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                <title>Notebandi - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>जानिए! भारत में कब-कब हुई नोट बंदी </title>
                                    <description><![CDATA[भारत में पहले चलता था 5 हजार से 10 हजार तक का नोट नोटबंदी से बजाए फायदे के हो गए ये 5  नुकसान जाने नोटबंदी से क्या फायदे होने की थी उम्मीद, और क्या हुआ गाजियाबाद (सच कहूँ/रविंद्र सिंह)। रिजर्व बैंक ने नोटबंदी (Notebandi) से जुड़े अंतिम आंकड़े जारी करते हुए बताया था कि वि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/how-many-times-demonetisation-happened-in-india/article-47906"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/notebandi.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">भारत में पहले चलता था 5 हजार से 10 हजार तक का नोट</h3>
<ul style="text-align:justify;">
<li>नोटबंदी से बजाए फायदे के हो गए ये 5  नुकसान</li>
<li>जाने नोटबंदी से क्या फायदे होने की थी उम्मीद, और क्या हुआ</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>गाजियाबाद (सच कहूँ/रविंद्र सिंह)।</strong> रिजर्व बैंक ने नोटबंदी (Notebandi) से जुड़े अंतिम आंकड़े जारी करते हुए बताया था कि वि मुद्रित मुद्रा में से 10,700 करोड़ रुपये वापस बैंक में नहीं लौटे। इन आंकड़ों के आधार पर साफ है कि इन रुपयों के अलावा देश में मौजूद पूरा काला धन एक बार फिर बैंकिंग में प्रवेश कर चुका है।  लेकिन इसके साथ ही नोटबंदी से इन फायदों पर भी सवाल खड़ा हो गया। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के 8 नवंबर 2016 को लिए गए नोटबंदी के फैसले पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी आई। जहां केंद्र सरकार अपने दावे  डटी रही  कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा फायदा मिलने वाला है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="2000 रुपये के नोट बदलने को लेकर आई बड़ी खबर" href="http://10.0.0.122:1245/two-thousand-note/">2000 रुपये के नोट बदलने को लेकर आई बड़ी खबर</a></p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली जुली प्रतिक्रिया के साथ कुछ संस्थाओं ने तीखी आलोचना भी की इस दौरान नोटबंदी के वास्तविक आंकड़े केन्द्रीय रिजर्व बैंक के पास एकत्र होते रहे और रिजर्व बैंक विमुद्रित की गई करेंसी की गिनती करती रही। रिजर्व बैंक ने नोटबंदी (Notebandi) से जुड़े अंतिम आंकड़े जारी करते हुए बताया था कि विमुद्रित मुद्रा में से 10,700 करोड़ रुपये वापस बैंकिंग प्रणाली में नहीं लौटे हैं।  इस धनराशि की जानकारी  आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के आधार पर, आठ नवंबर, 2016 को घोषित नोटबंदी से पूर्व चलन में रहे विमुद्रित नोटों की 15.42 लाख करोड़ रुपये की राशि में से वापस बैंकिंग प्रणाली में लौटी 15.31 लाख करोड़ रुपये की राशि को घटाने के बाद सामने आई थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भारत में 3 बार नोटबंदी हुई !</h3>
<p style="text-align:justify;">आरबीआई ने जनवरी 1938 में पहली पेपर करेंसी छापी, जो 5 रुपए की नोट थी। इस साल पहले 10 रुपए, 100 रुपए, 1,000 रुपए और 10,000 रुपए के नोट भी छापे गए थे। लेकिन आजादी से पूर्व भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल सर आर्चीबाल्ड वेवेल ने 12 जनवरी 1946 को हाई करेंसी वाले बैंक नोटों को डिमॉनेटाइज करने का अध्यादेश लाने का प्रस्ताव दिया और 1000 और 10000 के नोट बंद किए गए। इसके बाद 1954 में फिर से 1000, 5000 और 10000 के नोटों की छपाई हुई। भारत में 5000 से 10000  के नोटों का प्रचलन 1954 से 1978 तक रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि 1978 में जनता पार्टी की सरकार में तत्कालीन पीएम मोरारजी देसाई की सरकार ने 5000 और 10000 के नोटों का सर्कुलेशन रोक दिया। उसके बाद  8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे भारत में संपूर्ण नोटबंदी की घोषणा भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने किया था। उन्होंने 8 नवंबर की रात 8 बजे अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा था कि आज रात आठ बजे के बाद भारत में प्रचलित 500 और 1000 रुपये के नोट प्रचलन से बाहर हो जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">500 और 1000 के नोट बंद कर दिए गए। और 2000 का नोट जारी किया गया था। लेकिन अब 19 मई 2023 को फिर से अचानक 2000 का नोट बंद करने का ऐलान कर दिया गया। