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                <title>books - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>ज्ञान गंगा में गोते लगाना है तो पुस्तक से कीजिये दोस्ती</title>
                                    <description><![CDATA[समय परिवर्तनशील है। पुस्तकें कल की बात होगई है। आज इंटरनेट का भूत युवा पीढ़ी पर सवार है। आज का युवा प्रेमचंद को नहीं जानता। महादेवी वर्मा, दिनकर , विमल चटर्जी , मन्मथनाथ गुप्त, शरत चंद्र को नहीं पहचानता। इसका एकमात्र कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है। स्कूल में पुस्तकालय है मगर वहां किशोर नहीं जाता। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/books-friends/article-8667"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-04/book.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">समय परिवर्तनशील है। पुस्तकें कल की बात होगई है। आज इंटरनेट का भूत युवा पीढ़ी पर सवार है। आज का युवा प्रेमचंद को नहीं जानता। महादेवी वर्मा, दिनकर , विमल चटर्जी , मन्मथनाथ गुप्त, शरत चंद्र को नहीं पहचानता। इसका एकमात्र कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है। स्कूल में पुस्तकालय है मगर वहां किशोर नहीं जाता। उसे मोबाइल की लत लग गयी है। अध्यापक भी पुस्तकालय जाने को प्रेरित नहीं करता इसलिए वह किसी नामचीन लेखक को नहीं जानता। पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र थी मगर अब नहीं है। स्कूल की छोड़ों घर पर अभिभावक भी उन्हें अच्छी पुस्तकों से परिचित नहीं करवाते। युवा के लिए पाठ्यपुस्तक या कोचिंग की पुस्तकें ही सब कुछ है। कालजयी रचनाकार बाबू देवकी नंदन खत्री की पुस्तकों का ज्ञान भी नहीं है। पुस्तकें अब पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रही है। चिंतन की बात तो यह है की पुस्तकें कैसे पुस्तकालय से बाहर निकले और युवा का रुझान इनके प्रति कैसे हो यह विचारने की बात है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर सच्ची दोस्ती चाहिए तो किताबों को दोस्त बना लो क्योंकि वो कभी दगा नहीं देती है और ना ही झूठ के रास्ते पर चलती। लेकिन इंटरनेट के युग में व्यक्ति किताबों से काफी दूर हो गया है इसी बात के मद्देनजर और लोगों के दिलों में किताबों के प्रति प्रेम जगाने के लिए विश्व पुस्तक दिवस की शुरूआत हुई। विश्व पुस्तक दिवस दुनिया भर में 23 अप्रैल को मनाया जायेगा। पुस्तकें हमारे जीवन को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और हमेशा हमारे साथ एक सच्चे दोस्त की तरह रहती हैं, बशर्ते हमारे अंदर पढ़ने और सीखने का जज्बा हो। एक जमाना था जब किताबें सभी की अच्छी दोस्त हुआ करती थीं। जैसे-जैसे डिजिटलाइजेशन बढ़ता गया किताबें भी हमसे दूर होती चली गईं। अब किताबों की जगह मोबाइल, कंप्यूटर आदि इंटरनेट माध्यमों ने ले ली है।</p>
<p style="text-align:justify;">बचपन से बुढ़ापे तक पठन पाठन का काम अनवरत चलता रहता है। पुस्तक ने एक मित्र की भांति सदा हमारा साथ निभाया है। लेकिन अब इंटरनेट के प्रति बढ़ती दिलचस्पी के कारण पुस्तकों से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है। आज पुस्तक के बजाय इंटरनेट हमारा साथी बन बैठा है। हमने पुस्तक के व्यावहारिक,शिक्षाप्रद, मनोरंजक और बहुमुखी ज्ञान से अपनी दूरी बनाली है। इंसान और पुस्तक के मध्य उत्पन्न हुई इस दूरी को समाप्त करने के लिए यूनेस्को ने 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।<br />
