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                <title>Childhood - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>बचपन</title>
                                    <description><![CDATA[मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी, नंदन-वन सी फल उठी वह छोटी-सी कुटिया मेरी। ‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी, कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने लाई थी। मैंने पूछा-यह क्या लाई? बोल उठी वह-‘माँ काओ’, फूल-फूल मैं उठी खुशी से मैंने कहा-‘तुम्हीं खाओ।’ […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/childhood/article-29344"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-12/betiya.jpg" alt=""></a><br /><p>मैं बचपन को बुला रही थी<br />
बोल उठी बिटिया मेरी,<br />
नंदन-वन सी फल उठी वह<br />
छोटी-सी कुटिया मेरी।<br />
‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी<br />
मिट्टी खाकर आई थी,<br />
कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में<br />
मुझे खिलाने लाई थी।<br />
मैंने पूछा-यह क्या लाई?<br />
बोल उठी वह-‘माँ काओ’,<br />
फूल-फूल मैं उठी खुशी से<br />
मैंने कहा-‘तुम्हीं खाओ।’<br />
<strong>-सुभद्राकुमारी चौहान</strong></p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Dec 2021 12:36:33 +0530</pubDate>
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                <title>बस्तों का बोझ कम होने से लौटेगा बचपन</title>
                                    <description><![CDATA[स्कूली बच्चों पर बस्तों का बोझ कम करने की चर्चा कई वर्षों से होती आई है लेकिन अब केन्द्र सरकार ने पाठ्यक्रम का बोझ कम करने का फैसला किया है, जो एक सराहनीय कदम है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि पहली और दूसरी के छात्रों को होमवर्क न दिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/childhood-will-return-from-the-burden-of-the-school-begs/article-6705"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/school.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्कूली बच्चों पर बस्तों का बोझ कम करने की चर्चा कई वर्षों से होती आई है लेकिन अब केन्द्र सरकार ने पाठ्यक्रम का बोझ कम करने का फैसला किया है, जो एक सराहनीय कदम है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि पहली और दूसरी के छात्रों को होमवर्क न दिया जाए और उनके बस्तों का वजन भी डेढ़ किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। मंत्रालय ने पहली से लेकर दसवीं क्लास तक के बच्चों के बस्ते का वजन भी तय कर दिया है। निश्चित ही शिक्षा पद्धति की एक बड़ी विसंगति को सुधारने की दिशा में यह एक सार्थक पहल है जिससे भारत के करीब 24 करोड़ बच्चों का बचपन मुस्कुराना सीख सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने संभवत: पहली बार यह बात स्वीकार की है कि बच्चों को तनावमुक्त बनाये रखना शिक्षा की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पिछले कुछ समय से विभिन्न सरकारों की यह प्रवृत्ति हो चली है कि वे शिक्षा में बदलाव के नाम पर पाठ्यक्रम को संतुलित करने की बजाय उसमें कुछ नया जोड़ती रही एवं बोझिल करती रही हैं। इस तरह पाठ्यक्रम बढ़ता चला गया। सरकार ने बच्चों के बचपन को बोझिल होने से बचाने के लिये अनेक सूझबूझवाले निर्णय लिये हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मंत्रालय ने इन्हें केवल गणित और भाषा पढ़ाने को कहा है, जबकि तीसरी से पांचवीं कक्षा के स्टूडेंट्स को गणित, भाषा और पर्यावरण विज्ञान पढ़ाने का निर्देश दिया गया है। प्राइमरी शिक्षा में निश्चय ही यह एक बड़ा सुधार है, बशर्ते यह लागू हो जाए। स्कूल बैग का वजन कम करने को लेकर नियम पहले से ही बने हुए हैं पर वे लागू नहीं हो पाए। गौरतलब है कि 1993 में यशपाल कमिटी ने प्रस्ताव रखा था कि पाठ्यपुस्तकों को स्कूल की संपत्ति समझा जाए और बच्चों को अपनी किताबें क्लास में ही रखने के लिए लॉकर्स अलॉट किए जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक समाज में बच्चों का जीवन बोझिल हो गया एवं उनका बचपन लुप्त होने लगा है, क्योंकि शिक्षा के निजीकरण के दौर में बस्ते का बोझ हल्का करने की बात एक सपना बन कर रह गयी थी। