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                <title>हवा सिंह का किरदार निभायेंगे सूरज पंचोली</title>
                                    <description><![CDATA[Suraj ने हीरो फिल्म के साथ रखा था बॉलीवुड़ में कदम | Hawa Singh मुंबई (एजेंसी)। बॉलीवुड अभिनेता सूरज पंचोली (Suraj Pancholi) सिल्वर स्क्रीन पर बॉक्सर हवा सिंह (Hawa Singh) का किरदार निभाते नजर आएंगे। आदित्य पंचोली के बेटे सूरज ने वर्ष 2015 में फिल्म हीरो से अपने बॉलीवुड करियर की शुरूआत की थी। इस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/rangmanch/suraj-pancholi-will-play-the-role-of-boxer-hawa-singh/article-12923"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/hawa-singh.jpg" alt=""></a><br /><h2>Suraj ने हीरो फिल्म के साथ रखा था बॉलीवुड़ में कदम | Hawa Singh</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई (एजेंसी)।</strong> बॉलीवुड अभिनेता सूरज पंचोली (Suraj Pancholi) सिल्वर स्क्रीन पर बॉक्सर हवा सिंह (Hawa Singh) का किरदार निभाते नजर आएंगे। आदित्य पंचोली के बेटे सूरज ने वर्ष 2015 में फिल्म हीरो से अपने बॉलीवुड करियर की शुरूआत की थी। इस फिल्म के साथ ही सुनील शेट्टी की बेटी आथिया शेट्टी ने भी अपने बॉलीवुड पारी की शुरूआत की। सूरज अपनी नई बायोपिक को लेकर चर्चा में है। इस फिल्म का नाम हवा सिंह है और सलमान खान भी इस फिल्म को प्रमोट कर रहे हैं। सलमान ने सूरज स्टारर फिल्म हवा सिंह का फर्स्ट पोस्टर लुक शेयर किया है। इस तस्वीर में सूरज पहलवान के अंदाज में दूध पीते हुए देखे जा सकते हैं। सलमान ने इस पोस्टर को सोशल मीडिया पर शेयर किया है। उन्होंने इस तस्वीर के कैप्शन में लिखा था- हवा से बातें करेगा सिंह… हवा सिंह बायोपिक।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p lang="et" dir="ltr" xml:lang="et">Hawa se baatein karega singh… <a href="https://twitter.com/hashtag/HawaSinghBiopic?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#HawaSinghBiopic</a> <a href="https://twitter.com/Sooraj9pancholi?ref_src=twsrc%5Etfw">@Sooraj9pancholi</a> <a href="https://t.co/2zS0AQYs0n">pic.twitter.com/2zS0AQYs0n</a></p>
<p>— Salman Khan (@BeingSalmanKhan) <a href="https://twitter.com/BeingSalmanKhan/status/1224565820925177856?ref_src=twsrc%5Etfw">February 4, 2020</a></p></blockquote>
<p></p>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>गौरतलब है कि हवा सिंह ने वर्ष 1966 और 1970 में एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीते हैं। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>वह हेवीवेट कैटेगिरी में लगातार 11 बार नेशनल चैंपियनशिप जीत चुके हैं। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सूरज इस फिल्म में काम करने को लेकर काफी उत्साहित हैं।</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>रंगमंच</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Feb 2020 12:21:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सशक्तिकरण में युवाओं की भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[उसे स्व्यं से प्रश्न करना होगा कि भारतीय खेती और खेतिहर की आज दुर्दशा क्यों है ? उसे मंथन करना होगा कि यदि खेती सचमुच घाटे का सौदा है, तो फिर कई कंपनियां खेती के काम में क्यों उतर रही हैं ? कमी हमारी खेती में है या विपणन व्यवस्था में ? ऊंची पसंद वाले देसी, जैविक और हर्बल को अन्य से उत्तम समझ रहे हैं।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/empowerment-in-the-role-of-youth/article-12415"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/role-of-youth.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सशक्तिकरण का असल मायने</h1>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>-भारत के गांव असल में भौतिक से ज्यादा, एक सांस्कृतिक इकाई ही हैं। इस दृष्टि से भी भारतीय गांव पूर्व की तुलना में अशक्त हुए हैं। इन्हे सशक्तिकरण की सख्त आवश्यकता है। सशक्तिकरण का मूल सिद्धांतानुसार, किसी भी संज्ञा या सर्वनाम के मूल गुणों को उभारकर शक्ति प्रदान करना ही उसका असल सशक्तिरण है। गांवों को शहर में तब्दील कर देना अथवा उसे शहरी सुविधाओं से भर देना, गांवों का असल सशक्तिकरण नहीं है। यदि गांवों का असल सशक्तिकरण और उसमें युवाओं की असल भूमिका को चिन्हित करना हो, तो ह में सबसे पहले भारतीय गांव नामक इकाई के मौलिक गुणों को चिन्हित करना होगा।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">भारत में सड़क, दुकान, बिजली, प्राथमिक स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र और थानायुक्त गांवों की संख्या बढ़ रही है। गांवों में पक्के मकानों की संख्या बढ़ी है। मकानों में मशीनी सुविधाओं की संख्या बढ़ी है, शौचालय बढ़े हैं। मोबाइल फोन, मोटरसाइकिल और ट्रेक्टर बढ़े हैं। ऊंची डिग्री व नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ी है। प्रति व्यक्ति आय और क्रय शक्ति में भी बढ़ोत्तरी हुई है। मजदूरी और दहेज की राशि बढ़ी है। ग्राम पंचायतों व ग्राम आधारित योजनाओं में शासन की ओर से धन का आवंटन बढ़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या बढ़ोत्तरी के उक्त ग्राफ को सामने रखकर हम कह सकते हैं कि भारत के गांव सशक्त हुए हैं? यदि हम भारतीय गांवों को सिर्फ एक भौतिक इकाई मानें, तो कह सकते हैं कि हां, पूर्व की तुलना में भारतीय गांव आज ज्यादा सशक्त हैं। भौतिक इकाई के तौर पर भी यदि हम भारतीय गांवों की मिट्टी, पानी, हवा, प्रकाश, वनस्पति, मवेशी और इंसानी शरीर की गुणवत्ता को आधार माने, तो कहना होगा कि पूर्व की तुलना में भारतीय गांव अशक्त हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? क्योंकि अधिक अस्पताल, अधिक स्कूल, अधिक दुकानें, अधिक पैसा और अधिक थाने क्रमश: ज्यादा अच्छी सेहत, अधिक ज्ञान, अधिक स्वावलंबन, अधिक समृद्धि और कम अपराध की निशानी नहीं है। वर्ष 1947 की तुलना में आज कृषि उत्पादन नि:संदेह बढ़ा है, किन्तु वहीं तब के अनुपात में आज भारत में उतरते पानी वाले गांव, बीमार पानी वाले गांव, बंजर होते गांव, रोगियों की बढ़ती संख्या वाले गांव तथा ग्रामीण बेरोजगारों की संख्या कई गुना बढ़ी है। गांव की रसोई में कांस्य, पीतल और तांबे वाले अधिक मंहगे बर्तनों तथा जौ, चना, मक्का जैसे मंहगे अनाज, शुद्ध पुष्ट दूध तथा देसी घी की जगह आज क्रमश: सस्ते स्टील, सस्ते गेहूं, पानी मिले दूध तथा वनस्पति घी ने ले ली है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भारतीय गांव के मौलिक गुण:</h3>
