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                <title>असंतोष की सर्दी: नागरिक बनाम धारा 144</title>
                                    <description><![CDATA[एक जीवंत लोकतंत्र नागरिकों के विरोध प्रदर्शन अथवा सभी की राय और सहमति-असहमति का सम्मान करता है। इस बडी राजनीतिक चुनौती के समक्ष सरकार को सभी पक्षों के साथ वार्ता शुरू करनी चाहिए और लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को बहाल करने के लिए तालमेल स्थापित करना चाहिए।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/winter-of-discontent-citizens-vs-section-144/article-11973"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/citizenship-amendment-prote-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong><em>-कुछ लोगों का मानना है कि नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर संघ की उस बडी योजना का अंग है जिनका उपयोग वह भारत के संविधान को बदलने का प्रयास कर रहा है। साथ ही वह लोगों को यह भी समझाने का प्रयास कर रहा है कि उत्पीडित अल्पसंख्यकों के संरक्षण का विरोध कौन करेगा। एक शिक्षाविद् के अनुसार भाजपा ने ऐतिहासिक दृष्टि से धार्मिक धु्रवीकरण का उपयोग एक चुनावी रणनीति के रूप में किया है और अब वह यही नीति अपनाकर कानून बना रही है और इस संबंध में नागरिकता संशोधन कानून सांकेतिक है क्योंकि इससे भारतीय नागरिक प्रभावित नहीं होते हैं।</em></strong></p>
<p style="text-align:justify;">यह संतोष का सर्दी का मौसम है। देश के सभी भागों में विभिन्न शहरों में आक्रोश और असंतोष व्याप्त है। विभिन्न शहरों में छात्र नागरिक समाज के कार्यकर्ता और राजनेता नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके चलते दिल्ली का जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और लखनऊ का नदवा विश्वविद्यालय और कई जिले युद्धक्षेत्र जैसे बन गए हैं और यह सरकार के प्रति उनके आक्रोश को प्रदर्शित करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कानून को लागू करने के संबंध में हिंसा की किसी को संभावना नहीं थी और इसके विरुद्ध हिंसा के चलते गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि यह कानून ऐसे किसी नागरिक की नागरिकता नहीं ले रहा है जो भारत में 1987 से पहले पैदा हुआ है या जिसके माता पिता 1987 से पहले भारत के नागरिक थे। इसमें किसी को भी नागरिकता संशोधन कानून को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए। सरकार ने बंगलौर, अहमदाबाद, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहरों आदि में धारा 144 लागू की है और प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध पुलिस कडी कार्यवाही कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु नागरिकता संशोधन कानून का तात्पर्य क्या है? क्या प्रत्येक नागरिक को अधिकरण के समक्ष पेश होना पडेगा और जो लोग इसमें विफल हो जाएंगे उन्हें विदेशी समझा जाएगा? नागरिकता साबित करने के लिए क्या दस्तावेज चाहिए? यह सच है कि इस कानून से उन हिन्दू, जैन, सिख, इसाईयों और पारसी शरणार्थियों को राहत मिली है जो भारत में विभिन्न शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं और अब उन्हें नागरिकता मिल जाएगी। किंतु इससे श्रीलंकाई हिन्दुओं और अफगानी मुस्लिम प्रवासियों की स्थिति में बदलाव नहीं आएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ लोगों का मानना है कि नागरिकता संशोधन कानून सभी धर्मों को समान मानने की संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। प्रश्न यह भी उठता है कि सरकार इन शरणार्थियों को कहां बसाएगी क्योंकि भारत में पहले ही जनसंख्या विस्फोट है और इन लोगों को नागरिकता देने से संसाधनों पर दबाव पडेगा तथा बेरोजगारी बढेÞगी। प्रश्न यह भी उठता है कि क्या धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण सत्तारूढ़ भाजपा की योजना का अंग है या नहीं। कुछ लोग जानना चाहते हैं कि क्या यह प्रदर्शन केवल मुसलमान कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध प्रदर्शन में लोगों को सरकार के प्रति अपने आक्रोश को व्यक्त करने का अवसर मिला है। पूर्वोत्तर क्षेत्र विशेषकर असम ने नागरिकता संशोधन कानून का सबसे पहले विरोध किया और उसे बंगाली हिन्दुओं समेत सभी अप्रवासियों से समस्या है। असम देश का पहला ऐसा राज्य है जहां पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाया गया और उसमें 19 लाख लोग शामिल नहीं किए गए जिनमें अधिकतर हिन्दू हैं किंतु यह विरोध