<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/brotherhood/tag-5567" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Brotherhood - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/5567/rss</link>
                <description>Brotherhood RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>दूध में मिश्री की तरह घुल-मिलकर रहें सब</title>
                                    <description><![CDATA[भारत बहुत महान देश रहा है चूंकि इसके लोगों ने इसे बहुुत महान बनाया था, भारत गुलाम दीन-हीन भी रहा क्योंकि उस दौर के भारतीय ऐसे रहे होंगे। भारत को अभी भी महान बनने से कोई नहीं रोक सकता। अगर इस देश में कुछ चालाक, स्वार्थी एवं धर्म की वेशभूषा में घूम रहे अधार्मिक लोगों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/let-all-be-together-with-brotherhood/article-35177"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-07/supreme-court-of-india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत बहुत महान देश रहा है चूंकि इसके लोगों ने इसे बहुुत महान बनाया था, भारत गुलाम दीन-हीन भी रहा क्योंकि उस दौर के भारतीय ऐसे रहे होंगे। भारत को अभी भी महान बनने से कोई नहीं रोक सकता। अगर इस देश में कुछ चालाक, स्वार्थी एवं धर्म की वेशभूषा में घूम रहे अधार्मिक लोगों को परख लिया जाए और उन्हें काबू कर लिया जाए। नुपूर शर्मा नामी महिला नेता की वजह से फैले तनाव से एक राजस्थान से व दूसरे महाराष्टÑ से दो आदमियों की जान जा चुकी है। जान लेने वालों के तरीके से देश के कई शहरों में दहशत का माहौल है। दहशत इसलिए कि पता नहीं कब दंगा भड़क जाए और लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं। जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं उन्होंने देश भर में नुपूर शर्मा के विरुद्ध कई जगहों पर पुलिस प्राथमिकी दर्ज करवाई है, इस सबके बावजूद नुपूर र्श्मा के ऊपर कोई असर नहीं और वह सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।</p>
<p style="text-align:justify;">भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने देश को खतरे में देखकर न केवल नुपूर को डांटा बल्कि उसकी हैसियत भी याद दिलाई। दरअसल, धर्म कोई भी बुरा या निंदनीय नहीं है परन्तु इसे मजहबी नफरतों में डूबे नुपूर व गौस मोहम्मद, रियाज अत्तारी जैसे लोगों ने बुरा बनाया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि नुपूर जैसे लोग खुद भी धार्मिक नहीं हैं, धर्म ऐसे लोगों के लिए सस्ती लोकप्रियता पाने का जरिया है, नफरत फैलाने का जरिया मात्र है। जो धर्म को मानते हैं वह अपने धर्म के जितना ही दूसरे धर्म का भी सम्मान करते हैं। अफसोस इस बात का है कि आज भी देश में धर्मों की ठेकेदारी करने वालों के पीछे हुजूम चल रहा है। जबकि देश समाज की हजारों-हजार समस्याएं हैं जिनसे सभी धर्मों के लोग परेशान हैं। जरूरत है कि कट्टरता व हिंसा की बात करने वाली शिक्षाओं को नए दौर के अनुसार किनारे किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले कुछ सालों से केसवाजी, लड़ाई-झगड़े में समर्थन जुटाने के लिए धर्म का इस्तेमाल बेजा स्तर तक बढ़ चुका है। इसे प्रत्येक धर्म के प्रमुख जनों द्वारा रोका जाना चाहिए। जैसे कि उदयपुर की घटना के बाद बहुत से मुस्लिम बुद्धिजीवियों, धर्मधिकारियों ने अपने स्तर पर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर साबित किया है अन्यथा नुपूर व गौस मोहम्मद ने जो काम कर दिया है उससे अब तक हजारों बेकसूर मारे जा चुके होते व देश का करोड़ों-अरबों का नुक्सान हो गया होता। इस दौर में धार्मिक नफरत फैलाने वालों जितना ही मीडिया का एक वर्ग भी जिम्मेवार है जो अपने पेशेवर काम के लिए लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वालों को मंच मुहैया करवाता है और उससे उठने वाले शोर के मजे लेता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नुपूर शर्मा के