आज का युवा पुस्तक का मतलब पाठ्यपुस्तक ही समझता है। स्कूल और कॉलेज में पुस्तक लाइब्रेरी जरूर है मगर उसमें जाने का समय विद्यार्थी के पास नहीं है। कक्षा में विषयों के पीरियड अवश्य होते है खेलकूद का भी समय होता है मगर पुस्तक पढ़ने अथवा पुस्तकालय का कोई पीरियड नहीं होता। अध्यापक भी बच्चों को पुस्तक या सद साहित्य पढ़ने संबंधी कोई जानकारी नहीं देते। यही कारण है कि इन्टरनेट के इस युग में हम पुस्तक को भूल गए है।</p>
<p style="text-align:justify;">पढ़ने का मतलब इस संचार क्रांति में इन्टरनेट ही रह गया है युवा चौबीसों घंटे हाथ में मोबाइल लिए इन्टरनेट पर चैट करते मिल गाएंगे। वे पुस्तक से परहेज करने लगे है मगर मोबाइल को रिचार्ज करना नहीं भूलते। उन्हें घर या बाहर यह बताने वाला कोई नहीं है की पुस्तकों का भी अपना एक संसार है। वे प्रेमचंद की किसी पुस्तक के बारे में नहीं जानते। कॉमेडियन कपिल के शो के बारे में जरूर जानते है। शरत चंद्र या हरिशंकर परसाई की किसी शख्सियत से वाकिफ नहीं है। उन्हें पुस्तक अथवा पुस्तक की महिमा से कोई लेना देना नहीं है। वे पुस्तक मेले में जाना नहीं चाहते। वे किसी अच्छे मॉल में जरूर जाना चाहते है जहाँ उन्हें अपनी मन पसंद खाने पीने और पहनने की वस्तु मिल जाये।</p>
<p style="text-align:justify;">पुस्तक या किताब लिखित या मुद्रित पेजों के संग्रह को कहते हैं।, पुस्तकें ज्ञान का भण्डार है । पुस्तकें हमारी दुष्ट वृत्तियों से सुरक्षा करती हैं। इनमें लेखकों के जीवन भर के अनुभव भरे रहते हैं। अच्छी पुस्तकें पास होने पर उन्हें मित्रों की कमी नहीं खटकती है वरन वे जितना पुस्तकों का अध्ययन करते हैं । पुस्तकें उन्हें उतनी ही उपयोगी मित्र के समान महसूस होती हैं । पुस्तक का अध्ययन मनन और चिंतन कर उनसे तत्काल लाभ प्राप्त किया जा सकता है । कहानियों के जरिये बच्चे बहुत सी नई चीजों को सीखते हैं। पुस्तकों का अध्ययन कम हो गया है। पुस्तकें ज्ञान की भूख को मिटाती है। किताबें संसार को बदलने का साधन रही हैं। जीवन में पुस्तकें हमारा सही मार्गदर्शन कराती हैं। एकान्त की सहचारी हैं । वे हमारी मित्र हैं जो बदले में हम से कुछ नहीं चाहती । वे साहस और धैर्य प्रदान करती हैं । अन्धकार में हमारा मार्ग दर्शन कराती हैं ।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>बाल मुकुन्द ओझा</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Apr 2019 09:09:29 +0530</pubDate>
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                <title>पुस्तकें : बदलावों के प्रामाणिक दस्तावेज</title>
                                    <description><![CDATA[संसार का स्वरूप भले ही जनमानस की आंखों से उतरकर उसके अन्त:करण तक अपनी उपस्थिति का भान कराने में समर्थ हो, मगर इस स्वरूप का विश्लेषणात्मक एवं व्यापक विवेचन विचारों के माध्यम से ही संभव है। विचार सदैव स्मरण के आधार पर स्थायी बने रहे, ऐसा कदाचित संभव नहीं है। विचारों को स्थायित्व प्रदान करने के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/books-authentic-documents-of-changes/article-3379"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/books.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संसार का स्वरूप भले ही जनमानस की आंखों से उतरकर उसके अन्त:करण तक अपनी उपस्थिति का भान कराने में समर्थ हो, मगर इस स्वरूप का विश्लेषणात्मक एवं व्यापक विवेचन विचारों के माध्यम से ही संभव है। विचार सदैव स्मरण के आधार पर स्थायी बने रहे, ऐसा कदाचित संभव नहीं है। विचारों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए पहले भाषा का विकास किया गया तदुपरान्त उसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति के लिए लिपि का विकास किया गया। लिपि के माध्यम से विचारों को संकलित व संग्रहित किया गया, जिसका सर्वाधिक सशक्त माध्यम पुस्तकें बनीं। इतिहास साक्षी है कि पुस्तकें समाज के स्वरूप को समय-समय पर व्यक्त