<p style="text-align:justify;">यह जगजािहर फर्क है कि नगर का निर्माण सुविधाओं के लिए होता है और प्रत्येक गांव तब बसता है, जब आपसी रिश्ते वाले कुछ परिवार एक साथ रहना चाहते हैं। ये रिश्ते खून के भी हो सकते हैं और परंपरागत जजमानी अथवा सामुदायिक काम-काज के भी। लेन-देन में साझे का सातत्य और ईमानदारी किसी भी रिश्ते के बने रहने की बुनियादी शर्तें होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दृष्टि से एक गांव में रहने वाले सभी निवासियों के बीच रिश्ते की मौजूदगी पहला और एक ऐसा जरूरी मौलिक गुण है, जिसकी अनुपस्थिति वाली किसी भी भारतीय बसावट को गांव कहना अनुचित मानना चाहिए। साधन का सामुदायिक स्वावलंबन, आचार-विचार में सादगी तथा आबोहवा व खान-पान में शुद्धता को आप गांव के अन्य तीन आवश्यक मौलिक गुण मान सकते हैं। कृषि, मवेशी पालन व परंपरागत कारीगरी…तीन ऐसे आवश्यक पेशे हैं, जिन्हे भारतीय गांवों की आर्थिकी व संस्कृति की रीढ़ कह सकते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मौलिक गुणों की शक्ति :</h3>
<p style="text-align:justify;">ये ही वे गुण हैं, जिनकी मौजूदगी के कारण कभी प्रख्यात यूरोपीय विद्वान ई.वी. हैवल ने भारत के गांवों को प्रजातंत्र की आधारशिला बताया था। प्रसिद्ध पर्यटक ट्रैवनियर ने कहा था कि भारत में प्रत्येक गांव अपने आप में एक छोटा सा संसार है। बाहर की घटनाओं का उनके ग्राम्य जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन्हीं मौलिक गुणों की समृद्धि के परिणामस्वरूप, भारत कभी सोने की चिड़िया कहलाया। इन्ही मौलिक गुणों के आधार पर भारत के गांवों में कभी खेती को उत्तम, व्यापार को मध्यम और नौकरी को निकृष्ट कहा जाता था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ग्राम्य सशक्तिकरण की चुनौतियां:</h3>
<p style="text-align:justify;">ग्रामीण सशक्तिकरण के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आज हमारे गांव, गांव बने रहने की बजाय, कुछ और हो जाने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं। कुछ लोग इसे ही सशक्तिकरण मान रहे हैं; जबकि ऐसे सशक्तिकरण के कारण भविष्य में भारत के गांव न गांव रह पायेंगे और न ही नगर हो पायेंगे। वे अधकचरे होकर रह जायेंगे। यह चित्र कैसे उलटे? गांव अपने मौलिक गुणों को पुन: कैसे हासिल करे ? यह अब युवा तन-मन के भरोसे ही संभव है। भारत के गांव प्रतीक्षा में हैं कि गांवों का यौवन पुन: बली हो। उसकी मुट्ठियां पुन: बंधें।</p>
<p style="text-align:justify;">युवा चेतना पुन: ग्रामीण समुदाय के सशक्तिकरण में लगे। किंतु यह तभी संभव है, जब ग्रामीण युवा यह समझने को तैयार हो कि उसके गांव ने जो कुछ खोया है, वह मौलिक गुणों के खो जाने का ही परिणाम है। उसे समझना होगा कि रिश्ते की लगातार कमजोर पड़ती डोर के कारण साझे के जरूरी काम नहीं हो पा रहे। सामुदायिक भूमि, जल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन नहीं हो पा रहा। इसी कारण भारत में बेपानी व प्रदूषित पानी वाले गांवों की संख्या बढ़ रही है। इसी कारण साझे खेत व खेती लगातार घट रहे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सोच बदलने से बदलेगी दुनिया:</h3>
<p style="text-align:justify;">आई.ए.एस की नौकरी छोड़ने वाले बंकर रॉय का तिलोनिया स्थित बेयरफुट कॉलेज, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ-साथ अलवर का उत्थान चित्र, हिवरे बाजार के पोपटराव पवार की सरपंची की विख्यात दास्तान, भारत की पहली एम.बी.ए. डिग्रीधारी महिला संरपंच होने के नाते चर्चा में आई राजस्थान के जिला टोंक की छवि रजावत…. ऐसे जाने कितने उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि गांव में रहकर भी बेहतर आय, बेहतर रोजगार, बेहतर सम्मान और शहर से अधिक आनंदमयी जीवन संभव है। किंतु इसके लिए ग्रामीण युवा को सबसे पहले अपनी मानसिकता व प्राथमिकता बदलनी होगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">संभावनाओं का खुला आकाश:</h3>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>शिक्षा :</strong></em> उसे यह भी समझना होगा कि सिर्फ डिग्री और नौकरी के लिए पढ़ने-पढ़ाने से गांवों का सशक्तिकरण असंभव है। ग्रामीण युवाओं को ऐसे ज्ञान की चाहत को प्राथमिकता बनाना होगा, जो उन्हे खेतीबाड़ी, मवेशी और स्थानीय संसाधन आधारित कारीगरी तथा विपणन का सर्वश्रेष्ठ व स्वावलंबी नमूना प्रस्तुत करने में सक्षम बनाये। ऐसा कुशल ग्राम अर्थशास्त्री बनना होगा ताकि गांव को आर्थिक उत्थान के लिए नगर की ओर ताकना न पड़े। गांवों में प्राइवेट उच्चतर माध्यमिक स्कूलों व स्नातकोत्तर कॉलेजों की बाढ़ आ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामुदायिक व सहकारी आधार पर संचालित कृषि, मवेशी, जल, भूमि, आयुष, पारंपरिक कौशल उन्नयन तथा समग्र ग्राम प्रबंधन सिखाने वाली अच्छी तकनीकी व प्रबंधन पाठशालाओं का भारतीय गांवों में अभी भी अभाव है। बस, कुछ थोड़े से संजीदा युवा साथी एक बार यह तय कर लें, तो वे यह कर सकते हैं। कुश्ती, दौड़, निशानेबाजी, तैराकी जैसे ग्राम अनुकूल खेलों की नर्सरी बनाकर भी हमारे ग्रामीण युवा ग्रामोदय से भारतोदय की सक्षमता हासिल कर सकते हैं। ग्रामीण युवा को ऐसे ग्राम समाज का निर्माण करना होगा, जहां हम भिन्न जाति, संप्रदाय, वर्ग होते हुए भी पहले एक गांव हों। बंधुआ व बाल मजदूरी के दागों को पूरी तरह मिटाना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>पंचायत:</strong></em> उसे ग्रामसभा की ऐसी उत्प्रेरक शक्ति बनना पड़ेगा, जो खुद सक्रिय हो और पंचायतीराज संस्थान की त्रिस्तरीय इकाइयों को सतत सक्रिय, कर्मठ तथा ईमानदार बनाये रखने में सक्षम हो। ‘ग्राम विकास योजना’ की धनराशि गांव-गांव पहुंचने लगी है। प्रत्येक ग्रामीण युवा चाहे, तो ग्रामसभा सदस्य की हैसियत से उचित ग्राम योजना निर्माण, मंजूरी तथा क्रियान्वयन में एक नायक की भूमिका निभाकर अपना युवा होना सार्थक कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>कृषि :</strong></em> यह सिर्फ दुर्योग ही है कि बहकावे में आकर ग्रामीण युवा ने भी खेती को निकृष्ट मान लिया है। उसे स्व्यं से प्रश्न करना होगा कि भारतीय खेती और खेतिहर की आज दुर्दशा क्यों है ? उसे मंथन करना होगा कि यदि खेती सचमुच घाटे