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                <title>देश की उन्नति की चाबी युवा वर्ग के हाथ</title>
                                    <description><![CDATA[किसी भी देश का सौभाग्य होतें हैं उसके युवा और भारत दुनिया के सौभाग्यशाली युवा देशों में से एक है। दुनिया के विकसित देशों के विकास चक्र पर दृष्टि दौड़ाएं तो युवाओं का अहम रोल नजर आता है। युवा चाहें तो देश को विकास की बुलंदियों पर ले जाएं। अगर इन युवाओं की ऊर्जा और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-key-to-the-advancement-of-the-country-is-the-hand-of-the-youth/article-4703"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/youth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">किसी भी देश का सौभाग्य होतें हैं उसके युवा और भारत दुनिया के सौभाग्यशाली युवा देशों में से एक है। दुनिया के विकसित देशों के विकास चक्र पर दृष्टि दौड़ाएं तो युवाओं का अहम रोल नजर आता है। युवा चाहें तो देश को विकास की बुलंदियों पर ले जाएं। अगर इन युवाओं की ऊर्जा और जोश को सही मार्गदर्शन ना मिले तो यही युवा विकास के मार्ग का रोड़ा बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के बाद समय समय पर देश पर हुए हमलों का देश के युवा वर्ग के जोश, जनून और होंसले के दम पर ही डट कर सामना किया है। पिछले कुछ सालों से यूं लगता है कि युवा वर्ग किसी ईमानदार प्रेरणास्रोत के अभाव में दिशाहीनता की और बढ़ता जा रहा है। आजकल के भौतिकवादी समय में जहां हर कोई जल्द से जल्द तरक्की कर के लखपति बन जाना चाहता है, वहां युवा भी अपवाद नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">युवाओं का पढ़ लिख कर देश की तरक्की में रोल निभाने और मातृभूमि की मिट्टी का कर्ज चुकाने की बजाय, कानूनी अथवा गैरकानूनी किसी भी ढंग से विदेश जाना जैसे उनकी जिंदगी का एक मात्र उद्देश्य बन गया हो। जो युवा अपने देश में अपनी योग्यता अनुसार नौकरी से कम कुछ भी मंजूर नहीं की मानसिकता रखता है, वही युवा विदेश में डॉलरों और पौंड की चमक से चौंधिया कर हर स्तर का काम और हर तरह के समझौते करने को तैयार रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विकसित देशों की उन्नति में उस देश के नागरिकों की अपने देश को अपना समझने की भावना का योगदान होता है। वहां के नागरिक देश की भलाई के लिए बने कानूनों की पालना दिल से करते हैं, पर दु:ख की बात है कि हमारे युवा उनकी ही भलाई के लिए बने ट्रैफिक नियमों की भी पालना नहीं करना चाहते। हमें रोजाना ही बालों में जैल लगाए, बाजू में हेलमेट टांगे, कानों में एयर फोन लगाए, ट्रैफिक हवलदार को चकमा देने के लिए गलियों में वाहन घुमाते युवा अकसर दिख जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर ट्रैफिक हवलदार लाइटों पर ना हो तो तेज गति से वाहन दौड़ातें, अपनी जान की कीमत न समझते हुए रैड लाईट जम्प करते युवा यह भी ख्याल नहीं रखते की दूसरी तरफ से उन जैसा ही जोशीला युवा उनसे भी दोगुनी स्पीड से वाहन उड़ाते हुए उसकी जान को जोखिम में डाल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले जहां युवाओं की रुचियां सेहत बनाना, कब्बडी, घोल और कसरतें होते थे, अब वह रुचियां सोशल मीडिया ने खत्म कर दी हैं। बसों, ट्रेनों, पार्क और पब्लिक स्थानों पर युवा हाथों में मोबाइल पर उंगलियां चलाते किसी काल्पनिक दुनिया में खोए रहते हैं। घरों में भी मोबाइल गेमों और सोशल नेटवर्किंग में उलझे युवाओं से दिल की बात करने को मां-बाप तरसते रहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">फेसबुक, ट्विटर, वाट्सअप, स्नैपचेट और कई और इन्टरनेट ऐप्लिकेशन्स ने युवाओं का सारा समय ही चूस लिया है। रही सही कसर उलटे सीधे फैशनों ने पूरी कर दी है। विकसित देशों में कपड़े काम और मौसम देख कर पहने जाते हैं पर हमारा युवा वर्ग घिसी फट्टी लो वेस्ट जीन्स और अजीबोगरीब शब्दावली, डरावने कार्टून्स वाली टी शर्ट्स को ही फैशन समझ बैठा है। अजीब से बालों, दाढ़ी, मूछें और कलमों के स्टाइल के पीछे अच्छा दिखने की नहीं अलग दिखने की मानसिकता रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">युवा वर्ग का रुझान अब पहले की तरह दूध, घी, मक्खन, लस्सी और पौष्टिक खाने में नहीं रहा और इसकी जगह अब पीजा, बर्गर, नूडल्स, मन्चूरियन, कोल्ड ड्रिंक और फास्ट फूड ने ले ली है। इसके लगातार सेवन से होने वाले नुकसानों से बेपरवाह युवाओं के झुंड शाम के समय फास्ट फूड कार्नर पर मंडराते नजर आते हैं। जंक