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                <title>Fake News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Fake News RSS Feed</description>
                
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                <title>पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह के निधन की उड़ी अफवाह, डॉक्टरों ने कहा-उनकी हालत पहले से बेहतर</title>
                                    <description><![CDATA[लखनऊ (एजेंसी)। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में भर्ती राजस्थान के पूर्व राज्यपाल एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हालत पहले से बेहतर है। संस्थान ने शुक्रवार सुबह एक विज्ञप्ति जारी कर यह जानकारी दी जिसमें कहा गया है कि श्री सिंह आईसीयू की क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती है और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-news-of-the-death-of-former-governor-kalyan-singh-in-social-media-is-false/article-25008"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-07/kalyan-singh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ (एजेंसी)।</strong> संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में भर्ती राजस्थान के पूर्व राज्यपाल एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हालत पहले से बेहतर है। संस्थान ने शुक्रवार सुबह एक विज्ञप्ति जारी कर यह जानकारी दी जिसमें कहा गया है कि श्री सिंह आईसीयू की क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती है और उनकी सेहत स्थिर बनी हुयी है। उनके स्वास्थ्य में निरंतर सुधार हो रहा है और उनके महत्वपूर्ण पैरामीटर स्थिर है। वह अब लोगों को पहचानने लगे है और बात करने की कोशिश कर रहे है। उनका इलाज कार्डियोलाजी,न्यूरोलाजी,इंडोक्रिनोजाली और नेफ्रोलाजी के विशेष चिकित्सकों की देखरेख में हो रहा है। वहीं सोशल मीडिया में कल्याण सिंह के निधन को लेकर जो भी खबरें चल रही हैं वो झूठी हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या है मामला</h4>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बुजुर्ग नेता को शरीर में सूजन की वजह से पहले डा राममनोहर लोहिया संस्थान में भर्ती कराया गया था जहां उनकी हालत गंभीर होने पर एसजीपीजीआई ट्रांसफर किया गया। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुरूवार देर शाम अस्पताल पहुंचकर उनसे मुलाकात की थी और चिकित्सकों से उनके स्वास्थ्य की जानकारी हासिल की थी। इससे पहले रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी भाजपा के वरिष्ठ नेता को देखने यहां आ चुके है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अस्पताल पहुंचकर उनके स्वास्थ्य की निरंतर जानकारी ले रहे है।</p>
<p> </p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Jul 2021 10:32:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>फेक न्यूज V/s बियोंड फेक न्यूज</title>
                                    <description><![CDATA[माइक्रोसॉफ्ट की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं को फर्जी खबरों का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है। देश में फर्जी खबरों का प्रसार वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है। कंपनी की ओर से दुनिया के 22 देशों में किए गए सर्वेक्षण के बाद तैयार रिपोर्ट में कहा गया है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/fake-news-v-s-beyond-fake-news/article-18335"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-09/fake-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><em><strong>माइक्रोसॉफ्ट की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं को फर्जी खबरों का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है। देश में फर्जी