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                <title>Political Parties - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>जंतर-मंतर पर फिर छलका पहलवानों का दर्द, प्रदर्शन कर रहे पहलवानों ने किया सभी राजनैतिक दलों का स्वागत</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। डब्ल्यू एफ आई के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे पहलवानों का धरना सोमवार को भी जारी है। पहलवानों बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट व साक्षी मलिक ने बीती रात एक विडियो जारी करके उनके समर्थन में जंतर-मंतर पर पहुंचने की लोगों से अपील की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sports/wrestlers-protesting-at-jantar-mantar-welcomed-all-political-parties/article-46641"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-04/jantar-mantar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> डब्ल्यू एफ आई के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे पहलवानों का धरना सोमवार को भी जारी है। पहलवानों बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट व साक्षी मलिक ने बीती रात एक विडियो जारी करके उनके समर्थन में जंतर-मंतर पर पहुंचने की लोगों से अपील की है। उल्लेखनीय है कि प्रदर्शन कर रहे पहलवान रविवार की पूरी रात सड़कों पर पड़े रहे। पहलवानों के समर्थन में अब उनके परिजन भी आ गए हैं। इसी दौरान बजरंग पूनिया ने मंच पर सभी राजनैतिक दलों का स्वागत किया है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली पुलिस सांसद बृजभूषण के खिलाफ लगे आरोपों की जांच में जुट गई है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या हैं रेसलर के सांसद पर आरोप</h3>
<p style="text-align:justify;">रेसलर विनेश फोगाट ने आज सुबह अपने संबोधन में सांसद बृजभूषण पर आरोप लगाते हुए कहा, ‘आप सभी को नमस्कार, जैसे कि आप सब जानते हैं। 3 महीने पहले हमने रेसलिंग फेडरेशन के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आवाज उठाई थी कि हमारे साथ कुछ राजनीति हुई है। जिसकी एवज में सरकार ने एक कमेटी बनाई थी और 4 हफ्ते का समय मांगा था। लेकिन आज 3 महीने के इंतजार के बाद भी हमारे साथ न्याय नहीं हुआ है।’<br />
उन्होंने आगे कहा ‘दो दिन पहले हम पुलिस स्टेशन गए थे। जहां 7 लड़कियों ने बृजभूषण के खिलाफ कार्रवाई करने की शिकायत दी है। शिकायत में मांग की कि बृजभूषण ने जो शारीरिक शोषण किया है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। पुलिस हमारी एफआईआर भी दर्ज नहीं कर रही है, जिसके बाद ही हम जंतर-मंतर पर आए हैं।’</p>
<h4 style="text-align:justify;">मामले में अब तक क्या कुछ हुआ :-</h4>
<ul>
<li style="text-align:justify;"> विनेश फोगाट ने रोते हुए आरोप लगाए कि फेडरेशन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह और कोच नेशनल कैंप में महिला रेसलर्स का यौन उत्पीड़न करते हैं जिसके खिलाफ 18 जनवरी को रेसलर्स विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना शुरू किया था।</li>
<li style="text-align:justify;">19 जनवरी को केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से रेसलर्स की करीब पौने 4 घंटे बातचीत हुई। नतीजतन उन्हें कुश्ती संघ के अध्यक्ष के जवाब का इंतजार करने को कहा। पहलवानों ने डब्ल्यू एफ आई के अध्यक्ष को हटाने की मांग की।</li>
<li style="text-align:justify;">खिलाड़ियों ने 20 जनवरी को खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से बातचीत के बाद फिर से जंतर-मंतर पर धरना शुरू किया था। यहां आंदोलनकारी खिलाड़ियों ने ऐलान किया कि वे अब न्याय मिलने तक कोई कैंप जॉइन नहीं करेंगे। न ही वह किसी प्रतियोगिता में भाग लेंगे। अब वह खेल और खिलाड़ियों के हक की लड़ाई लड़ेंगे।</li>
