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                <title>protection - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>भाजपा का गौरक्षा का नारा और दावा झूठा : Bhupendra Hooda</title>
                                    <description><![CDATA[गौशालाओं के रखरखाव और खानपान के अभाव में गायों की मौत की खबरें आती रहती हैं। सड़कों पर भी बेसहारा गौवंश हादसों का शिकार या हादसों की वजह बनता रहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सिर्फ गाय के नाम वोट मांगती है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/bjps-slogan-of-cow-protection-and-claim-false-hooda/article-12736"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/bhupendra-hooda-2.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सिरसा में हुई हजारों मौतों के साथ गौ सेवा आयोग की तमाम राशि और खर्च की जांच होनी चाहिए (<span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Bhupendra Hooda</span></span>)</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा (<span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Bhupendra Hooda</span></span>) ने सिरसा जिले की गौशालाओं में गत लगभग सवा साल में 10,772 गायों की मौतों को लेकर भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) पर निशाना साधते हुए कहा कि उसका एकमात्र जोर गाय के नाम पर वोट बटोरने पर रहता है उनकी हालत सुधारने पर नहीं। हुड्डा ने जारी एक बयान में कहा कि गौशाला और सड़कों पर हरोज गौवंश की मौत हो रही है। उन्होंने बताया उनकी आरटीआई के जरिए जानकारी मिली है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">सिरसा जिले की गौशालाओं में महज सवा साल के भीतर 10,772 गौवंश की मौत हो चुकी है।</li>
<li style="text-align:justify;">अप्रैल 2017 से जुलाई 2018 के बीच 16 महीने के दौरान हर महीने औसतन 673 गौवंश ने दम तोड़ा।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">राज्य सरकार ने इन हजारों मौतों की दर्दनाक घटना को प्रदेश की जनता से छिपाए रखा</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">लेकिन आरटीआई से हुए खुलासे ने भाजपा के गौरक्षा वाले नारे और दावे की पोल खोल दी है।</li>
<li style="text-align:justify;"> जब से हरियाणा में भाजपा सरकार आई है गौवंश की हालत लोगों से छिपी नहीं है।</li>
<li style="text-align:justify;">गौशालाओं के रखरखाव और खानपान के अभाव में गायों की मौत की खबरें आती रहती हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">सड़कों पर भी बेसहारा गौवंश हादसों का शिकार या हादसों की वजह बनता रहता है।</li>
<li style="text-align:justify;">आरोप लगाया कि भाजपा सिर्फ गाय के नाम वोट मांगती है।</li>
<li style="text-align:justify;">लेकिन उसकी दयनीय हालत देखकर आंख बंद कर लेती है ।</li>
</ul>
<h3>गौमाता के लिए दान में मिलने वाली राशि भी गौशाला में खर्च करने के बजाए घोटाले की भेंट चढ़ रही है</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने मनसा देवी चारा घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि गत दिनों गौ सेवा आयोग के तहत पंचकूला की मनसा देवी गौशाला में चारा घोटाले की शिकायत सामने आई थी। उस पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। कांग्रेस नेता ने आशंका जताई कि गौमाता के लिए दान में मिलने वाली राशि भी गौशाला में खर्च करने के बजाए घोटाले की भेंट चढ़ रही है। इसलिए जरूरी है कि सिरसा में हुई हजारों मौतों के साथ गौ सेवा आयोग की तमाम राशि और खर्च की जांच होनी चाहिए।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">साथ ही तमाम सरकारी गौशालाओं की व्यवस्थाओं और रखरखाव की भी</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">         उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि और मौतों को रोका जा सके।</p>
<p> </p>
