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                <title>Electronic Media - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>टेलीविजन के मोहपाश में जकड़ते बच्चे</title>
                                    <description><![CDATA[इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज जनमानस इस कदर जुड़ गया है कि इसके बगैर अब जीवन की जैसे कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इन्हीं में मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम है टेलीविजन जिसे इडियट बॉक्स यानी की बुद्धुबक्सा भी कहा जाता है। टेलीविजन के आगे बच्चा एक बार बैठ जाता है तो उससे चिपककर रह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/tackling-children-in-television/article-3437"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/child-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज जनमानस इस कदर जुड़ गया है कि इसके बगैर अब जीवन की जैसे कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इन्हीं में मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम है टेलीविजन जिसे इडियट बॉक्स यानी की बुद्धुबक्सा भी कहा जाता है। टेलीविजन के आगे बच्चा एक बार बैठ जाता है तो उससे चिपककर रह जाता है। इस पर दिखाए जाने वाले अर्थहीन कार्यक्रम तथा उससे भी ज्यादा बेवकूफी भरे विज्ञापन बच्चों को मानसिक तौर पर क्या परोस रहे हैं। इसकी तरफ ध्यान तो सभी का आकर्षित होता है, लेकिन इसे नेसेसरी इविल की तरह स्वीकार कर लिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्सर अखबारों में चोरी, कत्ल, डाके बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में किए जाने के बारे में समाचार पढ़ने में आते हैं। बच्चे जिनके खेलने-पढ़ने, व्यावहारिकता सीखने के दिन होते हैं, ऐसी पिक्चर सीरियल देखकर कई तरह की भ्रांतियों के शिकार होने लगते हैं। जो बच्चे अधिक समय तक टेलीविजन से चिपके रहते हैं, उनकी कार्यक्षमता व कार्यकुशलता सफर करती है। शरीर की गतिशीलता कम होने के कारण मोटापा बढ़ने लगता है तथा शरीर सुस्त हो जाता है। इसी प्रकार बच्चों की कल्पनाशक्ति भी कम होने लगती है। होता यह है कि जिस कल्पना के लिए दिमाग का व्यायाम होता है, वह सब कुछ टेलीविजन पर इस प्रकार दर्शाया जाता है कि बच्चों की कल्पना के लिए कुछ बाकी नहीं रह जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार अधिक समय तक टीवी देखते रहने से बच्चों की आंखों पर बुरा असर पड़ता है खासकर कलर टीवी से निकलने वाली किरणों के दुष्प्रभाव के कारण आजकल छोटे-छोटे बच्चों को चश्में चढ़ जाते हैं। अगर टीवी दूर से और उचित रोशनी में देखा जाए तो उतनी हानि नहीं होती उपयुक्त स्थिति में देर तक बैठने से बच्चा एक तरह से सम्मोहन की सी स्थिति में आ जाता है। ऐसे में अगर वह आपको एक ग्लास पानी भी लाकर पिलाता है तो मशीन सा बिहैव करता है। आप कुछ बात करेंगे तो बात भी जैसे उसके सिर के ऊपर से गुजर जाएगी। ये घातक प्रभाव है टीवी का, जो बच्चे को मानसिक रूप से कुंद करके रख देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में माता-पिता बच्चे पर खीजें, उसे मारें-पीटें तो यह तो कोई निदान नहीं टीवी से फैले वायरस का। घर में टीवी रहेगा तो बच्चे देखेंगे भी जरूर। और फिर क्या मां- बाप स्वयं कई बार इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं होते? जब-जब बच्चे माता-पिता को तंग करते हैं। मेहमानों के आने पर उनकी बातों में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। वे स्वयं बच्चों को टीवी देखने के लिए कह देते हैं, क्योंकि उन्हें यही सबसे आसान तरीका नजर आता है बच्चों को व्यस्त रखने का। टीवी का चस्का बच्चों के लिए नशे की लत बन जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब टीवी बोलता है, बच्चे खामोश रहते हैं तो उनकी बोलने की क्षमता भी घटती है, फिर फिल्मों के चीप डायलॉग ही उनके कानों में गूंजते हैं। दादी और नानी की लुभावनी अच्छी शिक्षा से भरपूर स्वस्थ मनोरंजन करने वालीं कहानियां जिनमें बच्चों की लगातार जिज्ञासाओं का दादी-नानी बडेÞ प्यार से समाधान करती थीं। उनका ऐसा विकल्प हमारी आने वाली पीढ़ी को किस तरह बरबाद कर रहा है, क्या यह सिर्फ सोचने भर की बात है? पता नहीं क्यों सरकार ने इस विषय में चुप्पी साध रखी है। देश में भौतिक उन्नति का फायदा तभी है, जब नैतिकता का अवमूल्यन नहीं हो।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल माता-पिता इस विषय में जरा भी ढील न देते हुए टीवी देखने के लिए बच्चों का समय निर्धारित कर दें। टीवी कार्यक्रमों की गुणवत्ता का भी ख्याल रखा जाए। समय रहते जरूरी है कि बच्चों के स्वस्थ शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उन्हें टेलीविजन के मोहपाश से मुक्त कराया जाए। मुक्त सामाजिक व्यवहार, खेलकूद, डिबेट, पेंटिंग, रीडिंग, गायन, नृत्य आदि में उनकी रुचि जगाई जाए, जिससे वे टेलीविजन की बनावटी और एक सुस्त जिंदगी जीने के कहर से बचें। स्वयं को मिली सबसे बड़ी नेमत जिंदगी को स्वयं जिएं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-उषा जैन शीरी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Oct 2017 04:48:54 +0530</pubDate>