का सौदा है, तो फिर कई कंपनियां खेती के काम में क्यों उतर रही हैं ? कमी हमारी खेती में है या विपणन व्यवस्था में ? ऊंची पसंद वाले देसी, जैविक और हर्बल को अन्य से उत्तम समझ रहे हैं। बाजार भी इन्हे उत्तम बताकर मंहगे दाम पर बेच रहा है। पतंजलि उत्पादों का बढ़ता ग्राफ प्रमाण है कि ग्राहकों की दुनिया देशी बीज, योग और आयुर्वेदिक पर जान छिड़क रही है। समाधान यहां है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>स्वच्छता :</strong></em> गांवों ने शहरी खान-पान, रहन-सहन व पॉलीपैक उत्पाद तो अपना लिए, लेकिन शहर जैसा स्वच्छता तंत्र गांव के पास नहीं है, लिहाजा, भारतीय गांव, अब गंदगी और बीमारी के नये अड्डे बनने की दिशा में अग्रसर हैं। काली-पीली पन्नियां, बजबजाती नालियां और अन्य गंदगी के ढेर नई पहचान बनते जा रहे हैं। भारतीय गांवों की यह नई पहचान, किसी भी गांव के सशक्तिकरण के प्रतिकूल है। प्रतिकूलता के इन निशानों को मिटाना भी गांव का सशक्तिकरण ही है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>-अरुण तिवारी</strong></em></p>
<p> </p>
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<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jan 2020 20:22:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्र निर्माण में युवा शक्ति की अहम भूमिका : मुख्यमंत्री</title>
                                    <description><![CDATA[12 जनवरी को रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत प्रदेश में होगी मैराथन | Youth power रोहतक (सच कहूँ न्यूज)। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में 12 जनवरी को पूरे हरियाणा में रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत मैराथन का आयोजन किया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/youth-power-plays-an-important-role-in-nation-building-chief-minister/article-12055"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/youth-power.jpg" alt=""></a><br /><h2>12 जनवरी को रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत प्रदेश में होगी मैराथन | Youth power</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>रोहतक (सच कहूँ न्यूज)।</strong> मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में 12 जनवरी को पूरे हरियाणा में रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत मैराथन का आयोजन किया जाएगा। एक साथ युवा शक्ति (Youth power) नए संकल्प व सकारात्मक ऊर्जा के साथ मैराथन में भागीदार बनेगी। साथ ही राष्ट्र हित की दिशा में बेहतर करने का संकल्प लेगी। मुख्यमंत्री शनिवार को बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय सभागार में आयोजित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 51वें प्रांत अधिवेशन में बोल रहे थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में युवा शक्ति की अहम भूमिका है।</p>
<h3>शिक्षा व संस्कारों के आधार पर ही श्रेष्ठ नागरिक बनते हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद युवाओं में संस्कारों का समावेश करते हुए अपना दायित्व बखूबी निभा रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व संस्कारों के आधार पर ही श्रेष्ठ नागरिक बनते हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थाएं जहां युवा वर्ग को शैक्षणिक माहौल प्रदान कर रहे हैं। वहीं एबीवीपी जैसे सामाजिक संगठन संस्कार देने में अग्रणी हैं। मुख्यमंत्री ने हरियाणा सरकार की ओर से जल्द ही वोलेंटिरिजम कार्यक्रम शुरू करने की बात भी कही।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ये भी बोले सीएम</h3>
<ul style="text-align:justify;">
<li><strong>युवा वर्ग के साथ हर वर्ग सामाजिक जिम्मेवारी स्वयंसेवक के रूप में निभाए </strong></li>
<li><strong>बिना लोभ, लालच के कोई भी व्यक्ति राष्ट्र हित की योजनाओं में सुझाव दे। </strong></li>
<li><strong> बेटियों के हितों को सुरक्षित व उन्हें सुरक्षित माहौल प्रदान करने के लिए उठाए जा रहे कदम </strong></li>
<li><strong>सभी छात्र संगठन यदि अनुशासनात्मक स्वरूप के साथ आगे बढ़ें</strong></li>
<li><strong> एबीवीपी जैसे सामाजिक संगठन संस्कार देने में अग्रणी</strong></li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">जोश के साथ होश भी रखें युवा : बालक नाथ</h3>
<p style="text-align:justify;">बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं अलवर से सांसद महंत बाबा बालक नाथ ने भी युवाओं को पूरे जोश के साथ होश रखते हुए सामाजिक रूप से अपना योगदान देने के लिए प्रेरित किया। एबीवीपी की राष्ट्र महामंत्री निधि त्रिपाठी ने हरियाणा सरकार की ओर से महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदमों की सराहना की। इस अवसर पर सांसद डॉ. अरविंद शर्मा, मेयर मनमोहन गोयल, सांसद संजय भाटिया, संगठन मंत्री सुरेश भट्ट, भूपेंद्र मलिक, राजेंद्र धीमान, सुमित जागलान, डा.लखविंद लोहानी, सीताराम व्यास, एलपीएस बोसार्ड के चेयरमैन राजेश जैन, विजय, डॉ. लाकेश शेखावत, राजेश गहलावत, डा.रीटा शर्मा प्रमुख रूप से मौजूद रहे।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Dec 2019 07:00:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>‘चैंपियंस आॅफ दि अर्थ’ के बाद जिम्मेदारी भी चैंपियन के तौर पर निभाएं मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ रोज़ पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों के साथ इस साल का ‘चैंपियंस आॅफ दि अर्थ’ अवॉर्ड दिया गया है। इस पुरस्कार के बाद इस मोर्चे पर भारत की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। उम्मीद करें कि हमारे नीति निर्माता इस बढ़ी हुई जिम्मेदारी को महसूस करेंगे। इंटर गवर्नमेंटल पैनल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/modis-role-as-champion-after-champions-of-the-earth/article-6259"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/modis-role-as-champion-after-champions-of-the-earth-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ रोज़ पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों के साथ इस साल का ‘चैंपियंस आॅफ दि अर्थ’ अवॉर्ड दिया गया है। इस पुरस्कार के बाद इस मोर्चे पर भारत की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। उम्मीद करें कि हमारे नीति निर्माता इस बढ़ी