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<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Jan 2020 19:03:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>विशेष: अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[विश्वभर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने व उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में इस दिवस को मनाने की शुरूआत की थी। जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के शिक्षा व संवैधानिक अधिकार का संरक्षण, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/protection-of-rights-of-minorities/article-7027"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/minorities-day.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्वभर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने व उनके योगदान को राष्ट्र निर्माण में सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में इस दिवस को मनाने की शुरूआत की थी। जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के शिक्षा व संवैधानिक अधिकार का संरक्षण, आर्थिक सशक्तिकरण, महिला सशक्तिकरण, समान अवसर, कानून के तहत सुरक्षा व संरक्षण, कीमती परिसम्पत्तियों की सुरक्षा व आयोजना प्रक्रिया में सहभागिता प्रदान करना था। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ ने अल्पसंख्यकों को एक वैश्विक परिभाषा के तहत परिभाषित भी किया, जिसके अनुसार, ‘किसी राष्ट्र या राज्य में रहने वाला ऐसा समुदाय जो संख्याबल में कम हों तथा जो सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक रूप से निर्बल हो एवं जिनकी भाषा, धर्म, जाति बहुसंख्यकों से भिन्न होने के बाद भी राष्ट्र के निर्माण, विकास, एकता, संस्कृति, परंपरा व भाषा को बनाये रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हों, ऐसे किसी भी समुदाय को राष्ट्र व राज्य में अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म और भाषा को माना गया है। भारत की कुल जनसंख्या का अनुमानत: 19 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों का है। इसमें मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी शामिल हैं। जैन, बहाई और यहूदी अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन इन्हें संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। भारत सरकार ने अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1978 में अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया था। इसे बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत कानून के रूप में 1992 में पारित किया गया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वर्ष 2006 जनवरी में यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन कर दिया। इसे वे सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जो दीवानी अदालतों को हैं। इस आयोग का गठन भारत के लिए इसलिए भी महत्व रखता है, क्योंकि पूरे यूरोप के किसी भी राष्ट्र में ऐसा कोई आयोग नहीं है। आज भारत के कई अन्य राज्यों में भी राज्य अल्पसंख्यक आयोग हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के विकास के लिए शैक्षिक अधिकार और उनकी भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत विशेष प्रावधान किए गए हैं। देश की प्रत्येक इकाई में रह रहे सभी अल्पसंख्यकों को उनकी भाषा, लिपि तथा संस्कृति के संरक्षण का अधिकार है तथा देश में ऐसे कोई भी कानून व नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, जिनसे इन अल्पसंख्यकों की संस्कृति, भाषा व लिपि का शोषण हो। सभी धार्मिक, भाषायी व सामुदायिक अल्पसंख्यकों के साथ किसी भी राज्य शिक्षा संस्थान में भेदभाव नहीं किया जाएगा और न ही उन पर किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा थोपी जाएगी। सभी धार्मिक, भाषायी तथा सामुदायिक अल्पसंख्यक देश की प्रत्येक इकाई में अपनी इच्छानुसार कोई भी शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए स्वतंत्र हैं। किसी भी धार्मिक, भाषायी व सामुदायिक अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थानों को राज्य द्वारा अनुदान प्रदान करने में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, सवाल है कि अल्पसंख्यकों को इतने अधिकार और उनका संरक्षण उपलब्ध कराये जाने के बाद भी देश में यह समुदाय अशिक्षित व असक्षम रहकर अत्याचार झेलने को क्यों मजबूर है? आंकड़ों के अनुसार देश का हर चौथा भिखारी व सबसे अधिक अनपढ़ अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय ही है। अल्पसंख्यक समुदायों में मुसलमान 2.8 फीसदी, ईसाई 8.8 फीसदी और सिख 6.4 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। भारत में मुस्लिम समुदाय की कुल आबादी 14.23 फीसदी हैं व उनकी भिखारियों की आबादी में 24.9 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसके अलावा सच्चर आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो चुकी है। केवल अल्पसंख्यकों को अधिकार उपलब्ध कराने से उनका कायाकल्प संभव नहीं है जब तक तयशुदा अधिकारों की अनुपालना नहीं होगी तब तक उनकी स्थिति में परिवर्तन आना मुश्किल है।<br />