फूड के बुरे प्रभाव युवाओं की बिगड़ती सेहत और घटते कद काठ में नजर आते हैं। युवाओं की फिल्मों और इंटरनेट में बढ़ती दिलचस्पी के कारण ही उनमें हिंसा और नशीले पदार्थों के प्रति झुकाव बढ़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिल्मों और लचर पंजाबी गानों में लहराए जाते हथियारों के प्रदर्शन से प्रभावित युवा भी इनका प्रयोग करना शान समझते हैं। हिंसा में रोमांच ढूंढते युवा न तो सामने वाले की जान की परवाह करते हैं और न वारदात के बाद होने वाले अपने अंजाम की चिंता। फिल्मों के प्रभाव से, दोस्त मित्रों के उकसाने पर, उत्सुकतावश अथवा खुद ही शेखी मार कर दिलेरी दिखाने के चक्र में युवा नशे के दलदल में धँस जाते हैं। इस दलदल में फंसने के बाद वह अपने जिन्दगी के उद्देश्य से भटक जाते है।</p>
<p style="text-align:justify;">नशे की लत पूरा करने के लिए गुनाह की दुनिया उन्हें अपने आगोश में ले लेती है। फिर कोई विरला ही नशे के जाल में से निकल पाता है। नशे के सेवन से काल के मुँह में जाती अनमोल जवानियाँ, बिलखते बचपन, जवान मौतों को कमजोर कंधों पर ढ़ोते बुढ़ापे और विलाप करती औरतों की सफेद चुनरियों के बारे में रोजाना अखबारों के पन्ने लहू लुहान रहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">युवा वर्ग की अपने बजुर्गों और शिक्षकों के तजर्बे के प्रति बेरुखी भी उनके विकास के रास्ते की रुकावट बन जाती है। बजुर्गों की तजर्बे से भीगी मीठी कड़वी नसीहतें सुनने का न तो उनके पास सब्र है और न ही समय। कॉलेजों में शिक्षकों से बेमतलब उलझते युवा और ‘सब कुछ जानते हैं’ की गलतफहमी उनके उज्वल भविष्य के कई रास्ते बंद कर देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पुरानी पीढ़ी और शिक्षकों के प्रति सन्मान की भावना रखते हुए उनकी शिक्षाओं से मार्गदर्शन ले कर अपने होंसले, जोश और ज्ञान से देश को तरक्की की ऊँचाइयों पर ले जाए और देश की उन्नति पर लगे ताले को अपनी मेहनत और पसीने की चाबी से खोल दे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कुलदीप शर्मा</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sat, 07 Jul 2018 03:07:27 +0530</pubDate>
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                <title>मितव्ययिता है भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/economy-is-the-key-role-of-indian-culture/article-3468"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/gandhi-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 30 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत करने को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मितव्ययिता दिवस केवल बचत का ही दृष्टिकोण नहीं देता है बल्कि यह जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता देता है। महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। आधुनिक विचारक भी इसी तर्ज पर सोचने लगे हैं। प्रधामंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसी सोच को आकार दे रहे हैं और इसीलिये खादी और चर्खा उनकी प्राथमिकता बने हैं। उपयुक्त प्रौद्योगिकी की बात करते हुए इंग्लैंड के विचारक शूमाखर कहते हैं कि बड़े-बड़े कारखानों की अपेक्षा कम खर्च वाला गांधी का चर्खा कई दृष्टियों से अधिक उपयुक्त हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये मितव्ययिता जरूरी है। मोदी सरकार ने मितव्ययिता के लिये ही वीआईपी कल्चर पर नियंत्रण लगाया है। मंत्रियों की विदेश यात्राओं एवं अन्य भोग-विलास एवं सुविधाओं पर अंकुश लगाया गया है। सरकार ने मितव्ययिता एवं बचत का नारा दिया है। संचार माध्यमों से पानी बचाओ, बिजली बचाओ का उद्घोष प्रसारित हो रहा है। यह एक आवश्यक और उपयोगी कदम है, पर जब तक कोई भी आदर्श जीवनशैली का अंग नहीं बनता है, तब तक वह स्थायी नहीं बन पाता। समय के साथ वह बहुत जल्दी विस्मृत हो जाता है। इस प्रकार के अनेक उद्घोष सरकारी मंचों से जननेताओं द्वारा उद्घोषित होते रहे हैं, किन्तु उनका आधार गहरा नहीं होने के कारण वे जीवन से जुड़ नहीं सके। मितव्ययिता भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है। सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए उसका बहुत बड़ा महत्व है। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में उसके प्रति किसी का भी लक्ष्य प्रतीत नहीं होता। यदि मितव्ययिता का संस्कार लोकजीवन में आत्मसात हो जाये तो समाज एवं राष्ट्र में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक सामाजिक और राष्ट्रीय संपदा का यह अर्थहीन अतिरिक्त भोग और दूसरी तरफ अनेक-अनेक व्यक्ति जीवन की मौलिक और अनिवार्य अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए भी तरसते रहते हैं। यह आर्थिक विषमता निश्चित ही सामाजिक विषमता को जन्म देती है। जहां विषमता है, वहां निश्चित हिंसा है। इस हिंसा का उद्गम है, पदार्थ का अतिरिक्त संग्रह, व्यक्तिगत असीम भोग, अनुचित वैभव प्रदर्शन, साधनों का दुरुपयोग। सत्ता का दुरुपयोग भी विलासितापूर्ण जीवन को जन्म देता है। जनता के कुछ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के खून-पसीने की कमाई से किस कदर ऐशोआराम एवं भोग की जिन्दगी जीते हैं, यह भी सोचनीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस के मारर्कोस दंपति जब देश छोड़कर भागे तो श्रीमती इमेल्दा मार्कोस के पास से इतनी जूतों की जोड़ियां मिली, जिन्हें वो एक जोड़ी को दूसरी बार पहने बिना नौ साल तक पहन सकती थी। उसके महल से एक गाऊन और छह ऐसी विशिष्ट पोशाकें बिल सहित मिलीं, जिनका बिल राष्ट्रपति मार्कोस को राष्ट्रपति होने के नाते जो वार्षिक पगार मिलती थी, उससे 19 गुणा अधिक था। रोमानिया के पदच्युत राष्ट्रपति निकोलाई चाऊसेस्कू की कहानी भी कम विलासिता की नहीं है। जूतों की एड़ियों में कीमती हीरे लगे होने की बात तो ऐसे व्यक्तियों के लिए सामान्य हो सकती हैं। चालीस कमरों वाले उनके महल का प्रत्येक स्नानागार सोने के संसाधनों से परिपूर्ण था। आधुनिक भारत के अनेक राजनेताओं के भी ऐसे किस्से चर्चित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसके पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व इस बात का है कि अर्थ के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है तथा उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रश्न उठता है कि ये चकाचैंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित विश्व-व्यवस्था समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये विश्व मितव्ययिता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मितव्ययिता का महत्व शासन की दृष्टि से ही नहीं व्यक्ति एवं समाज की दृष्टि से भी है। हमारे यहां प्राचीन समाज में मितव्ययिता के महत्व को स्वीकार किया जाता था। किसी सामान की बबार्दी नहीं की जाती थी और उसे उपयुक्त जगह पहुंचा दिया जाता था। भोग विलास में पैसे नहीं खर्च किए जाते थे, पर दान, पुण्य किए जाने का प्रचलन था।</p>
<p style="text-align:justify;">पुण्य की लालच से ही सही, पर गरीबों को खाना खिला देना, अनाथों को रहने की जगह देना, जरूरतमंदों की सहायता करना जैसे काम लोग किया करते थे। पर आज का युग स्वार्थ से भरा है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर भोग विलास में आपना समय और पैसे जाया करना आज के नवयुवकों की कहानी बन गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरों की मदद के नाम से ही वे आफत में आ जाते हैं, अपने माता-पिता तक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, दाई-नौकरों और स्टाफ को पैसे देने में कतराते हैं, पर अपने शौक मौज के पीछे न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं। अपने मामलों में उन्हें मितव्ययिता की कोई आवश्यकता नहीं होती, पर कंपनी का खर्च घटाने में और दूसरों के मामले में अवश्य की जाती है। क्या मितव्ययिता का सही अर्थ यही है ? जब तक जन-जन को मितव्ययी जीवनशैली का व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक इस प्रकार की त्रुटियों का सुधार नहीं हो पायेगा। यह तभी संभव है हम अर्थ के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदलेगा एवं धन के प्रति व्यक्ति और समाज का दृष्टिकोण सम्यक होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वामी महावीर जी ने मितव्ययिता की दृष्टि से इच्छाओं के परिसीमन, व्यक्तिगत उपभोग का संयम एवं संविभाग यानी अपनी संपदा का समाजहित में सम्यक नियोजन के सूत्र दिये हैं। पंूजी, प्रौद्योगिकी और बाजार के उच्छृंखल विकास को नियंत्रित कर, व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सादगी एवं संयम को बल देकर, आर्थिक समीकरण एवं मानवीय सोच विकसित करके ही हम नया समाज दर्शन प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसा करके ही हम विश्व मितव्ययिता दिवस को मनाने की सार्थकता सिद्ध कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Oct 2017 03:41:08 +0530</pubDate>
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