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई ) ने 2,000 रुपये के नोट को चलन से बाहर करने की घोषणा कर दी है।  30 सितंबर के बाद यह नोट भी मान्य नहीं होगा। लोग एक बार में 2 हजार रुपये के केवल 10 नोट की बदल  पाएंगे। फिलहाल अब भारत में सबसे बड़ा नोट 500 का प्रचलन  में शायद जारी रहेगा। या भविष्य में भारत सरकार इसको भी बंद करने का एलान कर सकती है!</p>
<h3 style="text-align:justify;">नोटबंदी के क्या हुआ नुकसान और क्या फायदे होने की थी उम्मीद | (Notebandi)</h3>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई है। सरकार ने राजनीतिक फायदे के लिए अर्थव्यवस्था को ठप किया है और असली काले धन पर कुछ नहीं किया है। काला धन अब भी विदेश जा रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">नोटबंदी से हो गए ये 5 बड़े  नुकसान?</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">लुढ़क गई जीडीपी</li>
<li style="text-align:justify;">बढ़ गई बेरोजगारी</li>
<li style="text-align:justify;">बढ़ गया बैंकों का कर्ज</li>
<li style="text-align:justify;">नहीं बढ़ी सरकार की कमाई</li>
<li style="text-align:justify;">घट गई आम आदमी की सेविंग</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"> नोटबंदी से ये 10  फायदे होने की थी उम्मीद | (Notebandi)</h3>
<h5>1. भ्रष्टाचार पर लगाम लगने की थी उम्मीद</h5>
<p style="text-align:justify;">देश में 500 और 1000 रुपये की प्रतिबंधित करेंसी कुल करेंसी की 85 फीसदी थी।  करीब  यह दोनों करेंसी देश में भ्रष्टाचार की पोशाक भी थी।  नोटबंदी के फैसले के बाद से ही भ्रष्टाचार के लिए इस करेंसी का इस्तेमाल रुक गया।  पुरानी करेंसी की जगह जारी हुई नई करेंसी को सरकार ने धीरे-धीरे और सभी सुरक्षा मापदंडों के सहारे बाजार में संचालित भी किया जिससे दोबारा अर्थव् अर्थव्यवस्था में काला धन एकत्र न होने पाए। लेकिन कोई उपाय काम नहीं आया।</p>
<h5>2. कैशलेस इकोनॉमी प्रचलित होगी</h5>
<p style="text-align:justify;"> कैश इकोनॉमी बनाने के लिए जरूरी था कि देश में ज्यादा से ज्यादा ट्रांजेक्शन  डिजिटल के माध्यमों से किया जाए।  इससे करेंसी पर देश की निर्भरता कम होगी और रिजर्व बैंक और अन्य बैंकों के साथ-साथ केन्द्र सरकार को करेंसी संचालन में कम खर्च करना पड़ेगा।  कैशलेस इकोनॉमी का फायदा सरकार के रेवेन्यू में इजाफे के साथ-साथ आम आदमी को भी होगा ,क्योंकि उसका पैसा  डिजिटल आदान-प्रदान में ज्यादा सुरक्षित रहेगा।</p>
<h5>3. नकली करेंसी पर लगेगी लगाम</h5>
<p style="text-align:justify;">देश में सीमा पार से नकली करेंसी के प्रवाह की गंभीर समस्या थी।  नकली करेंसी जिसके हाथ पहुंचती थी उसे उतने मूल्य का तुरंत नुकसान उठाएं पड़ता था।<br />
वहीं सरकार को भी इसके रोकथाम के लिए बड़े नेटवर्क का सहारा लेना पड़ता था।  करेंसी का कम इस्तेमा तेल (डिजिटल पेमेंट) और बड़े डिनॉमिनेशन की करेंसी से एक झटके में देश से नकली करेंसी साफ हो चुकी है।  लिहाजा उम्मीद थी कि नई करेंसी के सुरक्षा मानक ज्यादा पुख्ता होने से अगले कई वर्षों तक अर्थव् अर्थव्यवस्था नकली करेंसी से सुरक्षित रहेगी।</p>
<h5>4. रियल एस्टेट सेक्टर पारदर्शी होने की थी उम्मीद</h5>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी के बाद सबसे बड़ा फायदा रियल एस्टेट सेक्टर में होना था।  बीते कई दशकों से रियल एस्टेट सेक्टर कालेधन के निवेश का सबसे बड़ा जरिया था।  इसके चलते कागजों पर प्रॉपर्टी की खरीद और वास्तविक खरीद में बड़ा अंतर  होना आम बात थी।  इससे जहां सरकार को स्टांप ड्यूटी  में बड़ा नुकसान होता था। वहीं आम आदमी को ब्लैक    न होने के चलते मकान खरीदने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।</p>
