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                <title>Negotiation - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>खंडित जनादेश में नेताओं की सौदेबाजी</title>
                                    <description><![CDATA[महाराष्ट्र में सरकार बनाने में रोड़ा अटकाने के खेल की शुरूआत शिवसेना ने की थी
लेकिन इस रोड़ा अटकाने के खेल में अजीत पवार ने मौके का फायदा उठाया अंत में खेल भाजपा ने खत्म कर दिया।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/fractured-mandate-of-the-leader-in-negotiation/article-11267"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-11/negotiation.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। इस क्षेत्र में पल भर में शत्रु दोस्ताना हो जाते हैं और दोस्त शत्रु दिखने लगते हैं। महाराष्ट्र में जिस तरह 29 दिनों बाद भाजपा के मुख्यमंत्री और एनसीपी के अजीत पवार ने उप-मुख्यमंत्री की शपथ ली है यह अनुमान से परे का घटनाक्रम है। 24 घंटे पहले जहां एनसीपी, कांग्रेस, शिवसेना सरकार गठन के लिए एकमत हो घोषणा कर चुके थे वहीं रातों-रात सारा ताना-बाना बिखर गया। एनसीपी नेता अजीत पवार ने अपने सगे चाचा व राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी शरद पवार को एहसास भी नहीं होने दिया कि सुबह होते ही क्या होने वाला है। इस खेल में एक बार फिर राज्यपाल के संवैधानिक पदWA का दुरुपयोग होने की राजनीतिक बहस छिड़ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में यह एकदम स्पष्ट है अगर राज्य में जनादेश खंडित है तब केंद्र में सत्ताधारी पार्टी संबंधित राज्यपाल के मार्फत राजनीतिक मर्यादाओं को उलटती-पलटती है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने में रोड़ा अटकाने के खेल की शुरूआत शिवसेना ने की थी लेकिन इस रोड़ा अटकाने के खेल में अजीत पवार ने मौके का फायदा उठाया अंत में खेल भाजपा ने खत्म कर दिया। अब इससे आगे जो होने वाला है वह भी बहुत उठापटक का मंजर बनने वाला है।</p>
<p style="text-align:justify;">अजीत पवार किस तरह से अपने चाचा की पार्टी में से सरकार के बहुमत लायक विधायक तोड़ते हैं यह देखना दिलचस्प होगा। चूंकि शरद पवार काफी विश्वस्त दिख रहे हैं कि अजीत पार्टी तोड़कर विधायक नहीं ले जा सकते। लेकिन शरद पवार को यह शिकस्त जेहन में रखनी चाहिए कि जो भाजपा उनके भतीजे को उनके अपने खून को उनके विरुद्ध खड़ा करने में कामयाब हो गई है वह उन विधायकों को भी हासिल कर लेगी जो शरद पवार के पीछे सिर्फ राजनीति करने के लिए खड़े हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री व भाजपा के शीर्ष नेता देवेंद्र फडणवीस बड़े ही आत्मविश्वास से कह रहे हैं कि सरकार पूरे 5 साल तक चलेगी। अत: 26 दिन भाजपा ने यूं ही नहीं गुजार दिए, जरूर भाजपा ने अपना खेल खेल दिया है। अब यहां देश के आदर्श राजनीतिक विचारकों व व्यवहारिक राजनीतिक विचारकों के लिए एक नया अध्याय बन गया है कि कैसे मतदाताओं की इच्छाएं अवसरवादी राजनेताओं के लिए महज एक सौदा बनकर रह जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अब यहां कोई भाजपा को कोसेगा तो कोई अजीत पवार को कोसेगा लेकिन इस सबमें शिवसेना की भूमिका निहायत ही ओच्छी साबित हुई है। शिवसेना ने अपनी कट्टर हिंदूवादी छवि को भी खो दिया है और सत्ता तो उससे बहुत दूर चली गई है। यूं भी किसी प्रदेश, क्षेत्र के लिए यह महत्वपूर्ण होना चाहिए कि खंडित जनादेश में सबसे बड़े दल को ‘पवित्र’ माना जाना चाहिए, क्योंकि खिचड़ी दल कौनसा बिना सौदेबाजी के साथ जुटते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अत: जनता के लिए यही अच्छा है छोटे-छोटे सौदों से अच्छा एक बड़ा, स्पष्ट सौदा हो ताकि रोज-रोज के विवाद एवं बर्बादी से बचा जा सके। कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना को अब अगर कुछ काम नहीं बचा है तो वह अपनी हार की समीक्षा के साथ-साथ अजीत पवार के द्वारा लिए गए निर्णय पर कुछ विचार-मंथन कर सकते हैं। राजनीति में करने को आखिर है ही क्या।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Nov 2019 20:35:28 +0530</pubDate>
