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                <title>Shah Mastana Ji - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Shah Mastana Ji RSS Feed</description>
                
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                <title>बंजर भूमि में बहार छा गई, सच्ची सरकार आ गई &amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[सच्ची सरकार आ गई भाईचारा प्रेम जब मिटने लगा हर रिश्ते में दरार आ गई , तरस खाकर करने उधार रूहों का सच्ची सरकार आ गई । कार्तिक की पूर्णमासी , हर रूह के मस्तक पर उज्जास था । सुखी कलियां जी उठी , रूहानियत के बादशाह का आगमन बड़ा खास था उनके दर से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/poem-on-the-occasion-of-the-holy-incarnation-month-of-shah-mastana-ji/article-77729"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-11/shah-mastana-ji-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;">सच्ची सरकार आ गई<br />
भाईचारा प्रेम जब मिटने लगा<br />
हर रिश्ते में दरार आ गई ,<br />
तरस खाकर करने उधार रूहों का<br />
सच्ची सरकार आ गई ।<br />
कार्तिक की पूर्णमासी ,<br />
हर रूह के मस्तक पर उज्जास था ।<br />
सुखी कलियां जी उठी ,<br />
रूहानियत के बादशाह का आगमन बड़ा खास था उनके दर से कोई खाली जाए ।<br />
न किसी की भूख बर्दाश्त थी ,<br />
हर मस्तक पर रौनक और मुस्कान हो ।<br />
केवल उनकी यही अरदास थी ,<br />
साधुओं को मिठाई खिलाकर ।<br />
उनकी भूख मिटाते थे ,<br />
मेहनत हक हलाल का खाना खुद अपनाते ,<br />
और सिखाते थे ।<br />
जी उठा आलम सारा ,<br />
बंजर भूमि में बहार छा गई ।<br />
सच्ची सरकार आ गई ,<br />
सादगी के पुंज , प्रेम प्रतीक ।<br />
और महानों के महान थे ,<br />
कण – कण , ब्रह्मण्ड उनके वश में और दुनिया के अरमान थे ।<br />
प्यासे की प्यास मिटी और भूखों का सहारा हुआ नंगे को कपड़ा , तंग को धन ,<br />
भव में डूबते को किनारा हुआ ।<br />
हर बुराई मिटने लगी ,<br />
अंधेरे में उजाला हुआ ,<br />
रूहानियात की महक जो छा गई ।<br />
सच्ची सरकार आ गई ।।<br />
जन्म मरण के दुख फिर मिटाने लगे ,<br />
देकर नाम का वरदान , शराब के गंदे नशों से<br />
मुक्त कराने लगे ।<br />
काल हुआ चिड़चिड़ा क्योंकि ,<br />
रूहों को छुड़ाने की मर्ज उसे दुखा गई<br />
सच्ची सरकार आ गई ।<br />
भाईचारा प्रेम की लहर चली ,<br />
अच्छाइयों का पौधा खिल उठा<br />
काल बड़ा छटपटाया ,<br />
साम्राज्य उसका हिल उठा ।<br />
जब सचखंड ले जाने को उनके ,<br />
मसीहा की पतवार आ गई ।<br />
सच्ची सरकार आ गई ।।<br />
तरस खाकर करने उधार रूहों का<br />
सच्ची सरकार आ गई ।।</p>
<p style="text-align:center;">लेखक – कुलदीप स्वतंत्र</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Nov 2025 15:15:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Source of inspiration: ‘‘यह तो देने वाला फकीर है, लेने वाला नहीं।’’</title>
                                    <description><![CDATA[Source of inspiration: सन् 1958, दिल्ली। एक बार जीवोद्धार यात्रा के दौरान पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज दिल्ली पधारे हुए थे। बेपरवाह जी ने कपड़े की खरीददारी करने की इच्छा व्यक्त की। कुछ सेवादारों को साथ लेकर आप जी दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में एक दुकान पर गए। उस समय सरसा से भक्त चरण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/this-is-a-fakir-who-gives-not-a-taker/article-63694"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-10/mastana-ji-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Source of inspiration: सन् 1958, दिल्ली। एक बार जीवोद्धार यात्रा के दौरान पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज दिल्ली पधारे हुए थे। बेपरवाह जी ने कपड़े की खरीददारी करने की इच्छा व्यक्त की। कुछ सेवादारों को साथ लेकर आप जी दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में एक दुकान पर गए। उस समय सरसा से भक्त चरण दास भी आप जी के साथ था। दुकान पर पहुंचकर बेपरवाह जी ने गर्म कपड़ा खरीदा। कीमत पूछने पर दुकानदार ने 4000/- रूपये मांगे। बेपरवाह जी ने दुकानदार को फरमाया, ‘‘बेटा, हम किताब के पन्ने पलटेंगे तुम रूपये निकालते रहना तथा गिनते रहना।’’ Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार दुकानदार पुस्तक में से नोट निकालता रहा। जब सौ-सौ के चालीस नोट हो गए तो उसने कहा कि बस। परंतु बेपरवाह जी ने एक पन्ना और पलटा तथा सौ रूपये का वह नोट निकालकर दुकानदार को दे दिया। उसके बाद बेपरवाह जी ने उसको पुस्तक के बाकी पन्ने पलटकर दिखाए परंतु उनमें से अब कुछ नहीं निकला। दुकानदार यह सब देखकर हैरान रह गया।  आश्चर्यचकित होकर दुकानदार यह सोचने लगा कि पैसे कम करवाने की बजाय अधिक दे दिये। ये कैसा फकीर है! आज तक ऐसा कोई भी ग्राहक नहीं देखा जो कम करवाने की बजाय पैसे अधिक दे दे। दुकानदार ने ईमानदारी दिखाते हुए वो सौ रूपये का नोट आपजी को वापिस देना चाहा, परंतु बेपरवाह जी ने लेने से इन्कार कर दिया और फरमाया,</p>
<h3>‘‘हम जो देते हैं, वापिस नहीं लेते”</h3>
<p style="text-align:justify;">‘‘हम जो देते हैं, वापिस नहीं लेते। यह तो देने वाला फकीर है, लेने वाला नहीं।’’ उस दिन दिल्ली में सत्संग का कार्यक्रम था। बेपरवाह जी ने यह कपड़ा सेवादार भाईयों को ‘दातें’ देने के लिए खरीदा था। बातों-बातों में दुकानदार को भी सत्संग के कार्यक्रम के बारे में पता चला। वह आप जी से इतना प्रभावित हुआ कि साथ चलने को तैयार हो गया। उसने उसी समय अपनी दुकान बंद की व आप जी की जीप में बैठ गया। रास्ते में एक खुली छत वाली कार मिली, जिसमें बढ़िया नस्ल के दो सुंदर कुत्ते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">बेपरवाह जी ने उस कार की ओर इशारा करके दुकानदार से कहा, ‘‘देखा भाई! ये कुत्ते अपने पिछले जन्म में बहुत रईस थे। इन्होंने बहुत दान किया था और उसके बदले में इनको ऐसी जगह जन्म मिला कि आदमी इनकी सेवा करते हैं परंतु संत-महापुरूषों के मिलाप के बिना चौरासी नहीं कट सकती।’’ ऐसे रूहानी वचन सुनकर दुकानदार आपजी का दीवाना हो गया तथा सत्संग के बाद उसने ‘नाम-शब्द’ ले लिया। बाद में उसके साथ सैकड़ों लोग आप जी के दर्शन करने के लिए आए और नाम-शब्द लेकर मोक्ष के अधिकारी बने। Shah Mastana Ji</p>
<p><a title="इंसानियत की खातिर मासूम की जिंदगी बचाने को युवा भाई-बहन दे रहे सैंपल" href="http://10.0.0.122:1245/for-the-sake-of-humanity-young-brother-and-sister-are-giving-samples-to-save-the-life-of-an-innocent/">इंसानियत की खातिर मासूम की जिंदगी बचाने को युवा भाई-बहन दे रहे सैंपल</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Oct 2024 12:22:27 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Shah Mastana Ji : ‘तहसीलदार को हुआ गलती का अहसास’, हाथ जोड़कर मांगी माफी!</title>
