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                <title>चीन को हांगकांग की स्वतंत्रता समाप्त नहीं करने देंगे: अमेरिका</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन।  अमेरिका ने हांगकांग में लागू किए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि वह चुपचाप नहीं बैठेगा और किसी भी परिस्थिति में चीन को हांगकांग पर मनमाना कानून लागू कर उसकी स्वतंत्रता का हनन नहीं करने देगा। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी कर कहा, “ चीन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/will-not-let-china-end-hong-kong-independence-us/article-16428"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-07/america-will-reopen-consulate-in-wuhan-china.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन।</strong>  अमेरिका ने हांगकांग में लागू किए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि वह चुपचाप नहीं बैठेगा और किसी भी परिस्थिति में चीन को हांगकांग पर मनमाना कानून लागू कर उसकी स्वतंत्रता का हनन नहीं करने देगा। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी कर कहा, “ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा हांगकांग पर मनमाना एवं कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने के फैसले से हांगकांग की स्वायत्तता और स्वतंत्रता समाप्त हो जायेगी। इससे चीन की उपलब्धि भी नष्ट हो जायेगी।”</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी वक्तव्य के मुताबिक हांगकांग ने दुनिया को दिखाया है कि स्वतंत्र चीनी लोग बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं। हांगकांग दुनिया में एक सफल अर्थव्यवस्था होने के साथ ही विभिन्नताओं वाला समाज होने जैसी मिसाल भी पेश करता है। इससे पहले अमेरिका ने हांगकांग को रक्षा उपकरणों तथा संवेदनशील प्रौद्योगिकी के निर्यात पर रोक लगाने की घोषणा की है। गौरतलब है कि चीन ने हांगकांग में एक विवादास्पद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू कर दिया है। दुनिया भर के विश्लेषकों का मानना है कि इस कानून से हांगकांग की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा पैदा होगा। हांगकांग के अलावा अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में इस कानून के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2020 10:59:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>स्पेन से आजादी के लिए बार्सिलोना में जमा हुए कैटेलियन प्रदर्शनकारी</title>
                                    <description><![CDATA[कैटेलन झंडे लिए ग्रामीण क्षेत्रों से गुजरे कैटेलोनिया के लोग बार्सिलोना (एजेंसी) स्पेन के स्वायत समुदाय कैटेलोनिया के करीब 10 लाख लोग स्पेन से आजादी के लिए बार्सिलोना में जमा हो हुए और कैटेलोनिया का संस्मारक दिवस मनाया। बार्सिलोना में कैटेलोनिया के लोग ट्रेक्टरों पर सवार होकर लाल टीशर्ट में ने कैटेलन झंडे लिए ह्यगणराज्य निर्माणह्ण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/catalan-protesters-depositing-in-barcelona-for-independence-from-spain/article-5893"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/spen.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">कैटेलन झंडे लिए<strong> </strong>ग्रामीण क्षेत्रों से गुजरे कैटेलोनिया के लोग</h1>
<p><strong>बार्सिलोना (एजेंसी)</strong> स्पेन के स्वायत समुदाय कैटेलोनिया के करीब 10 लाख लोग स्पेन से आजादी के लिए बार्सिलोना में जमा हो हुए और कैटेलोनिया का संस्मारक दिवस मनाया। बार्सिलोना में कैटेलोनिया के लोग ट्रेक्टरों पर सवार होकर लाल टीशर्ट में ने कैटेलन झंडे लिए ह्यगणराज्य निर्माणह्ण के नारे लगाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों से गुजरे।</p>
<p>लाखों कैटेलियन कैटेलोनिया के नेता क्यूइम टोरा और कार्ल्स पुइगडेमोंट के आह्वान पर बार्सिलोना में जमा हुए थे। कैटेलोनिया में जनमत संग्रह और सरकार गठन के बाद अक्टुबर में स्पेन सरकार की कैटेलियन सरकार को बर्खास्त कर दिया था जिसके बाद पुइगडेमोंट बेल्जियम भाग गये थे।</p>
<p>स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज पूर्ववर्ती सरकार की बजाय कैटेलोनिया के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति लचीला रुख अपनाया हुआ है लेकिन वह भी कैटेलोनिया की आजादी के लिए किये गये जनमत संग्रह को मान्यता देने के खिलाफ हैं।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Sep 2018 10:58:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>स्वतंत्रता बाद की उपलब्धियां और चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[आजादी के सात दशक बाद भी यह सवाल जेरेबहस है कि आजादी की जंग के दौरान जो सपने बुने-गढ़े गए थे क्या वे पूरे हुए हैं? क्या समाज के अंतिम पांत का अंतिम व्यक्ति आजादी के लक्ष्य को हासिल कर लिया है? दो राय नहीं कि आजादी के बाद इन सात दशकों में देश ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/later-achievements-and-challenges-of-independence/article-5394"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/day.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आजादी के सात दशक बाद भी यह सवाल जेरेबहस है कि आजादी की जंग के दौरान जो सपने बुने-गढ़े गए थे क्या वे पूरे हुए हैं? क्या समाज के अंतिम पांत का अंतिम व्यक्ति आजादी के लक्ष्य को हासिल कर लिया है? दो राय नहीं कि आजादी के बाद इन सात दशकों में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है और वैश्विक जगत में भारत का परचम लहराया है। पर गौर करने वाली बात यह है कि देश आज भी गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से उबर नहीं पाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि इन सात दशकों की उपलब्ध्यिों और चुनौतियों का मूल्यांकन हो। अगर उपलब्धियों की बात करें तो नि:संदेह देश प्रगति की राह पर अग्रसर है। देश की अधिकांश आबादी जो कृषि कार्य से जुड़ी है उनकी जीवन शैली में बदलाव हुआ है और किसानों की हालत सुधरी है। फसलों की उत्पादकता बढ़ी है और राष्ट्रीय आय का लगभग 28 प्रतिशत भाग कृषि आय से प्राप्त हो रहा है। कृषि कार्य हेतु भूमि उपयोग बढ़कर 43.05 प्रतिशत हो गया है। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और बिचैलियों की भूमिका समाप्त होने से किसानों को उनके उत्पादों की अच्छी आय मिलने लगी है और उत्तम कृषि उत्पादन ने अर्थव्यवस्था और उद्योग-धंधों का विस्तार किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां लघु एवं कुटीर उद्योगों ने हर हाथ को काम दिया है वहीं बड़े पैमाने के उद्योगों ने रोजगार सृजन के साथ तीव्र औद्योगीकरण की नींव को मजबूत की है। औद्योगीकरण और वैश्वीकरण ने भारतीय शिक्षा, विज्ञान व संचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। आज देश में कई विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान हैं जिनकी बदौलत भारतीय छात्र देश-दुनिया में रोज नए-नए इनोवेशन कर रहे हैं। विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन-इसरो ने कीर्तिमान रच दिया है। अब इसरो के जरिए स्वदेशी उपग्रहों के साथ कई विदेशी उपग्रह एक साथ भेजे जा रहे हैं। इन सात दशकों में देश में सामाजिक सुरक्षा व सेवाओं का भी विस्तार हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आज देश में पोषण सुरक्षा की देखभाल राष्ट्रीय तैयार मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम, समन्वित बाल विकास योजना, किशोरी शक्ति योजना, किशोर लड़कियों के लिए पोषण कार्यक्रम और प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना चलायी जा रही है। राष्ट्रीय तैयार मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम लगभग पूरे भारत में चल रहा है। समन्वित बाल विकास योजना का विस्तार भी चरणबद्ध ढंग से हो रहा है। 11 से 18 वर्ष तक की उम्र की लड़कियों के पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी विकास के लिए सरकार ने किशोरी शक्ति विकास योजना को हर जगह लागू किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अरसे से श्रम आंदोलन के तहत सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम लागू करने की मांग की जाती रही जिसे सरकार ने 2005 के मध्य में लागू कर दिया। इस अधिनियम के तहत कोई भी वयस्क व्यक्ति जो न्यूनतम मजदूरी पर आकस्मिक श्रम करने के लिए इच्छुक है वह 15 दिनों के अंदर स्थानीय जनकार्य में रोजगार पाने के लिए पात्र होगा। इसके अंतर्गत लोगों को वर्ष में उसके निवास से एक किमी के भीतर 100 दिनों का काम दिए जाने का प्रावधान लागू किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यों के अंतरगत लक्षित जन वितरण प्रणाली के तहत पहचान किए गए गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों में से, अत्यंत ही गरीब एक करोड़ परिवारों की पहचान करने का कार्य अंत्योदय योजना के तहत किया गया है। इन परिवारों को 2 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं और 3 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से चावल मुहैया कराया जाता है। सामाजिक सुरक्षा के तहत रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन रणनीति के तहत सरकार द्वारा स्वरोजगार योजना और दिहाड़ी रोजगार योजना चलाया जा रहा है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग को संशोधित कर लघु एवं ग्रामीण उद्योगों के जरिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार सृजन करने के लिए सुनिश्चित किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">असंगठित क्षेत्र को सामाजिक सुरक्षा से लैस करने के लिए राश्ट्रीय उद्यम आयोग की स्थापना एक पारदर्शी निकाय के रुप में की गयी है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि आज भी देश जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी और लैंगिक असमानता से मुक्त नहीं हो पाया है। देश की एक बड़ी आबादी आज भी जीवन की मूलभूत सुविधाओं मसलन रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि देश में 27 करोड़ लोग गरीब हैं। 68 करोड़ लोग ऐसे हैं जो बुनियादी सुविधाओं से महरुम हैं। आर्थिक विषमता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ्रीका की तुलना में भारत में दोगुने बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण के शिकार पांच साल से कम उम्र के चार करोड़ बच्चों का शारीरिक विकास नहीं हो पाया है। शिशु मृत्यु दर की हालात और भयावह है। 2015 में देश में पैदा होने वाले प्रति हजार बच्चों पर 37 बच्चों की मृत्यु हुई। बच्चे किस्म-किस्म की गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं। मेटरनल मॉर्टेलिटिी रेशियो (एमएमआर) और इंटरनेशनल प्रेग्नेंसी एडवाइजरी सर्विसेज की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असुरक्षित गर्भपात से हर दो घंटे में एक स्त्री मर रही है। गांवों में डॉक्टरों की भारी कमी है। 90 फीसद गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर कड़े कानून के बाद भी महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">लैंगिंक असमानता जस की तस बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की ह्यद वर्ल्डस वीमेन 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र की लड़कियों की मौत इसी उम्र के लड़कों की तुलना में ज्यादा होती है। लेकिन अगर श्रम बल में महिलाओं की संख्या को पुरुषों की संख्या के समान की जाए तो भारत की जीडीपी 27 फीसद तक बढ़ सकती है। सख्त कानूनों के बावजूद भी इस समय देश में सवा करोड़ से अधिक बाल श्रमिक मौजूद हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वयं स्वीकार चुका है कि उसके पास बालश्रम के हजारों मामले दर्ज हैं। रोजगार के मामले में भी स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। श्रम मंत्रालय की श्रम ब्यूरो द्वारा जारी सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में बेरोजगारी की दर में लगातार वृद्धि हो रही है। 2016 में बेरोजगारों की संख्या 1.77 करोड़ थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस साल यह संख्या 1.78 करोड़ और 2018 में 1.8 करोड़ हो सकती है। यह राहतकारी है कि भारत सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया के जरिए सन 2022 तक 40 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। शिक्षा की बात करें तो शिक्षा का अधिकार कानून तथा सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं के बावजूद भी लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा की परिधि से बाहर हैं। कुल सरकारी खर्च का 20 फीसद हिस्सा शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। लेकिन इस मद में 4 फीसद तक भी ही खर्च नहीं हो पा रहा। न्यायिक मोर्चे पर भी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हो रही है। शीध्र व सस्ता न्याय की चुनौती जस की तस बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2015 तक सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों सहित देश की सभी अदालतों में 2.64 करोड़ मुकदमें लंबित थे। मुकदमों के निस्तारण में दशकों का वक्त लग रहा है। पर्यावरण के मोर्चे पर भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में देश की राजधानी दिल्ली शीर्ष पर है। देश में सालाना 12 लाख से अधिक लोगों की मौत प्रदूषण से होती है। 2015 में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 6.3 फीसद रही।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में सड़क हादसे से हर वर्ष लाखों लोग काल के मुंह में जा रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक देश में सड़क नियम का पालन न होने से पिछले एक दशक में 13 लाख से अधिक लोग सड़क हादसों में मारे गए हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि लोकतंत्र का मंदिर संसद भी अपने उत्तरदायित्वों के प्रति गंभीर नहीं है। संसद में कामकाज का समय घटता जा रहा है और गैरजरुरी मसलों पर समय जाया किया जा रहा है। देश के राजनेताओं और जनमानस दोनों को समझना होगा कि देश महान व समृद्ध तभी बनेगा जब आजादी के लक्ष्य को हासिल किया जाएगा।</p>
<p> </p>