हुई जिम्मेदारी को महसूस करेंगे। इंटर गवर्नमेंटल पैनल आॅन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट ने जलवायु के मोर्चे से मानव जाति पर मंडरा रहे खतरे को बड़ी गंभीरता से रेखांकित किया है। लेकिन जब तक यह खतरा राजनीति के लिए मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक इस मोर्चे पर ठोस फैसले होते नहीं दिखेंगे। पोलैंड में इसी दिसंबर महीने में होने वाली क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में इस रिपोर्ट के निहितार्थों पर विचार होना है। गौर करने की बात है कि इस सम्मेलन में सरकारें पेरिस समझौते की भी समीक्षा करेंगी, जिससे बाहर निकलने की घोषणा अमेरिका पहले ही कर चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">अन्य प्रमुख देश जलवायु में बदलाव संबंधी चुनौतियों को गंभीरता से लेने की बात कहते रहे हैं, पर इस दिशा में दुनिया अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकी है जिससे खतरा टलने की संभावना जरा भी मजबूत होती दिखे। आईपीसीसी की यह रिपोर्ट बिना किसी लाग-लपेट के बताती है कि औसत वैश्विक तापमान डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का खतरा कहीं सुदूर भविष्य में नहीं 2030 तक, यानी 12 साल के अंदर ही वास्तविक रूप ले सकता है। जो लोग जलवायु परिवर्तन संबंधी खतरों को विकास के अजेंडे से बाहर की चीज मानते रहे हैं, उनकी गलतफहमी दूर करते हुए रिपोर्ट इस सचाई को सामने लाती है कि ये बदलाव विकास की उपलब्धियों को तहस-नहस कर सकते हैं। इनके चलते करोड़ों की आबादी फिर से गरीबी रेखा के नीचे जा सकती है, जिसे बड़ी मुश्किलों से इस रेखा के ऊपर लाया जा सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">फसलें नष्ट होने, खाद्य पदार्थों के महंगा होने और बड़े पैमाने पर लोगों के विस्थापित होने से जो चुनौतियां सरकारों के सामने आएंगी, उनसे निपटना बहुत कठिन होगा। रिपोर्ट यह भ्रम भी तोड़ देती है कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के प्रारंभिक दुष्प्रभाव दूर-दराज के द्वीपीय देशों में ही देखे जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक कोलकाता और कराची इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले इलाकों में शामिल होंगे। इस मान्यता का ठोस आधार यह है कि पिछले सौ साल से तापमान में बढ़ोतरी का यहां ज्यादा प्रभाव देखा गया है। देश के प्रमुख शहरों का पिछले सौ साल का रिकॉर्ड बताता है कि इस अवधि में जहां चेन्नै में तापमान औसतन 0.6 डिग्री सेल्सियस और मुंबई में 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, वहीं दिल्ली में यह 1 तो कोलकाता में 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। असल चिंता की बात यह है कि नीति निमार्ताओं की प्राथमिकता में जलवायु परिवर्तन आज भी शामिल नहीं हो पाया है। विकास को आर्थिक उपलब्धियों से जुड़े आंकड़ों के चश्मे से देखने की आदत हम नहीं छोड़ पा रहे, जबकि एक दिन यह छोड़नी होगी।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Oct 2018 17:11:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विद्या बालन निभायेंगी सीएम जयललिता का किरदार</title>
                                    <description><![CDATA[दो प्रोडक्शन कंपनियां फिल्म बनाने की प्रक्रिया में| Vidya Balan Jailalita मुंबई (एजेंसी)। बॉलीवुड में अपने संजीदा अभिनय के लिये मशहूर (Vidya Balan Jailalita)  विधा बालन सिल्वर स्क्रीन पर अभिनेत्री और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जय ललिता का किरदार निभाती नजर आ सकती है। चर्चा है कि जयललिता की जीवनी पर दो प्रोडक्शन कंपनियां फिल्म […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/rangmanch/vidya-balan-plays-cm-jayalalithaa-role/article-5417"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/vidya-balan.jpg" alt=""></a><br /><h2>दो प्रोडक्शन कंपनियां फिल्म बनाने की प्रक्रिया में| Vidya Balan Jailalita</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई (एजेंसी)।</strong> बॉलीवुड में अपने संजीदा अभिनय के लिये मशहूर <strong>(Vidya Balan Jailalita)</strong>  विधा बालन सिल्वर स्क्रीन पर अभिनेत्री और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जय ललिता का किरदार निभाती नजर आ सकती है। चर्चा है कि जयललिता की जीवनी पर दो प्रोडक्शन कंपनियां फिल्म बनाने की प्रक्रिया में हैं। पहली कंपनी वेबरी मीडिया जो बॉयोपिक बनाने जा रही है, उसे तमिल, तेलुगु और हिंदी में रिलीज किया जाएगा। इस फिल्म का निर्देशन तमिल डायरेक्टर ए.एल.व्यास करेंगे। वेबरी मीडिया के निदेशक ब्रिंदा प्रसाद अदुसुमिल्ली का कहना है-ये फिल्म अभिनय और राजनीति के क्षेत्र में उनके योगदान को एक श्रद्धांजलि होगी। बताया जा रहा है कि जयललिता की जयंती पर अगले वर्ष 24 फरवरी को फिल्म के पोस्टर का फर्स्ट लुक जारी करेंगे। चर्चा है कि विद्या बालन को लीड रोल में लिया जाएगा। इसके अलावा चेन्नई की पेपरटेल पिक्चर्स ने भी जयललिता के जीवन पर ए प्रियदर्शिनी के निर्देशन में फिल्म बनाने की घोषणा की है। फिल्म के निर्देशक का कहना है ये मेरी ड्यूटी है कि मैं ऐसे नेता पर फिल्म बनाउं। इस प्रोजेक्ट की कास्ट और टेक्निकल टीम की घोषणा 20 सितंबर को की जाएगी। साथ ही फिल्म की शूटिंग 24 फरवरी से शुरू हो जाएगी।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>रंगमंच</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Aug 2018 13:22:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है, यह अध्यात्म-जगत की सबसे बड़ी घटना के रूप में जाना जाता है। पश्चिमी देशों में गुरु का कोई महत्व नहीं है, वहां विज्ञान और विज्ञापन का महत्व है परन्तु भारत में सदियों से गुरु का महत्व रहा है। यहां की माटी एवं जनजीवन में गुरु को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/important-role-of-guru-in-indian-culture/article-5024"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/guru-punima.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है, यह अध्यात्म-जगत की सबसे बड़ी घटना के रूप में जाना जाता है। पश्चिमी देशों में गुरु का कोई महत्व नहीं है, वहां विज्ञान और विज्ञापन का महत्व है परन्तु भारत में सदियों से गुरु का महत्व रहा है। यहां की माटी एवं जनजीवन में गुरु को ईश्वरतुल्य माना गया है, क्योंकि गुरु न हो तो ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग कौन दिखायेगा? गुरु ही शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वे ही जीवन को ऊर्जामय बनाते हैं। जीवन विकास के लिए भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु की सन्निधि, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन कृतार्थता से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन। इन्हीं की प्रेरणा से आत्मा चैतन्यमय बनती है। गुरु भवसागर पार पाने में नाविक का दायित्व निभाते हैं। वे हितचिंतक, मार्गदर्शक, विकास प्रेरक एवं विघ्नविनाशक होते हैं। उनका जीवन शिष्य के लिये आदर्श बनता है। उनकी सीख जीवन का उद्देश्य बनती है। अनुभवी आचार्यों ने भी गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए लिखा है- गुरु यानी वह अर्हता जो अंधकार में दीप, समुद्र में द्वीप, मरुस्थल में वृक्ष और हिमखण्डों के बीच अग्नि की उपमा को सार्थकता प्रदान कर सके।</p>