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने स्वीकार किया कि एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम जटिल है और सरकार इसे घटाने की दिशा में पहल कर रही है। वर्ष 2005 में नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ) ने एक सर्कुलर जारी किया जिसमें बच्चों के शारीरिक और मानसिक दबाव को कम करने के सुझाव दिए गए थे। इसके आधार पर एनसीईआरटी ने नए पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें तैयार कीं, जिसे सीबीएसई से संबद्ध कई स्कूलों ने अपनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">उसके बाद चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत कहा गया कि बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इन सब उपायों के बावजूद आज भी ज्यादातर स्कूली बच्चों को भारी बोझा अपनी पीठ पर ढोना पड़ता है। स्कूल चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, हकीकत यही है कि जिस स्कूल का बस्ता जितना ज्यादा भारी होता है और जहां जितना ज्यादा होमवर्क दिया जाता है, उसे उतना ही अच्छा स्कूल माना जाता है। जबकि सचाई यह है कि पाठ्यक्रम के भारी भरकम बोझ से बच्चों का मानसिक विकास अवरुद्ध होता है, इससे बच्चों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। एक तो बच्चों पर पढ़ाई का अतिरिक्त बोझ बढ़ा और जो व्यावहारिक ज्ञान एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण बच्चों को विद्यालयों में मिलना चाहिए था, उसका दायरा लगातार सिमटता गया।</p>
<p style="text-align:justify;">बस्तों के बढ़े बोझ तले बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। आज बच्चे अपने बचपन को ढूंढ रहे हैं। किताबों से भरे बस्ते बेचारे मासूम बच्चे अपने कंधों पर ढो रहे हैं। हंसने-खेलने की उम्र में बच्चों की पीठ पर किताबों, कापियों का इतना बोझ लादना क्या इन मासूमों पर अत्याचार नहीं है? शरीर विज्ञानी चेतावनी दे चुके हैं कि भारी बस्ता बच्चों की हड्डियों में विकृति पैदा करता है और बड़े होने पर वे गंभीर बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस भारी-भरकम पाठ्यक्रम को लादे बच्चें इस तरह बीमार रहने लगे, तनाव के शिकार होने लगे। तनाव है तो उद्दण्डता भी होगी, आक्रामक भी बनेंगे, इस बढ़ती आक्रामकता को हमने पिछले दिनों देखा है, किस तरह से बच्चे ने अपने प्रिसिंपल को ही गोली मार दी या किसी दूसरे साथी बच्चे की हत्या कर दी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे को लागू करने के लिये सरकार सक्रिय हैं। शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) में संशोधन के आशय वाला बिल भी संसद के समक्ष रखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मद्रास हाईकोर्ट ने 30 मई को एक अंतरिम आदेश में केंद्र से कहा था कि वह राज्य सरकारों को निर्देश जारी करे कि वे स्कूली बच्चों के बस्ते का भार घटाएं और पहली-दूसरी कक्षा के बच्चों को होमवर्क से छुटकारा दिलाएं। कई शिक्षाविदों ने इस पर सवाल उठाया और कहा कि कम उम्र में बहुत ज्यादा चीजों की जानकारी देने की कोशिश में बच्चे कुछ नया नहीं सीख पा रहे, उलटे पाठ्यक्रम का बोझ उन्हें रटन विद्या में दक्ष बना रहा है। यही नहीं, इस दबाव ने बच्चों में कई तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा की हैं, वह कुंठित हो रहा है, तनाव का शिकार बन रहा है। पहले तो स्कूलों का तनाव भरा परिवेश, आठों कलांशें पढ़ने से बच्चे थक जाते हैं और ऊपर से उनको भारी होमवर्क दे दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षाशास्त्री बताते हैं कि 4 से 12 साल तक की उम्र बच्चे के व्यक्तित्व के विकास की उम्र होती है, इसलिए इस दौरान रटंत पढ़ाई का बोझ डालने के बजाय सारा जोर उसकी रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता विकसित करने पर होना चाहिए। आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने जीवन विज्ञान के रूप में शिक्षा की इन कमियों को उजागर करते हुए एक परिपूर्ण शिक्षा का स्वरूप प्रस्तुत किया।