खबरों का प्रसार वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है। कंपनी की ओर से दुनिया के 22 देशों में किए गए सर्वेक्षण के बाद तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि 64 फीसदी भारतीयों को फर्जी खबरों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 57 फीसदी का है। माइक्रोसॉफ्ट ने एक बयान में कहा है कि भारत इंटरनेट पर फेक न्यूज के मामले में वैश्विक औसत से कहीं आगे है। सर्वे में शामिल 54 फीसदी लोगों ने इसकी सूचना दी। इसके अलावा 42 फीसदी ने कहा कि उन्हें फिशिंग जैसी वारदातों से भी जूझना पड़ा है।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">दो बरस के बाद फेक न्यूज को लेकर देश में एक बार फिर जिरह जारी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावेड़कर के हालिया इस बयान ने फेक न्यूज को आम और खास की जुबां पर ला दिया है, फेक न्यूज पेड न्यूज की तुलना में ज्यादा खतरनाक है। फेक न्यूज को लेकर पूरी दुनिया में त्राहिमाम-त्राहिमाम है। फेक शब्द हमेशा सवाल-दर-सवाल और शक-दर-शक के दायरे में रहता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से लेकर दक्षिण एशिया में बीबीसी के प्रमुख रहे सर विलियम मार्क टुली इसके शिकार हो चुके हैं। पदमश्री/पदम विभूषण मार्क टुली से मैंने दिल्ली में बीबीसी के बियोंड फेक न्यूज प्रोग्राम के बाद सवाल किया, फेक न्यूज और रियल न्यूज में अंतर कैसे किया जाए? चलते -चलते वह बोले, जिस खबर की पुष्टि न हो, वह फेक न्यूज है। फोर्थ पिलर की छवि को पेड न्यूज भी बट्टा लगा रही है। फेक न्यूज के संग-संग पेड न्यूज भी सवालों के घेरे में है।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग 2011 में यूपी की बिसौली विधान सभा सीट से विजयी प्रत्याशी की सदस्यता रद्द करके पेड न्यूज को परिभाषित कर चुका है। बावजूद इसके फेक न्यूज और पेड न्यूज की रफ़्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। फेक न्यूज और पेड न्यूज राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवेश में कैंसर के मानिंद ही हैं। दोनों तरह की न्यूज चौथे स्तम्भ की सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं। हालाँकि सूचना एवं प्रसारण मंत्री मानते हैं, सरकार और मीडिया को साथ मिलकर इससे लड़ने की जरुरत है। सवाल यह है, आखिर यह लड़ाई कब और कैसे लड़ी जाएगी? फेक न्यूज को लेकर बीबीसी 2018 से वैश्विक मंचों पर शिद्दत से जुटी है। बीबीसी देश और दुनिया के शैक्षिणक संस्थानों में रियल न्यूज को लेकर जबर्दस्त कैंपेन चला रही है। क्या भारत सरकार या कोई न्यूज एजेंसी या न्यूज पेपर या चैनल ऐसा कोई आॅपरेशन चलाएंगे ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।अंतत: हमें भी बीबीसी जैसी विल पॉवर और फेक न्यूज के खिलाफ कड़े कानून बनाने की दरकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">फेक न्यूज पर पत्रकारों के ऊपर कार्रवाई को लेकर 2018 में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी के फैसलों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पलट दिया था। पीएम ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फैसले पर कहा था, फर्जी खबर पर कोई भी फैसला प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया या एनबीए ही लेगा। इसमें सरकार की कोई दखलअंदाजी नहीं होगी। फैसला पलट जाने के बाद केंद्रीय मंत्री श्रीमती ईरानी ने ट्वीट कर कहा है कि हम पत्रकार संगठनों या फिर प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर फेक न्यूज के खिलाफ लड़ेंगे। इससे पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी की थी, जिसमें पत्रकारों की मान्यता के लिए संशोधित दिशा-निर्देश दिए गए थे। नए दिशा-निदेर्शों में कहा गया था कि अगर पहली बार फर्जी खबर के प्रकाशन या प्रसारण की पुष्टि होती है तो पत्रकार की मान्यता छह महीने तक रद्द कर दी जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर दूसरी बार फर्जी खबर की पु्ष्टि होती है तो एक साल के लिए पत्रकार की मान्यता रद्द कर जाएगी। वहीं तीसरी बार किसी फर्जी खबर के प्रकाशन या प्रसारण का दोषी पाए जाने पर पत्रकार की मान्यता स्थाई रूप से रद्द कर दी जाएगी। पीएम के हस्तक्षेप करने के बाद सूचना प्रसारण मंत्रालय ने अपनी नई गाइडलाइन्स में कहा था कि यदि प्रिंट मीडिया में फेक न्यूज की शिकायत मिलती है तो उसे प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया को भेजा जाएगा। वहीं अगर फर्जी खबर का मामला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से आता है तो उसे न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन को भेजा जाएगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इस नए दिशा-निर्देश के बाद विपक्ष के नेताओं ने जहां एक तरफ केंद्र सरकार पर निशाना साधा था तो वहीं कुछ पत्रकारों ने सरकार से इस निर्णय पर फिर से विचार करने का आग्रह किया था, जिसके बाद प्रधानमंत्री ने 04 मार्च, 2018 को सूचना प्रसारण मंत्रालय के नए गाइडलाइन्स को रद्द कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार मानती है, फेक न्यूज पेड न्यूज से ज्यादा खतरनाक हैं। फर्जी खबरों को रोकना होगा, यह हम सबका काम है। यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है, यह सभी का काम है। जो सचमुच खबरों की दुनिया में हैं, उन्हें इससे लड़ना होगा। कई समाचार चैनल ‘वायरल सच’ जैसे कार्यक्रमों की मदद से इससे निपटने का प्रयास कर रहे हैं। बकौल केंद्रीय मंत्री, प्रिंट मीडिया को भी फर्जी और सही खबरों के लिए ऐसा ही एक कॉलम (स्तंभ) रखना चाहिए। सूचना-प्रसारण मंत्रालय राज्य सरकारों से भी फर्जी खबरों से निपटने को कह रहा है। पेड न्यूज भी अनैतिक है। मीडिया को इसे भी सख्ती से रोकना चाहिए। मीडिया को सरकार को सलाह देनी होगी, ताकि हम साथ मिलकर काम कर सकें और फर्जी खबरों में शामिल मीडिया के छोटे से धड़े को दंडित कर सकें और यह खत्म हो सके। एक प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी फेक न्यूज को लेकर सवालों के घेरे में आ गई।</p>
<p style="text-align:justify;">एजेंसी ने 28 अप्रैल, 2019 को एक स्टोरी की थी, जिसमें दावा किया गया कि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कई क्रिएटिव आर्टिस्टों ने लोगों से इन लोकसभा चुनावों में गैर-राष्ट्रवादियों के खिलाफ मतदान की अपील की है, लेकिन यह स्टोरी सच्चाई की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। 2020 में नेस्ले कंपनी के नूडल्स ब्रांड मैगी को लेकर एक फेक न्यूज वायरल हुई। वायरल पोस्ट में मैगी के बीफ फ्लेवर वाले पैकेट की फोटो शेयर की गई। इसमें दावा किया गया, इस बीफ फ्लेवर वाले प्रोडक्ट को भारत में बेचा जा रहा है, लेकिन पड़ताल में पता चला, बीफ फ्लेवर वाली मैगी का पैकेट भारत का नहीं, आस्ट्रेलिया का है। कोरोना महामारी के दौरान भी फेक न्यूज खूब चली हैं। महाराष्ट्र के वजीर श्री जितेंद्र आव्हाड की बेटी स्पेन से लौटी तो एक चैनल ने कोरोना वायरस से संक्रमित होने की कथित तौर पर झूठी खबर चला दी। इस समाचार चैनल के संवाददाता और एंकर के खिलाफ सख्त एक्शन लेने का आदेश दिया गया। अंतत: ये सभी खबरें फेक न्यूज की श्रेणी में आईं। दक्षिण एशिया में लंबे समय तक बीबीसी की पहचान रहे अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकार लेखक श्री मार्क टुली ने माना, देश में फेक न्यूज तेजी से चल रही हैं। यह बहुत ही चिंताजनक है।</p>
