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                <title>फिल्म व समाचार को अलग ही रहने दें</title>
                                    <description><![CDATA[समाचार व फिल्म में अंतर होता है। समाचार सच्चाई, तथ्यों व सबूतों से संबंधित होते हैं। इसके विपरीत फिल्म में काल्पिनक कहानी होती है जो मनोरंजन से भरपूर होती है। समाचार शीर्षक पढ़ते ही समझ आती है लेकिन फिल्म में दर्शक की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए सच्चाई को छुपाया जाता है, फिर प्रकट किया जाता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/leave-film-and-news-aside/article-3514"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/channel.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">समाचार व फिल्म में अंतर होता है। समाचार सच्चाई, तथ्यों व सबूतों से संबंधित होते हैं। इसके विपरीत फिल्म में काल्पिनक कहानी होती है जो मनोरंजन से भरपूर होती है। समाचार शीर्षक पढ़ते ही समझ आती है लेकिन फिल्म में दर्शक की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए सच्चाई को छुपाया जाता है, फिर प्रकट किया जाता है। आज समाचार युग में एक नया रूझान चल पड़ा है जिसे देखकर पता ही नहीं लगता कि व्यक्ति समाचार देख रहा है या फिल्म। जिस प्रकार फिल्म का अंत अचानक हैरान करने वाला होता है। फिल्म की कहानी अंत में बिल्कुल बदल जाती है। उसी प्रकार आजकल समाचार देखने को मिल रहे हैं, जिनका अंत किसी फिल्म से कम नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार के अधिकतर कहानीनुमा समाचार सनसनीखेज होते हैं। दर्शक टीवी से जुड़कर बैठ जाते हैं व समाचार की बात को समझने का प्रयास करते दर्शक उस वक्त हैरान हो जाते हैं जब समाचार पेश करने वाला व्यक्ति यह कहता कि यह समाचार झूठा था और इस प्रकार यकीन नहीं किया जा सकता। यह सरासर समाचार के सिद्धांतों व दर्शकों की भावना से खिलवाड़ है। इस प्रकार के अनगिनत उदाहरण हैं। ताजा उदाहरण रांची की एक मुस्लिम योग अध्यापिका का है, जिसके बारे में कहा गया कि मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने उसके खिलाफ फतवा जारी किया है व धर्म बदलने की धमकी दी है। यह भी कहा गया है कि अध्यापिका के घर शरारती तत्वों ने पथराव किया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला सुनकर प्रदेश के डीजीपी अध्यापिका के घर गए। अध्यापिका के पिता ने अधिकारियों को बताया कि यह सारा मामला झूठा है। कोई फतवा जारी नहीं हुआ। दूसरी दिन समाचार आता है कि वायरल हुई स्टोरी गलत थी लेकिन इस अफवाह को मीडिया में समाचार बनाकर पेश किया गया था। समाचार के कई विशेषज्ञ तो वायरल वस्तुओं का विश्लेषण भी करते हैं। विश्लेषण के बाद कोई ना कोई परिणाम आता है लेकिन कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कि यह तो सारा झूठ था तो परिणाम क्या होगा। दरअसल समाचार सिद्धांतों पर आधारित होता है, जिसके लिए मेहनत, लगन, व समर्पण से तथ्यों पर आधारित सच्चाई की तलाश की जाती है। लेकिन आजकल सबसे आगे निकलने की होड़ में समाचारों को मसाला लगाकर पेश किया जाता है। जिस प्रकार सियार को शेर की खाल पहनाकर शेर नहीं बनाया जा सकता उसी तरह अफवाहों को समाचार का रंग देकर समाचार नहीं बनाया जा सकता। समाचार अपने द्वारा नहीं बनाए जाते बल्कि पत्रकारों द्वारा तथ्यों को आधार बनाकर पेश किए जाते हैं। फिर ही दर्शकों से न्याय होगा, समाचार को समाचार ही रहने दिया जाएगा।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Nov 2017 03:36:00 +0530</pubDate>
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