<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/literature/tag-5629" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Literature - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/5629/rss</link>
                <description>Literature RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Shri Krishna Story: श्रीकृष्ण जी अपने बड़े भाई बलराम और प्रिय मित्र सात्यकि के साथ एक घने वन से होकर यात्रा कर रहे थे तभी...</title>
                                    <description><![CDATA[एक समय की बात है। श्रीकृष्ण जी अपने बड़े भाई बलराम और प्रिय मित्र सात्यकि के साथ एक घने वन से होकर यात्रा कर रहे थे। दिन ढल चुका था और चारों ओर गहरा अंधकार फैलने लगा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/shri-krishna-ji-was-traveling-through-a-dense-forest-with/article-88188"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/shri-krishna-story.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Shri Krishna Story: एक समय की बात है। श्रीकृष्ण जी अपने बड़े भाई बलराम और प्रिय मित्र सात्यकि के साथ एक घने वन से होकर यात्रा कर रहे थे। दिन ढल चुका था और चारों ओर गहरा अंधकार फैलने लगा। वन हिंसक पशुओं और भयानक राक्षसों के लिए प्रसिद्ध था। तीनों ने निश्चय किया कि रात के प्रत्येक पहर में एक-एक व्यक्ति जागकर पहरा देगा, ताकि सभी सुरक्षित रह सकें। पहले पहर में सात्यकि पहरे पर थे। तभी अचानक एक विशाल और डरावना राक्षस उनके सामने आ खड़ा हुआ। उसे देखकर सात्यकि का क्रोध भड़क उठा। वे पूरे बल से उससे भिड़ गए। लेकिन जैसे-जैसे उनका क्रोध बढ़ता गया, राक्षस का शरीर और भी विशाल तथा शक्तिशाली होता गया। अंतत: सात्यकि घायल हो गए। पहला पहर समाप्त होते ही राक्षस अदृश्य हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरे पहर में बलराम ने पहरा संभाला। उनके साथ भी वही घटना हुई। उन्होंने भी क्रोध में आकर राक्षस का सामना किया, किंतु परिणाम वही निकला। राक्षस और अधिक बलवान हो गया तथा बलराम भी घायल हो गए। तीसरे पहर श्रीकृष्ण जी जागे। कुछ ही देर में वही राक्षस उनके सामने प्रकट हुआ। किंतु इस बार दृश्य बिल्कुल अलग था। श्रीकृष्ण जी ने न क्रोध किया और न ही भय दिखाया। वे शांत भाव से मुस्कुराते रहे। राक्षस जितना आक्रमण करता, श्रीकृष्ण जी उतनी ही सहजता और धैर्य से उसका सामना करते। आश्चर्य यह हुआ कि हर मुस्कान के साथ राक्षस का आकार छोटा होने लगा। थोड़ी ही देर में वह एक छोटे से कीड़े के समान रह गया। श्रीकृष्ण जी ने उसे अपने वस्त्र के छोर में बांध लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">भोर होने पर जब बलराम और सात्यकि ने अपनी पीड़ा का कारण बताया, तब श्रीकृष्ण जी ने वस्त्र में बंधे उस छोटे जीव को दिखाते हुए कहा, यही वह राक्षस है। यह कोई बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि हमारा क्रोध है। जितना इसे बढ़ावा देंगे, यह उतना ही प्रबल होगा। यदि धैर्य, संयम और मुस्कान से इसका सामना करेंगे, तो यह स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। जीवन की सबसे बड़ी जीत दूसरों पर नहीं, बल्कि अपने क्रोध पर विजय पाने में है।</p>
<img src="https://www.sachkahoon.com/media/2026-07/shri-krishna-story.jpeg" alt="Shri Krishna Story" width="628" height="357"></img>
Shri Krishna Story: श्रीकृष्ण जी अपने बड़े भाई बलराम और प्रिय मित्र सात्यकि के साथ एक घने वन से होकर यात्रा कर रहे थे तभी...
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/shri-krishna-ji-was-traveling-through-a-dense-forest-with/article-88188</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/shri-krishna-ji-was-traveling-through-a-dense-forest-with/article-88188</guid>
                <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:17:14 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2026-07/shri-krishna-story.jpeg"                         length="44112"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sarvesh Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Story: जब बापू ने मेरी बीएड के लिए अपनी ट्रॉली बेच दी</title>
                                    <description><![CDATA[Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/mother-has-a-very-important-place-in-life/article-83707"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-04/story.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही पिता की भूमिका भी उतनी ही गहन और व्यापक होती है। माता और पिता दोनों ही संतान के लिए अलग-अलग किंतु समान रूप से अनमोल स्थान रखते हैं। बच्चे का परिवेश- उसका पड़ोस, उसका वातावरण, उसका विद्यालय और उसका शहर- उसके व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। अपने प्रियजनों के बिछुड़ जाने के बाद मन उदासी से भर जाता है और तब जीवन का अगला चरण उन्हीं की स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ने लगता है। कहा जाता है कि ठहरा हुआ पानी भी खराब होने लगता है, जबकि बहता पानी अपनी अलग ही सुगंध और ताजगी लिए होता है। यही जीवन का सिद्धांत है- समय के साथ चलते रहना, बदलते रहना।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना काल के कठिन समय में मेरा बापू मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गया। जब तक वह जीवित थे, मुझे जीवन की किसी भी बात की तनिक भी चिंता नहीं थी। मैं अपनी मस्ती भरी दुनिया में मग्न था। लेकिन उनके जाने के बाद जिम्मेदारियों का जो एहसास हुआ, वह मेरे जीवन का एक नया अध्याय बन गया। आज सोचता हूँ, न जाने कैसे वह कर्ज के बोझ तले दबे होने के बावजूद हम तीनों भाई-बहनों को पढ़ाते रहे और घर-गृहस्थी की गाड़ी भी खींचते रहे। यह बात 1998 की है, जब मेरा बी.एड. में प्रवेश हुआ। घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। छमाही फसल बिकने के बाद ही कहीं जाकर आढ़ती से कुछ पैसे मिलते और उन्हीं से हमारे कपड़े-वगैरह और अन्य आवश्यकताओं का प्रबंध होता। परीक्षा पास करने के तुरंत बाद बी.एड. में दाखिले की खुशी इतनी अधिक थी कि मैं उसे संभाल भी नहीं पा रहा था। मुझे क्या पता था कि इतनी भारी फीस भरना हमारे लिए संभव ही नहीं था। मैं चुपचाप सो गया। Story</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी माँ ने पिता से इस बारे में बात की कि बेटे का दाखिला हो गया है, वह आगे चलकर मास्टर बनेगा, पर फीस बहुत अधिक है- कोई उपाय करना होगा। अगले ही दिन मेरे पिता, बिना अपने साधनों की परवाह किए, अपनी ट्रॉली बेच आए और मेरी फीस के लिए पैसे जुटा दिए। मुझे इस बात का पता बाद में चला, जब मैंने उन्हें दूसरों से ट्रॉली मांगकर काम करते देखा। पिता के जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान होता है, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। पिता तो अपने बच्चों के लिए अपना संपूर्ण जीवन तक न्यौछावर कर देता है। आज भले ही मेरे बापू हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियां ही मेरे जीवन को आगे बढ़ाने का संबल बनी हुई हैं।<br />
जब मैं आज अपने विद्यार्थियों को यह प्रसंग सुनाता हूँ, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं और उनके मन में अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान और भी गहरा हो जाता है। माता-पिता घर की वह नींव होते हैं, जिनके रहते किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। जिन बच्चों के माता-पिता बचपन में ही उन्हें छोड़ जाते हैं, उनसे पूछकर देखिए कि बिना माता-पिता के जीवन कैसा होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि जीवन में यादें न हों, तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। अच्छी और बुरी, दोनों प्रकार की यादों के सहारे ही जीवन आगे बढ़ता है। माता-पिता हमें छोड़कर जाने के बाद भी हमारे सपनों में आकर हमें सही और गलत का मार्ग दिखाते रहते हैं। वास्तव में, जीवन की यादें एक विशाल चलचित्र है, जिसे हमारा मन अपने भीतर संजोए रखता है। अच्छी यादें हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। हमें चाहिए कि हम अपने बड़ों का सम्मान करें और जीवन की मधुर यादों को दूसरों के साथ भी साझा करें।<br />
अमनदीप शर्मा, गुरने कलां, मानसा, मो. 98760-74055</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Petrol-Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर तेल कंपनियों का आया बड़ा बयान" href="https://www.sachkahoon.com/oil-companies-issued-a-statement-regarding-the-increase-in-petrol-and-diesel-prices/">Petrol-Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर तेल कंपनियों का आया बड़ा बयान</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/mother-has-a-very-important-place-in-life/article-83707</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/mother-has-a-very-important-place-in-life/article-83707</guid>
                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 15:35:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2026-04/story.jpeg"                         length="96432"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Literature: मीठा रिश्ता बुआ का</title>
                                    <description><![CDATA[Bua: बुआ के साथ रिश्ता बड़ा प्यारा और मीठा होता है। मुझे नहीं पता कि बुआ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। हाँ, जो फूं-फूं करता है, उसे फुफ्फड़ कहते हैं, और उसी से “फुफ्फी” शब्द बना है। भुआ को सास “फुफेस” कहती है। भुआ उसी घर में जन्मी होती है, जहां वह अपने भाइयों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/sweet-relation-of-bua/article-80914"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/literature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Bua: बुआ के साथ रिश्ता बड़ा प्यारा और मीठा होता है। मुझे नहीं पता कि बुआ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। हाँ, जो फूं-फूं करता है, उसे फुफ्फड़ कहते हैं, और उसी से “फुफ्फी” शब्द बना है। भुआ को सास “फुफेस” कहती है। भुआ उसी घर में जन्मी होती है, जहां वह अपने भाइयों और भाभियों के मूड को देखते हुए फेरा डालने की सोचती है। कई घरों में भुआ के आने को अच्छा नहीं माना जाता। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">यह धारणा बना रखी है कि भुआ कुछ न कुछ लेने ही आती है। भुआ लालची होती है। जबकि हकीकत यह है कि भुआ अपने मायके में चाहे जितनी अच्छी हो, उसे अपने मायके से मिलने वाले सम्मान की भूख होती है। मायके से मिले छोटे-मोटे उपहारों को वह अपनी बहुओं और ननदों को बड़े गर्व से दिखाती है। उसका माँ से जन्मा भाई, भाभियाँ, भतीजे-भतीजियाँ भुआ से हर बात छिपाते हैं। कोई नई चीज लाएँ, तो उसे भुआ से छुपाते हैं। जबकि भुआ अपने मायके की हर खुशी को अपनी खुशी से भी बढ़कर मानती है। यह वही भुआ है, जो कभी उस घर की बराबर की हिस्सेदार थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जमीन-जायदाद की मालिक थी। उसके बराबर के हक थे। लेकिन उसका हिस्सा यह कहकर काट दिया जाता है कि उसकी शादी में उसकी हिस्सेदारी की रकम खर्च हो गई थी। जबकि आजकल लोग बेटियों की शादी से ज्यादा बेटों की शादी पर खर्च करते हैं। फिर भुआ का हिस्सा कहां गया? कई लड़कियां तो शादी से पहले ही कमाई शुरू कर देती हैं। अपनी तनख्वाह को वे मायके की झोली में डाल देती हैं या अपनी शादी के लिए जोड़ लेती हैं। फिर भी वे अपना हिस्सा नहीं लेतीं। क्योंकि शादी के बाद, माता-पिता के चले जाने के बाद भी वे मायके से जुड़े रहती हैं। वे चाहती हैं कि हर तीज-त्योहार पर उनकी सुध ली जाए। मायके आने पर उनका खुले दिल से स्वागत हो। सुख-दुख में भाई-भतीजे उनके साथ खड़े हों। बहन हमेशा मायके से ठंडी हवा के झोंके की उम्मीद करती है। लेकिन आज के दौर में ऐसा नहीं होता। अपना हिस्सा छोड़ने के बाद भी बेटी-बहन को पराया समझा जाता है। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">मायके की खुशी सुनकर बहन का दिल खुशी से भर जाता है, लेकिन भाई-भाभियां उसे बताना भी नहीं चाहते। कई बेटियां तो बच्चों वाली होकर भी भाइयों के हक में बयान दे देती हैं। कथित लालची भुआ के इस त्याग की कोई कदर नहीं करता। इसे भाई-भतीजे अपना हक मानते हैं। फिर भी लोहड़ी-दिवाली पर वह मायके से मिठाई के डिब्बे की राह देखती है। करोड़ों की जायदाद त्यागने वाली बेटियों-बहनों की यह दशा आज आम हो गई है। दुनिया के नजरिए से भुआ का यह त्याग बहुत बड़ा है, लेकिन फिर भी उसकी कोई कदर नहीं करता। मेरे हिसाब से भुआ का रिश्ता सबसे ऊँचा है। हमारी अमीरी में भुआ का हिस्सा और उसकी दुआएँ बोलती हैं। कोई सुने या न सुने। Literature<br />
