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                <title>nuclear - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>NATO Big Nuclear Exercise begins: उत्तरी यूरोप में नाटो का बड़ा परमाणु अभ्यास शुरू, नाटों के इस कदम से हिल सकती ही दुनिया!</title>
                                    <description><![CDATA[NATO Big Nuclear Exercise begins: ब्रुसेल्स (एजेंसी)। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने सोमवार को उत्तरी यूरोप में बड़े पैमाने पर परमाणु अभ्यास ‘स्टीडफास्ट नून’ शुरू कर दिया है, जिसमें 13 गठबंधन देशों के 2,000 सैनिक और 60 सैन्य विमान भाग ले रहे हैं। नाटो महासचिव मार्क रट ने कहा, ‘‘अभ्यास मुख्य रूप से ब्रिटेन, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/nato-big-nuclear-exercise-begins/article-63268"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-10/nuclear.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">NATO Big Nuclear Exercise begins: ब्रुसेल्स (एजेंसी)। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने सोमवार को उत्तरी यूरोप में बड़े पैमाने पर परमाणु अभ्यास ‘स्टीडफास्ट नून’ शुरू कर दिया है, जिसमें 13 गठबंधन देशों के 2,000 सैनिक और 60 सैन्य विमान भाग ले रहे हैं। नाटो महासचिव मार्क रट ने कहा, ‘‘अभ्यास मुख्य रूप से ब्रिटेन, उत्तरी सागर, साथ ही बेल्जियम और नीदरलैंड में हो रहा है।’’ उन्होंने कहा कि इन अभ्यासों से विरोधियों को पता चल जाएगा कि नाटो किसी भी खतरे का जवाब देने के लिए तैयार है। NATO’s nuclear exercises</p>
<h3>एक साल से चल रही थी योजना</h3>
<p style="text-align:justify;">नाटो ने पहले कहा था कि अभ्यास की योजना एक साल से अधिक समय पहले तैयार की गई थी और अभ्यास में किसी भी लड़ाकू हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। युद्धाभ्यास दो सप्ताह तक चलेगा। इसमें 8 एयरबेस शामिल हो रहे हैं। विशेष रूप से परमाणु हथियार, बमवर्षक, एस्कॉर्ट फाइटर और ईंधन भरने वाले विमान ले जाने में सक्षम विभिन्न विमान, साथ ही टोही और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक विमान अभ्यास में भाग लेंगे। नाटो प्रेस सेवा ने कहा कि गठबंधन लगातार परमाणु निरोधक बलों की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा रहा है। विशेष रूप से 2024 में नए डच लड़ाकू विमानों एफ35ए को परमाणु निरोधक मिशनों में उपयोग के लिए उपयुक्त माना गया।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि इस तथ्य के बावजूद कि नाटो का यह अभ्यास पूर्व निर्धारित है, युद्ध-विरोधी संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय जगत में जारी तनावों के संदर्भ में उसके आचरण की आलोचना की है। नाटो रणनीतिक अवधारणा में गठबंधन के नेताओं ने कहा है कि जब तक परमाणु हथियार मौजूद हैं, तब तक नाटो एक परमाणु गठबंधन बना रहेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ये है उद्देश्य | NATO’s nuclear exercises</h3>
<p style="text-align:justify;">इस अभ्यास का उद्देश्य नाटो की तत्परता को प्रदर्शित करना है। खासतौर से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ओर से परमाणु हमले के खतरों के बीच हो रहे इस अभ्यास को तनाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है। हालांकि नाटो का तर्क है कि वह इसके माध्यम से परमाणु निवारक क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। नाटो के महासचिव मार्क रूटे ने के मुताबिक यह अभ्यास अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या है परमाणु युद्धाभ्यास</h3>
<p style="text-align:justify;">परमाणु युद्धाभ्यास ये परखने के लिए किया जाता है कि किसी भी हमले का जवाब देने के लिए संबंधित देश या संगठन कितना तैयार है। इसमें वायुसेना इकाई भी शामिल होती हैं। इनके युद्धक विमान परमाणु हथियारों से लैस होते हैं जो गश्ती उड़ानें संचालित करते हैं। इससे पहले रूस ने भी पश्चिमी देशों के खतरे को देखते हुए परमाणु हथियारों के साथ युद्धाभ्यास करने का फैसला किया था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बढ़ेगा तनाव? NATO’s nuclear exercises</h3>
<p style="text-align:justify;">माना जा रहा है कि नाटो के इस कदम से क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है। इससे पहले भी कई बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन नाटो को चेता चुके हैं। पुतिन ये भी कह चुके हैं कि नाटो और पश्चिमी देश उस पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे हैं। उधर नाटो भी जिद पर अड़ा है। ऐसे में माना जा रहा है कि नाटों के इस कदम से दुनिया हिल सकती है।</p>
<p><a title="जम्मू-कश्मीर में चुनाव सम्पन्न होते ही हटा राष्ट्रपति शासन" href="http://10.0.0.122:1245/presidents-rule-lifted-in-jammu-and-kashmir-as-soon-as-elections-were-over/">जम्मू-कश्मीर में चुनाव सम्पन्न होते ही हटा राष्ट्रपति शासन</a></p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Oct 2024 17:29:31 +0530</pubDate>
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                <title>ईरान परमाणु समझौते पर बातचीत के लिए अमेरिका तैयार</title>