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छा है कि सरकार ने उनके सुझावों एवं विशेषज्ञों की राय पर ध्यान दिया और शुरूआती कक्षाओं में पाठ्यक्रम का बोझ कम करने का निर्णय किया। उम्मीद करें कि राज्य सरकारें उसके निदेर्शों की रोशनी में नियम बनाएंगी। पब्लिक स्कूलों के संचालकों, शिक्षकों और उन अभिभावकों को भी इन नियमों को मन से स्वीकार करना होगा, जो बच्चों को अधिक से अधिक पाठ रटा देने को ही गुणात्मक शिक्षा मान बैठे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बोझिल वातावरण में आज के बच्चे माता-पिता की आकांक्षाओं का बोझ भी ढ़ो रहे हैं और उन पर अभिभावकों की सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है। इन सब जटिल स्थितियों को भारत का बचपन संभाल नहीं पा रहा और वह आगे बढ़ने की अपेक्षा परीक्षा में फेल होने के डर से मौत को गले लगाने लगा हैं। आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं, जो भारत की शिक्षा पर एक बदनुमा दाग है। आज पाठ्यक्रम में व्यावहारिक पाठ्यक्रम के ज्ञान व शिक्षा से भी बच्चों को वंचित होना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कहना न होगा कि बस्तों के बढ़े बोझ तले बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 12 साल की आयु के बच्चों को भारी स्कूली बस्तों की वजह से पीठ दर्द का खतरा पैदा हो गया है। पहली कक्षा में ही बच्चों को छह पाठ्य पुस्तकें व छह नोट बुक्स दी जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मतलब पांचवीं कक्षा तक के बस्तों का बोझ करीब आठ किलो हो जाता है। बच्चों के बस्ते और भारी भरकम पाठ्यक्रम हैं। इससे बच्चों को पीठ, घुटने व रीढ़ पर असर पड़ रहा है। आजकल बहुत सारे बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं। बस्तों के बढ़े बोझ से निजी स्कूलों के बच्चे खेलना भी भूल रहे हैं। घर से भारी बस्ते का बोझ और स्कूल से होम वर्क की अधिकता से शिशु दिमाग का विकास बाधित हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ी स्पर्धा के दौर में सरकारी स्कूलों को छोड़कर अभिभावक अपने नौनिहालों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। परीक्षा का समय हो या अध्यापक का व्यवहार, घरेलू समस्या हो या आर्थिक समस्या-तनावमुक्त परिवेश बहुत आवश्यक है। लेकिन बच्चों को तनावमुक्त परिवेश देने में शिक्षा को व्यवसाय बनाने वाले लोगों ने कहर बरपाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चय ही कुछ स्वार्थी तत्त्व इन बच्चें रूपी महकते पुष्पों पर भी अत्याचार करने से बाज नहीं आते। उनका उद्देश्य हर कक्षा में अधिक से अधिक पुस्तकें लगवाना रहता है, जिससे वे पुस्तक-विक्रेताओं और दुकानदारों से कमीशन लेकर अपनी जेब गर्म कर सकें। दूसरी बात जो ध्यान में देनी है, वह यह है कि कक्षा के बंद कमरे में पाठ रटवाने के स्थान पर उन्हें रोचक ढंग से पढ़ाया जाए। बच्चों के दिमाग में शब्दों को भरना नहीं चाहिए, बल्कि उनके मस्तिष्क में शब्दों को निकलवाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">वे अच्छी तरह से शब्दों को समझें, रटें नहीं। बच्चों को व्यावहारिक विद्या सिखलाई जानी चाहिए, ताकि उनके विचार शक्ति में इजाफा हो। केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा पद्धति की विसंगतियों को दूर करने के लिये केवल कानून ही नहीं बनाये, बल्कि उन्हें पूरी ईमानदारी से लागू भी करें, तभी भारत का बचपन मुस्कुराता हुआ एक सशक्त पीढ़ी के रूप में नयी दिशाओं को उद्घाटित कर सकेंगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ललित गर्ग</p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Thu, 29 Nov 2018 12:51:44 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अकेला बचपन लापरवाह हुए अभिभावक</title>