<strong>                                                                                                                -रमेश सेठी बादल</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/sweet-relation-of-bua/article-80914</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/sweet-relation-of-bua/article-80914</guid>
                <pubDate>Mon, 02 Feb 2026 15:19:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2026-02/literature.jpg"                         length="75622"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Struggle Life Story: संघर्ष भरे जीवन की अजीब दास्तां</title>
                                    <description><![CDATA[Struggle Life Story: ‘‘भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती। मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने। असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था। हर लड़का राजा, हर लड़की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/strange-tales-of-a-struggle-life/article-87086"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-09/stragale-life.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Struggle Life Story: ‘‘भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती। मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने। असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था। हर लड़का राजा, हर लड़की रानी। काश कि बचपन वहीं ठहर जाता।’’</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे ही तांगा गली के मोड़ पर मुड़ा, सत्या का दिल बैठने लगा था। ऐसा नहीं था कि वह इस शहर में पहली बार आई हो। यहां तो उसके बचपन से लेकर किशोरवय तक के किलकते-हंसते दिन बीते थे। जीवन के सबसे सुखद सपने उसने और मीरा ने यहीं देखे थे। वह तो ऐसी उम्र थी जब वह सत्य और कल्पना में भेद नहीं कर पाती थी। सारी कल्पनाएं उसे सुनहरी और सत्य लगती थीं। मीरा और वह घंटों बतियाती रहतीं, पर उनमें कभी कहीं कोई निराशा की गंध नहीं होती थी। भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती। मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने। असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था। हर लड़का राजा, हर लड़की रानी। काश कि बचपन वहीं ठहर जाता। बचपन कब रू-ब-रू नहीं हो पाया है जिंदगी की धुंधली राहों से। जिंदगी के हर मोड़ पर वह खड़ा हो जाता है। उनके घर कितने छोटे थे और सपने कितने बड़े। छोटे घरों में बड़े सपने देखना कोई गुनाह तो नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">तांगे वाले ने फिर पूछा, ‘कहां तक जाना है बहनजी?’ ‘आगे तो चलो अभी।’ सर्दी का सूरज साढ़े चार बजते-बजते धुंधला गया था। छोटा शहर, भीड़-भाड़ से दूर, इस कॉलोनी की गली में इक्का-दुक्का लोग ही चलते नजर आ रहे थे। तांगे के घोड़े की टाप सुन कुछ लोग घर के बाहर निकल-निकलकर देखने भी लगे थे। सत्या की आंखें मकानों के नम्बरों पर टिकी थीं और मन बिजली की गति से दौड़ रहा था। Struggle Life Story</p>
<p style="text-align:justify;">‘मीरा सुना है, पिताजी का ट्रांसफर होनेवाला है।’ ‘ये नहीं हो सकता।’ मीरा एकदम तिलमिला उठी थी। सत्या के पिता का ट्रांसफर होने का अर्थ है सहेली सत्या का भी चले जाना। वह यहां पर इसीलिए तो है कि उसके पिता यहां बैंक अधिकारी हैं। पिछले सात वर्षों से वे यहीं टिके हैं। मीरा के पिता का तो व्यवसाय ही यहां है। दोनों सखियों के घर नजदीक थे। वे आसानी से एक-दूसरे के घर किसी भी समय आ-जा सकती थीं। एक ही स्कूल में पढ़ने के कारण उनकी मित्रता और भी गहरी हो गई थी। मीरा और सत्या की दोस्ती में कोई दुराव-छिपाव नहीं था। छोटी-से-छोटी चीज भी वे एक-दूसरे को दिखाने दौड़ पड़तीं। पहनने-ओढ़ने, किताब-कॉपी, एक जैसे बस्ते, एक जैसे कपड़े, एक जैसी किताबें और एक जैसा खाना, एक जैसी पसंद, एक जैसा फैशन।</p>
<p style="text-align:justify;">समय नदी की धार बन बहता रहा। उस धारा में बह गए थे बड़े-बड़े समय के पत्थर। पिता की बदली के संग बिछुड़ गई थीं दोनों सखियां-सत्या और मीरा। दोनों की पढ़ाई पूरी हुई। फिर शादियां हुईं। एक-दूसरे के घर शादी के निमंत्रण आए थे। कोई जा तो नहीं सका था। केवल शुभकामनाओं के पत्र भेज दिए गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मीरा अपनी शादी के आठ दिन बाद ही सत्या की शादी का बहुत ही सादा-सा निमंत्रण पत्र देख हैरान रह गई थी। सत्या की शादी साहिल से? साहिल, सत्या के साथ पढ़ने वाला लड़का था। निरंतर रहनेवाले पत्र-व्यवहार में दोनों सहेलियों को एक-दूसरे की पूरी जानकारी रहती थी। साहिल का जिक्र तो सत्या ने कई पत्रों में किया था, पर बात यहां तक बढ़ जाएगी, यह अंदाजा उसे नहीं था। मीरा को इस बात पर कुछ क्रोध भी आया। सत्या की बच्ची इतनी बड़ी बात मुझसे छुपा गई।</p>
<p style="text-align:justify;">मीरा ने जब अपनी सहेली को क्रोध और उलाहने से भरा पत्र लिखा तो उसका छोटा-सा उत्तर क्षमा प्रार्थना के साथ आया था। हस्ताक्षर! सत्या, साहिल के साथ शादी की बात छिपा लेने का कारण यह था कि हम दोनों के परिवार तो इस शादी के लिए राजी थे, पर दोनों की बिरादरी इस रिश्ते को नहीं स्वीकार पाई। शादी के दूसरे ही दिन लोगों की भीड़ ने हमारे घर पर हमला बोल दिया। मां-पिता ने हमें पिछले रास्ते से भगा दिया। हम भागकर ट्रेन में चढ़े और एक अन्य दोस्त के यहां महीने भर छिपे रहे। फिर दूसरे रिश्तेदार के यहां रहे। इस बीच हमारे लंदन जाने का इंतजाम हो गया। आगे की कहानी तुम्हें मेरे पिता ने बताई ही होगी। साहिल की ओर मेरा आकर्षण तो था, किन्तु पिता ने वचन लिया था कि जब तक मैं तुम्हारी शादी न कर दूं तब तक तुम अपनी मां से भी यह बात नहीं कहोगी।</p>
<p style="text-align:justify;">और मां को तब बतलाया गया, जब हम दोनों कोर्ट में शादी करके घर लौटे। पिता के साहस, उदारता और प्यार के आगे मैं नतमस्तक हूं मीरा। उन्हें भी बिरादरी के बंदों का डर था, वही हुआ। भड़के लोगों ने घर ही नहीं तोड़ा पिता के हाथ-पैर भी तोड़ दिए थे। वे छ: माह बिस्तर पर पड़े रहे। वो तो कुछ भले मानसों ने उन्हें बचा लिया। हम लंदन के लिए रवाना हों, उसके पहले ही मेरे पेट में दर्द होने लगा। इतना भारी दर्द मैं सह नहीं सकी। प्रथम मातृत्व का दर्द सातवें मास में ही उठा और बेटे का जन्म हो गया। इतने कमजोर, समय से पूर्व जन्मे बच्चे को बीस दिन अस्पताल में ही रखा गया। फिर आठ दिन मां के दूध पर पला। हमें लंदन जाना था। इतने छोटे कमजोर बच्चे को सम्भालना भी कठिन था। अभी तक हम समाज की नजरों से छिपकर रह रहे थे। पिता या ससुर के घर में जा नहीं सकती थी। Struggle Life Story</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों घरों में बार-बार धमकी भरे पत्र मिल रहे थे कि अब जब भी लड़का या लड़की हमें घर में दिखाई देंगे, हम उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे। धर्म के ठेकेदारों का यह जुनून दो प्रेमियों के साथ-साथ दो परिवारों को भी नष्ट कर रहा था। समझदार परिवारों ने दोनों बच्चों को बचाने के लिए पहले तो देश में ही आठ माह छिपाकर रखा, फिर विदेश भेजने की व्यवस्था कर दी। उन्होंने सोचा कुछ साल यहां से दूर चले जायेंगे, तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाएगा। किन्तु अब तीन सप्ताह के बच्चे की समस्या थी। इतने छोटे कमजोर बच्चे को प्लेन में ले जाने की अनुमति भी नहीं मिली। कुछ मित्रों ने सुझाया, बच्चे को किसी बालगृह में दे दो। इस बात पर मैं और साहिल दोनों ही राजी नहीं हुए। मेरा तो रोते-रोते बुरा हाल था। ‘पापा, मैं छिपकर भागना नहीं चाहती। मैं उनका सामना करूंगी, जो हमें बर्बाद करने पर तुले हैं।’ ‘बेटी, मैं तु्झे कैसे समझाऊं। भीड़ और क्रोध की बुद्धि नहीं होती। विवेक नहीं होता।’ ‘पापा उनका सामना करने के लिए हमें एक मौका तो दो।’ ‘बेटी अपनी टांगें सदा के लिए खोकर मैं ऐसी चुनौती कैसे ले सकता हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">अपनी आंखों की ज्योति को मैं आग में नहीं झोंक सकता।’ साहिल और सत्या के पिता भी लोगों की नजरें बचाकर मिलते थे। अपने बच्चों को बचाये रखने की योजना वे दिन-रात बनाते रहे। भारी विडम्बना यह थी कि जिन्हें लड़ना चाहिए था, वे तो गले मिल रहे थे और लड़ रहे थे वे, जिन्हें इनसे कोई लेना-देना नहीं था। घर और बाहर जलती आग के बीच उस छोटे बच्चे को मीरा के घर रातोंरात पहुंचाया गया था। आधी रात को चलने वाली गाड़ी से सत्या के मां-पिता बच्चे को लेकर जब मीरा के घर मुंह अंधेरे पहुंचे तो उन्हें देख वह हैरान रह गई। अपनी प्राणप्रिय सहेली के माता-पिता को इस संकट से उबारने के लिए उसने बच्चे को स्वीकार कर लिया। उस समय उसकी अपनी दो साल की एक बेटी थी। बच्चे को उसने अपने दूध से ही नहीं, प्राणों से सींचा, उसकी किलकारियों में तो वह भूल भी गई कि बच्चे को जन्म देनेवाली मां वह नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">और एक दिन तो ऐसा आया, जब उसे मां-पिता का नाम भी देना पड़ा। बड़ा होता जलज अपने मां-पिता इन्हीं को समझता रहा। स्कूल के कॉलेज के रजिस्टरों में पिता मीरा के पति थे। सारी स्थिति-परिस्थिति को समझकर मीरा के पति ने बहुत समझदारी से काम लिया। उन्हें सत्या का परिचय अपनी पत्नी मीरा से ही मिला था। मीरा के लिए सत्या का परिचय देना केवल एक सहेली का परिचय नहीं था। वह परिचय उसके जान-प्राण का परिचय था। मीरा के परिचय वर्णन से ही वे सत्या की तस्वीर मन में बनाकर उसका सम्मान करने लगे थे। अपनी पत्नी का भी वे सम्पूर्ण हृदय से आदर करते थे। उसकी किसी बात को वे कभी थोथी या निरर्थक नहीं समझते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण था कि उन्होंने पत्नी की सहेली के मात्र बीस दिन के बेटे को अपने पास रखना स्वीकार कर लिया। एक वर्ष तक चला तूफान शांत हो गया और जीवन सहज सुचारू रूप से चलने लगा। अब मीरा अपने पितृ नगर में रहने आ गई थी। जलज बड़ा होता गया। पढ़ने के साथ-साथ वह खेल-कूद में भी हमेशा आगे रहा। समय की गति बहुत तेज रही। सत्या और उसके पति आठ वर्ष तक विदेशों में जगह-जगह घूमते हुए अपने पैर जमाने का प्रयत्न करते रहे। इधर मीरा के पति दूर अरूणाचल स्थानांतरित हो गए। बेटा जलज तो आगे बढ़ता रहा, किन्तु दोनों मां-बाप के बीच सम्पर्क टूट गया। एक-दूसरे का कुशलक्षेम जानने के लिए दोनों सखियां बेचैन रहतीं, किन्तु बरसों एक-दूसरे के पते नहीं जान पाईं। उधर सत्या के मां-पिता भी जीवित नहीं रहे। इधर मीरा के माता-पिता भी दुनिया छोड़ गए। युग बदल गए। माता-पिता का इतिहास अब बेटे-बेटी दुहराने लगे थे। बेटी ने जिसे पसंद किया, मीरा ने बिना किसी विवाद के खुशी से उसकी शादी कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन जब बेटा भी अपनी पसंद की लड़की के साथ इन पालनहार माता-पिता के सामने खड़ा हो गया, तब मीरा कुछ उलझन में पड़ गई। वह सत्या को खोजकर उसे इस शुभ सूचना से अवगत कराना चाहती थी। बेटे की बेचैनी बढ़ रही थी। मां जल्दी उसकी पसंद स्वीकार नहीं कर रही थी। ‘मां आखिर नैनी में बुराई क्या है?’<br />