<p><strong>अरविंद जयतिलक</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Thu, 16 Aug 2018 11:56:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वतंत्रता दिवस को लेकर अलर्ट, रैडम चेकिंग शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ)।  आजादी के जश्न को लेकर सुरक्षा बलों ने कमर कस ली है। जिसकों लेकर दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर सुरखा के कड़े इंतेजाम किए हैं। इस दौरानआमजन को चेकिंग के साथ रैंडम स्क्रीनिंग से भी गुजरना पड़ सकता है। 15 अगस्त तक जारी हाई अलर्ट दौरान सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/alert-on-independence-day-random-checking-starts/article-5206"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/delhi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ)।  </strong>आजादी के जश्न को लेकर सुरक्षा बलों ने कमर कस ली है। जिसकों लेकर दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर सुरखा के कड़े इंतेजाम किए हैं। इस दौरानआमजन को चेकिंग के साथ रैंडम स्क्रीनिंग से भी गुजरना पड़ सकता है। 15 अगस्त तक जारी हाई अलर्ट दौरान सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सी.आई.एस.एफ) ने सुरक्षा जांच को और सख्त कर दिया है।  इसे लेकर वरिष्ठ अधिकारियों ने यात्रियों से सुरक्षा बलों के साथ सहयोग करने का अनुरोध किया है</p>
<h2 style="text-align:justify;">15 अगस्त तक  अलर्ट</h2>
<p style="text-align:justify;">आई.जी.आई. एयरपोर्ट पर सी.आई. एस.एफ. की ओर से की जाने वाली रैंडम स्क्रीनिंग यात्री के प्रोफाइलिंग के आधार पर की जा रही है। सी.आई.एस.एफ. अधिकारी के अनुसार यह प्रक्रिया पिछले हफ्ते से शुरू की गई है और 15 अगस्त तक चलेगी। इसमें उन्हें मिलने वाले नियमित अलर्ट के अनुसार सुरक्षा जांच प्रक्रिया में परिवर्तन कर उसी के अनुसार सुरक्षा कर्मियों को सक्रिय कर संदिग्ध दिखने वाले का चुनाव कर उनकी जांच की जा रही है। इसमें यात्रियों पर उसके एयरपोर्ट में प्रवेश से लेकर बोर्डिंग पास लेने, टर्मिनल के अंदर गुजारे गए समय दौरान किए गए कार्य से लेकर सुरक्षा जांच के लिए पहुंचने तक नजर रखी जा रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">यात्रियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं</h2>
<p style="text-align:justify;">यात्री के पास से उड़ान के दौरान प्रतिबंधित कोई भी सामान प्राप्त होने पर उसे तत्काल हिरासत में लेकर पुलिस के हवाले किया जा रहा है। इसे देखते हुए सी.आई. एस.एफ. ने यात्रियों से अनुरोध किया है कि वे प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची एयरपोर्ट टर्मिनल पर आने से पहले ही जांच कर लें। इससे सुरक्षा जांच दौरान समय बचेगा। अधिकारी ने कहा कि यात्रियों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो इसका सुरक्षा कर्मी पूरा प्रयास कर रहे हैं, पर यात्रियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।</p>
<h2 style="text-align:justify;">जांच में एंटी बम स्क्वायड की टीम भी शामिल</h2>
<p style="text-align:justify;">अधिकारी ने बताया कि इस जांच प्रक्रिया में एयरपोर्ट पर तैनात एंटी बम स्क्वायड की टीम को भी लगाया गया है। रैंडम स्क्रीनिंग दौरान यात्रियों के सामान की जांच भी हो रही है जिसे बम स्क्वायड की टीम कर रही है। इसके अलावा सीआईएसएफ  की कई हथियारबंद टीमें एयरपोर्ट टर्मिनल पर सादी ड्रैस में भी तैनात की गई हैं जो हर यात्री पर नजर रख रही हैं और संदेह होने पर तत्काल उनसे पूछताछ के साथ ही जरूरत पडऩे पर जांच भी की जा रही है। एयरपोर्ट में प्रवेश करने वाली कारों पर भी नजर रखी जा रही है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Aug 2018 10:31:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आजादी का जश्न मनाती सउदी अरब की महिलाएं</title>
                                    <description><![CDATA[आखिरकार लंबे संघर्ष के बाद अब सउदी अरब की महिलाएं भी दुनिया के अन्य देशों की महिलाओं की तरह कार चला सकेगी। बल्कि यों कहा जाएं तो अधिक ठीक होगा कि कार ही नहीं मोटरसाईकिल, ट्रक, वैन आदि भी चलाने के लिए स्वतंत्र हो गई है। सउदी अरब की महिलाओं की आबादी में 65 फीसदी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/saudi-arabia-celebrates-independence/article-4610"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/saudi-arabia-celebrates-independence.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आखिरकार लंबे संघर्ष के बाद अब सउदी अरब की महिलाएं भी दुनिया के अन्य देशों की महिलाओं की तरह कार चला सकेगी। बल्कि यों कहा जाएं तो अधिक ठीक होगा कि कार ही नहीं मोटरसाईकिल, ट्रक, वैन आदि भी चलाने के लिए स्वतंत्र हो गई है। सउदी अरब की महिलाओं की आबादी में 65 फीसदी महिलाएं 18 साल से अधिक उम्र की है और अब इन महिलाओं को कार चलाने की आजादी मिल गई है। दरअसल सउदी महिलाओं को इस स्वतंत्रता के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा और यहां तक कि संघर्ष की नायिका सामाजिक कार्यकर्ता मानल अल शरीफ को यूट्यूब पर वाहन चलाते वीडियों अपलोड करने के लिए जेल जाना पड़ा वहीं 2014 में ही लाउजैन अल हथगौल को 73 दिन की जेल काटनी पड़ी। देखा जाए तो यह सउदी महिलाओं के 28 साल के संघर्ष का परिणाम है तो दूसरी और इसका श्रेय सउदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के उदारवादी सोच को भी जाता है। 1990 में सउदी अरब की 47 महिलाओं ने नियम तोड़ते हुए शहर में वाहन चलाए और इसके परिणाम स्वरुप उन्हें गिरफ्तार किया गया। तब से ही महिला स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही महिलाएं कार चलाने की स्वतंत्रता के लिए भी संघर्ष कर रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">देर सबेर ही सही सउदी अरब में अब महिलाओं के प्रति कट्टरवादी सोच में बदलाव की बयार आई हैं। 2017 में सउदी महिलाओं को खेल के मैदान में जाकर वहां खेलों का लुत्फ उठाने की अनुमति दी गई। अब सउदी अरब की महिलाएं भी खेल स्टेडियम में जाकर में खेल प्रतियोगिताओं का आनंद लेने लगी है। हांलाकि यह अनुमति चुने हुए स्टेडियमों में ही है पर देर आयद दुरस्त आयद शुरूआत तो होने लगी है। हांलाकि सउदी अरब ने कट्टरता की छवि को तोड़ने के प्रयास 2015 से ही शुरू कर दिए थे। पहले स्थानीय निकाय के चुनावोें में महिलाओं को मतदान करने या चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई। सउदी अरब के खेल प्राधिकरण के अध्यक्ष तुर्की अल अशेख ने खेल क्षेत्र में बड़े बदलावों की घोषणा करते हुए रियाद, दम्मम और जेद्दा के खेल स्टेडियमों में महिलाओं और परिवार के साथ आने आने वाले दर्शकों को अनुमति देने का निर्णय किया। अशेख ने राजकुमारी रीमा बिंत बंदार को सउदी फैडरेशन फॉर कम्यूनिटी स्पोर्ट का अध्यक्ष नामित किया। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं और रीमा ने पहला कदम उठाते हुए जेद्दा में महिलाओं के लिए 5 स्टूडियो जिम खोले जा चुके हैं। रीमा का कहना है कि इससे महिलाओं को व्यायाम के प्रति प्रोत्साहित किया जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति लेंगिक भेदभाव होना बेहद चिंतनीय है। आज दुनिया के देशों में महिलाओें की भागीदारी कहां से कहां पहुंच गई है। अंतरिक्ष तक में महिलाओं की उड़ान होने लगी है। लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों के समकक्ष होते हुए भागीदारी तय की है। प्रबंधन के क्षेत्र में तो महिलाओं का कोई सानी ही नहीं है। ऐसे में कुछ सउदी अरब जैसे कट्टरपंथी देशों में महिलाओं के प्रति दोयम दर्जें का व्यवहार चिंतनीय रहा है। महिलाओं के अधिकारियों के प्रति लंबे संघर्ष का ही परिणाम है कि 1955 पहलीबार लड़कियों को स्कूल में पढ़ने का अवसर मिलना शुरू हुआ। हांलाकि महिलाओं के विश्वविद्यालय बनने में पूरे 15 साल लग गए और 1970 में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 2001 से महिलाओं के पहचान पत्र बनने लगे। कट्टरतावादी सोच में बदलाव का यह सिलसिला आगे बढ़ता गया और 2005 में जाकर जबरन विवाह पर रोक लगी। सउदी महिलाओं को सत्ता में भागीदारी का अवसर 2009 से मिलने लगा वहीं 2012 के सारा अतर को पहलीबार ओलंपिक में हिस्सा लेने का गौरव मिल सका। महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव का यह सिलसिला जब एक बार चल निकला तो फिर धीरे धीरे बदलाव की बयार ही चल निकली है। 2015 में सउदी महिलाओं को चुनिंदा स्थानों पर साईकिल चलाने की अनुमति मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">
महिलाओं के प्रति कट्टरता की छवि सुधार में सउदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को अधिक जाता है। महिलाओं के प्रति एक से एक क्रान्तिकारी निर्णय लेने में प्रिंस ने पहल की है। उनके प्रयासों से ही इससे पहले महिलाओं को राष्टÑीय दिवस में आमंत्रित कर अच्छा संकेत दिया जा चुका है। महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए अब जिस दिशा में सउदी अरब बढ़ रहा है वह निश्चित रुप से सराहनीय है। सउदी अरब ही नहीं दुनिया के अन्य कट्टरपंथी देशों को भी महिलाओं के प्रति अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। महिलाओं के साथ दोयम दर्जें का व्यवहार करने वाले देशों को भी संकुचित सोच के दायरें से बाहर निकलना होगा।</p>
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                <pubDate>Mon, 02 Jul 2018 11:22:16 +0530</pubDate>
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                <title>शहीदों की शहादत से मिली देश को आजादी</title>
                                    <description><![CDATA[देश में 30 जनवरी के अलावा 23 मार्च भी शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 30 जनवरी को जहां महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पड़ती है, तो वहीं 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को बरतानिया हुकूमत ने सरकार के खिलाफ क्रांति का बिगुल फंूकने के इल्जाम में फांसी की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/independence-of-the-country-attained-by-martyrdom/article-3648"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/sahid.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में 30 जनवरी के अलावा 23 मार्च भी शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 30 जनवरी को जहां महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पड़ती है, तो वहीं 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को बरतानिया हुकूमत ने सरकार के खिलाफ क्रांति का बिगुल फंूकने के इल्जाम में फांसी की सजा सुनाई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इन तीनों जांबाज क्रांतिकारियों की अजीम शहादत को श्रद्धांजलि देने के लिए ही शहीद दिवस मनाया जाता है। अदालती आदेश के मुताबिक सरदार भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनों को 24 मार्च, 1931 को फाँसी लगाई जानी थी, लेकिन एक दिन पहले ही 23 मार्च की शाम इन्हें फाँसी लगा दी गई और अंग्रेजी हुकूमत ने इनकी लाश रिश्तेदारों को न देकर रातों रात ले जाकर सतलुज नदी के किनारे जला दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के इन मतवालों का कसूर जानें, तो वह सिर्फ इतना भर था कि वे अपने देश को आजाद देखना चाहते थे। आजादी की इसी जद्दोजहद में जो काम उनके संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन जिसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी भी कहते थे ने उन्हें सौंपा, उसे इन तीनों ने पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से निभाया। अपने फर्ज से उन्होंने कभी गद्दारी नहीं की। अपनी सरजमीं को आजाद कराने के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">साइमन कमीशन के आगमन पर देश में हर ओर उसका तीखा विरोध हुआ। पंजाब में इस विरोध का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। 30 अक्तूबर, 1928 को लाहौर में एक विशाल जुलूस का नेतृत्व करते समय वहाँ के डिप्टी सुप्रीटेन्डेन्ट स्कार्ट के कहने पर उनके मातहत अफसर सांडर्स ने वहशी लाठीचार्ज किया, जिसमें सैंकड़ो लोगों के साथ लाला लाजपत राय भी घायल हो गए। घाव इतने गहरे थे कि राय साहब का देहांत हो गया। पंजाब में अंग्रेजी हुकूमत के इस काले कारनामे से देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">लाला लाजपत राय की मौत के शोक में जगह-जगह पर श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन किया गया। इस क्रूर घटना से भारतीय क्रांतिकारियों का खून खौल उठा और उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत के जिम्मेदार अंग्रेज अफसरों की हत्या करने का मंसूबा बना लिया। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने इस काम के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुना। बाद में इस योजना में चंद्रशेखर आजाद भी शरीक हुए। आखिर वह दिन 19 दिसंबर 1928 आया, जब इन क्रांतिकारियों ने अपनी योजना को कार्यरूप प्रदान करते हुए लाला लाजपत राय के हत्यारे अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या कर दी। अपने काम को सही तरह से अंजाम देने के बाद चारों लोग घटनास्थल से बचकर भाग निकले। पुलिस उन्हें ढ़ूढ़ती ही रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">साण्डर्स की हत्या को क्रांतिकारियों ने इन अल्फाजों में इंसाफ के लायक बतलाया-देश के करोड़ों लोगों के सम्माननीय नेता की एक साधारण पुलिस अधिकारी के क्रूर हाथों द्वारा की गयी हत्या….. राष्ट्र का घोर अपमान है। भारत के देशभक्त युवाओं का यह कर्तव्य है कि वे इस कायरतापूर्ण हत्या का बदला लें….. हमें साण्डर्स की हत्या का अफसोस है किन्तु वह उस अमानवीय व्यवस्था का एक अंग था, जिसे नष्ट करने के लिये हम संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लाहौर साजिश केस के बाद भी क्रांतिकारी खामोश नहीं बैठ गए, बल्कि अपने छोटे-छोटे कार्यकलापों से अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति का अलख जगाए रखे। 8 अप्रैल, 1929 को अंग्रेज सरकार के जनविरोधी पब्लिक सेफ्टी बिल व टेज्ड डिस्प्यूट्स बिल के खिलाफ और इस सरकार के बहरे कानों में आवाज पहुँचाने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंककर धमाका किया। बम फेंककर ये बहादुर क्रांतिकारी इस मर्तबा भाग नहीं गए, बल्कि आगे बढ़कर खुद ही इन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी।</p>
