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                <title>Priority - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>बजट में जन सामान्य मोदी की प्राथमिकता नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार बताते हुए उन्होंने इस ट्वीट के साथ प्रमुख उद्योगपतियों के साथ खिंचवाई गई मोदी की दो फोटो भी पोस्ट की हैं। उन्होंने कहा कि जो उद्योगपति इन चित्रों में मोदी के साथ मौजूद हैं
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/public-has-no-priority-in-the-budget/article-12377"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/rahul-gandhi.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर साधा निशाना, कहा- (Rahul Gandhi)</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि जन सामान्य के प्रति उन्हें कोई रुचि नहीं है इसलिए बजट पर ‘व्यापक विचार विमर्श’ में भी आम आदमी की बजाय वह अपने नजदीकी पूंजी पति मित्रों को ही महत्व देते हैं। गांधी ने शुक्रवार को ट्वीट किया, ‘मोदी का बजट को लेकर ‘व्यापक राय शुमारी’ भी उनके नजदीकी पूंजीपति मित्रों तथा बड़े धनपतियों के लिए आरक्षित है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, सरकार तथा सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों, छोटे कारोबारियों या मध्यम वर्ग के करदाताओं के प्रति उनकी कोई रुचि नहीं है। मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार बताते हुए उन्होंने इस ट्वीट के साथ प्रमुख उद्योगपतियों के साथ खिंचवाई गई मोदी की दो फोटो भी पोस्ट की हैं। उन्होंने कहा कि जो उद्योगपति इन चित्रों में मोदी के साथ मौजूद हैं वे उनके नजदीकी हैं और उन्हीं से वह राय शुमारी करते हैं।</p>
<p> </p>
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</strong></span></pre>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jan 2020 15:42:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>पुलिस कर्मियों को बेहतर सुविधाएं देना प्राथमिकता: डीजीपी</title>
                                    <description><![CDATA[सरसा (सच कहूँ/सुनील वर्मा)। पुलिस कर्मचारियों को बेहतर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाना पहली प्राथमिकता है, ताकि वे बगैर किसी तनाव के अपनी ड्यूटी का निर्वहन कर सके। पुलिस कर्मचारी अक्सर अपनी ड्यूटी के दौरान परिवार से दूर रहते है, इसलिए उनके बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए डीएवी पुलिस पब्लिक स्कूल की स्थापना की गई […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/priority-to-provide-better-facilities-to-police-personnel-dgp/article-4078"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/dgp-haryana.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सरसा (सच कहूँ/सुनील वर्मा)।</strong> पुलिस कर्मचारियों को बेहतर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाना पहली प्राथमिकता है, ताकि वे बगैर किसी तनाव के अपनी ड्यूटी का निर्वहन कर सके। पुलिस कर्मचारी अक्सर अपनी ड्यूटी के दौरान परिवार से दूर रहते है, इसलिए उनके बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए डीएवी पुलिस पब्लिक स्कूल की स्थापना की गई है। यह बात हरियाणा के पुलिस महानिदेशक बीएस संधू ने शुक्रवार को सरसा पुलिस लाइन में पुलिस पब्लिक स्कूल के नए भवन का उद्घाटन करने के बाद कही। इस अवसर पर उनके साथ पुलिस अधीक्षक हामिद अख्तर, एएसपी विजय कक्कड़, एएसपी नरेंद्र बिजारणिया, पुलिस आवास निगम के एससी केएल भट्ट, स्कूल के प्रिंसिपल आलोक शर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">महिलाओं व बच्चियों पर होने वाले अपराधों पर लगेगा अंकुश</h3>
