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                <title>Burden - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>स्लम बस्तियां हरियाणा पर बड़ा बोझ</title>
                                    <description><![CDATA[ प्रदेश के 75 टाउन में 3 लाख 32 हजार 697 स्लम हाउसहोल्ड Slums अश्वनी चावला/सच कहूँ चंडीगढ़। 21वीं सदी की तरफ बढ़ रहे देश में हरियाणा एक ऐसा राज्य है, जहां पर स्लम बस्तियां (Slums) खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। हालांकि केन्द्र सरकार ने स्लम बस्तियों के स्लम बस्तियों को खत्म […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/slums-are-a-big-burden-on-haryana/article-11868"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/slums-in-haryana.jpg" alt=""></a><br /><h2><strong> प्रदेश के 75 टाउन में 3 लाख 32 हजार 697 स्लम हाउसहोल्ड Slums<br />
</strong></h2>
<p><strong>अश्वनी चावला/सच कहूँ</strong><br />
चंडीगढ़। 21वीं सदी की तरफ बढ़ रहे देश में हरियाणा एक ऐसा राज्य है, जहां पर स्लम बस्तियां (Slums) खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। हालांकि केन्द्र सरकार ने स्लम बस्तियों के स्लम बस्तियों को खत्म करने के साथ-साथ इनकी रिहैबिलिटेशन के भी आदेश दिए हैं। परंतु पिछले 10 सालों में राज्य सरकार इस दिशा में ज्यादा अच्छा काम नहीं कर पाई है। इसके साथ ही इन बस्तियों में रहने वालों की तादाद निरंतर बढ़ रही है।<br />
केन्द्र सरकार के अनुसार हरियाणा में इस समय 75 से ज्यादा टाउनों में स्लम बस्तियां हैं। हरियाणा के इन टाउनों 3 लाख 32 हजार 697 से ज्यादा घर कच्चे बन चुके हैं। वहीं स्लम बस्तियों में 16 लाख 62 हजार 305 लोग रह रहे हैं।</p>
<h3>नागरिकता भी खड़ा हो सकता है सवाल Slums</h3>
<p>हरियाणा की इन स्लम बस्तियों में रह रहे लोगों की नागरिकता पर भी एक बड़ा सवाल उठता नजर आ रहा है। क्योंकि देश में लागू हुए नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता तो दी जानी है। परंतु स्लम बस्तियों में रहने वाले लोगों का पुराना कोई रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है। ये लोग कहां से आए हैं और कब आकर हरियाणा में बसे हैं। हालांकि इन लोगों ने अब राशन कार्ड और आधार कार्ड बनवाना शुरू कर दिया है। लेकिन कुल संख्या के हिसाब से यह आंकड़ा बहुत कम है। इसलिए जिन लोगों के राशन कार्ड और आधार कार्ड नहीं बने हैं, उनकी नागरिकता पर सवाल उठ सकता है। इस मामले में ज्यादा स्थिति नागरिकता संशोधन कानून के बाद एनआरसी में स्पष्ट हो पाएगी। क्योंकि देखना दिलचस्प होगा कि इन लोगों में से कितने लोगों को नागरिकता मिलेगी।</p>
<p><strong>किस जिले की स्लम बस्तियों में कितने लोग</strong><br />
<strong>जिला                                                    जनसंख्या</strong></p>
<p>महेंद्रगढ़                                            9 हजार 18<br />
मेवात                                                15 हजार 928<br />
पलवल                                              20 हजार 646<br />
पानीपत                                             22 हजार 188<br />
सिरसा                                               30 हजार 291<br />
पंचकूला                                             49 हजार 247<br />
फतेहाबाद                                          53 हजार 620<br />
रोहतक                                              55 हजार 985<br />
भिवानी                                             61 हजार 66<br />
रिवाड़ी                                               64 हजार 904<br />
कुरुक्षेत्र                                              69 हजार 23<br />
अम्बाला                                            69 हजार 303<br />
झज्जर                                              75 हजार 876<br />
करनाल                                             82 हजार 257<br />
कैथल                                                93 हजार 960<br />
यमुनानगर                                        94 हजार 453<br />
सोनीपत                                            1 लाख 18 हजार 208<br />
जींद                                                  1 लाख 21 हजार 270<br />
गुरुग्राम                                            1 लाख 69 हजार 549<br />
हिसार                                               1 लाख 70 हजार 462<br />
फरीदाबाद                                         2 लाख 15 हजार 53</p>
<h3>फरीदाबाद में अव्वल</h3>
<p>हरियाणा के साफ-सुथरे शहरों में शुमार फरीदाबाद स्लम बस्तियों के मामले में भी सबसे आगे है। इस समय राज्य की 12.94 फीसदी स्लम बस्तियों के साथ-साथ इन बस्तियों में रहने वाली जनसंख्या भी सबसे ज्यादा है। राज्य के 16 लाख 62 हजार लोगों में से 2 लाख 15 हजार 53 लोग फरीदाबाद की स्लम बस्तियों में ही रह रहे हैं।</p>
<h3>प्रधानमंत्री आवास योजना का सहारा</h3>
<p>स्लम बस्तियों के कच्चे घरों में रहने वाले लोगों को रिहैबिलिटेशन के लिए कई योजनाएं है। वहीं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भी इन लोगों को लाभ मिल सकता है। इसके लिए राज्य सरकार के पास आवेदन करना होगा। इसमें इन्हें अपनी नागरिकता के सुबूत के साथ सालाना आय डेढ़ लाख से कम होने का प्रमाण देना होगा।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Dec 2019 11:59:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>स्कूली बस्ते के बोझ तले सिसकता बचपन</title>