<p style="text-align:justify;">बम फेंकने का मकसद किसी को घायल करना नहीं था, बहरी अंगे्रज हुकूमत के कान खोलना था। गिरफ्तारी का एक और अहम मकसद अदालत को अपनी विचारधारा के प्रचार का माध्यम बनाना था, जिससे भारतीय जनता क्रांतिकारियों के विचारों तथा राजनीतिक दर्शन से वाकिफ हो सके। अपने इस जरूरी काम में क्रांतिकारी कामयाब भी हुए। इस बम विस्फोट और उसके बाद इन क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी एवं उनके विचारों की गूंज पूरे देश में सुनाई दी गई। अंग्रेजों के खिलाफ हिंदोस्तानी अवाम का गुस्सा बढ़ता चला गया। एक तरफ अंग्रेजों के खिलाफ जनता एकजुट हो रही थी, तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के प्रति अंग्रेजों का दमन चक्र तेज हो गया। उनकी गिरफ्तारियां की जाने लगीं।</p>
<p style="text-align:justify;">लाहौर में एक बम बनाने की फैक्ट्री पकड़ी गई, जिसके बाद 15 अप्रैल, 1929 को सुखदेव और दीगर क्रांतिकारी अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गए। एक वक्त ऐसा भी आया, जब चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु को छोड़कर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सभी सरगर्म मेम्बर गिरफ्तार कर लिए गए। पुलिस से बचने के लिए राजगुरु कुछ दिनों के लिए महाराष्ट्र चले गए, लेकिन बाद में वे भी अंग्रेजी पुलिस के शिकंजे में फंस गए। अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आजाद का पता जानने के लिए राजगुरु पर अनेक अमानवीय अत्याचार किये, लेकिन राजगुरु इनसे जरा सा भी विचलित नहीं हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने अंग्रेजों को चंद्रशेखर का सुराग नहीं दिया। अंग्रेज हुकूमत ने राजगुरु को उनके बाकी क्रांतिकारी साथियों के साथ लाहौर की जेल में ही कैद कर दिया। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव पर लाहौर साजिश केस के तहत अदालत में मुकदमा चला, लेकिन यह सब दिखावा था। फैसला पहले से ही तय था और इन तीनों को अदालत ने सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। सजा सुनने के बाद भी ये मतवाले क्रांतिकारी जरा सा भी नहीं घबराए और इन्होंने इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुदार्बाद के नारे लगाकर खुशी-खुशी इसे मंजूर किया। इन तीनों क्रांतिकारियों को जब फांसी लगी, तब इनकी उम्र महज 23-24 साल थी। जिस उम्र में आज का नौजवान पढ़-लिखकर कुछ काम करने की सोचता है, उस उम्र में इन मतवाले क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपनी शहादत दे दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">क्रांतिकारियों में सरदार भगतसिंह सबसे ज्यादा विचारसंपन्न थे। छोटी सी ही उम्र में उन्होंने खूब पढ़ा-लिखा। दुनिया को करीब से देखा, समझा और व्यवस्था बदलने के लिए जी भरकर कोशिशें कीं। जेल जीवन के दो वर्षों में भी भगत सिंह ने खूब अध्ययन, मनन, चिंतन व लेखन किया। जेल के अंदर से ही उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन को बचाए रखा और उसे विचारधारात्मक स्पष्टता प्रदान की। भगत सिंह सिर्फ जोशीले नौजवान नहीं थे, जो कि जोश में आकर अपने वतन पर मर मिटे थे। उनके दिल में देशभक्ति के जज्बे के साथ एक सपना था। भावी भारत की एक तस्वीर थी। जिसे साकार करने के लिए ही उन्होंने अपना सर्वस्व: देश पर न्यौछावर कर दिया। वे सिर्फ क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि युगदृष्टा, स्वप्नदर्शी, विचारक भी थे। वैज्ञानिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की उनमें अद्भुत क्षमता थी। भगत सिंह ने कहा था कि मेहनतकश जनता को आने वाली आजादी में कोई राहत नहीं मिलेगी। उनकी भविष्यवाणी अक्षरश: सच साबित हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">आज देश में प्रतिक्रियावादी शक्तियों की ताकत बढ़ी है। पंूजीवाद, बाजारवाद, साम्राज्यवाद के नापाक गठबंधन ने सारी दुनिया को अपने आगोश में ले लिया है। अपने ही देश में हम आज दुष्कर परिस्थितियों में जी रहे हैं। चहुं ओर समस्याऐं ही समस्याएें हैं। समाधान नजर नहीं आ रहा है। ऐसे माहौल में शहीद भगत सिंह के फांसी पर चढ़ने से कुछ समय पूर्व के विचार याद आते हैं, जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वह हिचकिचाते हैं, इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्प्रिट पैदा करने की जरूरत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते में ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रूक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्प्रिट ताजा की जाए। ताकि इंसानियत की रूह में एक हरकत पैदा हो।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जाहिद खान</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 23 Mar 2018 05:51:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वाह&amp;#8230; यही तो है असली आजादी</title>
                                    <description><![CDATA[मुंह में पान मसाला चबाते हुए गुल्लू मियां बड़बड़ाए जा रहे थे बहुत हो चुका, अब और बर्दाश्त नहीं होता, कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैं मुस्कराएं बिना न रह सका- अमां मियां यह तो बताओ अब कौन सी मुसीबत आन पड़ी है, कौन सी बात बर्दाश्त से बाहर हो रही है और क्या करना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/article-on-independence/article-3551"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/freedom.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मुंह में पान मसाला चबाते हुए गुल्लू मियां बड़बड़ाए जा रहे थे बहुत हो चुका, अब और बर्दाश्त नहीं होता, कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैं मुस्कराएं बिना न रह सका- अमां मियां यह तो बताओ अब कौन सी मुसीबत आन पड़ी है, कौन सी बात बर्दाश्त से बाहर हो रही है और क्या करना चाहते हो, सोच लो जो तुम करना चाहते हो, वह कर भी पाओगे, या यूं ही बैठे ठाले अपनी जुबान से भड़ास निकालकर फुस्स हो जाओगे।</p>
<p style="text-align:justify;">तुम भी शरमा जी, हर समय मस्ती के मूड में रहते हो, किसी दूसरे का मूड तो देख लिया करो, वह किस परेशानी में है, तुम मुस्कराते और मेरी जान पर बन आ गई है। ऐसी भी कौन सी समस्या उत्पन्न हो गई, जो तुम्हारी जान पर आ गई, मुझे तो तुम भले चंगे जुगाली करते दिखाई दे रहे हो। मैंने उन पर टिप्पणी की। यही तो बात है, जमाना दोमुंहा हो गया है। मन में कुछ और, और बाहर कुछ और जो जैसा है, वैसा दिखाई नहीं देता और जैसा दिखाई देता है, वैसा वह होता ही नहीं। गुल्लू मियां किसी मंजे हुए दार्शनिक की भांति बोले। फिर भी ऐसा कौन सा समस्याओं का पहाड़ खड़ा हो गया, जरा हम भी तो सुनें। मैंने गुल्लू मियां के प्रति संवेदना व्यक्त की।</p>