                                    <description><![CDATA[Shah Mastana Ji : शाह मस्तान शाह सतनाम जी धाम व मानवता भलाई केन्द्र, डेरा सच्चा सौदा, सरसा में भवन निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा था। सेवादार भाई पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज के हुक्मानुसार पूरी तन्मयता से सेवा में जुटे हुए थे। नई दीवारों पर टीप करने के लिए 50 […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/the-tehsildar-realized-his-mistake-asked-for-forgiveness-with-folded-hands/article-60760"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-08/mastana-ji-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Shah Mastana Ji : शाह मस्तान शाह सतनाम जी धाम व मानवता भलाई केन्द्र, डेरा सच्चा सौदा, सरसा में भवन निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा था। सेवादार भाई पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज के हुक्मानुसार पूरी तन्मयता से सेवा में जुटे हुए थे। नई दीवारों पर टीप करने के लिए 50 बोरी सीमेंट की आवश्यकता थी। उन दिनों सीमेंट बाजार में बहुत ही कम मिलता था। सीमेंट का परमिट प्रशासन से आवश्यकतानुसार लेना होता था। परमिट देने का कार्य तहसीलदार के जिम्मे था। आप जी ने सरसा शहर के ही एक भक्त खुशी राम की ड्यूटी लगाई कि वह सीमेंट प्राप्त करने की अर्जी लिखवार कर तहसीलदार के पास जाए और उसे सीमेंट का परमिट देने के लिए कहे। उसने तहसील कार्यालय जाकर तहसीलदार को सीमेंट पाने की अर्जी दी। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">तहसीलदार ने अर्जी पढ़कर उससे पूछा कि क्या यह वही सच्चा सौदा है, जहां मकान बनाते और गिराते हैं? सेवादार के ‘हां जी’ कहने पर तहसीलदार ने अर्जी को फैंकते हुए कहा सीमेंट का परमिट नहीं मिलेगा। भक्त खुशी राम उठकर वापिस चलने लगा तो तहसीलदार बोला कि पांच बोरियों का परमिट तो ले जाओ। सेवादार ने कहा हमें तो पचास बोरियों का ही परमिट चाहिए। फिर तहसीलदार ने बिल्कुल ही मना कर दिया और वह वापिस दरबार आ गया। आप जी ने पूछा, ‘‘परमिट लाए हो?’’ वह बोला कि आपजी ने दिलवाया ही नहीं है? आप जी ने फरमाया, ‘‘पुट्टर ! सब्र रख।’’</p>
<h3>एक-दो अफसर शहनशाह के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे | Shah Mastana Ji</h3>
<p style="text-align:justify;">तहसीलदार ने अपने साथी अफसरों के साथ उक्त घटना की चर्चा की और बताया कि मुझसे ऐसा हुआ है। उनमें से एक-दो अफसर शहनशाह के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। उन्होंने अपने साथी तहसीलदार को कहा कि तुझसे भारी गलती हुई है। इसी रविवार को हम सभी एकत्रित होकर पूजनीय बेपरवार साँईं शाह मस्ताना जी महाराज के पास डेरे में दर्शनों के लिए चलेंगे और इस गलती की माफी मांगेेंगे। रविवार को दो जीपों में सवार होकर अधिकारीगण सरसा डेरे में आ पहुुंचे। उन्होंने आदरपूर्वक दाता जी को बताया कि हम गलती की माफी मांगने आए हैं। आप जी ने उन सभी अफसरों को सम्मानपूर्वक चाय पिलवाई। फिर उन्होंने आप जी से डेरे दिखाने की इच्छा प्रकट की। इस पर आप जी उन्हें डेरा दिखाने लगे। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">आप जी उन सभी को वहाँ ले गए जहाँ मकान बनाने की सेवा चल रही थी। तहसीलदार बोला कि बाबा जी, कुछ बात सुनाइए। आप जी उन्हें एक साखी सुनाने लगे। एक किसान की एक शेर के साथ दोस्ती हो गई। जब मित्रता गहरी हुई तो किसान ने शेर से कहा कि मेरे घर रोटी खाने के लिए चल। शेर बोला कि मैं जगली जानवर हूँ, मेरे मुँह से बदबू आती है। तेरी पत्नी मुझे ताना न मारे इसलिए घर जाकर पहले पूछकर आ। किसान ने घर जाकर अपनी पत्नी से सलाह की। उसकी पत्नी बोली कि आपके यार ने रोटी खानी है मैं ताना क्यों मारूंगी? जो दिन तय हुआ, उस दिन किसान अपने दोस्त शेर को अपने घर ले आया।</p>
<h3>शेर को जो भी खाने को मिला, सब खा गया | Shah Mastana Ji</h3>
<p style="text-align:justify;">शेर को जब खाना खिलाया जाने लगा तो उसे जो भी खाने को मिला, सब खा गया। किसान की औरत से यह सहन न हुआ और बोली कि कैसे जानवरों से दोस्ती की है। सब कुछ ही खा गया। शेर उठकर वापिस चला गया। किसान को डर पड़ गया कि शेर को क्या मुँह दिखाऊँगा? कुछ दिनों बाद जब किसान शेर से मिला तो शेर ने कहा कि तू कूल्हाड़ा ला और मुझे मार। मैं लहूलुहान हो जाऊँगा फिर तू चले जाना और सात दिन बाद मेरा पता लेने आना। किसान ने वैसा ही किया। थोड़े दिनों में जख्म ठीक हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">शेर बोला कि यह जख्म तो ठीक हो गया परंतु तेरी पत्नी के ताने का जख्म जो अंदर हो गया है, वह सारी उम्र दिल से नहीं भूलूंगा। पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज ने फरमाया कि कड़वा बोलने से जो जख्म बन जाते हैं, वह जल्दी भरते नहीं। तहसीलदार को अपनी गलती का पूरी तरह अहसास हो चुका था। उसने पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज से हाथ जोड़कर माफी मांगी। Shah Mastana Ji</p>
<p><a title="Sahara Group News : सहारा समूह के निवेशकों को दी वित्त मंत्री ने बड़ी खुशखबरी!" href="http://10.0.0.122:1245/finance-minister-gives-great-news-to-sahara-group-investors/">Sahara Group News : सहारा समूह के निवेशकों को दी वित्त मंत्री ने बड़ी खुशखबरी!</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/spiritual/the-tehsildar-realized-his-mistake-asked-for-forgiveness-with-folded-hands/article-60760</link>
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                <pubDate>Tue, 06 Aug 2024 11:22:19 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Source of Inspiration : देखते ही देखते मृत बच्चे ने आंखें खोल दीं, सच्चे सतगुरू जी ने उसे जीवित कर दिया!</title>
                                    <description><![CDATA[Source of Inspiration : सन् 1957, बुधरवाली, राजस्थान राजस्थान के गांव बुधरवाली में 27 सिंतबर, 1957 की रात को शहनशाह शाह मस्ताना जी सत्संग फरमा रहे थे। काफी संख्या में साध-संगत बड़े प्रेम व मस्ती से सत्संग सुन रही थी। इस गांव का माड़ू राम नामक व्यक्ति मेहनत-मजदूरी कर हक-हलाल की खाने वाला श्रद्धापूर्वक सत्संग […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/the-true-satguru-brought-him-back-to-life/article-60534"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/shah-mastana-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Source of Inspiration : सन् 1957, बुधरवाली, राजस्थान</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के गांव बुधरवाली में 27 सिंतबर, 1957 की रात को शहनशाह शाह मस्ताना जी सत्संग फरमा रहे थे। काफी संख्या में साध-संगत बड़े प्रेम व मस्ती से सत्संग सुन रही थी। इस गांव का माड़ू राम नामक व्यक्ति मेहनत-मजदूरी कर हक-हलाल की खाने वाला श्रद्धापूर्वक सत्संग सुन रहा था। उसका इकलौता लड़का कुछ समय पहले ही पैदा हुआ था। घर के पड़ोसी द्वारा सत्संग के दौरान माड़ू राम के पास एक संदेश आया कि तेरा लड़का बहुत ही बीमार है। तो माड़ूू राम ने उस आदमी को यह कहकर वापिस भेज दिया कि मेरे लड़के को दवा दिलवा दो। मैं अभी थोड़ी देर में आ रहा हूं, क्योंकि उसे अंदर से आप जी के दर्श-दीदार का सच्चा रस आ रहा था। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">थोड़ी देर बाद फिर से समाचार आया कि तेरा लड़का मर गया है और तुझे तुरंत घर बुलाया गया है। यह सुनकर माडू राम ने उसे यह कहकर फिर से वापिस भेज दिया कि मेरा लड़का तो मर ही गया है तो अब मैं क्या कर सकता हूं? तुम घर चलो और मैं अब पूरा सत्संग सुनकर ही घर आऊंगा। सचमुच ही उसे ईलाही सत्संग का इतना आनंद आ रहा था, जिसे वह किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था। इकलौते लड़के की मौत की दुखदायी खबर सुनकर भी वह सत्संग से नहीं उठा। सत्संग की समाप्ति पर साध-संगत उठकर अपने-अपने घरों को जाने लगी तो किसी सेवादार भाई ने माड़ू राम के लड़के की मृत्यु की खबर पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज को भी बता दी।</p>