‘बुराई कुछ नहीं बेटा। कुछ दिन सोच लेने में क्या बुराई है?’ ‘और कितने दिन सोचोगी मम्मी?’<br />
‘बेटा अपने घर जिसे लाना है, उसके लिए धैर्य से सोच-विचार करना होगा।’ ‘मम्मी बताओ न तुम्हें कितना समय चाहिए?’</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>‘बहुत बेचैन हो रहा है!’ हंसते हुए मीरा ने कहा।</strong><br />
मीरा का सुखी-संतुष्ट मन कई परतों के नीचे एक भारी अकुलाहट अनुभव कर रहा था। वैसे यह अकुलाहट नई उत्पत्ति नहीं थी। पिछले बाईस सालों से मन के किसी कोने में पड़ी आग आज जैसे भभककर ऊपर आना चाहती थी। अब वह हर क्षण यही सोचती थी कि किस तरह जलज को सत्य बताऊं? बताऊं भी या नहीं। सत्या मिल पाती तो उससे सलाह करती। अब जब कभी वह अपने बेटे को देखकर ले जाना चाहेगी तब क्या होगा? मैं कैसे सहूंगी? और जलज जाएगा? आसानी से वह मानेगा क्या?</p>
<p style="text-align:justify;">एक मकान के गेट पर नामपट्ट देखकर तांगा रुका। ‘यही नम्बर है न बहनजी?’ तांगे वाले ने कहा तो सत्या एकदम चौंकी, ‘हां-हां यही।’ उसका दिल तीव्र गति से धड़क रहा था। धीमे कदमों से चलकर वह गेट तक पहुंची। काफी बदल दिया है मकान को मीरा ने। इस सुन्दर सुहाने मकान में वह तो पिता के समय का पुरानापन ढूंढ़ रही थी। वह ईंटों की दीवार को छूता हरसिंगार, वह पीछे आंगन से झांकता आम, आंगन के साथ-साथ चलती कच्ची नाली और बरामदे में पड़ी चिकें। मीरा ने घर और युग दोनों ही बदल दिए हैं। उसने गेट पर लगी बेल बजाई। किसी युवक ने आकर दरवाजा खोला। क्षण मात्र को वह सत्या के पैरों पर झुका और झट सामान उठाकर अन्दर चला गया। सत्या उसके पूरे रूप को आंखों में भी नहीं भर पाई। वह तांगे वाले को पैसे चुकाकर मुड़ी तो मीरा सामने खड़ी थी। घर के बरामदे में ही भरत-मिलाप-सा दृश्य उपस्थित हो गया। दोनों के आंसुओं से धरती भीगने लगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बेटा जलज खिड़की से यह दृश्य देखकर चकित था कि दोनों सहेलियां ‘हैलो हाय के साथ मिलने के बजाय रोकर गले मिल रही हैं। हां मां ने बताया था, शायद मिलने का पुराना ढंग यही था। पर आंटी तो बरसों विदेश में रही हैं? कुछ लोग होते हैं जो अपना पुराना ढंग नहीं छोड़ते। क्या किया जाए। पर मम्मी को रोते देखना उसे अच्छा नहीं लग रहा। हां- वो भी होस्टल से आकर जब मम्मी के गले लगता तो मम्मी की आंखें भर आती थीं। महिलाएं भावुक होती ही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वे दोनों ड्राईंगरूम में आकर बैठ गई थीं और जलज क्रिकेट मैच देखने में व्यस्त था। सत्या की आंखें ड्राईंगरूम में लगे युवा के चित्रों पर अटक-अटक जा रही थीं। इसकी आंखें कितनी मिल रही हैं उनसे। जब दोनों सहेलियों की आंखें टकराईं तो मौन बहुत कुछ कह गया। चाय पीते-पीते सत्या की आंखें उन चित्रों पर बार-बार टिक रही थीं और मीरा की आंखें डबडबा रही थीं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>‘बेटा जलज आओ। मौसी के साथ चाय पीयो।’</strong><br />
अपने लिए ‘मौसी, शब्द सुन एकबारगी सत्या कांप उठी। फिर अपने को संयत कर बातें करने का प्रयत्न करने लगी। पर सामने बैठे जलज को देख-देख उसका जिंदगीभर का रुका ममत्व फूट पड़ने को आतुर हो उठा। मीरा ने नाजुक स्थिति को समझा और जलज को किसी बहाने बाहर भेज दिया। दो स्त्रियों के इस भावनात्मक संघर्ष को समझने में जलज असमर्थ था। फिर भी वह इतना बच्चा नहीं था। कुछ गम्भीर बात है, यह उसे समझ में आ रहा था। सत्या चाहकर भी जलज से बात नहीं कर पा रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">कितनी बातों के ग्रंथ भरे थे मन में, फिर भी दोनों सहेलियां ऊपरी बातों में अपना समय काट रही थीं। रात का खाना तीनों ने साथ खाया। थकी होने के कारण सत्या जल्दी सोने चली गई। मन में उठती ऊंची लहरें उसे नींद में जाने से रोक रही थींं। वह चाह रही थी कि जलज के पास ही बैठे और उसे ही निहारती रहे। अंतर्मन ने पूछा, ‘क्या जलज मेरे साथ जाने को राजी होगा? जब उसे सत्य पता चलेगा तब भी क्या वह अपनी इस जन्मदात्री मां का आदर करेगा? सत्या का सिर फटने को हुआ। एक नींद की गोली निगल वह सो गई। उधर मीरा बेटे के पास आ बैठी थी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>‘ममा, आज तुम कुछ परेशान लग रही हो?’</strong><br />
‘नहीं तो बेटे। बस कुछ थकी हूं।’ ‘नहीं ममा कुछ बात है। डैडी की याद आ रही है?’ मीरा मुस्करा दी, ‘वो कौन-से बहुत दूर गए हैं, कल या परसों आ जाएंगे।’ ‘फिर क्या बात है मम्मी?’</p>
<p style="text-align:justify;">‘सोचती हूं अगर तुझे लंदन पढ़ने भेज दूं, तो मैं कैसे रहूंगी अकेली।’ ‘मां मैं कहीं नहीं जाऊंगा।’ कहते हुए जलज मां के गले में झूल गया। मां ने बेटे का माथा चूमा। ‘अच्छा बेटे, अब सो जा। मैं भी सोऊंगी।’ सत्या चार दिन मीरा के पास रही। दोनों सहेलियां उठते-बैठते, घूमते-फिरते, खाते-पीते तनाव में बनी रहीं। दोनों में से किसी का साहस नहीं हुआ कि बेटे को सच से अवगत करा दें। हालांकि पहले दोनों में यह तय हो चुका था कि जब हम दोनों सामने होंगी, बेटा भी सामने होगा, तब उसे सत्य से परिचित करा देंगे। मीरा और जलज का लाड-दुलार भरा सम्बन्ध देखकर सत्या का मन सत्य को चोट करने को नहीं हुआ। Struggle Life Story</p>
<p style="text-align:justify;">यदि उस समय बीस दिन के बालक को मीरा स्वीकार न करती तो? सत्या ने दूसरे दिन जाने की तैयारी कर ली। मीरा ने देखा तो सत्या के पास आ खड़ी हुई। सत्या ने मीरा के कंधे पर सिर टिका दिया और रो पड़ी। मीरा की आंखें भी बरस पड़ीं। ‘मीरा, मैं तुम्हारी कोख सूनी करने का साहस नहीं कर सकती।’ ‘यह क्या कह रही हो सत्या? कोख तुम्हारी सूनी हुई है।’ ‘कोख मेरी थी, पर उसकी रौनक तुम्हारे घर में समाई है। अब उसे सूनापन देना अन्याय होगा। तुम्हारे तप की मैं तुम्हें सजा नहीं दे सकती।’ मीरा का मन हुआ, सहेली के पैर पकड़ ले। पूर्व में प्रभात की किरणें फूट रही थीं और बेटा जलज ‘मौसी मां को छोड़ने स्टेशन जा रहा था। दो दिन से वह अपनी मम्मी के कहने पर सत्या को इसी सम्बोधन से बुला रहा था।                                                                                  <em><strong>-लेखक – उर्मि कृष्ण</strong></em></p>
<div class="td-post-content tagdiv-type">
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">linked in</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
</div>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/strange-tales-of-a-struggle-life/article-87086</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/strange-tales-of-a-struggle-life/article-87086</guid>
                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 17:30:34 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2025-09/stragale-life.jpg"                         length="17461"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Literature: दस रुपये की जिंदगी</title>
                                    <description><![CDATA[जीवन चलने का नाम Literature: कई साल पहले मैं दिल्ली के एक व्यस्त मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था, अपने नए रिज्यूमे को अंतिम रूप देने में व्यस्त। तभी एक छोटी-सी घटना ने मेरे जीवन का नजरिया बदल दिया। एक 8-9 साल की बच्ची, मैले-कुचैले कपड़ों में, मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/ten-rupees-life/article-69946"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-04/literature-1.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">जीवन चलने का नाम</h3>
<p style="text-align:justify;">Literature: कई साल पहले मैं दिल्ली के एक व्यस्त मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था, अपने नए रिज्यूमे को अंतिम रूप देने में व्यस्त। तभी एक छोटी-सी घटना ने मेरे जीवन का नजरिया बदल दिया। एक 8-9 साल की बच्ची, मैले-कुचैले कपड़ों में, मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ बोले अपना हाथ फैलाया, नन्हें हाथों में एक फटी-सी किताब थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मैंने जल्दी से जेब टटोली और दस रुपये का नोट निकालकर उसे दे दिया। वह बच्ची उस नोट को लेकर वहीं खड़ी रही। फिर अचानक उसने नोट मुझे लौटा दिया! ‘नहीं भैया, मुझे पैसे नहीं चाहिए, उसने मासूमियत से कहा, मैं तो बस ये पूछना चाहती थी कि क्या आप इस किताब को पढ़कर मुझे समझाएंगे?’ उसने अपने पुराने बैग से एक फटी हुई किताब निकाली- ‘प्राथमिक हिंदी’। ट्रेन का समय कम बचा था।</p>
<p style="text-align:justify;">जितना समय था, उसमें मैंने उसे वर्णमाला के कुछ शब्द पढ़वाए और नजदीकी स्कूल में रोज पढ़ने की सलाह दी। जिस दिन मैंने असली शिक्षा का मतलब समझा-वह बच्ची- जिसका नाम पूजा था- रोज मेट्रो स्टेशन पर आकर लोगों से पढ़ने में मदद मांगती थी। उसके माता-पिता कूड़ा बीनते थे, लेकिन उसकी पढ़ाई के लिए हर संभव कोशिश कर रहे थे। मेरी टीचर ने कहा है, पूजा ने गर्व से बताया, एक दिन मैं बड़ी होकर टीचर बनूंगी और गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाऊंगी!</p>
<h3 style="text-align:justify;">तीन सबक जो एक बच्ची ने सिखाए | Literature</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">शिक्षा की भूख सबसे ताकतवर होती है: जब आप सचमुच कुछ सीखना चाहते हैं, तो संसाधनों की कमी रास्ता नहीं रोकती।</li>
<li style="text-align:justify;">गरिमा दान में नहीं, स्वाभिमान में होती है। पूजा ने पैसे नहीं, ज्ञान मांगा।</li>
<li style="text-align:justify;">सबसे बड़ा दान है समय: उस दिन से मैं अपने दोस्तों को हर रविवार गरीब बस्तियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करता हूँ।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">कहानी का अंत नहीं, शुरूआत है। आज पूजा उसी सरकारी स्कूल में पढ़ती है, जहां मेरा दोस्त स्वेच्छा से पढ़ाता है। उसके माता-पिता अब कूड़ा नहीं बीनते, बल्कि हमारे छोटे-से सामुदायिक केंद्र में काम करते हैं। कभी-कभी जिंदगी आपको दस रुपये में ऐसा सबक दे देती है, जो करोड़ों में भी नहीं मिलता। आपके आस-पास भी कोई पूजा हो सकती है। क्या आप उसकी मदद के लिए तैयार हैं? याद रखिए, बदलाव की शुरूआत हमेशा एक छोटे-से कदम से होती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>                                                                                         एन. डी. बारहठ, लेखक एवं स्तंभकार</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="…समय का सही प्रबंधन करना ही बच्चों के लिए सफलता की कुंजी" href="http://10.0.0.122:1245/proper-time-management-is-the-key-to-success-for-children/">…समय का सही प्रबंधन करना ही बच्चों के लिए सफलता की कुंजी</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/ten-rupees-life/article-69946</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/ten-rupees-life/article-69946</guid>