<h5>5. उम्मीद थी खत्म होगा काला धन</h5>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने दावा किया था कि नोटबंदी के फैसले से कालेधन के खिलाफ सामाजिक बदलाव लाने के काम को आसानी से किया जा सकेगा।  यह हकीकत है कि किसी भी अर्थव् अर्थव्यवस्था से कालाधन तब तक नहीं खत्म किया जा सकता जब तक सामाजिक स्तर पर इसका बहिष्कार न होने लगे।  अभी तक काले धन का निवेश प्रॉपर्टी और सोना-चांदी में किया जाता था। जिससे उनकी कीमत वास्तविक कीमत से हमेशा अधिक बनी रहती थी।  लिहाजा, नोटबंदी के बाद इन क्षेत्रों में कालेधन के इस्तेमाल पर रोक लगने की उम्मीद थी। लेकिन नहीं लग सकी।</p>
<h5>6.  उम्मीद थी बंद होगी समानांतर इकोनॉमी</h5>
<h5 style="text-align:justify;">कालेधन और भ्रष्टाचार का सहारा लेकर देश में हमेशा से एक समानांतर इकोनॉमी चलती थी।</h5>
<p style="text-align:justify;">देश में कोयला की खदान से लेकर सड़क किनारे चाय और सब्जी बेचने वाले इस समानांतर अर्थव्यवस्था में शामिल रहते थे। यहां ज्यादातर लोग देश की सकल घरेलू आय को नुकसान पहुंचाते हुए अपनी आर्थिक स्थिति गतिविधियों को चलाते थे. लिहाजा, नोटबंदी से डिजिटल पेमेंट की ओर रुझान और नोटबंदी से खत्म हुए काले धन  के साथ-साथ इस समानांतर इकोनॉमी को मुख्यधारा से  जोड़ने में मदद मिलने की उम्मीद थी।</p>
<h5>7. बढ़ेगा टैक्स बेस</h5>
<p style="text-align:justify;">देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने का सबसे बड़ा फायदा होगा कि बड़े से बड़े और छोटे से छोटे ट्रांजैक्शन बैंकों  के पास दर्ज होंगे।  इन ट्रांजेक्शन  पर इनकम टैक्स विभाग की भी लगातार नजर रहेगी।  जब देश में ब्लैक इकोनॉमी का आधार नहीं रहेगा तो जाहिर है ज्यादा से ज्यादा लोग टैक्स का भुगतान करने के बाद ही अपनी खरीद-फरोख्त को पूरा  कर पाएंगे।  लिहाजा, नोटबंदी से उम्मीद थी कि केंद्र और राज्य सरकारों का रेवेन्यू तेजी  से बढ़ेगा।  उसका वित्तीय घाटा कम होगा और देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन रहेंगे।</p>
<h5>8. फाइनेंशियल सेविंग्स  में होगा इजाफा</h5>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी (Notebandi) के पहले तक देश में लोग अपनी सेविंग्स   को प्रॉपर्टी, सोना और ज्वैलरी में निवेश करते थे। जरूरत पड़ने पर लोग इसे ब्लैक मार्केट में बेचकर एक बार फिर करेंसी में बदल देते थे. नोटबंदी से पहले तक देश के 50 फीसदी से अधिक परिवार अपनी सेविंग्स  को इन्हीं तरीकों से बचाकर रखते थे। यहां निवेश हुआ अधिकांश पैसा  संभावित ब्लैकमेल  भी था।  लिहाजा उम्मीद थी कि नोटबंदी के बाद रियल एस्टेट और सोना अपेक्षा के मुताबिक रिटर्न नहीं दे पाएंगे और आम आदमी इन माध्यमों में निवेश करने की जगह अपनी सेविंग्स को रखने के लिए एक बार फिर बैंकों  का रुख करेंगे। उम्मीद थी कि लॉन्ग सेविंग्स। बैंक डिमांड ड्राफ्ट और म्यूचयूअलचुफंड जैसे विकल्पों का अधिक सहारा लेंगे और यहां उन्हें सबसे सुरक्षित रिटर्न भी मिलेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बैंकों की कमाई बढ़ने की थी उम्मीद</h3>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी (Notebandi) से कालेधन पर लगाम के साथ-साथ तेजी ते से बढ़ते डिजिटल पेमेंट से नोटबंदी के बाद बैंकों  की कमाई में बड़ा इजाफा देखने की उम्मीद बंधी थी।  माना जा रहा था कि इस इजाफे के सहारे बैंक भी  अपना विस्तार करेंगे और ग्राहकों को लुभाने के लिए आसान और सस्ती बैंकिंग का रास्ता साफ करेंगे।  इसके साथ ही यह भी उम्मीद लगाई गई कि नोटबंदी से बैंकों   के पास एकत्रित हुई अकूत  दौलत उन्हें उनका घाटा पाटने में भी मदद करेगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">10 सस्ता होगा कर्ज ये थी उम्मीद</h3>
