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                <title>अधिकारों की लड़ाई में उलझी दिल्ली</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में आम आदमी पार्टी व उपराज्यपाल के बीच पिछले करीब 4 साल से चली अधिकारों की जंग को उच्चतम न्यायालय ने विराम दे दिया था। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दिल्ली की सरकार लोगों द्वारा चुनी गई सरकार है, जिसके अधिकारों पर राज्यपाल कुंडली मार नहीं बैठ सकता। साथ ही सरकार को भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/delhi-entangled-in-the-fight-for-rights/article-4704"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/aap.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली में आम आदमी पार्टी व उपराज्यपाल के बीच पिछले करीब 4 साल से चली अधिकारों की जंग को उच्चतम न्यायालय ने विराम दे दिया था। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दिल्ली की सरकार लोगों द्वारा चुनी गई सरकार है, जिसके अधिकारों पर राज्यपाल कुंडली मार नहीं बैठ सकता। साथ ही सरकार को भी अराजकता न फैलाने के लिए नसीहत दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब उपराज्यपाल सेवा विभाग के कार्याें में अपना दखल रखने के लिए गृह मंत्रालय के आदेशों का हवाला देकर फिर से नया विवाद छेड़ने के मूड में आ गए। कल तक दिल्ली वासी ही नहीं पूरा देश यही मान रहा था कि उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली के मुख्यमंत्री व उपराज्यपाल के अधिकारों को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">परंतु अब गृह मंत्रालय 2015 की अधिसूचना के नाम पर फिर से उपराज्यपाल को सक्रिय कर चुका है। इसमें ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि दिल्ली में व केन्द्र में एक ही दल की सरकार होगी तब मुख्यमंत्री की चलेगी अन्यथा उपराज्यपाल ही दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं। अब जो विवाद शुरु हो रहा है इससे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को अवश्य आघात पहुंचेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">तकनीकी पेचों के नाम पर दिल्ली को आधा राज्य नहीं बल्कि अराजक राज्य बनाया गया है। जिस तरह से दिल्ली राज्य अधिनियम की व्याख्या है इसके चलते कभी भी दिल्ली मुख्यमंत्री व उपराज्यपाल के विवादों का अंत होना संभव नहीं है। अधिकारों की लड़ाई में उलझी दिल्ली का हाल कैसे सुधरे किसी के पास कोई जवाब नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">संवैधानिक तौर पर उपराज्यपाल दिल्ली में मंत्री परिषद् के निर्णयों को स्वीकार करेंगे। विवाद की सूरत में उपराज्यपाल मामला राष्टÑपति के पास भेजेंगे, मामला यदि राष्टÑीय स्तर का हो अन्यथा उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के निर्णयों को लागू करेंगे। पुलिस, कानून व्यवस्था व भूमि संबंधी मामलों पर पूर्ण अधिकार केन्द्र सरकार का है।</p>
<p style="text-align:justify;">अभी जो ताजा विवाद बनाया जा रहा है वह सेवा क्षेत्र है, जिसमें प्रशासनिक तबादले अहम कार्य है, यही उपराज्यपाल छोड़ना नहीं चाहते। यहां जब अधिकारों की स्पष्टता उच्चतम न्यायालय ने कर ही दी है तब सेवा विभाग का नियंत्रण बीच में कहां से आ गया? इस बात में कोई दोराय नहीं कि दिल्ली में लोकतंत्र का अधिकारों के नाम पर जमकर मजाक बनाया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारों की इस उलझी लड़ाई में दिल्ली की जनता पिस रही है, अफसरशाही बिना काम बैठी बिल्लियों की लड़ाई में से रोटी उठाकर खा रही है। दुनिया में भारतीय लोकतंत्र का विलक्षण नमूना दिल्ली शासन प्रबंध, तौबा।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Jul 2018 03:14:46 +0530</pubDate>
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                <title>पराली का मामला उलझा</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/parali-case-entangled/article-3389"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/prali.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धान की पराली के मुद्दा को लेकर पंजाब व हरियाणा में काफी तनातनी हो रही है। किसान पराली जलाने पर अड़े हुए हैं, वहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सरकारों पर लगातार सख्ती बरत रहा है। इन राज्यों में किसान संगठन मीटिंगों के दौरान पराली जलाकर अपना स्पष्टीकरण रख रहे हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियों ने किसानों का समर्थन कर मामले को तूल दे दियाहै फिर भी मामला किसी किनारे लगता नजर नहीं आ रहा। यहां किसान व सरकारें दोनों पक्ष मामले को गहराई से विचार करें व जिम्मेवारी वाला रवैया अपनाएं। किसानों की इस दलील को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पराली की संभाला खर्चीली व आगामी फसल की बिजाई में देरी का कारण बनती है। पराली को खेत में नष्ट करने के लिए कृषि औजार इतने महंगे हैं कि प्रत्येक किसान यह औजार खरीद नहीं सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">किसानों पर केवल सख्ती करना व मामले दर्ज करने से समस्या हल नहीं होगा। लेकिन जिस प्रकार किसान अड़े हुए हैं उसका संदेश भी सही नहीं जा रहा। किसान पराली जलाने के लिए मुआवजे के लिए संघर्ष करें तो बेहतर होगा। राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक की नीति छोड़कर टकराव वाले हालात पैदा न करें। यह तो स्पष्ट है कि पराली को आग लगाना किसानों के लिए नुकसानदायक है। जमीन के उपजाऊ तत्वों का नष्ट होना, मित्र कीड़ों का जलना इत्यादि से आगामी फसलों को नुकसान पहुंचता है। दूसरी तरफ सरकारों को यह बात समझनी चाहिए कि घाटे की कृषि के कारण पहले ही बुरे दौर से गुजर रहे किसानों पर सरकारों को बोझ नहीं बढ़ाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार पराली से बिजली बनाने जैसे प्रोजैक्ट को उत्साहित करे ताकि आफत बनी पराली राहत बन जाए। राष्टÑीय स्तर पर यह सोच भी बननी चाहिए है कि यदि पराली बड़ी समस्या है तो किसानों को धान के चक्कर से ही क्यों नहीं निकाला जाता। कभी शैलरों के नजदीक धान के छिलके के ढेरों को आग लगाई जाती थी व बाद में बची राख राहगीरों के लिए मुसीबत बन जाती थी। पराली के मामले में भी सरकार को ऐसी तकनी इजाद करनी चाहिए है। दरअसल पराली कानून व व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि कृषि के संकट की उपज है जिसके लिए सरकार को नीतियां व कार्यक्रमों में परिवर्तन करना चाहिए।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Oct 2017 04:25:23 +0530</pubDate>
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