<p style="text-align:justify;">
आषाढ़ की समाप्ति और श्रावण के आरंभ की संधि को आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा अथवा गुरु पूर्णिमा कहते हैं। गुरु पूर्णिमा आत्म-बोध की प्रेरणा का शुभ त्योहार है। यह त्योहार गुरु-शिष्य के आत्मीय संबंधों को सचेतन व्याख्या देता है। काव्यात्मक भाषा में कहा गया है- गुरु पूर्णिमा के चांद जैसा और शिष्य आषाढ़ी बादल जैसा। गुरु के पास चांद की तरह जीए गये अनुभवों का अक्षय कोष होता है। इसीलिये इस दिन गुरु की पूजा की जाती है इसलिए इसे ‘गुरु पूजा दिवस’ भी कहा जाता है। प्राचीन काल में विद्यार्थियों से शुल्क नहीं वसूला जाता था अत: वे साल में एक दिन गुरु की पूजा करके अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा देते थे। महाभारत काल से पहले यह प्रथा प्रचलित थी लेकिन धीरे-धीरे गुरु-शिष्य संबंधों में बदलाव आ गया। कहा गया है कि अगर आप गुरु की ओर एक कदम बढ़ाते हैं तो गुरु आपकी ओर सौ कदम बढ़ाते हैं। कदम आपको ही उठाना होगा, क्यों यह कदम आपके जीवन को पूर्णता प्रदत्त करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
भारतीय संस्कृति में गुरु का बहुत ऊंचा और आदर का स्थान है। माता-पिता के समान गुरु का भी बहुत आदर रहा है और वे शुरू से ही पूज्य समझे जाते रहे हैं। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समान समझ कर सम्मान करने की पद्धति पुरातन है। ‘आचार्य देवोभव:’ का स्पष्ट अनुदेश भारत की पुनीत परंपरा है और वेद आदि ग्रंथों का अनुपम आदेश है। ऐसी मान्यता है कि हरिशयनी एकादशी के बाद सभी देवी-देवता चार मास के लिए सो जाते हैं। इसलिए हरिशयनी एकादशी के बाद पथ प्रदर्शक गुरु की शरण में जाना आवश्यक हो जाता है। परमात्मा की ओर संकेत करने वाले गुरु ही होते हंै। गुरु एक तरह का बांध है जो परमात्मा और संसार के बीच और शिष्य और भगवान के बीच सेतु का काम करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन गुरुओं की छत्रछाया में से निकलने वाले कपिल, कणाद, गौतम, पाणिनी आदि अपने विद्या वैभव के लिए आज भी संसार में प्रसिद्ध हंै। गुरुओं के शांत पवित्र आश्रम में बैठकर अध्ययन करने वाले शिष्यों की बुद्धि भी तद्नुकूल उज्ज्वल और उदात्त हुआ करती थी। सादा जीवन, उच्च विचार गुरुजनों का मूल मंत्र था। तप और त्याग ही उनका पवित्र ध्येय था। लोकहित के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देना और शिक्षा ही उनका जीवन आदर्श हुआ करता था। प्राचीन काल में गुरु ही शिष्य को सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह का ज्ञान देते थे लेकिन आज वक्त बदल गया है। आजकल विद्यार्थियों को व्यावहारिक शिक्षा देने वाले शिक्षक को और लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान देने वाले को गुरु कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षक कई हो सकते हैं लेकिन गुरु एक ही होते हैं। हमारे धर्मग्रंथों में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा गया है कि जो शिष्य के कानों में ज्ञान रूपी अमृत का सींचन करे और धर्म का रहस्योद्घाटन करे, वही गुरु है। यह जरूरी नहीं है कि हम किसी व्यक्ति को ही अपना गुरु बनाएं। योग दर्शन नामक पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण को जगतगुरु कहा गया है क्योंकि महाभारत के युद्ध के दौरान उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था। माता-पिता केवल हमारे शरीर की उत्पत्ति के कारण हंै लेकिन हमारे जीवन को सुसंस्कृत करके उसे सर्वांग सुंदर बनाने का कार्य गुरु या आचार्य का ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
पहले गुरु उसे कहते थे जो विद्यार्थी को विद्या और अविद्या अर्थात आत्मज्ञान और सांसारिक ज्ञान दोनों का बोध कराते थे लेकिन बाद में आत्मज्ञान के लिए गुरु और सांसारिक ज्ञान के लिए आचार्य-ये दो पद अलग-अलग हो गए। भारत के महान दार्शनिक ओशो ने जब यह कहा कि हमारी शिक्षण संस्थाएं अविद्या का प्रचार कर रही हैं तो लोगों ने आपत्ति की लेकिन वे बात सही कह रहे थे। आज हमारे विद्यालयों में ज्ञान का नहीं बल्कि सूचनाओं का हस्तांतरण हो रहा है। विद्यार्थियों का ज्ञान से अब कोई वास्ता नहीं रहा इसलिए आज हमारे पास डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, न्यायाधीश, वैज्ञानिक और वास्तुकारों की तो एक बड़ी भीड़ जमा है लेकिन ज्ञान के अभाव में चरित्र और चरित्र के बिना सुंदर समाज की कल्पना दिवास्वप्न बन कर रह गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">
शिक्षा का संबंध यदि चरित्र के साथ न रहा तो उसका परिणाम यही होगा। परंतु इस मूल प्रश्न की ओर कौन ध्यान दे? सत्ताधारी लोग अपने पद को बनाये रखने के लिए शिक्षा का संबंध चरित्र की बजाय रोजगार से जोड़ना चाहते हैं। जो लोग शिक्षा का संबंध रोजगार से जोड़ने की वकालत करते हैं वे वस्तुत: शताब्दियों तक अपने लिए राज करने की भूमिका तैयार कर रहे हैं और उनके तर्क इतने आकट्य हैं कि सामान्य व्यक्ति को महसूस होता है कि समाज के सबसे अधिक हिंतचिंतक यही लोग हैं। यही कारण है कि देश में आज जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है, अनैतिकता और अराजकता फैलती जा रही है, हिंसा और आतंक बढ़ता जा रहा है, भ्रष्टाचार और अपराध जीवनशैली बन गयी है। इसका मूल कारण गुरु को नकारकर, चरित्र को नकारकर हमने केवल भौतिकता को जीवन का आधार बना लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">