<h3>‘‘माड़ू राम, सुना है तेरा लड़का चल बसा है” | Shah Mastana Ji</h3>
<p style="text-align:justify;">पूरी बात सुनकर पूजनीय दातार जी ने फरमाया, ‘‘माड़ू राम, सुना है तेरा लड़का चल बसा है और तू उठकर अपने घर क्यों नहीं गया?’’ उसने बताया कि बाबा जी, आपके प्रेम में इतना रस आ रहा था कि इसे छोड़कर कैसे चला जाता? मैं इसमें कर ही क्या सकता था? यह तो आप जी की ही अमानत है। आपजी का वचन ही सत्य वचन है। आप जी ने अपनी तवज्जोह (भरपूर दृष्टि) भक्त माड़ू राम पर डालते हुए फरमाया, ‘‘पुट्टर, घबराना नहीं। ‘धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा’ का नारा बोलकर बच्चे को हिला-डुलाकर देख लेना, जल्दबाजी बिल्कुल भी नहीं करना। क्या पता उसके श्वास कहीं रूके हुए हों।’’ सच्चे पातशाह जी का आशीर्वाद प्राप्त करके जब वह अपने घर पहुंचा तो घर में कोहराम मचा हुआ था। लोग तरह-तरह की बातें करने व ताने देने लगे। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">तब तक उसके लड़के को मरे हुए तीन घंटे बीत चुके थे। माड़ू राम अपने लड़के के पास ही बैठकर रोने लगा। तभी उसे शहनशाह जी के ईलाही वचन याद आ गए। वचनानुसार उसने ‘धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा’ का नारा लगाकर बच्चे को हिलाया-डुलाया और बेपरवाह जी के आगे विनती की कि सांईं जी, आप जी हमारे यहां जीवों के उद्धार के लिए पधारे हैं परंतु मेरा यह अभागा लड़का आपजी के दर्शन भी नहीं कर सका। तभी बच्चे की टांग थोड़ी सी हिली। अचानक उसके शरीर में कुछ हरकत महसूस होती देखकर सभी की आंखें उस बच्चे के शरीर पर टिक गई। धीरे-धीरे लड़के का रंग भी बदलने लगा और थोड़ी देर के बाद सभी के देखते ही देखते बच्चे ने आंखें खोल दीं।</p>
<h3>सभी ने प्रसन्नतापूर्वक ‘धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया</h3>
<p style="text-align:justify;">अपने सतगुरू जी की इस रहमत को प्रत्यक्ष में देख सभी ने प्रसन्नतापूर्वक ‘धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया तथा मुर्शिद-ए-कामिल का धन्यवाद करने लगे। गांव के घर-घर में यह खबर फैल चुकी थी। चारों और आपजी की महिमा हो रही थी। सुबह-सुबह ही माड़Þू राम अपने पूरे परिजनों एवं कई गांववासियों के साथ प्यारे सतगुरू जी का धन्यवाद करने आश्रम में आ गया। भगत तो खुशी के मारे बोल भी नहीं पा रहा था। आप जी ने फरमाया, ‘‘पुट्टर कैसे आए हो?’’ सेवादारों ने बताया कि बाबा जी, माड़ू राम का लड़का रात को शरीर त्याग गया था। आप जी की दया-मेहर रहमत से अब वह फिर से जिंदा हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ये आपके दर्शनों के लिए आए हैं। अंतर्यामी दातार जी ने फरमाया, ‘‘यह सब झूठ है। मरा हुआ भी कभी दोबारा जिंदा हो जाता है?’’ माड़ू राम के साथ आए सभी भक्तों ने बताया कि लड़का आपजी की रहमत से ही जिंदा हुआ है। इस पर पूज्य शहनशाह जी ने मुस्कुराते हुए फरमाया, ‘‘सभी की एक ही राय है? पुट्टर, तेरी सेवा व सच्ची भक्ति के कारण ही सच्चे पातशाह दाता सावण शाह जी महाराज जी ने तेरे बच्चे को जिंदगी बख्शी है। इसका यह नया जन्म हुआ है। अब असीं इसका नाम गंगा राम रखते हैं।’’ इस अद्भुत करिश्में को देखकर सारी साध-संगत बहुत ही खुश हुई। Shah Mastana Ji</p>
<p><a title="Maharashtra : महाराष्ट्र, ब्लॉक धनौरा के गणेश इन्सां की मानवता भलाई कार्य में गजब की शिद्दत!" href="http://10.0.0.122:1245/ganesh-insan-of-block-dhanaura-maharashtra-has-amazing-dedication-towards-his-humanitarian-work/">Maharashtra : महाराष्ट्र, ब्लॉक धनौरा के गणेश इन्सां की मानवता भलाई कार्य में गजब की शिद्दत!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/spiritual/the-true-satguru-brought-him-back-to-life/article-60534</link>
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                <pubDate>Wed, 31 Jul 2024 11:13:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Source of inspiration: नाम दान लेते ही यूं बदली तकदीर!</title>
                                    <description><![CDATA[Source of inspiration: प्रमुख दास गांव खजूरी (फतेहाबाद) में रहता था। उसका पहला नाम राम गोपाल शर्मा था। सन् 1952 में परम पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने पहली बार जब महमदपुर रोही में सत्संग फरमाया था तो गांव में सबसे पहले राम गोपाल ने नाम-दान प्राप्त किया था। पूजनीय शहनशाह जी ने अपार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/this-is-how-luck-changed-after-receiving-naam-daan/article-58063"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/mahamadpur-rohi-dera.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Source of inspiration: प्रमुख दास गांव खजूरी (फतेहाबाद) में रहता था। उसका पहला नाम राम गोपाल शर्मा था। सन् 1952 में परम पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने पहली बार जब महमदपुर रोही में सत्संग फरमाया था तो गांव में सबसे पहले राम गोपाल ने नाम-दान प्राप्त किया था। पूजनीय शहनशाह जी ने अपार रहमत करते हुए राम गोपाल का नाम प्रमुख दास रख दिया था। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">राम गोपाल के दो भाई थे। वह सबसे छोटा था। उसने बताया कि उन दोनों के यहां तो अच्छी पैदावार थी परंतु मेरे घर में गरीबी थी। नाम दान मिलने के बाद वह लगभग आश्रम में ही सेवा करता रहता था। पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज जहां भी सत्संग करने के लिए जाते वह भी साथ ही चला जाता। घर पर तो कभी-कभी ही आया करता था। घर में कई बार तो इतनी तंगी आ जाती थी कि घर में आटा तक नहीं होता था और मुश्किल से गुजारा करना पड़ता था। शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज, डेरा सच्चा सौदा अमरपुरा धाम, महमदपुर रोही में सत्संग करने के लिए पधारे। भक्त प्रमुख दास भी आप जी के साथ था। Shah Mastana Ji</p>
<h3>घट-घट के जाननहार दयालु दातार जी सब कुछ समझ गए | Shah Mastana Ji</h3>
<p style="text-align:justify;">घर में जबरदस्त गरीबी थी। खाने को कुछ भी नहीं था। भक्त के परिवार वाले सभी सदस्य भूखे बैठे हुए थे। इतने में भक्त का एक बड़ा भाई घर पर आया और परिवारजनों को इस प्रकार भूख के कारण उदास बैठे देखकर ताना मारते हुए कहने लगा कि तुम्हारे बाप ने और बाबे (पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज) ने बाजरी इक्ट्ठी कर रखी है जाओ और लाद लाओ। बच्चों ने ताऊ की इस बात को सच समझा और वे ऊंटनी लेकर डेरा सच्चा सौदा अमरपुरा धाम में पहुंच गए। बच्चों को क्या पता था कि उनके ताऊ ने उनसे मजाक करते हुए ताना मारा है। पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज स्टेज पर विराजमान थे। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">रूहानी सत्संग चल रहा था और ऊंटनी सहित अपने बच्चों को दरबार में आता देखकर प्रमुख दास ने उन्हें बाहर ही रोकते हुए पूछा कि वे यहां पर किस लिए आए हैं? इस पर बच्चों ने अपनी ताऊ वाली सारी बात ज्यों की त्यों ही बता दी। यह सुनकर उसको बहुत दु:ख पहुंचा परंतु उसने बच्चों को बहुत ही प्यार से समझाया कि बैठकर सत्संग सुन लें। सत्संग के बाद तुम्हारे साथ ही गांव को चलूंगा। Shah Mastana Ji</p>
<h3>वचन सुनते ही प्रमुख दास वैराग्य में आ गया | Shah Mastana Ji</h3>
