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                <title>Gender Equality - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>लैंगिक समानता की दिशा में अदालत का एक अहम फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[शीर्ष अदालत के हालिया फैसले के बाद अब महिला अधिकारियों को 10 ब्रांच में स्थायी कमीशन मिलेगा। जिनमें आर्मी एविएशन कोर, सिग्नल, इंजीनियरिंग, आर्मी एयर डिफेंस, मेकेनिकल इंजीनियरिंग, आर्मी सर्विस कोर, आर्मी ऑर्डिनेंस और इंटेलिजेंस शामिल है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/an-important-decision-of-the-court-on-gender-equality/article-13242"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/an-important-decision-of-the-court-on-gender-equality.jpeg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:center;"><strong>सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए, महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने का फैसला दिया। अदालत का यह फैसला, सभी सेवारत महिला अधिकारियों पर लागू होगा। 14 साल से ज्यादा समय से नौकरी कर रही और स्थायी कमीशन का विकल्प नहीं लेने वाली महिला अधिकारी 20 साल तक नौकरी में रह सकेंगी, ताकि उन्हें पेंशन की पात्रता मिल जाए।</strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;">देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना में महिला अधिकारों और समानता को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि अगर कोई महिला अफसर स्थायी कमीशन चाहती है, तो उसे इससे वंचित नहीं किया जा सकता। भले ही उनकी नौकरी 14 साल से अधिक हो गई हो। उन सभी महिला अफसरों को तीन महीने के अंदर सेना में स्थायी कमीशन दिया जाए, जो यह विकल्प चुनना चाहती हैं। महिलाओं को शारीरिक आधार पर परमानेंट कमीशन न देना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। अदालत ने इसके लिए मार्च, 2019 के बाद सेना से जुड़ने की सरकारी शर्त भी हटा दी। अदालत ने परमानेंट कमीशन देने के हाई कोर्ट के आदेश पर एक दशक तक अमल न करने पर, केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई, इसके बावजूद केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू नहीं किया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अदालत ने केन्द्र सरकार की इन दलीलों कि सेना में ज्यादातर जवान ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और महिला अधिकारियों से फौजी हुक्म लेना उनके लिए सहज नहीं होगा। महिलाओं की शारीरिक स्थिति और पारिवारिक दायित्व जैसी बहुत सी बातें उन्हें कमांडिंग अफसर बनाने में बाधक हैं, को स्पष्ट तौर पर खारिज करते हुए कहा कि सरकार, अपने दृष्टिकोण और मानसिकता में बदलाव लाए। उसकी यह सोच, अतार्किक और समानता के अधिकार के खिलाफ है। महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने से इंकार, स्टीरियोटाइप्स पूर्वाग्रह का उदाहरण है। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। महिला अधिकारी अपने पराक्रम में कहीं से भी कम नहीं हैं। अदालत ने अपने फैसले में जो भी बातें कहीं हैं, वे सही भी हैं। इस तरह के मामलों में पहले भी शीर्ष अदालत ने लैंगिक समानता का पक्ष लिया है और लिंग के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव को गलत ठहराया है। सच बात तो यह है कि केंद्र सरकार ने महिलाओं को सेना में स्थाई कमीशन न देने की अदालत में जो दलीलें पेश की थीं, वे न सिर्फ दकियानूस और प्रतिगामी थीं, बल्कि सेना में महिलाओं के असाधारण प्रदर्शन के रिकॉर्ड से भी मेल नहीं खातीं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अदालत ने अपने इस अहमतरीन फैसले में बाकायदा देश की उन 11 महिला सैन्य अधिकारियों जिसमें कैप्टन तानिया शेरगिल, ले. कर्नल