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                <title>Curse - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>कन्या भ्रूण हत्या-समाज का अभिशाप</title>
                                    <description><![CDATA[मां के गर्भ में पल रही कन्या की जब हत्या की जाती है तब वह बचने के कितने जतन करती होगी, यह माँ से अच्छी तरह कोई नही जानता। नन्हा जीव जो माँ के गर्भ में पल रहा है, जिसकी हत्या की जा रही है, उनमें कोई कल्पना चावला, पी टी उषा, लता मंगेशकर तो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/female-feticide-curse-of-society/article-3432"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/bhrun-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मां के गर्भ में पल रही कन्या की जब हत्या की जाती है तब वह बचने के कितने जतन करती होगी, यह माँ से अच्छी तरह कोई नही जानता। नन्हा जीव जो माँ के गर्भ में पल रहा है, जिसकी हत्या की जा रही है, उनमें कोई कल्पना चावला, पी टी उषा, लता मंगेशकर तो कोई मदर टेरेसा भी हो सकती थी। हाल ही में अमेरिका में पोट्रेट एजुकेशन प्रजेंटेशन की द साइलेंट स्कीम फिल्म में गर्भपात की कहानी को दर्शाया गया है। इस अमेरिकी फिल्म में बताया है किस तरह गर्भपात के समय भ्रूण अपने आप को बचाने का प्रयास करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">गर्भ में विचलित अजन्मे बालक की दशा माँ अच्छी तरह से जानती है। अजन्मा बच्चा हमारी तरह ही सामान्य इंसान है। ऐसे में भ्रूण की हत्या महापाप है। देश में लिंगानुपात की स्थिति निरंतर बिगड़ रही है। इस समस्या को लेकर केंद्र एवम् राज्य सरकारें भी चिन्तित है। इस गंभीर समस्या के हल हेतु अनेक प्रयास किये जा रहे है। निरंतर हो रहे प्रयासों के बावजूद इस दिशा में आशाजनक सफलता नही मिल रही है। भारत में लिंगानुपात में कमी का क्रम सन्1961 से चल रहा है। सन् 1991 में 1000 लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या 945 थी, जो सन 2001 में घटकर 927 और 2011 में 918 हो गई। इस अनुपात में निरंतर गिरावट समाज के लिये चिन्ता का विषय है। लिगांनुपात में निरंतर गिरावट समाज की भेदभाव पूर्ण मानसिकता के कारण आई है। समाज में यह भेदभाव महिलाओं एवम् लड़कियों के प्रति समाज की दूषित मानसिकता का ही परिचायक है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक ओर जहाँ समाज में लड़कियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार हो रहा है दूसरी ओर आधुनिक तकनीकी चिकित्सा पद्धति का व्यापक रूप से दुरुपयोग कर कन्या भ्रूण हत्या का कारोबार जोर शोर से जारी है। सरकार द्वारा कन्या भ्रूण हत्या अवैध घोषित है मगर यह अवैध कारोबार सारे देश में चल रहा है। इस प्रकार लिंगानुपात में अंतर स्वाभाविक है। भारतीय संस्कृति में यह मान्यता है अनेक जटिल समस्याओं के निदान के लिये देवी पूजा की जाती है। देवी की पूजा करने बाले भी कन्या के जन्म को अभिशाप मानते है। इस संकीर्ण मानसिकता के लिये प्रेरित करने के लिए दहेज प्रथा भी एक मुख्य कारण है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत दिनों हरियाणा के पानीपत नगर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने (बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ) अभियान का शुभारम्भ किया है। भारत सरकार ने यह अभियान पानीपत सहित देश के 100 जिलों में शुरू किया है, जहाँ लड़कों लड़कियों के लिंगानुपात में काफी अंतर है। इस अभियान में हरियाणा के पानीपत सहित 12 जिले सम्मिलित है । सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश के अन्य राज्यों के मुकाबले हरियाणा में एक हजार लड़कों के मुकाबले 879 लड़कियां है। जबकि लड़कियों का राष्ट्रीय औसत 941 है। भारत सरकार द्वारा घोषित बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना निश्चित रूप से देश मे बेटी को बचाने के साथ साथ बेटी को खोया स्थान दिलाने का प्रयास है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार की इस अनूठी योजना की सराहना होना चाहिये। इस योजना के लागू होने से लड़कियों को सम्मान जनक स्थान मिलेगा। मगर आज सबसे बड़ी चुनौती समाज में बेटा एवं बेटी को समान नही मानना है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार कन्या भ्रूण हत्या भारत में काफी अधिक है। भारत में एक हजार पुरुषों के मुकाबले मात्र 918 महिलाएं है। एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में भारत में पिछले 30 वर्षो में 1.20 करोड़ लड़कियों की गर्भ में ही हत्या होने का अनुमान बताया है। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए समाज की भेदभावपूर्ण मानसिकता बदलने के साथ साथ कानून से भी कठोर कदम उठाने की वर्तमान परिपेक्ष्य में आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-विजय कुमार जैन</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Oct 2017 04:13:54 +0530</pubDate>