<p style="text-align:justify;">घट-घट के जाननहार दयालु दातार जी सब कुछ समझ गए। प्रमुख दास वापिस शहनशाह जी के पास आया तो पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज ने पूछा, ‘‘प्रमुख दास! ये मुंडे (लड़के) किस लिए आए हैं?’’ उसने सच्चाई को छुपाते हुए प्रार्थना की कि सार्इं जी! यह पास के गांव बड़ोपल से आए हैं और अपने गांव जा रहे हैं जी। इस पर दातार जी ने फरमाया , ‘‘भई! तू गरीब मस्ताने से क्या छुपा रहा है, सच-सच बता क्या कहा है उन्होंने?’’ अपने मुर्शिद जी के पवित्र मुख ये यह वचन सुनते ही प्रमुख दास वैराग्य में आ गया और उसने सारी बात ज्यों की त्यों ही बयान कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज ने उन्हें अपना भरपूर प्यार बख्शते हुए पवित्र मुख से वचन फरमाया, ‘‘अच्छा! तो उन लोगों ने गरीब मस्ताने को ताना मारा है। जाओ पुट्टर! ऐसा बोलने वाले को कह देना कि इन लड़कों की गाड़ियां चलेंगी। अच्छा कारोबार होगा।’’ इसके साथ ही सच्चे पातशाह जी ने उन्हें नोटों के हार पहनाए और अपनी अलौकिक खुशियां प्रदान की। अपने मुर्शिद के ऐसे इलाही प्रेम व बेपरवाही खुशी को पाकर भक्त व उसके लड़के दाता जी के हजूरी में खूब नाचे। इस प्रकार अपने मुर्शिद का भरपूर प्यार प्राप्त कर वे अपने गांव आ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">बस! फिर क्या था? उसी दिन से ही उनके दिन फिर गए। कुल-मालिक की उन पर ऐसी अपार रहमत हुुई कि उन्होंने कारोबार शुरू कर लिया, दुकानें खोल ली। खूब आमदनी होने लगी। कारोबार दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया। प्यारे मुर्शिद जी की कृपा से आज उनके घर में उपरोक्त वचनानुसार गाड़ियां भी हैं और अच्छा कारोबार भी है। Shah Mastana Ji</p>
<p><a title="Sangaria : वरदान सिद्ध हो रही है मानसिक रोगियों के लिए ‘इंसानियत मुहिम’" href="http://10.0.0.122:1245/insaniyat-campaign-is-proving-to-be-a-boon-for-mentally-ill-patients/">Sangaria : वरदान सिद्ध हो रही है मानसिक रोगियों के लिए ‘इंसानियत मुहिम’</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 May 2024 16:31:38 +0530</pubDate>
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                <title>Shah Mastana Ji: अपने भक्त की सुनीं पुकार, बख्शी &amp;#8216;खुशियाँ बेशुमार&amp;#8217;!</title>
                                    <description><![CDATA[बहन ईशर कौर सुचान (सरसा) से पूजनीय शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज की अपार रहमत का वर्णन करती हुई बताती हैं कि सन् 1958 की बात है। मेरे ससुराल वालों ने अपनी सारी जमीन जो गांव सुचान (सरसा) के क्षेत्र में आती थी, को बेचकर यूपी (उत्तर प्रदेश) में खरीदने का निर्णय लिया। लेकिन मैंने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/precious-words-of-shah-mastana-ji-listened-to-the-call-of-the-devotee-gave-immense-happiness/article-57757"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/mastana-ji-21.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बहन ईशर कौर सुचान (सरसा) से पूजनीय शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज की अपार रहमत का वर्णन करती हुई बताती हैं कि सन् 1958 की बात है। मेरे ससुराल वालों ने अपनी सारी जमीन जो गांव सुचान (सरसा) के क्षेत्र में आती थी, को बेचकर यूपी (उत्तर प्रदेश) में खरीदने का निर्णय लिया। लेकिन मैंने इस बात का बहुत विरोध किया। मैंने अपने परिवार में सभी को अपनी राय देते हुए कहा कि हम सभी ने पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज से नाम-शब्द लिया हुआ है और हम डेरा सच्चा सौदा के साथ जुडे हुए हैं। डेरा अपने गांव से केवल 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पर हम अपने सतगुरू जी के दर्शन करते हैं, सत्संग सुनते हैं। Shah Mastana Ji</p>
<h3>दो-तीन भक्त पूजनीय शहनशाह जी की हजूृरी में पहले से ही बैठे थे</h3>
<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश में हम अपने सतगुरू जी के दर्शन कैसे कर पाएंगे? मेरा ससुर, पति तथा जेठ कोई भी मेरी बात से सहमत नहीं था। उनके इस फैसले से मेरा मन अत्यंत दु:खी हुआ। मैंने अपने पति को मनाने की पूरी-पूरी कोशिश की कि हम यूपी नहीं जाएंगे, क्योंकि उत्तर प्रदेश यहां से बहुत ही दूर है। मेरे मन में बार-बार यही बात आती कि अगर वहां जमीन ले ली तो हम अपने सतगुरू से बहुत दूर हो जाएंगे। लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुुनी। आखिर मेरे ससुराल वालों ने अपनी सारी जमीन बेच दी और यूपी में काशीपुर और कालागढ़ के पास जमीन खरीद ली। मेरे ससुराल के सभी आदमी अपनी जमीन की संभाल व काश्त के लिए यूपी में चले गए।</p>
<p style="text-align:justify;">सभी औरतें तथा बच्चे अभी सुचान (सरसा) में ही ठहरे हुए थे। जब परिवार के किसी सदस्य ने भी मेरी बात न सुनी तो मैंने अपने सतगुरू पूजनीय बेपरवाह साँईं शाह मस्ताना जी महाराज के चरणों में अर्ज करने का फैसला लिया। मैं अपने गांव के भक्त वैद्य गोबिन्द राम जी तथा उनकी पत्नी शांति देवी के साथ अर्ज करने के लिए डेरा सच्चा सौदा सरसा में पहुंच गई। जब हम लोग डेरा सच्चा सौदा सरसा में पहुंचे तो उस समय पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज डेरे में बने एक चौबारे के आगे मूढ़े पर विराजमान थे। मैं और बहन शांति, वैद्य जी के साथ पूजनीय शहनशाह जी के चरणों में पहुंच गए। वहां दो-तीन भक्त पूजनीय शहनशाह जी की हजूृरी में पहले से ही बैठे हुए थे। हम सभी ने पूजनीय शहनशाह जी के चरणों में नारा बोला और बैठ गए। Shah Mastana Ji</p>
<h3>मेरे सतगुरू जी ने मेरी अरदास स्वीकार कर ली</h3>
<p style="text-align:justify;">जब मैंने सतगुरू जी के दर्शन किए तो वैराग्य में आ गई और सुबक-सुबक कर रोने लगी। हालांकि मैंने शहनशाह जी के आगे कोई अर्ज भी नहीं की थी, परंतु फिर भी अंतर्यामी सतगुरू जी ने फरमाया, ‘‘पुट्टर! तुझे यहां से कोई हिला नहीं सकता। वो वापिस आ जाएंगे। पुट्टर, उम्र बहुत लम्बी है। तू तीसरी बॉडी (पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां) के भी दर्शन करेगी। रोने से बात नहीं बनती। तू फिक्र न कर।’’ सर्व-सामर्थ सतगुरू जी से उपरोक्त वचन सुनकर मुझे हौंसला हो गया। मुझे इस बात की अत्यंत खुशी हुई कि मेरे सतगुरू जी ने मेरी अरदास स्वीकार कर ली है। मेरी आत्मा खुशी से झूम उठी।</p>
<p style="text-align:justify;">उस दिन हम लोग पूजनीय शहनशाह जी से आज्ञा लेकर वापिस लौट आए। सतगुरू जी की ऐसी रहमत हुुई कि मेरे ससुर परिवार को वह जमीन बेचनी पड़ी, जो उन्होंने यूपी में जाकर खरीदी थी। हमारा सारा परिवार वापिस सुचान मंडी में लौट आया। मेरे ससुराल वालों ने फिर से सुचान मंडी में जमीन खरीद ली। इस प्रकार अंतर्यामी सतगुरू जी ने मेरी इच्छा पूरी की।</p>
<p style="text-align:justify;">जब हमारा परिवार यूपी से वापिस आया तो मैं अपने सतगुरू पूजनीय शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज जी का धन्यवाद करने के लिए डेरा सच्चा सौदा दरबार में गई और पूजनीय शहनशाह जी को सारी बात बताई कि साँईं जी! आप जी के वचन सच हो गए हैं। पूजनीय शहनशाह जी बहुत खुश हुए और वचन फरमाए, ‘‘अगर इन्सान का हृदय सच्चा हो और पुकार जायज हो तो सतगुरू उसे जरूर मंजूर करता है।’’ सतगुरू जी के वचन अटल होते हैं, जैसा कि उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट होता है। Shah Mastana Ji</p>