                                    <description><![CDATA[वॉशिंगटन (एजेंसी)। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उनका देश सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को लेकर ईरान परमाणु समझौते पर बातचीत करने की तैयारी कर रहा है। विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि क्योंकि जेसीपीओए का अनुपालन परस्परिक वापसी बहुत अनिश्चित प्रस्ताव है, अब हम किसी भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/america-ready-to-negotiate-iran-nuclear-deal/article-32975"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/america-iran.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वॉशिंगटन (एजेंसी)।</strong> अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उनका देश सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को लेकर ईरान परमाणु समझौते पर बातचीत करने की तैयारी कर रहा है। विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि क्योंकि जेसीपीओए का अनुपालन परस्परिक वापसी बहुत अनिश्चित प्रस्ताव है, अब हम किसी भी स्थिति के लिए समान रूप से तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम अपने सहयोगियों और भागीदारों के साथ एक ऐसे परिदृश्य के लिए भी तैयारी कर रहे हैं, जिसमें कोई जेसीपीओए नहीं है और हमें इसे ठीक करने के लिए अन्य रणनीति और अन्य तरीकों की ओर रुख करना होगा। प्राइस ने कहा कि बाइडेन प्रशासन ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए प्रतिबद्ध है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 May 2022 10:58:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>रूस ने जपोरिजिया परमाणु संयंत्र पर किया कब्जा</title>
                                    <description><![CDATA[कीव। यूक्रेन में ज़ापोरिज्जिया क्षेत्र के सैन्य प्रशासन ने शुक्रवार को परमाणु नियमन के लिए सरकारी निकाय का हवाला देते हुए कहा कि रूसी सैनिकों ने ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र (एनपीपी) की साइट पर कब्जा कर लिया है। प्रशासन ने टेलीग्राम पर लिखा,”ज़ापोरिज्जिया एनपीपी की साइट को रूसी सैन्य बलों ने जब्त कर लिया है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/russia-captures-zaporizhia-nuclear-plant/article-31267"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/zaporizhia-nuclear-plant.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कीव।</strong> यूक्रेन में ज़ापोरिज्जिया क्षेत्र के सैन्य प्रशासन ने शुक्रवार को परमाणु नियमन के लिए सरकारी निकाय का हवाला देते हुए कहा कि रूसी सैनिकों ने ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र (एनपीपी) की साइट पर कब्जा कर लिया है। प्रशासन ने टेलीग्राम पर लिखा,”ज़ापोरिज्जिया एनपीपी की साइट को रूसी सैन्य बलों ने जब्त कर लिया है। परिचालन कर्मियों ने आवश्यकता के अनुसार तकनीकी जांच की तथा सुरक्षित संचालन को सुनिश्चित किया।” इससे पहले यूक्रेनी राज्य आपातकालीन सेवा ने कहा था कि ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र के बाहर आग लग गई और इसकी एक इकाई को बंद कर दिया गया। बाद में उन्होंने बताया था कि आग को बुझा दिया गया है तथा घटना में कोई व्यक्ति हताहत नहीं हुआ है।</p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Mar 2022 15:06:44 +0530</pubDate>
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                <title>परमाणु आतंकवाद कर रहा है रूस: जेलेंस्की</title>
                                    <description><![CDATA[कीव। यूक्रेन के ज़ापोरिज्ज्या परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हमले के बाद राष्ट्रपति वलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने शुक्रवार को यूरोप से कदम उठाने का आग्रह किया तथा उन्होंने कहा कि रूस ‘परमाणु आतंकवाद’ करने वाला एक ‘आतंकवादी राज्य’ है। उन्होंने कहा,”यूरोप को अब जागना चाहिए। यूरोप के सबसे बड़े परमाणु केंद्र में आग लगी हुई है। अभी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/russia-doing-nuclear-terrorism/article-31262"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/volodymyr-zelenskyy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कीव।</strong> यूक्रेन के ज़ापोरिज्ज्या परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हमले के बाद राष्ट्रपति वलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने शुक्रवार को यूरोप से कदम उठाने का आग्रह किया तथा उन्होंने कहा कि रूस ‘परमाणु आतंकवाद’ करने वाला एक ‘आतंकवादी राज्य’ है। उन्होंने कहा,”यूरोप को अब जागना चाहिए। यूरोप के सबसे बड़े परमाणु केंद्र में आग लगी हुई है। अभी रूसी टैंक परमाणु इकाइयों पर गोलाबारी कर रहे हैं।” राष्ट्रपति ने कहा,”मैं सभी यूक्रेनियन और सभी यूरोपीय लोगों को संबोधित करता हूं, जो चेर्नोबिल शब्द जानते हैं, जो जानते हैं कि परमाणु स्टेशन पर विस्फोट के कारण कितनी क्षति हुई थी। यह एक वैश्विक आपदा थी। रूस इसे दोहराना चाहता है लेकिन छह गुना कठिन है।”</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हम सभी को चेतावनी देते हैं कि किसी भी देश ने कभी भी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर गोलाबारी नहीं की। मानव जाति के इतिहास में पहली बार आतंकवादी राज्य परमाणु आतंकवाद करता है। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा,”रूसी प्रचारकों ने दुनिया को परमाणु राख से ढकने की धमकी दी। अब यह कोई खतरा नहीं है बल्कि यह एक वास्तविकता है।” उन्होंने कहा,”हमें रूसी सैनिकों को रोकना चाहिए। अपने नेताओं को बताएं कि यूक्रेन 15 परमाणु इकाइयां हैं। अगर कोई विस्फोट होगा, तो यह हम सभी का अंत होगा, यूरोप का अंत। केवल यूरोप की तत्काल कार्रवाई से यह रुक सकती है।” उल्लेखनीय है कि रूसी सैनिकों के हमले में शुक्रवार की तड़के परमाणु संयंत्र में आग लग गई।