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                <title>NGT - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>नेशनल हाईवे-48 पर कई ढाबें धराशाही</title>
                                    <description><![CDATA[एनजीटी आदेशों की पालना न करने पर की गई कार्रवाई रेवाड़ी (सच कहूँ न्यूज)। नेशनल हाईवे-48 पर एनजीटी के आदेशों की पालना नहीं करने वाले कई ढाबों पर मंगलवार सुबह पीला पंजा चला। नियमों को ताक पर रखकर चलने वाले कई ढाबों को जेबीसी मशीन से धराशाही कर दिया गया। लगभग आधा दर्जन विभागों की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/on-national-highway-48-many-dhabas-which-did-not-comply-with-the-orders-of-the-ngt-ran-a-yellow-paw/article-38301"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/national-green-tribunal.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li>
<h3 style="text-align:justify;">एनजीटी आदेशों की पालना न करने पर की गई कार्रवाई</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>रेवाड़ी (सच कहूँ न्यूज)।</strong> नेशनल हाईवे-48 पर एनजीटी के आदेशों की पालना नहीं करने वाले कई ढाबों पर मंगलवार सुबह पीला पंजा चला। नियमों को ताक पर रखकर चलने वाले कई ढाबों को जेबीसी मशीन से धराशाही कर दिया गया। लगभग आधा दर्जन विभागों की संयुक्त टीम ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया। समाचार लिखे जाने तक हाईवे पर यह कार्रवाई जारी थी, जिससे ढाबा संचालकों में हड़कंप मचा हुआ था। जानकारी के अनुसार एनजीटी ने शिकायत के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित विभिन्न विभागों को इस तरह के ढाबों के खिलाफ कार्रवाई करने के आदेश दिए गए थे। मंगलवार को डीटीपी, प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड, सिंचाई विभाग, पब्लिक हेल्थ, फायर ब्रिगेड व दूसरे विभागों के अधिकारियों की एक संयुक्त टीम पुलिस बल और जेसीबी मशीन के साथ नेशनल हाइवे पर पहुंची। इस टीम ने नियमों की पालना नहीं करने वाले ढाबों पर तोड़फोड की कार्रवाई शुरू की। जेसीबी मशीन से कई ढाबों को धराशाही कर दिया गया।</p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong>यह भी पढ़ें:–</strong></span> <a href="http://10.0.0.122:1245/vigilance-team-has-caught-a-patwari-in-jhajjar-district-red-handed-while-accepting-a-bribery/">रिश्वत के आरोप में पटवारी गिरफ्तार</a></p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Sep 2022 19:07:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>प्रदूषण के खिलाफ एनजीटी का कड़ा निर्णय</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली सरकार की लापरवाही को जिम्मेवार ठहराते हुए 25 करोड़ रुपए जुर्माना ठोका नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल  (NGT strong decision against pollution) ने बढ़ रहे प्रदूषण के पीछे दिल्ली सरकार की लापरवाही को जिम्मेवार ठहराते हुए 25 करोड़ रुपए जुर्माना ठोका है। नई बात यह है कि जुर्माना सरकार की बजाय अधिकारियों को अपनी जेब से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/ngt-strong-decision-against-pollution/article-6804"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/77.jpg" alt=""></a><br /><h2>दिल्ली सरकार की लापरवाही को जिम्मेवार ठहराते हुए 25 करोड़ रुपए जुर्माना ठोका</h2>
<p style="text-align:justify;">नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल  <strong>(NGT strong decision against pollution)</strong> ने बढ़ रहे प्रदूषण के पीछे दिल्ली सरकार की लापरवाही को जिम्मेवार ठहराते हुए 25 करोड़ रुपए जुर्माना ठोका है। नई बात यह है कि जुर्माना सरकार की बजाय अधिकारियों को अपनी जेब से भरना होगा। नि:संदेह ट्रिब्यूनल की यह कार्रवाई उचित है, क्योंकि सरकारी खजाने से पैसा जा रहा था जिसकी अधिकारियों को रत्ती भर भी सिरदर्दी नहीं थी। आम तौर पर अधिकारी कानून की उल्लंघना करने वाले फैक्ट्री मालिकों के साथ मिलकर प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते।</p>