<p><a title="Maharashtra: नागपुर के सेवादारों ने दिया ‘अनबोल धन’ के लिए सराहनीय योगदान!" href="http://10.0.0.122:1245/nagpurs-sewadars-poured-grains-and-water-for-birds/">Maharashtra: नागपुर के सेवादारों ने दिया ‘अनबोल धन’ के लिए सराहनीय योगदान!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
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                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
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                <pubDate>Tue, 21 May 2024 11:17:41 +0530</pubDate>
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                <title>तेरे मकान का एक कंकर लाख रुपये में भी नहीं देंगे</title>
                                    <description><![CDATA[Shah Mastana Ji Maharaj: पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज डेरे में नीम के वृक्ष के नीचे, पानी से भरे टब में स्नान कर रहे थे। वहीं पास ही लालपुरा गांव का प्रेमी ख्याली राम मकानों की नींव के पास मिट्टी दबाने की सेवा में लगा हुआ था। स्नान करते करते पूजनीय बेपरवाह जी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/precious-words-of-mastana-ji-maharaj/article-57505"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/mastana-ji-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Shah Mastana Ji Maharaj: पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज डेरे में नीम के वृक्ष के नीचे, पानी से भरे टब में स्नान कर रहे थे। वहीं पास ही लालपुरा गांव का प्रेमी ख्याली राम मकानों की नींव के पास मिट्टी दबाने की सेवा में लगा हुआ था। स्नान करते करते पूजनीय बेपरवाह जी ने ख्याली राम को ईलाही वचन फरमाया, ‘‘सरदार हरबंस सिंह (पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का पहले वाला नाम) के अंदर प्रेम बादशाह आ गया है, उसको दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।’’ Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">फिर पूजनीय शाह मस्ताना जी ने आपजी के पास संदेश भेजा कि हरबंस सिंह अपना मकान तोड़कर घर का सारा सामान डेरे में लेकर आ जाए। आप जी तो पहली बार ही दर्शन करते ही अपने प्यारे सतगुरू पर तन मन से न्यौछावर हो चुके थे। आप जी को जैसे ही अपने सतगुरू जी का फरमान प्राप्त हुआ, आप जी ने बिना देरी किए, तत्काल ही कुदाल व गंधाला उठाया और ‘धन धन सतगुरू तेरा ही आसरा’ का नारा लगाकर अपना मकान अपने हाथों से तोड़ना शुरू कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस काम में आप जी के पूजनीय माता जी ने जी आप जी का साथ देते हुए कहा कि साईं जी के किसी भी हुक्म को नहीं मोड़ना। जैसा भी वह कहें, वैसा ही करना है। पूजनीय माता जी भी आप जी के साथ मकान तोड़ने लग गए। उसी दौरान एक प्रेमी ने आकर आप जी को सतगुरू जी का वचन सुनाते हुए कहा कि एक कमरे व एक बैठक को नहीं तोड़ना है, परिवार कहां बैठेगा और कहां सोएगा? Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">इधर आप जी अपने सतगुरू प्यारे की कृपा व खुशी प्राप्त करने के लिए उनके आदेश से खुशी-खुशी अपना मकान तोड़ रहे थे, परंतु दूसरी तरफ गांव श्री जलालआणा साहिब का हर व्यक्ति दु:खी व उदास था क्योंकि प्रत्येक गांववासी आप जी से अत्याधिक स्नेह करता था। संभवत: गांववासी यही सोच रहे होंगे कि यह कैसी गुरू भक्ति है, यह कैसी फकीरी है? एक बड़ा कमरा तथा एक बैठक को छोड़कर आप जी द्वारा अपना सारा मकान तोड़ कर गिरा दिया गया। पूजनीय सतगुरू जी का यह अनोखा खेल कई दिनों तक चलता रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">लोग इस घटना को देखकर व सुनकर आश्चर्यचकित रह जाते तथा मन ही मन विचार करते कि आप जी को क्या हो गया है? आप अपना मकान क्यों तोड़ रहे हैं? उन बेचारे गांव वालों को प्यारे सतगुरू जी के रहस्य का क्या पता था? इस प्रकार आप जी घर का सामान रेडियो, घड़ी, पानी वाली टंकी, गाड़ी, कपड़ों से भरी पेटियां, संदूक, बिस्तर, मोटरसाईकिल, फर्नीचर तथा जो भी अन्य सामान घर में मौजूद था, उसे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर डेरा सच्चा सौदा, सरसा में ले आए।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय नई ईटों का भाव 28 रूपये प्रति हजार था परंतु ट्रक वाले गांव श्री जलालआणा साहिब से सरसा तक ईंटों की ढुलाई का किराया 20 रूपये प्रति हजार मांग रहे थे। इसलिए आप जी ने पूजनीय बेपरवाह जी के चरणों में विनती की, ‘‘साईं जी! यदि आपका हुक्म हो तो पुरानी ईटें इसी गांव को दे देते हैं और यहां नई ईंटें मंगवा लेते हैं।’’ इस पर पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने वचन फरमाया, ‘‘नहीं भई! Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">नहीं, तेरे मकान का तो एक-एक कंकर, एक-एक लाख रूपये में भी किसी को नहीं दिया जाएगा। सभी ईंटें यहां दरबार में उठा लाओ।’’ इस तरह अपने प्यारे सतगुरू के आदेश को सर्वाेपरि मानते हुए आप जी अपने मकान का सारा मलबा ईंटें, गार्डर तथा लकड़ी के बड़े-बड़े शहतीर आदि सब कुछ ट्रकों, ट्रॉलियों में भरकर डेरा सच्चा सौदा, सरसा में ले आए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">नाम शब्द देने के वचन | Shah Mastana Ji</h3>
<p style="text-align:justify;">दिनांक 16 अप्रैैल 1960 को रात्रि के लगभग सवा बारह बजे पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज ने जीप से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। उस समय उनके साथ पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज, चालक हजारा लाल, गोबिन्द मदान, प्रेमी बुल्ला तथा कुछ अन्य सेवादार थे। उस समय पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज बातों बातों में अपने निजघर जाने का संकेत कर रहे थे, किन्तु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के अलावा उनकी इन बातों का रहस्य कोई समझ नहीं पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">दिनांक 17 अप्रैल को साध-संगत के साथ दिल्ली के कुछ स्थानों सफदरजंग, निजामुद्दीन औलिया की कब्र देखने गए एवं रात्रि के समय दिल्ली में सत्संग भी किया। उस समय कुछ लोगों द्वारा नामदान हेतु प्रार्थना करने पर शाह मस्ताना जी ने स्पष्ट शब्दों में फरमाया, ‘‘अब हम नाम शब्द शाह सतनाम सिंह जी के रूप में देंगे।’’ Shah Mastana Ji</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
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                <pubDate>Tue, 14 May 2024 17:56:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>साईं जी ने मीठे वचनों से आलोचना करने वालों को भगत बनाया!</title>