आवश्यकता है कि भारत में जम्मू-कश्मीर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, पंजाब और लक्षद्वीप में अल्पसंख्यक पर होने वाली लड़ाइयों का अंत करके इस शब्द को पुनर्परिभाषित कर देना अधिक बेहतर होगा ताकि अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के विवाद को सुलझाकर वास्तविक अर्थों में सुनिश्चित होने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा हेतु अविलंब कदम उठाए जा सकें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 18 Dec 2018 08:33:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजनीति में बढ़ता अपराधों को सरंक्षण</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति के अपराधीकरण का मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चिंता जताई है वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि सर्वोच्च अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। केंद्र सरकार की इस दलील के पीछे तर्क यह है कि अधिकांश मामलों में नेता बरी हो जाते हैं। यानि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/protection-of-increasing-crimes-in-politics/article-5916"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/protection-of-increasing-crimes-in-politics.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजनीति के अपराधीकरण का मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चिंता जताई है वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि सर्वोच्च अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। केंद्र सरकार की इस दलील के पीछे तर्क यह है कि अधिकांश मामलों में नेता बरी हो जाते हैं। यानि केवल आरोपों के आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित कर देना गलत होगा। दूसरी ओर न्यायाधीशों की राय भी इस मामले में बंटी हुई है। मसलन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का मानना है कि चुनाव आयोग खुद ही यह नियम बना सकता है कि आपराधिक मामलों में लिप्त उम्मीदवार को पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं दिया जाएगा। दो अन्य न्यायाधीश भी चीफ जस्टिस के इस मत का समर्थन करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन एक अन्य न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा का कहना है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है। यानि विपक्षी नेता उम्मीदवारों पर गलत आरोप लगा सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आशंकाओं के मद्देनजर राजनीति के अपराधीकरण से आंखें मींच ली जाएं? सरकार की ओर से अटार्नी जनरल कहते हैं कि इस मसले पर न्यायपालिका संसद के अधिकार क्षेत्र को अपने हाथ में ले रही है यानि विधायिका के अधिकार पर अतिक्रमण कर रही है। जबकि प्रधान न्यायाधीश का कहना है कि संसद जब तक कानून नहीं बनाए तब तक क्या अदालत को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए। जाहिर तौर पर राजनीति की मंशा इस मसले पर पारदर्शी नहीं दिखती।</p>
<p style="text-align:justify;">अपराध मुक्त राजनीति को लेकर संसद और सड़क पर बड़े-बड़े नेताओं ने बड़ी-बड़ी बातें कहीं। लेकिन अदालत में अटार्नी जनरल द्वारा रखा गया पक्ष इस बात की तस्दीक करता है वे सिर्फ बातें थीं, इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं। ऐसे में यदि सर्वोच्च अदालत कोई फैसला सुना भी दे तो उसका पालन होने में संदेह है। न्यायपालिका के कई फैसले ऐसे हैं जिनका पालन होने में लापरवाही बरती जा रही है। दरअसल कानून चाहे संसद बनाए चाहे सुप्रीम कोर्ट के आदेश से देश में कोई नियम लागू हो, उसका पालन होने में तब तक संदेह बना ही रहेगा जब तक पालन करवाने वाला इच्छाशक्ति नहीं दिखाएगा। संविधान में छुआछूत को गैरकानूनी घोषित किया गया है और सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं लेकिन क्या आजादी के 71 साल बाद भी समाज से छुआछूत मिट सकी है? क्या महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी मिल सकी है? ऐसे में जब सरकार खुद ही सुप्रीम कोर्ट को इस मसले से दूर रहने की सलाह दे तो लगता है सियासत खुद अपराधमुक्त नहीं होना चाहती।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Sep 2018 13:29:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण संरक्षण को परम्पराओं से जोड़ना सार्थक पहल</title>