<p style="text-align:justify;">उम्मीद की जा रही थी कि नोटबंदी (Notebandi) के बाद से बैंकों  को हो रहे फायदे का सीधा असर देश में ब्याज दरों पर पड़ना तय माना  जा रहा था। उम्मीद थी कि वित्तीय जगत में पारदर्शिता  के साथ-साथ बैंक अपना कारोबार फैलाने के लिए ज्यादा से ज्यादा कर्ज देने की कोशिश करेंगे।  यहां ग्राहकों को लुभाने के लिए वह कर्ज पर लगने वाले ब्याज दरों में बड़ी कटौती का ऐलान कर सकते हैं।  इससे देश में घर खरीदने, कार या स्कूटर खरीदने अथवा कारोबार के लिए कर्ज सस्ते दरों में मिलना शुरू हो जाएंगे। लेकिन सब उल्टा हो गया।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 May 2023 15:48:59 +0530</pubDate>
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                <title>नोटबंदी से आखिर क्या हासिल हुआ?</title>
                                    <description><![CDATA[नोटबंदी को दो साल से ज्यादा होने को आए, लेकिन उससे जुड़ी आश्चर्यजनक बातें एक के बाद एक सामने निकलकर आ रही हैं। ताजा खुलासा रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने किया है। नोटबंदी को लेकर आरबीआई ने सरकार को साफ तौर पर आगाह किया था कि नोटबंदी से कालेधन पर कोई ठोस असर नहीं पड़ेगा, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">नोटबंदी को दो साल से ज्यादा होने को आए, लेकिन उससे जुड़ी आश्चर्यजनक बातें एक के बाद एक सामने निकलकर आ रही हैं। ताजा खुलासा रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने किया है। नोटबंदी को लेकर आरबीआई ने सरकार को साफ तौर पर आगाह किया था कि नोटबंदी से कालेधन पर कोई ठोस असर नहीं पड़ेगा, बल्कि इससे आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। आरबीआई ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई एक जानकारी के जवाब में यह महत्वपूर्ण बात कही है। एक आरटीआई कार्यकर्ता के सूचना के अधिकार कानून के तहत पूछे गये सवाल के जवाब में आरबीआई ने हाल ही में यह बताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी के एलान से सिर्फ ढाई घंटे पहले आरबीआई निदेशक मंडल की बैठक हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">निदेशक मंडल में आरबीआई के मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास भी शामिल थे। इस बैठक में आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल और तत्कालीन वित्त सचिव अंजलि छिब दुग्गल, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर आर गांधी एवं एसएस मूंदड़ा शामिल थे। आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि बोर्ड की बैठक में सरकार के नोटबंदी के अनुरोध को मंजूरी दी गई थी, लेकिन यह भी कहा गया था कि इससे काले धन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। निदेशक मंडल ने इस बैठक में सरकार को राय दी थी कि ज्यादातर कालाधन नकद रूप में नहीं है, बल्कि सोना और अचल सम्पत्ति के रूप में है। लिहाजा सरकार के इस कदम का वैसी संपत्ति पर ठोस असर नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यही नहीं नकली नोट के बारे में निदेशक मंडल की राय थी कि कुल 400 करोड़ रुपये इस श्रेणी के अंतर्गत हैं, जो कुल मुद्रा का बहुत कम प्रतिशत है। आरबीआई के इस खुलासे के बाद यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि वह भी नोटबंदी के पक्ष में नहीं था, लेकिन प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी के दवाब और जिद में आरबीआई ने फैसले का समर्थन किया। जिससे देश को आगे चलकर काफी आर्थिक संकट झेलना पड़ा। जिन उद्देश्यों के लिए नोटबंदी की गई थी, उनमें से एक भी हासिल नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया था और जनता को बैंकों में अपने पास जमा पुराने नोट बदलवाने के लिए 30 दिसंबर 2016 तक यानी 50 दिनों की मियाद दी गई थी। ये नोट हटते ही देश में आर्थिक इमरजेंसी के हालात बन गए थे। देखते ही देखते देश की 87 फीसदी यानी 15 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा, भारतीय अर्थव्यवस्था से बाहर हो गई थी। सरकार द्वारा अचानक थोपे गए इस फैसले से सभी प्रभावित हुए। नोटबंदी से हो रही दिक्कतों की वजह से देश में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। बावजूद इसके मोदी सरकार और सत्ताधारी पार्टी बीजेपी नोटबंदी के अपने इस कदम को, एक क्रांतिकारी कदम बतलाती रही।