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                <title>Lieutenant Governor - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Lieutenant Governor RSS Feed</description>
                
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                <title>राजधानी में अधिकारों की लड़ाई</title>
                                    <description><![CDATA[Delhi Government और उपराज्यपाल के बीच तनातनी काफी पुरानी है, जहां अधिकारों को लेकर लगातार जंग छिड़ी रहती है। केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त उपराज्यपाल और चुनी हुई दिल्ली सरकार के बीच इस लड़ाई को लेकर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनी हुई […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/fight-for-rights-in-the-capital/article-47803"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/delhi-government.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Delhi Government और उपराज्यपाल के बीच तनातनी काफी पुरानी है, जहां अधिकारों को लेकर लगातार जंग छिड़ी रहती है। केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त उपराज्यपाल और चुनी हुई दिल्ली सरकार के बीच इस लड़ाई को लेकर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनी हुई सरकार को ही फैसले लेने का अधिकार होना चाहिए। इस फैसले के बाद दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इसे अपनी जीत बताया और अब अधिकारियों के तबादले शुरू हो चुके हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:–</strong><a title="तेज आंधी के चलते तीन नहरें टूटीं, सैकड़ों एकड़ भूमि हुई जलमग्न" href="http://10.0.0.122:1245/three-canals-broke-due-to-strong-storm/">तेज आंधी के चलते तीन नहरें टूटीं, सैकड़ों एकड़ भूमि हुई जलमग्न</a></p>
<p style="text-align:justify;">संविधान पीठ ने सर्वसम्मत फैसला दिया है कि दिल्ली में lieutenant governor (एलजी) ही सर्वेसर्वा नहीं है। वह दिल्ली सरकार के फैसलों को मानने और कैबिनेट की सलाह के अनुसार काम करने को बाध्य हैं। एलजी की शक्तियां उन्हें दिल्ली विधानसभा और निर्वाचित सरकार की शक्तियों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं देतीं। चूंकि निर्वाचित सरकार अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति जवाबदेह होती है और उसे जनता की मांगों का भी ध्यान रखना होता है, लिहाजा उसके नियंत्रण में प्रशासनिक ढांचा होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है, लेकिन बाकी केंद्र शासित प्रदेशों से यहां कुछ नियम अलग हैं। बाकी तमाम राज्यों के राज्यपालों की तुलना में दिल्ली के एलजी यानी उपराज्यपाल के पास ज्यादा शक्तियां होती हैं। बेशक दिल्ली अर्द्धराज्य और संघ शासित क्षेत्र है, लेकिन 1991 के कानून के बाद यहां विधानसभा है और जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार भी है। बेशक पूर्ण राज्य नहीं है, फिर भी दिल्ली को कानून बनाने का अधिकार है। यह व्याख्या प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की है।</p>
<h3>आखिर फैसला सर्वोच्च न्यायालय को देना पड़ा | Delhi Government</h3>
<p style="text-align:justify;">विधान सभा बनने से पूर्व दिल्ली में महानगर परिषद (मेट्रो पॉलिटन काउंसिल) होती थी जिसकी संरचना मौजूदा विधान सभा जैसी ही थी। निर्वाचित सदन, उसका सभापति और मुख्य कार्यकारी काउंसलर होता था जिसकी हैसियत कमोबेश मुख्यमंत्री जैसी ही थी, लेकिन उसका केंद्र से टकराव नहीं होता था। लेकिन अधिक अधिकार की चाहत में विधानसभा की मांग के साथ राज्य का दर्जा देने का जोर बढ़ा और राजनीतिक दबाव के कारण राष्ट्रीय राजधानी को केंद्र शासित राज्य मानकर वहां निर्वाचित विधानसभा और उप-राज्यपाल (लेफ्टीनेंट गवर्नर) का पद सृजित किया गया। शुरू-शुरू में तो ठीक चला किंतु ‘आप’ के सत्तासीन होने के बाद केंद्र सरकार के साथ दिल्ली सरकार की टकराहट बढ़ती गई जिसकी वजह से ही सर्वोच्च न्यायालय को फैसला