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                <title>Delay - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>गुजरात चुनाव : घोषणा में विलंब से सरकार को फायदा</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीतिक विरोधी या जानी दुश्मन! आज राजनीतिक विरोधियों और जानी दुश्मनों के बीच रेखा धुंधली हो गयी है। विकास के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रही तू-तू, मैं-मैं इस तथ्य को बखूबी बखान करती है और यह तू-तू, मैं-मैं ये दोनों दल राजनीकि तृप्टि प्राप्त करने की आशा में कर रहे हैं। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/gujarat-elections/article-3407"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/bjp.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजनीतिक विरोधी या जानी दुश्मन! आज राजनीतिक विरोधियों और जानी दुश्मनों के बीच रेखा धुंधली हो गयी है। विकास के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रही तू-तू, मैं-मैं इस तथ्य को बखूबी बखान करती है और यह तू-तू, मैं-मैं ये दोनों दल राजनीकि तृप्टि प्राप्त करने की आशा में कर रहे हैं। किंतु इस जटिल मुद्दे में चुनाव आयोग भी फंस गया है।आयोग ने परंपरा से हटकर एक विवादास्पद निर्णय लिया और हिमाचल तथा गुजरात चुनावों की घोषणा एक साथ नहंी की जबकि दोनों विधान सभाओं के कार्यकाल को समाप्त होने में केवल दो सप्ताह का अंतर है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे एक प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस का यह आरोप सही है कि गुजरात के मामले में चुनाव आयोग ने भेदभाव किया है और भगवा संघ का पक्ष ले रहा है। दोनों विधान सभाओं के कार्यकाल लगभग एक साथ समाप्त हो रहे हैं फिर गुजरात चुनावों की घोषणा क्यों नहीं की गयी। और यदि गुजरात में भी मतगणना हिमाचल के साथ साथ की जानी है तो फिर वहां अभी से आदर्श आचार संहिता लागू क्यों नहंी की गयी। इससे वास्तव में क्या प्राप्त होगा? हिमाचल प्रदेश में मतदान और मतगणना में 39 दिन का अंतर क्यों रखा गया? क्या चुनाव आयोग ने अपनी निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ समझौता किया है? क्या चुनाव आयोग स्वयं में एक कानून है?</p>
<p style="text-align:justify;">नि:संदेह इससे एक गलत संदेश गया है और एक गलत पूर्वोद्दाहरण स्थापित हुआ है। सामान्यतया निर्वाचन आयोग उन राज्यों में विधान सभा चुनाव एक साथ कराती है जहां पर विधान सभाओं का कार्यकाल छह माह के भीतर समाप्त हो रहा हो और इन राज्यों के लिए चुनावों की घोषणा एक साथ की जाती है। उदाहरण के लिए इस वर्ष उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में एक साथ चुनाव हुए। इन राज्यों में 4 फरवरी से 8 मार्च तक चुनाव हुए और चुनावों की घोषणा एक साथ 4 जनवरी को की गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2002-03 में गोधरा दंगों के बाद जब गुजरात विधान सभा को समय पूर्व भंग किया गया था तब चुनावों की घोषणा 28 अक्तूबर 2002 को की गयी थी जबकि हिमाचल के लिए 11 जनवरी 2003 को की गयी थी अन्यथा 1998 से लेकर अब तक गुजरात और हिमाचल विधान सभाओं के चुनावों की घोषणा एक साथ की जाती रही है। अब कांग्रेस शासित हिमाचल में आदर्श आचार संहिता लागू हो गयी है जबकि भाजपा शासित गुजरात में अभी लागू नहीं हुई है। इससे भाजपा को लाभ मिल सकता है और वह भी तब जब गुजरात में विधान सभा चुनाव 18 दिसंबर से पूर्व संपन्न होना है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री रूपाणी ने पहले ही राज्य में रोजगार के एक लाख नए अवसर सृजित करने के लिए 16 नए औद्योगिक जोनों की स्थापना और 780 करोड रूपए के विकास कार्यों का उद्घाटन पहले ही कर दिया है। इसीलिए कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि वह भगवा संघ के दबाव के समक्ष झुक रहा है ताकि प्रधानमंत्री मोदी राज्य में अपनी रैलियों में लोक लुभावने वायदों की घोषणा कर सके। मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग के बचाव में कहा है कि गुजरात विधान सभा चुनावों की घोषणा अभी इसलिए नहीं की गयी कि राज्य में लंबे समय तक आदर्श