                                    <description><![CDATA[प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल कहा करते थे कि ज्ञान बस्ते के बोझ से नहीं शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है। उनकी अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी, वो मानते थे बच्चे पढ़ें तो खेल की तरह, वे किताबों से […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/childhood-under-the-burden-of-school-bags/article-3561"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/sachool-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल कहा करते थे कि ज्ञान बस्ते के बोझ से नहीं शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है। उनकी अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी, वो मानते थे बच्चे पढ़ें तो खेल की तरह, वे किताबों से मिलें तो खिलौनों की तरह, देश-दुनिया का ज्ञान उन्हें लुका-छिपी से भी आसान लगे तथा परीक्षाएं उन्हें दोस्तों के गप्प-ठहाकों से भी सहज लगें । हैरान करने वाली बात है कि उनके नेतृत्व वाली समिति ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम के बोझ में कम करने के लिए जो सिफारिशें की थी, उनको दो दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">देर से ही सही अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय छात्रों के स्कूली बस्तों का बोझ कम करने के इरादे से 2019 के सत्र से एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम आधा करने पर विचार कर रहा है,जो स्वागत योग्य है। लेकिन राज्य सरकारों और राज्य शिक्षा बोर्डो को भी इस पहल का सहभागी बनाने की सख्त दरकार है क्योंकि बस्ते का बोझ बच्चो की शिक्षा, समझ और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। एसोचैम के एक सर्वे के अनुसार, बस्ते के बढ़ते बोझ के कारण बच्चों को नन्हीं उम्र में ही पीठ दर्द जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है। इसका हड्डियों और शरीर के विकास पर भी विपरीत असर होने का अंदेशा जाहिर किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल जानेवाले करीब 68 प्रतिशत बच्चे, जिसमें विशेष तौर पर देखा जाए तो 7 से 13 वर्ष के करीब 88 फीसदी बच्चे पीठ दर्द या उससे जुड़ी समस्या का शिकार हो रहे हैं। इसका प्रमुख कारण किताबों की बोझ, स्पोर्ट किट और उनके बैग हैं, जो बच्चों के वजन से करीब 40 से 45 फीसदी तक ज्यादा होता है। यह सर्वे अहमदाबाद, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, बैंगलूरु, मुंबई, हैदराबाद, पुणे, लखनऊ, जयपुर और देहरादून में किया गया, जिसमें 25,00 छात्रों और 1,000 अभिभावकों से बातचीत की गई थी। अधिकतर अभिभावकों की शिकायतें थी कि आठ पीरियड के लिए बच्चे हर रोज करीब 20 से 22 किताबें स्कूल ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्कैट्स, ताइक्वांडो के साधन, स्विङ्क्षमग बैग और क्रिकेट किट भी कभी-कभार बच्चों को ले जाना पड़ता है ।</p>
<p style="text-align:justify;">हड्डी रोग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बच्चों के लगातार बस्तों के बोझ को सहन करने से उनकी कमर की हड्डी टेढ़ी होने की आशंका रहती है। अगर बच्चे के स्कूल बैग का वजन बच्चे के वजन से 10 प्रतिशत से अधिक होता है तो काइफोसिस होने की आशंका बढ़ जाती है। इससे सांस लेने की क्षमता प्रभावित होती है। भारी बैग के कंधे पर टांगने वाली पट्टी अगर पतली है तो कंधों की नसों पर असर पड़ता है। कंधे धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते हैं और उनमें हर समय दर्द बना रहता है। हड्डी के जोड़ पर असर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन जब से प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक मिला है,तभी से निजी स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते ही जा रहे हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि सरकारी स्कूल वालों के बस्ते निजी स्कूल वालों के बस्तों से काफी हल्के हैं।तथा सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा, गणित के अलावा एक या दो पुस्तकें हैं। लेकिन निजी स्कूलों के बस्तों का भार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे ज्ञानवृद्धि का कोई कारण नहीं है, बल्कि व्यापारिक रुचि ही प्रमुख है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज स्थिति यह है कि देश भर में लाखों बच्चों को भारी बस्ता ढोना पड़ रहा है। इनमें तमाम वे नामी-गिरामी स्कूल भी हैं जो कथित तौर पर पठन-पाठन के आधुनिक तरीके अपनाए हुए हैं। मोहल्ला ब्रांड अंग्रेजी स्कूलों के लिए तो भारी बस्ते शुभ लाभ कर रहे हैं। लेकिन बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर गैर-जरूरी दबाव बढ़ रहा है। तथा माता-पिता भी होमवर्क की चक्की में पिस रहे हैं। बच्चे की समझ में न आने पर उसे ट्यूशन के हवाले कर दिया जा रहा है और अपनी प्रारंभिक उम्र से ही बच्चा रटी-रटाई शिक्षा लेने पर मजबूर हो रहा है। जिससे उसकी मानसिक चेतना कहीं दब कर रह जाती है,तथा बच्चे का सर्वांगीण विकास भी बाधित होता है । ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता बच्चों का स्वास्थ्य होना चाहिए,इसके लिए सरकार को निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए अब आगे आना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-कैलाश बिश्नोई</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Feb 2018 00:11:01 +0530</pubDate>
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