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                <title>पाक सरकार द्वारा बातचीत का न्यौता व हैवानियत</title>
                                    <description><![CDATA[भारत-पाकिस्तान में सबंधों में यह बात सच्चाई बन गई है कि जब भी सुधार की उम्मीद बंधी है तो सीमा पर कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो बनी बनाई खेल को बिगाड़ देता है। पाक के नए बने प्रधानमंत्री इमरान खान ने पड़ौसी देशों के साथ संबंध सुधारने का बयान देकर भारत की तरफ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/invitation-and-negotiation-by-the-pak-government/article-6016"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/djkdjf-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत-पाकिस्तान में सबंधों में यह बात सच्चाई बन गई है कि जब भी सुधार की उम्मीद बंधी है तो सीमा पर कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो बनी बनाई खेल को बिगाड़ देता है। पाक के नए बने प्रधानमंत्री इमरान खान ने पड़ौसी देशों के साथ संबंध सुधारने का बयान देकर भारत की तरफ इशारा किया था। इसी तरह पाकिस्तान ने किसी ओर लड़ाई न लड़ने की बात कहकर कश्मीर मामले के बारे में नरम रूख अपनाने का संकेत दिया था। अब पाक की नई सरकार ने भारत के साथ बातचीत की पेशकश की। चिट्ठी आने से पहले ही पाक सैनिकों ने भारतीय बीएसएफ के एक जवान के साथ हैवानीयत करते हुए उसकी गर्दन व एक टांग काट दी और एक आंख निकालकर ले गए। पाकिस्तानी सेना यह बात अच्छी तरह जानती है कि ऐसी करतूत कभी भी भारत को बातचीत के लिए तैयार नहीं करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह हैवानीयत इमरान सरकार के लिए चुनौती है। यह प्रतीत हो रहा है कि पाकिस्तान की सेना अपना दबदबा समाप्त करने के लिए तैयार नहीं। इमरान सरकार के लिए भी यह सख्त संदेश है कि सेना किसी भी शासक को अपनी इच्छा से काम करने देने के हक में नहीं। सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है कि वह सेना के परंपरागत अंदाज व दबदबे के खिलाफ बहादुरी कैसे दिखाएंगे? भारत प्रत्येक मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार है, बशर्तें कि सीमा पर अमन कायम हो। बातचीत दोनों देशों के लिए सबसे बड़ी जरूरत है और पाकिस्तान में सेना व आतंकवादियों ने बातचीत के हालात खत्म करने के लिए हमेशा ही कोई न कोई साजिश बनाई है। अटल बिहारी वाजपाई व नवाज शरीफ लाहौर ऐलाननामा जारी कर अमन शांति के लिए हाथ बढ़ाते हैं तो कारगिल में पाक सेना हमला करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाहौर जाते हैं तो पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हमला हो जाता है। भारत बातचीत की अहमीयत को समझता है, लेकिन बात तो तब ही बनेगी जब पाकिस्तान के शासक पूरी इच्छा शक्ति व बहादुरी से सेना व आतंकवादी संगठनों की परवाह न करते हुए मित्रता का हाथ बढ़ाएंगे। इमरान खान को यह समझना होगा कि यदि वह पाकिस्तान की राजनीति में नई इबारत लिखना चाहते हैं, तो चुनौतियों से निपटने के लिए बहादुरी दिखाएं, क्योंकि सत्ता प्राप्ति उद्देश्य नहीं बल्कि देश के लिए काम करने का केवल जरिया है।</p>