प्रदर्शन केवल नागरिकता संशोधन कानून को लेकर है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्वोत्तर क्षेत्र के अलावा शेष देश के लोग सोचते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून विपक्षी पार्टियों द्वारा उठायी गयी एक सांप्रदायिक समस्या है। उनका मानना है कि नागरिकता संशोधन कानून और संपूर्ण देश में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर बनाने की संभावना भारत के संविधान के मूल चरित्र धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है। कांग्रेस सरकार पर आरोप लगा रही है कि वह जनता की आवाज दबा रही है जबकि मित्र से शत्रु बने शिव सेना के ठाकरे ने युवा बम की चेतावनी दी है और जामिया की घटना की जलियांवाला बाग की घटना से तुलना की।</p>
<p style="text-align:justify;">तमिलनाडू में द्रमुक के स्टालिन ने विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की तो केरल में इसके विरोध में माकपा के मुख्यमंत्री विजयन और विधान सभा में विपक्ष के नेता चेनीथला के बीच इस मुद्दे पर एकता देखने को मिली। तृणमूल की ममता सड़कों पर उतर कर इस मुद््दे पर संयुक्त राष्ट्र जनमत संग्रह की मांग कर रही है जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया था और उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पश्चिम बंगाल में नागरिकता संशोधन कानून या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर कानून लागू करने वाली नहीं है। उनका विरोध राजनीति प्रेरित है किंतु 2021 में राज्य में विधान सभा चुनाव होने हैं और राज्य के कुछ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या 30 से 35 प्रतिशत है। इसी तरह कांग्रेस शासित मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तथा आप शासित दिल्ली ने भी इस कानून को लागू न करने की बात कही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा के सहयोगियों में जद (यू) ने भी बिहार के संदर्भ में यही बात कही और गारंटी दी कि जब तक वे हैं राज्य में अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय नहीं होगा। विडंबना देखिए। संसद में नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में मतदान करने वाले बीजद के पटनायक ने भी इस कानून को ओडिशा में लागू करने से इंकार किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवा संघ भी नागरिकता संशोधन कानून के बारे में विशेषकर मुस्लिम जनता को अवगत कराने के लिए कार्यशालाएं और व्याख्यान देने की योजना बना रहा है। अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से मोदी की छवि पर प्रभाव पडा है। नागरिकता संशोधन कानून का प्रभाव यह रहा है कि जापान के प्रधानमंत्री आबे ने अपनी भारत यात्रा रद्द कर दी। अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि पश्चिमी देशों ने भी इसकी आलोचना की। बंगलादेश की शेख हसीना सरकार ने भी विदेश मंत्री का भारत दौरा स्थगित किया। भारत सरकार अफगानिस्तान और बंगलादेश में मित्र सरकारों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि वहां की वर्तमान सरकारों ने धार्मिक उत्पीडन नहीं किया है। हावर्ड और एमआईटी जैसे विश्वविद्यालयों ने पुलिस कार्यवाही की आलोचना की है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समाजशास्त्री के अनुसार नागरिकता संशोधन कानून के अंतर्गत उत्पीडित अल्पसंख्यकों की वापसी का अधिकार एक मूलवंशीय लोकतंत्र है जो भाजपा की हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा से मेल खाता है। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह मोदी-शाह के गुजरात मॉडल की पुनरावृति है जिसके अंतर्गत बांटो, धु्रवीकरण करो और लाभ उठाओ जिसके अनुसार नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर के विरुद्ध प्रदर्शन का दीर्घकालीन प्रभाव यह होगा कि गुजरात की तरह पूरे देश में मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक बन जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु संघ परिवार इसका यह कहकर प्रत्युत्तर देता है टुकडे टुकडे गैंग, शहरी नक्सलवादी और छद््म धर्मनिरपेक्षतावादी जितना अधिक विरोध करेंगे हिन्दुत्व के नायक के रूप में हमारी छवि उतनी ही मजबूत होगी। यह एक नए इतिहास का निर्माण होगा जहां पर मुस्लिम वोट बैंक राजनीति को राजनीतिक आत्महत्या समझा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर यह आवश्यक है कि केन्द्र, राज्य और सभी राजनीतिक दल नागरिकता संशोधन कानून-राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के बारे में गतिरोध दूर करने का प्रयास करें और शांति बनाए रखे। एक जीवंत लोकतंत्र नागरिकों के विरोध प्रदर्शन अथवा सभी की राय और सहमति-असहमति का सम्मान करता है। इस बडी राजनीतिक चुनौती के समक्ष सरकार को सभी पक्षों के साथ वार्ता शुरू करनी चाहिए और लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को बहाल करने के लिए तालमेल स्थापित करना चाहिए। देश में राष्ट्रवाद, वर्चस्ववाद के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है और इसका अमल भी किया जाने लगा है। वर्तमान में व्याप्त असंतोष बताता है कि भारत का लोकतंत्र अभी भी जीवंत है और आगे बढ़ रहा है।<br />