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार की दलीलें थीं कि भ्रष्टाचार, काले धन और सीमा पार से होने वाली नकली नोटों की तस्करी पर लगाम लगाने के मद्देनजर उसने बड़े नोट बदलने का फैसला लिया है। यह बात अलग है कि सरकार के इस कदम से न तो भ्रष्टाचार खत्म हुआ और ना ही काले धन पर कोई रोक लगी। आरबीआई ने खुद ये बात मानी कि नोटबंदी के दौरान देश में प्रचलन में रहे 15.41 लाख करोड़ रुपए के प्रतिबंधित नोट में से 15.31 लाख करोड़ रुपए प्रणाली में वापस लौट आए हैं। यानी नकली नोट और काला धन पकड़ने के उसके सारे दावे झूठे निकले। नोटबंदी की वजह से देश की जीडीपी में तकरीबन 2 फीसदी की गिरावट आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमईआई) के कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्विस (सीपीएचएस) के आंकड़ों के मुताबिक साल 2016-2017 के अंतिम तिमाही में तकरीबन 15 लाख नौकरियां गई। भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी संगठन भारतीय मजदूर संघ ने खुद नोटबंदी पर ये कहा था कि, असंगठित क्षेत्र की ढाई लाख यूनिटें बंद हो गईं और रियल एस्टेट सेक्टर पर बहुत बुरा असर पड़ा है। बड़ी तादाद में लोगों ने नौकरियां गंवाई हैं।नोटबंदी का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बात और कही थी कि सरकार के इस कदम से देश के अंदर नक्सलियों और देश के बाहर से फंडिंग पाने वाली आतंकी हरकतों पर अंकुश लगेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन आज कश्मीर में क्या हालात हैं, सबको मालूम हैं। प्रधानमंत्री के दावे से इतर, आतंकी हमलों में और भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। नोटबंदी से कोई फायदा तो नहीं हुआ, बल्कि इसे लागू करने में रिजर्व बैंक को हजारों करोड़ रूपए का नुकसान जरूर हुआ। नए नोटों की प्रिटिंग के लिए रिजर्व बैंक को 7,965 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। इसके अलावा नकदी की किल्लत नहीं हो, इसके लिए ज्यादा नोट बाजार में जारी करने के चलते 17,426 करोड़ रुपए का ब्याज भी चुकाना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी के इस अकेले फैसले से देश में इतना सब कुछ हो गया, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी भी यह बात मानने को तैयार नहीं कि उनका यह फैसला गलत था। उन्होंने बिना किसी तैयारी के देश को आर्थिक अनिश्चितता में खड़ा कर दिया था। संसद में अपने फैसले का बचाव और उसकी तारीफ करते हुए उन्होंने नोटबंदी को दुनिया में किया गया ऐसा सबसे बड़ा कदम करार दिया, जिसकी कोई तुलना नहीं है। वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नोटबंदी के फैसले के फायदे गिनाते हुए कहा, दीर्घावधि में इससे कर राजस्व बढ़ेगा और यह तेजी से राजकोषीय मजबूती में तब्दील होगा।एक तरफ सरकार, नोटबंदी के अपने फैसले को सही मानती रही, तो दूसरी ओर उसने जनता को इस फैसले से जुड़ी जानकारियां देने में हमेशा आना कानी की।</p>
<p style="text-align:justify;">वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ने लंबे समय तक यह सामान्य जानकारी देशवासियों को नहीं बतलाई कि नोटबंदी के कदम से देश की अर्थव्यवस्था को कितना फायदा पहुंचा, कितना काला धन उजागर हुआ, कितने जाली नोट पकड़े गए और कितना भ्रष्टाचार रुका ? रिजर्व बैंक ने दो साल तक यह बात भी नहीं बतलाई कि नोटबंदी से पहले बैंक और सरकार के बीच कोई विचार विमर्श हुआ था ? वहीं प्रधानमंत्री कार्यालय भी यह जानकारी देने से बचता रहा कि नोटबंदी से पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार और वित्त मंत्रालय के साथ सरकार का कोई सलाह-मशविरा हुआ था ? हालत यह थी कि नोटबंदी के फैसले के बारे में सरकार कुछ कहती थी और रिजर्व बैंक कुछ। सूचना के अधिकार के तहत जब भी किसी आरटीआई कार्यकर्ता ने नोटबंदी के फैसले से जुड़ी जानकारियां मांगी, तो यह कहकर उनकी मांग ठुकरा दी जाती थी कि नोटबंदी से जुड़ी कोई भी जानकारी देना सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत सूचना के दायरे में नहीं आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि नोटबंदी से जुड़े मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं था। आरटीआई अधिनियम में कुछ ऐसे विशेष प्रावधान भी शामिल हैं, जिनके तहत सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त रिकार्ड को भी सार्वजनिक किया जा सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के इस नकारात्मक रवैये पर तत्कालीन केन्द्रीय सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचायुर्लु ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया था कि सभी सरकारी प्राधिकारियों की यह नैतिक, संवैधानिक, आरटीआई आधारित लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वह नोटबंदी से प्रभावित हुए हर नागरिक को इस संबंधी सूचना, इसके कारण, प्रभाव और यदि कोई नकारात्मक असर पड़ा है,</p>
<p style="text-align:justify;">तो उसके लिए उठाए गए उपचारात्मक कदमों की जानकारी दे।बहरहाल देर से ही सही, नोटबंदी से जु़ड़ी सभी जानकारियां एक के बाद एक देश के सामने आ रही हैं और देशवासियों को मालूम चल रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी को लेकर जो बड़े-बड़े वादे और दावे किए थे, वे सब झूठे थे। नोटबंदी से ना तो कालाधन वापिस आया और ना ही उतने नकली नोट पकड़ में आए, जितना सरकार ने दावा किया था। नोटबंदी से गर कोई फायदा हुआ, तो वह है टैक्स भरने वाले लोगों की संख्या में कुछ लाख की बढ़ोत्तरी।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>आशीष वशिष्ठ</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/notebandi/article-8071</link>
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                <pubDate>Fri, 15 Mar 2019 21:04:10 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सोने में नोटबंदी के बाद की सबसे बड़ी तेजी, 32 हजार के पार</title>
                                    <description><![CDATA[पीली धातु (Gold Market Price) में सबसे बड़ी तेजी नई दिल्ली (एजेंसी)। वैश्विक स्तर पर पीली धातु (Gold Market Price)के 1,200 डॉलर प्रति औंस को पार कर जाने और घरेलू स्तर पर डॉलर की तुलना में रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर पर उतरने से आज दिल्ली सरार्फा बाजार में सोना 555 रुपये की छलाँग लगाकर 32,030 रुपये […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/gold-market-price/article-6112"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/gold-market-prize.jpg" alt=""></a><br /><h2>पीली धातु (<strong>Gold Market Price</strong>) में सबसे बड़ी तेजी</h2>
<p><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> वैश्विक स्तर पर पीली धातु (<strong>Gold Market Price</strong>)के 1,200 डॉलर प्रति औंस को पार कर जाने और घरेलू स्तर पर डॉलर की तुलना में रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर पर उतरने से आज दिल्ली सरार्फा बाजार में सोना 555 रुपये की छलाँग लगाकर 32,030 रुपये प्रति दस ग्राम पर पहुँच गया। चाँदी 450 रुपये चमककर दो महीने से ज्यादा के उच्चतम स्तर 39,400 रुपये प्रति किलोग्राम पर रही। पीली धातु में यह नोटबंदी के बाद की सबसे बड़ी तेजी है। नोटबंदी की घोषणा 08 नवंबर 2016 की रात को की गयी थी और अगले दिन 09 नवंबर 2016 को सोने की कीमत 900 रुपये प्रति दस ग्राम बढ़ गयी थी।</p>
<p>इस साल 15 जून के बाद यह पहला मौका है जब घरेलू बाजार में पीली धातु 32 हजार रुपये के पार निकली है। कारोबारियों का कहना है कि रुपये के 73 रुपये प्रति डॉलर से भी ज्यादा कमजोर हो जाने से पीली धातु के दाम बढ़े हैं। कारोबार के दौरान एक समय भारतीय मुद्रा 73.41 रुपये प्रति डॉलर तक लुढ़क गयी थी। देश में सोना मुख्य रूप से आयात किया जाता है और इसलिए डॉलर के महँगा होने से इसके दाम बढ़ जाते हैं।</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Oct 2018 18:02:15 +0530</pubDate>
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                <title>नोटबंदी नासमझी वाला फैसला था : चिदंबरम</title>