<p style="text-align:justify;">वह कुछ पसीजे, फिर बोले- शरमा जी, आप तो जानते ही हैं कि मेरे मन में राष्टÑ के प्रति कितना अनुराग है, कोई भी मेरे देश की बुराई करे, मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं स्वयं चाहता हूं कि सब कुछ पारदर्शी हो। सरकार हर कार्य में पारदर्शिता बरते, ठेकेदारों को जो ठेके दिए जाएं, वे पूरी तरह पारदर्शिता के आधार पर होने चाहिए, जमीनों का अधिग्रहण हो, उनमें भी पारदर्शिता हो। सरकारी खरीद मोलभाव भी पारदर्शिता से की जानी चाहिए। इसमें तो कुछ भी गलत नहीं है, आम आदमी भी ऐसा ही सोचता है, जैसा कि आप सोचते हैं, फिर इसमें आप खास क्या सोचते हैँ? मैंने गुल्लू मियां की सोच को जनमानस की सोच बताया।</p>
<p style="text-align:justify;">गुल्लू मियां बिफर गए- आप मेरी सोच को कम आंक रहे हैं, मेरी सोच ओरिजनल है, मैंने किसी की नकल नहीं की है, में चाहता हूं कि सभी कार्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से राष्टÑ हित सर्वोपरि मानते हुए होने चाहिए। वह तो हर कोई चाहता है, मगर इसमें परेशानी क्या है? मैंने चुटकी ली। परेशानी एक हो तो बताई जाए, जिसे देखो, वही देश को अपने आप से छोटा समझ रहा है। देश उनके लिए बाद में है जेब पहले है, पहले उनकी जेब गरम हो जाए। उसके बाद उनसे कोई बात की जाए। यदि ऐसा न होता, तो देश में जितने भी घोटाले आज खुलकर अपना चेहरा दिख रहे है, सभी घोटाले अल्ट्रासाउण्ड की भेंट चढ़ चुके होते। यानी घोटाले अस्तित्व में आने से पहले ही मौत के घाट उतार दिए जाते, मगर ऐसा हुआ ही नहीं। गुल्लू मियां के चेहरे पर उदासी छा गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अब तुम्हें क्या परेशानी है, जो है सो सबके लिए है, सबके सामने है, परेशान होने का कोई मजबूत आधार बताओ, तभी अपनी परेशानी किसी के सामने बताओ, अन्यथा मजाक उड़ाने वाले कम नहीं है। नाहक ही तुम अपना मजाक उड़वाना चाहते हो। मैंने गुल्लू मियां को समझाया। राष्टÑहित में मैं अपना मजाक भी उड़वा सकता हूं, मैं नहीं डरता किसी से भी।</p>
<p style="text-align:justify;">नहीं डरते तो क्या कर लोगे, बताओ समसया का समाधान कैसे करवाओगे? मैंने पूछा। समस्या का समाधान होगा और अवश्य होगा, आप जानते नहीं, लोगों में कितनी जागरूकता आ गई है, एक बार हजारों के साथ जंतर-मंतर पर बैठ गया था, तो सबकी नींद हराम हो गई थी, लोगों का कितना सहयोग मिला था, मुझे, मैं बता नहीं सकता, अच्छे-अच्छे दिग्गज घबराकर मेरी चरण वंदना कर रहे थे, कह रहे थे- गुल्लू मियां मान जाइए,… हम आपकी बात मानेंगे। और आप उनकी बात मान गए, बदले में क्या मिला? मैंने गुल्लू मियां पर तंज कसा। कुछ नहीं मिला न… नहीं, अब फिर धरना देकर बैठूंगा, फिर लड़ाई लडूंगा, मैं अपनेदेश में हो रहे किसी भी अन्याय को सहन नहीं करूंगा। गुल्लू मियां तैश में आ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">वाह गुल्लू मियां… आजादी का असली आनंद आप ही उठा रहे हैं, मैं मुस्कराया। हूं… यह भी कोई आजादी है, खाए कोई और बदनाम कोई और होवे। ऐसा तो पहले कभी हुआ ही नहीं था, जैसा कि अब हो रहा है। अब दूसरी आजादी की लड़ाई मुझे लड़नी ही है। गुल्लू मियां के चेहरे पर कुछ कर गुजरने का भाव उभर आया था। ईश्वर आपको लड़ाई लड़ने की ताकत दे, मेरी यही कामनाएं है, आजाद भारत में। मैंने अपनी राह पकड़ने में ही भलाई समझी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. सुधाकर आशावादी</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 27 Feb 2018 02:25:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सरल नहीं है कैटालोनिया की राह</title>
                                    <description><![CDATA[स्पेन के उत्तर पूर्व में स्थित दूसरा सबसे बड़ा तटवर्ती राज्य कैटालोनिया अपनी आजादी को लेकर जारी संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। इसी एक अक्टूबर को हुए जनमत संग्रह में कैटालोनिया के 90 फीसदी लोगों ने स्पेन से अलग होने के पक्ष में मतदान किया है। हालांकि स्पेन के मौजूदा प्रधानमंत्री और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-path-of-catalonia-is-not-easy/article-3394"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/us.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्पेन के उत्तर पूर्व में स्थित दूसरा सबसे बड़ा तटवर्ती राज्य कैटालोनिया अपनी आजादी को लेकर जारी संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। इसी एक अक्टूबर को हुए जनमत संग्रह में कैटालोनिया के 90 फीसदी लोगों ने स्पेन से अलग होने के पक्ष में मतदान किया है। हालांकि स्पेन के मौजूदा प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने इस जनमत संग्रह के फैसले को बलपूर्वक दबाने के लिए सभी जरूरी हथकंडे अपनाए, बावजूद इसके बड़ी संख्या में लोगों ने स्पेन से अलग होने के लिए किये गये जनमत संग्रह में कैटालोनिया की आजादी का समर्थन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">जनमत संग्रह में लगभग 23 लाख (40 फीसदी मतदाता) लोगों ने मतदान में भाग लिया और 90 प्रतिशत से अधिक लोगो ने स्पेन से अलग होने के पक्ष मे मतदान किया। 5 लाख 5 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और पौने 5 करोड़ जनसंख्या वाला देश स्पेन 17 स्वायतशासी क्षेत्रों व प्रदेशों वाला एक संसदीय राजतंत्र है। इसके उत्तर में स्थित दो प्रदेश बास्कलैंड और कैटालोनिया पिछले लंबे समय से अपनी आजादी के लिए संघर्षरत हैंं। इससे पहले घटे घटनाक्रम में कैटालोनिया की प्रादेशिक सरकार ने 6 सितंबर को एक शासकीय आदेश जारी किया। आदेश में कहा गया कि 1 अक्टूबर को प्रदेशभर में लोगों की इस राय को जानने के लिए जनमत संग्रह करवाया जाएगा कि क्या कैटालोनिया को स्पेन से अलग व स्वतंत्र राज्य होना चाहिए या नहीं?</p>
<p style="text-align:justify;">आदेश में यह भी कहा गया कि जनमत संग्रह का परिणाम चाहे जो भी आए राज्य सरकार उससे बंधी होगी। अगर जनमत संग्रह में जनता की राय स्पेन से अलग होने के पक्ष में आती है तो प्रदेश सरकार 48 घंटों के भीतर ही, यानी तीन अक्टूबर तक कैटालोनिया को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर देगी। दूसरी ओर मैड्रिड स्थित स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने कैटालोनिया सरकार के शासकीय आदेश को इस आधार पर अवैध घोषित कर दिया कि संविधान में देश की अखंडता को अक्षुण बनाये रखने की बात कही गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कैटालोनिया स्पेन का सर्वाधिक सपन्न और दूसरा सबसे बड़ा प्रदेश है। इसकी जनसंख्या 74 लाख है। यह क्षेत्र स्पेन के विकास का प्रमुख केन्द्र है। स्पेन के सकल घरेलू उत्पाद में कैटालोनिया का योगदान 20 प्रतिशत के बराबर है। बेरोजगारी भी स्पेन के अन्य प्रदेशों से कम है। प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भी कैटालोनिया स्पेन के दूसरे राज्यों से अधिक सपन्न है, ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि कैटालोनिया के लोग स्पेन से अलग क्यों होना चाहते हैं? इसके कुछ कारण स्पेन व कैटालोनिया के इतिहास में छिपे है, तो कुछ कारण मौजूदा प्रशासनिक व राजव्यवस्था में दिखाई देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहला कारण तो यह कि इतिहास में एक समय ऐसा था जब कैटालोनिया के लोग एक