देना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों का (Delhi Government) अधिकार केजरीवाल सरकार को होगा। बेशक अफसरों का काडर बुनियादी तौर पर भारत सरकार के अधीन होता है, लेकिन राज्य सरकारें उनकी तैनाती और तबादले का फैसला ले सकती हैं। केंद्र एलजी के जरिए राज्य के अधिकारों को टेकओवर न करे। केंद्र सभी विधायी शक्तियां रख लेगा, तो संघीय ढांचा ही खत्म हो जाएगा। यह टिप्पणी भी प्रधान न्यायाधीश ने की, जो संविधान पीठ का नेतृत्व कर रहे थे। बीते 9 साल से अधिक समय से दिल्ली की केजरीवाल सरकार और एलजी के बीच तनातनी का माहौल बना हुआ है। प्रशासनिक संबंधों में भी खुन्नस थी। आम आदमी पार्टी के विधायकों और नेताओं ने एलजी के प्रति अपशब्दों का भी प्रयोग किया।</p>
<h3>पुलिस, भूमि, जन-व्यवस्था के मुद्दे भारत सरकार के अधीन होंगे</h3>
<p style="text-align:justify;">अभी तक असमंजस की स्थिति थी कि दिल्ली कौन चलाएगा? (Delhi Government) दिल्ली का कार्यकारी प्रमुख कौन हैं? दिल्ली अर्द्धराज्य से जुड़े फैसले कौन करेगा? नौकरशाही पर नियंत्रण किसका होगा? केंद्र सरकार कहां तक दखल दे सकती है? अब संविधान पीठ ने स्पष्ट व्याख्या कर दी है कि पुलिस, भूमि, जन-व्यवस्था के मुद्दे एलजी के जरिए भारत सरकार के अधीन होंगे। शेष फैसले निर्वाचित केजरीवाल सरकार लेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">केजरीवाल सरकार पुलिस पर भी अपना नियंत्रण चाहती है। लेकिन फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने जमीन, कानून व्यवस्था और पुलिस पर केंद्र के नियंत्रण को मान्य करते हुए चुनी हुई सरकार को प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण और पद स्थापना का काम सौंपने संबंधी जो निर्णय दिया उससे समस्या का आंशिक समाधान ही होगा और भविष्य में केजरीवाल सरकार इस बात के लिए लड़ेगी कि उसे वे सभी अधिकार मिलने चाहिए जो एक निर्वाचित राज्य सरकार को संविधान में दिए गए हैं। ये देखते हुए केंद्र शासित राज्य की व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं। चंडीगढ़, दादरा व नगर हवेली, लक्षद्वीप, दमन और दीव, लद्दाख आदि केंद्र शासित क्षेत्रों में प्रशासक काम देखते हैं।</p>
<h3>केजरीवाल के पास दिल्ली की जनता का जबरदस्त जनादेश है</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं दिल्ली, पुडुचेरी, अंडमान निकोबार और जम्मू-कश्मीर में उपराज्यपाल हैं। (Delhi Government) लेकिन फिलहाल चुनी हुई विधानसभा केवल दिल्ली और पुडुचेरी में ही है। उसमें भी विवाद की स्थिति दिल्ली में सबसे ज्यादा है क्योंकि यहां केंद्र सरकार का मुख्यालय होने से शक्तियों और अधिकारों का विकेंद्रीकरण या बंटवारा बेहद कठिन है। निश्चित रूप से केजरीवाल सरकार के पास दिल्ली की जनता का जबरदस्त जनादेश है किंतु दूसरी तरफ ये भी सही है कि राष्ट्रीय राजधानी में दो सरकारों का एक साथ होना समस्या पैदा करता रहेगा। केंद्र शासित होने के बाद भी जिस तरह अन्य क्षेत्र बिना विधानसभा के अपना शासन चलाते हैं वैसा ही दिल्ली के लिए भी श्रेयस्कर होता।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को अब विकास करवाने में कोई बाधा आड़े नहीं आएगी। इस मामले को राजनीतिक दृष्टि की बजाय सामान्य नजरिये से देखें तो ये महसूस होता है कि राष्ट्रीय राजधानी में दो चुनी हुई सरकारों का होना हमेशा टकराव पैदा करता रहेगा। केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार और कर्तव्य संविधान में उल्लिखित हैं। लेकिन केंद्र शासित क्षेत्र में चुनी हुई विधानसभा बनने के बाद उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना ही उचित होता है जैसा कि गोवा के मामले में हो चुका है।</p>