                                    <description><![CDATA[करोड़ों लोगों को तकलीफ में डाला नई दिल्ली (एजेंसी)। नोटबंदी का फैसला नासमझी वाला और जल्दबाजी में लिया गया फैसला था। यह बड़ी भूल साबित हुआ। इसकी वजह से इकोनॉमी को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और करोड़ों आम लोगों को तकलीफ हुई। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने यह बात अपने ट्वीट में लिखी है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/crores-of-people-in-trouble/article-3516"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/note-bandi.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:left;">करोड़ों लोगों को तकलीफ में डाला</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> नोटबंदी का फैसला नासमझी वाला और जल्दबाजी में लिया गया फैसला था। यह बड़ी भूल साबित हुआ। इसकी वजह से इकोनॉमी को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और करोड़ों आम लोगों को तकलीफ हुई। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने यह बात अपने ट्वीट में लिखी है। उन्होंने रविवार को एक के बाद एक कई ट्वीट किए। “नोटबंदी के एक साल बाद, इस फैसले के लिए हर दावा तुच्छ हो चुका है, इसे खारिज कर दिया गया है और हंसी उड़ रही है।” “अब मुझे तर्क दिया जा रहा है कि नोटबंदी नकली नोटों को खत्म करने के लिए थी। ” “एक साल बाद हमसे कहा गया कि आरबीआई के पास वापस आए 15 लाख 28 हजार करोड़ (बंद किए गए नोटों का मूल्य) रुपए में से 41 करोड़ के नोट नकली थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए, नोटबंदी भारतीय नकली नोटों का जवाब नहीं है।”  “नोटबंदी के बाद भी करप्शन हो रहा है, रिश्वत देने और लेने वाले लगातार रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं।” “जहां तक ब्लैकमनी का सवाल है, हर दिन टैक्सेबल इनकम जनरेट होती है। उसका एक हिस्सा ऐसा होता है, जिस पर टैक्स नहीं चुकाया जाता और अलग-अलग मकसद के लिए इसका इस्तेमाल होता है। जैसे- रिश्वत देना, इलेक्शन फंडिंग, कैपिटेशन फीस, जुआ खेलने और लेबर लगाने के लिए।” “नोटबंदी एक नासमझी वाला एकतरफा फैसला था, जो बड़ी भूल साबित हुआ। इकोनॉमी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और करोड़ों आम लोगों को इसने तकलीफ में डाल दिया।””डेमोक्रेसी में किसी भी चुनी हुई सरकार को लोगों को बेहद तकलीफ और दुख में डालने का कोई हक नहीं है।</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Nov 2017 06:28:40 +0530</pubDate>
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                <title>नोटबंदी की सालगिरह : ऐतिहासिक या काला दिन</title>
                                    <description><![CDATA[8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई अकस्मात नोटबंदी ने देश की जनता को ही नहीं बल्कि तंत्र, राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी हिला कर रख दिया था। 500 और 1000 रूपए के नोट बंद कर 500 व 2000 के नए नोटों को बाजार में उतारा गया। आज एक वर्ष पूरा होने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/notebandi-anniversary-historical-or-black-days/article-3500"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/arun.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई अकस्मात नोटबंदी ने देश की जनता को ही नहीं बल्कि तंत्र, राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी हिला कर रख दिया था। 500 और 1000 रूपए के नोट बंद कर 500 व 2000 के नए नोटों को बाजार में उतारा गया। आज एक वर्ष पूरा होने के बाद मुद्दा सिर्फ इतना है कि यह एक सफल प्रयास के रूप में साबित हुआ या नहीं? इस बात में कोई दोराय नहीं कि नोटबंदी के एक साल बाद भी कोई खासा बदलाव देखने को नहीं मिला है। हालांकि इस एक साल में डिजिटल पेमेंट के काफी सूत्र बाजार में आए जैसे भीम, युपीआई, मोबाइल वॉलेट, पेमेंट बैंक आदि, पर आज भी 1,31,81,190, करोड़ रूपए नगद बाजार में चल रहे है। देश में 3 करोड़ क्रेडिट कार्ड व 70 करोड़ डेबिट कार्ड है उसके बावजूद भी लोग नकद को ही प्राथमिकता देते है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक की संस्था नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया (एनपीसीआई) देश में होने वाले सभी तरह के डिजिटल भुगतान की निगरानी रखने वाली सबसे बड़ी संस्था है। एनपीसीआई के आंकड़ो के मुताबिक नोटबंदी के बाद देश डिजिटल ट्रांजेक्शन को बहुत तेजी से अपना रहा है। साल 2017-2018 में अक्टूबर तक ही डिजिटल ट्रांजेक्शन 1000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। पेमेंट काउंसिल आॅफ इंडिया के मुताबिक, डिजिटल भुगतान उद्योग की वृद्धि दर जो कि पहले 20 से 50 प्रतिशत के बीच थी, नोटबंदी के बाद बढ़कर 40-70 प्रतिशत के बीच हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी के लेन-देन में यूपीआई (यूनाइटेड पेमेंट इंटरफेस) बहुत कारगर साबित हुआ है। एनपीसीआई के अपने ऐप भीम के अलावा 50 से ज्यादा बैंक इससे जुड़ चुके हैं। अक्टूबर 2017 में ही यूपीआई से होने वाले लेन देन का आंकड़ा 7 करोड 70 लाख पहुंच गया। सितंबर में सिर्फ 3 करोड़ 90 लाख लोगों ने यूपीआई के जरिए लेन देन किया था। इस साल यूपीआई के जरिए अब तक 7057 करोड़ का लेन-देन हो चुका है जो पिछले साल के मुकाबले 32 फीसदी ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक विभाग ने नोटबंदी के बाद 23.22 लाख खातों में से 17.73 लाख संदिग्ध मामलों की पहचान की है। इनमें 3.68 लाख करोड़ रुपये की राशि जमा कराई गई। इन मामलों में संबंधित लोगों को नोटिस भेजा गया। इनमें से 11.8 लाख ने आॅनलाइन माध्यमों से जवाब दाखिल कर दिया है। नोटबंदी के बाद देश में इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है वहीं डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन भी बढ़ा है। आॅनलाइन इनकम टैक्स रिटर्न भरने के मामले में भी बड़ा कामयाबी हासिल हुई। 2016-17 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न की ई-फाइलिंग में करीब 23% का इजाफा हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मुताबिक सितंबर 2016 से सितंबर 2017 के बीच के 12 महीनों में क्रेडिट कार्ड की बकाया रकम में 38.7 फीसदी का उछाल आया है। इस दौरान कुल बकाया रकम 59,900 करोड़ रुपये हो गई। पिछले साल इसी अवधि में यह रकम 43,200 करोड़ रुपये थी. हालांकि, बीते दो साल में क्रेडिट कार्ड की बकाया रकम में लगभग 77.74 फीसदी का उछाल आया है। सितंबर 2015 में यह रकम 33,700 करोड़ रुपये थी. आरबीआई के मुताबिक देश में क्रेडिट कार्ड की संख्या अगस्त 2016 में 2.64 करोड़ थी जो अगस्त 2017 में 3.27 करोड़ हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी बयान में कहा गया है कि अभी तक 2.24 लाख कंपनियों का नाम आधिकारिक रिकार्ड से हटाया गया है। ये कंपनियां दो या अधिक साल से निष्क्रिय थीं। बैंकों से मिली शुरूआती सूचना के अनुसार 35,000 कंपनियों से जुड़े 58,000 बैंक खातों में नोटबंदी के बाद 17,000 करोड़ रुपये जमा कराए गए थे, जिसे बाद में निकाल लिया गया। इसमें कहा गया है कि एक कंपनी जिसके खाते में 8 नवंबर, 2016 को को कोई जमा नहीं थी, ने नोटबंदी के बाद 2,484 करोड़ रुपये जमा कराए और निकाले।</p>
<p style="text-align:justify;">नोटबंदी के सरकार ने इस बात का भी पता लगाने की कोशिश की कि टैक्स चोर अपने बेहिसाब संपत्ति को कहा इस्तेमाल कर सकते हैं। जांच के बीच यह पता लगा कि विदेश यात्रा में जहां नवंबर 2015 में 36.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च हुए वहीं नवंबर 2016 में यह खर्चा बढ़कर 246.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर पहुंच गया। वित्त मंत्रालय ने 6 नवंबर को कहा कि साल भर पहले हुई नोटबंदी से काला धन समाप्त करने, जाली नोटों को बाहर करने और चलन में नकदी कम करने में मदद मिली है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि चलन में नकदी 17.77 लाख करोड़ से कम होकर चार अगस्त 2017 को 14.75 लाख करोड़ पर आ गयी है। उसने कहा, पुनर्मुद्रीकरण के बाद अब महज 83 प्रतिशत ही प्रभावी नकदी है।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Nov 2017 03:44:29 +0530</pubDate>
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