                <pubDate>Mon, 21 Apr 2025 15:35:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2025-04/literature-1.jpg"                         length="62454"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Literature: डर लगता है कि कहीं कोई प्याज की सब्जी को नजर न लगा दे&amp;#8230;.</title>
                                    <description><![CDATA[Literature: हमारे गांव में मेरे पड़ोस में एक औरत रहती थी जिसका नाम निक्की था। हम उसे चाची निक्की कहते थे। असल में मेरे मम्मी-पापा उसे चाची कहते थे, और उनकी देखादेखी हम भी उसे चाची ही कहने लगे थे। उसके तीन बेटे थे, जिनमें सबसे छोटा कोई पांच साल का था। चाची लोगों का […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/onion-vegetable/article-69365"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-04/literature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Literature: हमारे गांव में मेरे पड़ोस में एक औरत रहती थी जिसका नाम निक्की था। हम उसे चाची निक्की कहते थे। असल में मेरे मम्मी-पापा उसे चाची कहते थे, और उनकी देखादेखी हम भी उसे चाची ही कहने लगे थे। उसके तीन बेटे थे, जिनमें सबसे छोटा कोई पांच साल का था। चाची लोगों का सूत कातकर, रजाइयां गाँठकर या छोटे-मोटे काम करके गुजारा करती थी। कभी-कभी वह हमारे चूल्हे, तंदूर या आंगन को भी लीप देती थी। मेरी मां उसके पास से खेस भी बनवाती थी। वह अक्सर चरखे पर बैठी रहती थी। कई बार आस-पड़ोस की औरतें उसे अपने साथ दीवारें लीपने के लिए ले जाती थीं। सर्दियों में वह कभी-कभी किसी के कपास या नरमा चुनने चली जाती थी। इससे उसे चार पैसे मिलते थे और वह घर का खर्च चलाती थी। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">वह मिर्च, मसाला, हल्दी, नमक और सरसों का तेल हमेशा जरूरत के हिसाब से ताजा ही लाती थी और फिर सब्जी बनाती थी। वह इतना तेल लाती थी, जिससे दो या तीन दिन की सब्जी बन जाती। डलियों वाला नमक, साबुत लाल मिर्च, धनिया और हल्दी, जिसे वह वसार कहती थी, को कूँडे में कूटकर सब्जी तैयार करती थी। मैं देखता था कि वह बिना प्याज के ही सब्जी बनाती थी, क्योंकि प्याज भी पैसे से आता था। लहसुन, अदरक और टमाटर डालने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। फिर भी, मुझे उनकी सब्जी देखने में स्वादिष्ट लगती थी। मैं चाहकर भी उस सब्जी का स्वाद नहीं ले पाता था। कभी-कभी वह सिर्फ प्याज की सूखी सब्जी बनाती थी। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">उसे देखकर मेरा मन करता था कि खा लूँ, लेकिन वहां मैं मजबूर हो जाता था। घर आकर मैं अपनी माँ से कहता कि वैसी ही सब्जी बनाएँ, लेकिन मेरी माँ सरसों के तेल की जगह देसी घी, अदरक, लहसुन और प्याज डाल देती थी। वह सब्जी वैसी नहीं बनती थी। मैं रोटी नहीं खाता था। मेरी माँ मुझे डाँटती थी और कभी-कभी हल्का हाथ भी चला देती थी। सेठों का परिवार होने के कारण हम उनसे सब्जी भी नहीं माँग सकते थे। बल्कि कई बार वह मेरी माँ से सब्जी की कटोरी ले जाती थी या मेरी माँ खुद ही उन्हें सब्जी दे देती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर एक बार मैं मंडी में एक फिल्म देखकर आया। शायद उस फिल्म का नाम ‘राजा और रंक’ था। उस फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। मेरे मन में उस देसी सब्जी और बड़ी-बड़ी अनछुई चीजें खाने की लालसा बढ़ती गई। लेकिन अब हम घर में सरसों का तेल ही इस्तेमाल करते हैं। मैं अक्सर वैसी सब्जियां बनवा लेता हूँ। आज बच्चों की माँ से मैंने सिर्फ प्याज की सब्जी खाने की इच्छा जाहिर की। उसने तुरंत काम शुरू कर दिया। डर लगता है कि कहीं कोई प्याज की सब्जी को नजर न लगा दे।<br />
<strong>                                                                                                                 – रमेश सेठी बादल</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Snake: सांपों के लिए हैं ये लक्ष्मण रेखा, घर पर छिड़क दें ये बीज, घुसने से डरेगा सांप" href="http://10.0.0.122:1245/lakshman-rekha-for-snakes/">Snake: सांपों के लिए हैं ये लक्ष्मण रेखा, घर पर छिड़क दें ये बीज, घुसने से डरेगा सांप</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/onion-vegetable/article-69365</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/onion-vegetable/article-69365</guid>
                <pubDate>Sun, 06 Apr 2025 15:44:03 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2025-04/literature.jpg"                         length="80332"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Piece of Land: जमीन का टुकड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[Piece of Land: पूरे बीस बरस बाद-अपने गांव लौटना उसे बड़ा अजीब सा लग रहा था। शाम के धुंधलके में जब वह गांव से थोड़ी दूर मोटर से उतरा तो एक अजीब-सी अनुभूति से भर उठा। गांव को कभी वह छोड़ेगा, इसकी कल्पना भी उसने नहीं की थी, जब वह जवान था, थोड़ी-सी भावुकता में […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/piece-of-land/article-87008"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-03/piece-of-land.jpeg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">Piece of Land: पूरे बीस बरस बाद-अपने गांव लौटना उसे बड़ा अजीब सा लग रहा था। शाम के धुंधलके में जब वह गांव से थोड़ी दूर मोटर से उतरा तो एक अजीब-सी अनुभूति से भर उठा। गांव को कभी वह छोड़ेगा, इसकी कल्पना भी उसने नहीं की थी, जब वह जवान था, थोड़ी-सी भावुकता में वह गांव छोड़ गया था। गांव पटेल की लड़की से उसका विवाह हो गया और वह इंदौर चली गयी। उसके लिये अब गांव वीरान हो गया था, कहीं दिल नहीं लगता था। घर से दो सौ रुपये लेकर एक चिट्ठी लिखकर बिना कुछ कहे वह चला गया था।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">शहर में दो सौ रुपये कपूर की तरह उड़ गये और उसे मिली परेशानी और भूख, लेकिन उसके मन में एक ही इच्छा थी, वह जिस शहर में रहता है वहां उसकी प्रेयसी तो है। कभी तो दिखेगी, कभी तो मिलेगी। भूखा रहा किन्तु गांव नहीं लौटा। खराब समय था, वह भी चला गया, छोटा-सा सहारा मिला। उसने भी उस सहारे को थाम लिया। देखते-देखते दिन बरसों में बदल गये। एक अच्छी खासी संपत्ति का वह मालिक बन गया। एक दिन वह कार से कहीं जा रहा था, तब ही दृष्टि सड़क पर दो बच्चों के साथ अपने पति को लिये खुश-खुश उसकी प्रेयसी पर पड़ी। लगा चलती कार के सामने कोई बड़ा पत्थर आ गया हो कार नहीं रुकी, न उसने ड्राइवर को रुकने को कहा। उसी दिन उसे लगा गांव ही नही, शहर भी मनुष्य के प्रेम को लील लेता है और टूटन की पीड़ा को वह सहता चुपचाप अपने दिनों को काटने लगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">काम का बोझ अधिक था। उसका रक्तचाप भी अधिक रहने लगा था। चिकित्सकों ने उसे आराम करने की सलाह दी किन्तु आराम उसके जीवन में कहां था। कभी-कभी सपनों में उसे अपने खेत, घर, पिताजी, माताजी का चेहरा याद आ जाता था। वह इन सबसे मुक्त भी नहीं हो पाता था कि अचानक भैया-भाभी का चेहरा याद आ जाता था। न जाने घर का क्या हाल होगा। न जाने गांव, खेत कैसे होंगे, जब भी स्मृतियों का दंश उसे डंसता वह कई दिनों तक परेशान रहता। उसे इस बात की प्रसन्नता होती कि इस शहरी संपत्ति के अतिरिक्त गांव में भी उसकी संपत्ति है। जहां उसकी जड़ें हैं, वह जब भी चाहेगा जाकर रह सकता है, फिर एक दिन अचानक घबराहट, सीने के दर्द के बाद डॉक्टरों ने उसको आराम करने की हिदायत दे दी। दु:खी मन से उसने अपने निजी व्यक्तियों को सारा काम बतलाया और शहर से गाड़ी में बैठकर रातभर का रास्ता काटा और प्रात: स्टेशन से बस पकड़ी तो शाम को वह अपने गांव में उतर पाया था। न जाने इतने बरसों में उसके जीवन से कितना कुछ चला गया। वही रास्ता, वही पगडंडियां।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उसने अटैची उठाई और आगे बढ़ने लगा। गांव में विशेष कोई फर्क नहीं पड़ा था। घर के सामने पहुंचा, घर में पूर्व से थोड़ा सुधार हो चुका था। बाहर बरामदे में माताजी बैठी थीं। पास में कम रोशनी का बल्ब जल रहा था। (उसके जाने के समय गांव में बिजली नहीं थी)। माताजी के हाथ में माला थी, वह गुरिया घुमा रही थीं। उसने अटैची रखी और जाकर सामने खड़ा हो गया। कितनी झुर्रियां चेहरे पर आ गयी थीं, सिर के बाल सफेद हो गये थे। वह जब छोटा था, तब माताजी के सफेद बाल तोड़ता था। बदले में माताजी उसे बासी रोटी का लड्डू बनाकर खिलाती थीं। माताजी ने अपनी दृष्टि ऊपर उठाई कुछ चौंक पड़ीं और पूछा कौन है। मैं हूं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">चश्मे के पीछे से असफल पहचानने का प्रयास करते हुये माताजी ने पूछा<br />
किससे मिलना है?<br />
किसी से नहीं तुमसे मिलने ही आया था।<br />
क्या काम है।<br />
वह अपने को संभाल न सका और वहीं पांव के पास बैठकर घुटनों में सिर देकर फूट-फूटकर रोने लगा। रोने का कंपन और भींगे स्वरों को माताजी ने पहचान लिया और एकदम चौंक पड़ीं क्यों रे तू छोटू तो नहीं है?<br />
हां अम्मा मैं ही हूं।<br />
माताजी ने कांपते हाथों से उठाया और गले से लगाकर स्वयं भी रोने लगीं। रोते-रोते मैंने माताजी के चेहरे को ध्यान से देखा तो चौंक पड़ा, माताजी के माथे पर लाल टीका, गले में मंगलसूत्र नहीं था, मैंने भरार्ये गले से ही पूछा- अम्मा, बाबूजी… मैं पूरा वाक्य भी नहीं कर पाया था कि अम्मा ने रोते हुए ही कहा-तेरी याद करते-करते प्राण त्याग दिये। अरे तूने एक चिट्ठी भी नहीं डाली। क्या हम इतने गैर हो गये थे?</h6>
<h6 style="text-align:justify;">बाबू के विषय में मालूम पड़ते ही और तरल हो उठा वह। पिताजी की न जाने कितनी मीठी-तीखी स्मृतियां मस्तिष्क में आईं और चली गईं। वह हर स्मृति पर रोता रहा। उसे नहीं लगा कि वह अभी भी माताजी के सामने वही छोटा-सा छोटू हूं। वह अभी पीड़ा के इस भाव से उभर भी नहीं पाया था कि भाभी आश्चर्य में दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयीं। उसने आंसू पोंछते हुये उनके पांव छुए। वे कुछ झिझकीं फिर एकदम से पहचानकर कह उठीं- अरे तू। उनका तू कहना मुझे बहुत भाया, तब ही एक दस-बारह साल का लड़का एवं उसके साथ पांच-सात साल की एक लड़की अपरिचित से आकर खड़े हो गये। Piece of Land</h6>