आचार संहिता लागू होती जो सामान्यतया 46 दिन से अधिक नहंी होनी चाहिए किंतु लोग आयोग के इस मत से सहमत नहंी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">2007 और 2012 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में आदर्श आचार संहिता 83 दिन और इस वर्ष पंजाब और गोवा में 64 दिन तक लागू रही। साथ ही आयोग ने यह भी कहा कि यह विलंब गुजरात के मुख्य सचिव के इस आग्रह पर भी किया गया कि चुनावों की घोषणा से आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी और इससे राज्य में बाढ राहत और पुनर्वास कार्यों में बाधा पडेगी। किंतु यह तर्क भी दमदार नहीं है। सच यह है कि पार्टियां आदर्श आचार संहिता की बात करती है किंतु यह चुनाव आयोग और पार्टियों के बीच एक स्वैच्छिक समझौता है। आदर्श आचार संहिता की वैधानिक बाध्यता नहंी है और पार्टियां आए दिन इसका उल्लंघन करती रहती हैं और निर्वाचन आयोग नि:सहाय बना रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार आदर्श आचार संहिता को कानूनी स्वीकृति प्राप्त नहंी है। इसका उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक नैतिक पुलिस के रूप में कार्य करना है। आयोग केवल किसी पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त कर सकता है या एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उसकी मान्यता समाप्त कर सकता है। इससे परे आयोग को कोई शक्ति प्राप्त नहंी है। इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए भी लोक सभा या विधान सभाओं के लिए चुना जाता है। नि:संदेह वर्तमान राजनीतिक प्रणाली और राजनीतिक मूल्यों में बदलाव के लिए लंबा संघर्ष करना पडेगा। गुजरात में भाजपा और नमो की साख दांव पर लगी है। मुद्दा यह नहीं है कि राज्य में संख्या खेल में कांग्रेस भाजपा को मात देती है या भाजपा कांग्रेस को किंतु जैसा कि पूर्व निर्वाचन आयुक्त कुरैशी ने कहा है ‘‘चुनाव की घोषणा टालने से गंभीर प्रश्न खडे होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि सरकार लोकप्रिय योजनाओं और वायदों की घोषणा करती है तो इससे आयोग की साख दाव पर लगेगी। आयोग पर आारोप लगेगा कि उसने आदर्श आचार संहिता लागू करने से पहले गुजरात सरकार को कुछ अतिरिक्त दिन दिए हैं। बड़ी कठिन मेहनत से आयोग की प्रतिष्ठा स्थापित की गयी है और यह प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है जो कि हमारे लोकतंत्र के लिए घातक होगा। राजनेताओं को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उनकी वैधता चुनाव आयोग द्वारा कराए गए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से प्राप्त होती है और आयोग की वैधता चुनावों की विश्वसनीयता की गारंटी देते हैंं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावा कराना एक मूल अधिकार है और इसके लिए भारत के संविधान में अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को परम शक्तियां दी गयी हैं। इस अनुच्छेद में कहा गया है ‘‘संसद और प्रत्येक राज्य के विधान सभा के चुनावों के लिए मत सूची तैयार करने और निर्वाचन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण चुनाव आयोग करेगा।’’ नि:संदेह टीएन शेषन, गोपालस्वामी, लिंगदोह और गिल जैसे मुख्य निर्वाचन आयुक्तों ने देश को यह बताया कि निर्वाचन आयोग क्या कर सकता है। शेषन द्वारा आदर्श आचार संहिता के कडाई से पालन करवाने से नेता और सरकारें आयोग से डरने लगी थी। इससे निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">गोपालस्वामी ने इस प्रणाली को और सुचारू बनाया और लिंगदोह ने यहां तक सुनिश्चित कराया कि जम्मू कश्मीर में भी चुनाव ईमानदारी से हो जहां पर लंबे समय से चुनावों में हेराफेरी हो रही थी। इन सब लोगों ने लोकतंत्र को मजबूत किया। साथ ही भावी चुनावों की दिशा भी तय की। निर्वाचन आयोग को भी सतर्क रहना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई पार्टी या उम्मीदवार उस पर पक्षपात करने का आरोप न लगाए। साथ ही चुनावों में हेराफेरी और अन्य अनियमितताओं की शिकायतें न आए और आदर्श आचार संहिता का कडाई से पालन हो। आयोग द्वारा आकर्षक विज्ञापन देने से उत्तरोत्तर चुनावों में मतदान प्रतिशत