साथ चली डिबेट से पहले कुछ मुस्लिमों द्वारा शिवलिंग पर नफरती टीका टिप्पणियों को भी नहीं किया जाना चाहिए था। सरकार को तत्काल नफरत फैलाने की ताक में बोल रहे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। परन्तु देश में बहुत बार देखा गया है कि जब जरूरत होती है तब कार्रवाई नहीं होती जब आग फैल जाती है तब फिर कसूरवार लोगों के साथ-साथ बेकसूरों को भी सरकारी उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है। यहां अगर सरकार शिकार बनाएगी तो उससे बचने के रास्ते न्यायलय के रूप में देशवासियों के पास हैं, लेकिन धर्म का ठेका लेने वालों से बचना होगा जिसके लिए देश में धार्मिक सुधार की लहर चलाए जाने की आवश्यकता है ताकि सभी धर्मों को मानने वाले दूध में मिश्री की तरह मिलकर रहें इसके लिए जरूरत बस इतनी है कि नफरत की आग बुझानी होगी व धर्मों में दिए शांति, समृद्धि, अध्यात्मिक उन्नति के संदेशों को आत्मसात करना होगा।</p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://twitter.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/news-brief/let-all-be-together-with-brotherhood/article-35177</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/news-brief/let-all-be-together-with-brotherhood/article-35177</guid>
                <pubDate>Mon, 04 Jul 2022 10:46:59 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2022-07/supreme-court-of-india.jpg"                         length="32816"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नेता और उद्योगपति मायने क्रोनी भाईचारा</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले सप्ताह भारत के राजनीतिक मंच पर क्रोनी पूंजीवाद और भ्रष्ट नेताओं का एक और किस्सा देखने सुनने को मिला। किंगफिशर एयरलाइंस के किंग आफ गुड टाइम्स भगोडेÞ विजय माल्या के दावे की 2 मार्च 2016 को भारत छोड़ने से पहले वह अपने 2000 करोड रूपए के बैंक ऋणों को निपटाने के लिए वित्त मंत्री […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/leader-and-industrialist-means-croni-brotherhood/article-5978"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/artical-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले सप्ताह भारत के राजनीतिक मंच पर क्रोनी पूंजीवाद और भ्रष्ट नेताओं का एक और किस्सा देखने सुनने को मिला। किंगफिशर एयरलाइंस के किंग आफ गुड टाइम्स भगोडेÞ विजय माल्या के दावे की 2 मार्च 2016 को भारत छोड़ने से पहले वह अपने 2000 करोड रूपए के बैंक ऋणों को निपटाने के लिए वित्त मंत्री अरूण जेटली से मिले थे, उनके इस बयान से राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया। कांगे्रस ने इस बात पर बल दिया कि सीबीआई ने माल्या को हवाई अड्डे पर निरुद्ध करने के नोटिस को बदलकर सूचना देने के नोटिस में क्यों बदला। सरकार ने दोनों पर आरोप लगाया है कि वे अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने के लिए ये आरोप लगा रहे हैं। 21वीं सदी में देश की राजनीति में आपका स्वागत है जो आपसी लेनदेन के कारोबार की राजनीति बन गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">
कांग्रेस और भाजपा दोनों ने माल्या को राज्य सभा का सदस्य बनाने में मदद की। 2002 में कांग्रेस और जद (एस) की मदद से वे राज्य सभा सदस्य बने तो 2010 में भाजपा और जद (एस) की सहायता से बने। नीरव मोदी के मामले में उनहें ऋण कांग्रेस की संप्रग सरकार के दौरान दिया गया और वे भाजपा की राजग सरकार के दौरन इस वर्ष जनवरी में देश से भाग गए। लगता है यह चोर-चोर, मौसेरे भाई का खेल बन गया है। एक वरिष्ठ राजनेता के अनुसार इस हमाम में हम सब नंगे हैं। तीन वर्ष पूर्व केन्द्रीय राजमार्ग मंत्री गडकरी दक्षिण फ्रांस में एस्सार के रूइया की याच में सैर-सपाटा करने गए थे। हमारे नेता लोग अपने उद्योगपति मित्रों के जेट का उपयोग करते हैं तथा अपने आनंद के लिए उनके घरों का उपयोग करते हैं, उनके बच्चों की शादियों में ये उद्योगपति खर्च करते हैं जिसके चलते कंपनियां अपने राजनीतिक और सरकारी माई बाप के लालच को पूरा करने के लिए कंपनी के खातों में हेराफेरी करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