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Mar 2022 10:17:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अब परमाणु समझौते का पालन नहीं करेगा ईरान</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका की ओर से बगदाद हवाई अड्डे के पास ड्रोन हमले में ईरानी कमांडर मेजर जनरल कासिम सुलेमानी के मारे से दोनों देशों में तनाव बढ़ गया है। बयान के अनुसार ईरान ने कहा कि वह अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने के पांचवें चरण में परमाणु समझौते को छोड़ रहा है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/iran-will-no-longer-follow-nuclear-deal/article-12261"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/nuclear-deal.jpg" alt=""></a><br /><h2>प्रतिबंध हटाने की रखी शर्त  | <span lang="en" xml:lang="en">Nuclear Deal</span></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>तेहरान (एजेंसी)।</strong> ईरान (Iran) ने कहा कि अब वह 2015 के परमाणु समझौते (<span lang="en" xml:lang="en">Nuclear Deal</span>) का पालन नहीं करेगा। उसने शर्त रखी है कि पहले उसके ऊपर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं, तभी वह सोचेगा। इराना संवाद समिति ने सरकारी बयान के हवाले यह जानकारी दी। अमेरिका की ओर से बगदाद हवाई अड्डे के पास ड्रोन हमले में ईरानी कमांडर मेजर जनरल कासिम सुलेमानी के मारे से दोनों देशों में तनाव बढ़ गया है। बयान के अनुसार ईरान ने कहा कि वह अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने के पांचवें चरण में परमाणु समझौते को छोड़ रहा है। उन्होंने कहा कि अब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी उच्च तकनीकी की जरुरत है।ईरान ने कहा है कि अगर प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं तो वह अपनी परमाणु प्रतिबद्धताओं का फिर से पालन करेगा।</p>
<h3>अमेरिका को कड़ा सबक सिखाने की धमकी | <span lang="en" xml:lang="en">Nuclear Deal</span></h3>
<ul>
<li><strong>बगदाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिकी ड्रोन हमले में सुलेमानी और ईरान समर्थित संगठन शिया पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स के उप प्रमुख मारे गए थे। </strong></li>
<li><strong>ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने इस हमले का ‘कड़ा प्रतिशोध’ लेने का संकल्प लिया है। </strong></li>
<li><strong>ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भी कहा है कि अमेरिका को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।</strong></li>
<li></li>
</ul>
<h3>ईरान-अमेरिका में तलवारें खिंचने की प्रमुख वजहें</h3>
<ul>
<li><strong>1953  तख्तापलट : इस साल दोनों की दुश्मनी की शुरूआत हुई। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान में तख्तापलट करवाया। निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसाद्दिक को हटाकर ईरान के शाह रजा पहलवी के हाथ में सत्ता दे दी गई। इसका प्रमुख कारण था-तेल। मोसाद्दिक तेल के उद्योग का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे।</strong></li>
<li><strong>1979  ईरानी क्रांति : ईरान में आयतोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी नए नेता के रूप में उभरे थे। वे पाश्चात्यकरण और अमेरिका पर ईरान की निर्भरता के विरुद्ध थे। शाह पहलवी उनके निशाने पर थे। खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में असंतोष बढ़ने लगा। इस बीच शाह को ईरान छोड़ना पड़ा। एक फरवरी 1979 को खुमैनी निर्वासन से लौट आए।</strong></li>
<li><strong>1979-81  दूतावास संकट : इस वक्त में ईरान-अमेरिका के राजनयिक संबंध समाप्त हो गए थे। तेहरान में ईरानी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास को अपने कब्जे में ले लिया। 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा। 2012 में इस विषय पर हॉलीवुड फिल्म-आर्गो आई। इसी बीच इराक ने अमेरिका की मदद से ईरान पर हमला बोल दिया। युद्ध 8 साल चला।</strong></li>
<li><strong>2015  परमाणु समझौता : जब ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो दोनों देशों के रिश्ते सुधरने लगे थे। ईरान के साथ परमाणु समझौता हुआ। जिसमें ईरान ने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की बात कही। बदले में आर्थिक प्रतिबंधों में थोड़ी ढील दी गई। लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही समझौता रद्द कर दिया गया। दुश्मनी फिर शुरू हो गई।</strong></li>
</ul>
<h3>अब तक क्या असर हुआ?</h3>
<ul>
<li><strong>बगदाद में अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों से तत्काल इराक छोड़ देने को कहा है।</strong></li>
<li><strong>ब्रिटेन ने मिडिल ईस्ट में अपने सैन्य अड्डों की सुरक्षा भी बढ़ा दी।</strong></li>
<li><strong>क्रूड के दाम 4 प्रतिशत बढ़ गए हैं।</strong></li>
</ul>
<h3>सैन्य क्षमता से आंके दोनों की ताकत</h3>
<p><strong>                   अमेरिकी                                                 ईरानी ताकत</strong></p>
<ul>
<li><strong>सैन्य क्षमता              12.81 लाख                                           5.23 लाख</strong></li>
<li><strong>थल शक्ति                (टैंक, व्हीकल्स, तोपें) 48422               8577</strong></li>
<li><strong>जल शक्ति               (जहॉज, पनडब्बियां आदि) 415               398</strong></li>
<li><strong>वायु शक्ति               (एयर क्रॉफ्ट, हेलीकॉप्टर्स) 10170           512</strong></li>
<li><strong>मिसाइलें                   07                                                         12</strong></li>