<p style="text-align:justify;">सूचना और प्रसारण मंत्री ने फोर्थ पिलर को आश्वस्त किया, समाचारों पर रोक लगाने से प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई आंच नहीं आएगी। अफवाहें बड़ी तेजी से फैलती हैं। उनके दुष्परिणाम भी बहुत घातक होते हैं। सरकार फेक न्यूज से निपटने के लिए कृत संकल्प है। सूचना और प्रसारण मंत्री ने कहा कि इस बात को लेकर देश में हमेशा बहस होती रही है कि प्रेस को कितनी आजादी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में प्रेस की आजादी के हनन का एकमात्र उदाहरण आपात काल के दौरान देखने को मिला था। उन्होंने कहा कि फेक न्यूज मीडिया की स्वतंत्रता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। देश में लॉकडाउन के दौरान प्रिंट, इलैक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया, खासतौर पर ट्विटर, फेसबुक और वाट्स-एप पर फेक न्यूज का फैलाव बढ़ा है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने पत्र सूचना कार्यालय में तथ्यों की जांच के लिए फेक्ट चैक एकांश गठित किया है, जो ऐसी खबरों का तत्काल संज्ञान ले रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हकीकत यह है, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और फिल्मों की भांति वेब स्ट्रीमिंग साइटों (ओटीटी) के लिए भी नियमन का होना आवश्यक है। ओटीटी मंचों में समाचार पोर्टल, वेबस्ट्रिमिंग साइट’ जैसे हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स और आमेजन प्राइम वीडियो आते हैं। मुख्य धारा मीडिया के कई संस्थानों ने सरकार से कहा है कि ओटीटी के साथ समान स्तर का मुकाबला नहीं है क्योंकि उनका कोई नियमन नहीं होता है। केंद्रीय मंत्री ने खुद सलाह मांगी है कि इससे कैसे निपटा जाएं क्योंकि ओटीटी पर लगातार सिनेमा आ रहा है, जिसमें अच्छा, बुरा और बहुत बुरा भी है। ऐसे में इससे कैसे निपटें, निगरानी कौन करे, किसे नियमन करना चाहिए? ओटीटी मंचों के लिए कोई प्रमाणन संस्था नहीं है। समाचार पोर्टल के लिए भी यही स्थिति है। सरकार मानती है, इस संबंध में अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। प्रिंट मीडिया की जवाबदेही भारतीय प्रेस परिषद, समाचार चैनलों की जवाबदेही न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए), विज्ञापनों के लिए भारतीय विज्ञापन मानदंड परिषद और फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, लेकिन ओटीटी मंचों के लिए कुछ भी नहीं है। कड़वा सच यह है, तीनों सेंसर बोर्ड टीथलैस ही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">                                                                                                            <strong>-श्याम सुंदर भाटिया</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Sep 2020 14:27:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महाराष्ट्र में लॉकडाउन के दौरान सोशल मीडिया पर फ़र्ज़ी खबर फैलाने के 601 मामले दर्ज</title>
                                    <description><![CDATA[मुंबई l महाराष्ट्र में वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान महाराष्ट्र साइबर विभाग ने सोशल मीडिया पर अफवाह और गलत जानकारी फैलाने के आरोप में 601 मामले दर्ज किये हैं। विभाग की तरफ से इन मामलों के विश्लेषण से पता चला है कि इन कुल मामलों में 219 मामले आपत्तिजनक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/601-cases-of-fake-news-spread-on-social-media-during-lockdown-in-maharashtra/article-17636"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/601-cases-of-fake-news-spread-on-social-media-during-lockdown-in-maharashtra.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;"><strong>मुंबई</strong> l महाराष्ट्र में वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान महाराष्ट्र साइबर विभाग ने सोशल मीडिया पर अफवाह और गलत जानकारी फैलाने के आरोप में 601 मामले दर्ज किये हैं। विभाग की तरफ से इन मामलों के विश्लेषण से पता चला है कि इन कुल मामलों में 219 मामले आपत्तिजनक व्हाट्सएप संदेशों को प्रसारित करने के कारण दर्ज किये गए जबकि फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट साझा करने के लिए 262 मामले और टिकटाॅक पर वीडियो साझा करने के लिए 28 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा ट्विटर पर भी आपत्तिजनक ट्वीट करने के 19 मामले दर्ज किये गए हँ। वही इंस्टाग्राम पर गलत जानकारी डालने के पांच मामले और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे यूट्यूब, ऑडियो क्लिप्स आदि के गलत इस्तेमाल के 68 मामले दर्ज किये गए है। विभाग के अनुसार इन सभी मामलों में अबतक 299 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और इनमे से 136 आपत्तिजनक पोस्ट को हटा दिया गया है।</h6>