                                    <description><![CDATA[तीन महीनों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में 100 के करीब जिंदगीयां मौत के मुंह में जा चुकी हैं। विगत दिनों पंजाब में दो युवक सैल्फी लेने की चक्कर में रेलगाड़Þी की चपेट में आकर अपनी जिंदगी गंवा बैठे। इसी तरह हरियाणा के 10-12 वर्ष की आयु के बच्चे यमुना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/single-childhood-carefree-guardian/article-5202"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/train.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तीन महीनों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में 100 के करीब जिंदगीयां मौत के मुंह में जा चुकी हैं। विगत दिनों पंजाब में दो युवक सैल्फी लेने की चक्कर में रेलगाड़Þी की चपेट में आकर अपनी जिंदगी गंवा बैठे। इसी तरह हरियाणा के 10-12 वर्ष की आयु के बच्चे यमुना नदी में नहाने गए व डूब गए।</p>
<p style="text-align:justify;">मृतकों में अधिकतर 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे ही शामिल हैं। गर्मी में नहरों में बच्चों के डूबने की खबरें आम सुनने को मिल रही हैं। ऐसी घटनाएं एक-दो दिन चर्चा में रहकर समय की धूल में खो जाती हैं। सरकारों के लिए यह मुद्दा नहीं सिर्फ अचानक घटित हुई घटनाएं हैं। यह घटनाएं मामूली नहीं बल्कि एक सामाजिक संकट का परिणाम हैं, जिस संबंधी चर्चा नहीं के समान है। दरअसल यह दो पीढ़ियों के मध्य पैदा हुई खाई का परिणाम है, जिस संबंधी न तो समाज जागृत है व न ही इसे रोकने के लिए कोई चर्चा होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब परिस्थितियां यह बन गई हैं कि बच्चे समाज में अकेले रह गए हैं। अभिभावकों के लाड-प्यार की कमी के चलते वह मोबाईल फोनों पर समय व्यतीत करने लगे हैं। काम-धंधों में उलझे अभिभावकों के पास समय की कमी तो जरूर है लेकिन बच्चों को नजरअंदाज भी किया जा रहा है। अभिभावक बच्चों को समय नहीं दे रहे। नहरों-नदियों में नहाने के लिए बच्चे पहले भी जाते थे लेकिन तब उनके साथ परिवार का कोई समझदार आदमी जरूर होता था।</p>
<p style="text-align:justify;">अब घरों में बंद हुए बच्चे अभिभावकों को कामों में उलझे देख खुद अनजान नदियोंं-नहरों पर जा पहुंचते हैं व नहाने का आनंद लेने के चक्कर में अपनी जिंदगी गंवा बैठते हैं। दूसरी तरफ सैल्फी कल्चर का ऐसा रूझान है कि बच्चे अपनी सुरक्षा की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहे। सैकड़Þों बच्चे समुन्द्र में कि श्तियों पर सैल्फी लेते डूब गए। कोई हैडफोन कानों में लगाकर सड़क हादसे या रेल हादसे का शिकार हो गया। मोबाईल फोन ने जरूरत की बजाए एक बीमारी का रूप धारण कर लिया हैै।</p>
<p style="text-align:justify;">कसूर मोबाईल फोन का नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का है जहां अभिभावकों ने अपनी जिम्मेवारी से मुंह मोड़कर बच्चों को मोबाईल के सामने फेंक दिया। सांझे परिवार खत्म हो गए हैं। छोटे परिवार आर्थिक जरूरतों के लिए तंगहाली से जूझ रहे हैं। अमेरिका ने हथियारों की आजादी देकर जो दुख झेले हैं भारत वह मोबाईल के बेजा दुरुपयोग एवं अभिभावकों की लापरवाही के कारण भुगत रहा है। सरकार को इन घटनाओं को देखकर आंखें मूंदने की बजाए बचपन को बचाने के लिए कोई ठोस नीति तैयार करनी चाहिए।</p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Mon, 06 Aug 2018 20:04:40 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बचपन पर भारी पड़ते मोबाइल!</title>
                                    <description><![CDATA[आॅनलाइन गेम्स खेलने वाला हर व्यक्ति गेमिंग एडिक्शन का शिकार Infinitely mobile at childhood! प्रमोद भार्गव । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले दिनों रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीडी) में डिजिटल और विडियो गेम की लत को एक तरह का डिसआॅर्डर बताते हुए इसे मानसिक बिमारी यानी मनोविकार के रूप में वगीर्कृत किया है Infinitely mobile at […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/infinitely-mobile-at-childhood/article-4551"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/child1.jpg" alt=""></a><br /><h1>आॅनलाइन गेम्स खेलने वाला हर व्यक्ति गेमिंग एडिक्शन का शिकार</h1>