पिछले सात दशक से हम उल्टी गिनती गिन रहे हैं। उसी का परिणाम है कि न पानी की समस्या सुलझी न रोजी-रोटी की। न उन्नत चिकित्सा सुलभ हो पा रही है न शिक्षा को उन्नत बना पाये है। चंद लोगों की भव्य अट्टालिकाएं अवश्य खड़ी हो गई हैं। यदि हमें भारत में लोकतांत्रिक पद्धति को सफल बनाना है तो चरित्र उसकी पहली शर्त है। महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि हम हिंदुस्तान में कौन-सी पद्धति लागू करें बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हम चरित्रवान व्यक्ति पैदा करें।</p>
<p style="text-align:justify;">
पाठ्य पुस्तकों में कुछ नीतिपरक श्लोकों को जोड़ने अथवा बच्चों को तोते की तरह गायत्री मंत्र रटाने या अंग्रेजी शैली में योग को ‘योगा’ करने से न तो चरित्र निर्माण होता है और न भावी पीढ़ी में ज्ञान का हस्तांतरण ही संभव है। ज्ञान तो गुरु से ही प्राप्त हो सकता है लेकिन गुरु मिलें कहां? अब तो ट्यूटर हैं, टीचर हैं, प्रोफेसर हैं पर गुरु नदारद हैं। गुरु के प्रति अविचल आस्था ही वह द्वार है जिससे ज्ञान का हस्तांतरण संभव है। हमें इन तथ्यों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सच है कि आज हम जिस सामाजिक और आर्थिक परिवेश में सांस ले रहे हैं वहां इन पुरानी व्यवस्थाओं की चर्चा निरर्थक है परंतु इनके सार्थक और शाश्वत अंशों को तो हम ग्रहण कर ही सकते हैं।सिर्फ धन कमाने या रोजी-रोटी चला लेने से मनुष्य जीवन में सुखी नहीं रह सकता। यह सुखी रहने का बाहरी भौतिक उपाय है।</p>
<p><span style="text-align:justify;">अपनी आत्मा को जानना और भगवान को पाना ही सच्चा सुख है। यद्यपि गुरुओं के महागुरु भगवान स्वयं प्रत्येक व्यक्ति के हृदय-गुहा में विराजमान हैं तथापि बिना किसी बाहर के योग्य गुरु की मदद के हम अपनी आत्मा को नहीं जान सकते। यह आध्यात्मिक गुरु ही अन्तरात्मा के बंद द्वार खोलता है और हमें भगवान से साक्षात्कार कराता है।</span><span style="text-align:justify;">माँ का ज्ञान और शिक्षक द्वारा दिया गया ज्ञान बाहर का ज्ञान है, वस्तुओं का ज्ञान है परन्तु आध्यात्मिक गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान आंतरिक ज्ञान है। वह भीतर के अंधकार को दूर कर उसे प्रकाशित करता है। बाहर की वस्तुओं का कितना भी हमें ज्ञान प्राप्त हो जाए हम कितने भी बड़े पद पर हों, कितना भी हमारे पास पैसा हो परन्तु बिना भीतर के ज्ञान सब कुछ व्यर्थ है। बाहरी ज्ञान, मन-बुद्धि का ज्ञान-विज्ञान है परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान मन से परे भगवान का ज्ञान है।</span></p>
<p style="text-align:justify;">परन्तु विडम्बना यह है कि जिस प्रकार गुरु रूपी माँ की महिमा और सम्मान में गिरावट आई है, रोजगार दिलाने वाले शिक्षकों का अवमूल्यन हुआ है। उसी प्रकार भगवान से मिलाने वाले आध्यात्मिक गुरुओं का भी अवमूल्यन हो रहा है। आज नकली, धूर्त, ढोंगी, पाखंडी, साधु-संन्यासियों और गुरुओं की बाढ़ ने असली गुरु की महिमा को घटा दिया है। असली गुरु की पहचान करना बहुत कठिन हो गया है। भगवान से मिलाने के नाम पर, मोक्ष और मुक्ति दिलाने के नाम पर, कुण्डलिनी जागृति के नाम पर, पाप और दु:ख काटने के नाम पर, रोग-व्याधियां दूर करने के नाम पर और जीवन में सुख और सफलता दिलाने के नाम पर हजारों धोखेबाज गुरु पैदा हो गये हैं जिनको वास्तव में कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">
जो स्वयं आत्मा को नहीं जानते वे दूसरों को आत्मा पाने का गुर बताते हैं। तरह-तरह के प्रलोभन देकर धन कमाने के लिए शिष्यों की संख्या बढ़ाते हैं। जिसके बाड़े में जितने अधिक शिष्य हों वह उतना ही बड़ा और सिद्ध गुरु कहलाता है। मूर्ख भोली-भाली जनता इनके पीछे-पीछे भागती है और दान-दक्षिणा देती है। ऐसे धन-लोलुप अज्ञानी और पाखंडी गुरुओं से हमें सदा सावधान रहना चाहिए। कहावत है कि ‘पानी पीजै छान के और गुरु कीजै जान के।</p>
<p style="text-align:justify;">’ सच्चा गुरु ही भगवान तुल्य है। इसीलिए कहा गया है कि ‘गुरु-गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविंद दियो मिलाय।’ यानी भगवान से भी अधिक महत्व गुरु को दिया गया है। यदि गुरु रास्ता न बताये तो हम भगवान तक नहीं पहुंच सकते। अत: सच्चा गुरु मिलने पर उनके चरणों में सब कुछ न्यौछावर कर दीजिये। उनके उपदेशों को अक्षरश: मानिये और जीवन में उतारिये। सभी मनुष्य अपने भीतर बैठे इस परम गुरु को जगायें। यही गुरु-पूर्णिमा की सार्थकता है तथा इसी के साथ अपने गुरु का भी सम्मान करें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 27 Jul 2018 03:23:48 +0530</pubDate>
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                <title>‘डेट लीक’ मामला और चुनाव आयोग की भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[कभी ‘डाटा लीक’, कभी डेट लीक’, कभी आधार की सूचनाएं लीक और कभी देशभर में विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक, आखिर देश में इन दिनों यह सब क्या घटित हो रहा है? लोगों के आधार कार्ड से उनकी सूचनाएं लीक होने तथा ‘डाटा’ लीक होने के सिलसिले में हाल के दिनों में देश में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/role-of-data-leak-and-election-commission/article-3677"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/sadan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी ‘डाटा लीक’, कभी डेट लीक’, कभी आधार की सूचनाएं लीक और कभी देशभर में विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक, आखिर देश में इन दिनों यह सब क्या घटित हो रहा है? लोगों के आधार कार्ड से उनकी सूचनाएं लीक होने तथा ‘डाटा’ लीक होने के सिलसिले में हाल के दिनों में देश में काफी घमासान मच चुका है और कुछ समय से एस.एस.सी., राजस्थान पुलिस तथा कई अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने और अब सीबीएसई की बोर्ड की 10वीं व 12वीं कक्षा के प्रश्नपत्र लीक होकर सहजता से व्हाट्सअप पर उपलब्ध होने के बाद सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर जो गंभीर सवाल उठने लगे हैं, उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">ताजा प्रकरण 27 मार्च को चुनाव आयोग द्वारा कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित करने से ठीक पहले भाजपा के आई.