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                <pubDate>Tue, 18 Aug 2020 10:10:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सरकार ने वॉट्सऐप से कहा- फेक न्यूज और अश्लील मैसेज रोकने के उपाय तलाशें, वरना लगेगा जुर्माना</title>
                                    <description><![CDATA[वॉट्सऐप को भारतीय कानून का करना होगा पालन Government told Whatsapp, Find Ways, stop, fake news, and, porn message, Else, It Will, Feel The, Penalty नई दिल्ली। सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वॉट्सऐप के सीईओ क्रिस डेनियल से मंगलवार को यहां मुलाकात की। उन्होंने कंपनी को मॉब लिंचिंग, फेक न्यूज और बदले की भावना […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/government-told-whatsapp-find-ways-to-stop-fake-news-and-porn-message-else-it-will-feel-the-penalty/article-5482"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/government-told-whatsapp-find-ways-stop-fake-news-and-porn-message-else-it-will-feel-the-penalty-1.jpg" alt=""></a><br /><h1>वॉट्सऐप को भारतीय कानून का करना होगा पालन Government told Whatsapp, Find Ways, stop, fake news, and, porn message, Else, It Will, Feel The, Penalty</h1>
<p><strong>नई दिल्ली। </strong></p>
<p>सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वॉट्सऐप के सीईओ क्रिस डेनियल से मंगलवार को यहां मुलाकात की। उन्होंने कंपनी को मॉब लिंचिंग, फेक न्यूज और बदले की भावना से भेजे गए अश्लील संदेशों को रोकने के लिए तकनीकी उपाय तलाशने को कहा है। मंत्री ने कहा कि वॉट्सऐप को भारतीय कानून का पालन करना होगा। ऐसा नहीं करने पर उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है। प्रसाद ने कहा कि फेसबुक के मालिकाना हक वाली इस कंपनी से भारत में कॉरपोरेट ऑफिस बनाने और एक शिकायत अधिकारी नियुक्त करने को भी कहा गया है।</p>
<p>हम नहीं चाहते की किसी भी सवाल का जवाब अमेरिका से मिले। उन्होंने कहा कि वॉट्सऐप से गंदे और आतंक फैलाने वाले संदेश के बारे में तुरंत जानकारी साझा करने का सिस्टम बनाने को कहा गया है। उसे यह भी पता लगाना होगा कि ये मैसेज कहां से जारी किए जा रहे हैं। वॉट्सऐप को भारतीयों का डाटा भी भारत में ही रखना होगा। प्रसाद ने कहा, “हमारी मुलाकात बहुत अच्छी रही। मैंने वॉट्सऐप के केरल में राहत, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के लिए किए जाने वाले कामों को सराहा।” पिछले महीने वॉट्सऐप के सीओओ मैथ्यू इडेमा ने सूचना एवं प्रौद्योगिकी सचिव और अन्य सरकारी अधिकारियों से फेक न्यूज के संबंध में मुलाकात की थी।</p>
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<p>Government told Whatsapp, Find Ways, stop, fake news, and, porn message, Else, It Will, Feel The, Penalty</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Aug 2018 04:57:42 +0530</pubDate>