<h2>Infinitely mobile at childhood!</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रमोद भार्गव । </strong></p>
<p style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले दिनों रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीडी) में डिजिटल और विडियो गेम की लत को एक तरह का डिसआॅर्डर बताते हुए इसे मानसिक बिमारी यानी मनोविकार के रूप में वगीर्कृत किया है Infinitely mobile at childhood!।डब्लयूएचओ के इस वर्गीकरण में शामिल की गई बीमारियों का चिकित्सकीय इलाज करवाना जरूरी माना जाता है।डब्ल्यूएचओ ने डिजिटल माध्यमों पर गेमिंग की लत के अध्ययन के बाद बताया कि इस बीमारी का अपना ही एक साँचा होता है,इसके शिकार रोगियों में गेमिंग की लत इस हद तक बढ़ सकती है कि वह अपने जीवन के किसी भी अन्य पहलू की अपेक्षा गेमिंग को अधिक महत्वपूर्ण मानने लगते हैं।ऐसा नहीं है कि आॅनलाइन गेम्स खेलने वाला हर व्यक्ति गेमिंग एडिक्शन का शिकार है।</p>
<h1>नींद, खानपान और शारीरिक गतिविधियां प्रभावित</h1>
<h2>Infinitely mobile at childhood!</h2>
<p style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसके लिए उस व्यक्ति के साल भर के गेमिंग पैटर्न को देखने की जरूरत होती है।अगर उसकी गेम खेलने की लत से उसके निजी, पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक और व्यवसायिक कामों पर असर पड़ने लगे। साथ ही गेमिंग की वजह से नींद, खानपान और शारीरिक गतिविधियां प्रभावित होने लगे। तभी उसे ‘गेमिंग एडिक्ट’ यानी बीमारी का शिकार माना जा सकता है। इस तरह के लोग वीडियो गेम से उनके व्यवहार में बदलाव आने के कारण वे वास्तविक नहीं आभासी संसार में जीना शुरू कर देते हैं। गेम्स की दुनिया को सच मानते हुए बच्चे इसे वास्तविक जीवन में भी अपनाने की सोचते है। वो रोजमर्रा की जिंदगी में वीडियो गेम के करेक्टर की तरह व्यवहार करने लगते हैं। इससे धीरे-धीरे उनके व्यवहार में गुस्सा और जिद्दीपन आने लग जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
पिछले कुछ वर्षों में इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। आज के डिजिटल युग में ‘बिना इंटरनेट सब सून’ वाली स्थिति है। बच्चे, युवा यहां तक कि हर उम्र के लोग इंटरनेट पर चैटिंग, आॅनलाइन गेम व शॉपिंग करते हैं। लेकिन चिंता इस बात की है कि आज बच्चों का बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है और बदलते परिवेश में बच्चों के दोस्त, खेल का मैदान, पार्क, सब कुछ इंटरनेट के एक एप्लीकेशन पर सिमट गया है।आउटडोर गेम्स से ज्यादा तवज्जो अब इंटरनेट गेम्स को मिलने लगी है।जिस उम्र में बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए उनका हमउम्र साथियों के साथ खेलना-कूदना, हंसना-बोलना जरूरी होता है, वे हाथ में मोबाइल लिए या फिर कंप्यूटर में कोई कृत्रिम गेम खेल रहे होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले गली-मोहल्ले तथा खेल के मैदानों में सुबह-शाम बच्चों को खेलते हुए देखा जा सकता था। अब खेल मैदान भी खत्म हो रहे हैं और बचपन एक कमरे तक सिमट कर रह गया है। उनके खेल व मनोरंजन के तरीके बदल गए हैं। बच्चे पहले लुका-छिपी, गिल्ली- डंडा, रस्सी कूद, क्रिकेट, फुटबॉल, पतंग उड़ानें जैसे पारंपरिक खेलों से अपना मन बहलाते थे, वहीं अब बच्चे इन खेलों से दूर हो गए हैं। बच्चे अब सामूहिक खेलों के बजाय अकेले खेले जाने वाले मोबाइल गेम में ही अपना अधिकांश समय बिता रहे है, इससे सामूहिकता में रहने की परंपरा लगभग खत्म हो रही है।ऐसे बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास भी उतना नहीं हो पाता है जितना बाहर खेलने वाले बच्चों का होता है।शारीरिक श्रम नहीं करने से ये बच्चे कमजोर भी ज्यादा हो रहे हैं। खेल या व्यवहार में संवेदना के गायब होने का प्रभाव बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">
