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                <title>Literature - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Story: जब बापू ने मेरी बीएड के लिए अपनी ट्रॉली बेच दी</title>
                                    <description><![CDATA[Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/mother-has-a-very-important-place-in-life/article-83707"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-04/story.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही पिता की भूमिका भी उतनी ही गहन और व्यापक होती है। माता और पिता दोनों ही संतान के लिए अलग-अलग किंतु समान रूप से अनमोल स्थान रखते हैं। बच्चे का परिवेश- उसका पड़ोस, उसका वातावरण, उसका विद्यालय और उसका शहर- उसके व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। अपने प्रियजनों के बिछुड़ जाने के बाद मन उदासी से भर जाता है और तब जीवन का अगला चरण उन्हीं की स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ने लगता है। कहा जाता है कि ठहरा हुआ पानी भी खराब होने लगता है, जबकि बहता पानी अपनी अलग ही सुगंध और ताजगी लिए होता है। यही जीवन का सिद्धांत है- समय के साथ चलते रहना, बदलते रहना।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना काल के कठिन समय में मेरा बापू मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गया। जब तक वह जीवित थे, मुझे जीवन की किसी भी बात की तनिक भी चिंता नहीं थी। मैं अपनी मस्ती भरी दुनिया में मग्न था। लेकिन उनके जाने के बाद जिम्मेदारियों का जो एहसास हुआ, वह मेरे जीवन का एक नया अध्याय बन गया। आज सोचता हूँ, न जाने कैसे वह कर्ज के बोझ तले दबे होने के बावजूद हम तीनों भाई-बहनों को पढ़ाते रहे और घर-गृहस्थी की गाड़ी भी खींचते रहे। यह बात 1998 की है, जब मेरा बी.एड. में प्रवेश हुआ। घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। छमाही फसल बिकने के बाद ही कहीं जाकर आढ़ती से कुछ पैसे मिलते और उन्हीं से हमारे कपड़े-वगैरह और अन्य आवश्यकताओं का प्रबंध होता। परीक्षा पास करने के तुरंत बाद बी.एड. में दाखिले की खुशी इतनी अधिक थी कि मैं उसे संभाल भी नहीं पा रहा था। मुझे क्या पता था कि इतनी भारी फीस भरना हमारे लिए संभव ही नहीं था। मैं चुपचाप सो गया। Story</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी माँ ने पिता से इस बारे में बात की कि बेटे का दाखिला हो गया है, वह आगे चलकर मास्टर बनेगा, पर फीस बहुत अधिक है- कोई उपाय करना होगा। अगले ही दिन मेरे पिता, बिना अपने साधनों की परवाह किए, अपनी ट्रॉली बेच आए और मेरी फीस के लिए पैसे जुटा दिए। मुझे इस बात का पता बाद में चला, जब मैंने उन्हें दूसरों से ट्रॉली मांगकर काम करते देखा। पिता के जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान होता है, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। पिता तो अपने बच्चों के लिए अपना संपूर्ण जीवन तक न्यौछावर कर देता है। आज भले ही मेरे बापू हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियां ही मेरे जीवन को आगे बढ़ाने का संबल बनी हुई हैं।<br />
जब मैं आज अपने विद्यार्थियों को यह प्रसंग सुनाता हूँ, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं और उनके मन में अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान और भी गहरा हो जाता है। माता-पिता घर की वह नींव होते हैं, जिनके रहते किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। जिन बच्चों के माता-पिता बचपन में ही उन्हें छोड़ जाते हैं, उनसे पूछकर देखिए कि बिना माता-पिता के जीवन कैसा होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि जीवन में यादें न हों, तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। अच्छी और बुरी, दोनों प्रकार की यादों के सहारे ही जीवन आगे बढ़ता है। माता-पिता हमें छोड़कर जाने के बाद भी हमारे सपनों में आकर हमें सही और गलत का मार्ग दिखाते रहते हैं। वास्तव में, जीवन की यादें एक विशाल चलचित्र है, जिसे हमारा मन अपने भीतर संजोए रखता है। अच्छी यादें हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। हमें चाहिए कि हम अपने बड़ों का सम्मान करें और जीवन की मधुर यादों को दूसरों के साथ भी साझा करें।<br />
अमनदीप शर्मा, गुरने कलां, मानसा, मो. 98760-74055</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Petrol-Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर तेल कंपनियों का आया बड़ा बयान" href="https://www.sachkahoon.com/oil-companies-issued-a-statement-regarding-the-increase-in-petrol-and-diesel-prices/">Petrol-Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर तेल कंपनियों का आया बड़ा बयान</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 15:35:40 +0530</pubDate>
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                <title>Literature: मीठा रिश्ता बुआ का</title>
                                    <description><![CDATA[Bua: बुआ के साथ रिश्ता बड़ा प्यारा और मीठा होता है। मुझे नहीं पता कि बुआ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। हाँ, जो फूं-फूं करता है, उसे फुफ्फड़ कहते हैं, और उसी से “फुफ्फी” शब्द बना है। भुआ को सास “फुफेस” कहती है। भुआ उसी घर में जन्मी होती है, जहां वह अपने भाइयों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/sweet-relation-of-bua/article-80914"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/literature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Bua: बुआ के साथ रिश्ता बड़ा प्यारा और मीठा होता है। मुझे नहीं पता कि बुआ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। हाँ, जो फूं-फूं करता है, उसे फुफ्फड़ कहते हैं, और उसी से “फुफ्फी” शब्द बना है। भुआ को सास “फुफेस” कहती है। भुआ उसी घर में जन्मी होती है, जहां वह अपने भाइयों और भाभियों के मूड को देखते हुए फेरा डालने की सोचती है। कई घरों में भुआ के आने को अच्छा नहीं माना जाता। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">यह धारणा बना रखी है कि भुआ कुछ न कुछ लेने ही आती है। भुआ लालची होती है। जबकि हकीकत यह है कि भुआ अपने मायके में चाहे जितनी अच्छी हो, उसे अपने मायके से मिलने वाले सम्मान की भूख होती है। मायके से मिले छोटे-मोटे उपहारों को वह अपनी बहुओं और ननदों को बड़े गर्व से दिखाती है। उसका माँ से जन्मा भाई, भाभियाँ, भतीजे-भतीजियाँ भुआ से हर बात छिपाते हैं। कोई नई चीज लाएँ, तो उसे भुआ से छुपाते हैं। जबकि भुआ अपने मायके की हर खुशी को अपनी खुशी से भी बढ़कर मानती है। यह वही भुआ है, जो कभी उस घर की बराबर की हिस्सेदार थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जमीन-जायदाद की मालिक थी। उसके बराबर के हक थे। लेकिन उसका हिस्सा यह कहकर काट दिया जाता है कि उसकी शादी में उसकी हिस्सेदारी की रकम खर्च हो गई थी। जबकि आजकल लोग बेटियों की शादी से ज्यादा बेटों की शादी पर खर्च करते हैं। फिर भुआ का हिस्सा कहां गया? कई लड़कियां तो शादी से पहले ही कमाई शुरू कर देती हैं। अपनी तनख्वाह को वे मायके की झोली में डाल देती हैं या अपनी शादी के लिए जोड़ लेती हैं। फिर भी वे अपना हिस्सा नहीं लेतीं। क्योंकि शादी के बाद, माता-पिता के चले जाने के बाद भी वे मायके से जुड़े रहती हैं। वे चाहती हैं कि हर तीज-त्योहार पर उनकी सुध ली जाए। मायके आने पर उनका खुले दिल से स्वागत हो। सुख-दुख में भाई-भतीजे उनके साथ खड़े हों। बहन हमेशा मायके से ठंडी हवा के झोंके की उम्मीद करती है। लेकिन आज के दौर में ऐसा नहीं होता। अपना हिस्सा छोड़ने के बाद भी बेटी-बहन को पराया समझा जाता है। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">मायके की खुशी सुनकर बहन का दिल खुशी से भर जाता है, लेकिन भाई-भाभियां उसे बताना भी नहीं चाहते। कई बेटियां तो बच्चों वाली होकर भी भाइयों के हक में बयान दे देती हैं। कथित लालची भुआ के इस त्याग की कोई कदर नहीं करता। इसे भाई-भतीजे अपना हक मानते हैं। फिर भी लोहड़ी-दिवाली पर वह मायके से मिठाई के डिब्बे की राह देखती है। करोड़ों की जायदाद त्यागने वाली बेटियों-बहनों की यह दशा आज आम हो गई है। दुनिया के नजरिए से भुआ का यह त्याग बहुत बड़ा है, लेकिन फिर भी उसकी कोई कदर नहीं करता। मेरे हिसाब से भुआ का रिश्ता सबसे ऊँचा है। हमारी अमीरी में भुआ का हिस्सा और उसकी दुआएँ बोलती हैं। कोई सुने या न सुने। Literature<br />