<li style="text-align:justify;">आंदोलन बढ़ता देख 21 जनवरी को भारतीय ओलिंपिक एसोसिएशन (आईओए) ने जांच कमेटी बनाई। जिसकी अध्यक्ष पीटी ऊषा ने कमेटी की अध्यक्ष मैरीकॉम को बनाया। 7 सदस्यों की कमेटी बनाकर जांच करने के निर्देश दिए। इस कमेटी में बॉक्सर मैरीकॉम, तीरंदाज डोला बनर्जी, बैडमिंटन प्लेयर अलकनंदा अशोक, फ्री स्टाइल कुश्ती खिलाड़ी योगेश्वर दत्त, भारतीय भारोत्तोलन महासंघ के अध्यक्ष सहदेव यादव और 2 वकील शामिल थे।</li>
</ul>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>खेल</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Apr 2023 12:40:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजनीतिक पार्टियों की काली कमाई</title>
                                    <description><![CDATA[देश विडंबनाओं के साथ भरा पड़ा है, खास कर राजनीति में जो कहा जाता है वह होता नहीं है, जो असलियत है वह बताई नहीं जाती। कालेधन की वापसी का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियां खुद ही काले धन पर पल रही हों तो आम आदमी का भौंच्चका रह जाना स्वाभाविक है। एक खुलासे के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/black-money-of-political-parties/article-3880"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/black-money.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश विडंबनाओं के साथ भरा पड़ा है, खास कर राजनीति में जो कहा जाता है वह होता नहीं है, जो असलियत है वह बताई नहीं जाती। कालेधन की वापसी का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियां खुद ही काले धन पर पल रही हों तो आम आदमी का भौंच्चका रह जाना स्वाभाविक है। एक खुलासे के अनुसार राजनीतिक पार्टियों को 711 करोड़ का चंदा ‘अज्ञात स्त्रोतों’ से प्राप्त हुआ है। कानून की भाषा में यह कालाधन है जो कि दंडनीय है। इस राशि में सबसे बड़ा हिस्सा 532 करोड़ भाजपा के हिस्से आया है जो कांगे्रस सहित कई अन्य पार्टियों के कुल चंदे से 9 गुणा अधिक है। ऐसे हालातों में देश से बाहर रखा कालाधन वापिस लाने व देश के अंदर कालेधन का खात्मा करना असंभव है। दरअसल पैसा राजनीति में सबसे बड़ी बुराई बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंदा तकनीकी तौर पर रिश्वत का ही एक रूप हो गया है, जो धनवान राजनीतिक पार्टियों को चुनावों के समय जो दान दिया जाता है, सरकारें बनने पर पूंजीपतियों द्वारा वह कई गुणा अधिक वसूल किया जाता है। जब तक चंदा राजनीति का अंग बना रहेगा तब तक सुधार की गुजांईश बहुत कम है। सभी राजनेता यह बात सार्वजनिक तौर स्वीकार कर चुके हैं कि वह सिर्फ रूपयों की कमी के कारण ही हार गए। जब पार्टियां ‘पेशेवर चुनाव रणनीतिकारों’ को 500-700 करोड़ रूपये फीस के तौर पर देंगी तो लड़ाई विचारों की नहीं पैसों की होगी। एक प्रसिद्ध रणनीतिकार की तरफ से केन्द्र से लेकर राज्यों तक मुंह मांगी फीस देने वाली पार्टियों की सरकार बनाने की चर्चा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंदा एकत्रित करने की स्वीकृति के साथ-साथ चुनाव कमीशन की ओर से खर्च की सीमा तय करना व नामाकंन के समय उम्मीदवार द्वारा उसकी अपनी चल-अचल सम्पति के विवरण जारी करने के नियम बेअसर हो रहे हैं। बहुत से नेता चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं करते चूंकि उनके पास धन नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्द्र सिंह ने तो यहां तक कह दिया था कि राजनीति राजनीतिक घरानों के वश की ही बात रह गई है। राजनीतिक पार्टियों के पास आया कालाधन चुनाव प्रबंध के साथ-साथ शासन-प्रशासन में भी भ्रष्टाचार पैदा करता है। पैसे की अधिकता लोकतंत्र को बौना करती है। राजनीतिक पार्टियों को चंदा एकत्रित करने पर राष्टÑीय बहस होनी चाहिए ताकि धन किसी भी पार्टी की ताकत न बने।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Jun 2018 08:30:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भाजपा बनाम शेष राजनीतिक पार्टियांक्षे</title>