<li><strong>रक्षा बजट                  716 बिलियन डॉलर                                6.3 बिलियन डॉलर</strong></li>
</ul>
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</span></span></p>
</div>
</div>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/iran-will-no-longer-follow-nuclear-deal/article-12261</link>
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                <pubDate>Mon, 06 Jan 2020 12:02:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत में अमेरिका लगाएगा छह परमाणु ऊर्जा प्लांट</title>
                                    <description><![CDATA[दोनों देशों की सुरक्षा को लेकर सहमति वाशिंगटन, एजेंसी। भारत और अमेरिका ने सुरक्षा व असैन्य परमाणु सहयोग को बढ़ावा देते हुए भारत में छह अमेरिकी परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने पर सहमति जताई हैं। बुधवार को दोनों देशों ने भारत-अमेरिका रणनीतिक सुरक्षा वार्ता के 9 वें दौर के समापन पर जारी एक संयुक्त बैठक में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2 style="text-align:justify;">दोनों देशों की सुरक्षा को लेकर सहमति</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन, एजेंसी।</strong> भारत और अमेरिका ने सुरक्षा व असैन्य परमाणु सहयोग को बढ़ावा देते हुए भारत में छह अमेरिकी परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने पर सहमति जताई हैं। बुधवार को दोनों देशों ने भारत-अमेरिका रणनीतिक सुरक्षा वार्ता के 9 वें दौर के समापन पर जारी एक संयुक्त बैठक में सहमति जताई। भारत की तरफ से विदेश सचिव विजय गोखले और अमेरिका के स्टेट फॉर आर्म्स कंट्रोल एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी विभाग की अंडर सेक्रेटरी एंड्रिया थॉम्पसन ने बातचीत में हिस्सा लिया। को।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों देश के संयुक्त बयान में कहा गया, ” भारत में छह अमेरिकी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना सहित द्विपक्षीय सुरक्षा और असैन्य परमाणु सहयोग को मजबूत करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं।” आपको बता दें कि भारत और अमेरिका ने अक्टूबर 2008 में असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस सौदे ने द्विपक्षीय संबंधों को एक मजबूती प्रदान की। हालांकि बयान में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के बारे में कुछ ज्यादा जानकारी नहीं दी गई। लेकिन भारत में अमेरिका के इस रुख से तमाम संभावनाएं पैदा होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के मुताबिक सौदे का एक प्रमुख पहलू परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) था, जिसने भारत को एक विशेष छूट दी जिससे वह एक दर्जन देशों के साथ सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर कर सके। छूट के बाद, भारत ने अमेरिका, फ्रांस, रूस, कनाडा, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, यूके, जापान, वियतनाम, बांग्लादेश, कजाकिस्तान और दक्षिण कोरिया के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए है।</p>
<p style="text-align:justify;">बुधवार को संयुक्त बैठक के दौरान अमेरिका ने 48-सदस्यीय एनएसजी में भारत की शुरुआती सदस्यता के लिए अपने मजबूत समर्थन की भी बात कही हैं। बता दें कि चीन ने भारत को एनएसजी में शामिल नहीं होने दिया था। वो भारत के परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना चाहता है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">क्यों महत्व रखता है ये समझौता?</h2>
<p style="text-align:justify;">यह समझौता, ऊर्जा की कमी की समस्‍या का समाधान करने में सहायता करेगा जो भारत की बढ़ती विकास दर से संबंधित एक प्राथमिक समस्‍या के रूप में उभरी है। इस समय भारत की केवल 3 % ऊर्जा जरूरतें परमाणु स्रोतों से पूरी की जाती हैं। भारत की सन् 2020 तक परमाणु क्षेत्र से 20,000 एमडब्‍ल्‍यूई के उत्‍पादन की योजना है जो वर्तमान 3700 एमडब्‍ल्‍यूई के मुकाबले काफी अधिक है।</p>
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<p>Nuclear, Power, Plant</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 Mar 2019 12:39:59 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका और रूस ने बढ़ाया परमाणु युद्ध का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[अभी तक दुनिया को परमाणु युद्ध का खतरा पाकिस्तान और उत्तर कोरिया की जमीन से झांकता दिखाई देता रहा है। पाकिस्तान से यह आशंका इसलिए ज्यादा थी, क्योंकि वहां की जमीन पर आतंक के खिलाड़ी पनाह लिए हुए हैं, लिहाजा भूल से भी उनके हाथ परमाणु हथियार लग गए तो दुनिया को तबाह करने में […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/us-and-russia-threaten-nuclear-war/article-6529"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/us.