<h6 style="text-align:justify;">भाभी ने उन्हें कहा- तुम्हारे चाचा हैं नमस्ते करो। दोनों ने हाथ जोड़कर नमस्ते किया। नेत्रों में कहीं पहचान का कोई सूत्र नहीं था। भाभी ने अटैची उठायी माताजी के साथ वह घर के भीतर आया। हाथ-पांव धोकर पलंग पर बैठा था कि दरवाजे पर बड़े भैया आकर खड़े हो गये। एक-दो क्षण वह उन्हें देखता रहा। उन्होंने आगे बढ़कर उसे अपने सीने से लगा लिया। भैया कितने दुबले हो गये थे। आंखों के नीचे गड्ढे, खिचड़ी बाल, गर्दन के नीचे हड्डियां निकल आई थीं। कुछ समय तक उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, न वह पूछने की स्थिति में रहा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">रात को बड़े दिनों बाद भाभी के हाथ का बना भोजन वहीं रसोई में बैठकर किया। साथ में माताजी भी थीं, जो दूध में रोटी गलाकर खा रही थीं। बच्चे पूर्व में ही भोजन कर चुके थे। पूरे परिवार में किसी ने अभी तक उसके जीवन के बीस वर्षों का हिसाब-किताब नहीं पूछा था, न ही वह बता सकने की स्थिति में था। भोजन करके वह थकान के कारण शीघ्र सो गया। प्रात: उसकी नींद देर से खुली। माताजी ने भी जगाना उचित नहीं समझा था। उठकर लगा तबियत हल्की हो गयी है। हाथ-मुंह धोकर भैया के विषय में पूछा तो ज्ञात हुआ, भैया खेत पर चले गये हैं। उसने नाश्ता किया और बड़े भैया के बड़े पुत्र जिसका नाम अनिल था, उसे लेकर खेत पर निकल गया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">गांव की हालत पूर्व की तरह ही थी। विशेष कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसके आने का समाचार अनिल एवं भैया- भाभी द्वारा प्रात: से ही फैला दिया गया था परिणामस्वरूप कई जगह रोककर उसका हालचाल पूछा जा रहा था। एक-दो बुजुर्गों ने तो ‘घरवाली को क्यों नहीं लायेझ् भी पूछ लिया था। वह हंसकर आगे बढ़ गया था। कुछ प्रश्न बड़े स्वाभाविक होते हैं किन्तु उसके उत्तर उतने ही विषम होते हैं। वह प्रश्न उसके सीने में कांटे की तरह चुभकर पीड़ा देता रहा और वह उसी स्थिति में खेत पर पहुंचा। भैया खेत में कीटनाशक औषधि डाल रहे थे। दूर-दूर तक फैली खेत की हरियाली मन को मोह रही थी। Piece of Land</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उसने भैया से कहा- लाइये, मुझे तसला दे दें, मैं उड़ा देता हूं।<br />
नहीं रे तू तो बैठ। कहकर वे आगे बढ़ गये, फिर उसने पूछा- भैया अपने खेत और बढ़े हैं या…?<br />
तेरे जाने के बाद कुल जमा पांच एकड़ खेत और खरीदा है। अब अपने खेत चालीस एकड़ हो गये हैं।<br />
कहां से कहां तक खेत हैं?<br />
उन्होंने अपने लड़के को आवाज देकर कहा- अनिल, जा तेरे काका को खेत दिखा ला।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वह अनिल के साथ हो लिया और पूरा खेत देखकर विचार आया कि बड़े भैया ने पिछले बरसों में काफी मेहनत की है। घर चलाने के अतिरिक्त थोड़ी जमीन भी बना ली है। वह वहीं से घर को लौट आया। वह पटवारी से मिलकर पिताजी की कोई और जमीन-जायदाद तो नहीं है, का पता लगा लेना चाह रहा था। उसने अपना विचार अनिल को बताया। उसी ने तुरंत सामने साइकिल से आते पटवारी को दिखलाया। उसने पटवारी दादा को रोका। जेब से सौ का नोट निकालकर दिया और जमीन की बात की। नक्शा बगैरह बनवाने की चर्चा की। उसने एक-दो दिन में पूरा काम निपटा देने का आश्वासन दिया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वह घर लौटा तो भाभी गाय को चारा डालती बाहर ही दिखाई दे गयीं। वह अंदर चला गया। (Piece of land) अनिल वहीं बाहर रुक गया। अनिल ने खेत जानने की पटवारी से मिलकर जो चर्चा की थी उसे एक जासूस की तरह कह दिया। शाम को भैया से भेंट हुई उस दिन का पूरा समय आराम से कट गया। प्रात: मैं शीघ्र उठ गया था किन्तु पूरे परिवार के सदस्यों के व्यवहार में एक तनाव व्याप्त था। अम्मा भी बात तो कर रही थीं किन्तु ऐसा लगा वह पुरानी अम्मा नहीं होकर कुछ तेज समझदार मां हो गयी है। दो दिनों पश्चात पटवारी घर पर ही आ गया। उसने कागज, नक्शे वगैरह दिये। मैंने उसे सौ का एक नोट और दिया। कागज, नक्शे आदि को भाभी छिपकर दरवाजे की आड़ में से देख रही थीं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अगले दिन प्रात: वह तहसील कार्यालय के लिये निकला तो गांव के पुराने परिचित मिल गये। उन्हें मैंने कह दिया कि घर पर बता देना मैं तहसील कार्यालय जा रहा हूं। पूरा दिन तहसील कार्यालय में व्यतीत किया। चरमराती सरकारी कार्यवाहियों से उलझा और परेशान थका हुआ शाम को लौटा। घर में आते ही उसने कागजों को अटैची में रख दिया और विचार किया प्रात: भैया से चर्चा कर लूंगा। हाथ-मुंह धोकर भोजन करने बैठ गया। दोनों भतीजे उससे बड़े सहमे-सहमे थे। भाभी भी विशेष कुछ नहीं बोल रही थीं। अम्मा हाथ में तुलसी की माला लेकर बाहर बैठ गयी थीं। उसने खाना खाते हुये भैया से कहा-कल मैं शहर जाने की सोच रहा हूं।<br />
कुछ और रुकते। थोड़ा काम अधिक है। ठीक है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इससे अतिरिक्त कोई चर्चा नहीं हुई। रात में जब सोया तो अनायास आंखों में आंसू भर आये, कब तक ये आंसू बहकर तकिये को गीला करते रहे, नहीं जानता। प्रात: वह जल्दी उठ गया और तैयार हो गया। सब दरवाजे तक छोड़ने आये थे किन्तु व्यवहार में आत्मीयता नहीं थी। इन सबको क्या हो गया, नहीं जान पाया। अचानक ध्यान आया, उसने अटैची खोली और जायदाद के कागज निकाले और भैया से कहा- भाई साहब, आपसे कुछ कहना है, कागज देखकर उनका मुख मलिन हो गया। वे उसके साथ एक तरफ हो गये। लगा कि उनके धीरज का बांध टूटने वाला है। तब ही उसने कहा पिताजी के खेत, घर जो कुछ चल-अचल संपत्ति थी, वह आपके नाम कर दी है। शायद अब मेरा आना गांव में हो या न हो, इसलिये तहसील से सब पक्के कागज तैयार करवा लाया हूं। कहकर उसने उन्हें कागज थमा दिये। भैया, जो अब तक चुप थे इतने जोर से रो उठे कि वह स्वयं दंग रह गया। आवाज सुनकर भाभी भी उस ओर आ गयीं। भैया को जोर से रोता देखकर वह नहीं समझ पायीं कि क्या हुआ है?</h6>
<h6 style="text-align:justify;">भैया के हाथ में कागज थे, उसने उनकी पीठ पर हाथ रखा। अम्मा के, भाभी के चरण छूकर तुरंत बाहर निकल आया। मोटर मिल गयी थी। शहर की ओर जा रहा था कि कुछ थोड़ा बहुत गांव से जुड़ा था, वह भी आज टूट गया। अच्छा हुआ उनका भ्रम भी खत्म हुआ और पूरे परिवार का मुझे लेकर जो डर था वह भी। क्या शहरी आदमी वास्तव में इतना प्रदूषित हो चुका है, जितना गांव वाले सोचते हैं। बस तेज गति से उसके गांव से दूर प्रतिपल ले जा रही थी। भैया के आंसू की नमी वह अभी तक अपने भीतर अनुभव कर रहा था।</h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><em>डॉ. गोपाल नारायण आवटे</em></strong></h6>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="गजल : कोई आँसू बहाता है…" href="http://10.0.0.122:1245/ghazal-someone-sheds-tears/">गजल : कोई आँसू बहाता है…</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/piece-of-land/article-87008</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/piece-of-land/article-87008</guid>
                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 16:14:21 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2025-03/piece-of-land.jpeg"                         length="22492"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Dream Room: स्वप्न कक्ष</title>
                                    <description><![CDATA[Dream Room: एक शहर में एक परिश्रमी, ईमानदार और सदाचारी लड़का रहता था। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, रिश्तेदार सब उसे बहुत प्यार करते थे। सबकी सहायता को तत्पर रहने के कारण पड़ोसी से लेकर सहकर्मी तक उसका सम्मान करते थे। सब कुछ अच्छा था, किंतु जीवन में वह जिस सफलता प्राप्ति का सपना देखा करता था, […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/dream-room/article-87081"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-12/dreem.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">Dream Room: एक शहर में एक परिश्रमी, ईमानदार और सदाचारी लड़का रहता था। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, रिश्तेदार सब उसे बहुत प्यार करते थे। सबकी सहायता को तत्पर रहने के कारण पड़ोसी से लेकर सहकर्मी तक उसका सम्मान करते थे। सब कुछ अच्छा था, किंतु जीवन में वह जिस सफलता प्राप्ति का सपना देखा करता था, वह उसे उससे कोसों दूर था। वह दिन-रात जी-जान लगाकर मेहनत करता, किंतु असफलता ही उसके हाथ लगती। उसका पूरा जीवन ऐसे ही निकल गया और अंत में जीवनचक्र से निकलकर वह कालचक्र में समा गया। चूंकि उसने जीवन में सुकर्म किये थे, इसलिए उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। देवदूत उसे लेकर स्वर्ग पहुँचे। स्वर्गलोक का अलौकिक सौंदर्य देख वह मंत्रमुग्ध हो गया और देवदूत से बोला, ‘ये कौन सा स्थान है?’</h5>
<h5 style="text-align:justify;">‘ये स्वर्गलोक है। तुम्हारे अच्छे कर्म के कारण तुम्हें स्वर्ग में स्थान प्राप्त हुआ है। अब से तुम यहीं रहोगे।’ देवदूत ने उत्तर दिया। यह सुनकर लड़का खुश हो गया। देवदूत ने उसे वह घर दिखाया, जहां उसके रहने की व्यवस्था की गई थी। वह एक आलीशान घर था। इतना आलीशान घर उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था। देवदूत उसे घर के भीतर लेकर गया और एक-एक कर सारे कक्ष दिखाने लगा। सभी कक्ष बहुत सुंदर थे। अंत में वह उसे एक ऐसे कक्ष के पास लेकर गया, जिसके सामने ‘स्वप्न कक्ष’ लिखा हुआ था। Dream Room</h5>
<h5 style="text-align:justify;">जब वे उस कक्ष के अंदर पहुँचे, तो लड़का यह देखकर दंग रह गया कि वहाँ बहुत सारी वस्तुओं के छोटे-छोटे प्रतिरूप रखे हुए थे। ये वही वस्तुयें थीं, जिन्हें पाने के लिए उसने आजीवन मेहनत की थी, किंतु हासिल नहीं कर पाया था। आलीशान घर, कार, उच्चाधिकारी का पद और ऐसी ही बहुत सी चीजें, जो उसके सपनों में ही रह गए थे। वह सोचने लगा कि इन चीजों को पाने के सपने मैंने धरती लोक में देखे थे, किंतु वहाँ तो ये मुझे मिले नहीं। अब यहाँ इनके छोटे प्रतिरूप इस तरह क्यों रखे हुए हैं? वह अपनी जिज्ञासा पर नियंत्रण नहीं रख पाया और पूछ बैठा, ‘ये सब यहाँ इस तरह इसके पीछे क्या कारण है?’</h5>
<h5 style="text-align:justify;">देवदूत ने उसे बताया, ‘मनुष्य अपने जीवन बहुत से सपने देखता है और उनके पूरा हो जाने की कामना करता है। किंतु कुछ ही सपनों के प्रति वह गंभीर होता है और उन्हें पूरा करने का प्रयास करता है। ईश्वर और ब्रह्मण्ड मनुष्य के हर सपने पूरा करने की तैयारी करते है। लेकिन कई बार असफलता प्राप्ति से हताश होकर और कई बार दृढ़ निश्चय की कमी के कारण मनुष्य उस क्षण प्रयास करना छोड़ देता है, जब उसके सपने पूरे होने वाले ही होते हैं। उसके वही अधूरे सपने यहां प्रतिरूप के रूप में रखे हुए है। तुम्हारे सपने भी यहाँ प्रतिरूप के रूप में रखे है। तुमने अंत समय तक हार न मानी होती, तो उसे अपने जीवन में प्राप्त कर चुके होते। ’लड़के को अपने जीवनकाल में की गई गलती समझ आ गई। किंतु मृत्यु पश्चात अब वह कुछ नहीं कर सकता था।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">किसी भी सपने को पूर्ण करने की दिशा में काम करने के पूर्व यह दृढ़ निश्चय कर लें कि चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न आये? चाहे कितनी बार भी असफलता का सामना क्यों न करना पड़े? अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में तब तक प्रयास करते रहेंगे, जब तब वे पूरे नहीं हो जाते। अन्यथा समय निकल जाने के बाद यह मलाल रह जाएगा कि काश मैंने थोड़ा प्रयास और किया होता। अपने सपनों को अधूरा मत रहने दीजिये, दृढ़ निश्चय और अथक प्रयास से उन्हें हकीकत में तब्दील करके ही दम लीजिये। Dream Room</h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>अन्य <a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a> हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/dream-room/article-87081</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/dream-room/article-87081</guid>
                <pubDate>Tue, 17 Dec 2024 17:43:27 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-12/dreem.jpg"                         length="26647"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Unique Relation: अनोखा एवं पवित्र रिश्ता</title>