                                    <description><![CDATA[त्रीय क्षत्रपों में 2019 के आम चुनावों में नेतृत्व करने की होड़ मची हुई है। इनमें से अधिकतर नेता दिल्ली पहुंच रहे हैं और वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मजबूत भाजपा और इसकी मोदी-शाह की जोड़ी के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा के निर्माण में वे आगे रहें। इस कम में पश्चिम बंगाल की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/bjp-vs-remaining-political-parties/article-3684"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/bjp-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">त्रीय क्षत्रपों में 2019 के आम चुनावों में नेतृत्व करने की होड़ मची हुई है। इनमें से अधिकतर नेता दिल्ली पहुंच रहे हैं और वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मजबूत भाजपा और इसकी मोदी-शाह की जोड़ी के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा के निर्माण में वे आगे रहें। इस कम में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तूणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने न केवल सभी पार्टियों के नेताओं अपितु अरूण शौरी, यशवनत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे भाजपा के बागी नेताओं को भी एकजुट करने का प्रयास किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बुधवार को उन्होंने राकांपा, सपा, राजद, तेदेपा, तेलंगाना राष्ट्र समिति, द्रम्रक और शिव सेना के नेताओं से मुलाकात की। उन्होने यह मुलाकात संसद के सत्र के दौरान संसद परिसर में की। इस बैठक के लिए आमंत्रित नेताओं में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम शामिल नहंी था अपितु सोनिया गांधी का था। इसका तात्पर्य यह है कि ममता चाहती हैं कि 2019 के चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियां आगे रहें। ममता के इस कदम से अन्य नेता भी प्रभावित हैं इसीलिए आंध प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेदेपा अध्यक्ष चन्द्रबाबू नायडू तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति अध्यक्ष ने अगले सप्ताह दिल्ली आने का निर्णय किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि दोनों नेता अपने मुद्दों पर और दलों का समर्थन मांगने आ रहे हैं किंतु इस बात से इंकार नहंी किया जा सकता है कि वे संघीय मोर्चा के निर्माण में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। नेतृत्व की होड़ में लगे इन नेताओं को ध्यान में रखना चाहिए कि नेत्त्व की होड़ से उनका उद्देश्य भटक सकता है। उत्तर प्रदेश में नाम पर राजनीति: क्या शेक्सपीयर की इस उक्ति कि नाम में क्या रखा है को योगी का उत्तर प्रदेश समझ पाएगा? शायद नहीं। और इसी के चलते लगता है राज्य में एक अनावश्यक विवाद पैदा हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">बुधवार को राज्य की भाजपा सरकार ने सभी विभागों और उच्च न्यायालय की इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठों को निर्देश देते हुए आदेश जारी किया कि सभी दस्तावेजों और अभिलेखों में डॉ0 अम्बेडकर के नाम में रामजी भी जोडा जाए और अब उनका नाम डा0 भीमराव रामजी अंबेडकर होगा। इसके लिए सरकार ने तर्क दिया है कि संविधान की आठवीं अनुसूची के पन्नों पर उन्होने अपने हस्ताक्षर इसी नाम से किए हैं और साथ ही रामजी उनके पिताजी का नाम है तथा महाराष्ट्र में बेटा अपने पिता का नाम मध्य नाम के रूप में जोड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही अंबेडकर की अंग्रेजी वर्तनी वैसे ही रहेगी किंतु हिन्दी में उसे आंबेडकर पढ़ा जाएगा। सरकार के इस कदम से विवाद पैदा होगा तथा बसपा और सपा इसमें राजनीति की बू सूंघेंघे। दलित आदर्शों के साथ राजनीति और इसके माध्यम से दलित वोट बैंक को लुभाना हिन्दुत्व पार्टी के लिए आसान नहंी है। इससे विरोधी दलों को एकुजट होने का एक और मौका मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कर्नाटक में चुनावी समर: कर्नाटक में चुनावों का बिगुल बज गया है। राज्य