<p style="text-align:justify;">पत्रकारों से रूबरू होते हुए डीजीपी ने कहा कि प्रदेश में महिलाओं व बच्चियों के विरूद्ध होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए प्रदेश में पुलिस द्वारा अगले महीने से बड़ा प्रोग्राम शुरु किया जा रहा है। उन्होंने रेवाड़ी, यमुनानगर, हांसी, उकलाना इत्यादि क्षेत्रों में बच्चियों के साथ हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस महिलाओं की सुरक्षा में जुटी हुई है। डीजीपी संधु ने कहा कि वर्तमान में प्रदेश में गांव बंद आंदोलन के दौरान जोर जबरदस्ती की घटनाएं कहीं नहीं हो रही है। आतंकी संगठनों द्वारा अंबाला रेलवे स्टेशन उड़ाए जाने की धमकी संबंध में उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एसपी के आॅपरेशन प्रबल प्रहार को सराहा</h3>
<p style="text-align:justify;">डीजीपी ने सरसा में पुलिस अधीक्षक हामीद अख्तर के नेतृत्व में जिलाभर में नशे के खिलाफ चलाए जा रहे आपरेशन प्रबल प्रहार की सराहना की। पुलिस महानिदेशक ने कहा कि हरियाणा पुलिस नशे के खिलाफ एक विशेष मुहिम चलाए हुए है, जिसमें आमजन का सहयोग अति आवश्यक है। नशा बेचने वालों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जाएगा और उनकी प्रोपर्टी तक एटैच की जाएगी।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Jun 2018 09:37:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>बच्चों के अधिकार किसी दल की प्राथमिकता क्यों नहीं?</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बाल मजदूरी और अंधविश्वास बचपन के बैरी तो हैं ही साथ में कुबेर तंत्र बनती राजनीति भी बचपन के दुश्मन ही बन गए हैं, क्योंकि सरकारी नीतियां बचपन को बचाने और सही दिशा देने में नाकाफी साबित हो रहीं हैं। सड़कों पर घूमते बच्चे बदलते भारत की तस्वीर है, जिस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-childrens-rights-are-not-the-priority-of-any-party/article-3488"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बाल मजदूरी और अंधविश्वास बचपन के बैरी तो हैं ही साथ में कुबेर तंत्र बनती राजनीति भी बचपन के दुश्मन ही बन गए हैं, क्योंकि सरकारी नीतियां बचपन को बचाने और सही दिशा देने में नाकाफी साबित हो रहीं हैं। सड़कों पर घूमते बच्चे बदलते भारत की तस्वीर है, जिस ओर एयरकंडीशन में बैठी हमारी लोकतांत्रिक राजशाही व्यवस्था शायद देखना नहीं चाहती।</p>
<p style="text-align:justify;">इनका अपना कोई ठिकाना भी नहीं होता, कभी कोई फुटपाथ जिन बच्चों का बिस्तर, फ्लाईओवर जिनका छत और किसी तरह भूख शांत करना जिनका दैनिक उद्देश्य होता है, उनकी तरफ शायद हमारी व्यवस्था ने कानून बनाने के बाद कभी झांकने की कोशिश की ही नहीं। यह बदलते देश का नया वर्तमान है? बिता लोकतांत्रिक भूतकाल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पढ़ने-लिखने की उम्र में कचरे के ढ़ेर से कचरा उठाते बच्चे, अखबार, फूल, कलम बेचते बच्चे, कलाबाजियां दिखाता भारत का भविष्य वर्तमान में कहीं भी दिख जाएगा। केवल पेट भरने के सिवाय अन्य जिम्मेदारियों से उनके माता-पिता भी मजबूरीवश पल्ला झाड़ लेते हैं, तो सरकारें भी अच्छे दिन बहुरने का वादा कर अपने सामाजिक कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में लगता यही है, क्या लोकतंत्र में इन बच्चों के लिए कोई जगह नहीं क्या। ऐसे में सवालों की फेहरिस्त फिर लंबी हो जाती है, क्योंकि दिमागी बुखार, निमोनिया, डायरिया और अन्य बीमारियों की वजह से आजादी के सत्तर साल बाद भी हर वर्ष सैकड़ों बच्चे मारे जाते हैं। लेकिन इन मौतों के बावजूद सरकारें सबक सीखने को तैयार नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में शायद नीति-नियंत्रणकर्ता ही इन प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि वोटबैंक की राजनीति के वे बच्चे हिस्सेदार नहीं होते। वरना शायद उनकी मलिन दशा और दिशा देखकर भारतीय राजनीति को शर्म आती, और उनके लिए भी कोई न कोई सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन होता। जैसा कि लैपटॉप, और मोबाइल रूपी लॉलीपॉप 10वीं और 12वीं के छात्रों के लिए बांटा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में गरीबी के कारण भी बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की 2014 में आई रिपोर्ट के अनुसार विश्व के बेहद गरीब 120 करोड़ लोगों में से लगभग एक तिहाई बच्चे हमारे देश के हैं। यह आज की स्थिति है, फिर वर्तमान राजनीति से क्या उम्मीद की जाए। 