करती रही हैं। सामाजिक व्यवस्थाएं एवं व्यवस्थाओं में निरन्तर हो रहे बदलावों का प्रामाणिक दस्तावेज पुस्तकें ही सिद्ध होती रही हैं। समाज की गतिशीलता में पुस्तकें ही दिशानायक की सी भूमिका का निर्वाह करती रही हैं, साथ ही जीवन से जुड़े प्रत्येक क्षेत्र में अपनी विशिष्टता का अहसास भी पुस्तकें ही कराती रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पुस्तकों की महत्ता का यदि विश्लेषणात्मक ढंग से अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि चाहे प्रौद्योगिकी का क्षेत्र हो अथवा चिकित्सा का, साहित्य का भावपक्ष हो अथवा कला पक्ष, प्रत्येक क्षेत्र में पुस्तकों ने अपनी महत्ता सिद्ध की है तथा सृष्टि के समूचे ज्ञान की अपने पृष्ठों में समेटकर जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत किया है। नित्य सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में हो रहे बदलावों के निष्कर्ष पुस्तकों के माध्यम से समाज को दिशा देने का माध्यम सिद्ध हुए हैं। इतिहास एवं परम्पराओं में सुधारात्मक परिवर्तन संभव हुए हैं। समय जिस द्रुतगति से पंख लगाकर उड़ रहा है, उसका मापन भले ही वैज्ञानिक यंत्रों के माध्यम से संभव हुआ हो, मगर मापन का प्रामाणिक आधार पुस्तकें ही बनी हैं। ज्ञान के स्थायी कोष के रूप में विचारों का भंडारण, विश्लेषण, परिभाषीकरण सभी कुछ पुस्तकों के माध्यम से ही संभव हुआ है। सर्वविदित है कि विश्व में जितने भी परिवर्तन हुए हैं, सभी की प्रेरणास्रोत पुस्तकें ही बनी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज कम्प्यूटर युग में भले ही विचारों के संग्रहण में कम्प्यूटर की भूमिका प्रभावी होती जा रही हो, मगर अति विशिष्ट तकनीक के आधार पर भी आधुनिक संयंत्रों में ज्ञान के स्थायी कोष की संभावना संदिग्ध प्रतीत होती है। तकनीकी खराबी के कारण कम्प्यूटर की स्थिति भी कई बार दयनीय प्रतीत होती है, जिससे विचारों के स्थायी संकलन के प्रति कई बार सन्तोषजनक परिणाम नहीं निकलते, इसके विपरीत नई तकनीकों के आधार पर किए जा रहे मुद्रण से पुस्तकों की गुणवत्ता अपनी उत्कृष्टता प्रमाणित करती जा रही है। नि:संदेह पुस्तकें तुलना की परिधि से इतर हैं, इनमें समाहित स्थायी ज्ञान लम्बे समय तक विश्व में संग्रहित एवं संरक्षित रखा जा सकता है, जिनकी उपलब्धता भी सहज होती है। विश्व स्तरीय साहित्य जनमानस को पुस्तकों के रूप में ही उपलब्ध है, जिसके आधार पर मानव मात्र अपनी विशिष्ट प्रतिभा के बल पर विश्व में अपनी सिरमौर स्थिति बना चुका है तथा विश्व मानव की संज्ञा पा चुका है। जितने भी प्रयोग ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे हैं, सभी का आधार पुस्तकें बनी हैं। सहज अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी पुस्तकें ही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">समाज की दिशावाहक पुस्तकों की महिमा का यदि विस्तारपूर्वक विवेचन किया जाए तो अनेक पुस्तकों की रचना की जा सकती है तथापि पुस्तक की महत्ता स्वयं सत्यापित है। जितनी बार पुस्तकों का अध्ययन किया जाता है, उतनी बार ही पुस्तकों में व्यक्त विचारों के नवप्रयोग प्रकाश में आते हैं। जनमानस को दिशा प्रदान करने के साथ- साथ पुस्तकें अपने पाठकों के दृष्टिकोण को तर्कसंगत बनाती हैं। पाठकों को चिन्तन का विस्तृत आकार प्रदान करती हैं। जिससे यही निष्कर्ष निकलता है कि विचारजन्य भौतिक सृष्टि में यदि कहीं गतिशीलता के लक्षण प्रमाणित होते हैं, तो गतिशीलता के प्रत्येक सोपान की अभिव्यक्ति पुस्तकों के माध्यम से ही संभव है।</p>
<p><strong>-डॉ. सुधाकर आशावादी</strong></p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Oct 2017 04:29:41 +0530</pubDate>
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