सोफिया कुरैशी और मेजर मधुमिता शामिल हैं, की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियां गिनाई, जिन्होंने अपने बहादुरी भरे कारनामों से देश का सम्मान बढ़ाया और जिन्हें सेना पदक समेत कई वीरता पदक मिल चुके हैं। इन महिला अफसरों ने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में भी भाग लिया है और पुरस्कार प्राप्त किए हैं। लिहाजा सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं के योगदान को शारीरिक संरचना के आधार पर कमतर आंकना सरासर गलत है। पुरूष समकक्षों के मुकाबले उन्हें कमतर समझा जाना, पुरुषग्रंथी के सिवाय और कुछ नहीं। महिला होने के आधार पर उनकी क्षमता पर सवाल उठाना न सिर्फ उनकी महिला होने की गरिमा का निरादर है, बल्कि भारतीय सेना के एक सम्मानित सदस्य का भी निरादर है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">जाहिर है अदालत के इस फैसले से सेना में महिलाओं को आगे आने का मौका मिलेगा। थलसेना में उन्हें स्थायी कमीशन और कमांड पोस्टिंग दिए जाने का रास्ता खुलेगा। फैसले से सेना में सेवारत 1,653 महिला सैन्य अधिकारियों को फायदा होगा। महिला होने के आधार पर उन्हें स्थायी कमीशन से वंचित नहीं किया जा सकेगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2010 में उनके हक में फैसला सुनाया। सितंबर, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले पर अपनी मोहर लगा दी थी। बावजूद इसके केंद्र सरकार ने इस पर अमल नहीं किया। हाईकोर्ट के फैसले के नौ साल बाद, फरवरी 2019 में सरकार ने सेना के 10 विभागों में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की नीति बनाई, लेकिन साथ में यह शर्त भी जोड़ दी कि इसका फायदा, मार्च 2019 के बाद से सर्विस में आने वाली महिला अफसरों को ही मिलेगा। इस तरह वे महिलाएं स्थायी कमीशन पाने से वंचित रह गईं, जिन्होंने इस मसले पर लंबे अरसे तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">मामला फिर अदालत में पहुंचा और सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए, महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने का फैसला दिया। अदालत का यह फैसला, सभी सेवारत महिला अधिकारियों पर लागू होगा। 14 साल से ज्यादा समय से नौकरी कर रही और स्थायी कमीशन का विकल्प नहीं लेने वाली महिला अधिकारी 20 साल तक नौकरी में रह सकेंगी, ताकि उन्हें पेंशन की पात्रता मिल जाए। देश में महिलाएं 88 साल से भारतीय सेनाओं में हैं। सबसे पहले साल 1927 में महिलाओं को सेना में नर्सिंग सेवाओं की खातिर शामिल किया गया था। फिर उसके बाद साल 1943 में चिकित्सा अधिकारी के तौर पर उन्हें सेना में जगह मिली।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">बहरहाल एक लंबे अंतराल के बाद साल 1992 में भारतीय सशस्त्र सेना की दीगर इकाइयों में भी महिलाओं को शामिल होने की इजाजत दी गई। समय के साथ हमारी सेना में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन जनसंख्या में उनकी भागीदारी के मुताबिक अभी भी वह उतनी नहीं है, जितनी की होनी चाहिएं। सेना की तीनों कमानों में कुल सैन्य अफसरों में महज 3.80 फीसदी महिला अफसर हैं। साल 2008 में सेना की दो ब्रांच में महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया गया। जिसमें जज एडवोकेट जनरल और आर्मी एजुकेशन कोर शामिल हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">महिला अधिकारियों को कॉम्बैट रोल न देने के पीछे अक्सर यह दलीलें दी जाती है कि शारीरिक तौर पर वे पुरुषों के मुकाबले कमतर हैं। वे असाधारण परिस्थितियों को सामना नहीं कर सकतीं। महिलाएं 20 दिन पेट्रोलिंग ड्यूटी पर नहीं जा सकतीं, सियाचिन जैसी जगहों में वे ड्यूटी नहीं कर सकतीं। महिलाओं को पुरुष जवानों के साथ रहने में परेशानी होगी आदि-आदि। यह दलील भी दी जाती है कि अगर महिला अफसर को युद्धबंदी बना