<h3>केजरीवाल सरकार का मनोबल बढ़ेगा | Delhi Government</h3>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा तैनात अधिकारी उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं क्योंकि उनकी नियुक्ति व तबादले का अधिकार उनकी सरकार के पास नहीं है। निस्संदेह, सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था के लिये ही नहीं बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी हैं। निस्संदेह, इससे केजरीवाल सरकार का मनोबल बढ़ेगा। आप दलील देती रही है कि जो जनता हमें सरकार बनाने का जिम्मा सौंपती है, नौकरशाहों के जरिए उनके लिए काम करने का अधिकार भी हमें होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी विकट स्थिति में हम जनता के दरबार में फिर किस मुंह से जाएंगे? यदि उनके कार्य न करा पाएंगे। अब सचिवों के सरकार के अधीन होने से हम यह जिम्मेदारी पूरी कर सकेंगे। कोर्ट का मानना था कि किसी भी चुनी हुई सरकार को लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अधिकार होना चाहिए। दूसरे शब्दों में किसी भी सरकार में वास्तविक ताकत जनप्रतिनिधियों के हाथ में ही होनी चाहिए। जो संघीय ढांचे व लोकतांत्रिक मूल्यों के लिये भी जरूरी है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>राजेश माहेश्वरी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 May 2023 09:56:14 +0530</pubDate>
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                <title>विनय कुमार सक्सेना होंगे दिल्ली के नए उप राज्यपाल, राष्ट्रपति ने की नियुक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। राष्ट्रपति ने अनिल बैजल का इस्तीफा स्वीकार करते हुए विनय कुमार सक्सेना को दिल्ली का नया राज्यपाल नियुक्त किया है। पिछले दिनों निजी कारणों का हवाला देते हुए अनिल बैजल ने दिल्ली के राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया था। सोमवार को राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी किए गए नोटिस के मुताबिक विनय कुमार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/vinay-kumar-saxena-will-be-the-new-lieutenant-governor-of-delhi-appointed-by-the-president/article-33770"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/lieutenant-governor.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> राष्ट्रपति ने अनिल बैजल का इस्तीफा स्वीकार करते हुए विनय कुमार सक्सेना को दिल्ली का नया राज्यपाल नियुक्त किया है। पिछले दिनों निजी कारणों का हवाला देते हुए अनिल बैजल ने दिल्ली के राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया था। सोमवार को राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी किए गए नोटिस के मुताबिक विनय कुमार सक्सेना उस दिन से दिल्ली के उप-राज्यपाल होंगे जिस दिन से वो पदभार संभालेंगे। विनय कुमार सक्सेना फिलहाल खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन (केवीआईसी) के चेयरमैन हैं।</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 May 2022 22:59:13 +0530</pubDate>
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                <title>एलजी का सही निर्णय</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली के राज्यपाल अनिल बैजल ने केजरीवाल सरकार का दिल्ली में केवल दिल्ली के ही मरीजों का ईलाज होने का निर्णय पलटकर एक अच्छा व मानवता के हित में निर्णय लिया है। अगर केजरीवाल सरकार का निर्णय लागू हो जाता तो इससे देश में बहुत ही बुरा संदेश जाना था व उन मरीजों के लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/right-decision-of-lieutenant-governor-of-delhi/article-16037"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-06/anil.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली के राज्यपाल अनिल बैजल ने केजरीवाल सरकार का दिल्ली में केवल दिल्ली के ही मरीजों का ईलाज होने का निर्णय पलटकर एक अच्छा व मानवता के हित में निर्णय लिया है। अगर केजरीवाल सरकार का निर्णय लागू हो जाता तो इससे देश में बहुत ही बुरा संदेश जाना था व उन मरीजों के लिए भी कई नई मुश्किलें खड़ी हो जाती जिनका ईलाज दिल्ली के अस्पतालों में चल रहा था। असल में लॉकडाऊन से पूरे देश में ही ईलाज की काफी समस्याएं सामने आई हैं। कई प्राईवेट अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं को डिलवरी के समय भर्ती करने