                                    <description><![CDATA[डेरा सच्चा सौदा सतलोक पुर धाम नेजिया खेड़ा आश्रम सरसा से चौपटा सड़क पर स्थित है। जो इस गांव की शान है। एक बार की बात है। उन दिनों सरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा आश्रम का मुख्य दरवाजा पूर्व दिशा की ओर से जाती पुरानी सड़क पर था। एक दिन पूजनीय बेपरवाह सांई शाह मस्ताना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/sai-ji-converted-his-critics-into-devotees-with-sweet-words/article-56714"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/shah-mastana-ji-maharaj-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">डेरा सच्चा सौदा सतलोक पुर धाम नेजिया खेड़ा आश्रम सरसा से चौपटा सड़क पर स्थित है। जो इस गांव की शान है। एक बार की बात है। उन दिनों सरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा आश्रम का मुख्य दरवाजा पूर्व दिशा की ओर से जाती पुरानी सड़क पर था। एक दिन पूजनीय बेपरवाह सांई शाह मस्ताना जी महाराज आश्रम के अंदर मुख्य द्वार के साथ की एक दीवार के पास धूप में विराजमान थे। लोगों के आने जाने का रास्ता भी उसी ओर ही था। वहां से इसी गांव नेजिया खेड़ा के कुछ व्यक्ति ऊंटों पर सवार होकर वहां से गुजरते समय अज्ञानतावश आपस में पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज के बारे में कुछ अनाप-शनाप बातेें करते हुए जा रहे थे जैसे ये सच्चे सौदे वाला कोई जासूस है, यह पाखण्ड करते होंगे, पता नहीं इनके पास इनता धन कहां से आता है जो लोगों में बांटते रहते हैं इत्यादि। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">साईं जी ने उनकी ये बातें साफ-साफ सुन ली और उन सबको बुलवाने के लिए एक सेवादार को भेज दिया। उनके आने पर उनसे पूछा कि वे सच्चा सौदा के बारे में क्या कह रह थे? पहले तो वो लोग डर गए कि उन्होंने बिना जांच पड़ताल के पूज्य गुरू जी के बारे में काफी कुछ बोल दिया। लेकिन पूजनीय बेपरवाह जी उनके साथ बड़े ही सहजता के साथ बातें करने लगे। आप जी ने उनका हौसला बढ़ाया और बेशुमार प्यार दिया। फिर उन्होंने सारी बातें ज्यों की त्यों दोहरा दीं। वे बहुत ही शर्मिंदा हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजनीय बेपरवाह जी ने उनसे पूछा कि आप कभी सच्चा सौदा आए हैं? या कभी सत्संग सुना है? वे कहने लगे कि हम आज यहां पर पहली बार ही आएं हैं। पूज्य बेपरवाह जी ने बड़े ही प्यार से उनसे कहा कि जब आप यहां कभी आए ही नहीं, कभी सत्संग सुना ही नहीं तो आप को क्या पता कि यहां पाखण्ड हैं? पूजनीय दातार ने उनको समझाया, ‘‘भाई! हमें चाहे आप कुछ भी कहो लेकिन जीवन में हर बात हमेशा सोच समझकर बोलनी चाहिए। बिना देखे-परखे किसी को भी बुरा नहीं कहना चाहिए। तुम्हारा भी कोई कसूर नहीं। यह सब मन का काम है, जो सबको गुमराह करता है और संतों की बातें सुनने नहीं देता। न हम कोई चोर हैं और न ही ठग हैं। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">हम तो अंदर वाले जिंदाराम की बात बताते हैं कि तुम्हारा सतगुरू तुम्हारे अंदर ही बैठा है, उसको पकड़ो। उसने ही यह दुर्लभ मनुष्य जन्म दिया है। उसका शुक्राना अदा करो व उसे हमेशा याद करो।’’ इसके बाद पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज ने सभी को बूंदी का प्रशाद दिया। प्रशाद रूपी अमृत जैसे ही उनके अंदर गया तो वह अर्ज करने लगे कि बाबा जी! बड़ा आनंद आया, बहुत शांति मिली है। हमारा तो यहां जाने का दिल ही नहीं कर रहा है। आप जी ने फरमाया, ‘‘पुट्टर! सत्संग पर आना फिर तुम्हें नाम-शब्द देंगे। जिसका जाप सुखों की खान है।’’ रूहानी संत से भरपूर प्यार पाकर उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने बहुत ही पश्चाताप किया कि हम ईश्वरीय स्वरूप गुरू को पहचान न सके। ये तो स्वयं ही भगवान के अवतार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन आप जी ने सत् ब्रह्मचारी सेवादार दादू बागड़ी को अपने पास बुलाकर फरमाया कि वैसे तो पुट्टर! हमें सरसा का ये एक ही आश्रम काफी है लेकिन जहां आश्रम बनाया जाता है वहां सतगुरू का कोई न कोई राज जरूर होता है। इसरार सबकुछ जानता है। वहां पुरानी संस्कारी रूहें होती हैं और उनको ईश्वर अल्लाह से जोड़ना होता है इसीलिए वहां डेरा बनाया जाता है। इसके साथ ही पूजनीय बेपरवाह जी ने दादू जी व एक अन्य भक्त जो नेजिया में राम नाम की चर्चा करने, भजनों शब्दों आदि द्वारा मालिक का यश गाने के लिए भेज दिया। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">अपने मुर्शिद-कामिल का आशीर्वाद लेकर नेजिया खेड़ा गांव में पहले दिन उन्होंने नंबरदार जोत राम के घर नामचर्चा द्वारा मालिक का गुणगान गाया और दूसरे दिन की नामचर्चा तेजा राम नंबरदार के घर की। लोग मालिक के नाम की चर्चा से बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने आपस में राय बनाकर अपने गांव में आश्रम बनाने की इच्छा जाहिर की। अगले ही दिन गांव के कुछ मुखिया लोग डेरा सच्चा सौदा सरसा में आप जी से मिले। आप जी ने संगत को आशीर्वाद देते हुए वचन फरमाया,‘‘वरी! सतगुरू स्वयं तुम्हें यहां लेकर आया है और तुमसे धन धन सतगुरू तेरा ही आसरा का नारा बुलवाया है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">आप जी ने नेजिया की संगत को अपने अमृतमयी वचनों द्वारा खूब प्यार दिया। सतगुरू के प्यार ने ऐसा रंग दिखाया कि जो कभी आश्रम की तरफ से मुंह फेरकर निकलते थे, वो भी मस्ती में नाच रहे थे। साध-संगत ने पूजनीय गुरु जी के पवित्र चरणों में अपने गांव में आश्रम बनाने के लिए अर्ज की। पूज्य बेपरवाह जी ने फरमाया, ‘‘वरी! पहले आप जगह तलाशो वहीं सत्संग करेंगे।’’ साध-संगत ने समस्त गांव की रजामंदी से 10 कनाल जगह डेरा सच्चा सौदा के लिए चुन ली। Shah Mastana Ji</p>
<p style="text-align:justify;">पूज्य बेपरवाह जी की आज्ञा पाकर आश्रम का निर्माण कार्य शुरू कर दिया। मात्र 8-10 दिनों में कच्ची ईटों से तेरावास, दो कमरे व कांटेदार झाड़ियां लगाकर आश्रम की चारदीवारी बनाई गई। आश्रम का निर्माण निश्चित होने के उपरांत पूजनीय बेपरवाह जी ने इस आश्रम का नाम ‘डेरा सच्चा सौदा सतलोकपुर धाम’ रखा और साथ ही 28-29 दिसंबर का सत्संग कर कई नामाभिलाषी जीवों को नाम-दान प्रदान किया।</p>
<p><a title="Pink Full Moon: आज रात है गुलाबी पूर्णिमा, गुलाबी दिखेगा चंद्रमा?" href="http://10.0.0.122:1245/today-aprils-pink-full-moon/">Pink Full Moon: आज रात है गुलाबी पूर्णिमा, गुलाबी दिखेगा चंद्रमा?</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
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                <pubDate>Tue, 23 Apr 2024 21:12:21 +0530</pubDate>
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                <title>Source of Inspiration: सतलोक को उड़ान: यूं ओड़ निभा जाते हैं सतगुरु के प्यारे शिष्य?</title>
                                    <description><![CDATA[Source of Inspiration एक बार गांव चूनावढ़ (राजस्थान) में सुबह का सत्संग था। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज (Shah Satnam Ji Maharaj) शाही स्टेज पर आकर विराजमान हो गए। पूजनीय परम पिता जी की आज्ञा से भाई हाथी राम को शब्द बोलने का समय दिया गया। जैसे ही हाथी राम ने नारा बोला […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/flight-to-satlok-this-is-how-satgurus-beloved-disciples-leave-their-bodies/article-56420"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/shah-satnam-singh-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Source of Inspiration एक बार गांव चूनावढ़ (राजस्थान) में सुबह का सत्संग था। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज (Shah Satnam Ji Maharaj) शाही स्टेज पर आकर विराजमान हो गए। पूजनीय परम पिता जी की आज्ञा से भाई हाथी राम को शब्द बोलने का समय दिया गया। जैसे ही हाथी राम ने नारा बोला तो पूजनीय परम पिता जी फरमाने लगे, ‘‘हाथी राम, आज तू अपनी आप बीती सुना।’’ वह अपनी आप बीती सुनाने लगा। उसने कहा, ‘‘पिता जी, शुरू में हम बहुत ही गरीब थे। Source of Inspiration</p>