टी. प्रकोष्ठ प्रमुख अमित मालवीय द्वारा चुनाव की तारीख संबंधी ट्वीट करने से जुड़ा है। दरअसल चुनाव आयोग चुनाव की तिथि की घोषणा से कुछ ही समय पहले अमित मालवीय ने ट्वीट कर कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तारीख 12 मई बताई थी और चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रैंस में यह सच साबित हुई और इसे लेकर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले को लेकर जहां केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा पर ‘सुपर इलैक्शन कमीशन’ की तरह कार्य करने के आरोप लगने लगे हैं, वहीं आए दिन सामने आ रहे तरह-तरह के ‘लीक’ मामलों को लेकर अब केन्द्र पर संवैधानिक संस्थाओं का डाटा चुराने के आरोप भी लगाए जाने लगे हैं, जो बेहद गंभीर स्थिति है। चुनाव की तारीख जैसी महत्वपूर्ण गोपनीय सूचना लीक करने के मामले को लेकर यदि विपक्षी दल चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या आयोग अब भाजपाध्यक्ष अमित शाह तथा पार्टी के आईटी हेड के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाएगा तो इसमें गलत क्या है? चूंकि चुनाव की तारीख चुनाव आयोग से ही लीक हुई है, इसलिए पहले से ही विवादों में घिरे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली इस प्रकरण के बाद एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल जिस प्रकार अदालत में किसी भी मामले में फैसला सुनाने का हक सिर्फ और सिर्फ न्यायाधीश को होता है, ठीक उसी प्रकार चुनाव आयोग के भी अपने कुछ अधिकार हैं और चुनाव की तारीखें घोषित करने का कार्य सिर्फ चुनाव आयोग का ही है, किसी भी राजनीतिक दल या किसी न्यूज चैनल को अथवा किसी भी अन्य शख्स को यह अधिकार नहीं है कि वो चुनाव आयोग की घोषणा से पहले ही इस प्रकार चुनाव की तारीखें सार्वजनिक कर आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का दुस्साहस करे।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे मामलों में आयोग को अपनी साख प्रभावित होने से बचाने के लिए कठोर कदम उठाने चाहिएं। चूंकि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जिसके पास देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न कराने के लिए न्यायिक अधिकार भी होते हैं और संविधान की व्याख्या के तहत न तो केन्द्र सरकार और न ही कोई भी राजनीतिक दल उसके कार्य में हस्तक्षेप कर सकता है, अत: यदि देश में आयोग की किसी भी प्रकार की कार्यप्रणाली को लेकर कोई गलत संकेत जाता है तो यह लोकतंत्र के हित में कदापि नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में दिल्ली की केजरीवाल सरकार के 20 विधायकों के मामले में हाईकोर्ट द्वारा जिस प्रकार आयोग की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया था तथा अब आयोग से चुनाव की तारीख लीक होने का मामला सामने आया है, इससे पहले भी आयोग की साख प्रभावित करते कुछ और प्रकरण सामने आए हैं और इसी वजह से आशंका जताई जाने लगी है कि आयोग केन्द्र के दबाव में काम कर रहा है। हालांकि केन्द्र सरकार पर पिछले काफी समय से इस प्रकार के आरोप लगते रहे हैं कि वह संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर उनका बड़े पैमाने पर दुरूपयोग कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी प्रकरण के दौरान जिस प्रकार भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का चीरहरण होते सभी ने देखा, उसी प्रकार सीबीआई, आईटी और ईडी जैसी संस्थाओं का विपक्षी दलों व विरोधियों का मुंह बंद कराने के लिए व्यापक स्तर पर दुरूपयोग करने के आरोप भी लगते रहे हैं लेकिन जहां तक चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की बात है तो आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण धुरी है, अत: आयोग की कार्यप्रणाली में यदि किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव झलकता है तो उससे आयोग की प्रतिष्ठा पर जो आघात लगेगा, उसका खामियाजा समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था को भुगतना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 1990 से पहले चुनाव आयोग केन्द्र सरकार की एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में ही कार्य करने के लिए विख्यात था, उसके अधिकांश फैसलों में उस पर केन्द्र का दबाव प्रत्यक्ष झलकता था किन्तु 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए चुनाव आयोग को निष्पक्ष छवि प्रदान की और देश की जनता को अहसास कराया कि आयोग केन्द्र के हाथों की कठपुतली नहीं बल्कि एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त पर अंकुश लगाने के लिए उस समय सरकार द्वारा चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान कर दिया गया ताकि उनके माध्यम से सरकार आयोग पर नियंत्रण बनाए रख सके किन्तु उसके बाद भी चुनाव आयोग ने अपनी निष्पक्षता पर आंच नहीं आने दी और यही कारण है कि हमारे देश के चुनाव आयोग की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष कार्यप्रणाली का बारीकी से अध्ययन करते हुए दुनिया के कई देशों ने उसी के अनुरूप अपने लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कदम उठाए हैं</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन कुछ समय से आयोग की कार्यप्रणाली पर जिस प्रकार बार-बार सवालिया निशान लग रहे हैं और उसके विभिन्न फैसलों में उस पर अप्रत्यक्ष दबाव झलक रहा है, उसके मद्देनजर आयोग को इस ओर खास ध्यान देते हुए देश के मतदाताओं को यह संदेश देने के लिए पर्याप्त कदम उठाने ही होंगे कि उसके निर्देशन, मार्गदर्शन और नियंत्रण में देश में आने वाले समय में भी चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से सम्पन्न होती रहेगी और लांकतांत्रिक प्रणाली पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में सरकारें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन अगर आयोग की कार्यप्रणाली किसी भी कारणवश कटघरे में खड़ी नजर आती है तो वह लोकतंत्र में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिहाज से ठीक नहीं है। अत: यह जिम्मेदारी आयोग की ही है कि उसकी कार्यप्रणाली में आम नागरिकों का भरोसा बरकरार रहे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 30 Mar 2018 03:17:59 +0530</pubDate>