आभासी संसार और तकनीकी गैजेट्स इंसान की सहूलियत तक सीमित नहीं हैं। इनके अजब-गजब इस्तेमाल की सनक इन्हें जानलेवा बना रही है। तभी तो पोकेमोन गो और द ब्लू व्हेल जैसे गेम्स बच्चों की जान के दुश्मन बने हुए हैं। दुखद आभासी खेल के कारण जान देने के ऐसे वाकये रुक नहीं रहे हैं। साइबर संसार की अनदेखी-अनजान दुनिया में अपनी समझ और दिमाग को गिरवी रखने का यह कैसा जंजाल है? यह वाकई विचारणीय है कि तकनीक और सनक का यह मेल आत्मीयता, आपसी संवाद और सामाजिकता तो छीन ही रहा है, अब हमारा विवेक भी इसकी बलि चढ़ रहा है।लगातार टीवी व मोबाइल के सामने रहने से इनकी आंखे भी कमजोर होती है। यही वजह है कि आजकल छोटे बच्चों के जल्दी चश्में लग रहे है।</p>
<p style="text-align:justify;">
एक अध्ययन के मुताबिक 12 से 20 साल के किशोर बच्चों में इंटरनेट गेमिंग डिसआॅर्डर काफी तेजी से बढ़ रहा है। यहां तक कि अमेरिका और यूरोप के मुकाबले एशियाई देशों में इंटरनेट गेमिंग डिसआॅर्डर के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे है। गौर करने वाली बात है कि स्मार्ट फोन की लत को चीन, कोरिया और ताईवान ने तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट वाली बीमारी में शुमार किया हैं। अभिभावकों के दबाव के बाद इंटरनेट की जानी-मानी चीनी कंपनी टेनसेंट ने किंग आॅफ ग्लोरी जैसे अपने लोकप्रिय खेल के लिए समय निर्धारित कर दिया है। 12 साल से कम उम्र के बच्चे दिन में केवल एक घंटे तक लॉग इन कर पाते हैं ,वही बड़े बच्चे केवल दो घंटे तक ही यह गेम खेल सकते हैं।साथ ही बच्चों के उम्र के दावे की जांच की भी पुख्ता व्यवस्था की गयी है। दक्षिण कोरिया में तो रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक 16 साल से कम के बच्चों के आॅनलाइन खेल पर प्रतिबंध है यह प्रतिबंध पिछले 7 साल से लागू है।जापान में तो जब बच्चे जरूरत से ज्यादा समय किसी गेम पर बिताते हैं तो कंप्यूटर पर अपने आप चेतावनी सामने आ जाती है।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Jun 2018 08:14:29 +0530</pubDate>
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                <title>स्कूली बस्ते के बोझ तले सिसकता बचपन</title>
                                    <description><![CDATA[प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल कहा करते थे कि ज्ञान बस्ते के बोझ से नहीं शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है। उनकी अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी, वो मानते थे बच्चे पढ़ें तो खेल की तरह, वे किताबों से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/childhood-under-the-burden-of-school-bags/article-3561"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/sachool-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल कहा करते थे कि ज्ञान बस्ते के बोझ से नहीं शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है। उनकी अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी, वो मानते थे बच्चे पढ़ें तो खेल की तरह, वे किताबों से मिलें तो खिलौनों की तरह, देश-दुनिया का ज्ञान उन्हें लुका-छिपी से भी आसान लगे तथा परीक्षाएं उन्हें दोस्तों के गप्प-ठहाकों से भी सहज लगें । हैरान करने वाली बात है कि उनके नेतृत्व वाली समिति ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम के बोझ में कम करने के लिए जो सिफारिशें की थी, उनको दो दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">देर से ही सही अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय छात्रों के स्कूली बस्तों का बोझ कम करने के इरादे से 2019 के सत्र से एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम आधा करने पर विचार कर रहा है,जो स्वागत योग्य है। लेकिन राज्य सरकारों और राज्य शिक्षा बोर्डो को भी इस पहल का सहभागी बनाने की सख्त दरकार है क्योंकि बस्ते का बोझ बच्चो की शिक्षा, समझ और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। एसोचैम के एक सर्वे के अनुसार, बस्ते के बढ़ते बोझ के कारण बच्चों को नन्हीं उम्र में ही पीठ दर्द जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है। इसका हड्डियों और शरीर के विकास पर