में चुनाव 12 मई को होंगे और परिणाम 15 मई को घोषित किया जाएगा। राज्य में सत्ता के दो मुख्य दावेदार भाजपा और कांग्रेस ने प्रचार कार्य में तेजी ला दी है। किंतु शुरूआत ही गलत हुई है अ‍ैर निर्वाचन सदन भी विवाद में फंस गया है तथा उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न चिह्न लग गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मंगलवार को निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों की तारीख की घोषणा से पूर्व ही भाजपा के आईटी प्रकोष्ठ के सदस्य ने चुनावों की तारीख ट्वीट कर सार्वजनिक कर दी। इसी तरह कांग्रेस के एक स्थानीय नेता ने भी निर्वाचन आयोग से पहले चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी थी। हालांकि उनकी ओर से चुनाव की तारीख तो वही थी किंतु मतगणना की तरीख गलत थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि उन्हें यह सूचना टीवी समाचार से मिला। तथापि यह मामला यहंी समाप्त नहंी हुआ और विपक्ष को यह पूछने का बहाना मिल गया कि क्या चुनावों की तारीख की घोषणा करने से पूर्व निर्वाचन अयोग ने भाजपा से परामर्श किया था। निर्वाचन आयोग ने इस मामले में जांच की शुरूआत कर दी है। क्या यह जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष होगी?</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक दंगे: बिहार और पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा जारी है। पिछले सपताह दोनों राज्यों में रामनवमी के अवसर पर पुलिस को सजग रहना पडा। बिहार के मुंगेर, भागलपुर और सीवान सहित सात जिलों में सांप्रदायिक तनाव बना रहा तथा अनधिकृत धािर्मक जुलूसों और मूर्ति विसर्जन जुलुसों को लेकर दोनों समुदायों के बीच झड़प हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">इन जुलसों के दौरान विवादास्पद गीत गाए गए तथा भडकाऊ नारे लगाए गए। हिंसा के दौरान पुलिसकर्मियों सहित सौ से अधिक लोग घायल हुए तथा अनेक दुकानों और वाहनों को आग लगायी गयी। अर्धसैनिक बल तथा रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती की गयी और प्रभावित इलाकों में निषेधाज्ञा लागू की गयी। इसी तरह ममता के बंगाल के रानीगंज में भाजपा द्वारा आयोजित शोभा यात्रा के एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र में प्रवेश के प्रयास के बाद टकराव में तीन व्यक्ति मारे गए और अनेक अन्य घायल हुए। बिहार में भाजपा की सहयोगी जद (यू) ने उसे चेताया है तो केन्द्र ने बंगाल सरकार से रिपोर्ट मांगी है। इस दोहरे मापदंड पर भी विवाद पैदा होने वाला है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य और आॅनर किलिंग: उच्चतम न्यायालय साधुवाद का पात्र है और यदि उसके द्वारा जारी दिशा-निदेर्शों का पालन किया गया तो राज्यों को दंपत्तियों को आॅनर किलिंग से संरक्षण देना होगा। न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने आदेश दिया कि किसी वर्ग के सम्मान की संविधानेत्तर धारणा के आधार पर परिवार या समुदाय के सदस्यों द्वारा किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के विवाह करने के अधिकार से वंचित नहंी किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि वयस्क व्यक्तियों को अपनी पसंद की शादी करने के लिए परिवार या समुदाय की सहमति लेने की आवश्यकता नहंी है और ऐसे व्यक्ति के स्तवंत्रता के अधिकार की निरंतर रक्षा की जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायालय ने राज्य सरकार और पुलिस प्राधिकारियों को कहा है कि वे ऐसे जिलों और गांवों की पहचान करे जहां पर आॅनर किलिंग होती है। इस मुद्दे पर खाप पंचायतों को बैठक करने की अुनमति न दी जाए और यदि दंपत्तियों को जान से मारने की धमकी दी जाती है तो उस क्षेत्र में धारा 144 लागू की जाए और ऐसे लोगों की गिरफ्तारी की जाए तथा उनके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाए। न्यायालय ने राज्य के प्राधिकारियों से कहा कि वे ऐसे दंपत्तियों के विवाह करने में मदद करें और उन्हें सुरक्षित घरों में रखें और उन्हें सुरक्षा भी उपलब्ध कराए। न्यायालय के इस आदेश से ऐसे दंपत्ति खुश होंगे किंतु प्रश्न उठता है कि क्या वे राज्य प्राधिकारियों और पुलिस पर भरोसा कर पाएंगे?</p>