से इन्कार कर दिया और जगह जगह भटकते हुए कई गर्भवती महिलाओं की मौत भी हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा अन्य रोगों वाले मरीजों को कुछ प्राईवेट अस्पतालों ने मना कर दिया व आखिर राज्य सरकारों को प्राईवेट अस्पतालों के प्रबंधकों के साथ पूरी सख्ती के साथ पेश आना पड़ा। ऐसी हालत में केजरीवाल सरकार का निर्णय न केवल कानूनन बल्कि नैतिक तौर पर भी मानवता के खिलाफ था। कानून मुताबिक कोई भी नागरिक देश के किसी भी अस्पताल में अपना ईलाज करवा सकता है। भारतीय विचारधारा भी दूसरों की मदद को मनुष्य का धर्म मानती है। परोपकार भारतीय संस्कृति का आधार है, जहां घायल दुश्मनों पर भी मलहम लगाई जाती है। एक देश में दो-तीन देशों जैसा सिस्टम नहीं चल सकता। सरकार का अस्तित्व ही नागरिकता की सेवा व सुविधा के लिए है।</p>
<p style="text-align:justify;">लॉकडाऊन का मतलब देशवासियों को बचाना है तो किसी मरीज का ईलाज करने से मना कर देना अपने आप में लॉकडाऊन की महत्तता को खत्म करना है। इस मामले में किसी भी तरह की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। केन्द्र व राज्य सरकारों को मिलकर कोविड-19 महामारी के साथ निपटने के लिए कदम उठाने चाहिए। जो राज्य अच्छे कार्य कर रहे हैं, उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए। यह भी जरूरी है कि राज्य राजनीति खेल में ना पड़कर अपनी रणनीति व तर्जुबे सांझे करें ताकि इस फैल रही बीमारी को रोका जा सके। महाराष्टÑ, राजस्थान, तामिलनाडू, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व गुजरात की हालत भी मौजूदा समय में बहुत ही बुरी है व दोबारा लॉकडाऊन की भी चर्चा चल रही है। ऐसे स्थिति में कोरोना को नियंत्रण में लाने वाले राज्य अधिक प्रभावित राज्यों को साथ दें। हर नागरिक कीमती है। इसलिए किसी भी मरीज का राज्य, भाषा, धर्म नहीं देखा जाना चाहिए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2020 09:49:39 +0530</pubDate>
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                <title>ऐतिहासिक फैसला: दिल्ली में अब एलजी नहीं सीएम की चलेगी</title>
                                    <description><![CDATA[हर काम में उपराज्यपाल की इजाजत जरूरी नहीं | Historical Decision सरकार के फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते उपराज्यपाल Agency/Edit By Deepak Tyagi नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में चुनी हुई सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि उपराज्यपाल के बीच आखिर किसकी चलेगी इस पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला (Historical Decision) सुना दिया है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/historical-decision/article-4656"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/kejriwal.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">हर काम में उपराज्यपाल की इजाजत जरूरी नहीं | Historical Decision</h2>
<ul>
<li><strong>सरकार के फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते उपराज्यपाल</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>Agency/Edit By Deepak Tyagi </strong><strong>नई दिल्ली।</strong> राजधानी दिल्ली में चुनी हुई सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि उपराज्यपाल के बीच आखिर किसकी चलेगी इस पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला <strong>(Historical Decision)</strong> सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली होईकोर्ट के फैसले को बदलकर कहा कि दिल्ली के उपराज्यपाल निर्वाचित सरकार के प्रत्येक फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते और वह मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अलग-अलग, परंतु सहमति वाले फैसले में कहा कि उपराज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 239एए के प्रावधानों को छोड़कर अन्य मुद्दों पर निर्वाचित सरकार की सलाह मानने को बाध्य हैं।</p>