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                <title>देश के लिए अभिशाप है बालश्रम</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/curse-for-country-is-child-labor/article-3388"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/child-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बच्चे देश का भविष्य हैं। हमारे देश में बच्चों को भगवान का रूप भी माना गया है। लेकिन वर्तमान में बच्चों के सर्वांगीण विकास और सुरक्षित भविष्य के लिए समूचा देश चिन्तित है। हमारे देश में कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.4 प्रतिशत भाग 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों का है। यह उम्र बच्चों के पढ़ने और खेलने-कूदने की है। मगर गरीबी और अशिक्षा के कारण ये बच्चे इन सुविधाओं से वंचित हैं और जबरन मजदूरी में धकेल दिये गये हैं। भारत में प्रत्येक दस बच्चों में से 9 बच्चे काम करते हैं। ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारम्परिक कृषि कार्यों और घरेलू कार्यों में कार्यरत हैं। जबकि 9 फीसदी से कम बच्चे उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">8.8 फीसदी बच्चे कारखानों में मजदूरी पर लगे हैं। पढ़ाई के बजाय मजदूरी करने से बच्चों का भविष्य अंधकार में पड़ गया है और यह देश के भविष्य के लिए भी अभिशाप है। अंतर्राष्टÑीय संगठन यूनिसेफ के अनुसार विश्व में लगभग दो करोड़ 50 लाख बच्चे जिनकी आयु सीमा 17 तक है बाल श्रम में लिप्त हैं। बताया जाता है कि इनमें से बहुत से परिवार अपनी बेहद तंगी और गरीबी के कारण अपने बच्चों को मजदूरी में धकेलते हैं। रोटी हमारी बुनियादी जरूरत है। रोटी ही बच्चों को ऐसे कार्यों में धकेलती है और माँ-बाप न चाहते हुए भी अपने बच्चों से बालश्रम करवाने में मजबूर हैं। भारत के संविधान में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कारखाने आदि में काम पर नहीं रखा जाये। कारखाना अधिनियम, बाल श्रम निरोधक कानून आदि में भी बच्चों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">मगर बच्चे आज भी घरेलू नौकर का कार्य करते हैं। होटलों, कारखानों, सेवा केन्द्रों, दुकानों आदि में सरेआम और सरेराह बच्चों को काम करते देखा जा सकता है। कानून के रखवालों की आंख के नीचे बच्चे काम करते मिल जायेंगे। सरकार ने स्कूलों में बच्चों के लिए शिक्षा, वस्त्र, भोजन आदि की मुफ्त व्यवस्था की है। मगर सरकार के लाख जतन के बाद भी बाल श्रम आज बदस्तूर जारी है। गरीबी और कुपोषण बच्चों का सबसे बड़ा दुश्मन है। नेशनल सेम्पल सर्वे संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दो तिहाई लोग पोषण के सामान्य मानक से कम खुराक प्राप्त कर रहे हैं। एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट में बताया गया है कि कुपोषित और कम वजन के बच्चों की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत भाग भारत में है।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों में अपराध और बाल मजदूरी के मामले में भी हमारा देश आगे है। हालांकि सरकार दावा कर रही है कि बाल मजदूरी में अपेक्षाकृत काफी कमी आई है। सरकार ने बाल श्रम रोकने के लिए अनेक कानून बनाये हैं और कड़ी सजा का प्रावधान भी किया है मगर असल में आज भी लाखों बच्चे कल-कारखानों से लेकर विभिन्न स्थानों पर मजदूरी कर रहे हैं।चाय की दुकानों पर, फल-सब्जी से लेकर मोटर गाड़ियों में हवा भरने, होटल, रेस्टोरेंटों में और छोटे-मोटे उद्योग धंधों में बाल मजदूर सामान्य तौर पर देखने को मिल जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी प्रयासों से कई बार प्रशासन ने ऐसे बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराकर उनके घरों पर भेजा मगर गरीबी के हालात इनकी प्रगति एवं विकास में अवरोध बने हुए हैं। जितने बच्चे बाल श्रम से मुक्त कराये जाते हैं, उससे अधिक बच्चे फिर बाल मजदूरी में फंस जाते हैं। ये बच्चे गरीबी के कारण स्कूलों का मुंह नहीं देखते और परिवार पोषण के नाम पर मजदूरी में धकेल दिये जाते हैं। हमें अपने प्रयासों को तेज करना चाहिये और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए वह हर जतन करना चाहिये जिससे बच्चे बाल श्रम की इस कुत्सित प्रथा और मजबूरी से बचपन मुक्त हो सकें।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Oct 2017 04:23:01 +0530</pubDate>
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