<p style="text-align:justify;">जातिविहीन समाज की ओर बढ़ता केरल: राजनीतिक दलों और राजनेताओं को केरल के बच्चों से सबक लेना चाहिए। केरल के युवा छात्रों ने जाति और धर्म को नकार दिया है जबकि नेता निर्लज्जता से इन्हें राजनीति में मुद्दा बनाते हैं। राज्य में कक्षा 1 से कक्षा 10 तक के 1.23 लाख छात्र अपनी जाति या धर्म का उल्लेख नहंी करेंगे और स्कूल में प्रवेश के समय जाति और धर्म के कॉलम खाली छोडेंगे। इन छात्रों के लिए वर्ष 2017-18 एक रिकार्ड वर्ष होगा तथा राज्य में कुल स्कूल जाने वाले छात्रों में ऐसे छात्रों की संख्या 2 प्रतिशत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जातिविहीन समाज के निर्माण में इन छात्रों की पहल से अनेक लोग उत्साहित हैं। किंतु देखन यह है कि क्या इसका प्रभाव इन छात्रों के प्रगतिशील मन पर बना रहता है या नहीं क्योंकि अब स्कूल इन छात्रों को अपनी जाति या धर्म का उल्लेख करने के लिए बाध्य नहंी कर सकते हैं और न्यायालय ने भी ऐसा आदेश दिया है। साथ ही हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि शिक्षा कौशल के माध्यम से प्राप्त की जानी चाहिए न कि किसी तरह के आरक्षण से। यह एक छोटीकिंतु एक सुखद पहल है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>इंसाफ</em></strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 31 Mar 2018 01:26:18 +0530</pubDate>
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                <title>दागी माननीयों के भरोसे राजनीतिक दल</title>
                                    <description><![CDATA[गत दिवस केंद्र सरकार द्वारा देश की सर्वोच्च अदालत में दाखिल हलफनामा में देश भर में 1765 सांसदों और विधायकों के खिलाफ 3045 आपराधिक मुकदमों से भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि देश के सियासी दलों में दागी माननीयों की भरमार है। दागी माननीयों के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है तो वहीं तमिलनाडु […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/political-parties-trusted-by-tainted-believers/article-3592"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/polictle.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गत दिवस केंद्र सरकार द्वारा देश की सर्वोच्च अदालत में दाखिल हलफनामा में देश भर में 1765 सांसदों और विधायकों के खिलाफ 3045 आपराधिक मुकदमों से भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि देश के सियासी दलों में दागी माननीयों की भरमार है। दागी माननीयों के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है तो वहीं तमिलनाडु दूसरे और बिहार तीसरे नंबर पर है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को ताकीद किया था कि वह 2014 में नामांकन भरते समय आपराधिक मुकदमा लंबित होने की घोषणा करने वाले विधायकों और सांसदों के मुकदमों की स्थिति बताए। सर्वोच्च अदालत ने यह भी पूछा था कि इनमें से कितनों के मुकदमें सर्वोच्च अदालत के 10 मार्च, 2014 के आदेश के मुताबिक एक वर्ष के भीतर निपटाए गए और कितने मामलों में सजा हुई एवं कितने बरी हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च अदालत ने सरकार से यह भी जानना चाहा था कि 2014 से 2017 के बीच कितने वर्तमान और पूर्व विधायकों व सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हुए। जवाब में केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च अदालत में कुल 28 राज्यों का ब्यौरा दिया गया है जिसमें उत्तर प्रदेश के सांसदों-विधायकों के खिलाफ सबसे ज्यादा मुकदमें लंबित हैं। दागी माननीयों के मामले का शीध्र निपटारा किया जाना इसलिए भी आवश्यक है कि संसद और विधानसभाओं में दागी और आपराधिक चरित्र