<strong>                                                                                                                -रमेश सेठी बादल</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 15:19:39 +0530</pubDate>
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                <title>Literature: दस रुपये की जिंदगी</title>
                                    <description><![CDATA[जीवन चलने का नाम Literature: कई साल पहले मैं दिल्ली के एक व्यस्त मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था, अपने नए रिज्यूमे को अंतिम रूप देने में व्यस्त। तभी एक छोटी-सी घटना ने मेरे जीवन का नजरिया बदल दिया। एक 8-9 साल की बच्ची, मैले-कुचैले कपड़ों में, मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/ten-rupees-life/article-69946"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-04/literature-1.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">जीवन चलने का नाम</h3>
<p style="text-align:justify;">Literature: कई साल पहले मैं दिल्ली के एक व्यस्त मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था, अपने नए रिज्यूमे को अंतिम रूप देने में व्यस्त। तभी एक छोटी-सी घटना ने मेरे जीवन का नजरिया बदल दिया। एक 8-9 साल की बच्ची, मैले-कुचैले कपड़ों में, मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ बोले अपना हाथ फैलाया, नन्हें हाथों में एक फटी-सी किताब थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मैंने जल्दी से जेब टटोली और दस रुपये का नोट निकालकर उसे दे दिया। वह बच्ची उस नोट को लेकर वहीं खड़ी रही। फिर अचानक उसने नोट मुझे लौटा दिया! ‘नहीं भैया, मुझे पैसे नहीं चाहिए, उसने मासूमियत से कहा, मैं तो बस ये पूछना चाहती थी कि क्या आप इस किताब को पढ़कर मुझे समझाएंगे?’ उसने अपने पुराने बैग से एक फटी हुई किताब निकाली- ‘प्राथमिक हिंदी’। ट्रेन का समय कम बचा था।</p>
<p style="text-align:justify;">जितना समय था, उसमें मैंने उसे वर्णमाला के कुछ शब्द पढ़वाए और नजदीकी स्कूल में रोज पढ़ने की सलाह दी। जिस दिन मैंने असली शिक्षा का मतलब समझा-वह बच्ची- जिसका नाम पूजा था- रोज मेट्रो स्टेशन पर आकर लोगों से पढ़ने में मदद मांगती थी। उसके माता-पिता कूड़ा बीनते थे, लेकिन उसकी पढ़ाई के लिए हर संभव कोशिश कर रहे थे। मेरी टीचर ने कहा है, पूजा ने गर्व से बताया, एक दिन मैं बड़ी होकर टीचर बनूंगी और गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाऊंगी!</p>
<h3 style="text-align:justify;">तीन सबक जो एक बच्ची ने सिखाए | Literature</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">शिक्षा की भूख सबसे ताकतवर होती है: जब आप सचमुच कुछ सीखना चाहते हैं, तो संसाधनों की कमी रास्ता नहीं रोकती।</li>
<li style="text-align:justify;">गरिमा दान में नहीं, स्वाभिमान में होती है। पूजा ने पैसे नहीं, ज्ञान मांगा।</li>
<li style="text-align:justify;">सबसे बड़ा दान है समय: उस दिन से मैं अपने दोस्तों को हर रविवार गरीब बस्तियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करता हूँ।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">कहानी का अंत नहीं, शुरूआत है। आज पूजा उसी सरकारी स्कूल में पढ़ती है, जहां मेरा दोस्त स्वेच्छा से पढ़ाता है। उसके माता-पिता अब कूड़ा नहीं बीनते, बल्कि हमारे छोटे-से सामुदायिक केंद्र में काम करते हैं। कभी-कभी जिंदगी आपको दस रुपये में ऐसा सबक दे देती है, जो करोड़ों में भी नहीं मिलता। आपके आस-पास भी कोई पूजा हो सकती है। क्या आप उसकी मदद के लिए तैयार हैं? याद रखिए, बदलाव की शुरूआत हमेशा एक छोटे-से कदम से होती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>                                                                                         एन. डी. बारहठ, लेखक एवं स्तंभकार</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="…समय का सही प्रबंधन करना ही बच्चों के लिए सफलता की कुंजी" href="http://10.0.0.122:1245/proper-time-management-is-the-key-to-success-for-children/">…समय का सही प्रबंधन करना ही बच्चों के लिए सफलता की कुंजी</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Apr 2025 15:35:48 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Literature: डर लगता है कि कहीं कोई प्याज की सब्जी को नजर न लगा दे&amp;#8230;.</title>
                                    <description><![CDATA[Literature: हमारे गांव में मेरे पड़ोस में एक औरत रहती थी जिसका नाम निक्की था। हम उसे चाची निक्की कहते थे। असल में मेरे मम्मी-पापा उसे चाची कहते थे, और उनकी देखादेखी हम भी उसे चाची ही कहने लगे थे। उसके तीन बेटे थे, जिनमें सबसे छोटा कोई पांच साल का था। चाची लोगों का […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/onion-vegetable/article-69365"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-04/literature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Literature: हमारे गांव में मेरे पड़ोस में एक औरत रहती थी जिसका नाम निक्की था। हम उसे चाची निक्की कहते थे। असल में मेरे मम्मी-पापा उसे चाची कहते थे, और उनकी देखादेखी हम भी उसे चाची ही कहने लगे थे। उसके तीन बेटे थे, जिनमें सबसे छोटा कोई पांच साल का था। चाची लोगों का सूत कातकर, रजाइयां गाँठकर या छोटे-मोटे काम करके गुजारा करती थी। कभी-कभी वह हमारे चूल्हे, तंदूर या आंगन को भी लीप देती थी। मेरी मां उसके पास से खेस भी बनवाती थी। वह अक्सर चरखे पर बैठी रहती थी। कई बार आस-पड़ोस की औरतें उसे अपने साथ दीवारें लीपने के लिए ले जाती थीं। सर्दियों में वह कभी-कभी किसी के कपास या नरमा चुनने चली जाती थी। इससे उसे चार पैसे मिलते थे और वह घर का खर्च चलाती थी। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">वह मिर्च, मसाला, हल्दी, नमक और सरसों का तेल हमेशा जरूरत के हिसाब से ताजा ही लाती थी और फिर सब्जी बनाती थी। वह इतना तेल लाती थी, जिससे दो या तीन दिन की सब्जी बन जाती। डलियों वाला नमक, साबुत लाल मिर्च, धनिया और हल्दी, जिसे वह वसार कहती थी, को कूँडे में कूटकर सब्जी तैयार करती थी। मैं देखता था कि वह बिना प्याज के ही सब्जी बनाती थी, क्योंकि प्याज भी पैसे से आता था। लहसुन, अदरक और टमाटर डालने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। फिर भी, मुझे उनकी सब्जी देखने में स्वादिष्ट लगती थी। मैं चाहकर भी उस सब्जी का स्वाद नहीं ले पाता था। कभी-कभी वह सिर्फ प्याज की सूखी सब्जी बनाती थी। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">उसे देखकर मेरा मन करता था कि खा लूँ, लेकिन वहां मैं मजबूर हो जाता था। घर आकर मैं अपनी माँ से कहता कि वैसी ही सब्जी बनाएँ, लेकिन मेरी माँ सरसों के तेल की जगह देसी घी, अदरक, लहसुन और प्याज डाल देती थी। वह सब्जी वैसी नहीं बनती थी। मैं रोटी नहीं खाता था। मेरी माँ मुझे डाँटती थी और कभी-कभी हल्का हाथ भी चला देती थी। सेठों का परिवार होने के कारण हम उनसे सब्जी भी नहीं माँग सकते थे। बल्कि कई बार वह मेरी माँ से सब्जी की कटोरी ले जाती थी या मेरी माँ खुद ही उन्हें सब्जी दे देती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर एक बार मैं मंडी में एक फिल्म देखकर आया। शायद उस फिल्म का नाम ‘राजा और रंक’ था। उस फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। मेरे मन में उस देसी सब्जी और बड़ी-बड़ी अनछुई चीजें खाने की लालसा बढ़ती गई। लेकिन अब हम घर में सरसों का तेल ही इस्तेमाल करते हैं। मैं अक्सर वैसी सब्जियां बनवा लेता हूँ। आज बच्चों की माँ से मैंने सिर्फ प्याज की सब्जी खाने की इच्छा जाहिर की। उसने तुरंत काम शुरू कर दिया। डर लगता है कि कहीं कोई प्याज की सब्जी को नजर न लगा दे।<br />
<strong>                                                                                                                 – रमेश सेठी बादल</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Snake: सांपों के लिए हैं ये लक्ष्मण रेखा, घर पर छिड़क दें ये बीज, घुसने से डरेगा सांप" href="http://10.0.0.122:1245/lakshman-rekha-for-snakes/">Snake: सांपों के लिए हैं ये लक्ष्मण रेखा, घर पर छिड़क दें ये बीज, घुसने से डरेगा सांप</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 06 Apr 2025 15:44:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Literature : मोतीलाल का किशोर बेटा जब घर से निकल गया तो&amp;#8230;!</title>
                                    <description><![CDATA[पीलीबंगा, हनुमानगढ़ (निशांत)। मोतीलाल का किशोर बेटा जब घर से निकल गया तो मोतीलाल की पत्नी निर्मला को इतना शोक लगा कि वह बुक्का फाड़कर और माथा पीट-पीटकर रोने लगी। अड़ोसी-पड़ोसी दौड़े आए और धीरज बंधाने लगे- कोई बानही, बबलू घर से ही तो गया है दो चार दिन में लौट आएगा। Literature हाय रे! […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/vichar/when-motilals-teenage-son-left-home/article-57980"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/litreture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>पीलीबंगा, हनुमानगढ़ (निशांत)।</strong> मोतीलाल का किशोर बेटा जब घर से निकल गया तो मोतीलाल की पत्नी निर्मला को इतना शोक लगा कि वह बुक्का फाड़कर और माथा पीट-पीटकर रोने लगी। अड़ोसी-पड़ोसी दौड़े आए और धीरज बंधाने लगे- कोई बानही, बबलू घर से ही तो गया है दो चार दिन में लौट आएगा। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">हाय रे! न जाने वह किस हाल में होगा? किसके हत्थे चढ़ गया मेरा लाल, न जाने कोई उसके साथ क्या करेगा? सुना है, बड़े शहरों में लोग, आदमी के अंग निकाल कर बेच देते हैं।<br />
उसे कुछ नहीं होगा। वह पढ़ा लिखा है। समझदार है। अपनी भलाई देखेगा, वहीं रहेगा। हम उसे खोज निकालेंगे। तुम थोड़ा धैर्य रखो।<br />
इस तरह से समझा-बुझाकर लोगों ने निर्मला को कुछ शांत किया। फिर तलाश शुरू हुई। सबसे पहले उसके मित्र-दोस्तों के घर फोन से पता किया। फिर दूर-निकट के रिश्तेदारों से फोर से पूछा। किसी ने उसकी कोई खबर नहीं दी। सबने वही कहा-हमारे यहां तो नहीं आया।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसे-जैसे पता चला, मोतीलाल के घर चला आया। सयानोें के भाव बढ़ गए। जो चोरी माल का या किसी गुमशुदा का पता बता दें, उसे इधर ‘सयाना’ कहा जाता है। एक के पास गए तो उसने देवी मां की जोत के लिए दो-ढाई सौ का सामान और देवी मां का एक सूट मंगवाया। जोत करके आखे देखे। बताया कि तुम्हारा लड़का ज्यादा दूर नहीं गया है। उत्तर-पूर्व के कोने में जो सड़क आती है, उस पर पांचवे गांव में गया है। गांव का नाम अ अक्षर से शुरू होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीप भर कर आदमी उस गांव गए। गांव के सब रास्तों को रोका कि हमारे आने का पता लगने पर कहीं खिसक न जाए। शेष बचे आदमी गांव की गलियों और गुवाहड़ में उसे खोजने निकले। गांव में एक जगह दस-पन्द्रह लोग ताश पीट रहे थे। उनसे हुलिया बताकर पूछा। उनमेें से एक ने कहा-हां! भाई इस तरह का एक लड़का गांव की ओर आते तो मैंने देखा था। ढृूंढने वालों का विश्वास और भी पक्का हो गया कि हो न हो ‘सयाने’ की बात सच है और लड़का इसी गांव मेें छिपा है।</p>
<p style="text-align:justify;">फोन करके कस्बे से आदमी और बुलाए गए। अड़ोसी-पड़ोसियों की एक जीप और भरकर गई। पहरा और कड़ा किया गया। शाम के समय मंदिर के स्पीकर मेें आवाज लगा दी गई कि अपरिचित लड़के को देखें तो हमें सूचित करें। रात भर आदमी उस गांव की गलियों की खाख छानते रहे। लेकिन लड़का न मिला। सुबह थक हार कर के वापिस लौट आए। ‘सयाने’ के पास गए ‘सयाना’ अपनी हार मानने वाला कहां था? उसने जोर देकर कहा- लड़का उस गांव मेें जरूर गया है। तुम्हारे हाथ नहीं लगा तो जरूर वह तुम्हारे जाने से पहले वहां से आगे निकल गया। हां! गया वह उसी दिशा में है। घर वालों को ‘सयाने’ की बात का फिर विश्वास हो गया। उन्होंने मन ही मन कहा- उस गांव का एक आदमी भी तो कह रहा था कि हां! इस शक्ल-सूरत का एक लड़का इस गांव की ओर आ रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">मोतीलाल और उसके साथी फिर उस दिशा के दूसरे गांवों मेें गए। चार-पांच दिनों तक उधर कई गांवो की खाक छानी। लड़का न मिला। किसी समझदार ने उन्हें सलाह दी कि थाने में रिपोर्ट तो दर्ज करवाओ। ऐसे कामों में पुलिस वाले बड़े उस्ताद होते हैं। लड़कों को भगाकर ले जाने वाले कई गिरोहों का उन्हें पता होता है। वे थाने गए। थाने वालों ने उन्हें डांटा- इतने दिन क्या करते रहे?</p>
<p style="text-align:justify;">‘ढूंढते रहे।’ ‘तो जाओ अब भी ढूंढ लो।’ Literature</p>
<p style="text-align:justify;">वे कई देर तक मुंह लटकाए खड़े रहे तो पुलिस वालों ने बेमन से झूठी-सच्ची रिपोर्ट लिख ली।<br />
घर आने पर उन्हें पता चला कि पड़ोस के मंदिर में एक बूढ़ी पुजारिन आई हुई है। बड़ी पहुंची हुई महिला है। कस्बे की एक डूबी हुुई आसामी को उसने मालामाल कर दिया। वह आसामी अब उसका बड़ा मान-तान करती है। उन्हीं के बुलावे पर वह अपने आश्रम से चलकर, साल में एक-दो बार यहां आती है। ठहरती यहां मंदिर में ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोतीलाल की पत्नी निर्मला अपने साथ एक अन्य स्त्री को लेकर उसके पास पहुंची। लड़के के घर से निकलने की बात कही। महिला ने थोड़ा ध्यान लगाकर कहा- कोई बात नहीं। मैं तुम्हे एक जाप देती हूं, उसका आप घर में बैठकर सात दिन तक दोहराते रहो। भगवान ने चाहा तो आपका लड़का आठवें दिन घर आ जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनकर निर्मला ने सोचा- जाप यह महिला ही करे तो और अधिक उपयुक्त रहेगा क्योंकि जाप इसी का है और उसी के आराध्य देव का है। हमसे पता नहीं वह प्रसन्न हो या न हो? इसलिए उसने अपना भय महिला के सामने प्रकट किए- माई, यह जाप आप स्वयं ही करें। हमसे जाप में कोई कोर-कसर रह सकती है।<br />