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                <title>भीड़तंत्र का हत्यारा बन जाने का दर्द</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/fake-news-on-social-media/article-4231"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/social-media.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के चंदगांव में सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे फर्जी मेसेज पर यकीन करके भीड़ द्वारा दो लोगों को पीट-पीट के हत्या कर दिये जाने का मामला सामने आया है। इससे पहले असम के कार्बी आंग्लोंग जिले में भीड़ ने बच्चा चोरी के संदेह में पेशे से साउंड इंजीनियर नीलोत्पल दास और गुवाहाटी के ही व्यवसायी अभिजीत की पीट-पीटकर हत्या कर दी। कुछ अर्से पहले दिल्ली में खुलेआम दो लड़कों को पेशाब करने से रोकने पर एक ई-रिक्शा चालक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी गौमांस खाने के तथाकथित आरोपी को मार डाला जाता है, कभी किसी की गायों को वधशाला ले जाने के संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है, कभी छोटी-मोटी चोरी करने वाले को मारा जाता है तो कभी बच्चा चोरी के संदेह में लोगों की हत्याएं की जाती हैं। किसान आन्दोलन हो या गौरक्षा का मसला या आम जनजीवन की सामान्य-सी बातें-हिंसा एवं अशांति की ऐसी घटनाएं देशभर में लगातार हो रही हैं। महावीर, बुद्ध, गांधी के अहिंसक देश में हिंसा का बढ़ना न केवल चिन्ता का विषय है बल्कि गंभीर सोचनीय स्थिति को दशार्ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भीड़ द्वारा लोगों को पकड़कर मार डालने की घटनाएं परेशान करने वाली हैं। सभ्य समाज में किसी की भी हत्या किया जाना असहनीय है लेकिन जिस तरह से भीड़तंत्र के द्वारा कानून को हाथ में लेकर किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना अमानवीयता एवं क्रूरता की चरम पराकाष्ठा है। भीड़तंत्र के द्वारा हत्या की बढ़ती घटनाओं का कारण अफवाहें हैं, सोशल मीडिया की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन वे पहले भी फैलती थीं। खासकर धर्म पर आधारित अफवाहों के फैलने में देर नहीं लगती थी। बिना मोबाइल के दिल्ली में गणेश की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह सैकड़ों किलोमीटर दूर तक घंटों में पहुंच गई और हजारों-लाखों लीटर दूध बर्बाद हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक मुस्लिम के घर के पास एक जानवर का कंकाल मिला। किसी पशु विशेषज्ञ ने यह पुष्टि तक नहीं की कि वह गाय का कंकाल था। किसी जांच से यह भी साबित नहीं हुआ था कि वह अगर गाय ही थी तो उसकी हत्या उस मुसलमान ने ही की। लेकिन भीड़ ने उस मुसलमान का घर जला डाला। साथ ही उस बूढ़े मुसलमान की भी जान ले ली।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल यह हत्यारी मानसिकता को जो प्रोत्साहन मिल रही है उसके पीछे एक घृणा, नफरत, संकीर्णता और असहिष्णुता आधारित राजनीतिक सोच है। यह हमारी प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था के चरमराने का भी संकेत है। अपराधी को स्वयं सजा देना कानूनी तौर पर तो गलत है ही, नैतिक तौर पर भी अनुचित है और ये घटनाएं समाज के अराजक होने का संकेत है। लेकिन यहां प्रश्न यह भी है कि व्यक्ति हिंसक एवं क्रूर क्यों हो रहा है? सवाल यह भी है कि हमारे समाज में हिंसा की बढ़ रही घटनाओं को लेकर सजगता की इतनी कमी क्यों है?</p>
<p style="text-align:justify;">एक सभ्य एवं विकसित समाज में अनावश्यक हिंसा का बढ़ना विडम्बनापूर्ण है। ऐसे क्या कारण है जो हिंसा एवं अशांति की जमीं तैयार कर रहे हैं। देश में भीड़तंत्र हिंसक क्यों हो रहा है? मनुष्य-मनुष्य के बीच संघर्ष, द्वेष एवं नफरत क्यों छिड़ गयी है? कोई किसी को क्यों नहीं सह पा रहा है? प्रतिक्षण मौत क्यों मंडराती दिखाई देती है? ये ऐसे सवाल हंै जो नये बनते भारत के भाल पर काले धब्बे हैं। ये सवाल जिन्दगी की सारी दिशाओं से उठ रहे हैं और पूछ रहे हैं कि आखिर इंसान गढ़ने में कहां चूक हो रही है?</p>