                                    <description><![CDATA[विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा में कमोबेस सभी जगह गिरावट देखी जाने लगी है डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा राजनीति के अखाड़े बने देश के विश्वविद्यालयों की दशा और दिशा के संदर्भ में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की पहल निश्चित रुप से ताजी हवा का झोंका है। देश की उच्च शिक्षा और खासतौर से विश्वविद्यालयों के हालातों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/meaningful-initiative-linking-environment-protection-to-traditions/article-4758"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/arical.jpg" alt=""></a><br /><h2>विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा में कमोबेस सभी जगह गिरावट देखी जाने लगी है</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति के अखाड़े बने देश के विश्वविद्यालयों की दशा और दिशा के संदर्भ में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की पहल निश्चित रुप से ताजी हवा का झोंका है। देश की उच्च शिक्षा और खासतौर से विश्वविद्यालयों के हालातों को देखते हुए राजस्थान के राजभवन से प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को जिस तरह का संदेश दिया गया है वह निश्चित रुप से आज की आलोचना-प्रत्यालोचना और राजभवन को सियासी नजरिएं से देखते चहुंऔर कमियां ढंूढ़ते बुद्धिजीवियों के लिए भी किसी तमाचे से कम नहीं माना जा सकता। दरअसल देश के विश्वविद्यालयों की अध्ययन-अध्यापन और शोध संदर्भ की स्थिति से कोई अनभिज्ञ नहीं है। विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा में कमोबेस सभी जगह गिरावट देखी जाने लगी है। शोध और अध्ययन कहीं पीछे छूट गया है।</p>
<h2>दुनिया के शैक्षणिक संस्थानों की सूची में  हमारे विश्वविद्यालयों का नाम दूर तक दिखाई नहीं देता हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के शैक्षणिक संस्थानों की सूची में ढूंढ़ने पर भी हमारे विश्वविद्यालयों का नाम दूर तक दिखाई नहीं देता हैं। कभी दुनिया के 100 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में नाम ढूंढते रह जाते हैं तो कहीं दो सौ की सूची में भी तलाश बनी रहती है। यह सब तो तब है जब विश्वविद्यालय एक तरह से स्वतंत्र है। हांलाकि स्वतंत्रता या यों कहें कि स्वायत्तता का दुरुपयोग भी आम होता जा रहा है। अभी पिछले दो तीन सालों में जिस तरह से देश के नामचीन विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी जुमलों और नारों और इनके समर्थन में सियासी नोटंकी से सारा देश वाकिफ है। आखिर शिक्षण संस्थान अपनी गरिमा बनाए रखने में भी सफल नहीं हो पाते हैं या यों कहें कि स्वायत्तता के नाम पर देश विरोधी गतिविधियां खुलेआम की जाती हो तो इससे अधिक दुर्भाग्यजनक क्या होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में यह स्थितियां चिंतनीय और समूचे देश को चेताने वाली है। यदि स्वतंत्रता के नाम पर देश विरोधी गतिविधियां की जाती हैं तो उसे किसी भी वुद्धिजीवी या राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक रोटियां सेंकने के प्रयास किए जाते हैं तो इसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। विश्वविद्यालयों के माहौल की तो यह स्थितियां हो गई कि पहले कुलपति बनने या प्रशासनिक पद पाने के लिए जोड़ तोड़ में लगे रहना और इस सबसे परे नए कुलपति से गोटियां नहीं बैठती हैं या हित नहीं सधते है तो दूसरे दिन से ही शिकायतों व विरोध की राह पकड़ लेना आम होता जा रहा है। इन सबसे विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल कहीं खो जाता है। यह सभी विश्वविद्यालयों के लिए लागू नहीं होता पर कमोबेस इस तरह की स्थिति देश के अधिकांश स्थानों पर आम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने राजस्थान के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को विश्वविद्यालयों के स्तर को सुधारने के लिए 12 सूत्र दिए हैं। इन 12 सूत्रों में खासबात यह है कि राज्यपाल कल्याण सिंह ने विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन, गुणवतापूर्ण शोध पर जोर दिया है वहीं पर्यावरण, सामाजिक संवेदनशीलता, छात्रों की व्यवस्थित जीवन शैली साथ ही सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की दिशा में भी कार्य योजना बनाकर आगे आने को कहा है। आखिर देश का भविष्य भावी पीढ़ी यानी की युवाओं के हाथों में ही है और उनको अच्छा शैक्षणिक माहौल, उच्च संवेदनशीलता, पर्यावरण की समझ और क्रियान्वयन, सामाजिक सरोकार के तहत स्मार्ट विलेज जैसी गतिविधियों से जुड़कर सहभागी बनने, जैसी 12 सूत्रों में उन सभी बिन्दुओं का समावेश किया गया है जो बदलते सामाजिक ताने बाने में आज की आवश्यकता बनता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल की यह पहल इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि राजभवनों पर आए दिन केवल और केवल केन्द्र के इशारों पर राजनीतिक निर्णय करने के आरोप लगाए जाते रहते हैं। 