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                <title>Emphasis - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>मानवीय योजनाओं की बजाए विकसित देशों का हथियार बनाने पर जोर</title>
                                    <description><![CDATA[मेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं भले युद्ध व आतंकवाद से लड़ने के लिए हथियार जरूरी हैं लेकिन विकसित देशों के लिए जब हथियार आय का स्त्रोत बन जाएं तो विकासशील व गरीब देशों के लिए नई मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। अमेरिका व रूस सहित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/emphasis-on-the-creation-of-weapons-of-developed-countries/article-6150"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/s-400-2.jpg" alt=""></a><br /><h2>मेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">भले युद्ध व आतंकवाद से लड़ने के लिए हथियार जरूरी हैं लेकिन विकसित देशों के लिए जब हथियार आय का स्त्रोत बन जाएं तो विकासशील व गरीब देशों के लिए नई मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। अमेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं जिनकी जीडीपी में हथियारों का बड़ा योगदान है। ताजा मामले में भारत ने रूस के साथ करीब 40,000 करोड़ के मिसाईल का सौदा किया है। इससे पहले ऐसे कई समझौते अमेरिका, फ्रांस व इज्रराइल के साथ किए हैं।हथियार भारत की जरूरत है। पाकिस्तान व चीन जैसे पड़ोसियों के मंसूबों को देखते हुए भारत हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता लेकिन भारत सहित अन्य देशों के आपसी टकराव ही विकसित देशों की आय बन गए हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">विकसित देशों ने खुद बना रखे हैं गुट</h2>
<p style="text-align:justify;">बेहद दुख की बात है कि जिस संस्था (संयुक्त राष्ट्र) का निर्माण ही दो विश्व युद्धों की बर्बादी को न दोहराने के लिए किया गया था उसी संस्था के सदस्य देश (अमेरिका, चीन, रूस व फ्रांस) हथियारों की फैक्टरियों को लगातार चला ही नहीं रहे बल्कि जो विकासशील देश हथियार खरीदने में देरी करते हैं उन पर शिकंसा भी कस देते हैं। इन आर्थिक नीतियों को देखते हुए आतंकवाद की कार्रवाईयां खेल प्रतीत होने लगी हैं। विकसित देशों ने खुद गुट बना रखे हैं और अपने-अपने साथी विकासशील देशों के साथ मित्रता के नाम पर अरबों के हथियार बेचे जा रहे हैं। विकासशील देशों का जितना पैसा हथियारों की खरीद में बह रहा है, उतने पैसे से उनके झुग्गियों में बसने वाले करोड़ों लोगों को शानदार घर बनाकर दिए जा सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अनपढ़ता जैसी समस्याएं तो नजर भी नहीं आएंगी।</p>
<h2>नए-नए हथियारों का अविष्कार करने की बजाय कैंसर व अन्य भयानक बीमारियों को रोकने पर हो फोकस</h2>
<p>विश्व को केवल सुरक्षा की जरूरत नहीं बल्कि स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों, लैबोरेट्री, अस्पतालों, आधुनिक ट्रेनों व हवाई सेवाओं की आवश्यकता है। हथियारों की खरीद में प्रयोग किए जाने वाला पैसा भलाई कार्यों में इस्तेमाल किया जाए तो विश्व का नक्शा ही बदल जाएगा। परमाणु हथियारों का खात्मा करने के लिए विकसित देश पहल कर रहे हैं लेकिन लड़ाकू जहाज, मिसाइलों पर हो रहा खर्च आर्थिक बर्बादी ला रहे हैं। इस बर्बादी से आंखें नहीं फेरी जानी चाहिए। खुशहाल विश्व का सपना पूरा करना है तब केवल नए-नए हथियारों का अविष्कार करने की बजाय कैंसर व अन्य भयानक बीमारियों को रोकने के लिए खर्च करने की आवश्यकता है। युद्ध की बर्बादी कब होती है यह तो भविष्य की बात है लेकिन कैंसर जैसी बीमारियां हजारों जिंदगीयां लील रही हंै। विकसित देशों को नागरिक मुद्दों ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।</p>
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                <pubDate>Sat, 06 Oct 2018 09:29:44 +0530</pubDate>
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                <title>लोक सभा चुनावों की तैयारी में मुद्दे गायब, गठबंधन पर जोर</title>