लिया गया तो फिर क्या होगा? जाहिर है कि यह सारी दलीलें तर्कसंगत नहीं। सच बात तो यह है कि लैंगिक भेदभाव की वजह से महिलाएं, पुरुषों से पीछे रही हैं। वरना उनकी काबिलियत में कहीं कोई कमी नहीं। अनुशासन, समर्पण, पराक्रम और सेना की प्रतिष्ठा बनाए रखने में महिलाएं कम नहींं। सेना में कॉम्बैट भूमिका भी वे बेहतर तरीके से निभ़ा सकती हैं। सेना में कई बार ऐसे मौके आए हैं, जब महिलाओं ने अपनी काबिलियत बेहतर तरीके से दिखलाई है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वायुसेना में जब उन्हें कॉम्बैट भूमिका मिली, फाइटर विमान उड़ाने का मौका मिला, तो उन्होंने यहां भी अपने आप को साबित कर दिखाया। पुरुषों की तरह महिलाएं भी सेना के हर क्षेत्र में काम कर सकती हैं, बस जरूरत उन्हें और अधिक मौका देने की है। सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का शीर्ष अदालत का फैसला, निश्चित तौर पर लैंगिक समानता की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। सच मायने में महिलाएं और भी ज्यादा सशक्त होंगी। अदालत ने अपने फैसले से सेना में महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को खत्म किया है। महिला-पुरुष के बीच समानता का संदेश दिया है। इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। पूरे देश में लड़कियों को उन क्षेत्रों में भी आगे आने की प्रेरणा मिलेगी, जिनमें पुरुषों का विशेषाधिकार माना जाता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">शीर्ष अदालत के हालिया फैसले के बाद अब महिला अधिकारियों को 10 ब्रांच में स्थायी कमीशन मिलेगा। जिनमें आर्मी एविएशन कोर, सिग्नल, इंजीनियरिंग, आर्मी एयर डिफेंस, मेकेनिकल इंजीनियरिंग, आर्मी सर्विस कोर, आर्मी ऑर्डिनेंस और इंटेलिजेंस शामिल है। महिलाएं अब सेना में पूर्णकालिक रूप से कर्नल या उससे ऊपर रैंक पर पदस्थ हो सकती हैं। एक महिला कर्नल अब 850 पुरुषों की एक बटालियन की कमान संभाल सकती है। महिलाएं योग्यता के आधार पर ब्रिगेडियर, मेजर जनरल, लेफ्टिनेंट जनरल और सैद्धांतिक रूप से सेना प्रमुख के पद तक बढ़ सकती हैं। अलबत्ता महिलाओं को कॉम्बैट रोल यानी युद्धक भूमिका देने का फैसला अदालत ने सरकार और सेना पर छोड़ दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि युद्धक भूमिका में महिलाओं की तैनाती नीतिगत विषय है। इस पर संबंधित अधिकारियों को निर्णय लेना चाहिए।</h6>
<h6 style="text-align:right;"><em>जाहिद खान</em></h6>
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                <pubDate>Tue, 25 Feb 2020 01:06:41 +0530</pubDate>
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                <title>लिंगानुपात में असंतुलन की गंभीर समस्या</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय समाज में बेटा-बेटी में फर्क करने की मानसिकता में बदलाव लाने और लड़कियों की दशा और दिशा सुधारने के लिए पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्तर पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कई महत्वपूर्ण अभियान चलाए जाने के बावजूद हाल ही में ‘नीति आयोग’ की जो चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, वह बेहद […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/problem-of-imbalance-in-gender-equality/article-3560"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/save-child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय समाज में बेटा-बेटी में फर्क करने की मानसिकता में बदलाव लाने और लड़कियों की दशा और दिशा सुधारने के लिए पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्तर पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कई महत्वपूर्ण अभियान चलाए जाने के बावजूद हाल ही में ‘नीति आयोग’ की जो चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, वह बेहद चिंताजनक है। ‘हैल्दी स्टेट्स एंड प्रोग्रेसिव इंडिया’ (स्वस्थ राज्य और प्रगतिशील भारत) नामक इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 21 बड़े राज्यों में से 17 में लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">जन्म के समय लिंगानुपात मामले में 10 या उससे अधिक अंकों की गिरावट वाले राज्यों में प्रधानमंत्री के गृह राज्य ‘गुजरात’ की हालत सबसे खराब है, जहां लिंगानुपात 53 अंकों की गिरावट के साथ 907 से घटकर महज 854 रह गया है। कन्या भ्रूण हत्या के लिए पहले से ही बदनाम हरियाणा लिंगानुपात मामले में 35 अंकों की गिरावट के साथ दूसरे स्थान पर है जबकि राजस्थान में 32, उत्तराखण्ड 27, महाराष्ट्र 18, हिमाचल प्रदेश 14, छत्तीसगढ़ 12 और कर्नाटक में 11 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में लिंगानुपात में क्रमश: 19, 10 व 9 अंकों का सुधार हुआ है, जो आशाजनक तो है किन्तु यह स्थिति भी ऐसी नहीं है, जिसे लेकर हम ज्यादा उत्साहित हो सकें क्योंकि लिंगानुपात में मामूली सुधार के बावजूद इन राज्यों की स्थिति भी इस मामले में कोई बहुत बेहतर नहीं है। नीति आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी भी प्रति 1000 पुरूषों पर महिलाओं की संख्या मात्र 879 है जबकि बिहार में यह संख्या 916 है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा शुरू से ही ‘कन्या भ्रूण हत्या’ को निरूत्साहित करने के लिए जिस तरह की योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाता रहा है, उसके बावजूद लिंगानुपात के बिगड़ते संतुलन की इस तरह की रिपोर्ट सामने आना वाकई हमारे लिए गंभीर चुनौती है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘लाडली बेटी योजना’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ सरीखी सरकारी योजनाओं के अलावा विशेष रूप से मीडिया द्वारा चलाया गया कैंपेन ‘सेल्फी विद डॉटर’ नारी सशक्तिकरण की दिशा में बहुत अच्छे प्रयास किए गए किन्तु हालिया रिपोर्ट को देखें तो इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के परिणाम आशाजनक नहीं रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में यह गंभीर सवाल उठ खड़ा जाता है कि आखिर हमारे प्रयासों में कहां कमी रह गई?दरअसल हम आज भले ही 21वीं सदी में जी रहे हैं किन्तु हमारी रूढ़िवादी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। लिंग परीक्षण को लेकर देश में कड़े कानूनों के बावजूद आज भी अधिकांश लोग बेटे की ख्वाहिश के चलते लिंग परीक्षण का सहारा ले रहे हैं, जिससे कन्या भ्रूण हत्याएं जारी हैं या फिर बेटे की चाह में ज्यादा बच्चों को जन्म दे रहे हैं, जिससे अनचाही लड़कियों की संख्या बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में इस दौरान 2.1 करोड़ अनचाही लड़कियों का जन्म हुआ है। एक अन्य रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ है कि पिछले कई वर्षों से प्रतिवर्ष देश में 3 से 7 लाख कन्या भ्रूण नष्ट कर दिए जाते रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश में महिलाओं की संख्या पुरूषों की तुलना में करीब पांच करोड़ कम है। विड़म्बना ही है कि नारी को या तो जन्म लेने से पहले ही कन्या भ्रूण हत्या के रूप में समाप्त करने के प्रयास होते हैं या फिर उसे दहेज की बलिवेदी पर जिंदा जला डालने की कुत्सित कोशिशें।</p>