1959 में बाल अधिकारों की घोषणा को स्वीकारने में लगभग पचास साल लग लगें।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पता चलता है, कि लोकतंत्र में सियासतदारों ने बच्चों के भविष्य और जीवन को कितना अहमियत दिया है। सड़क पर जीवन बिताने वाले बच्चों की संख्या मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दस लाख, तो वहीं गैर सरकारी संगठनों डॉन बॉस्को नैशनल फोरम और यंग एट रिस्क की ओर से देश के 16 शहरों में 2013 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों में सबसे ज्यादा बच्चे फुटपाथों पर रहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिनके अनुसार दिल्ली में सबसे ज्यादा 69976 बच्चे , मुंबई में 16059, कोलकाता में 8287 ,चेन्नई में 2374 और बेंगलूरु में 7523 बच्चे फुटपाथ पर रहते हैं। ये चंद उदाहरण हैं, यह स्थिति पूरे देश की शायद है ही नहीं। स्थितियां इससे बदत्तर होगी। बाल अधिकार के तहत जीवन का अधिकार, पहचान, भोजन, पोषण, स्वास्थ्य, और शिक्षा शामिल है। फिर जब देश के बच्चें सड़कों पर जीवन जीने को विवश हैं, फिर उन्हें क्या पहचान राजनीति दिला सकी, और फिर किस संवैधानिक स्वतंत्र और समानता की बात की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह बड़ा प्रश्न है। बच्चे तो आजादी से ही इन अधिकारों से वंचित दिखते हैं। क्या इनको अपने अधिकारों के हिस्से का 5 फीसद भी हक देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्यों की बात करने वाली रहनुमाई व्यवस्था दिला पाई। बच्चा कोई भी हो, चाहे गरीब या अमीर। वह देश की अनमोल धरोहर होता है, जिसके कंधों पर ही देश का भविष्य अड़िग होता है, लेकिन अफसोस कि वास्तविक परिदृश्य में आजादी के सत्तर वर्षों में राजनीति ने इन बच्चों के लिए शायद शून्य बाटे सन्नाटा के बराबर ही काम कर सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कहते हैं न, भूखे पेट भजन न हो गोपाला, जब देश से भुखमरी, और कुपोषण मिट ही नहीं रहा। फिर शिक्षा के अधिकार से क्या मिला, वह इस कहावत से समझा जा सकता है। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे कर्तव्यों से मुख तो हमारा समाज भी मोड़ रहा है, वह इन बच्चों को रुपए एक की भीख देकर ही अपनी सामाजिक और नैतिक जिम्मेवारियों से छुटकारा पा लेता है, यह रवायत भी उचित नहीं। अब जब चुनावी धुन भले ही राज्य चुनावों की बज चुकी है, तो क्या राजनीति बच्चों के अधिकारों के बारे में बात करने की सार्थक पहल करेगी। यह देखने वाला विषय होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे बीते समय की राजनीति और नेशनल सेम्पल सर्वे की रिपार्ट देखकर लगता नहीं, कि राजनीति बच्चों के अधिकारों को लेकर सचेत होने वाली है, क्योंकि एक रिपोर्ट के मुताबिक दो तिहाई लोग पोषण के सामान्य मानक से कम खुराक प्राप्त कर पाते हैं। वहीं गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार कुपोषित और कम वजन के बच्चों की आबादी का लगभग 40 फीसद हिस्सा विश्व में भारत से ही आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जो बच्चों के अधिकारों की हवाई किला बनाने वाली व्यवस्था की नीतियों पर सवालिया प्रश्न खड़ी करती है, कि अगर बच्चों के भविष्य को सँवारने के लिए कदम उठाए जा रहें हैं, फिर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट को किस विकास के पैमाने से नापे। जिसके अनुसार झारखंड में पांच वर्ष तक के 47.8 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर खनिज संपदा से भरे प्रदेश की यह स्थिति है। ऐसे में अन्य प्रदेशों की हालत कितनी पतली होगी, इसका सहज आंकलन किया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे झारखंड में हैं। वहीं एक साल तक के बच्चों की मौत के मामले में उत्तर प्रदेश पूरे देश में पहले नंबर पर है। फिर बच्चों का भविष्य किस दल की प्राथमिकता में है, यह समझना कोई दूर की कौड़ी नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-लेखक महेश तिवारी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Nov 2017 04:09:19 +0530</pubDate>
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