                                    <description><![CDATA[Unique Relation: यह बात कुछ पुरानी भी नहीं है और न ही नई। पांच-सात साल पहले की बात है। समय कब बदल जाता है कुछ पता नहीं चलता, लेकिन पता तब चलता है जब हमें उस रिश्ते का एहसास होता है। यह अनुभव बहुत ही अनोखा है और उतना ही सुंदर तथा पवित्र भी, जितना […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/unique-and-sacred-relationship/article-87078"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-10/facebook.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Unique Relation: यह बात कुछ पुरानी भी नहीं है और न ही नई। पांच-सात साल पहले की बात है। समय कब बदल जाता है कुछ पता नहीं चलता, लेकिन पता तब चलता है जब हमें उस रिश्ते का एहसास होता है। यह अनुभव बहुत ही अनोखा है और उतना ही सुंदर तथा पवित्र भी, जितना हम किसी रिश्ते को समझते है वह उससे कई गुना बढ़कर होता है। जिस तरह माँ का अपने बच्चों से जो रिश्ता होता है वह बहुत ही पवित्र एवं निस्वार्थ होता है। आज के युग में लोग इतना व्यस्त रहते है कि वह अपने जीवन को ही भूल जाते है। माला अपनी पढ़ाई कर रही थी। जब वह बीए के अंतिम वर्ष में पढ़ाई कर रही थी तो उसने एक फोन खरीदा था। माला को फोन इतना ही चलाना आता था कि कॉल को रिसिव कर सकें और काट सकें। समय बदल रहा था। समय के साथ लोगों की सोच भी बदल रही थी। माला भी अपनी पुरानी सोच को त्याग कर नए सिरे से जीवन जी रही थी। समय बदलता गया, माला ने अब छोटा फोन रखना बंद कर दिया क्योंकि उसके भाई ने उसे एंड्राइड फोन दिला दिया था। अब माला के लिए एंड्राइड फोन चलाना ऐसा था जैसे कोई पहली बार देश के लिए लड़ने जा रहा हो, पर दोस्तों की सहायता से उसने धीरे-धीरे फोन को चलाना सीख लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">माला ने अपने करीबी दोस्तों की मदद से फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाया। उसकी दोस्ती फेसबुक पर बहुत से लोगों से हुई। उसने सुना था कि फेसबुक और वट्सएप पर अनजान लोगों से दोस्ती करना ठीक नहीं होता, पर माला फेसबुक पर दोस्तों से बात करती गई। काफी दोस्त उसे मिलने को कहते थे और काफी लोगों ने उसका फोन नंबर भी मांगा। हद तो यहां तक हो गई कि कुछ ने तो शादी का भी प्रस्ताव रखा, लेकिन माला ने किसी की बात नहीं सुनी। समय का पहिया किसी का इंतजार नहीं करता। वह अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ता रहता है। माला के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, वह फेसबुक और वाट्सअप की दुनिया में व्यस्त रहती है। जाने-अनजाने में उसकी दोस्ती एक ऐसे इंसान से हो गई जिसे वह नहीं जानती थी, जिससे वह बात करती थी वह महेश नाम का लड़का था। महेश बेहद पढ़ा-लिखा और नौकरी करता था।</p>
<p style="text-align:justify;">माला और महेश की काफी दिनों तक फेसबुक मेसेज पर बात चलती रही। हर पल वह फोन को हाथ में लिए बैठी रहती। इसी इंतजार में कहीं महेश का तो मैसेज नहीं आया है? एक दिन महेश ने माला से कहा कि आप अपनी फोटो भेजो। माला ने अपनी फोटो भेज दी, पर वह बहुत डरी हुई थी, क्योंकि लोगों से सुना था कि फेसबुक पर फोटो भेजने से उसका गलत प्रयोग किया जाता है। पर माला को महेश पर पूरा विश्वास था और उसने अपनी फोटो महेश को भेज दी। फिर अब महेश की बारी थी, फोटो भेजने की। माला को भी महेश को देखना था। इसलिए महेश से उसने उसकी फोटो मांगी। महेश ने भी बिना सोचे फोटो भेज दी, फोटो देखकर माला ने सोचा, वह लड़का फोटो में बहुत ही अजीब सा लग रहा है। इसी बीच माला ने महेश से आठ-दस महीने तक बात बंद कर दी। महेश के मैसेज आते रहे, पर माला ने कोई जवाब नहीं दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अब माला का बड़ी कक्षा में दाखिला हो गया था। उस कक्षा में माला को किसी ऐसे व्यक्ति की जरुरत थी जो उसकी पढाई में मदद कर सकें। एक दिन माला आराम कर रही थी तो अचानक उसे महेश की याद आई। माला उठी और दोबारा से फेसबुक पर महेश को ढूंढना शुरू किया और महेश को मैसेज किया। महेश ने कहा कि कितने दिनों के बाद याद किया, कहां थी? फिर माला ने बताया कि मेरा दाखिला बड़ी कक्षा में हो गया है और मैं बहुत व्यस्त थी। पर अभी मुझे आप के मदद की आवश्यकता है। महेश ने अगले ही क्षण उत्तर दिया- काम बोलो, क्या करना है? आपका काम हो जाएगा। माला को यह उत्तर अपेक्षित नहीं था। वह कुछ देर के लिए सुन अवस्था में चली गई। कोई जवाब नहीं दिया और महेश का मैसेज पर मैसेज आते गए-बोलो क्या करना है? कुछ समय पश्चात माला को एहसास हुआ कि, सुनी-सुनाई सब बातें सही नहीं होती। जीवन में कुछ रिश्ते काफी पवित्र होते है और बहुत अनोखे भी, पर हमें उनका एहसास बहुत समय बाद होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">माला का काम महेश ने कर दिया। आज भी महेश ने माला को देखने की, मिलने की जिद्द नहीं की और ना ही माला ने भी। फेसबुक से दोनों की बाते धीरे-धीरे फोन पर जारी हो गई, परंतु वह अब भी एक-दूसरे से मिलने की बात नहीं करते। दोनों का यह रिश्ता इतना विश्वास का है। माला भी महेश के किसी बात को मना नहीं करती और न महेश माला के काम को कभी मना करता है। मैंने सुना था कि जोड़ी ऊपरवाला बनाता है। पर दोस्ती, शादी, जीवन, मृत्यु सबको ऊपर भगवान के घर पर ही मजूंरी मिल जाती है। आज के युग में एक सच्चा दोस्त मिलना बहुत मुश्किल है लेकिन माला को एक अनोखा एवं सच्चा दोस्त मिला है। वो हमेशा भगवान का शक्रगुजार रहेगी। हमने पकड़ी थी रिश्तों की डोर। कुछ इस तरह पता नहीं कब वो देखते…अनोखे अनुभव बन गए।<br />
<strong>                                                                                                               -डॉ. सरिता यादव</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Dry Clean: कैसे करें घर पर वूलन कपड़ों पर ड्राई क्लीन" href="http://10.0.0.122:1245/how-to-dry-clean-clothes-at-home/">Dry Clean: कैसे करें घर पर वूलन कपड़ों पर ड्राई क्लीन</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/unique-and-sacred-relationship/article-87078</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/unique-and-sacred-relationship/article-87078</guid>
                <pubDate>Sat, 26 Oct 2024 16:19:02 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-10/facebook.jpg"                         length="28570"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Motivational Story: Sanar : प्रेरक कहानी: संस्कार</title>
                                    <description><![CDATA[एक घर मेें तीन भाई और एक बहन थी। बड़ा और छोटा पढ़ने में बहुत तेज थे। उनके मां-बाप उन चारों से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे। बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डॉक्टर बन गया। छोटा भी पढ़-लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल आवारा और गंवार बनके ही […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/motivational-story-sanar/article-87063"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-08/motivational-story-sanskar.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">एक घर मेें तीन भाई और एक बहन थी। बड़ा और छोटा पढ़ने में बहुत तेज थे। उनके मां-बाप उन चारों से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे। बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डॉक्टर बन गया। छोटा भी पढ़-लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल आवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई। बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयों ने मैरिज की थी। बहन की शादी भी अच्छे घराने में हुई थी। आखिर भाई सब डॉक्टर इंजीनियर जो थे। अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी। बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था। वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो…नौकरी कौन देता। मझले की शादी किए बिना बाप गुजर गए। मां ने सोचा कहीं अब बंटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी। शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">दोस्तों ने कहा… ए चन्दू आज अड्डे पे आना। चंदू-आज नहीं फिर कभी दोस्त – अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया? चंदू – अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज कल और होगा। घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है। मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दी गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी…फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कॉलेज में नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मां बाप से मिलते हैं। इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की…जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा। मां के लाख मना करने पर भी…बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं ।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है। चंदू – तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से में जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर। बहन- अरे बेवकूफ …तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें मां- अरे चंदू आज रूक जा। बंटवारे में कुल दस बीघा जमीन में दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं। और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है तभी चंदू जोर से चिल्लाता है। अरे! फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है? दोनों भाई हंसकर बोलते हैं अरे मूर्ख…बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से में सिर्फ उसका मायका ही है। चंदू – ओह… शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है। ठीक है आप दोनों ऐसा करो। मेरे हिस्से की वसीयत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो। दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं। और तूं? चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है मेरे हिस्से में माँ है न……। फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके…क्यों चंदूनी जी…क्या मैंने गलत कहा? चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इससे बड़ी वसीयत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासू मिली और बाप जैसा ख्याल रखने वाला पति। बस यही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा में बदल दिया। बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..माफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको। चंदू – इस घर में तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का। बहुओं को जलाने की हिम्मत किसी मेें नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दूर। माँ का चुनाव इसलिए किया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जहां हमने साथ साथ 9 – 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ। दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी आखों में पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।</h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><em>-लोकेश जैन, कोटा (राजस्थान).</em></strong></h6>
<p><strong>अन्य <a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a> हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/motivational-story-sanar/article-87063</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/motivational-story-sanar/article-87063</guid>
                <pubDate>Fri, 02 Aug 2024 17:35:34 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-08/motivational-story-sanskar.jpg"                         length="23509"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक ही कामवाली के कई-कई रूप और अनेकानेक व्याख्याएं</title>