क्रोनी पूंजीवाद के अनेक उदाहरण हैं जिनमें 2जी घोटाला, आदर्श घोटाला आदि प्रमुख हैं। कोलगेट में कोयला ब्लॉक संप्रग के मंत्रियों कांग्रेस और उसके सहयोगी सांसदों और पार्टी के निकट रहे लोगों के परिवारों को दिए गए। कांग्रेस के पूर्व सांसद उद्योगपति नवीन जिंदल और विजय डाडा को कोयला ब्लाक दिए गए थे। इसी तरह राजग के केन्द्रीय कारपोरेट मंत्री प्रेमचंद गुप्ता के बच्चों को भी कोयला ब्लाक दिए गए। नीरा राडिया टेप्स उद्योगपति, मीडिया, नेतागणों और अधिकारियों की सांठगांठ को उजागर करते हैं। आज हम ऐसे युग में रहते हैं जहां पर सार्वजनिक नैतिकता और व्यावहारिक राजनीति ने विचित्र आयाम ले लिया है जहां पर भारत आज रियायतों का लोकतंत्र या राज्य सत्ता की रियायत का तंत्र बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">
भ्रष्ट राजनेता प्रत्यक्ष बिक्री की राजनीति के माध्यम से अपने सहयोगियों की मदद करते हैं और अपने मित्रों पर करदाताओं के पैसे उड़ाते हैं और सरकरी बैंकों से कहा जाता है िकवे इन लोगों को बिना सत्यापन के ऋण दें। इसके बदले नेताओं को कारोबारियों और उद्योगपतियों से पैसा मिलता है जिसकी मदद से वह चुनाव लड़ता है। इसे आप धन तंत्र या चोरी का तंत्र भी कह सकते हैं। जिसमें छोटे बड़े हर तरह के नेता लाभान्वित होते हैं और वे इस सबको गलत भी नहीं मानते हैं। नौकरशाहों को रिश्वत दी जाती है और उद्योपतियों की सफलता कानून के शासन के द्वारा नहीं अपितु सरकार द्वारा किए गए पक्षपात पर निर्भर करती है और इस क्रम में छोटे से छोटा अधिकारी, कर्मचारी भी लाभान्वित होता है। क्रोनी पूंजीवाद तीन स्तरों पर कार्य करता है। पहले स्तर पर मंत्री, बाबू, बैंक के अध्यक्ष, डायरेक्टर और कर्मचारी आपको पैसा देते हैं और यह सुनिश्चित करते है कि आपको कारोबार में अपना पैसा न लगाना पड़े।</p>
<p style="text-align:justify;">कारोबारी बैंक से भारी ऋण लेता है और यदि यह पैसा डूब भी जाता है तो वह बैंक का पैसा होता है। दूसरे स्तर पर कारोबारी यह सुनिश्चित करता है कि उसके प्रतिद्वंदी को भी ऐसी रियायत न मिले। इसका मतलब है कि आप न केवल अपने लिए लॉबिंग करते हैं अपितु अपने प्रतिस्पर्धी के विरुद्ध भी लॉबिंग करते हैं। और तीसरे चरण में विमानन जैसे विनियमित उद्योगों में आप न केवल राजनेताओं अपितु विनियामक एजेंसियों में भूतपूर्व नौकरशाहों को भी मैनेज करते हैं। आॅक्सफोम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार क्रोनी पूंजीवाद सूचकांक में भारत नौवें स्थान पर है। भारत में अरबपतियों के पास सकल घरेलू उत्पाद की 15 प्रतिशत संपत्ति है और इसका श्रेय भाईचारा और ढुलमुल नीतियों को जाता है। इसके अलावा हिन्दुत्व युग में एक नया क्रोनीवाद शुरू हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज नए नौकरशाह अपने राजनीतिक आकाओं का अनुसरण करते हैं और वे इन आकाओं को अपना भगवान मानते हैं। समय आ गया है कि हम पारदर्शी विनियामक ढ़ांचा बनाएं और क्रोनी पूंजीवाद पर अंकुश लगाएं। जिससे हमारे वास्तविक कारोबारियों पर कुप्रभाव न पड़े। इन नेतागणों को राजनीतिक क्रोनीवाद पर रोक लगानी होगी। हमें देश में कारोबार के माहौल को बिगडने से रोकना होगा अन्यथा एक कमजोर शासन व्यवस्था पैदा होगी। हमारे नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे की समीक्षा की जानी चाहिए। यदि व्यक्ति जिम्मेदारी से अपना कार्य नहीं करेगा तो उत्तरदायी समाज की स्थापना नहीं होगी और उत्तरदायी समाज के बिना उत्तरदायी राज्य की स्थापना नहीं हो सकती है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में निर्देश दिया है कि भारतीय अरबपतियों द्वारा सार्वजनिक धन को न उड़ाया जाए और उसने भारतीय रिजर्व बैंक को लताड लगायी है