<em><strong>-पूनम आई कौशिश</strong></em></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Dec 2019 20:27:39 +0530</pubDate>
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                <title>विशेष: अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[विश्वभर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने व उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में इस दिवस को मनाने की शुरूआत की थी। जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के शिक्षा व संवैधानिक अधिकार का संरक्षण, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/protection-of-rights-of-minorities/article-7027"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/minorities-day.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्वभर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने व उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में इस दिवस को मनाने की शुरूआत की थी। जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के शिक्षा व संवैधानिक अधिकार का संरक्षण, आर्थिक सशक्तिकरण, महिला सशक्तिकरण, समान अवसर, कानून के तहत सुरक्षा व संरक्षण, कीमती परिसम्पत्तियों की सुरक्षा व आयोजना प्रक्रिया में सहभागिता प्रदान करना था। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ ने अल्पसंख्यकों को एक वैश्विक परिभाषा के तहत परिभाषित भी किया, जिसके अनुसार, ‘किसी राष्ट्र या राज्य में रहने वाला ऐसा समुदाय जो संख्याबल में कम हों तथा जो सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक रूप से निर्बल हो एवं जिनकी भाषा, धर्म, जाति बहुसंख्यकों से भिन्न होने के बाद भी राष्ट्र के निर्माण, विकास, एकता, संस्कृति, परंपरा व भाषा को बनाये रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हों, ऐसे किसी भी समुदाय को राष्ट्र व राज्य में अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म और भाषा को माना गया है। भारत की कुल जनसंख्या का अनुमानत: 19 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों का है। इसमें मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी शामिल हैं। जैन, बहाई और यहूदी अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन इन्हें संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। भारत सरकार ने अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1978 में अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया था। इसे बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत कानून के रूप में 1992 में पारित किया गया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वर्ष 2006 जनवरी में यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन कर दिया। इसे वे सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जो दीवानी अदालतों को हैं। इस आयोग का गठन भारत के लिए इसलिए भी महत्व रखता है, क्योंकि पूरे यूरोप के किसी भी राष्ट्र में ऐसा कोई आयोग नहीं है। आज भारत के कई अन्य राज्यों में भी राज्य अल्पसंख्यक आयोग हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के विकास के लिए शैक्षिक अधिकार और उनकी भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत विशेष प्रावधान किए गए हैं। देश की प्रत्येक इकाई में रह रहे सभी अल्पसंख्यकों को उनकी भाषा, लिपि तथा संस्कृति के संरक्षण का अधिकार है तथा देश में ऐसे कोई भी कानून व नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, जिनसे इन अल्पसंख्यकों की संस्कृति, भाषा व लिपि का शोषण हो। सभी धार्मिक, भाषायी व सामुदायिक अल्पसंख्यकों के साथ किसी भी राज्य शिक्षा संस्थान में भेदभाव नहीं किया जाएगा और न ही उन पर किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा थोपी जाएगी। सभी धार्मिक, भाषायी तथा सामुदायिक