<p style="text-align:justify;">पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज से नाम-दान लेने के बाद हमारे घर में बरकतें होने लगी और अब आपकी मेहर से हमारे पास सबकुछ है।’’ फिर पूजनीय परम पिता जी साध-संगत को बताने लगे, ‘‘इसकी अब अस्सी साल उम्र है अभी भी इसमें पूरा दमखम है। जिस प्रकार इस उम्र में यह उछल-उछलकर नाचता है, यह मालिक की कृपा ही तो है।’’ इसके बाद शाम को श्रीगंगानगर में सत्संग था। वहां पर श्री मेहर चंद के घर में पूजनीय परम पिता जी का उतारा था। सत्संग में पूजनीय परम पिता जी शाही स्टेज पर विराजमान हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्ञानी दलीप सिंह ने हारमोनियम पर एक नाचने वाली धुन लगा दी। हाथी राम खूब नाचा। नाचते-नाचते उसका चेहरा लाल हो गया। फिर जैसे ही धुन बंद हुई, हाथी राम अपने दोनों हाथों से स्टेज का सहारा लेकर खड़ा रहा। पूजनीय परम पिता जी ने सेवादारों को उसे सहारा देकर बैठाने का इशारा किया। शब्द की धुन के साथ जब वह नाचने के लिए उठने की कोशिश करता तो उसे फिर से बैठा दिया जाता। हाथी राम पूजनीय परम पिता जी को एकटक देख रहा था। उसने अपनी टांगें सीधी कर ली और आंखें पूजनीय परम पिता जी को देखते-देखते एक जगह पर टिक गई।</p>
<p style="text-align:justify;">उसकी आत्मा अपना शरीर छोड़कर पूजनीय परम पिता जी की गोद में बैठकर सचखंड के लिए उड़ान भर चुकी थी। उसे देखकर पूजनीय परम पिता जी ने सेवादारों को फरमाया, ‘‘उसे किसी डॉक्टर के पास ले जाओ।’’ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस दौरान सत्संग चलता रहा। साध-संगत को आभास तक नहीं हुआ कि हाथी राम ने चोला छोड़ दिया है। इस प्रकार मुर्शिद अपने भक्तों को बिना कोई कष्ट दिए ही इस भवसागर से पार कर देते हैं। Source of Inspiration</p>
<p style="text-align:right;"><strong>श्री जगतार सिंह, रामगढ़ (पंंजाब)</strong></p>
<p><a title="मुर्शिद का दर: ‘खैरा’ को मिली दया-मेहर की खैर" href="http://10.0.0.122:1245/murshid-ka-dar-khaira-got-the-bounty-of-mercy/">मुर्शिद का दर: ‘खैरा’ को मिली दया-मेहर की खैर</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
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                <pubDate>Tue, 16 Apr 2024 15:39:44 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>करिश्मा : जब लाशों के बीच पड़े जख्मी के खून को खुद शाह मस्ताना जी ने किया साफ</title>
                                    <description><![CDATA[सच्चाई की दास्तान, जहां बचाव किया खुद शाह मस्तान प्रेमी हंस राज खट्टर पुत्र श्री गुरांदित्तामल गऊशाला रोड, सरसा से पूजनीय परम संत बेपरवाह मस्ताना जी महाराज (Shah Mastana Ji) की अपार रहमत का वर्णन करते हुए बताता है कि मेरा छोटा भाई इन्द्रजीत जोकि अपना शरीर छोड़कर सचखंड जा चुका है, उसने पूजनीय बेपरवाह […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/shah-mastana-ji-came-in-a-dream-and-alerted/article-55300"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/shah-mastana-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">सच्चाई की दास्तान, जहां बचाव किया खुद शाह मस्तान</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी हंस राज खट्टर पुत्र श्री गुरांदित्तामल गऊशाला रोड, सरसा से पूजनीय परम संत बेपरवाह मस्ताना जी महाराज (Shah Mastana Ji) की अपार रहमत का वर्णन करते हुए बताता है कि मेरा छोटा भाई इन्द्रजीत जोकि अपना शरीर छोड़कर सचखंड जा चुका है, उसने पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज से नाम-दान लिया था और दरबार में रहकर ही सेवा व सुमिरन किया करता था। इंद्रजीत शादी नहीं करवाना चाहता था। किंतु मेरी माता ने एक दिन पूज्य शहनशाह जी के चरणों में अरदास की, कि साईं जी! इन्द्रजीत शादी नहीं करवाता।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर बेपरवाह जी ने इन्द्रजीत की तरफ मुखातिब होकर वचन फरमाया, ‘पुट्टर! तू अपना घर-बार बसा। अपने मां-बाप को राजी कर।’ शहनशाह जी के वचनों के अनुसार उसने शादी करवा ली। इसके बाद वह सिलाई मशीनों का एजेंट बनकर अपना कारोबार करने लग गया यानि वह कम्पनी से मशीनें मंगवाता और आगे अपना कमिशन लेकर उन्हें बेच देता। इस तरह उसका रोजगार बहुत बढ़िया चल पड़ा। एक बार वह लुधियाना के किसी एजेंट के साथ व्यापार के संबंध में अहमदाबाद चला गया। काम पूरा कर लेने के बाद उन दोनों ने राय बनाई कि वो सुबह वाली गाड़ी में वहां से दिल्ली जाएंगे। उस रात्रि वे वहां किसी होटल में ठहरे हुए थे।</p>
<h3>सपने में रेलगाड़ी का एक्सीडेंट हो गया</h3>
<p style="text-align:justify;">यह सलाह-मशविरा बनाकर वो दोनों सो गए। उस रात इन्द्रजीत को सपना आया कि वो दोनों रेलगाड़ी द्वारा अहमदाबाद से दिल्ली जा रहे हैं और रास्ते में उसी रेलगाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। उस दुर्घटना में लाशें ही लाशें पड़ी हुई हैं और सैंकड़ों आदमी घायल भी हैं। इन्द्रजीत ने बताया कि वह भी उन लाशों के बीच जख्मी हुआ पड़ा था, पर मुझे पूरी होश थी और वहीं पड़ा उन लाशों को देख रहा था। इतने में अचानक पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज पास आए। उसने देखा कि प्यारे सार्इं जी स्वयं उसके शरीर से बह रहे खून को कपड़े से साफ कर रहे हैं और इसी दरमियान उसकी आंख खुल गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अगली सुबह लुधियाना वाले एजेंट ने मेरे भाई से कहा कि ‘इन्द्रजीत! जल्दी कर, गाड़ी का टाईम हो गया है, हमने दिल्ली पहुंचना है।’ तो रात्रि के उस भयानक दृष्टांत के मद्देनजर इन्द्रजीत ने उसको जवाब दे दिया कि ‘मैं तो कल जाऊंगा, मुझे कोई काम है।’ दो-तीन दिन बाद इन्द्रजीत को पता चला कि उस रेलगाड़ी का एक्सीडेंट हो गया, जिसमें वो लुधियाने वाला एजेंट भी मारा गया। यह सुनकर इन्द्रजीत ने अपने पूजनीय सतगुरु बेपरवाह मस्ताना जी महाराज का कोटि-कोटि बार धन्यवाद किया जिनकी दया-मेहर से ही उसे दोबारा जिंदगी मिल पाई थी। प्रेमी हंसराज बताता है कि उपरोक्त सच्ची घटना मेरा भाई इन्द्रजीत खुद हमें बताया करता था।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Nov 2023 20:59:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऐसे पड़ा ‘सच्चा सौदा’ नाम</title>
                                    <description><![CDATA[जब आश्रम बनकर तैयार हो गया तो पूज्य साईं शाह मस्तनाना जी ने साध-संगत को इकट्ठा किया और उनसे मुखातिब होकर पूछा कि अब हम इस (Dera Sacha Sauda) आश्रम का नाम रखना चाहते हैं, क्या नाम रखा जाए? सभी चुप हो गए। पूज्य शहनशाह जी ने स्वयं ही तीन नाम तजवीज (सुझाव) किए- 1. […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/shah-mastana-ji-maharaj-named-this-holy-place-as-dera-sacha-sauda/article-46878"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-04/dera-sacha-sauda-2-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जब आश्रम बनकर तैयार हो गया तो पूज्य साईं शाह मस्तनाना जी ने साध-संगत को इकट्ठा किया और उनसे मुखातिब होकर पूछा कि अब हम इस (Dera Sacha Sauda) आश्रम का नाम रखना चाहते हैं, क्या नाम रखा जाए? सभी चुप हो गए। पूज्य शहनशाह जी ने स्वयं ही तीन नाम तजवीज (सुझाव) किए- 1. रूहानी कॉलेज 2. चेतन कुटिया 3. सच्चा सौदा। पूज्य शहनशाह जी ने साध-संगत से पूछा कि इन तीनों में से कौन सा नाम रखें? तब एक भक्त ने खड़े होकर कहा-सच्चा सौदा।