‘वह तो है ही। एक सांसारिक मनुष्य में और एक साधु पुरुष में फर्क तो है ही।’</p>
<p style="text-align:justify;">‘तो फिर आप खुद ही चलकर हमारे घर पर जाप करो।’ बुढ़िया घर के एक कोने में, अपने ईष्ट देव की मूर्ति के आगे धूप-दीप जलाकर जाप करने बैठ गई। जाप का उच्चारण वह बहुत धीरे करती थी। बस जाप की फुसफुसाहट मात्र होती थी। ऊंची आवाज में जाप होता भी कैसे? बात सात दिन की थी। कोई पांच-सात मिनट की तो थी नहीं। बुढ़िया की धूप-दीप की थाली में, घर वालों ने सौ रुपए चढ़ा दिए थे। उन्हें देखकर जो भी घर में सान्तवना प्रकट करने आता, दस-बीस रुपए चढ़ाकर जाता। लोग कहते थे कि जिस आसामी को इसने मालामाल किया है उसने बुढ़िया को खूब दान किया है। लेकिन उसकी दुबली-पतली काया और पुराने-सुराने पहनावे को देखकर तो वह कंगाल ही लगती थी। कहने का मतलब यही कि वह बात न थी कि उसे रुपयों-पैसों की कोई परवाह नहीं थी। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">पांचवे दिन महिला के पास उसका एक मरियल सा चेला आया। उसने उसे कोई संदेश दिया। महिला ने घरवालों से कहा कि महात्मा ने मुझे बुलाया है। मैं तो जाती हूं। अब जाप आप खुद ही करते रहना। इतना कहकर जाप के बोल घरवालों को बताकर वह वहां से खिसक चली गई।</p>
<p style="text-align:justify;">घर वाले कई दिन तक जाप करते रहे। एक दिन थक गए तो बंद कर दिया। बीच में ‘सयानों’ की तलाश भी चलती रही। जो भी बताता कि फलां ‘सयाना’ बड़ा पहुंचा हुआ है। वहीं पहुंच जाते। चढ़ावा चढ़ाते और लड़के का पूछते। कोई ‘सयाना’ उन्हें बच्चे के सही सलामत लौट आने की बात कहता। कोई कहता कि वह मुसीबत में है। उसे उबारने के लिए जाप करवाओ। घरवाले जाप के लिए चढ़ावा लाकर देते। ‘सयाना’ जाप करता लेकिन लड़का घर न आया। किसी ने उन्हें कहा कि सात दिन लगातार उल्टा चरखा चलाओ। इस प्रकार करने से लड़का उल्टा लौट आएगा। लड़के की मां-दादी और बहनों ने यह भी किया। लेकिन लड़का घर न लौटा।</p>
<p style="text-align:justify;">तीन महिने बाद उनके घर किसी अनजाने व्यक्ति का फोन आया कि क्या आपका कोई लड़का घर से भागा हुआ है? उन्होंने कहा कि हां! तो उसने आगे बताया कि आपका लड़का हमारे यहां जैसलमेर में राठौड़ फैक्ट्री में मजदूरी का काम कर रहा है। मैं इस फैक्ट्री के आगे चाय की दुकान करता हूं। वह अक्सर हमारे पास चाय पीने आता है। हमें उसकी बातचीत और पहनावे से शुरू से ही शक हो चला था। इसलिए बहला-फुसलाकर हमने उससे तुम्हारे घर का फोन नंबर लिया है। तुम आकर उसे ले जाओ। घर वाले गए और उसे ले आए। शायद लड़का वहां स्वयं तंग आ गया था। उसने स्वयं ही चाय बनाने वाले के घर से फोन करने के लिए कहा था। घर आकर लड़के ने बताया कि वह रात की गाड़ी से ही जैसलमेर के लिए निकल पड़ा था। जैसलमेर को जाने वाली गाड़ी उस दिशा के ठीक विपरीत जाती थी। जिस दिशा में ‘सयाने’ ने लड़के के जाने की बात कही थी। Literature</p>
<p><a title="Australia: पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में कुछ इस अंदाज में मनाया MSG सत्संग भंडारा!" href="http://10.0.0.122:1245/msg-satsang-bhandara-celebrated-in-this-style-in-perth-australia/">Australia: पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में कुछ इस अंदाज में मनाया MSG सत्संग भंडारा!</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 May 2024 17:57:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>बंद मुट्ठियों की दास्तां</title>
                                    <description><![CDATA[हम छुट्टी वाले दिन बाहर घूमने चले जाते। उस लड़के के साथ अनेक जगहों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गोवा आदि राज्यों के शहरों में भ्रमण किए। …गतांक से आगे जज यह सब कुछ सुन कर आश्चर्य में पड़ गए तथा उन्होंने बहुत सोच विचार के पश्चात कहा, ‘‘बेटी सुनो, तस्कर (स्मगलर) लोग किसी के भी सगे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/tales-of-clenched-fists/article-50119"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/literature.gif" alt=""></a><br /><h5>हम छुट्टी वाले दिन बाहर घूमने चले जाते। उस लड़के के साथ अनेक जगहों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गोवा आदि राज्यों के शहरों में भ्रमण किए।</h5>
<p style="text-align:justify;">…गतांक से आगे जज यह सब कुछ सुन कर आश्चर्य में पड़ गए तथा उन्होंने बहुत सोच विचार के पश्चात कहा, ‘‘बेटी सुनो, तस्कर (स्मगलर) लोग किसी के भी सगे नहीं होते। इनको खुद का पता नहीं होता कि अगले पल उनके साथ क्या होने वाला है? यह लोग पुलिस के साथ उतनी देर आँख मिचौली खेलते हैं, जब तक यह गिरफ्तार नहीं हो जाते। इनका भविष्य एक ऐसी गुफा है जिससे निकलने का कोई रास्ता ही नहीं होता। इनको आखिर हथियार फेंकने पड़ते हैं। इन लोगों में प्यार, विश्वास, संस्कार, इकरार नाम की कोई चीज नहीं होती। यह तो मौत का धागा बांध कर इस तरह के कार्य करते हैं। आज बरी (बहाल) हो जाएगा तो फिर किसी-न-किसी दिन शिकंजे में फंस जाएगा। यह लोग तो अपने घर वालों के साथ भी धोखा करते हैं। प्यार की परिभाषा क्या है? इनसे कोसों मील दूर है। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल इनके प्यार के ऊपर वाले हिस्से में शहद तथा नीचे वाले हिस्से में खतरनाक जहर होता है सांप की भांति। देखो, माता-पिता की अनुमति के बगैर कभी भी शादी नहीं करनी चाहिए। अपनी मिट्टी के परम्परावादी संस्कारों से जुड़े रहना सभ्याचारक इंसानियत होती है। बेटी तस्कर (स्मगलर) लोगों पर कभी भी भरोसा नहीं करना चाहिए। ये किसी भी वक्त मौत के मुंह में जा सकते हैं। ये लोग बड़े लोगों के इशारों पर काम करते हैं। एक-न-एक दिन ये पकड़े ही जाते हैं। बेटी तू कुछ समय सोच ले, अपने घर वालों से बातचीत कर ले। मेरे ख्याल में तुझे इस लड़के के साथ शादी नहीं करनी चाहिए। मेरा निजी तजुर्बा है कि इन लोगों की जिंदगी सुरक्षित नहीं होती। मैं अनेकानेक मुकदमों में ऐसे लोगों को सजा सुना चुका हूं। ये लोग सारी उम्र के लिए नकारा हो जाते हैं। यह लोग न घर के न बाहर के रहते हैं।’’ Literature</p>
<p style="text-align:justify;">डाक्टर साहिब मैं बजिद हो गई तथा जज साहिब को तरले-मिन्नते करते हुए कहा, ‘‘सर मैं बहुत दूर निकल चुकी हूँ , अब वापस नहीं आ सकती। प्लीज सर हेल्प मी, सर मैं सारी उम्र आप का एहसान नहीं भुलूंगी। सर, जहां तक घरवालों (माता-पिता) का सवाल है, सर मैं पढ़ी लिखी हूँ। खुद कमाती हूँ, मुझे अपने भविष्य के बारे में अच्छे बुरे फैसले लेने का पूरा हक है। सर, औरत को भी अपनी मर्जी से जीने का अधिकार होना चाहिए। जज साहब ने मजबूर होकर कहा, ‘‘अच्छा बेटी अगर तुम इतनी ही दूर चली गई हो। अगर पक्का मन बना ही लिया है तो फिर कुछ तारीखों के बाद उसको बरी कर दूंगा, परन्तु तुम किसी से भी यह बात नहीं कहोगी।’’ विनम्रता से सिर झुका कर जज से कहा, ‘‘थैंक्यू सर, थैंक्यू वेरी मच सर।’’ Literature</p>
<p style="text-align:justify;">मैं खुशी से फूली नहीं समा रही थी। ड्यूटी के बाद शाम को मैं उस लड़के से मिली और उसे सारी बात बता दी और उसे हिदायत की कि तू किसी से यह बात नहीं करेगा। लड़का बहुत खुश हुआ। हम नई जिंदगी के बारे कई हसीन सपने देखने लगे। भविष्य की अनेक योजनाओं का चित्रण कर लिया। हम छुट्टी वाले दिन बाहर घूमने चले जाते। उस लड़के के साथ अनेक जगहों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गोवा आदि राज्यों के शहरों में भ्रमण किए। भ्रमण का सारा खर्च वह लड़का ही करता था, हम दोनों बहुत खुश थे। एक दिन जज ने मुझे बुला कर कहा, ‘‘देखो बेटी, दो दिनों के पश्चात मैं इस लड़के को बरी कर दूंगा तथा तुम खुशी खुशी शादी कर लेना।’’ Literature</p>