कि वह बैंकों पर निगरानी के मामले में ढ़ील रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायालय ने केन्द्रीय बैंक से कहा है कि वह ऐसे चूककतार्ओं की सूची उपलब्ध कराए जिन पर सरकारी बैंकों का 500 करोड से अधिक का ऋण लंबित है। समय आ गया है कि हम लोग पंचायत से लेकर केन्द्रीय सरकार के स्तर पर हमारे लोकतंत्र में फैले इस कैंसर का उपचार करें। हर कीमत पर सत्ता की चाह रखने वाले नेताओं को उखाड़ फेंका जाए और क्रोनी पूंजीवाद के हानिकारक प्रभावों पर अंकुश लगाया जाए क्योंकि यह हमारे सस्थानों को नष्ट कर रहा है। जब नेता ऐसे खेल में भागीदार बन जाते हैं और भ्रष्ट लोग भ्रष्टाचार की जांच करते हैं और भ्रष्टाचारियों को निर्दोष साबित कर देते हैं फिर दोषियों की पहचान कौन करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
कुल मिलाकर हमें नेताओं को शासन करने के लिए निर्वाचित करना होगा। हमारे नेताओं को स्वयं को व्यापारी बनने से रोकना होगा। जब अन्नदाता व्यापारी बन जाए तो आम आदमी का गरीब बनना स्वाभाविक है। हमारे नेताओं को इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही अपरिहार्य है और सत्ता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ती है। मोदी को इस राजनीतिक व्यवस्था में स्वच्छता लानी होगी और ऐसे नेताओं पर निर्भर रहना बंद करना होगा जो स्वयं को ईमानदार और नैतिक घोषित करते हैं। देश की जनता को राजनीति में आयी गंदगी को स्वच्छ करने के लिए सफेदी की चमकार की अंतिम बंूंद तक को निचोड़ना होगा। देखना यह है कि क्या मोदी भारतीय राजनीति को स्वच्छ करने के अपने वचन को पूरा कर पाते हैं या नहीं। हमें सार्वजनिक चेहरे के प्राइवेट मुखौटे का पदार्फाश करना होगा। जब सच्चाई पर आंच आती है तो फिर बुराई ही बच जाती है। आपका क्या मत है?</p>
<p style="text-align:right;">पूनम आई कौशिश</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/leader-and-industrialist-means-croni-brotherhood/article-5978</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/leader-and-industrialist-means-croni-brotherhood/article-5978</guid>
                <pubDate>Tue, 18 Sep 2018 09:19:12 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-09/artical-1.jpg"                         length="145654"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण अनुकूल दिवाली मनाने का लें संकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[पर्व-त्योहारों का हिन्दू दैनंदिनी में समय-समय पर दस्तक देना भारतीय समाज की प्रमुख विशेषता रही है। इन पर्व-त्योहारों में निहित संदेशों से इसकी महत्ता स्पष्ट होती है। पर्व-त्योहार, न सिर्फ व्यक्ति के जीवन में व्याप्त नीरसता को खत्म करते हैं, बल्कि परिवारजनों को एक साथ जोड़कर सदस्यों के बीच निहित प्रेम को प्रगाढ़ करने में […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/take-an-opportunity-to-celebrate-diwali-with-environment-friendly-diwali/article-3401"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/happy-diwali.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पर्व-त्योहारों का हिन्दू दैनंदिनी में समय-समय पर दस्तक देना भारतीय समाज की प्रमुख विशेषता रही है। इन पर्व-त्योहारों में निहित संदेशों से इसकी महत्ता स्पष्ट होती है। पर्व-त्योहार, न सिर्फ व्यक्ति के जीवन में व्याप्त नीरसता को खत्म करते हैं, बल्कि परिवारजनों को एक साथ जोड़कर सदस्यों के बीच निहित प्रेम को प्रगाढ़ करने में भी महती भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि शैक्षिक, आर्थिक व अन्य कारणों से देश व परदेश के विभिन्न हिस्सों में अपने पैतृक स्थान से प्रवास किया व्यक्ति पर्व-त्योहार पर घर लौटने को व्याकुल नजर आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, बदलते समय के साथ पर्व-त्योहारों को मनाने के तरीकों में भी बड़ा बदलाव आया है। बतौर