<h2>अधिकारी चाहकर भी उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते</h2>
<p style="text-align:justify;">इससे रिश्वतखोरी का धंधा बढ-फूल रहा है। अधिकारी वेतन के अलावा कई गुणा ज्यादा पैसा रिश्वत के रूप में वसूलकर अपनी जेब भर रहे थे। इस निर्णय का मजबूत पक्ष यह है कि अधिकारियों में जवाबदेही बढ़ेगी लेकिन निर्णय का एक कमजोर पक्ष यह भी है कि जो फैक्ट्री मालिक अधिकारियों की परवाह न करते हुए सीधा राजनेताओं के साथ सांठगांठ कर लेते हैं, अधिकारी चाहकर भी उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते, यह उन अधिकारियों के साथ अन्याय भी होगा। दरअसल एनजीटी का निर्णय अधिकारियों की लापरवाही के खिलाफ केवल सजा जुर्माने तक ही सीमित है।</p>
<h2>राजनेता अधिकारियां के हाथ बांधकर रखते हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">इस मामले का प्रशासनिक व्यवस्था से सबंधित पक्ष गायब है। यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वे प्रशासनिक व्यवस्था को ऐसा बनाएं कि गैर-कानूनी कार्य करने वालों की राजनैतिक पहुंच खत्म हो। मंत्रियों व विधायकों की भी जिम्मेदारी तय की जाए। आम तौर पर मंत्री/ विधायक अपनी नाकामी अधिकारियों के सिर मढ़ देते हैं। एक तरफ राजनेता अधिकारियां के हाथ बांधकर रखते हैं दूसरी तरफ किसी नुकसान के लिए अधिकारियों को आगे कर देते हैं। ऐसे में यदि कोई उपलब्धि हो तो श्रेय मंत्री या सरकार को मिलता है।</p>
<h2>बड़े-बड़े घोटालों में मंत्री बरी हो रहे हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">देश की समस्याएं जवाबदेही व इमानदारी की कमी के कारण बढ़ रही हैं। बड़े-बड़े घोटालों में मंत्री बरी हो रहे हैं लेकिन अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट जरूर दायर हो जाती है। यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि अधिकारी चालाक हैं तो फिर मंत्री किस मर्ज की दवा हैं जो भ्रष्ट अधिकारियों की निगरानी करने में नाकाम रहते हैं। मंत्रियों को पद केवल वेतन और भत्तों के लिए ही नहीं दिए जाते। एनजीटी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता लेकिन यह तो मुख्यमंत्री ने देखना है कि उसके मंत्री सरकार की नीतियों के अनुसार काम कर भी रहे हैं या नहीं।</p>
<h2>एनजीटी का अधिकारियों के खिलाफ सख्ती का निर्णय सही</h2>
<p style="text-align:justify;">एनजीटी का अधिकारियों के खिलाफ सख्ती का निर्णय सही है, लेकिन बीमारी की जड़ को हाथ डालने के लिए सरकारों को अपनी व्यवस्था में भी सुधार करना होगा। ‘राइट टू रीकाल’ की चर्चा भी हमारे देश में चल चुकी है लेकिन यह काम सरकारों ने करना है। अपने ही मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कौन बहादुरी दिखाता है? कौन नियम बनाता है? भ्रष्टाचार या राजनीति में बढ़ रहे अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ही फैसले सुना रही है। राजनेता भी अपनी आत्मा की आवाज सुनें और कानून कायदों को लागू करने की जिम्मेदारी निभाएं।</p>
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<p>NGT, Strong, Decision, Against, Pollution</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/ngt-strong-decision-against-pollution/article-6804</link>
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                <pubDate>Tue, 04 Dec 2018 10:25:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एनजीटी ने दक्षिण दिल्ली में पेड़ काटने पर 19 जुलाई तक रोक लगाई</title>