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अभी तक दुनिया को परमाणु युद्ध का खतरा पाकिस्तान और उत्तर कोरिया की जमीन से झांकता दिखाई देता रहा है। पाकिस्तान से यह आशंका इसलिए ज्यादा थी, क्योंकि वहां की जमीन पर आतंक के खिलाड़ी पनाह लिए हुए हैं, लिहाजा भूल से भी उनके हाथ परमाणु हथियार लग गए तो दुनिया को तबाह करने में उन्हें देर नहीं लगेगी। परंतु अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ताजा बयानों के बाद इस डर की दिशा बदलती दिख रही है। ट्रंप ने आईआरएनएफ यानी मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि से पृथक होने और नए व ज्यादा मारक क्षमता वाले परमाणु शस्त्र बनाने की घोषणा करके दुनिया को चिंतित कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ इस ऐलान की प्रतिक्रिया में पुतिन ने कहा है कि अगर अमेरिका ने संधि से पलटने का फैसला लिया तो रूस भी इसका प्रभावी ढंग से उत्तर देगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस किसी भी यूरोपीय देश ने अमेरिका की परमाणु मिसाइलों को अपने देश में जगह दी तो उसे निशाना बनाया जाएगा। मसलन वैश्विक शक्तियां पुरानी परमाणु संधियों से अलग-थलग होती हैं तो इन्हीं परमाणु शक्तियों को युद्ध का शंखनाद करने में देर नहीं लगेगी ? यह युद्ध यदि हुआ तो वैश्विक परमाणु युद्ध में बदलना तय है। दरअसल ट्रंप जो भी अंतरराष्ट्रीय संधियां हैं, उन्हें शक की निगाह से देख रहे हैं। इन संधियों के मद्देनजर उन्हें अमेरिका के राष्ट्रहित कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। इस सोच के पनपने का कारण रूस व चीन की निरंतर हर क्षेत्र में बढ़ती ताकत और घनिष्ट होती मित्रता भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में हुए समझौते को भी अमेरिका के औद्योगिक विकास में बड़ी बाधा मान रहे हैं, इसलिए वे उसे भी तोड़ने का बयान देते रहते हैं। हालांकि संधि बनाए रखने की दृष्टि से उन्होंने यह भी कहा है कि यदि रूस और चीन घोषणा कर दें कि दोनों देश संधि पर पुनर्विचार के लिए तैयार हैं, तो अमेरिका अपना फैसला बदल सकता है। अलबत्ता यहां सवाल उठता है कि रूस व चीन अमेरिका की धमकी के आगे क्यों घुटने टेकेंगे ? यदि अमेरिका संधि पर पुनर्विचार का शांतिपूर्ण ढंग से प्रस्ताव रखता तो एक बार इस पर विचार की संभावना रूस व चीन कर सकते थे। अलबत्ता धमकी तो आखिर में टकराव के रास्ते ही खोलती है, इसीलिए रूस ने ईंट का जबाव पत्थर से दे भी दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस संधि को लेकर उपजे विवाद को दोनो देश को बातचीत से हल करने का सुझाव दिया है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जिस तरह से अप्रासंगिक होती जा रही है, उससे लगता नहीं कि इन महाशक्तियों पर उसका पर्याप्त दबाव बन पाएगा ? संयुक्त राज्य अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने मध्यम दूरी के परमाणु प्रक्षेपास्त्रों, यानी मिसाइलों को समाप्त करने के लिए 8 दिसंबर 1987 के दिन मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि (इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लीयर फोर्स) पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता परमाणु-शस्त्रों पर नियंत्रण के लिए छह साल तक चली सकारात्मक वार्ता का परिणाम था।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन 1989 में वारसा संधि के खात्मे और सोवियत रूस के विघटन की घटनाओं ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि इस आईआरएनएफ संधि का सामरिक महत्व नगण्य हो गया। वारसा संधि के समापन से यूरोप की सेनाओं की भूमिका एकपक्षीय हो गई। समुद्री सतह पर तैनात मिसाइलों के विस्तार का औचित्य खत्म हो गया। वैसे भी इस संधि में समुद्री मिसाइलों को नष्ट करने की शर्त नहीं जुड़ी थी। जबकि आईआरएनएफ का लक्ष्य इन्हीं मिसाइलों की निगरानी करना था। संधि के पालन में सभी परमाणु हथियार और पारंपरिक मिसाइलों के साथ-साथ उनके लांचर, जिनकी मारक क्षमता 500 से 1000 और 1000 से 3500 किमी थी, को हटा दिया गया था। 1991 तक करीब 2692 मिसाइलें नष्ट कर दी गई थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल इस संधि की समय-सीमा दो साल बाद खत्म हो रही है, इसलिए अमेरिका अब अपने देशहित के चलते इसके नवीनीकरण के पक्ष में नहीं है। इस संधि का ही नतीजा था कि शीतयुद्ध के समय दुनिया तनावमुक्त रही। इससे यह भरोसा बना हुआ था कि दुनिया एकाएक परमाणु विभीशका की भट्टी में नहीं झोंकी जाएगी ? किंतु कालांतर में संधि टूटती है तो दुनिया कभी भी परमाणु हमले की चपेट में आ सकती है। हालांकि 20 अक्टूबर 2018 को टंÑप ने जो बयान दिया है, वह प्रस्ताव अभी अमेरिकी सीनेट से अनुमोदित नहीं हुआ है। इसलिए एकाएक यह कहना भी मुश्किल है कि यह संधि समाप्त हो ही जाएगी। अब दोनों देश इस संधि के उल्लंघन का आरोप एक-दूसरे पर मढ़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका ने 2008 में एसएससी क्रूज मिसाइल का परीक्षण किया, तो रूस ने यूरोप को लक्षित करने वाली मिसाइलों का परीक्षण और निर्माण कर लिया। इनमें 9 एम-729 और आरएस-26 रूबेज मिसाइलें शामिल हैं। ये अंतरराष्ट्रीय बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। इनका परीक्षण व निर्माण आईआरएनएफ संधि का खुला उल्लंघन है। इधर चीन, भारत और पाकिस्तान भी मिसाइल संपन्न देश हो गए हैं। रूस-चीन के मजबूत होते सामरिक संबंध भी अमेरिका को परेशान किए हुए हैं। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग तो पहले ही अमेरिका पर परमाणु हमले की धमकी दे चुके हैं। किम को चीन की शह हासिल है और पाकिस्तान ने उसे गोपनीय ढंग से परमाणु शस्त्र निर्माण की तकनीक दी थी। उत्तर कोरिया हाइड्रोजन बम का भी सफल परीक्षण करके दुनिया को दहला चुका है। गोया, अमेरिका संधि तोड़ता है तो चीन व रूस की शह पर किम जोंग किसी भी हरकत को अंजाम दे सकते हैं। हालांकि फिलहाल उत्तर और दक्षिण कोरिया में सद्भाव कायम है, जो अमेरिका के हस्तक्षेप से ही सफल हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय कुल 9 देश परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। इनमें पांच अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन ऐसे देश हैं, जिनके पास परमाणु हथियारों के इतने बड़े भंडार है कि वे पूरी दुनिया को कई बार नष्ट कर सकते हैं। विडंबना यह भी है कि यही देश परमाणु अप्रसार संधि के सदस्य हैं। अमेरिका के पास 