<p style="text-align:justify;">यह किसी भारी चूक का ही परिणाम है कि झारखंड में बच्चा चोरी की अफवाहों के चलते क्रुद्ध भीड़ ने 6 लोगों को पीट-पीटकर मार डाला था। यह कहां का न्याय है? यह कहां की सभ्यता है? हत्या का शिकार कोई एक समाज या धर्म का व्यक्ति नहीं होता बल्कि सभी समुदायों के लोग इसका शिकार हो रहे हैं। तेजी से बढ़ता हिंसक दौर किसी एक प्रान्त का दर्द नहीं रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसने हर भारतीय दिल को जख्मी बनाया है। अब इन हिंसक होती स्थितियों को रोकने के लिये प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है। यदि समाज में पनप रही इस हिंसा को और अधिक समय मिला तो हम हिंसक वारदातें सुनने और निर्दोष लोगों की लाशें गिनने के इतने आदी हो जायेंगे कि वहां से लौटना मुश्किल बन जायेगा। इस पनपती हिंसक मानसिकता के समाधान के लिये ठंडा खून और ठंडा विचार नहीं, क्रांतिकारी बदलाव के आग की तपन चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">आज कितने असुरक्षित हैं हम? निर्दोष मारा जा रहा है और अपराधी साफ-साफ बच निकलता है। राजनीति की छांव तले होने वाली भीड़तंत्र की वारदातें हिंसक रक्तक्रांति का कलंक देश के माथे पर लगा रही हैं चाहे वह एंटी रोमियो स्क्वायड के नाम पर हो या गौरक्षा के नाम पर। कहते हैं भीड़ पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। वह आजाद है, उसे चाहे जब भड़काकर हिंसक वारदात खड़ी की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उसे राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है जिसके कारण वह कहीं भी कानून को धत्ता बताते हुए मनमानी करती है। भीड़ इकट्ठी होती है, किसी को भी मार डालती है। जिस तरह से भीड़तंत्र का सिलसिला शुरू हुआ उससे तो लगता है कि एक दिन हम सब इसकी जद में होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">हिंसा एवं अराजकता की बढ़ती इन घटनाओं के लिये केकड़ावृत्ति की मानसिकता जिम्मेदार है। जब-जब जनता के निर्णय से राजनीतिक दल सत्ता से दूर हुए हैं, उन्होंने ऐसे ही अराजक एवं हिंसक माहौल निर्मित किये हैं। आज राजनेता अपने स्वार्थों की चादर ताने खड़े हैं अपने आपको तेज धूप से बचाने के लिये या सत्ता के करीब पहुंचने के लिये। सबके सामने एक ही अहम सवाल आ खड़ा है कि ‘जो हम नहीं कर सकते वो तुम कैसे करोगे?’ लगता है इसी स्वार्थी सोच ने, आग्रही पकड़ ने, राजनीतिक स्वार्थ की मनोवृत्ति ने देश को हिंसा की आग में झोंक रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक स्वार्थों के लिये हिंसा को हथियार बनाया जा रहा है। किसी न किसी विचारधारा से जोड़कर अपनी सेनाएं बना लेने की परम्परा विकसित की जा रही है, कोई भीम सेना बना रहा हैं तो कोई रावण सेना, कोई अपना ही रक्षक दल बना रहा तो कोई अल्पसंख्यकों की अपनी सेना गठित कर रहा है। बहुसंख्यक अपनी सेना बना रहा है तो हर गली-मौहल्ले में भी ऐसे ही संगठन हिंसा करने के लिये खड़े किये जा रहे हैं। भीड़तंत्र भेड़तंत्र में बदलता जा रहा है। इस लिहाज से सरकार को अधिक चुस्त होना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ कठोर व्यवस्थाओं को स्थापित करना होगा, अगर कानून की रक्षा करने वाले लोग ही अपराधियों से हारने लगेंगे तो फिर देश के सामान्य नागरिकों का क्या होगा? देश बदल रहा है, हम इसे देख भी रहे हैं। एक ऐसा परिवर्तन जिसमें अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं और भीड़ खुद फैसला करने लगी है। भीड़तंत्र का अपराध में शामिल होना, उसे जायज ठहराना या फिर खामोशी से देखकर आगे बढ़ जाना हिंसा को बढ़ावा देना है। यदि इस प्रवृत्ति को तुरन्त रोका नहीं गया तो यह देश तबाह हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे हत्याकांड देश पर आत्मघाती हमला हैं। भारत का जनतंत्र आदमखोर भीड़तंत्र में परिवर्तित हो रहा है। इसे रोकना होगा और इसके लिए हम सभी को पहल करनी होगी। हिंसा ऐसी चिंनगारी है, जो निमित्त मिलते ही भड़क उठती है। इसके लिये सत्ता के करीबी और सत्ता के विरोधी हजारों तर्क देंगे, हजारों बातें करेंगे लेकिन यह दिशा ठीक नहीं है। जब समाज में हिंसा को गलत प्रोत्साहन मिलेगा तो उसकी चिंनगारियों से कोई नहीं बच पायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sun, 17 Jun 2018 08:11:57 +0530</pubDate>
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