                                    <description><![CDATA[Female Servant Story: मेरी गली में भी कामवालियों को लेकर रोज ही चकल्लस चला करतीं। गली की मेमसाहबें कभी उनकी तारीफें करते न अघातीं तो कभी बुराइयां करते-करते। एक ही कामवाली के कई-कई रूप और अनेकानेक व्याख्याएं। बुराई-भलाई करने का भी एक अलग निंदारस चला करता जैसे कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव चल रहा हो। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/many-forms-and-many-interpretations-of-the-same-work/article-87103"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-08/fmale-servent.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Female Servant Story: मेरी गली में भी कामवालियों को लेकर रोज ही चकल्लस चला करतीं। गली की मेमसाहबें कभी उनकी तारीफें करते न अघातीं तो कभी बुराइयां करते-करते। एक ही कामवाली के कई-कई रूप और अनेकानेक व्याख्याएं। बुराई-भलाई करने का भी एक अलग निंदारस चला करता जैसे कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव चल रहा हो। आलस्य व प्रमाद के चलते कई तो इतनी डौल-बेडौल हो गई थीं, जब वे चक्कलस बाजार लगाने आतीं तो ऐसा लगता कि जैसे कि वे किसी गुफा से निकलकर आ रही हों। सबके ही अपने-अपने भौतिक सुख, अहम और नाज नखरे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरे भी एक बहुत घनिष्ठ मित्र हैं सुखलाल जी। सुखलाल जी का अपने नाम के अनुरूप स्वभाव भी था। वह दुख-सुख में हमेशा प्रसन्न रहा रहते। उन्हें समाज के कुछ चुनिंदा लोगों ने बिना वजह खूब परेशान भी किया और अब भी लोग करने से न चूकते जैसे कि बेचारे ईश्वर के यहां से परेशानियों का पट्टा ही लिखवाकर लाए हों। उन्हें कभी कोई पड़ोसी परेशान करता तो कभी दामाद जी, तो कभी बेटी जी, तो कभी पत्नी जी। वह बेचारे दुनिया भर के लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने की पूरी कोशिश करते रहते। नदी की तरह बहकर लोगों को सुख ही पहुंचाने का प्रयास करते रहते।</p>
<p style="text-align:justify;">परेशान करने के भी लोगों के पास अलग-अलग हथकंडे थे। कोई विषभरी वाणी और व्यवहार से वेद पाठ करता रहता तो कोई अपनी कार्यशैली से ही। उदाहरण स्वरूप कई पड़ोसी सुबह और शाम के वक्त पतंगबाजों का मजमा लगाकर सुखलाल जी के पढ़ने-लिखने में रंग में भंग डालते रहते तो कभी योग और छत पर सैर करने में। कुछ पड़ोसी रात के बारह बजे तक गली में ऐसा हंगामा काटते कि उनका सोना भी हराम हो जाता। कुछ पड़ोसी जानबूझकर उनके घर के सामने हार्न बजाते तो कभी बम-पटाखेबाजी कर जलती हांडिया ही तोड़ देते। इस तरह तमाम तरह के लोगों ने परेशान करने के आविष्कार कर रखे थे। इसी तरह सुखलाल जी के सगे संबंधी भी करते कि हमेशा अपने-अपने कर्तव्यों से विमुख होकर अधिकारों के लिए उनसे जंग करते रहते और करने के लिए हमेशा आतुर रहते। दूर रहकर भी न स्वयं चैन से रहते और न ही सुखलाल जी को रहने देते। Female Servant Story</p>
<p style="text-align:justify;">चलो छोड़ों भी यह सब। यह सब तो वे अपनी जन्म कुंडली में ही लिखवाकर लाए थे, सो सब झेलकर संतोष करते रहते। सुखलाल जी रिटायरमेंट के बाद भी अकेले ही बना-खा रहे थे। उनकी पत्नी जी बहुत दूर अपने ही मधुवन में अकेले ही मस्त रहकर सुख महसूस किया करतीं उन्हें सुखलाल जी के सुख-दुख से कोई मतलब न था। हमेशा ही अधिकारों के लिए जंग करके अपने भौतिक सुखों में मस्त रहा करतीं। उन्हें अपने सुख में सुख नजर आता और अपने दुख में दुख। पति जाए भाड़ में।</p>
<p style="text-align:justify;">अरे ये भी छोड़िए। उनके तो बहुत सारे पशु-पक्षी भी अच्छे दोस्त थे। सुखलाल जी को रिटायर हुए लगभग छह वर्ष से अधिक हो गए थे। आजकल पूरे देश में कोरोना चल रहा था। वे पूरी तरह कोरोना से प्राण बचाने के लिए बहुत सारी सावधानियां बरतते रहते। कामवाली से भी मास्क लगाने की कहते। कदाचित लोगों को देखकर हैरान भी होते कि लोग जानबूझकर कोरोना से पंगा लेने को आतुर हैं, उसे कमजोर समझकर कोई बचाव या सावधानी नहीं बरत रहे हैं, इसलिए देश कोरोना मरीजों के मामले में अव्वल दर्जे पर पहुँचने का रिकार्ड बनाने जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">सुखलाल जी के घर पर बर्तन और सफाई करने लिए तीन माह से एक नई कामवाली आ रही थी। नाम भी उसका बड़ा प्यारा-सा लेकिन सुखलाल जी उसका नाम जल्दी बताना नहीं चाहते थे, क्योंकि उसके गुण ही इतने सारे थे कि नाम भी उसके आगे बिल्कुल फीका पड़ जाए। Female Servant Story</p>
<p style="text-align:justify;">कामवालियां अक्सर सीधी सादी-सी ही होती हैं, कुछ अपवाद और विवादों को छोड़कर। बेचारी मजबूरी में ही काम करती हैं। किसी का पति शराबी निकल आता तो किसी का आदमी मर जाता लेकिन एकाध ऐसी भी थीं कि घर में अधिक सुख सुविधाएं जुटाने के लिए, महंगा मोबाइल प्रयोग करने के लिए या किसी को अपने जाल में फंसाने के लिए ही दूसरों घरों में घरेलू काम किया करतीं, अर्थात झाडू, पौंछा और खाना बनाने आदि का।</p>
<p style="text-align:justify;">सुखलाल जी की नई कामवाली भी तीसरे प्रकार की कैटेगरी में ही लगी। उसे उनकी एक रिश्तेदार की कामवाली ने बड़े अहसान से लगवाया था जैसे कि वह माह में पगार न ले। उसका आदमी भी दस-पंद्रह हजार रुपये कमाता। उसके तीन बच्चे थे, लेकिन उसके स्वप्न बहुत ही बड़े-बड़े थे जिन्हें पूरा करने के चक्रव्यूह में वह काम पर ही जादू की छड़ी चलाना चाहती कि फूंक मारूं कि काम खत्म हो जाए अर्थात वह इतनी जल्दी काम करती कि पलक झपकी नहीं कि झाडू लग गई। एक-डेढ़ घण्टे का काम वह तिहाई समय में ही पूरा करने की जुगत में अच्छे से कभी काम न करती, बस औपचारिकता भर निभाना चाहती। कुछ टोका टाकी कर दी तो नाक-भौं ऐसी सिकोड़ती कि काम छोड़ने की धमकी तक दे डालती। वह मधुमक्खी की तरह झटपट उड़ती फिरती। जिस कामवाली ने उसे काम पर लगवाया था उसी पर बुराइयों की कीचड़ उछाल कर स्वयं पाक साफ बनने का नाटक किया करती व झूठे ही आनन्द रस लेने में मग्न रहती।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वप्न बड़े-बड़े। एंड्रायड स्मार्टफोन रखनेवाली, व्हाट्सएप और फेसबुक का प्रयोग करने वाली। जिस दिन लगी, उस दिन से ही बड़ी-बड़ी बातें जबकि सुखलाल जी तभी बोलते जब कोई काम बिगड़ा हुआ बताना हो। दो-तीन बाद ही एंड्रायड मोबाइल के खराब होने की कहानी बताकर गढ़ी गई, फोन की डिमांड शुरू हो गई। सुखलाल जी बहुत भोले थे, कदाचित दे भी देते क्योंकि उनके पास एक अतिरिक्त मोबाइल था लेकिन ईश्वर ने उनसे मना करा दिया। यदि दे देते तो संभवत: बाद में कुछ अन्य डिमांड शुरू हो जातीं या मांगने पर आरोप-प्रत्यारोप भी मड़ दिए जाते। कुछ भी हो सकता था क्योंकि बेचारे सुखलाल जी को अपनी इज्जत बहुत प्यारी लगती।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले तो उसने जाति का रौब दिया कि मैं गुप्ता हूँ, मैं किसी को बताती नहीं हूँ यानी मैं उच्च जाति की हूँ। उसने अपने मायके के बातों-बातों में ऐसे पुल बांधें कि बस पूछिए मत-कोठी, अच्छा बिजनिस और कारें-गाड़ियां और भी बहुत कुछ। भाई पत्रकार और वकील। कुछ दिन बाद ही काम की गिनतियां भी बदलती रहीं, कभी छह, तो कभी चार, रोज नए-नए झूठ गढ़ने में अति प्रवीण। जो काम ठहरा था, उसे भी ठीक से करने में उसे परेशानी होती। एक काम के एवज में कोई दूसरा काम कभी नहीं। टका-सा जवाब। कोई हिचक नहीं, कोई लिहाज नहीं। Female Servant Story</p>
<p style="text-align:justify;">कभी हल्की-सी आवाज देकर आती तो कभी बिल्कुल चुपचाप। कभी राम-राम भी कर लेती। सब कुछ रहस्यमय। विगत तीन महीने में काम छोड़ने की दसियों बार धमकियां सुखलाल जी को दे डाली थीं। उसके द्वारा काम ठीक से न करने और धमकियों के कारण सुखलाल जी को कई बार अनावश्यक खीज और तनाव भी इन विगत तीन माहों में कुछ ज्यादा ही हुए लेकिन सहते इसलिए रहे कि विकल्प कोई और न दिखता था। कुछ उम्र का तकाजा तो कुछ पढ़ने- लिखने की प्रवृत्ति। बर्तन और घर की सफाई के अतिरिक्त भी नित्य नाश्ता व खाना आदि बनाने, पंछियों की सेवा, कुछ समाज सेवा आदि के कारण व्यस्तता बनी ही रहती।</p>
<p style="text-align:justify;">कामवाली के छुट्टी करने पर तो सब कुछ करना ही पड़ता। सुखलाल जी बड़े दयालु व क्षमाशील भी थे, वे कामवाली के दुर्व्यवहार को जल्दी भूलकर यदा-कदा और भी छोटी- मोटी मदद करते रहते, उनके इलाज भी करते रहते। उनको जीवन जीने के मंत्र भी बताते रहते। पुस्तकें देते रहते। इससे पहले कामवाली तो साढ़े पाँच साल निरन्तर काम करती रही। उसने भी सुखलाल जी को बीच-बीच में खूब परेशान किया लेकिन उसके भी नाज नखरे सहकर वे काम कराते रहे। जब उसकी खामियों के कारण हटाया तो बहुत नाराज हो गई, धमकी भिजवाती रही कि किसी और को नहीं लगने दूँगी।</p>
<p style="text-align:justify;">घर आकर झगड़ा करूँगी जैसे कि उसे सरकारी नौकरी से हटा दिया गया हो। उसका मुख्य कारण था कि अकेले रहने वाले व्यक्ति को कामवाली जल्दी मिलती नहीं, ऊंच-नीच के डर से लेकिन सुखलाल जी तो ईश्वर भक्त थे। ईश्वर ही उन्हें योग व ध्यान क्रियाएं आदि करवाकर बचाता रहता। पहली वाली कामवाली की तो वे कुछ ज्यादा ही मदद करते रहे, यह सोचकर कि विधवा है, दो बच्चों की विद्यालय की फीस से लेकर अन्य मदद। वे उसे भी इसलिए निभाते रहे कि अकेले हैं, जो चल रहा है चलने दो। सब कुछ ईश्वर ही तो चला रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब तो कामवाली ने अपने समय में भी बदलाव कर दिया था। सब कुछ अपने मन से। मन की रानी। वह आठ बजे सुबह एक समय ही आती थी। 6 सितंबर का दिन था। सुखलाल जी दैनिक क्रियाओं, अर्थात योग, भ्रमण, पंछियों का दाना पानी, पौधों की सेवा आदि से निवृत्त होकर नाश्ता कर, अखबार पढ़ रहे थे। समय रहा होगा पौने नौ का। कामवाली घोड़े पर सवार होकर नित्य की भाँति आज भी आई, और आते ही उसने ऊपर की मंजिल पर झाड़ू लगाना शुरू कर दी। कल उसने कहीं भी पौंछा नहीं लगाया था। कई बार तय काम भी छोड़ जाती। कुछ बहाना बनाकर कि मुझे कुछ काम है, मुझे जल्दी जाना है कहकर जल्दी चली गई थी, अर्थात जल्दी में भी बहुत जल्दी।</p>
<p style="text-align:justify;">आधा मिनट ही हुआ होगा कि आधा घर की झाड़ू लग गई थी। सुखलाल जी बरामदे में बैठे अखबार पढ़ ही रहे थे। वे इसलिए उठे कि कुर्सी के नीचे से भी झाड़ू लग जाएगी। उन्होंने कहा, सुनीता आज झीने में भी पौंछा लगा लेना। उसने बिना देर किए टका-सा जवाब दिया, मैं एक जगह ही पौंछा लगाऊँगी। पहले भी कह चुकी हूँ, चाहे झीने में लगवा लो या कमरों में। सुखलाल जी ने कहा, कई दिनों से तुम कुछ न कुछ तय काम भी छोड़ जाती हो तो इसलिए आज दोनों जगह पौंछा लगा देना, गंदा हो रहा है। जैसे ही उसने यह सुना कि वह आग बबूला हो गई क्योंकि उसके मन के विपरीत बात कह दी थी। गुस्से में बोली, काम कराना है तो कराओ नहीं तो मत कराओ। Female Servant Story</p>
<p style="text-align:justify;">सुखलाल जी अवाक, करें तो क्या करें? वे मन मसोस कर रह गए।<br />
उन्होंने कहा, आप तो हमेशा गुस्से में ही बात करती हो। तय काम भी नहीं करना चाहतीं।<br />
इतना सुनना था कि कामवाली ने जोर से झाड़ू पटकर कहा, मेरा हिसाब कर दो।<br />