बढा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब सबकी निगाहें नमो के गृह राज्य गुजरात पर लगी हैं कि वहां चुनाव कौन जीतता है। किंतु हमारी पार्टियों को यह समझना होगा कि यदि हमारी संवैधानिक संस्थाएं दृढता से कार्य नहीं करती तो हमारे देश में अराजकता जैसी स्थिति पैदा हो जाती। कुल मिलाकर यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कौन चुनाव जीतता है या कौन हारता है क्योंकि इस खेल में अंतत: जनता हारती है। व्यवस्था, सरकार, राजनेता, राजनीति आदि सभी इस तरह से चल रही है कि जनता को बेहतर जीवन से वंचित रखा जाए। भारत के मतदाताओं को इस खिलवाड को रोकना होगा और लोकतंत्र को वास्तव में प्रातिनिधिक बनाना होगा। आपकी क्या राय है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-लेखक पूनम आई कौशिश</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Oct 2017 05:04:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दोहरी लापरवाही: उपचार में देरी के चलते हुई मौत, एंबुलैंस भी नहीं करवाई मुहैया</title>
                                    <description><![CDATA[दोहती का शव कंधे पर रखकर घर ले गया बेबस नाना  फरीदाबाद के सरकारी अस्पताल में सामने आया वाकया फरीदाबाद। हरियाणा में प्रदेश सरकार बेशक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने का दम भर रही है, लेकिन सरकारी नुमाइंदे इन दावों को पलीता लगा रहे हैं। दिल्ली से सटे फरीदाबाद के सिविल अस्पताल बादशाह खान के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/negligence-death-of-child-by-delay-in-treatment/article-2299"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/child-death.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">दोहती का शव कंधे पर रखकर घर ले गया बेबस नाना</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong> फरीदाबाद के सरकारी अस्पताल में सामने आया वाकया</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>फरीदाबाद।</strong> हरियाणा में प्रदेश सरकार बेशक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने का दम भर रही है, लेकिन सरकारी नुमाइंदे इन दावों को पलीता लगा रहे हैं। दिल्ली से सटे फरीदाबाद के सिविल अस्पताल बादशाह खान के डॉक्टरों का शर्मनाक चेहरा सामने आया है, जहां डाक्टरों ने एक बीमार बच्ची के इलाज में लापरवाही बरती जिसके चलते उसकी मौत हो गई, वहीं परिजनों को मृत बच्ची के शव को घर तक ले जाने के लिए एम्बुलेंस मुहैया नहीं कराई, जिसके चलते परिजन शव को कंधे पर रख कर घर लेकर चल दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">मृतक लक्ष्मी के परिजनों ने बताया कि बच्ची को बुखार था, जिसको वह पहले दो निजी अस्पतालों में लेकर गए, लेकिन रुपयों के अभाव में उन्होंने कोई इलाज नहीं किया। शुक्रवार सुबह वह बच्ची को फरीदाबाद के सिविल अस्पताल बादशाह खान में लेकर पहुंचे थे। यहां डाक्टरों ने बच्ची का कोई इलाज नहीं दिया, इस लापरवाही के चलते बच्ची की मौत हो गई। आर्थिक तंगी झेल रहे परिवार को डाक्टरों ने शव को घर ले जाने के लिए कोई एम्बुलेंस नहीं दी। बाद में नाना अपनी 9 साल की मासूम बच्ची लक्ष्मी के शव को कंधे पर रख कर घर ले जाते दिखाई दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि कुछ लोगों ने अस्पताल के सीएमओ, पीएमओ तथा एम्बूलेंस वालों को भी फोन मिलाया, लेकिन किसी ने भी कोई सहयोग नहीं किया। जब इस संबंध में जब सीएमओ गुलशन अरोड़ा से बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Jul 2017 09:39:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>विवादों के कारण लटकी अकाली दल की लंबी सीट</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति: ‘आप’ की लोकप्रियता व जनता के समर्थन से घबराए अकाली नेताओं की मुश्किलें भरी राहें, टिकट बंटवारे में असमंजस्य जलालाबाद सहित एक दर्जन सीटें भी शामिल सुखबीर दो सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर दुविधा में जलालाबाद से ‘आप’ नेता भगवंत मान लड़ रहे हैं चुनाव ChandiGarh, Ashwani Chawla:  शिरोमणी अकाली दल अब तक […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/long-delayed-by-disputes-sad-seat/article-413"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/maan-badal.