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जहां बहती है प्यार-मोहब्बत की गंगा" href="http://10.0.0.122:1245/the-ganga-of-love-flows-in-dera-sacha-sauda/">जहां बहती है प्यार-मोहब्बत की गंगा</a></p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार एक भक्त के मुंह से कहलवाकर पूजनीय सांई जी ने इस पवित्र जगह का नाम सच्चा सौदा अर्थात् डेरा सच्चा सौदा रख दिया। उस समय पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने वचन फरमाए कि यह वह सच्चा सौदा है, जो आदिकाल से चला आ रहा है। यह कोई नया धर्म, मज़हब या लहर नहीं है। (Dera Sacha Sauda) सच्चा सौदा का भाव है सच का सौदा। इसमें सच है भगवान, ईश्वर, इसरार, वाहेगुरु, अल्लाह, ख़ुदा, गॉड और सच्चा सौदा है उसका नाम जपना अर्थात् नाम का धन कमाना। दुनिया में भगवान के नाम के सिवाय सब सौदे झूठे हैं। कोई भी वस्तु इस जहान में सदा स्थिर रहने वाली नहीं है। ईश्वर, वाहेगुरु, ख़ुदा, गॉड के नाम का सौदा करना ही सच्चा सौदा है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Apr 2023 10:36:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>जब सतगुरू जी ने उठाकर ड्यूटी पर भेजा&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[मास्टर लीला कृष्ण उर्फ लीलाधर पुत्र श्री पुरूषोत्तम दास नानक नगरी, मोगा (पंजाब) ने बताया कि मैंने बेपरवाह पूजनीय सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज से नाम-दान प्राप्त किया हुआ है और मुझे अपने सतगुरू पर दृढ़ विश्वास है। सन् 1958 की बात है कि मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला खूईयां नेपालपुर जिला सरसा में बतौर अध्यापक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/moment-between-dera-devotee-and-shah-mastana-ji-maharaj/article-36372"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/mastana-ji1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मास्टर लीला कृष्ण उर्फ लीलाधर पुत्र श्री पुरूषोत्तम दास नानक नगरी, मोगा (पंजाब) ने बताया कि मैंने बेपरवाह पूजनीय सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज से नाम-दान प्राप्त किया हुआ है और मुझे अपने सतगुरू पर दृढ़ विश्वास है। सन् 1958 की बात है कि मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला खूईयां नेपालपुर जिला सरसा में बतौर अध्यापक सेवारत्त था और मैं उसी गांव में रहता था। उन दिनों पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज का गांव श्री जलालआणा साहिब में रविवार के दिन एक विशाल सत्संग था। श्री जलालआणा साहिब, खुईयां नेपालपुर से करीब 12-13 मील की दूरी पर है। उन दिनों खूईयां से श्री जलालआणा साहिब तक आने जाने के लिए कोई साधन नहीं था। रास्ता कच्चा था इसलिए मैं अपनी साईकिल पर सवार होकर श्री जलालआणा साहिब पहुंच गया। सफर के कारण मैं काफी थक गया था। रात्रि का सत्संग था। उन दिनों शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज रात को काफी देर तक सत्संग किया करते। उस दिन भी प्यारे सतगुरू जी ने रात्रि दो बजे तक सत्संग किया और समाप्ति के बाद नाम-दान की दात भी प्रदान की।</p>
<p style="text-align:justify;">मैंने अगले दिन सोमवार को सुबह सात बजे अपने स्कूल में ड्यूटी पर पहुंचना था। कच्चे रास्ते में साईकिल चलाने की वजह से मैं बहुत थक गया था। इस कारण मैंने सोचा कि आराम से सुबह 6 बजे जाऊंगा और 8-9 बजे तक स्कूल पहुंच जाऊंगा। मौज मस्तपुरा धाम श्री जलालआणा साहिब डेरे में मिट्टी का एक काफी बड़ा चबूतरा था। सत्संग के बाद स्थानीय साध-संगत तो अपने-अपने घरों में चली गई। बाकी साध-संगत उसी चबूतरे पर लेट गई। उस चबूतरे पर करीब 100-150 आदमी अपनी चद्दरें ओढ़ कर सो रहे थे। मैं भी उन्हीं के बीच में अपने ऊपर चद्दर लेकर लेट गया। उस चबूतरे पर इतने सत्संगी अपनी चद्दरें ओढ़ कर सो रहे थे कि उस रात के अंधेरे में किसी आदमी की पहचान करना बहुत ही मुश्किल था।</p>
<p style="text-align:justify;">मैं तो बेफिक्र होकर आराम से अपनी गहरी नींद में सो गया। मुझे क्या पता था कि अगले दिन सोमवार को मेरे स्कूल की वार्षिक जांच होने वाली है। उन दिनों वार्षिक जांच अचानक ही हुआ करती थी। पूर्ण गुरू तो अपने शिष्य की हर आने वाली मुश्किल, भयानक कर्म को अपनी दया मेहर से टाल देते हैं। हां! अगर शिष्य को अपने सतगुरू पर दृढ़ यकीन हो और उन्हीं के वचनों को शत-प्रतिशत मानता हो तो सतगुरू भी उस शिष्य की पल-पल संभाल करता है। उसे कोई दुखांत घड़ी देखने ही नहीं देते। जब सारी साध-संगत गहरी नींद में सोई पड़ी थी तो लगभग प्रात: चार बजे अंतर्यामी दातार पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज चौबारे से बाहर आ गए और फरमाया, ‘‘असीं बाहर घूमने जाना है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज चौबारे से उतरकर अचानक ही उस चबूतरे के पास आकर खड़े हो गए जहां सारी साध-संगत सो रही थी। परम दयालु दातार जी के पावन कर-कमलों में हर समय एक लाठी हुआ करती थी। अचानक ही शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने सोए हुए भक्तों में से मेरी टांग पर अपनी लाठी की नोक लगाई और खड़े होने को कहा। मैं एकदम घबराहट में खड़ा हो गया। अपनी आंखें मलकर मैंने देखा तो सामने पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज खड़े हैं और फरमा रहे हैं, ‘‘कौन है भाई! तू सो क्यों रहा है?’’ फिर स्वयं ही कहने लगे, ‘‘तू तो मास्टर है, तूने ड्यूटी पर स्कूल में नहीं जाना? तू कैसे आया था?’’ मैंने जवाब दिया कि सांई जी! मेरे पास साईकिल है और साईकिल से ही वापिस खुईयां नेपालपुर जाना है। सतगुरू जी ने दोबारा फिर फरमाया, ‘‘अब चार बज चुके हैं तूं अभी जा।</p>
<p style="text-align:justify;">12-13 मील की यात्रा साईकिल पर करनी है। स्कूल की सरकारी ड्यूटी से लेट नहीं होना चाहिए।’’ मैंने कहा-शहनशाह जी ! मैं अभी ही साईकिल उठाकर जा रहा हूं। उसके बाद शहनशाह जी वापिस चौबारे पर जाकर आराम फरमाने लगे। उसी वक्त मैंने चादर अपने थैले में डाली, साईकिल उठाया और अपने गांव के लिए रवाना हो गया। घर से तैयार होकर ठीक सात बजे अपनी ड्यूटी पर स्कूल में पहुंच गया। स्कूल के बच्चों की प्रार्थना करवाई तथा सभी छात्रों को अपनी अपनी कक्षाओं में बैठा दिया गया। मैंने बच्चों की हाजिरी लगाकर पढ़ाना शुरू कर दिया। मुझे पढ़ाते हुए अभी पांच -सात मिनट ही हुए थे कि अचानक ही एक जीप मेरे स्कूल के गेट पर आकर रूक गई। उस जीप में जिला शिक्षा अधिकारी तथा सहायक जिला शिक्षा अधिकारी और दो क्लर्क थे।</p>
<p style="text-align:justify;">चारों जीप से उतरकर मेरे स्कूल के अंदर आ गए और मुझे कहने लगे कि आपके स्कूल का वार्षिक मुआयना करना है। मैंने उनका स्वागत किया और चाय-पानी पिलाया। दोनों अफसर साहिबानों तथा क्लर्कों ने भिन्न-भिन्न कक्षाओं की पढ़ाई व लिखाई का निरीक्षण किया। हाजिरी रजिस्टर व सरकारी फंड के हिसाब की पूरी पड़ताल की। इस काम में उन्होंने पूरे दो घंटे लगाए। हमारे स्कूल की पड़ताल करने के बाद वे और स्कूलों के निरीक्षण के लिए चले गए। अफसर साहिबानों को विदा करने के बाद मैंने अपने मन में बेहद खुशी महसूस की और अपने प्यारे सतगुरू का लाख-लाख बार धन्यवाद करने लगा। मेरे मन में ये बार-बार ख्याल आने लगा कि अंतर्यामी दातार पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज अगर आज सुबह चार बजे मुझे जगाकर स्कूल न भेजते तो मैं शायद 9-10 बजे स्कूल पहुंचता और गैरहाजिर पकड़ा जाता। गैरहाजिरी के कारण मुझे अफसर नौकरी से भी हटा सकते थे या और कोई भी सख्त सजा दे सकते थे। पूजनीय परम दयालु सतगुरू जी ने अपने शिष्य की इस अवसर पर लाज रखी और मेरी नौकरी सुरक्षित रखी।</p>
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                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Aug 2022 21:06:17 +0530</pubDate>
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