                                    <description><![CDATA[दक्षिण दिल्ली में सात कालोनियों को पुर्नविकसित के लिए  पेड़ों को काटने पर रोक नई दिल्ली (एजेंसी)। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने दक्षिण दिल्ली में सात कालोनियों को पुर्नविकसित करने के लिए 17 हजार पेड़ों को काटने पर 19 जुलाई तक रोक लगा दी है । (NGT, Banned, Tree, Cutting, SouthDelhi) एनजीटी में सोमवार को इस मामले […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/ngt-bans-tree-cutting-in-south-delhi-till-july-19/article-4624"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/ngt-banned-tree-cutting.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">दक्षिण दिल्ली में सात कालोनियों को पुर्नविकसित के लिए  पेड़ों को काटने पर रोक</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong>राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने दक्षिण दिल्ली में सात कालोनियों को पुर्नविकसित करने के लिए 17 हजार पेड़ों को काटने पर 19 जुलाई तक रोक लगा दी है । <strong>(NGT, Banned, Tree, Cutting, SouthDelhi)</strong> एनजीटी में सोमवार को इस मामले पर सुनवाई हुई । प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायाधीश जावेद रहीम ने कालोनियों को विकसित करने वाले सार्वजिनक उपक्रम राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम(एनबीसीसी) और केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग(सीपीडब्ल्यूडी)को निर्देश दिया कि इस मामले की 19 जुलाई को सुनवाई तक पेड़ों की कटाई नहीं करे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पेड़ों की कटाई को लेकर कई संगठन ने किया विरोध</h3>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी 25 जून को एक डॉक्टर की याचिका पर सुनवाई करते हुए चार जुलाई तक पेड़ों की कटाई को रोकने का आदेश दिया था। उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई चार जुलाई को होनी है। दक्षिण दिल्ली में सात कालोनियों को विकसित किया जाना है जिसके लिए पेड़ों की कटाई की जानी थी। पेड़ों की कटाई को लेकर कई संगठन विरोध कर रहे हैं। जिन कालोनियों का पुर्नविकास किया जाना है उनमें सरोजिनी नगर,नेताजी नगर,नारौजी नगर,कस्तूरबा नगर,त्यागराज नगर,श्रीनिवास पुरी और मोहम्मदपुर शामिल हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Jul 2018 16:38:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली की हवा पर एनजीटी की तलवार</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण की जानलेवा भयानकता को देखते हुए एक बार फिर सम-विशम कारें सड़कों पर उतारने का फैसला लिया है। इसके मुताबिक सम और विशम नंबर वाले निजी वाहन एक-एक दिन के अंतराल से पांच दिन चलाए जाएंगे, लेकिन इस घोषणा के होते ही राश्ट्रीय हरित अधिकरण ने इस फैसले पर अजीबो-गरीब […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ngt-swords-on-delhi-air/article-3512"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/ngt.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण की जानलेवा भयानकता को देखते हुए एक बार फिर सम-विशम कारें सड़कों पर उतारने का फैसला लिया है। इसके मुताबिक सम और विशम नंबर वाले निजी वाहन एक-एक दिन के अंतराल से पांच दिन चलाए जाएंगे, लेकिन इस घोषणा के होते ही राश्ट्रीय हरित अधिकरण ने इस फैसले पर अजीबो-गरीब ढंग से रोक लगा दी।</p>
<p style="text-align:justify;">एनजीटी ने कहा है कि दिल्ली सरकार के इस आदेश पर वह प्रतिबंध तो नहीं लगा रहा है, लेकिन इस फॉर्मूेले को उसकी अनुमति के बाद ही लागू किया जाए। अब इस द्विअर्थी इबारत का क्या अर्थ निकाला जाए ? एनजीटी की स्थापना बिगड़ते पर्यावरण को सुधारने के लिए की गई थी, बावजूद उसने यह विरोधाभासी आदेश क्यों दिया यह समझ से परे है।</p>