उन्होंने कहा, हिसाब भी हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इतना सुनना था कि वह गालियां बकती और कोसती हुई झीने से उतरकर बाहर चली गई। तेरे आगे आएगी, मत दे पैसे। इस महीने में उसे कुल जमा पाँच दिन ही हुए थे। इतना भी उन्होंने इसलिए कह दिया था कि शायद इसका मन बदल जाए और दुबारा काम करने लग जाए। वह बाद में बहुतेरा आवाज भी देते रहे कि अपना हिसाब करके रुपये ले जाओ लेकिन उसे तो बिना मतलब बदनामी करनी थी। Female Servant Story</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ अन्य महिलाओं से वह बात करके सुखलाल जी को कोसती रही। उन्होंने दरवाजे पर खड़े होकर इशारा किया क्योंकि सुखलाल जी की कमजोरी यही थी कि वह किसी भी प्रकार की बदनामी से बहुत डरते थे। उनका संकेत उनकी गली की सफाई वाली ने देख लिया, उसने सुखलाल जी की कामवाली से कहा कि तुम्हें वह बुला रहे हैं। वह तुरंत ही घोड़े पर सवार होकर आई। सुखलाल जी ने पूछा, कितने दिन हो गए इस महीने में। उसने कहा छह। तब सुखलाल जी ने कहा कि आज तो काम हुआ ही नहीं। तब फिर वह ताकने लगी और उन्होंने उसे पाँच दिन के रुपये देकर नमस्कार कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">सुखलाल जी को आज बहुत कटु अनुभव हुआ और मनन करते रहे कि सच में जमाना अब बहुत बदल गया है। कल ही इसके और इसके बच्चों के लिए जलेबियां दी थीं। इस तरह वे कुछ न कुछ देकर पगार के अलावा मदद करते ही रहते थे। यह सब उनके स्वभाव में सम्मिलित था वरना आजकल लोग महीने की पगार के अलावा कौन कुछ देते हैं, वो भी इस तरह के स्वभाववाली कामवाली को।</p>
<p style="text-align:justify;">आज उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि फिलहाल कोरोना काल में अब वे कोई कामवाली नहीं रखेंगे। तनाव और अपमान सहने से अच्छा है कि वे सारे ही काम एक कर्मयोगी की भांति स्वयं करते रहेंगे। कदाचित ईश्वर ने यह भी अच्छा ही किया होगा। गीता भी यही कहती है कि जो भी होता है वह अच्छा ही होता है। आज इस संकल्प के साथ वह एक नई राह की ओर बढ़ गए थे। Female Servant Story</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-राकेश चक्र</strong></p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">link din</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/many-forms-and-many-interpretations-of-the-same-work/article-87103</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/literature/many-forms-and-many-interpretations-of-the-same-work/article-87103</guid>
                <pubDate>Fri, 02 Aug 2024 17:30:14 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-08/fmale-servent.jpg"                         length="13511"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Literature : मोतीलाल का किशोर बेटा जब घर से निकल गया तो&amp;#8230;!</title>
                                    <description><![CDATA[पीलीबंगा, हनुमानगढ़ (निशांत)। मोतीलाल का किशोर बेटा जब घर से निकल गया तो मोतीलाल की पत्नी निर्मला को इतना शोक लगा कि वह बुक्का फाड़कर और माथा पीट-पीटकर रोने लगी। अड़ोसी-पड़ोसी दौड़े आए और धीरज बंधाने लगे- कोई बानही, बबलू घर से ही तो गया है दो चार दिन में लौट आएगा। Literature हाय रे! […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/when-motilals-teenage-son-left-home/article-57980"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/litreture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>पीलीबंगा, हनुमानगढ़ (निशांत)।</strong> मोतीलाल का किशोर बेटा जब घर से निकल गया तो मोतीलाल की पत्नी निर्मला को इतना शोक लगा कि वह बुक्का फाड़कर और माथा पीट-पीटकर रोने लगी। अड़ोसी-पड़ोसी दौड़े आए और धीरज बंधाने लगे- कोई बानही, बबलू घर से ही तो गया है दो चार दिन में लौट आएगा। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">हाय रे! न जाने वह किस हाल में होगा? किसके हत्थे चढ़ गया मेरा लाल, न जाने कोई उसके साथ क्या करेगा? सुना है, बड़े शहरों में लोग, आदमी के अंग निकाल कर बेच देते हैं।<br />
उसे कुछ नहीं होगा। वह पढ़ा लिखा है। समझदार है। अपनी भलाई देखेगा, वहीं रहेगा। हम उसे खोज निकालेंगे। तुम थोड़ा धैर्य रखो।<br />
इस तरह से समझा-बुझाकर लोगों ने निर्मला को कुछ शांत किया। फिर तलाश शुरू हुई। सबसे पहले उसके मित्र-दोस्तों के घर फोन से पता किया। फिर दूर-निकट के रिश्तेदारों से फोर से पूछा। किसी ने उसकी कोई खबर नहीं दी। सबने वही कहा-हमारे यहां तो नहीं आया।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसे-जैसे पता चला, मोतीलाल के घर चला आया। सयानोें के भाव बढ़ गए। जो चोरी माल का या किसी गुमशुदा का पता बता दें, उसे इधर ‘सयाना’ कहा जाता है। एक के पास गए तो उसने देवी मां की जोत के लिए दो-ढाई सौ का सामान और देवी मां का एक सूट मंगवाया। जोत करके आखे देखे। बताया कि तुम्हारा लड़का ज्यादा दूर नहीं गया है। उत्तर-पूर्व के कोने में जो सड़क आती है, उस पर पांचवे गांव में गया है। गांव का नाम अ अक्षर से शुरू होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीप भर कर आदमी उस गांव गए। गांव के सब रास्तों को रोका कि हमारे आने का पता लगने पर कहीं खिसक न जाए। शेष बचे आदमी गांव की गलियों और गुवाहड़ में उसे खोजने निकले। गांव में एक जगह दस-पन्द्रह लोग ताश पीट रहे थे। उनसे हुलिया बताकर पूछा। उनमेें से एक ने कहा-हां! भाई इस तरह का एक लड़का गांव की ओर आते तो मैंने देखा था। ढृूंढने वालों का विश्वास और भी पक्का हो गया कि हो न हो ‘सयाने’ की बात सच है और लड़का इसी गांव मेें छिपा है।</p>
<p style="text-align:justify;">फोन करके कस्बे से आदमी और बुलाए गए। अड़ोसी-पड़ोसियों की एक जीप और भरकर गई। पहरा और कड़ा किया गया। शाम के समय मंदिर के स्पीकर मेें आवाज लगा दी गई कि अपरिचित लड़के को देखें तो हमें सूचित करें। रात भर आदमी उस गांव की गलियों की खाख छानते रहे। लेकिन लड़का न मिला। सुबह थक हार कर के वापिस लौट आए। ‘सयाने’ के पास गए ‘सयाना’ अपनी हार मानने वाला कहां था? उसने जोर देकर कहा- लड़का उस गांव मेें जरूर गया है। तुम्हारे हाथ नहीं लगा तो जरूर वह तुम्हारे जाने से पहले वहां से आगे निकल गया। हां! गया वह उसी दिशा में है। घर वालों को ‘सयाने’ की बात का फिर विश्वास हो गया। उन्होंने मन ही मन कहा- उस गांव का एक आदमी भी तो कह रहा था कि हां! इस शक्ल-सूरत का एक लड़का इस गांव की ओर आ रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">मोतीलाल और उसके साथी फिर उस दिशा के दूसरे गांवों मेें गए। चार-पांच दिनों तक उधर कई गांवो की खाक छानी। लड़का न मिला। किसी समझदार ने उन्हें सलाह दी कि थाने में रिपोर्ट तो दर्ज करवाओ। ऐसे कामों में पुलिस वाले बड़े उस्ताद होते हैं। लड़कों को भगाकर ले जाने वाले कई गिरोहों का उन्हें पता होता है। वे थाने गए। थाने वालों ने उन्हें डांटा- इतने दिन क्या करते रहे?</p>
<p style="text-align:justify;">‘ढूंढते रहे।’ ‘तो जाओ अब भी ढूंढ लो।’ Literature</p>
<p style="text-align:justify;">वे कई देर तक मुंह लटकाए खड़े रहे तो पुलिस वालों ने बेमन से झूठी-सच्ची रिपोर्ट लिख ली।<br />
घर आने पर उन्हें पता चला कि पड़ोस के मंदिर में एक बूढ़ी पुजारिन आई हुई है। बड़ी पहुंची हुई महिला है। कस्बे की एक डूबी हुुई आसामी को उसने मालामाल कर दिया। वह आसामी अब उसका बड़ा मान-तान करती है। उन्हीं के बुलावे पर वह अपने आश्रम से चलकर, साल में एक-दो बार यहां आती है। ठहरती यहां मंदिर में ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोतीलाल की पत्नी निर्मला अपने साथ एक अन्य स्त्री को लेकर उसके पास पहुंची। लड़के के घर से निकलने की बात कही। महिला ने थोड़ा ध्यान लगाकर कहा- कोई बात नहीं। मैं तुम्हे एक जाप देती हूं, उसका आप घर में बैठकर सात दिन तक दोहराते रहो। भगवान ने चाहा तो आपका लड़का आठवें दिन घर आ जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनकर निर्मला ने सोचा- जाप यह महिला ही करे तो और अधिक उपयुक्त रहेगा क्योंकि जाप इसी का है और उसी के आराध्य देव का है। हमसे पता नहीं वह प्रसन्न हो या न हो? इसलिए उसने अपना भय महिला के सामने प्रकट किए- माई, यह जाप आप स्वयं ही करें। हमसे जाप में कोई कोर-कसर रह सकती है।<br />
‘वह तो है ही। एक सांसारिक मनुष्य में और एक साधु पुरुष में फर्क तो है ही।’</p>
<p style="text-align:justify;">‘तो फिर आप खुद ही चलकर हमारे घर पर जाप करो।’ बुढ़िया घर के एक कोने में, अपने ईष्ट देव की मूर्ति के आगे धूप-दीप जलाकर जाप करने बैठ गई। जाप का उच्चारण वह बहुत धीरे करती थी। बस जाप की फुसफुसाहट मात्र होती थी। ऊंची आवाज में जाप होता भी कैसे? बात सात दिन की थी। कोई पांच-सात मिनट की तो थी नहीं। बुढ़िया की धूप-दीप की थाली में, घर वालों ने सौ रुपए चढ़ा दिए थे। उन्हें देखकर जो भी घर में सान्तवना प्रकट करने आता, दस-बीस रुपए चढ़ाकर जाता। लोग कहते थे कि जिस आसामी को इसने मालामाल किया है उसने बुढ़िया को खूब दान किया है। लेकिन उसकी दुबली-पतली काया और पुराने-सुराने पहनावे को देखकर तो वह कंगाल ही लगती थी। कहने का मतलब यही कि वह बात न थी कि उसे रुपयों-पैसों की कोई परवाह नहीं थी। Literature</p>
<p style="text-align:justify;">पांचवे दिन महिला के पास उसका एक मरियल सा चेला आया। उसने उसे कोई संदेश दिया। महिला ने घरवालों से कहा कि महात्मा ने मुझे बुलाया है। मैं तो जाती हूं। अब जाप आप खुद ही करते रहना। इतना कहकर जाप के बोल घरवालों को बताकर वह वहां से खिसक चली गई।</p>
<p style="text-align:justify;">घर वाले कई दिन तक जाप करते रहे। एक दिन थक गए तो बंद कर दिया। बीच में ‘सयानों’ की तलाश भी चलती रही। जो भी बताता कि फलां ‘सयाना’ बड़ा पहुंचा हुआ है। वहीं पहुंच जाते। चढ़ावा चढ़ाते और लड़के का पूछते। कोई ‘सयाना’ उन्हें बच्चे के सही सलामत लौट आने की बात कहता। कोई कहता कि वह मुसीबत में है। उसे उबारने के लिए जाप करवाओ। घरवाले जाप के लिए चढ़ावा लाकर देते। ‘सयाना’ जाप करता लेकिन लड़का घर न आया। किसी ने उन्हें कहा कि सात दिन लगातार उल्टा चरखा चलाओ। इस प्रकार करने से लड़का उल्टा लौट आएगा। लड़के की मां-दादी और बहनों ने यह भी किया। लेकिन लड़का घर न लौटा।</p>
<p style="text-align:justify;">तीन महिने बाद उनके घर किसी अनजाने व्यक्ति का फोन आया कि क्या आपका कोई लड़का घर से भागा हुआ है? उन्होंने कहा कि हां! तो उसने आगे बताया कि आपका लड़का हमारे यहां जैसलमेर में राठौड़ फैक्ट्री में मजदूरी का काम कर रहा है। मैं इस फैक्ट्री के आगे चाय की दुकान करता हूं। वह अक्सर हमारे पास चाय पीने आता है। हमें उसकी बातचीत और पहनावे से शुरू से ही शक हो चला था। इसलिए बहला-फुसलाकर हमने उससे तुम्हारे घर का फोन नंबर लिया है। तुम आकर उसे ले जाओ। घर वाले गए और उसे ले आए। शायद लड़का वहां स्वयं तंग आ गया था। उसने स्वयं ही चाय बनाने वाले के घर से फोन करने के लिए कहा था। घर आकर लड़के ने बताया कि वह रात की गाड़ी से ही जैसलमेर के लिए निकल पड़ा था। जैसलमेर को जाने वाली गाड़ी उस दिशा के ठीक विपरीत जाती थी। जिस दिशा में ‘सयाने’ ने लड़के के जाने की बात कही थी। Literature</p>
<p><a title="Australia: पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में कुछ इस अंदाज में मनाया MSG सत्संग भंडारा!" href="http://10.0.0.122:1245/msg-satsang-bhandara-celebrated-in-this-style-in-perth-australia/">Australia: पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में कुछ इस अंदाज में मनाया MSG सत्संग भंडारा!</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/when-motilals-teenage-son-left-home/article-57980</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/when-motilals-teenage-son-left-home/article-57980</guid>
                <pubDate>Sun, 26 May 2024 17:57:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-05/litreture.jpg"                         length="28981"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        