<p style="text-align:justify;">लड़के ने मुझे कहा कि जिस दिन मैं बरी हो जाऊंगा मैं तुझे 5 बचे के बाद तेरी ड्यूटी के बाद, बस स्टैंड के बाहर एक स्तम्भ के नीचे मिलूंगा तथा वहां से फिर हम गाड़ी में बैठकर चले जाएंगे।’’ उसने मेरे साथ समय व स्थान निश्चित कर लिया। निश्चित समय वाले दिन जज ने लड़के को बरी कर दिया। लड़का मुझे कोर्ट में इशारा कर के चला गया। मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। जैसे विजयी सपनों के पंखों से मैं उड़ती जाऊं। डाक्टर साहिब मैं पांच से पहले ही बस स्टैंड के सामने उस स्तम्भ के नीचे जाकर खड़ी हो गई। अनेक तरंगे, उमंगे, चाव, उम्मीदों से मेरा दिमाग खुशियों से भर गया। जैसे सारा संसार मेरे कदमों के नीचे आ गया हो। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे परमात्मा ने मेरी मुँह मांगी मुराद पूरी कर दी हो। खुशी में पागल सी होती जा रही थी। सच डाक्टर साहिब जब सपने हकीकत में साकार होते हैं तो मनुष्य जन्नत की तो क्या भगवान की परवाह नहीं करता। मैं उस स्तम्भ के नीचे खड़ी उसका बेसब्री से स्थिर दृष्टि लगा कर इंतजार कर रही थी। पांच बज गए, छह बज गए। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं। परन्तु जज साहिब के कहे शब्द कानों में गूंजने लगे। एक भय सारे शरीर में अग्नि की लहर बन कर दौड़ने लगा। एकदम ठंडा पसीना आने लगा। डाक्टर साहब मैं कई घण्टे वहां उसका इंतजार किया, वह नहीं आया। अब मुझे पूरा यकीन हो गया कि उसने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। मैं क्रोध में आकर दोनों मुट्ठियां जोर जोर से स्तम्भ पर मारती गई, बस, डाक्टर साहिब तब से यह दोनों मुट्ठियां बंद हैं, खुलती नहीं।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>बलविन्द्र बालम गुरदासपुर, ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब) </strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जो काम नहीं आता, उसे करने का दिखावा नहीं करना चाहिए" href="http://10.0.0.122:1245/pigeon-story/">जो काम नहीं आता, उसे करने का दिखावा नहीं करना चाहिए</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/tales-of-clenched-fists/article-50119</link>
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                <pubDate>Mon, 17 Jul 2023 16:35:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>साहित्य: अमरलोक</title>
                                    <description><![CDATA[एक दिन एक नौजवान बोला, ‘‘मुझे यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगती कि हर किसी को एक न एक दिन मरना ही पड़ता है। मैं ऐसी जगह की खोज करूँगा जहाँ कोई कभी नहीं मरता।’’ वह अपने माता-पिता, सगे-संबंधियों सबसे विदा लेकर चल पड़ा अमरलोक की खोज में! वह हर मिलने वाले से अमरलोक की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/literature-amarlok/article-40539"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-12/literature-amarlok.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक दिन एक नौजवान बोला, ‘‘मुझे यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगती कि हर किसी को एक न एक दिन मरना ही पड़ता है। मैं ऐसी जगह की खोज करूँगा जहाँ कोई कभी नहीं मरता।’’<br />
वह अपने माता-पिता, सगे-संबंधियों सबसे विदा लेकर चल पड़ा अमरलोक की खोज में!<br />
वह हर मिलने वाले से अमरलोक की राह पूछता, दिनों, महीनों चलता रहा पर उसे कोई ऐसा न मिला जो उसे सही राह दिखा पाता।</p>
<p style="text-align:justify;">दिखाता भी कैसे?<br />
चलते-चलते एक दिन, हाथगाड़ी धकेलता एक वृद्ध, जिसकी सफेद दाढ़ी उसकी छाती तक लटक रही थी, उसे मिला। युवक ने उससे पूछा, ‘‘क्या तुम मुझे उस स्थान का रास्ता बता सकते हो जहाँ कोई कभी नहीं मरता?’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘क्या तुम मरना नहीं चाहते? तो मेरे साथ लगे रहो। जब तक मैं इस पूरे पहाड़ को पत्थर-पत्थर में तोड़कर, ढ़ो नहीं डालता, तुम नहीं मरोगे।’’<br />
‘‘इसे समतल करने में आपको कितना समय लगेगा?’’<br />
‘‘कम से कम सौ साल’’<br />
‘‘और इसके बाद मैं मर जाऊँगा?’’<br />
‘‘शायद ऐसा ही हो।’’<br />
‘‘नहीं यह जगह मेरे लिए नहीं है, मैं ऐसी जगह जाऊँगा, जहाँ कभी कोई नहीं मरता!’’<br />
बूढ़े को राम-राम कहकर युवक आगे बढ़ गया। कोसों-मीलों चलने के बाद उसे एक जंगल दिखाई पड़ा, जिसका अंत दिखलाई ही नहीं पड़ता था। अंदर घुसने पर जंगल में उसे एक बूढ़ा दिखाई दिया। उसकी सफेद दाढ़ी नाभी तक लटक रही थी। उसके हाथ में एक लग्गी थी, जिसमें हंसुआ लगा था। वह पेड़ों की छोटी-छोटी टहनियों की छँटाई कर रहा था। जवान ने उससे भी पूछा, ‘‘बाबा क्या आप मुझे वह राह बता सकते हैं, जो अमर लोक को जाती है? मैं मरना नहीं चाहता।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘तुम मेरे साथ ही रहो’’, बूढ़े ने कहा, ‘‘जब तक मैं सारे जंगल के पेड़ों की छँटाई ना कर लूँ, तुम नहीं मारोगे।’’<br />
‘‘यह कितने वक़्त में हो पाएगा?’’<br />
‘‘कौन जाने? शायद दो सौ साल लग जाएँ।’’<br />
‘‘और उसके बाद, मुझे मरना ही होगा?’’<br />
‘‘बिल्कुल दो-सौ साल क्या कम हैं?’’<br />
‘‘तब तो मैं नहीं रुकूँगा। मैं ऐसी जगह जाना चाहता हूंँ, जहाँ कभी मरना नहीं होगा।’’<br />
वृद्ध को अलविदा कह कर युवक आगे बढ़ गया। कुछ महीनों की यात्रा के बाद वह सागर तट पर पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि एक बूढ़ा बैठा हुआ एक बत्तख को पानी पीते देख रहा है, दाढ़ी उसकी सफेद है और घुटनों तक झूल रही है।<br />
‘‘क्या आप मुझे ऐसी जगह का पता बता सकते हैं, जहाँ कोई कभी मरता नहीं?’’<br />
‘‘यदि तुम मरने से डरते हो तो मेरे साथ आ बैठो, वह बत्तख देखते हो, जब तक यह समुद्र का सारा पानी पी नहीं लेती, तब तक तुम्हें मरने का कोई खतरा नहीं है।’’<br />
‘‘ऐसा कब तक हो पाएगा ?’’<br />
‘‘हो सकता है तीन सौ साल लग जाएँ’’<br />
‘‘उसके बाद मैं मर जाउँगा?’’<br />
‘‘तुम और क्या चाहते हो? आखिर तुम कितना जीना चाहते हो?’’<br />
‘‘नहीं-नहीं यह जगह मेरे लिए नहीं है। मैं ऐसी जगह जाना चाहता हूंँ, जहाँ मुझे कभी मरना ही ना पड़े।’’<br />
जवान अपनी खोज में फिर चल पड़ा।<br />
आखिरकार एक शाम वह एक भव्य महल के सामने आ खड़ा हुआ। द्वार खटखटाया, और एक बूढ़े ने द्वार खोल दिया। उस बूढ़े की दाढ़ी पैरों तक लटक रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘क्या चाहते हो युवक?’’<br />
‘‘मैं ऐसी जगह की तलाश में हूंँ, जहाँ कोई नहीं मरता।’’<br />
‘‘बहुत अच्छा हुआ, वह जगह तुम्हें मिल गई है। यह वही जगह है, जहाँ कोई कभी नहीं मरता। मैं शर्त लगा कर कहता हूंँ कि जब तक तुम मेरे साथ रहोगे, नहीं मरोगे।’’<br />
‘‘हे भगवान! कितना चलकर मैं यहाँ आ पाया हूंँ! यह वही ‘अमरलोक’ है जिसकी खोज में मैं भटक रहा था। लेकिन मैं तुम पर बोझ तो नहीं बनूंँगा?’’<br />
‘‘बिल्कुल नहीं! मैं यहाँ एकाकी हूँ, तुम्हारा साथ पाकर अतिप्रसन्न रहूंँगा।’’<br />
और … वह जवान उस वृद्ध के साथ एक राजा की तरह रहने लगा। दिन इतने आनंद से और इतने वेग से बीत रहे थे कि वह समय की गणना ही भूल गया।<br />