12 सूत्रों में खासबात यह है कि सभी पहलूआें को नजदीक से समझा गया है और उसी के आधार पर यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी समग्र रुप से हालातों को सुधारने की संदेश हैं। छात्रों पर कक्षाएं गोल करने के आरोप लगते रहते हैं पर शिक्षकों के भी कक्षाएं गोल करना किसी से छुपा नहीं होने के कारण ही बायोमोट्रिक उपस्थिति की बात की गई है। शोध कार्यों की गुणवत्ता पर जोर दिया जाना तो खैर पहली शर्त और आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">खासबात यह है कि राजस्थान के राज्यपाल ने 12 सूत्र भेजकर औपचारिकता पूरी नहीं की हैं अपितु इसके प्रति गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि कुलपतियों की समन्वय समिति की बैठक का इन 12 सूत्रों पर रिव्यू किया जाना स्थाई एजेण्डा का हिस्सा बनाया गया है। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की यह पहल निश्चित रुप से सराहनीय है। अन्य राज्यों के महामहिमों द्वारा भी इस तरह के नवाचार निश्चित रुप से किए जाते होंगे। सियासी चालों, राजभवनों पर आरोपों-प्रत्यारोपों से परे इस तरह के नवाचारों की सराहना की जानी चाहिए ताकि सियासी राजनीति से परे होने वाले इस तरह के कार्य जगजाहिर हो, इनका इम्फेक्ट सामने आ सके।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Jul 2018 05:47:53 +0530</pubDate>
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                <title>लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जरूरी: अंसारी</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/minorities-need-protection-in-democracy-ansari/article-3020"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/ansari.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong> उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का गुरुवार को कार्यकाल खत्म हो गया। राज्यसभा में स्पीच में उन्होंने कहा लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। इसके लिए उन्होंने राधाकृष्णन सर्वपल्ली के एक बयान का जिक्र किया। बता दें कि शुक्रवार को नए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कार्यभार संभालेंगे। इससे पहले नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यसभा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के लिए विदाई स्पीच दी।</p>
<h1 style="text-align:justify;">मोदी ने कहा- अंसारीजी, अपनी यादें छोड़कर जा रहे हैं</h1>
<p style="text-align:justify;"> नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यसभा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के लिए विदाई स्पीच दी। उन्होंने कहा कि अंसारीजी, अपनी यादें छोड़कर जा रहे हैं। उनके किए गए कामों को याद किया जाएगा। उन्होंने एक डिप्लोमैट के रूप में करियर शुरू किया था और वो काफी शानदार रहा।</p>
<h1 style="text-align:justify;">किस नेता ने क्या कहा?</h1>
<p style="text-align:justify;">गुलाम नबी आजाद ने कहा कि जिस तरह से आपने सदन को चलाया वह सराहनीय है| आपका यह कार्यकाल शानदार रहा। अरुण जेटली ने कहा, आज का दिन बहुत अहम है। हम इस सदन में आपके सभापति के तौर पर 10 साल का टेन्योर पूरा करने के बाद विदाई दे रहे हैं। आपके टेन्योर में काफी अच्छी चर्चा हुईं। एसपी मेंबर राम गोपाल यादव ने कहा- अंसारी ने बिना किसी के भेदभाव के सदन को चलाया।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी किसी भी कानून को बिना चर्चा के पास होने की मंजूरी नहीं दी। मैं आशा करता हूं कि अगले सभापति भी इस परंपरा को बनाए रखेंगे। टीएमसी मेंबर डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि अंसारी योग करते हैं और अच्छी सेहत को बनाए रखने के लिए शाम को टहलने जाते हैं। वे पिछले 40 साल से लंच में सेंडविच खाते आ रहे हैं। यह वर्ल्ड रिकॉर्ड होना चाहिए।</p>
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</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
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                <pubDate>Thu, 10 Aug 2017 02:52:47 +0530</pubDate>
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