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                <title>जानिए हनीप्रीत की फर्जी सहेली का सच</title>
                                    <description><![CDATA[मीडिया ने तोते की तरह रटा रखी है हनप्रीत की फर्जी सहेली सरसा। इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने शर्म की सभी हदें पार कर दी हैं। वह डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ झूठा प्रचार करने की कोई कसर नहीं छोड़ रहा। पूज्य गुरु जी के फर्जी रिश्तेदार भूपेन्द्र गोरा को स्टूडियो में लाने के बाद अब हनीप्रीत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/fake-friend-of-honeypreet/article-3325"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-09/honeypreet-fake-friend-copy-1.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">मीडिया ने तोते की तरह रटा रखी है हनप्रीत की फर्जी सहेली</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा।</strong> इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने शर्म की सभी हदें पार कर दी हैं। वह डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ झूठा प्रचार करने की कोई कसर नहीं छोड़ रहा। पूज्य गुरु जी के फर्जी रिश्तेदार भूपेन्द्र गोरा को स्टूडियो में लाने के बाद अब हनीप्रीत इन्सां की फर्जी सहेलियों का जाल बुना जा रहा है लेकिन मीडिया अपने इस जाल में बुरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। प्रत्येक आम दर्शक को भी यह बात समझ आ रही है कि हनीप्रीत की फर्जी सहेली के बोलने से पहले एंकर ही ज्यादा बोल रहा है। वह खुद ही उसके मुंह से कुछ बुलवाना चाह रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जो कुछ एंकर खुद कहना चाहता है वह पहले ही बोल देता है, जिसे फर्जी सहेली केवल दोहराती है। सहेली के रुक-रुककर बोलने से भी समझ जाता है कि वह पूरी तरह प्लान प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसे पहले तोते की तरह रटाया गया है। जब वह किसी बात को भूल जाती है तब एंकर खुद मक्कारी से उसे याद करवाता है। फर्जी सहेली का तब झूठ सरेआम सामने आ जाता है जब वह कहती है कि हनीप्रीत गरीब परिवार से संबंधित थी। सरसा व फतेहाबाद के आम लोग जानते हैं कि हनीप्रीत के माता-पिता पूरे खुशहाल परिवार से संबंध रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरसा में परशुराम चौंक के नजदीक इस परिवार का एक प्रसिद्ध कंपनी के टायरों का शोरूम है, जिसमें मोटरसाईकिल, स्कूटर से लेकर चार पहिया वाहनों के टायर बेचे जाते हैं।  क्या कोई गरीब परिवार टायरों की एजेंसी ले सकता है? कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते। फर्जी सहेली को रटाने वाला मीडिया यह बात भूल गया कि सहेली को यह भी बताना था कि हनीप्रीत गरीब परिवार से संबंध नहीं रखती। फर्जी सहेली यह भी झूठ बोलती है कि हनीप्रीत का परिवार किराए के मकान में रहता है, जो सरासर गलत है। सारा फतेहाबाद यह बात जानता है कि हनीप्रीत के पिता की शहर के जगजीवनपुरा कॉलोनी में अपनी कोठी थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">ट्रेनर ने नहीं कही-हनीप्रीत के बारे में कोई भी गलत बात</h2>
<p style="text-align:justify;">ट्रेनर से अपनी मनघंड़त बात कहलवाना चाहता था एंकर, लेकिन हुआ नाकाममीडिया ने एक जिम ट्रेनर को भी पेश किया है जो डेरा सच्चा सौदा में हनीप्रीत को जिम करवाने का दावा करती है लेकिन इस ट्रेनर ने कोई भी ऐसी बात नहीं कही, जो हनीप्रीत के चरित्र के खिलाफ हो। ट्रेनर केवल इतना ही कहती है कि हनीप्रीत खुद को फिट रखने के लिए जिम करती थी। ट्रेनर ने यह भी कहा कि पूज्य गुरु जी कभी-कभी जिम में आते थे और सभी को बेहतर तरीके से जिम करने व फिट रहने के लिए कहते थे। ट्रेनर ने कहीं भी यह नहीं कहा कि हनीप्रीत किसी बॉलीवुड अभिनेता की हीरोइन बनना चाहती थी लेकिन एंकर धक्के से ट्रेनर के मुंह में यह बातें कहलवाने की कोशिश करता है परन्तु नाकाम हो जाता है। फिर एंकर खुद ही चीख-चीखकर बोलने लग जाता है कि हनीप्रीत बालीवुड में नाम कमाना चाहती थी।</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 19 Sep 2017 02:48:21 +0530</pubDate>
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