                                    <description><![CDATA[देश की केंद्रीय सरकार में 2019 की लोकसभी चुनाव संबंधी घड़ियां जा रही हैं रणनीतियों का पूरा गठबंधन बन गया है। भाजपा ने सत्ता में चुनाव के बावजूद अपने भाईचारे को जोड़े रखने के लिए मुहिम छेड़ दी है। ये मुहिम लगभग सहयोगी पार्टियों से हां करवाना ही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का आज […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/issues-missing-preparations-lok-sabha-elections-emphasis-on-coalition/article-4006"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/loc.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की केंद्रीय सरकार में 2019 की लोकसभी चुनाव संबंधी घड़ियां जा रही हैं रणनीतियों का पूरा गठबंधन बन गया है। भाजपा ने सत्ता में चुनाव के बावजूद अपने भाईचारे को जोड़े रखने के लिए मुहिम छेड़ दी है। ये मुहिम लगभग सहयोगी पार्टियों से हां करवाना ही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का आज अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल से मुलाकात का प्रोग्राम है। बिहार में भाजपा नेता सुशील मोदी ने नितीश को एनडीए का चेहरा कहकर भाजपा और जनता दल यू की जोड़ी बनाने का प्रयास किया है। पिछले दिनों नितीश ने नोटबंदी पर सवाल खड़े करके भाजपा नेताओं की चिंता बढ़ा दी थी। इसी तरह महाराष्टÑ में शिव सेना को मनाने की कोशिश की जा रही है। इधर कांग्रेस 2019 में भाजपा को सरकार से बाहर रखने के लिए विरोधी पार्टियों से गठबंधन के लिए सरगर्म हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी शुरूआत कर्नाटक में सरकार बनान से हो चुकी है। दरअसल कर्नाटक और उपचुनावों के नतीजों के बाद भाजपा 2019 के चुनावों के लिए सरगर्मी से काम कर रही है। तृणमूल कांग्रेस, बसपा, राष्टÑीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, तेलगू देशम पार्टी, भाजपा के खिलाफ एकजुट हो गई हैं। कांग्रेस की सख्त विरोधी रही आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस के साथ चलने का मन बना लिया है। ऐसे हालातों में भाजपा के लिए सबसे जरूरी चीज अपने सहयोगी दलों को साथ रखना है।</p>
<p style="text-align:justify;">तेलगू देशम पार्टी ने भाजपा से सिर्फ नाता नहीं तोड़ा बल्कि केंद्र की आलोचना भी की है। अकाली दल के प्रमुख नेता नरेश गुजराल ने कई बार भाजपा पर सहयोगी पार्टियों को नजरअंदाज क रने का दोष लगाकर नई चर्चा छेड़ दिया थी। इसलिए भाजपा प्रधान किसी तरह की कमी नहीं छोड़ना चाहते। संसदीय प्रणाली में गिनती का महत्व बढ़ गया है और मुद्दों की अहमियत घट गई है। गठबंधन की मजबूती की मुहिम में क्षेत्रीय पार्टियों की कदर बढ़ गई है पर मुद्दों पर सारे चुप हैं। राजनीति के मौजूदा रुझान ने आम आदमी को नजरअंदाज कर दिया है और कुर्सी ही बड़ा उद्देश्य बन गई है। किसके साथ जाना है की चर्चा है मुद्दों की शर्त गायब है।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Jun 2018 12:07:57 +0530</pubDate>
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                <title>गैर परंपरागत ऊर्जा पर बढ़ता जोर</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग तीन गुण वृद्धि के कारण ऊर्जा संकट आज के युग की वास्तविकता बन चुका है। विश्व में चार करोड़ 36 लाख 65 हजार टन कोयला भंडार है। गैस भंडार तो केवल 41 हजार मेगा टन है। वहीं पेट्रोल उत्पादों के बढ़ते दामों से सरकार ने गैर-परंपरागत ऊर्जा स्त्रोतों पर जोर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/increasing-emphasis-on-non-conventional-energy/article-3458"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/pargrti.