स्वतंत्र देश के नागरिक के रूप में रहे हैं, स्वतंत्र देश के नागरिक के रूप में जिन सुखसुविधाओं का उपभोग उनके पुरखों ने किया था आज के कतालन नागरिक भी उन सुविधाओं का उपभोग करना चाहते है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा यहां के लोग अपनी भाषा व अपनी संस्कृति से बेइंतहा प्रेम करते हैं, ऐसे में जब -जब उनकी स्वतंत्रता को छीना गया तब- तब उनकी भाषा और संस्कृति का गला घोंटा गया। भाषा और संस्कृति से छेड़छाड़ के प्रयास कतालन लोगों के लिए अब असहनीय हो गया। तृतीय, जनरल फ्रांको की तानाशाही के समय स्पेन के कोने कोने से 20 लाख से अधिक लोेगों को उनकी भूमि पर बसाया गया आज वही लोग उनकी स्वतंत्रता का विरोध कर रहे है। चतुर्थ, वर्ष 2006 में स्पेन में सोशलिस्ट पार्टी की सरकार के समय एक नया स्वायत समझौता हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समझौते के तहत कैटालोनिया को एक स्वायतशासी प्रदेश घोषित किया जाना था। इस समझौते पर स्पेन की संसद और कैटालोनिया की विधानसभा ने भी मुहर लगा दी। कैटालोनिया की जनता ने भी एक जनमत संग्रह में उसका अनुमोदन कर दिया था। लेकिन वर्तमान स्पेनी प्रधानमंत्री मारियानो राखोय की अनुदारवादी पार्टी (पोपुलार जनता पार्टी) ने समझौते को अदालत में चुनौती दी। 2010 में स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की व्याख्या करते कहा कि कैटालोनिया को एक राष्ट्र का दर्जा दिये जाने का कोई कानूनी आधार नहीं है, इसलिए एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में किये गए समझौते की बहुत सी धाराए अवैध है।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय से कतालन की जनता की भावनाए आहत हुई। नतिजतन कैटालोनिया के नागरिक पूर्ण स्वतंत्रा की मांग करने लगे। पांचवा कारण कतालन लोगों की रोजी-रोटी व पेट से जुड़ा हुआ है। यूरो मुद्रा वाले देशोंं में यूनान के बाद अब स्पेन ही ऐसा राष्ट्र है जो आर्थिक दीवालियेपन के नजदीक है। आर्थिक मंदी से उबरने के लिए सरकार ने खर्च में कटौतियों का जो निर्णय किया उससे कैटालोनिया व बास्कलैंड जैसे खुशहाल प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित हुए। वे अपनी वित्तीय ंहिस्सेदारी को स्पेन के अन्य प्रदेशों के साथ बाटने के लिए तैयार नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर स्पेन की शासन व्यवस्था और वहां का संविधान ईकाईयों को संघ से अलग होने की इजाजत नहीं देता हैै। ऐसे में कतालन लोगों को अपनी आजादी के लिए आरंभ किये गये आंदोलन का प्रतिफल कब प्राप्त होगा कहा नहीं जा सकता है। यद्यपि 1978 से लागू लोकतांत्रिक राजशाही वाले स्पेन के वर्तमान संविधान में कैटालोनिया को एक स्वयातशासी प्रदेश का दर्जा तो दे दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उनकी एक स्वतंत्र प्रदेश की मांग की राह इतनी आसान नहीं है, जिसको कैटालोनिया के नागरिक गांधीवादी सिंद्वातों के मार्फत प्राप्त करना चाहते है। सच तो यह है कि जब तक स्पेन की सरकार और वहां का संविधान कैटालोनिया की स्वतंत्रता का समर्थन नहीें करेगे तब तक कैटालोनिया एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व मानचित्र पर उभर पाएगा इसमें सन्देह है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-एन.के. सोमानी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Oct 2017 04:52:11 +0530</pubDate>
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                <title>आजादी के अपने-अपने मायने</title>
                                    <description><![CDATA[15 अगस्त, 1947 को लाखों देशवासियों ने कुर्बानियां देकर ब्रिटिश शासन से आजादी प्राप्त की थी। हमारे देश में आजादी के अर्थ समय के साथ बदलते रहे हैं। सबने अपने-अपने ढंग से आजादी का मतलब निकाला है। गरीब आदमी के लिए आजादी का अर्थ गरीबी से आजादी है। अशिक्षित व्यक्ति के लिए आजादी का अर्थ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-independence/article-3064"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/india-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">15 अगस्त, 1947 को लाखों देशवासियों ने कुर्बानियां देकर ब्रिटिश शासन से आजादी प्राप्त की थी। हमारे देश में आजादी के अर्थ समय के साथ बदलते रहे हैं। सबने अपने-अपने ढंग से आजादी का मतलब निकाला है। गरीब आदमी के लिए आजादी का अर्थ गरीबी से आजादी है। अशिक्षित व्यक्ति के लिए आजादी का अर्थ अशिक्षा से आजादी है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक दलों के लिए आजादी का मतलब सत्ता प्राप्ति है। समाज के सभी वर्गों और व्यक्तियों के लिए आजादी के अलग-अलग मायने हैं। इस सबके बीच असहिष्णुता बेकारी, महंगाई, कालेधन और भ्रष्टाचार से आजादी के नारे सर्वत्र बुलंद हो रहे हैं। यही नहीं, सत्ता और विपक्ष दोनों ने आजादी की परिभाषा अपने-अपने तरीके से गढ़ ली है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के 70 वर्षों के बाद आज हमारा देश अपने देशवासियों की अंतरआत्मा को झकझोर रहा है। हमारे देश में दूध-दही की नदियां बहती थीं। देश को सोने की खान कहा जाता था। सत्यमेव जयते हमारा आदर्श था। महापुरूषों और ग्रंथों ने सत्य की राह दिखाई थी। भाईचारा, प्रेम और सद्भाव हमारे वेद वाक्य थे। कमजोर की मदद को हम सदैव आगे रहते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के आदर्श समाज और राम राज्य की विश्व में अनूठी पहचान थी। राजाओं के राज को आज भी लोग याद रखते हैं और यह कहते नहीं थकते कि उस समय की न्याय व्यवस्था काफी सुदृढ़ थी। राज्य के कर्मचारी आम आदमी को प्रताड़ित नहीं करते थे। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में नैतिकता थी। बुराई के विरूद्ध अच्छाई का बोलबाला था।</p>
<p style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने आजादी के बाद राम राज्य की कल्पना संजोई थी। प्रगति और विकास की ओर हमने तेजी से बढ़ने का संकल्प लिया था। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चहुंमुखी विकास की ओर कदम बढ़ाये थे। सामाजिक क्रांति का बीड़ा उठाया था। ईमानदारी के मार्ग पर चलने की कस्में खाई थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब आजादी की आधी से अधिक सदी बीतने के बाद हमारे कदम लड़खड़ा रहे हैं। सत्यमेव जयते से हमने किनारा कर लिया है। अच्छाई का स्थान बुराई ने ले लिया है और नैतिकता पर अनैतिकता प्रतिस्थापित हो गई है। ईमानदारी केवल कागजों में सिमट गई है और भ्रष्टाचरण से पूरा समाज आच्छादित हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के बाद निश्चय ही देश ने प्रगति और विकास के नये सोपान तय किये हैं। पोस्टकार्ड का स्थान ई-मेल ने ले लिया है। इन्टरनेट से दुनिया नजदीक आ गई है। मगर आपसी सद्भाव, भाईचारा, प्रेम, सच्चाई से हम कोसों दूर चले गये हैं। समाज में बुराई ने जैसे मजबूती से अपने पैर जमा लिये हैं। लोक कल्याण की बातें गौण हो गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी का मतलब स्वच्छंदता नहीं है। आजादी हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाती है। आज हमारे जीवन में अनुशासन की सख्त आवश्यकता है। अनुशासन जीवन के विकास का अनिवार्य तत्व है, जो अनुशासित नहीं होता, वह दूसरों का हित तो कर नहीं पाता, स्वयं का अहित भी टाल नहीं सकता। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन का महत्व है। अनुशासन स्वतंत्रता प्रदान करता है जो व्यक्ति अनुशासित रूप से जीते हैं उन्हें स्वत ही विद्या, ज्ञान एवं सफलता प्राप्त होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के बाद हमने अनुशासन की भावना को तिलांजलि दे दी, जिसके फलस्वरूप देश पतन की गहरी खाई की और उन्मुख हो रहा है। हमारी कथनी और करणी विश्वसनीय नहीं रही है। जुबान काबू में नहीं है और स्वार्थ हम पर हावी हो गया है। हमें अपनी आजादी बचानी है तो अनुशासन को अपनाना ही होगा। किसी भी राष्टÑ की प्रगति तभी संभव है जब उसके नागरिक अनुशासित हों।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हम चाहते हैं कि हमारी आजादी अक्षुष्ण रहे और समाज एंव राष्टÑ प्रगति के पथ पर निरंतर अग्रसर रहें, तो हमें अनुशासित रहना ही पड़ेगा। जब हम स्वयं अनुशासित रहेंगे, तब ही किसी दूसरे को अनुशासित रख सकेंगे। अनुशासन ही देश को महान बनाता है। प्रत्येक व्यक्ति का देश के प्रति कुछ कर्तव्य होता है, जिसका पालन उसे अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जिस देश के नागरिक अनुशासित होते हैं, वही देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रह सकता है। यही हमारे लिए आजादी की सीख है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-बाल मुकुंद ओझा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Aug 2017 23:30:57 +0530</pubDate>
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                <title>आजादी अपनी सोच में लायें</title>
                                    <description><![CDATA[भारत हर साल 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है। यह दिन जहां हमारे आजाद होने की खुशी लेकर आता है, वहीं इसमें भारत के खण्ड-खण्ड होने का दर्द भी छिपा होता है। वक्त के गुजरे पन्नों में भारत से ज्यादा गौरवशाली इतिहास किसी भी देश का नहीं हुआ, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप से ज्यादा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/get-independence-in-your-thinking/article-3023"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत हर साल 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है। यह दिन जहां हमारे आजाद होने की खुशी लेकर आता है, वहीं इसमें भारत के खण्ड-खण्ड होने का दर्द भी छिपा होता है। वक्त के गुजरे पन्नों में भारत से ज्यादा गौरवशाली इतिहास किसी भी देश का नहीं हुआ, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप से ज्यादा सांस्कृतिक राजनैतिक सामरिक और आर्थिक हमले भी इतिहास में शायद किसी देश पर नहीं हुए। और कदाचित किसी देश के इतिहास के साथ इतना अन्याय भी कहीं नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">वो देश जिसे इतिहास में ‘विश्व गुरु’ के नाम से जाना जाता हो, उस देश के प्रधानमंत्री को आज “मेक इन इंडिया” की शुरूआत करनी पड़ रही है। ‘सोने की चिड़िया’ जैसा नाम जिस देश को कभी दिया गया हो, उसका स्थान आज विश्व के विकासशील देशों में है। शायद हमारा वैभव और हमारी समृद्धि की कीर्ति ही हमारे पतन का कारण भी बनी। भारत के ज्ञान और सम्पदा के चुम्बकीय आकर्षण से विदेशी आक्रांता लूट के इरादे से इस ओर आकर्षित हुए। वे आते गए और हमें लूटते गए। जो देश अपने खुद की गलतियों से नहीं सीख पाता, वो स्वयं इतिहास बन जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें भी शायद अपनी इसी भूल की सजा मिली, जो हमारी वृहद सीमाएं आज इतिहास बन चुकी हैं। वो देश जिसकी सीमाएं उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में इंडोनेशिया और पश्चिम में ईरान तक फैली थीं, आज सिमट कर रह गई हैं और इस खंडित भारत को हम आजाद भारत कहने के लिए विवश हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अखंड भारत का स्वप्न सर्वप्रथम आचार्य चाणक्य ने देखा था और काफी हद तक चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर इसे यथार्थ में बदला भी था। तब से लेकर लगभग 700 ईसवी तक भारत ने इतिहास का स्वर्णिम काल अपने नाम किया था। लेकिन 712 ईस्वी में सिंध पर पहला अरब आक्रमण हुआ, फिर 1001 ईस्वी से महमूद गजनी, चंगेज खान, अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद तुगलक, तैमूरलंग, बाबर और उसके वंशजों द्वारा भारत पर लगातार हमले और अत्याचार हुए। 1612 ईस्वी में जहाँगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की इजाजत दी। यहाँ इतिहास ने एक करवट ली और व्यापार के बहाने अंग्रेजों ने पूरे भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इतने विशाल देश पर नियंत्रण रखना इतना आसान भी नहीं था, यह बात उन्हें समझ में आई 1857 की क्रांति से। इसलिए उन्होंने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाते हुए धीरे-धीरे भारत को तोड़ना शुरू किया। 1857 से 1947 के बीच अंग्रेजों ने भारत को सात बार तोड़ा-1876 में अफगानिस्तान, 1904 में नेपाल, 1906 में भूटान, 1914 में तिब्बत, 1935 में श्रीलंका, 1937 में म्यांमार, 1947 में बांग्लादेश और पाकिस्तान। लेकिन हम भारतवासी अंग्रेजों की इस कुटिलता को नहीं समझ पाए कि उन्होंने हमारे देश की भौगोलिक सीमाओं को ही नहीं तोड़ा, बल्कि हमारे समाज, हमारी भारतीयता, इस देश की आत्मा को भी खण्डित कर गए।</p>
<p style="text-align:justify;">हम भारत के लोग 15 अगस्त को किस बात का जश्न मनाते हैं? आजादी का? लेकिन सोचो कि हम आजाद कहाँ हैं? हमारी सोच आज भी गुलाम है! हम गुलाम हैं अंग्रेजी सभ्यता के, जिसका अन्धानुकरण हमारी युवा पीढ़ी कर रही है। हम गुलाम हैं उन जातियों के, जिन्होंने हमें आपस में बांटा हुआ है और हमें एक नहीं होने देती। हम गुलाम हैं अपनी सरकार की उन नीतियों के, जो इस देश के नागरिक को उसके धर्म और जाति के आधार पर आंकती हैं, उसकी योग्यता के आधार पर नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">अत: अब वक्त आ गया है कि हम अपनी आजादी को भौगोलिक अथवा राजनैतिक दृष्टि तक सीमित न रखें। हम अपनी आजादी अपनी सोच में लाएं, जो सोच और जो भौगोलिक सीमाएं हमें अंग्रेज दे गए हैं उनसे बाहर निकलें। विश्व इतिहास से सीखें कि जब जर्मनी का एकीकरण हो सकता है, जब बर्लिन की दीवार गिराई जा सकती है, तो भारत का क्यों नहीं? चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, सुखदेव महारानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाष चंद्र बोस, ने अपनी जान अखंड भारत के लिए न्योछावर की थी खण्डित भारत के लिए नहीं। जिस दिन हम भारत को उसकी खोई हुई अखंडता लौटा देंगे उस दिन हमारी ओर से हमारे वीरों को सच्चे श्रद्धांजलि अर्पित होगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>-डॉ. नीलम महेंद्र</strong></em></p>
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                <pubDate>Thu, 10 Aug 2017 03:30:34 +0530</pubDate>
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