भी विपरीत असर होने का अंदेशा जाहिर किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल जानेवाले करीब 68 प्रतिशत बच्चे, जिसमें विशेष तौर पर देखा जाए तो 7 से 13 वर्ष के करीब 88 फीसदी बच्चे पीठ दर्द या उससे जुड़ी समस्या का शिकार हो रहे हैं। इसका प्रमुख कारण किताबों की बोझ, स्पोर्ट किट और उनके बैग हैं, जो बच्चों के वजन से करीब 40 से 45 फीसदी तक ज्यादा होता है। यह सर्वे अहमदाबाद, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, बैंगलूरु, मुंबई, हैदराबाद, पुणे, लखनऊ, जयपुर और देहरादून में किया गया, जिसमें 25,00 छात्रों और 1,000 अभिभावकों से बातचीत की गई थी। अधिकतर अभिभावकों की शिकायतें थी कि आठ पीरियड के लिए बच्चे हर रोज करीब 20 से 22 किताबें स्कूल ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्कैट्स, ताइक्वांडो के साधन, स्विङ्क्षमग बैग और क्रिकेट किट भी कभी-कभार बच्चों को ले जाना पड़ता है ।</p>
<p style="text-align:justify;">हड्डी रोग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बच्चों के लगातार बस्तों के बोझ को सहन करने से उनकी कमर की हड्डी टेढ़ी होने की आशंका रहती है। अगर बच्चे के स्कूल बैग का वजन बच्चे के वजन से 10 प्रतिशत से अधिक होता है तो काइफोसिस होने की आशंका बढ़ जाती है। इससे सांस लेने की क्षमता प्रभावित होती है। भारी बैग के कंधे पर टांगने वाली पट्टी अगर पतली है तो कंधों की नसों पर असर पड़ता है। कंधे धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते हैं और उनमें हर समय दर्द बना रहता है। हड्डी के जोड़ पर असर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन जब से प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक मिला है,तभी से निजी स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते ही जा रहे हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि सरकारी स्कूल वालों के बस्ते निजी स्कूल वालों के बस्तों से काफी हल्के हैं।तथा सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा, गणित के अलावा एक या दो पुस्तकें हैं। लेकिन निजी स्कूलों के बस्तों का भार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे ज्ञानवृद्धि का कोई कारण नहीं है, बल्कि व्यापारिक रुचि ही प्रमुख है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज स्थिति यह है कि देश भर में लाखों बच्चों को भारी बस्ता ढोना पड़ रहा है। इनमें तमाम वे नामी-गिरामी स्कूल भी हैं जो कथित तौर पर पठन-पाठन के आधुनिक तरीके अपनाए हुए हैं। मोहल्ला ब्रांड अंग्रेजी स्कूलों के लिए तो भारी बस्ते शुभ लाभ कर रहे हैं। लेकिन बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर गैर-जरूरी दबाव बढ़ रहा है। तथा माता-पिता भी होमवर्क की चक्की में पिस रहे हैं। बच्चे की समझ में न आने पर उसे ट्यूशन के हवाले कर दिया जा रहा है और अपनी प्रारंभिक उम्र से ही बच्चा रटी-रटाई शिक्षा लेने पर मजबूर हो रहा है। जिससे उसकी मानसिक चेतना कहीं दब कर रह जाती है,तथा बच्चे का सर्वांगीण विकास भी बाधित होता है । ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता बच्चों का स्वास्थ्य होना चाहिए,इसके लिए सरकार को निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए अब आगे आना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-कैलाश बिश्नोई</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Feb 2018 00:11:01 +0530</pubDate>
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                <title>फिर बचपन सुरक्षित है कहां?</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/then-where-is-childhood-safe/article-3372"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की लोकतांत्रिक राजनीति गाहे-बगाहे किसानों, और अन्य लोगों की चर्चा कर लेती है। भले आखिरी में परिणाम वही हो, वहीं ढाक के तीन पात। ऐसे में पहला ज्वलंत सवाल यही है कि क्या राजनीति ने कभी देश के भावी भविष्य को याद करने की भूल की? उत्तर नहीं है किसी के पास। ऐसे में सवालों की एक लंबी कड़ी उत्पन्न होती है। क्या नौनिहाल देश का हिस्सा नहीं? क्या उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी सरकारों की नहीं? क्या बच्चों की दुनिया समाज से अलग है? जिनका ध्यान करती हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली दिखती नहीं। दुर्भाग्य से यही विचार मन को उधेड़ता है कि बच्चों के प्रति इतना तटस्थता भरा रवैया क्यों?