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग तीन गुण वृद्धि के कारण ऊर्जा संकट आज के युग की वास्तविकता बन चुका है। विश्व में चार करोड़ 36 लाख 65 हजार टन कोयला भंडार है। गैस भंडार तो केवल 41 हजार मेगा टन है। वहीं पेट्रोल उत्पादों के बढ़ते दामों से सरकार ने गैर-परंपरागत ऊर्जा स्त्रोतों पर जोर देना शुरू कर दिया है। यही कारण हैं कि सरकार ने सौर और पवन ऊर्जा पर 30 हजार करोड़ रुपए खर्च करने की मंजूरी दी है। दरअसल सरकार गैर परंपरागत ऊर्जा स्त्रोतों को बढ़ावा दे रही है। आने वाले 10-12 वर्षों में इस क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलने की उम्मीद है। अगले तीन वर्ष में ही सौर ऊर्जा उत्पादन जोकि इस समय नाममात्र का ही है, बढ़कर 1300 मेगावाट तक पहुंच जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">केंद्र सरकार सौर ऊर्जा मिशन को 2020 तक भारत में 20,000 मेगावाट उत्पादन की क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इसको लेकर पिछले वर्ष 90,000 करोड़ रुपए की लागत वाले राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन के मसौदा दस्तावेज को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी भी दी है। सौर ऊर्जा के बेहतर भविष्य को देखते हुए हाल ही में बिजली उत्पादन करने वाली सरकारी कंपनी एटीपीसी ने भी गैर परंपरागत ऊर्जा के उत्पादन पर 81 अरब रुपए के निवेश की घोषणा की है। सरकार पवन ऊर्जा के विकास पर भी जोर दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, पवन ऊर्जा का उत्पादन 2022 तक तीन गुना बढ़कर 33 हजार मेगावाट तक पहुंच जाएगा। इसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में भागीदारी होगी। मंत्रालय के पास निजी क्षेत्र के अनेक प्रस्ताव आए हैं। दरअसल बिजली पैदा करने तथा पानी उठाने का सबसे सस्ता उपाय है हवा। जापान में भूंकप तथा सूनामी के बाद परमाणु बिजली घरों के सुरक्षित होने के बारे में उत्पन्न संदेह ने ऊर्जा संकट को और बढ़ा दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुजरात में लाम्बा नामक स्थान पर एशिया का सबसे बड़ा पॉवर प्रोजेक्ट चालू किया गया है, जिसमें हवा की 50 टरवाइनें 200 किलोवाट बिजली उत्पन्न करते हैं। इनमें से किसी भी काम से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। देश में इस समय 5 पवन फार्म हैं, जिनकी क्षमता 3.63 मेगावाट है और जो 45 लाख ऊर्जा इकाइयां तैयार करती है। नब्बे के दशक में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों को पवन ऊर्जा के संभावनाशील क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया गया। वहीं कई निजी क्षेत्र की कंपनियों ने पवन ऊर्जा पर निवेश किया है। भारत के भूमध्य रेखा पर स्थित होने के कारण सौर ऊर्जा का असीम भंडार हमारे ऊपर बरस रहा है। भारत ने सूर्य से 200 मेगावाट प्रति वर्ग किलोमीटर ऊर्जा प्राप्त होती है। इसकी भौगोलिक क्षेत्र 3.28 मिलियन वर्ग किलोमीटर है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अनुसार यहां 657.4 मिलियन मेगावाट ऊर्जा उपलब्ध है। पर इस क्षेत्र का सिर्फ 12.5 फीसदी अर्थात् 0.413 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही सौर ऊर्जा विकास के लिए उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए यदि 10 फीसदी भूमि भी उपलब्ध हो जाए, तो 8 मिलियन मेगावाट बिजली मिल सकती है। यह उपलब्ध ऊर्जा वर्तमान खपत की 26 गुना है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह से भारत नें पवन ऊर्जा से 45000 मेगावाट बिजली की क्षमता आंकी गई है। लेकिन अभी तक 5340 मेगावाट क्षमता का ही उपयोग हम कर सके हैं। देश में बायोमास के विद्युत उत्पादन की अनुमानित क्षमता लगभग 19,500 मेगावाट है, पर अभी तक 912 मेगावाट की बायोमास परियोजनाओं का ही पूरा किया जा सका है। इसके अलावा 1180 मेगावाट क्षमता की परियोजना पर काम हो रहा है। कुल मिलाकर ऊर्जा स्त्रोतों से अब तक कुल 8,095 मेगावाट बिजली ही ग्रिड को उपलब्ध कराई जा रही है। इसमें छोटी पनबिजली परियोजनाओं का उत्पादन भी शामिल है। जबकि भारत में गर्मियों में प्रचंड सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा उपलब्ध है। इसका उपयोग करके हम अनेक जिलों के तमाम कस्बों और गांवों की बिजली की समस्या हल कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong>लेखक मानवेन्द्र कुमार</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Oct 2017 03:13:52 +0530</pubDate>
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