उदाहरण, दिवाली को देखा जा सकता है। इसमें निहित शुचिता, स्वच्छता व मितव्ययिता की बातें दिन-ब-दिन गायब होती जा रही हैं। आज यह बस पटाखों की आतिशबाजी, प्रदूषण और फिजूलखर्ची तक ही सीमित रह गई है। यह पर्व स्वच्छता का प्रतीक भी है, इसलिए दिवाली से पूर्व हम अपने घर व आसपास की साफ-सफाई तो करते हैं, लेकिन दूसरे ही दिन पटाखों के फटे अंश हमारी मेहनत का सत्यानाश कर देते हैं। कानफाड़ू पटाखों से एक तरफ पूरा वायुमंडल धुंध से ढक जाता है, तो दूसरी तरफ उसकी गूंज और होने वाले प्रदूषण से बच्चे बीमार व बुजुर्गों को सांस लेने में तकलीफ होने लगती हैं। हर साल दिवाली पर केवल पटाखे जलाकर हम करोड़ों रुपये की संपत्ति अनावश्यक रूप से स्वाहा कर देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही, पटाखा उद्योगों अथवा दुकानों में अनहोनी की वजह से लगने वाली आग से जान-माल के नुकसान होने की घटनाएं भी आम हो जाती हैं। पटाखों के बेतहाशा प्रयोग से, लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी बड़े पैमाने पर असर पड़ता है। अब जबकि, देश के अधिकांश शहर प्रदूषण की भारी चपेट में है, तब दिवाली पर पटाखों के अति प्रयोग को रोकना समाज व प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली में 31 अक्तूबर तक पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध का फैसला स्वागत योग्य है। यही फैसला देश भर में लागू किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, कुछ वर्ष पहले मनायी जाने वाली और अब की दिवाली में एक बड़ा फर्क नजर आया है। आज दिवाली बस नाममात्र की रह गई है। व्यक्तिगत व पेशेवर जीवन में व्याप्त तनाव व दबाव तथा समयाभाव इसकी वजहें हो सकती हैं। दूसरी तरफ, चंद वर्ष पहले तक दिवाली पर मिट्टी के दीये खरीदकर घर रोशन करने का लोगों में जबरदस्त क्रेज था। बकायदा इसकी तैयारियां कई दिनों पहले से होने लगती थीं। आवश्यकतानुसार लोग दीया वगैरह की एडवांस बुकिंग तक कर लेते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उपभोक्ताओं के इस प्रयास से अनेक कुम्हार परिवारों की रोजी-रोटी का बंदोबस्त हो जाता था। लेकिन, आज इतनी जहमत कौन उठाना चाहता है? कथित रुप से यह जमाना शॉर्टकट का जो है। इसलिए, लोग दीये और मोमबत्ती की जगह बिजली के उपकरणों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहे हैं। क्या यह भारत जैसे गौरवशाली व परंपरावादी देश के हित में है? दीया निर्माण के व्यवसाय में लगे हजारों लोगों के पेट पर यह सीधा हमला ही तो है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दौर था, जब दिवाली आते ही स्थानीय हाट और बाजार मिट्टी के दीये और संबंधित अन्य आवश्यक सामग्रियों से पट जाते थे। दिवाली के दिन मिट्टी के दीये में मिट्टी तेल या घी से भींगे कपड़े के कतरन से जलने वाली लौ सम्पूर्ण पृथ्वी को शुद्ध कर देती थी। इससे न सिर्फ गौरवशाली संस्कृति का आभास होता था, बल्कि बरसात के बाद पनपने वाले कीड़े-मकोड़ों का खात्मा भी हो जाता था। लेकिन, समय बीतने के साथ इसमें भी बड़ा परिवर्तन आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">नब्बे के दशक में अपनाई गई वैश्वीकरण की नीति के पश्चात भारतीय बाजारों में चाइनीज उत्पादों की भरमार हो गई है। बेशक, ये उत्पाद अपेक्षाकृत सस्ते, आकर्षक व टिकाऊ हैं, लेकिन भारतीय बाजारों में इसकी अनियंत्रित दखल से हमारे समाज के कुम्हार जातियों के लोगों की परंपरागत रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है। पारंपरिक रुप से यह वर्ग सदियों से मिट्टी के बर्तन, खिलौने और नाना प्रकार की कलाकृतियां तथा उपयोगी वस्तुओं को बनाकर अपनी आजीविका का निर्वहन करते आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेकार पड़ी मृदा को अपनी कला से जीवंत रुप प्रदान करने वाले मूर्तिकारों और कुम्हारों का यह वर्ग उपेक्षित है। यह उपेक्षा, न सिर्फ सरकारी स्तर पर है, अपितु तथाकथित आधुनिकता को किसी भी कीमत पर अपनाने वाले नागरिकों द्वारा भी है। हमारे छोटे-से प्रयास से हजारों लोगों के रोजी-रोटी का इंतजाम करने में मदद मिल सकती है। जरुरत एक पहल करने भर की है। दिवाली पर हमारी यथासंभव कोशिश मिट्टी के दीये ही खरीदने की होनी चाहिए। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि आज भी देश की एक बड़ी आबादी, अशिक्षित, कुपोषित व फटे पुराने कपड़े पर गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर है। ऐसी स्थिति में, पर्व-त्योहारों को हर्षोल्लास से मनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। वास्तविकता यह है कि आज पर्व-त्योहार केवल अमीरों के लिए ही रह गए हैं। आर्थिक विपन्नता व महंगाई की वजह से गरीब लोगों का इन त्योहारों के प्रति रुझान कम हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं, आज देश में आर्थिक विषमता की खाई इतनी गहरी हो गयी है कि अमीर दिन-ब-दिन अमीर और गरीब, उसी अनुपात में गरीबी के दलदल में फंसते जा रहे है। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा जारी इंडिया रिच लिस्ट-2017 के मुताबिक आर्थिक सुस्ती के बाद भी शीर्ष 100 अमीर लोगों की संपत्ति में 26 प्रतिशत इजाफा हुआ है। वहीं वैश्विक भुखमरी सूचकांक की 2017 की रिपोर्ट में भारत का सौवें पायदान पर होना यह जाहिर करता है कि यहां गरीबों की स्थिति ठीक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, देश में गहराती आर्थिक विषमता की खाई को नहीं भरा जाएगा, तब तक पर्व-त्योहारों का आनंद देश के सभी लोग नहीं उठा पाएंगे। कितनी विडंबना है कि ‘धनतेरस’ पर जब देश में आर्थिक रुप से संपन्न लोग महंगी वस्तुएं खरीदने में व्यस्त रहते हैं, तब हमारे समाज का एक तबका दो जून की रोटी के लिए भटकता नजर आता है। दिवाली पर जब संपन्न परिवारों के बच्चे नए कपड़े पहन कर आतिशबाजी करते हैं, तब निम्न आय वर्ग के बच्चे फटे-पुराने कपड़ों में किसी कारणवश ना जलने वाले पटाखों को चुनकर उसे दोबारा जलाने की जुगत में रहते हैं। पैसे की कमी, गरीबों की खुशी के मार्ग में बाधक है। लोगों को उचित शिक्षा व रोजगार के अवसर मिले, तो समाज में व्याप्त आर्थिक भेदभाव को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दीपावली दीपों का पर्व है। हर्षोल्लास का पर्व है। अंधकार पर प्रकाश के विजय का प्रतीक यह पर्व खास संदेश देता है। जब, व्यक्ति के जीवन में निराशा का घना अंधकार छा जाता है, तब आशाओं का एक दीपक अंधकार को चीरता हुआ प्रकट होता है। जब रातें, अपनी काली परछाई से संपूर्ण पृथ्वी को ढंक लेती है, तब तड़के उसे भगाने के लिए सूरज का प्रकाश चला आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलने वाली मोमबत्ती या दीये का प्रकाश, उस उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है, जो सारी रात बिना रुके दरिद्र के प्रतीक अंधकार को आस-पास भटकने नहीं देतीं। उसी तरह, हमें भी जीवन में हमेशा आशावादी होना चाहिए। मुश्किलों और दुश्वारियों पर रोने की बजाय उनका हल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए। दीपावली के दिन हम जरुरतमंदों की सहायता, बेसहारों का सहारा तथा गिरे हुए को उठाने का पुणित कार्य कर सकते हैं। आइए पटाका रहित, स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल दिवाली मनाने का संकल्प लें। हमारे इसी प्रयास से, इस पर्व की सार्थकता बनी रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधीर कुमार</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/take-an-opportunity-to-celebrate-diwali-with-environment-friendly-diwali/article-3401</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/take-an-opportunity-to-celebrate-diwali-with-environment-friendly-diwali/article-3401</guid>
                <pubDate>Tue, 17 Oct 2017 03:38:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-10/happy-diwali.jpg"                         length="51371"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        