अचानक एक दिन उसने वृद्ध से कहा, ‘‘इस जगह से अच्छी कोई दूसरी जगह नहीं है। फिर भी एक बार मैं अपने परिवार से कुछ देर के लिए मिलना चाहता हूंँ। अक़्सर सोचता हूंँ, उन लोगों के बारे में कि वे लोग कैसे होंगे।’’<br />
‘‘किस परिवार की बात कर रहे हो? वे सब के सब तो कब के मर-खप चुके हैं।’’<br />
‘‘फिर भी, मैं एक बार अपने जन्मस्थान जाना चाहता हूंँ, हो सकता है, मेरे संबंधियों के नाती-पोते-परपोते वहाँ मुझे मिल जाएँ!’’<br />
‘‘यदि तुम जाना ही चाहते हो, तो मेरी बातें ध्यान से सुनो, अस्तबल में जाओ और मेरा सफेद घोड़ा ले लो। वह वायु-वेग से चलता है। ध्यान रहे, जब एक बार उस पर सवार हो जाओगे तो उससे हरगिज-हरगिज न उतरना! अगर उतरे तो उसी क्षण तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।’’<br />
‘‘चिंता न करें, मैं काठी से कभी नहीं उतरूँगा! आपको तो मालूम ही है कि मुझे मरने के विचार तक से घृणा है।’’<br />
वह अस्तबल में गया, सफेद घोड़े पर काठी लगाई और सवार हो गया। और हवा की तरह यह जा-वह जा …<br />
कुछ ही क्षणों में वह उस जगह जा पहुँचा जहाँ उसे एक बूढ़ा बत्तख के साथ दिखाई दिया था। जहाँ कभी सागर लहरा रहा था, वहाँ घास का लहलहाता मैदान था। किनारे पर हड्डियों का एक छोटा सा ढेर देखकर वह मन ही मन बोला, ‘‘बेचारा बुड्ढा!</p>
<h3 style="text-align:justify;">अच्छा हुआ, मैं यहाँ नहीं रुका, नहीं तो मैं भी हड्डियों का ढेर ही होता अब तक।’’</h3>
<p style="text-align:justify;">वह आगे बढ़ा तो उस जगह पहुँचा, जहाँ कभी जंगल था और कोई बूढ़ा आदमी पेड़ों की छँटाई कर रहा था। वहाँ अब एक भी पेड़ नहीं था। जमीन रेगिस्तान बन चुकी थी। युवक ने सोचा, ‘‘यदि मैं यहाँ रुका होता तो उस वृद्धात्मा की तरह मैं भी न जाने कब का संसार से जा चुका होता।’’<br />
कुछ ही क्षणों में वह वहाँ जा पहुँचा जहाँ कभी ऊँचा पर्वत था, जिसे एक बूढ़ा पत्थर ढ़ो-ढोकर समतल कर रहा था। वह धरती अब चिकनी और सपाट थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">‘‘यहाँ रुका होता तो भी मेरा कुछ भला ना होता।’’</h3>
<p style="text-align:justify;">वह चलता रहा-चलता रहा-चलता रहा। अंत में अपने कस्बे में जा ही पहुँचा। पर यह क्या!! यहाँ तो सब कुछ इतना बदल चुका था कि पहचानना कठिन था। उसके मकान की तो बात ही क्या, वह गली और मोहल्ला भी नदारद था! उसने अपने परिजनों का पता जानना चाहा, लेकिन वहाँ तो लोगों ने तो उसके परिवार का नाम तक कभी न सुना था, सब खत्म हो चुका था। उसने तुरंत वापस लौटने का फैसला कर लिया। घोड़े की रास मोड़ी और लौट पड़ा। अभी वह आधे रास्ते ही गया होगा कि देखा, एक बूढ़ा आदमी जूतों से भरी बैलगाड़ी हाँक रहा है, ‘‘बाबूजी,’’ गाड़ीवान ने कहा, ‘‘थोड़ी दया करिए। मेरी गाड़ी का पहिया कीचड़ में धँस गया है, जरा सा हाथ लगा दीजिएगा तो मेरे बैलों को सहारा मिल जाएगा।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘मैं जल्दी में हूंँ, घोड़े से उतर नहीं सकता,’’ युवक बोला।<br />
‘‘गरीब पर दया करो बाबू! मैं यहाँ अकेला हूंँ, ऊपर से रात भी होने वाली है। मैं दुखियारा हूँ।’’<br />
वृद्ध की दशा देख, युवक का दिल पसीज गया। वह घोड़े से उतर पड़ा। अभी उसका एक पैर रकाब में ही था कि गाड़ी वाले ने उसकी बाँह पकड़कर खींची और बोला, ‘‘आखिर आज तुम मिल ही गए! जानते हो मैं कौन हूंँ? मैं मृत्यु हूंँ। इस गाड़ी में भरे ये पुराने-फटे जूते देख रहे हो? यह सब तुम्हारा पीछा करने में दौड़ते हुए फटे हैं! अब जाकर तुम मेरे हत्थे चढ़े हो, मुझसे कभी कोई नहीं भाग सकता!’’</p>
<p style="text-align:justify;">वृद्ध की दशा देख, युवक का दिल पसीज गया। वह घोड़े से उतर पड़ा। अभी उसका एक पैर रकाब में ही था कि गाड़ी वाले ने उसकी बाँह पकड़कर खींची और बोला, ‘‘आखिर आज तुम मिल ही गए! जानते हो मैं कौन हूंँ? मैं मृत्यु हूंँ। इस गाड़ी में भरे ये पुराने-फटे जूते देख रहे हो? यह सब तुम्हारा पीछा करने में दौड़ते हुए फटे हैं! अब जाकर तुम मेरे हात्थे चढ़े हो, मुझसे कभी कोई नहीं भाग सकता!’’<br />
. . . और उस बेचारे युवक को भी मरना पड़ा जैसे सभी मरते हैं!!!                         <strong>अनुवादक : सरोजिनी पाण्डेय</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/literature-amarlok/article-40539</link>
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                <pubDate>Sun, 04 Dec 2022 14:56:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कविता: मैं किसान हूँ&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[हा मैं किसान हूँ जमीं को चीर कर अन्न उगाने वाला। खुद की पेट काट कर भी सबकी भूख मिटाने वाला। सरकार की बीमार मानसिकता का शिकार हो कर भी पेट भरने वाला आय दोगुनी का लॉलीपॉप दे कर । एक्ट ला हमें खत्म करने वाली सरकार के खिलाफ है हम न हम हिंदुस्तान के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/poem-i-am-a-farmer/article-36357"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/poem-i-am-a-farmer.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हा मैं किसान हूँ<br />
जमीं को चीर कर अन्न उगाने वाला।<br />
खुद की पेट काट कर भी<br />
सबकी भूख मिटाने वाला।<br />
सरकार की बीमार<br />
मानसिकता का<br />
शिकार हो कर भी पेट भरने वाला<br />
आय दोगुनी का लॉलीपॉप दे कर ।<br />
एक्ट ला हमें खत्म करने वाली<br />
सरकार के खिलाफ है हम<br />
न हम हिंदुस्तान के खिलाफ है<br />
न हम किसी पार्टी के खिलाफ है<br />
आज जब हम अपने हक के लिए।<br />
सड़क पर खड़े है।<br />
तो आये है कुछ लोग ऐसे भी।<br />
जो लोग हमें खालिस्तानी कहते है।<br />
कोई हमें देश के दुश्मन बता देता है<br />
तो कोई हमें पाकिस्तानी कहता है<br />
खत्म कर देते है ये लोग हमारी उम्मीदों को।<br />
भले ही तुम हमें कुछ भी कहो लेकिन<br />
हां मैं किसान हूँ।<br />
<em><strong>– नृपेन्द्र अभिषेक नृप छपरा</strong></em></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/poem-i-am-a-farmer/article-36357</link>
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                <pubDate>Sat, 06 Aug 2022 15:58:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दर्जी की सीख</title>
                                    <description><![CDATA[एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया। वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा। उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/lesson-of-tailor/article-34973"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/literature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया। वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा। उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं। फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सु ई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं। जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है? पापा ने कहा- बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो?</p>
<p style="text-align:justify;">बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों? इसका जो उत्तर पापा ने दिया- उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने जिÞन्दगी का सार समझा दिया। उत्तर था- बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है। यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं।</p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jun 2022 16:24:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरक प्रसंग: ईमानदारी का फल</title>