वाले माननीयों की तादाद कम होने के बजाए लगातार बढ़ती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर ऐसे दागी माननीयों के मामले का शीध्र निपटारा नहीं होगा तो देश भर में यहीं संदेश जाएगा कि कानून की नजर में सभी बराबर नहीं हैं। उचित होगा कि जनप्रतिनिधियों के मुकदमों का निस्तारण अति शीध्रता से हो और इसके लिए अलग से न्यायालय की स्थापना हो। अगर प्राथमिकता के आधार पर इन मुकदमों का निस्तारण नहीं होगा तो फिर राजनीति में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का प्रवेश रोक पाना मुश्किल होगा। अगर चुनाव आयोग के आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 में कुल 1581 सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे। इसमें लोकसभा के 184 और राज्यसभा के 44 सांसद शामिल थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इनमें महाराष्ट्र के 160, उत्तर प्रदेश के 143, बिहार के 141 और पश्चिम बंगाल के 107 विधायकों पर मुकदमें लंबित थे। सभी राज्यों के आंकड़े जोड़ने के बाद कुल संख्या 1581 थी। यहां ध्यान देना होगा कि चुनाव दर चुनाव दागी जनप्रतिनिधियों की संख्या कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। उदाहरण के तौर पर 2009 के आमचुनाव में 158 यानी 30 प्रतिशत माननीयों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की थी। आम चुनाव 2014 के आंकड़ों पर गौर करें तो 2009 के मुकाबले इस बार दागियों की संख्या बढ़ गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर ऐसे माननीयों की भी संख्या बढ़ी है जिनपर हत्या, हत्या के प्रयास और अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2009 के आमचुनाव में ऐसे सदस्यों की संख्या तकरीबन 77 यानी 15 प्रतिशत थी जो अब 16 वीं लोकसभा में बढ़कर 112 यानी 21 प्रतिशत हो गयी है। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने दागी माननीयों पर लगाम कसने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री एवं राज्य के मुख्यमंत्रियों को ताकीद किया था कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले दागी लोगों को मंत्री पद न दिया जाए क्योंकि इससे लोकतंत्र को क्षति पहुंचती है। तब सर्वोच्च अदालत ने दो टूक कहा था कि भ्रष्टाचार देश का दुश्मन है और संविधान की संरक्षक की हैसियत से प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री नहीं चुनेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन विडंबना है कि अदालत के इस नसीहत का पालन नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए कि सर्वोच्च अदालत ने दागी सांसदों और विधायकों को मंत्री पद के अयोग्य मानने में हस्तक्षेप के बजाए इसकी नैतिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ दिया है। दरअसल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों का अपना मंत्रिमंडल चुनने का हक संवैधानिक है और उन्हें इस मामले में कोई आदेश नहीं दिया जा सकता। ऐसा इसलिए भी संविधान के अनुच्छेद 75(1) की व्याख्या करते समय उसमें कोई नई अयोग्यता नहीं जोड़ी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">जब कानून में गंभीर अपराधों या भ्रष्टाचार में अभियोग तय होने पर किसी को चुनाव लड़ने के अयोग्य नहीं माना गया है तो फिर अनुच्छेद 75(1) और 164(1) जो केंद्रीय और राज्य मंत्रिमंडल के चयन से संबंध है, के मामले में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के अधिकारों की व्याख्या करते हुए उसे अयोग्यता के तौर पर शामिल नहीं किया जा सकता। वैसे भी उचित है कि व्यवस्थापिका में न्यायपालिका का अनावश्यक दखल न हो। अगर ऐसा होगा तो फिर व्यवस्था बाधित होगी और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि कार्यपालिका दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर अपनी आंख बंद किए रहे और न्यायपालिका तमाशा देखे। यहां ध्यान देना होगा कि दागी माननीयों को लेकर सर्वोच्च अदालत कई बार अपनी सख्त टिप्पणी कर चुका है। लेकिन हर बार यहीं देखा गया कि राजनीतिक दल अपने दागी जनप्रतिनिधियों को बचाने के लिए कुतर्क गढ़ते नजर आए।</p>