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                <title>मितव्ययिता है भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/economy-is-the-key-role-of-indian-culture/article-3468"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/gandhi-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 30 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत करने को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मितव्ययिता दिवस केवल बचत का ही दृष्टिकोण नहीं देता है बल्कि यह जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता देता है। महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। आधुनिक विचारक भी इसी तर्ज पर सोचने लगे हैं। प्रधामंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसी सोच को आकार दे रहे हैं और इसीलिये खादी और चर्खा उनकी प्राथमिकता बने हैं। उपयुक्त प्रौद्योगिकी की बात करते हुए इंग्लैंड के विचारक शूमाखर कहते हैं कि बड़े-बड़े कारखानों की अपेक्षा कम खर्च वाला गांधी का चर्खा कई दृष्टियों से अधिक उपयुक्त हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये मितव्ययिता जरूरी है। मोदी सरकार ने मितव्ययिता के लिये ही वीआईपी कल्चर पर नियंत्रण लगाया है। मंत्रियों की विदेश यात्राओं एवं अन्य भोग-विलास एवं सुविधाओं पर अंकुश लगाया गया है। सरकार ने मितव्ययिता एवं बचत का नारा दिया है। संचार माध्यमों से पानी बचाओ, बिजली बचाओ का उद्घोष प्रसारित हो रहा है। यह एक आवश्यक और उपयोगी कदम है, पर जब तक कोई भी आदर्श जीवनशैली का अंग नहीं बनता है, तब तक वह स्थायी नहीं बन पाता। समय के साथ वह बहुत जल्दी विस्मृत हो जाता है। इस प्रकार के अनेक उद्घोष सरकारी मंचों से जननेताओं द्वारा उद्घोषित होते रहे हैं, किन्तु उनका आधार गहरा नहीं होने के कारण वे जीवन से जुड़ नहीं सके। मितव्ययिता भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है। सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए उसका बहुत बड़ा महत्व है। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में उसके प्रति किसी का भी लक्ष्य प्रतीत नहीं होता। यदि मितव्ययिता का संस्कार लोकजीवन में आत्मसात हो जाये तो समाज एवं राष्ट्र में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक सामाजिक और राष्ट्रीय संपदा का यह अर्थहीन अतिरिक्त भोग और दूसरी तरफ अनेक-अनेक व्यक्ति जीवन की मौलिक और अनिवार्य अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए भी तरसते रहते हैं। यह आर्थिक विषमता निश्चित ही सामाजिक विषमता को जन्म देती है। जहां विषमता है, वहां निश्चित हिंसा है। इस हिंसा का उद्गम है, पदार्थ का अतिरिक्त संग्रह, व्यक्तिगत असीम भोग, अनुचित वैभव प्रदर्शन, साधनों का दुरुपयोग। सत्ता का दुरुपयोग भी विलासितापूर्ण जीवन को जन्म देता है। जनता के कुछ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के खून-पसीने की कमाई से किस कदर ऐशोआराम एवं भोग की जिन्दगी जीते हैं, यह भी सोचनीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस के मारर्कोस दंपति जब देश छोड़कर भागे तो श्रीमती इमेल्दा मार्कोस के पास से इतनी जूतों की जोड़ियां मिली, जिन्हें वो एक जोड़ी को दूसरी बार पहने बिना नौ साल तक पहन सकती थी। उसके महल से एक गाऊन और छह ऐसी विशिष्ट पोशाकें बिल सहित मिलीं, जिनका बिल राष्ट्रपति मार्कोस को राष्ट्रपति होने के नाते जो वार्षिक पगार मिलती थी, उससे 19 गुणा अधिक था। रोमानिया के पदच्युत राष्ट्रपति निकोलाई चाऊसेस्कू की कहानी भी कम विलासिता की नहीं है। जूतों की एड़ियों में कीमती हीरे लगे होने की बात तो ऐसे व्यक्तियों के लिए सामान्य हो सकती हैं। चालीस कमरों वाले उनके महल का प्रत्येक स्नानागार सोने के संसाधनों से परिपूर्ण था। आधुनिक भारत के अनेक राजनेताओं के भी ऐसे किस्से चर्चित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसके पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व इस बात का है कि अर्थ के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है तथा उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रश्न उठता है कि ये चकाचैंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित विश्व-व्यवस्था समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये विश्व मितव्ययिता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मितव्ययिता का महत्व शासन की दृष्टि से ही नहीं व्यक्ति एवं समाज की दृष्टि से भी है। हमारे यहां प्राचीन समाज में मितव्ययिता के महत्व को स्वीकार किया जाता था। किसी सामान की बबार्दी नहीं की जाती थी और उसे उपयुक्त जगह पहुंचा दिया जाता था। भोग विलास में पैसे नहीं खर्च किए जाते थे, पर दान, पुण्य किए जाने का प्रचलन था।</p>
<p style="text-align:justify;">पुण्य की लालच से ही सही, पर गरीबों को खाना खिला देना, अनाथों को रहने की जगह देना, जरूरतमंदों की सहायता करना जैसे काम लोग किया करते थे। पर आज का युग स्वार्थ से भरा है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर भोग विलास में आपना समय और पैसे जाया करना आज के नवयुवकों की कहानी बन गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरों की मदद के नाम से ही वे आफत में आ जाते हैं, अपने माता-पिता तक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, दाई-नौकरों और स्टाफ को पैसे देने में कतराते हैं, पर अपने शौक मौज के पीछे न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं। अपने मामलों में उन्हें मितव्ययिता की कोई आवश्यकता नहीं होती, पर कंपनी का खर्च घटाने में और दूसरों के मामले में अवश्य की जाती है। क्या मितव्ययिता का सही अर्थ यही है ? जब तक जन-जन को मितव्ययी जीवनशैली का व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक इस प्रकार की त्रुटियों का सुधार नहीं हो पायेगा। यह तभी संभव है हम अर्थ के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदलेगा एवं धन के प्रति व्यक्ति और समाज का दृष्टिकोण सम्यक होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वामी महावीर जी ने मितव्ययिता की दृष्टि से इच्छाओं के परिसीमन, व्यक्तिगत उपभोग का संयम एवं संविभाग यानी अपनी संपदा का समाजहित में सम्यक नियोजन के सूत्र दिये हैं। पंूजी, प्रौद्योगिकी और बाजार के उच्छृंखल विकास को नियंत्रित कर, व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सादगी एवं संयम को बल देकर, आर्थिक समीकरण एवं मानवीय सोच विकसित करके ही हम नया समाज दर्शन प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसा करके ही हम विश्व मितव्ययिता दिवस को मनाने की सार्थकता सिद्ध कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
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                <pubDate>Mon, 30 Oct 2017 03:41:08 +0530</pubDate>
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