                                    <description><![CDATA[बहुत पहले की बात है एक राजा सुबह सुबह सैर करने के लिये महल से अकेला ही निकला। रास्ते में उसने देखा, एक किसान पसीने में तर-ब-तर अपने खेत में काम कर रहा है। राजा ने उसके पास जाकर पूछा, ‘भाई आप इतनी मेहनत करते हो, दिन में कितना कमा लेते हो ?’ किसान ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/motivational-context-of-honesty/article-34327"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/fruit-of-honesty.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बहुत पहले की बात है एक राजा सुबह सुबह सैर करने के लिये महल से अकेला ही निकला। रास्ते में उसने देखा, एक किसान पसीने में तर-ब-तर अपने खेत में काम कर रहा है। राजा ने उसके पास जाकर पूछा, ‘भाई आप इतनी मेहनत करते हो, दिन में कितना कमा लेते हो ?’ किसान ने उत्तर दिया ‘एक सोने का सिक्का।’ राजा ने पूछा ‘उस सोने के सिक्के का क्या करते हो?’ किसान ने कहा, ‘राजन ! एक चौथाई भाग मैं खुद खाता हूँ। दूसरा चौथाई भाग उधार देता हूँ। तीसरे चौथाई भाग से ब्याज चुकाता हूँ और बाकी चौथाई हिस्सा कुएँ में डाल देता हूँ।’ किसान की बात राजा की समझ में न आई। वह बोले-भाई, पहेली मत बुझाओ। साफ-साफ बताओ।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान ने मंद-मंद मुसकराकर कहा-महाराज, बात तो साफ है। पहले चौथाई भाग में से मैं अपना और अपनी औरत का पेट पालता हूँ। दूसरे चौथाई हिस्से में अपने बाल-बच्चों को खिलाता हूँ, क्योंकि बुढ़ापे में वे ही हमें पालने वाले हैं। तीसरे चौथाई भाग से मैं अपने बूढ़े माँ-बाप को खिलाता हूँ, क्योंकि उन्होंने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है। इसलिए मैं उनका ऋणी हूँ। इस प्रकार उनका ब्याज चुकाता हूँ। बाकी चौथाई हिस्से को मैं दान-पुण्य में लगा देता हूँ, जिससे मौत के बाद परलोक सुधर जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान का जवाब सुनकर राजा बहुत खुश हुए। उन्होंने किसान से कहा–मुझे तुम यह वचन दो कि जब तक तुम मेरा मुँह सौ बार न देखोगे, तब तक यह बात किसी दूसरे को न बताओगे। किसान ने राजा को वैसा ही वचन दिया। दूसरे दिन राजा का दरबार लगा। राजा ने दरबारियों के सामने यह सवाल रखा और पूछा-आप लोग मेरा सवाल ध्यान से सुनिए और इसका सही जवाब दीजिए। जो इसका सही जवाब देगा, उसे सौ सोने के सिक्के इनाम में दिए जाएँगे। अब सुन लीजिए। मेरा सवाल है-हमारे राज्य में एक किसान है। वह रोज एक सोने का सिक्का कमाता है। उसका एक चौथाई भाग वह खुद खाता है। दूसरा चौथाई भाग उधार देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तीसरे चौथाई भाग से ब्याज चुकाता है और बाकी चौथाई हिस्सा कुएँ में डाल देता है। इसका मतलब क्या है? सभी दरबारी राजा का यह सवाल सुनकर मौन रह गए। कोई जवाब न दे पाया। राजा ने सभी दरबारियों को यह पहेली सुलझाने के लिए दो दिन की मुहलत दी। राजा का एक मंत्री बड़ा ही समझदार था। उसने सोचा कि आज सुबह राजा टहलने के लिए राजधानी से बाहर गए थे, वहाँ पर राजा की मुलाकात किसी किसान से हुई होगी। यह सोचकर वह मंत्री दूसरे दिन सवेरे टहलते हुए राजधानी के बाहर चला गया।</p>
<p style="text-align:justify;">वहाँ पर नदी के किनारे खेत में वही किसान खेत जोत रहा था। मंत्री ने उस किसान के पास जाकर उस सवाल का जवाब पूछा। किसान ने कहा-मैंने राजा को वचन दिया है कि जब तक मैं राजा का मुँह सौ बार न देखूँगा, तब तक मैं इस सवाल का जवाब किसी को न बताऊँगा। इसलिए मुझे माफ कीजिए। मैं इसका जवाब आपको नहीं दे सकता। मंत्री बड़ा ही बुद्धिमान था। वह किसान की बात समझ गया। उसने उसी वक्त अपनी थैली में से सौ सोने के सिक्के निकालकर किसान को दिए। हर-एक सिक्के पर राजा का चित्र था।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान ने सौ सिक्कों पर राजा का चित्र देख लिया और उस सवाल का जवाब मंत्री को बता दिया। तीसरे दिन जब दरबार लगा, तब राजा ने वही सवाल पूछा। मंत्री ने उठकर उसका सही जवाब कह सुनाया। राजा समझ गए कि उसी किसान ने मंत्री को उनके सवाल का जवाब बता दिया है। राजा गुस्से में आ गए। उन्होंने उस किसान को बुलवाकर पूछा-तुमने अपने बचन का पालन क्यों नहीं किया? किसान ने हाथ जोड़कर कहा-महाराज, मैंने अपने वचन का पालन किया है। यह उत्तर देने से पहले मैंने सौ बार आपका चेहरा देख लिया है। ये लीजिए, आपके चेहरे वाले सौ सोने के सिक्के। इन पर मैंने आपका चेहरा सौ बार देख लिया, तभी तो जवाब बता दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">राजा किसान की ईमानदारी पर बहुत खुश हुआ। किसान ने अपने वचन का पालन किया था, इसलिए राजा ने किसान को सौ सौने के सिक्के इनाम में दिए। किसान खुशी-खुशी अपने घर चला गया। प्रत्येक परिवार इसी तरह के संस्कार अपने बच्चों को देना चाहते है और हर माँ और पिता की यही भावना होती है कि उसकी संतान हमेशा ईमानदारी के रास्ते पर चले।</p>
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                <pubDate>Thu, 09 Jun 2022 10:10:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>India is my country: भारत देश मेरा&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[मेरी भारत माता मानवता की महान भूमि है
पहली बार सभ्यता को अपनी उपस्थिति मिली
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/india-is-my-country/article-34022"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/india-is-my-country.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">(India is my country)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>भारत, विविधता की महान भूमि,</strong><br />
<strong>भारत, एकता का प्रतीक</strong><br />
<strong>भारत, शीतलता का ठंडा पानी</strong><br />
<strong>भारत, जहां हर दिल में प्यार और दया है।</strong><br />
<strong>मेरी भारत माता, जहां गंगा पैदा होती है,</strong><br />
<strong>मेरी भारत माता, जहाँ सच्चा ज्ञान निहित है</strong><br />
<strong>मेरी भारत माता, जहाँ महान नेताओं की मृत्यु नहीं होती है</strong><br />
<strong>लेकिन महान मातृ भूमि के लिए, वे बलिदान करते हैं</strong><br />
<strong>ईश्वर का पवित्र स्थान, जहाँ लोग एक साथ रहते हैं</strong><br />
<strong>यहां, हम हर तरह के मौसम में एकजुट रहते हैं</strong><br />
<strong>दुख में खुशी में, हमारी आत्मा बिखरती नहीं है</strong><br />
<strong>यहां, हर अध्याय में हर कोई हंसमुख रहता है</strong><br />
<strong>मेरी महान माता, हिमालय का मुकुट हैं</strong><br />
<strong>हर कस्बे में हर तरह के लोग रहते हैं</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>मेरी महान माता, तुम्हारे लिए मेरा सिर झुकता है</strong><br />
<strong>जहाँ सब कुछ पवित्रता का प्रतीक है</strong><br />
<strong>मेरी भारत माता मानवता की महान भूमि है</strong><br />
<strong>पहली बार सभ्यता को अपनी उपस्थिति मिली</strong><br />
<strong>जहां इच्छा शक्ति, सच्चाई, भावनाओं और ज्ञान का सार है</strong><br />
<strong>जहाँ हम कभी युद्ध नहीं फैलाते लेकिन मौन में विश्वास करते हैं</strong><br />
<strong>पृथ्वी की तरह मजबूत, हम हर जगह बाधाओं का सामना करते हैं</strong><br />
<strong>सौभाग्य से मैं इस महान भूमि पर पैदा हुआ हूं</strong><br />