<p style="text-align:justify;">याद होगा गत वर्ष पहले जब सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के जरिए दोषी सांसदों व विधायकों की सदस्यता समाप्त करने और जेल से चुनाव लड़ने पर रोक लगायी तो राजनीतिक दलों ने किस तरह वितंडा खड़ा किया। तब उनके हैरतअंगेज दलील से देश हैरान रह गया। बता दें कि उस समय सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर किया गया था जिसमें कैबिनेट से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को हटाने की मांग की गयी थी। शुरू में न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा पुनर्विचार याचिका दाखिल किए जाने पर 2006 में इस मामले को संविधान पीठ के हवाले कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले भी सर्वोच्च अदालत ने अपने एक फैसले में राजनीतिकों और अतिविशिष्ट लोगों के खिलाफ लंबित मुकदमें एक साल के भीतर निपटाने का आदेश दिया था। दूसरे फैसले में उसने कानून के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया था जो दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों को अपील लंबित रहने के दौरान विधायिका का सदस्य बनाए रखता है। अब चूंकि केंद्र सरकार ने दागी जनप्रतिनिधियों के मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत के गठन को हरी झंडी दिखा दी है ऐसे में राजनीति के शुद्धीकरण की उम्मीद बढ़ गयी है। अगर दोषी माननीयों पर कानून का शिकंजा कसता है तो फिर राजनीतिक दल ऐसे लोगों को चुनावी मैदान में उतारने से परहेज करेंगे। दरअसल राजनीतिक दलों को विश्वास हो गया है कि जो जितना बड़ा दागी है उसके चुनाव जीतने की उतनी ही बड़ी गारंटी है। गौर करें तो पिछले कुछ दशक से इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है।</p>
<p style="text-align:justify;">हैरान करने वाली बात यह कि दागी चुनाव जीतने में सफल भी हो रहे हैं। लेकिन यह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। लेकिन इसके लिए सिर्फ राजनीतिक दलों और उनके नियंताओं को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जनता भी बराबर की कसूरवार है। जब देश की जनता ही साफ-सुथरे प्रतिनिधियों को चुनने के बजाए जाति-पांति और मजहब के आधार पर बाहुबलियों और दागियों को चुनेगी तो स्वाभाविक रुप से राजनीतिक दल उन्हें टिकट देंगे ही। नागरिक और मतदाता होने के नाते जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह ईमानदार, चरित्रवान, विवेकशील और कर्मठ उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि चुने।</p>
<p style="text-align:justify;">यह तर्क सही नहीं कि कोई दल साफ-सुथरे लोगों को उम्मीदवार नहीं बना रहा है इसलिए दागियों को चुनना उनकी मजबूरी है। यह एक खतरनाक सोच है। देश की जनता को समझना होगा कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में नेताओं के आचरण का बदलते रहना एक स्वाभावगत प्रक्रिया है। लेकिन उन पर निगरानी रखना और यह देखना कि बदलाव के दौरान नेतृत्व के आवश्यक और स्वाभाविक गुणों की क्षति न होने पाए यह जनता की जिम्मेदारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तरक्की के लिए जितनी सत्यनिष्ठा व समर्पण राजनेताओं की होनी चाहिए उतनी ही जनता की भी। दागियों को राजनीति से बाहर खदेड़ने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों के कंधे पर डालकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। उचित होगा कि केंद्र सरकार सर्वोच्च अदालत के सुझाव पर अमल करते हुए अति शीघ्र विशेष न्यायालयों का गठन करे ताकि दागी जनप्रतिनिधियों के मुकदमों का निपटारा शीध्रता से हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>रीता सिंह</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Mar 2018 04:11:59 +0530</pubDate>
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