<h1 style="text-align:center;">दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं | Historical Decision</h1>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति मिश्रा ने साथी न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति ए के सिकरी एवं न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की ओर से फैसला पढ़ा, जबकि न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने अपना-अपना फैसला अलग से सुनाया। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को यहां के लोगों की जीत बताया है।</p>
<h1 style="text-align:center;"><strong>सुप्रीम कोर्ट का फैसला जनता की जीत: केजरीवाल</strong></h1>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p lang="en" dir="ltr" xml:lang="en">A big victory for the people of Delhi…a big victory for democracy…</p>
<p>— Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) <a href="https://twitter.com/ArvindKejriwal/status/1014387139583373313?ref_src=twsrc%5Etfw">July 4, 2018</a></p></blockquote>
<p></p>
<h1 style="text-align:center;">सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा | Historical Decision</h1>
<ul>
<li><strong>कुछ मामलों को छोड़कर दिल्ली विधानसभा बाकी मसलों पर कानून बना सकती है। संसद का बनाया कानून सर्वोच्च है। </strong></li>
<li><strong>एलजी दिल्ली कैबिनेट की सलाह और सहायता से काम करें।</strong></li>
<li><strong>इतना ही नहीं कोर्ट ने यह भी कहा है कि एलजी को दिल्ली सरकार के काम में बाधा नहीं डालनी चाहिए। </strong></li>
<li><strong>हर काम में एलजी की सहमति अनिवार्य नहीं है।</strong></li>
<li><strong>सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, </strong></li>
<li><strong>इसलिए यहां के राज्यपाल के अधिकार दूसरे राज्यों के गवर्नर से अलग है। </strong></li>
<li><strong>दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है। इसलिए यहां बाकी राज्यपालों से अलग स्थिति है।</strong></li>
<li><strong>सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर एलजी को दिल्ली कैबिनेट की राय मंजूर न हो तो वह सीथे राष्ट्रपति के पास मामला भेज सकते हैं। </strong></li>
<li><strong>शक्तियों में समन्वय होना चाहिए। शक्तियां एक जगह केंद्रित नहीं हो सकती।</strong></li>
<li><strong>लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोच्च हैं। जनता के प्रति जवाबदेही सरकार की होनी चाहिए। </strong></li>
<li><strong>संघीय ढांचे में राज्यों को भी स्वतंत्रता मिली हुई है। </strong></li>
<li><strong>जनमत का महत्व बड़ा है। इसलिए तकनीकी पहलुओं में उलझाया नहीं जा सकता।</strong></li>
</ul>
<h1 style="text-align:center;">बीजेपी ने अपनी जीत बताया | Historical Decision</h1>
<p style="text-align:justify;">बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष मनोज तिवारी ने फैसले का स्वागत किया है। उनका तर्क है कि कोर्ट ने सीएम और उप-राज्यपाल को संविधान सम्मत होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज नहीं देने की बात कह कर सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को आईना दिखाया है। दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष ने आगे कहा कि केजरीवाल संविधान को नहीं मानते और सुप्रीम कोर्ट ने अराजक शब्द का इस्तेमाल करके केजरीवाल के गाल पर तमाचा मारा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>यह उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला है। अब दिल्ली सरकार को फाइलें उप राज्यपाल को नहीं भेजनी होंगी और काम नहीं रुकेगा। हम दिल्ली की जनता की ओर से सुप्रीम कोर्ट का आभार जताते हैं। उपराज्यपाल को कैबिनेट के फैसले को मानना होगा। तबादला और नियुक्ति सरकार ही करेगी। सिसोदिया ने कहा कि पूर्ण राज्य का आंदोलन चलता रहेगा।</em><br />
<strong>मनीष सिसोदिया</strong></p>
<h2 style="text-align:center;">केजरीवाल ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी थी चुनौती | Historical Decision</h2>