<p style="text-align:justify;">यह अजीब विड़म्बना है कि एक ओर जहां हिन्दुओं में लड़की को ‘घर की लक्ष्मी’ अथवा ‘देवी’, वहीं मुस्लिमों में बेटियों को ‘नेमत’ माना गया है, उसके बाद भी लड़कियों के साथ जिस तरह का दोयम व्यवहार किया जा रहा है, वह न केवल हमारी खोखली और विकलांग सामाजिक मानसिकता का परिचायक है, वहीं हमारी कथित आधुनिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त है। आधुनिक युग में भी हमारी विकलांग मानसिकता का अनुमान इस उदाहरण से सहजता से लगाया जा सकता है। हाल ही में राजस्थान के करौली जिले में एक 83 वर्षीय बुजुर्ग सुखराम बैरवा ने अपनी पत्नी की सहमति से अपने से 53 वर्ष छोटी युवती रमेशी बैरवा से सिर्फ इसलिए शादी की ताकि उसे पुत्र की प्राप्ति हो सके क्योंकि उसे अपनी पहली पत्नी से पुत्र प्राप्त नहीं हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पहले माना जाता था कि लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन का बड़ा कारण समाज में अशिक्षा और अंधविश्वास है और इसी कारण लड़के-लड़कियों में भेदभाव किया जाता रहा है किन्तु आज शिक्षित समाज में भी इस समस्या का निदान होने के बजाय यह समस्या नासूर की भांति फैल रही है बल्कि जिस प्रकार हालिया रिपोर्ट में देखा गया है कि देश के न्यूनतम साक्षर राज्य बिहार में लिंगानुपात की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है और शिक्षित राज्यों में हालत बिगड़ी है, यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में जहां वर्ष 1950 में लैंगिक अनुपात 970 के करीब था, वह वर्ष 2011 की जनगणना में 939 रह गया था। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी लैंगिक अनुपात में आई गिरावट को लेकर चिंता जताते हुए इसका कारण जानना चाहा था। एक सरकारी अध्ययन में तो यह भी सामने आया है कि अगर यही हालात रहे तो वर्ष 2031 तक प्रति 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या सिर्फ 898 रह जाएगी। लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन के खतरनाक परिणामों का आभास इसी से हो जाता है कि आज कुछ जगहों पर लोग बेटों की शादी के लिए दूसरे राज्यों से गरीब परिवारों की लड़कियों को खरीदकर लाने लगे हैं। ‘कन्या भ्रूण हत्या’ के लिए बदनाम हरियाणा जैसे राज्य में तो ‘मोलकी’ नामक यह प्रथा कुछ ज्यादा ही प्रचलित हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों के अपहरण की घटनाएं भी जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे हमारा सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2016 की एक रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ है कि देशभर में कुल 66225 लड़कियों का अपहरण हुआ, जिनमें से 33855 लड़कियों का अपहरण सिर्फ शादी के लिए ही किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">नीति आयोग की रिपोर्ट में ‘पूर्व गभार्धान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994’ (पीसीपीएनडीटी) को लागू करने तथा लड़कियों के महत्व के बारे में प्रचार करने के लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया गया है और राज्यों से लिंग चयन कर गर्भपात की प्रवृत्ति पर कड़ाई से अंकुश लगाने का आग्रह किया गया है। हालांकि यह सुखद बात है कि हमारे समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है बल्कि कई क्षेत्रों में लड़कियां लड़कों से कहीं आगे हैं लेकिन लैंगिक असमानता को लेकर जब तक लोगों की मानसिकता में अपेक्षित बदलाव नहीं आता, हालात में सुधार की उम्मीद बेमानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने की बात है तो नारी सशक्तिकरण और बेटियों को गरिमामयी जीवन देने के लिए सरकार द्वारा कई बेहतरीन योजनाएं तो चलाई जा रही हैं लेकिन यहां यह ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि विभिन्न सरकारी योजनाएं सरकारी फाइलों या विभिन्न मंचों पर सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा फोटो खिंचवाने की प्रथा तक ही सीमित होकर रह जाएं। इसके लिए युद्धस्तर पर जनजागरण अभियान की भी महत्ती आवश्यकता है।</p>
<p><em>योगेश कुमार गोयल</em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Feb 2018 00:07:32 +0530</pubDate>
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