<p style="text-align:justify;">एनजीटी ने दिल्ली में हेलीकॉप्टर से पानी छिड़काव की सलाह भी दी है। लेकिन यह सुझाव खर्चीला होने के कारण अप्रासंगिक है। हालांकि दिल्ली सरकार ने फायर बिग्रेडों के जरिए पेड़ों की धुलाई शुरू कर दी है। जिससे पेड़ों की वायु प्रदूषण सोखने की क्षमता बढ़ जाए। लेकिन यह उपाय कितना कारगर साबित होगा, यह कालांतर में पता चलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले साल भी दिल्ली में सम-विशम फॉर्मूला लागू किया गया था। तब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण वोट ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो यह साबित करे कि सम-विशम योजना लागू करने से वायु प्रदूषण नियंत्रित हुआ हो ? दिल्ली सरकार के साथ संकट यह भी है कि जब भी वह प्रदूषण नियंत्रण के परिप्रेक्ष्य में पहल करती है तो दिल्ली के उपराज्यपाल आदेश में रोड़ा अटका देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर सर्वोच्च न्यायालय भी यह दलील देता है कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के संवैधानिक प्रमुख हैं। लिहाजा दिल्ली सरकार के लिए उनकी सहमति अनिवार्य है। अब सवाल उठता है कि क्यों नहीं कि जब दिल्ली में वायु प्रदूषण की भयानकता के चलते जब 20 प्रतिशत रोगियों की वृद्घि एकाएक हो गई हो, तब उपराज्यपाल पर भी क्यों नहीं यह जिम्मेवारी डाली जाती कि वे इस समस्या के निदान की दिशा में पहल करें।</p>
<p style="text-align:justify;">यह तब और जरूरी हो जाता है। जब किसी महानगर के नागरिकों को घर से बाहर न निकलने की सलाह दी जाए। सारे विद्यालय बंद करना पड़ें। ऐसा अकसर सांप्रदायिक तनाव या युद्घ की स्थिति बनने पर होता है। लेकिन देश की राजधानी धुंआ-धुंआ हुई दिल्ली को प्रदूशित वायु के कहर बरप जाने के कारण झेलना पड़ रहा है। इसके फौरी कारण हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश के खेत में फसलों के जलाए जा रहे अवशेष बताए जा रहे हैं। डंठल जलाने कोई नई बात नहीं है, ये हजारों साल से चली आ रही परंपराए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए सारा दोष इन पर मढ़ना, मूल समस्या से ध्यान भटकाना है। असली वजह बेतरतीब होता शहरीकरण और दिल्ली में बढ़ते वाहन हैं। इन वाहनों से निकले धुंए की वजह से पहली बार पता चला है कि हम अपने पेड़-पौधों में कार्बन डाईआॅक्साइड सोखने की क्षमता खो रहे हैं। संयुक्त राष्टÑ के एक ताजा शोध से भी पता चला है कि वायु प्रदूशण के चलते दुनिया में 30 करोड़ बच्चों को जहरीली हवा में सांस लेनी पड़ रही है। इस स्थिति के चलते भारत में प्रति वर्श 25 लाख लोगों की मौतें हो रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही स्थिती बनी रही तो दिल्ली से लोग पलायन को मजबूर हो जाएंगे।जाड़ों के शुरू होने से पहले और दीवाली के आसपास पिछले कई सालों से यही हालात पैदा हो रहे हैं। जागरूकता के तमाम विज्ञापन छपने के बावजूद न तो आतिशबाजी का इस्तेमाल कम हुआ और न ही पराली जलाने पर अंकुश लगा। पराली जलाने पर तो जुर्माना वसूलने तक की बात कही गई थी। लेकिन ठोस हकीकत तो यह है कि किसानों के पास पलारी को जलाकर नश्ट करने के अलावा कोई दूसरा उपाय है ही नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि केंद्र व राज्य सरकारें विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च करने की बजाय पराली से आधुनिक ईंधन, जैविक खाद और मवेशियों का आहार बनाने वाली मशीनें धान की ज्यादा पैदावार वाले क्षेत्रों में लगवा देतीं, तो कहीं ज्यादा बेहतर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में ठूंठ व कचरा नहीं जलाने की अपील की थी, लेकिन इस अव्यावहारिक नसीहत का कोई असर नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के नजरिये से पिछले साल राष्ट्रीय हरित पंचाट ने कई कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए थे। उनमें से बाहरी ट्रकों के शहर में प्रवेश पर रोक लगाने की कोशिश की थी। निजी वाहनों के लिए प्रायोगिक तौर पर एक दिन सम और दूसरे दिन विशम कारें चलाने की योजना लागू की गई। ज्यादा