<p style="text-align:justify;">केजरीवाल सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी जिसमें उसने कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक अधिकारी हैं। केजरीवाल सरकार का आरोप था कि केंद्र सरकार दिल्ली में संवैधानिक रूप से चुनी गयी सरकार के अधिकारों का हनन करती है। इस वजह से दिल्ली के विकास कार्य प्रभावित होते हैं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Jul 2018 10:35:50 +0530</pubDate>
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                <title>449 प्राइवेट स्कूलों को टेकओवर करने के प्रस्ताव को LG की मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। एक बड़ी कार्रवाई के तहत दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने 449 निजी स्कूलों को टेकओवर करने केे दिल्ली सरकार के आदेश को मंजूरी दे दी है। इन स्कूलों पर ये कार्रवाई मनमानी फीस वसूलने को लेकर की गई है। इन स्कूलों ने सरकार के फीस वापस लौटाने के आदेश की अनदेखी की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/lg-approval-for-takeover-of-449-private-schools/article-3294"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/school-21.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> एक बड़ी कार्रवाई के तहत दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने 449 निजी स्कूलों को टेकओवर करने केे दिल्ली सरकार के आदेश को मंजूरी दे दी है। इन स्कूलों पर ये कार्रवाई मनमानी फीस वसूलने को लेकर की गई है। इन स्कूलों ने सरकार के फीस वापस लौटाने के आदेश की अनदेखी की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">केजरीवाल ने 18 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के नाम पर इन स्कूलों ने स्कूल की फीस बढ़ाई थी जिसे अदालत ने जस्टिस अनिल देव समिति समिति की जांच के आधार पर गलत पाते हुए सरकार से इस दिशा में की गई कार्रवायी का जवाब मांगा था। केजरीवाल ने कहा कि ‘‘सरकार ने अदालत को बताया कि सरकार अनिल देव समिति की सिफारिशों को स्कूलों से लागू कराएगी। जो स्कूल इसे लागू नहीं करेंगे उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जायेगी और जरूरत पड़ने पर ऐसे स्कूलों को टेकओवर भी कर सकती है।’’</p>
<h2 style="text-align:justify;">दिल्ली सरकार ने 449 प्राइवेट स्कूलों को टेकओवर करने का दिया था प्रस्ताव</h2>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने 449 प्राइवेट स्कूलों को टेकओवर करने का प्रस्ताव दिया था। इस सूची में दिल्ली पब्लिक स्कूल मथुरा रोड, स्प्रिंग डेल, अमिटी इंटरनेशनल साकेत, संस्कृति स्कूल, मॉडर्न पब्लिक स्कूल भी शामिल हैं। दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि दिल्ली हाई कोर्ट की बनाई समिति की सिफारिश 449 प्राइवेट स्कूल नहीं मान रहे और लगातार नियम का उल्लंघन कर रहे हैं इसलिए सरकार इनको टेकओवर करने को तैयार है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">सरकार चुप नहीं बैठेगी</h2>
<p style="text-align:justify;">इसी मसले पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि मौजूदा दिल्ली सरकार शिक्षा को अभिन्न अंग मानती है। प्राइवेट में पैसे वालों के बच्चे पढ़ते थे। सरकारी में ग़रीब लोगों के बच्चे पढ़ते थे। हमने ये गैप कम किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, हमने सरकारी शिक्षा प्रणाली को अच्छा किया है. 449 प्राइवेट स्कूलों पर मनमानी का आरोप लगाते हुए कहा कि ये नियमों का उल्‍लंघन कर रहे हैं। हालांकि हम इन स्कूलों के ख़िलाफ़ नहीं हैं। हम जस्टिस अनिल देव सिंह की सिफारिशें लागू करेंगे। अगर प्राइवेट स्कूल पेरेंट्स को लूटेंगे तो वो हम नहीं होने देंगे। अब सरकार चुप नहीं बैठेगी।</p>
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                <pubDate>Mon, 21 Aug 2017 03:46:41 +0530</pubDate>
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