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                <pubDate>Fri, 21 Sep 2018 13:06:16 +0530</pubDate>
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                <title>कश्मीर के हल के लिए बातचीत</title>
                                    <description><![CDATA[केन्द्र की मोदी सरकार ने अटल बिहारी बाजपेयी के फार्मूले पर वापिसी करते बातचीत द्वारा कश्मीर मसले को हल करने का फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस संबंधी नारा दे चुके हैं, ‘न गोली से, न गाली से, गले मिलने से हल निकलेगा’। इस कार्य के लिए पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/negotiation-for-solution-of-kashmir/article-3451"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केन्द्र की मोदी सरकार ने अटल बिहारी बाजपेयी के फार्मूले पर वापिसी करते बातचीत द्वारा कश्मीर मसले को हल करने का फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस संबंधी नारा दे चुके हैं, ‘न गोली से, न गाली से, गले मिलने से हल निकलेगा’। इस कार्य के लिए पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। बातचीत का रास्ता लोकतंत्र व सद्भावना से जुड़ा है। अगर इस तरीके से बात किसी सही दिशा में चलती है तो यह सरकार की उपलब्धि होगी, लेकिन जहां तक पिछले तर्जुबे की बात है वह कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। पहले भी विभिन्न पार्टियों के सीनीयर नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल कश्मीर पहुंचा था लेकिन सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेताओं ने घर के दरवाजे ही बंद कर दिए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह यूपीए सरकार के समय भी बुद्धिजीवियों का एक प्रतिनिधिमंडल भेजा गया, जिसकी बातचीत तो सद्भावना भरे माहौल में हुई लेकिन मसले के हल के लिए शुरुआत तक न हो सकी। दरअसल कश्मीर मसले में कई पेचीदगीयां आ गई हैं। सख्ती और बातचीत दोनों तरफ से जरूरी है। आतंकवाद से निपटने के लिए सख्त एक्शन लिए बिना गुजारा नहीं है। दूसरी तरफ जनता की सुरक्षा की बात है। पिछले वर्ष सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की घटनाएं ही बड़ी चुनौती बन गई थी। बुरहान वानी जैसे आंतकवादी के मारे जाने के बाद प्रदर्शन भी होते रहे। आम जनता को गुमराह होने से बचाने के लिए सेना व जनता के बीच के रिश्ते को मजबूत करना होगा। जनता को आतंकवाद के खिलाफ खड़ा करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">युवा पीढ़ी को रोजगार व कल्याणकारी कार्यांे की तरफ लाने की मुख्य जरुरत है। जनता व अलगाववादिओं के मसले अलग-अलग हैं। अलगाववादी सीधे तौर पर पाकिस्तान की जय-जयकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जनता के मसले सुरक्षा बलों व प्रशासन से संबंधित हैं। यह बात भी विचार योग्य है कि एक ही व्यक्ति अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर कोई सांझी राय तैयार कर सकेगा। वैसे केन्द्र द्वारा यह छूट दी गई है कि दिनेश्वर जिससे भी चाहें उससे बातचीत कर सकते हैं। नाजुक बने हुए हालातों को ठीक करने के लिए बातचीत का कोई भी प्रयास ठोस साबित हो तो मिशन की सार्थकता बनेगी। किसी भी उठाए गए कदम से सिर्फ समय की बर्बादी न हो, इसलिए दृढ़ इच्छा शक्ति को बरकरार रखना होगा।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Oct 2017 04:27:42 +0530</pubDate>
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