डीजल खाने वाली नई कारों के पंजीयन पर आंशिक रोक लगाई गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों के खिलाफ भी सख्ती बरतने की बात कही गई थी। दस साल पुरानी कारों को सड़कों से हटाने के निर्देश दिए गए। लेकिन परिणाम शून्य रहा। यहां तक की वाहनों के बेवजाह इस्तेमाल की आदत पर भी अंकुश लगाना संभव नहीं हो सका। मसलन बीमारी को जान लेने के बाद भी हम उसका इलाज नहीं कर पा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचने की यही सबसे बड़ी विडंबना है। लिहाजा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार वायुमंडल में बढ़ रहा है।अब तक तो यह माना जाता रहा था कि वाहनों और फसलों के अवशेषों को जलाने से उत्पन्न होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में पेड़-पौधों की अहम् भूमिका रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पेड़ अपना भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया में कार्बन डाइआॅक्साइड सोखते हैं और आॅक्सीजन छोड़ते हैं। यह बात सच भी है, मगर अब पहली बार देश और दुनिया में यह तथ्य सामने आया है कि बढ़ता प्रदूषण पेड़-पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता घटा रहा है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के लिए जिस तरह से पेड़ों को काटा जा रहा है, इस कारण भी पेड़ों की प्रकृति में बदलाव आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">शहरों को हाईटैक एवं स्मार्ट बनाने की पहल भी कहर ढाने वाली है।वाहनों की अधिक आवाजाही वाले क्षेत्रों में पेड़ों में कार्बन सोखने की क्षमता 36़75 फीसदी कम पाई गई है। यह तथ्य देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के ताजा शोध से सामने आया है। संस्थान की जलवायु परिवर्तन व वन आकलन प्रभाव विभाग के वैज्ञानिक डॉ हुकूम सिंह ने ‘फोटो सिंथेसिस एनालाइजर‘ से कर्बन सोखने की स्थिति का पता लगाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">लैगेस्ट्रोमिया स्पेसियोसा नाम के पौधे पर यह अध्ययन किया गया। इसके लिए हरियाली से घिरे वन अनुसंधान संस्थान और वाहनों की अधिक आवाजाही वाली देहरादून की चकराता रोड का चयन किया गया है। बाद में इन नतीजों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद उपरोक्त स्थिति सामने आई।संस्थान के परिसर में पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता 9़96 माइक्रो प्रति वर्गमीटर प्रति सेकेण्ड पाई गई।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि चकराता मार्ग पर पौधों में यह दर महज 6़3 रही। इसके कारणों की पड़ताल करने पर ज्ञात हुआ कि पौधों की पत्तियां प्रदूषण से ढंक गईं। इस हालत में पत्तियों के वह छिद्र अत्याधिक बंद पाए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">जिनके माध्यम से पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेशण (फोटो सिंथेसिस) की क्रिया कर कार्बन डाइआॅक्साइड सोखते हैं। छिद्रो को खोलने के लिए पौधे से भीतर से दबाव भी डालते हैं। दबाव का यह उल्लघंन का ग्राफ भी वन परिसर के पौधों की तुलना में चकराता मार्ग के पौधों में तीन गुना अधिक रिकोर्ड किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह अध्यन संकेत दे रहा है कि इंसान ही नहीं प्रदूशित वायु से पेड़-पौधे भी बीमार होने लग गए हैं। इसलिए जिस तरह पर्यावरण पर चौतरफा मार पड़ रही है, उसे सुधारने के लिए भी चहुंमुखी प्रयास करने होंगे। हर समस्या को लेकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने या फिर जनहित याचिका न्यायालय के दिशा निर्देशों से भी कोई कारगार परिणाम निकलने वाले नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रमोद भार्गव</strong></p>
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                <pubDate>Sun, 12 Nov 2017 03:30:44 +0530</pubDate>
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