</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों की नैसर्गिक आवश्यकता पोषक आहार, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि है। क्या आज के दौर में ये मूलभूत आवश्यकताओं को हमारी व्यवस्था पूरी करने में सक्षम हो पाई है। तो उत्तर ‘न’ में ही मिलेगा। जिस वक़्त देश में बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं आवश्यक होती हैं, उस दौर में आक्सीजन की कमी बच्चों की मौत का कारण बनती है। जिस उम्र में बच्चों को सम्पूर्ण पोषण की आवश्यकता होती है, उस दरमियान उन्हें अपनों के द्वारा ही हवस का शिकार बनाया जाता है। जिस समय बच्चों के हाथों में कलम और किताब होनी चाहिए। तब उनके हाथ मजदूरी करने के लिए बांध दिए जाते हैं। फिर बचपन कहाँ सुरक्षित है?</p>
<p style="text-align:justify;">पहले बात बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की करते हैं। एक रिपोर्ट्स के मुताबिक 2015 के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में 12, 859, बिहार 12,420 और उत्तर प्रदेश में 11,420 बाल अपराध के मामले दर्ज किए गए। इसी के अंतर्गत केंद्रीय महिला एवं बाल विकास विभाग ने एक अध्ययन में पाया कि बच्चों के खिलाफ यौन शोषण के मामले बढ़ रहे हैं, तो उसके साथ देश का माहौल ऐसा भी नहीं कि मात्र बच्चियां इन हरकतों से पीड़ित हों। इस कलुषित और हवसीपन ने समाज के लड़के और लड़कियों दोनों का भक्षण करने की कोशिश की है, जो एक आदर्शवादी देश की छवि को कलंकित और अमर्यादित करने का काम कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट-2016 में कहा गया कि यहाँ पाँच वर्ष से कम उम्र के 69 बच्चे प्रति वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। ‘दुनिया में बच्चों की स्थिति’ के अंतर्गत पेश की गई यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 52 है। वहीं जन्म के एक माह के भीतर प्रति हजार में से 36 बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं। इसी तरह पांच वर्ष की आयु तक के 42.8 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। इसके साथ 42 फीसद बच्चे नाटे हैं। वहीं एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के मात्र 5.9 फीसद, उत्तर प्रदेश के 5.3 प्रतिशत, राजस्थान में बच्चों को 3.4 फीसद और गुजरात के 5.2 प्रतिशत बच्चों को ही समुचित मात्रा में आहार मिल पा रहा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में जब केंद्र और राज्य सरकारों में समन्वयन न होने के कारण केंद्र की योजनाओं में गड़बड़ी होने का रोना रोया जाता है। सरकारी योजनाओं को देखकर ऐसा लगता है, कि केवल खानापूर्ति और दिखावट की दुकान के रूप में इन्हें नियंत्रित और संचालित किया जा रहा हैं। वहीं पोषण की कमी बच्चों में अन्य रोग की भी वाहक बनती है, जिसका सीधा सबूत यह है कि देश के 58 फीसदी बच्चे खून की कमी की गिरफ्त में हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत के सात करोड़ से अधिक बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। इसके साथ देश के बच्चों में स्वच्छता के प्रति उदासीनता भी कुपोषण के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर ऐसे में सवाल लाजिमी हैं कि बच्चों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति सजग क्यों नहीं बनाया जा रहा? ये कुछ चंद स्थितियां हैं, जो बच्चों की वास्तविक स्थिति से रूबरू कराती हैं, जिसको मद्देनजर रखते हुए, भावी भविष्य को बचाने का प्रयास सरकारों को करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-महेश तिवारी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Oct 2017 04:47:41 +0530</pubDate>
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