4760, रूस 4300, फ्रांस 300, चीन 250 और ब्रिटेन के पास 225 परमाणु हथियार हैं। इन देशों के अलावा भारत, पाकिस्तान, इजराइल और उत्तर कोरिया भी परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। भारत के पास 90-110, पाकिस्तान 90-120, इजराइल 80-100 और उत्तर कोरिया के पास 10 परमाणु हथियार बताए जाते हैं। किस देश के पास वास्तव में कितने परमाणु अस्त्र है, इनकी वास्विक गिनती नहीं हुई है, ये महज अनुमान हैं। दक्षिण अफ्रीका, बेलारूस, यूक्रेन और कजाकिस्तान अपने-अपने परमाणु हथियार खत्म कर चुके हैं। ईरान परमाणु हथियार निर्माण कार्यक्रम चला रहा था, किंतु अमेरिका के दबाव और नई संधि के चलते इस शंका को निर्मूल माना जा रहा है। परमाणु हमले का दंश झेल चुके जापान के पास कोई परमाणु हथियार नहीं है, लेकिन उत्तर कोरिया द्वारा हाइड्रोजन बम के परीक्षण के बाद जापान ने परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के संकेत दिए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन की विस्तारवादी नीति ने भी जापान को इस दिशा में मुड़ने को विवश किया है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कहना था कि कल्पना ज्ञान से अधिक शक्तिशाली होती है। अस्त्रों का उपयोग बचावकारी आधुनिक टेसला शील्ड के समान होता है। परमाणु हथियारों से हमला बोलने की अनुमति का अधिकार किसी भी देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख या सामूहिक निर्णय के जरिए लिया जाता है। आम प्रचलन में परमाणु हमले को रेड बटन यानी खूनी खेल खेलने का लाल बटन माना जाता है। जो दबने के बाद सिर्फ और सिर्फ तबाही की क्रूरता रचता है। अमेरिका इस बटन को दबाकर जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी शहरों पर 6 और 9 अगस्त 1945 को परमाणु हमला बोलकर नेस्तनाबूद कर चुका है। शायद परमाणु हमले की विभीशका व वीभत्सता को अहसास करते हुए ही अल्बर्ट आइंसटीन ने कहा था कि मैं यह नहीं जानता कि तीसरे विश्वयुद्ध में किस तरह के हथियारों का इस्तेमाल होगा, लेकिन यह तय है कि चौथा विश्व युद्ध लाठी और पत्थरों से लड़ा जाएगा। बहरहाल आईआरएनएफ संधि टूटती है तो दुनिया के जल्द तबाह होने का खतरा बढ़ जाएगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>प्रमोद भार्गव</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Nov 2018 08:36:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>चीन दुनियाभर में अपने परमाणु तकनीकी मानकों को करेगा प्रोत्साहित</title>
                                    <description><![CDATA[शंघाई(एजेंसी)। चीन ने कहा है कि वर्ष 2027 के अंत तक वैश्विक परमाणु मानकों में अग्रणी भूमिका हासिल करने के लिए वह अपने परमाणु उद्योग के तकनीकी मानकों का दुनियाभर में प्रचार-प्रसार करेगा ।कैबिनेट के नये दिशानिर्देशों के अनुसार चीन के परमाणु तकनीकी मानकों को प्रोत्साहित किया जाएगा। चीन के दो बड़े परमाणु परियोजना डेवलपर्स, चाइना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/china-will-encourage-nuclear-technical-standards/article-5296"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/cinaa.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>शंघाई(एजेंसी)। </strong>चीन ने कहा है कि वर्ष 2027 के अंत तक वैश्विक परमाणु मानकों में अग्रणी भूमिका हासिल करने के लिए वह अपने परमाणु उद्योग के तकनीकी मानकों का दुनियाभर में प्रचार-प्रसार करेगा ।कैबिनेट के नये दिशानिर्देशों के अनुसार चीन के परमाणु तकनीकी मानकों को प्रोत्साहित किया जाएगा। चीन के दो बड़े परमाणु परियोजना डेवलपर्स, चाइना नेशनल न्यूक्लियर कार्पोरेशन (सीएनएनसी) और चाइना जनरल न्यूक्लियर प्रोजेक्ट कार्पोरेशन (सीजीएन) मिलकर आधुनिक तीसरी पीढ़ी के परमाणु संयंत्र हुलांग वन का विदेशों में प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।</p>
<h2>वैश्विक परमाणु उद्योगों पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है चीन</h2>
<p>सीजीएन ब्रिटेन के ब्रैडवेल में प्रस्तावित परमाणु परियोजना के लिए तकनीक प्रदान करेगा।चीन का लक्ष्य अपनी परमाणु क्षमता को वर्ष 2020 तक 58 गिगावॉट और वर्ष 2030 तक 200 गिगावॉट तक बढ़ाने का है। फिलहाल जून महीने के अंत में चीन की परमाणु क्षमता 37 गिगावॉट है। चीन अपनी स्वदेशी परमाणु तकनीक के माध्यम से वैश्विक परमाणु उद्योगों पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है।</p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
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                <pubDate>Fri, 10 Aug 2018 09:36:20 +0530</pubDate>
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                <title>परमाणु समझौते पर जारी गतिरोध समाप्त हो: ईरान</title>
                                    <description><![CDATA[वियना/पेरिस (एजेंसी)। ईरान ने कहा है कि वह परमाणु पर्यवेक्षकों के साथ पूरी तरह से तब तक सहयोग नहीं करेगा जब तक कि परमाणु समझौते पर जारी गतिरोध समाप्त नहीं हो जाता। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत ने  एक बयान जारी कर यह बात कही। गत माह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ending-the-deadlock-on-the-nuclear-deal-iran/article-4004"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/iran.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong><span class="storydetails">वियना/पेरिस (एजेंसी)। </span></strong><span class="storydetails">ईरान ने कहा है कि वह परमाणु पर्यवेक्षकों के साथ पूरी तरह से तब तक सहयोग नहीं करेगा जब तक कि परमाणु समझौते पर जारी गतिरोध समाप्त नहीं हो जाता। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत ने  एक बयान जारी कर यह बात कही। गत माह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ हुए ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते से अमेरिका के अलग होने की घोषणा की थी। श्री ट्रम्प ने इस समझौते को अप्रासंगिक करार देते हुए ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को फिर से शुरू करने की भी घोषणा की थी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span class="storydetails"> अमेरिका के इस समझौते से अलग होने के बाद से ही यूरोपीय देश इस समझौते को बचाने के लिए काम कर रहे हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी के विदेश तथा वित्त मंत्रियों ने अमेरिकी अधिकारियों को पत्र लिखकर ईरान परमाणु समझौते को बचाए रखने के लिए अपनी प्रतिबद्धता से अवगत कराया है। इसके अलावा तीनों देशों ने अमेरिका से ईरान में सक्रिय यूरोपीय कंपनियों को प्रतिबंधों से छूट देने का आग्रह किया है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span class="storydetails">ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खमनेई ने सोमवार को एक आदेश जारी कर यूरेनियम संवर्धन क्षमता में वृद्धि करने के लिए तैयारी करने के लिए कहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2015 में ईरान ने अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत ईरान ने उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के बदले अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति जतायी थी।</span></p>
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                                                            <category>विदेश</category>
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                <pubDate>Thu, 07 Jun 2018 09:52:05 +0530</pubDate>
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                <title>परमाणु युद्ध के खतरे और परमाणु निशस्त्रीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[महाशक्तियों के अंतर्द्वन्द्व, विरोधाभासों एवं शक्ति प्रदर्शन के कारण दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। 1945 में जापान पर परमाणु बम गिराने के 72 वर्ष बाद दुनिया पुन:परमाणु बम के संकट से बुरी तरह घिरी हुई है। ऐसे में दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की पहल को नोबेल शांति पुरस्कार दिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/nuclear-war-threats-and-nuclear-disarmament/article-3449"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/danger.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">महाशक्तियों के अंतर्द्वन्द्व, विरोधाभासों एवं शक्ति प्रदर्शन के कारण दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। 1945 में जापान पर परमाणु बम गिराने के 72 वर्ष बाद दुनिया पुन:परमाणु बम के संकट से बुरी तरह घिरी हुई है। ऐसे में दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की पहल को नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाना एक प्रशंसनीय कदम है। दुनिया से परमाणु हथियार खत्म करने के प्रयास में जुटे संगठन “इंटरनेशनल कैंपेन टू एबोलिश न्यूक्लियर वेपन्स (आईसीएएन)” को वर्ष 2017 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा है। नार्वे स्थित नोबेल समिति ने वैश्विक संधि के जरिए परमाणु हथियारों को कानूनी तौर पर प्रतिबंधित कराने के प्रयास के लिए आईसीएएन की सराहना की है। इस पुरस्कार के तहत संगठन को 1.1 करोड़ डॉलर (करीब 7.15 करोड़) की नगद राशि और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस संस्था को यह पुरस्कार तब दिया जा रहा है, जब संपूर्ण विश्व परमाणु युद्ध के आशंका से डरी सहमी हुई है। कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु युद्ध की आशंकाएँ आज सबसे तीव्र महसूस की जा रही है। पिछले 3 सितंबर को दुनिया के तमाम विरोधों तथा दबावों को दरकिनार करते हुए उत्तर कोरिया ने अपना 6 ठा परमाणु परीक्षण किया, जो मूलत: हाइड्रोजन बम का परीक्षण था। इस हाइड्रोजन बम की ताकत नागासाकी पर गिराये परमाणु बम से 6 गुना ज्यादा थी। यही कारण है कि इस परमाणु परीक्षण के बाद पूरी दुनिया में परमाणु युद्ध के खतरों को लेकर खलबली मची हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">जापान, दक्षिण कोरिया तथा अमेरिकी द्वीप गुआम में तो लोगों को परमाणु युद्ध से बचाव के लिए लगातार प्रशिक्षण भी दिए जा रहे हैं। कभी अमेरिका संपूर्ण उत्तर कोरिया को परमाणु बम से भस्म करने की धमकी दे रहा है, तो कभी उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग उन जापान एवं अमेरिका को परमाणु बमों से तबाह करने की धमकी दे रहे हैं। कोरियाई प्रायद्वीप के अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप में भी पाकिस्तान हमेशा भारत को परमाणु बमों की धमकी देता रहता है। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर भी प्रश्न उठते रहते हैं। पाकिस्तानी हथियार कभी भी आतंकवादियों के हाथ लग सकते हैं। ऐसे में भारतीय महाद्वीप में तो स्थिति की गंभीरता को स्पष्टत: समझा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दक्षिण चीन सागर में चीनी वर्चस्व को तोड़ने के लिए बार-बार अमेरिकी एवं चीनी परमाणु युद्धपोत आमने-सामने हो जाते हैं। ज्ञात हो कि चीन ने पिछले तीन वर्षों में दक्षिण चीन सागर के कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर लगभग दो तिहाई दक्षिण चीन सागर पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में चीन के इस वर्चस्व को अब जब अमेरिका चुनौती दे रहा है, तब परमाणु युद्ध की संभावनाएँ दक्षिण चीन सागर में भी खुल जाती हैं। सीरिया संकट में अमेरिकी एवं रूसी परमाणु शक्तियाँ अभी आमने – सामने खड़ी है। आतंकवाद के खात्मे के नाम पर अमेरिका एवं रूस दोनों जिस प्रकार स्वार्थलोलुप दृष्टि से सीरिया में आमने-सामने हो रहे हैं, उससे सीरिया में भी भविष्य में परमाणु युद्ध की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्यपूर्व के अरब-इजराइल विवाद में भी सदैव अत्यधिक तनाव मौजूद रहता है। इजराइल को सदैव हिजबुल्ला छापामारों एवं हमास जैसे संगठनों से निपटना होता है। इस क्षेत्र में भी फिलस्तीन मामले को लेकर लंबी अवधि से अभूतपूर्व तनाव की स्थिति बनी हुई है। यहाँ पर इजराइल भी परमाणु शक्ति संपन्न देश है । अगर भविष्य में कभी भी इजराइल ने धैर्य खोया तो इस क्षेत्र में भी परमाणु युद्ध की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस समय संपूर्ण विश्व पर परमाणु युद्ध की प्रबल संभावनाएँ हैं। इसलिए नोबेल पुरस्कार समिति ने “इंटरनेशनल कैंपेन टू एबोलिश न्यूक्लियर वेपन्स (आईसीएएन)” को ऐसे समय शांति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की है, जब उत्तर कोरिया न केवल परमाणु परीक्षण कर रहा है, बल्कि हमले की भी धमकी भी दे रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आईसीएएन की स्थापना 2007 में वियना में की गई थी। फिलहाल 101 देशों के 468 गैरसरकारी संगठन इससे जुड़े हुए हैं। आईसीएएन दुनियाभर की समस्याओं को परमाणु हथियारों से पैदा हुए खतरे को लेकर आगाह कर रहा है। साथ ही इस अभियान के तहत परमाणु संपन्न देशों को नष्ट करने की अपील की जा रही है। इस कैंपेन का असर यह हुआ कि इसी वर्ष 7 जुलाई 2017 को संयुक्त राष्ट्र के 122 सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने वाली संधि को स्वीकार किया था। इसमें हालांकि भारत, अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजराइल शामिल नहीं हैं। आईसीएएन के प्रयास से संयुक्त राष्ट्र में पारित संधि “ट्रीटी आॅन द प्रोहिबिशन आॅफ न्यूक्लियर वेपंस (टीपीएनडब्लू)” परमाणु हथियारों को पूरी तरह से नष्ट करने की पहली अंतर्राष्ट्रीय संधि है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस संधि को संयुक्त राष्ट्र के 122 सदस्य देशों ने स्वीकार किया है। लेकिन जब 50 देश इसे हस्ताक्षरित और अनुमोदित करेंगे, तभी संधि प्रभावी होगी। नोबेल समिति द्वारा जारी बयान के मुताबिक 108 देशों ने संधि के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है। इसके प्रभावी होने पर परमाणु हथियार भी बारुदी सुरंग, क्लस्टर आयुध और जैविक व रासायनिक हथियार की तरह कानूनी तौर पर प्रतिबंधित हो जाएंगे। एक आंकड़े के मुताबिक रूस के पास 7000, अमेरिका के पास 6800, फ्रांस के पास 300, चीन के पास130, भारत के पास 120 तथा इजराइल के पास 80 परमाणु हथियार हैं। ऐसे में परमाणु युद्ध के विकरालता को समझा जा सकता है। परमाणु बमों की लगातार धमकियों से स्थिति और बिगड़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि आईसीएएन की कार्यकारी निदेशक बिट्रिस फेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा, “परमाणु हथियार अवैध हैं। इनकी धमकी देना भी गैरकानूनी है। परमाणु हथियार रखना और उसका विकास अवैध है। इसे रोकने की जरूरत है।” जहाँ एक ओर मानवता की रक्षा के लिए परमाणु निशस्त्रीकरण की बात हो रही है, वहीं उत्तर कोरिया तथा महाशक्तियों हाइड्रोजन बम की ओर अग्रसर हो रही हैं। ऐसे में हाइड्रोजन बम की विनाशलीला को समझना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में सियोल के कुकमिन यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने न्यूयार्क जैसे बड़े शहर पर हाइड्रोजन बम से हमले की कल्पना कर संपूर्ण दुनिया को इसकी भयंकर विनाशलीला से परिचय कराया। अगर उत्तर कोरिया अपने हाइड्रोजन बम का प्रयोग न्यूयॉर्क जैसे शहर पर करता है, तो पूरा न्यूयॉर्क शहर तबाह हो जाएगा और एक भी आदमी जिंदा नहीं बचेगा। सियोल की कुकमिन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एंड्री बताते हैं कि एक हाइड्रोजन बम न्यूयॉर्क शहर को पूरी तरह से तबाह कर सकता है। धमाके के बाद एक भी व्यक्ति जीवित नहीं बचेगा, जबकि एक परमाणु बम से न्यूयार्क शहर का एक हिस्सा मैनहटन ही तबाह हो पाएगा। ज्ञात हो कि न्यूयॉर्क शहर की आबादी 85 लाख है और क्षेत्रफल 789 वर्ग किमी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर कोरिया के सफल हाइड्रोजन बम परीक्षण पर सिओल यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर विभाग के प्रोफेसर सुह कहते हैं कि उत्तर कोरिया का यह परीक्षण गेम चेंजर नहीं बल्कि गेम ओवर है। ऐसे में आईसीएएन के परमाणु मुक्त विश्व के प्रयासों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाना, सर्वथा उचित, प्रशंसनीय व प्रासंगिक कदम है। आईसीएएन के इस कैंपेन की बदौलत ही दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त कराने की दिशा में धीमी गति से ही सही, पर गंभीर प्रयास शुरू हुए हैं।पूर्व में भी अमेरिका एवं रूस ने आपसी समझौतों के द्वारा भारी संख्या में अपने परमाणु जखीरे को घटाया है। सच तो यही है कि परमाणु हथियारों से दुनिया के खत्म होने का खतरा है। जब तक ये हथियार रहेंगे, खतरा बरकरार रहेगा। इसलिए सुरक्षित विश्व तथा मानवता की रक्षा के लिए परमाणु निशस्त्रीकरण अब अपरिहार्य हो चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-राहुल लाल</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Oct 2017 04:22:21 +0530</pubDate>
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