<strong>खुशी है कि मैं इस महान रेत का हिस्सा बनने जा रहा हूं</strong><br />
<strong>धन्य है कि मैं अपनी माँ के हजार हाथों में से एक हूँ</strong><br />
<strong>मेरी माँ की कहानी कभी खत्म नहीं हो सकती</strong></p>
<p style="text-align:right;"><em><strong>-मुकेश बिस्सा</strong></em></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 May 2022 10:07:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अलग-अलग देशों में अभिवादन की अनोखी परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[सच कहूँ डेस्क। अपने प्रियजनों या दोस्तों से मुलाकात होने पर, अजनबियों से मिलने पर, किसी व्यापारिक या व्यावसायिक समारोहों के दौरान लोग अक्सर एक दूसरे से हाथ मिलाकर (हैंडशेकिंग) अभिवादन करते हैं। यह स्वाभाविक रूप से पश्चिमी देशों की प्रथा रही है, और विश्व स्तर पर भी अभिवादन करने की व्यापक और संक्षिप्त परंपरा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/unique-tradition-of-greetings-in-different-countries/article-33153"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ डेस्क। </strong>अपने प्रियजनों या दोस्तों से मुलाकात होने पर, अजनबियों से मिलने पर, किसी व्यापारिक या व्यावसायिक समारोहों के दौरान लोग अक्सर एक दूसरे से हाथ मिलाकर (हैंडशेकिंग) अभिवादन करते हैं। यह स्वाभाविक रूप से पश्चिमी देशों की प्रथा रही है, और विश्व स्तर पर भी अभिवादन करने की व्यापक और संक्षिप्त परंपरा है। दुनिया भर में अभिवादन के लिए हाथ मिलाकर अभिवादन (हैंडशेकिंग) करने की प्रथा शायद पश्चिमी और गैर-पश्चिमी दोनों समुदायों में सबसे अधिक प्रचलित है। लेकिन दुनिया में अन्य जगहों पर, अभिवादन करने के अलग-अलग रिवाज देखें जाते हैं। जिसे सच कहूँ आज पाठकों के तक अपने इस कॉलम के जरिए पहुंचाने का प्रयास करेगा। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं की हाथ मिलाने के अतिरिक्त दुनिया भर में लोग एक दूसरे का किस तरह विनम्रता से और शारीरिक रूप से 10 अलग-अलग तरीके से अभिवादन करते हैं?</p>
<h4 style="text-align:justify;">हाथ जोड़कर और अपने सिर को झुकाकर <strong>(<span style="color:#ff0000;">भारत</span>)</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">भारत में, लोग प्रार्थना शैली में अपने हाथों को जोड़कर और अपने सिर को थोड़ा झुकाकर एक-दूसरे का ‘नमस्ते’ कहते हुए अभिवादन करते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ताली बजाकर (जिम्बाब्वे और (<span style="color:#ff0000;"><strong>मोजाम्बिक</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">दक्षिणी अफ्रीका में ‘शोना’ एक बंटू जातीय समूह हैं जो यहां के मूल निवासी है। यहां अभिवादन करने के लिए हाथ मिलाने के बाद पारंपरिक तरीके से ताली बजाने का रिवाज होता है। शोना लोगों में पहला व्यक्ति ‘माकड़ी’ (आप कैसे हैं?) कहते हुए दो बार ताली बजाता हैं, बदले में दूसरा व्यक्ति भी दो बार ताली बजाकर जवाब देता है। पुरुष अपनी उंगलियों और हथेलियों को मिलाते हुए ताली बजाते हैं, जबकि महिलाएं अपने हथेलियों के बिच अंतर रखकर ताली बजाती हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">अपनी जीभ बाहर निकाल कर (<span style="color:#ff0000;"><strong>तिब्बत</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">तिब्बत में अपनी जीभ को बाहर निकालना सम्मान या समझौते का प्रतीक माना जाता है और अक्सर इसे पारंपरिक तिब्बती संस्कृति में अभिवादन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तिब्बती लोक-कथाओं के अनुसार, नौवीं सदी के एक क्रूर तिब्बती राजा की जीभ काली थी, इसलिए राजा को अपनी नापसंदगी दर्शाने के लिए लोग अपनी जीभ बाहर निकालते हैं। इस प्रथा की शुरूआत बौद्ध भिक्षुओं द्वारा हुई थी, जो यह बताने के लिए अपनी जीभ बाहर निकालते हैं कि वे शांति मार्ग पर आए हैं और वह 9वीं शताब्दी के क्रूर राजा का पुनर्जन्म नहीं है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">एक दूसरे के माथे और नाक को एक साथ दबाकर (<span style="color:#ff0000;"><strong>न्यूजीलैंड</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">अभिवादन की यह प्रथा न्यूजीलैंड के ‘माओरी संस्कृति’ में निभाई जाती है, इसे ‘होंगी’ (ऌङ्मल्लॅ्र) कहा जाता है और इसका मतलब, ‘सांसों का आदान-प्रदान’ करना है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">अपना हाथ दिल पर रखकर (<span style="color:#ff0000;"><strong>मलेशिया</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">मलेशिया में अभिवादन करने की यह औपचारिक परंपरा है, लेकिन इस पारंपरिक मलेशियाई अभिवादन के पीछे एक विशेष और सुंदर भावना है। सबसे पहले दूसरे व्यक्ति के हाथों को सहजता से अपने हाथों में लिया जाता है। फिर, इसी सहजता से दूसरे व्यक्ति के हाथों को मुक्त किया जाता है और अपने दाहिने हाथ को अपनी छाती पर रखते हुए शरीर को सामने की ओर झुकाते हैं, जिसे सद्भावना और साफ-दिल का प्रतीक जाना जाता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">शरीर को थोड़ा सामने झुकाकर (<span style="color:#ff0000;"><strong>जापान</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">जापान में लोग एक-दूसरे को झुक कर अभिवादन करते हैं। शरीर का झुकाव सिर के छोटे से झुकाव से लेकर कमर के गहरे मोड़ तक हो सकता है। सिर के साथ एक छोटा सा झुकाव आकस्मिक और अनौपचारिक अभिवादन होता है, जबकि सिर से कमर तक का पूर्ण झुकाव और अवधि वाला अभिवादन सम्मान का संकेत देता है। .</p>
<h4 style="text-align:justify;">एक दूसरे की नाक से नाक टकराकर (<span style="color:#ff0000;"><strong>कतर, यमन, ओमान</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">कुछ खाड़ी देशों में महिला, पुरुष और बुजर्गों से अभिवादन करने की अलग-अलग परंपरा है। यहां पुरुषों द्वारा अभिवादन के तीन तरीकें हैं, यदि यह एक औपचारिक अभिवादन है, तो वे आपस में हाथ मिलाते हैं, अगर कोई व्यक्ति अच्छी तरह से जान पहचान वाला हो तो उसके दाहिने गाल को तीन बार चूमकर अभिवादन किया जा सकता हैं और यदि वह व्यक्ति आपका रिश्तेदार या करीबी दोस्त है, तो आप दोनों दो बार अपनी नाक से नाक टकरा कर अभिवादन कर सकते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">हाथ की उंगलियों से (<span style="color:#ff0000;"><strong>नाइजीरिया</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">नाइजीरिया में, युवा लोग आमतौर पर एक-दूसरे को एक विशेष तरीके से बधाई देते हैं, युवा लोग हैंडशेक की प्रक्रिया में अपनी उंगलियों को दूसरे व्यक्ति के उंगलिओं से मिलाकर चुटकी बजाते हंै। लेकिन यह हैंडशेक सीखना बहुत कठिन है, इसलिए आपको वास्तव में किसी नाइजीरियन व्यक्ति की जरूरत होती है जो आपको सही तरीका सिखाए कि हाथों को हिलाते हुए उंगलियों को कैसे झपकाया जाए।</p>
<h4 style="text-align:justify;">बड़ों का हाथ अपने माथे से लगाकर (<span style="color:#ff0000;"><strong>फिलीपींस</strong></span>)</h4>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस में अभिवादन के तरीके को ‘‘मनो’’ या ‘‘पैगामानो’’ कहते है, यह एक ‘‘सम्मान-भाव’’ है, जिसका उपयोग फिलीपीनी संस्कृति में बुजुर्गों के सम्मान के रूप में और बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Mon, 09 May 2022 15:39:55 +0530</pubDate>
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