अल्पसंख्यक देश की प्रत्येक इकाई में अपनी इच्छानुसार कोई भी शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए स्वतंत्र हैं। किसी भी धार्मिक, भाषायी व सामुदायिक अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थानों को राज्य द्वारा अनुदान प्रदान करने में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, सवाल है कि अल्पसंख्यकों को इतने अधिकार और उनका संरक्षण उपलब्ध कराये जाने के बाद भी देश में यह समुदाय अशिक्षित व असक्षम रहकर अत्याचार झेलने को क्यों मजबूर है? आंकड़ों के अनुसार देश का हर चौथा भिखारी व सबसे अधिक अनपढ़ अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय ही है। अल्पसंख्यक समुदायों में मुसलमान 2.8 फीसदी, ईसाई 8.8 फीसदी और सिख 6.4 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। भारत में मुस्लिम समुदाय की कुल आबादी 14.23 फीसदी हैं व उनकी भिखारियों की आबादी में 24.9 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसके अलावा सच्चर आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो चुकी है। केवल अल्पसंख्यकों को अधिकार उपलब्ध कराने से उनका कायाकल्प संभव नहीं है जब तक तयशुदा अधिकारों की अनुपालना नहीं होगी तब तक उनकी स्थिति में परिवर्तन आना मुश्किल है।<br />
आवश्यकता है कि भारत में जम्मू-कश्मीर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, पंजाब और लक्षद्वीप में अल्पसंख्यक पर होने वाली लड़ाइयों का अंत करके इस शब्द को पुनर्परिभाषित कर देना अधिक बेहतर होगा ताकि अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के विवाद को सुलझाकर वास्तविक अर्थों में सुनिश्चित होने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा हेतु अविलंब कदम उठाए जा सकें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 18 Dec 2018 08:33:28 +0530</pubDate>
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                <title>भारत में अल्पसंख्यको को बहुसंख्यकों से भला कैसी असुरक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[नेताओं के पास यदि कुर्सी है, तब तक सब कुछ ठीक है। कुर्सी छिन जाए, तब वह अपना घटियापन दिखाने में देर नहीं लगाते। हाल ही में हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति के पद से रूखस्त हुए हैं और जाते-जाते जिक्र कर रहे थे कि देश के मुस्लमान अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। जबकि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/what-insecurity-is-good-for-minorities-in-india/article-3170"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/ansari1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नेताओं के पास यदि कुर्सी है, तब तक सब कुछ ठीक है। कुर्सी छिन जाए, तब वह अपना घटियापन दिखाने में देर नहीं लगाते। हाल ही में हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति के पद से रूखस्त हुए हैं और जाते-जाते जिक्र कर रहे थे कि देश के मुस्लमान अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। जबकि हामिद अंसारी लगातार दस वर्ष तक उपराष्ट्रपति रहे, तब उन्हें कभी असुरक्षा महसूस नहीं हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, हामिद अंसारी को महसूस हो रही असुरक्षा महज उनकी घटिया राजनीति के बोल मात्र हैं, जोकि इस क्षेत्र में हर मुस्लमान नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए आए दिन शोर मचाने के लिए बोलते रहते हैं। भाजपा व आरएसएस के नाम पर इस देश के कई नेता व राजनीतिक संगठन मुस्लमानों को आतंकित करते रहते हैं। ऐसे लोग भाजपा व आरएसएस के हर काम में अल्प संख्यकों के खिलाफ षड़यंत्र ढूंढते रहते हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे दुखद व आश्चर्य की बात यह है कि जो लोग मुस्लमानों की सुरक्षा व उन्नति की बात करते हैं, वह स्वयं कुछ भी ऐसा नहीं कर रहे, जिससे कि मुस्लमानों का विकास हो या उन्नति हो, कांग्रेस ने बहुत लंबे समय तक मुस्लिम अल्प संख्यकों के वोट के दम पर अपनी सत्ता चलाई है, लेकिन मुस्लिमों को कांग्रेस कुछ नहीं दे सकी। आज भी मुस्लिम आबादी का एक बड़ा वर्ग अशिक्षा, गरीबी एवं धार्मिक कुरीतियों के भंवर में फंसा हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुस्लिम नेताओं ने अपने समुदाय को इतना बरगला दिया कि वह भाजपा व आरएसएस से डरे रहें और मुड़ कर उन्हें ही वोट देते रहें, लेकिन अब यह नहीं होने वाला। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार देश में तीन साल पूरे करने जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सरकार ने मुस्लिम औरतों को सबला बनाया है, वह भी बिना पुरुषों का शोषण व उत्पीड़न किए। तीन तालाक की मान्यता अरब देशों ने भी समाप्त कर दी है, जो कि इस्लामिक राष्ट्र हैं, जबकि मुस्लिम हितैषी किसी भी व्यक्ति ने भारत में इस कुरीति को रोकने की चेष्टा नहीं की, जिससे कि मुस्लिम महिलाओं का आत्म सम्मान कुचला जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा व आरएसएस तीस करोड़ की मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी को भी देश के विकास में भागीदार देखना चाहती है, लेकिन कईयों के यह रास नहीं आ रहा। गाय के नाम पर कुछ लोगों ने धार्मिक नफरत फैलाने का प्रयास भी किया, परंतु भाजपा व आरएसएस ने हर मंच पर स्पष्ट कर दिया कि गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी हो रही है, जिस का भाजपा पुरजोर विरोध करती है और दोषियों को दंड दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत देश हर धर्म, जाति, भाषा वालों का देश है। अत: सबका दायित्व है कि वह एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश का विकास व उन्नति को बढ़ाएं। अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक यह लड़ाई स्वार्थी नेताओं की है। जिन्हें देश से प्यार है, उनके लिए यह बातें कोई मायने नहीं रखती।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Aug 2017 23:55:22 +0530</pubDate>
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                <title>लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जरूरी: अंसारी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का गुरुवार को कार्यकाल खत्म हो गया। राज्यसभा में स्पीच में उन्होंने कहा लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। इसके लिए उन्होंने राधाकृष्णन सर्वपल्ली के एक बयान का जिक्र किया। बता दें कि शुक्रवार को नए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कार्यभार संभालेंगे। इससे पहले नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/minorities-need-protection-in-democracy-ansari/article-3020"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/ansari.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong> उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का गुरुवार को कार्यकाल खत्म हो गया। राज्यसभा में स्पीच में उन्होंने कहा लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। इसके लिए उन्होंने राधाकृष्णन सर्वपल्ली के एक बयान का जिक्र किया। बता दें कि शुक्रवार को नए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कार्यभार संभालेंगे। इससे पहले नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यसभा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के लिए विदाई स्पीच दी।</p>
<h1 style="text-align:justify;">मोदी ने कहा- अंसारीजी, अपनी यादें छोड़कर जा रहे हैं</h1>
<p style="text-align:justify;"> नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यसभा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के लिए विदाई स्पीच दी। उन्होंने कहा कि अंसारीजी, अपनी यादें छोड़कर जा रहे हैं। उनके किए गए कामों को याद किया जाएगा। उन्होंने एक डिप्लोमैट के रूप में करियर शुरू किया था और वो काफी शानदार रहा।</p>
<h1 style="text-align:justify;">किस नेता ने क्या कहा?</h1>
<p style="text-align:justify;">गुलाम नबी आजाद ने कहा कि जिस तरह से आपने सदन को चलाया वह सराहनीय है| आपका यह कार्यकाल शानदार रहा। अरुण जेटली ने कहा, आज का दिन बहुत अहम है। हम इस सदन में आपके सभापति के तौर पर 10 साल का टेन्योर पूरा करने के बाद विदाई दे रहे हैं। आपके टेन्योर में काफी अच्छी चर्चा हुईं। एसपी मेंबर राम गोपाल यादव ने कहा- अंसारी ने बिना किसी के भेदभाव के सदन को चलाया।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी किसी भी कानून को बिना चर्चा के पास होने की मंजूरी नहीं दी। मैं आशा करता हूं कि अगले सभापति भी इस परंपरा को बनाए रखेंगे। टीएमसी मेंबर डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि अंसारी योग करते हैं और अच्छी सेहत को बनाए रखने के लिए शाम को टहलने जाते हैं। वे पिछले 40 साल से लंच में सेंडविच खाते आ रहे हैं। यह वर्ल्ड रिकॉर्ड होना चाहिए।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Aug 2017 02:52:47 +0530</pubDate>
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