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>राजनीति: ‘आप’ की लोकप्रियता व जनता के समर्थन से घबराए अकाली नेताओं की मुश्किलें भरी राहें, टिकट बंटवारे में असमंजस्य</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>जलालाबाद सहित एक दर्जन सीटें भी शामिल</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सुखबीर दो सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर दुविधा में </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>जलालाबाद से ‘आप’ नेता भगवंत मान लड़ रहे हैं चुनाव</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>ChandiGarh, Ashwani Chawla:</strong>  शिरोमणी अकाली दल अब तक अपने हिस्से की 94 सीटों में से 82 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुका है लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि अभी तक पार्टी के दो प्रमुख चेहरों, सीएम प्रकाश सिंह बादल और डि΄टी सीएम व पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल के नाम की अभी तक घोषणा नहीं कर सका है। इन दोनों सीटों पर किसी किस्म की कोई चुनौती नहीं है। इसके बावजूद इन सीटों पर किसी के नाम की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके अलावा अपनी बेटी का जबरन गर्भ गिराने के आरोप में सजा झेल रही बीबी जागीर कौर को भी भुलत्थ से टिकट देने के मामले में पार्टी फंसी नजर आ रही है। मोहाली, बरनाला सीटें ऐसी हैं जहां पार्टी को अभी तक कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है। सुखबीर बादल जिन दो सशक्त उम्मीदवारों को इन सीटों पर उतारना चाहते हैं वे दोनों ही चुनाव लड़ने से पीठ दिखा रहे हैं। भटिंडा की दो सीटें, भटिंडा ग्रामीण और भुच्चो मंडी आंतरिक विवाद के कारण फंसी हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>भगवंत-घुबाया के कारण फंसी तीन सीटें</strong><br />
आम आदमी पार्टी ने जलालाबाद सीट पर भगवंत मान को खड़ा कर इसे पंजाब की सबसे हॉट सीट बना दिया है। इसी सीट पर दो बार सुखबीर बादल भारी मतों से जीत चुके हैं। लेकिन इस बार लड़ाई इसलिए भी दिलचस्प है कि जिस राय सिख बिरादरी की वोटों से सुखबीर जीतते रहे हैं उनका नेता शेर सिंह घुबाया इन दिनों अकाली दल से नाराज है और उनके बारे में चर्चा है कि वह किसी भी समय कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। ऐसे में सुखबीर को यह दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। सुखबीर के सीट बदलने और दो सीटों पर खड़े होने का मैसेज गलत जाने की संभावना को देखते हुए ही अभी तक उनके नाम का ऐलान नहीं हो रहा है। राय सिख बिरादरी की वोट को देखते हुए ही आम आदमी पार्टी ने पहले ही मोहन सिंह फलियांवाला को फिरोजपुर रूरल से टिकट दे दिया है। पार्टी उनकी जलालाबाद में मदद ले सकती है। ऐसा हुआ तो सुखबीर बादल के लिए मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि इसीलिए धूरी, लंबी और मोहाली की सीट पर अभी तक किसे के नाम की घोषणा नहीं हुई है।</p>
<p><strong>गुलशन से नाराजगी के बीच फंसे कोटफत्ता</strong><br />
भटिंडा ग्रामीण व भुच्चो मंडी पर भी अभी फैसला नहीं हुआ है। दरअसल पूर्व सांसद परमजीत कौर गुलशन को भटिंडा रूरल सीट देने का फैसला हो गया है लेकिन पार्टी की जिला इकाई उनके खिलाफ है। सुखबीर बादल, जिला सिकंदर सिंह मलूका आदि उन्हें टिकट नहीं देना चाहते लेकिन परमजीत गुलशन की पैरवी खुद सीएम प्रकाश सिंह बादल कर रहे हैं। ऐसे में इस सीट के मौजूदा विधायक दर्शन सिंह कोटफत्ता को भुच्चो मंडी शिफ्ट करने का फैसला नहीं हो पा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>पटियाला सीट से नहीं मिल रहा उम्मीदवार</strong><br />
मोहाली सीट जनरल होने के बावजूद सुखबीर बादल इस सीट पर दलित उम्मीदवार कुलवंत सिंह को उतारना चाहते हैं जो इस समय मोहाली नगर निगम के मेयर हैं। पता चला है कि उन्होंने चुनाव लड़ने से साफ इंकार कर दिया है। उधर, लगभग यही हालत ट्राइटेंड ग्रुप के चेयरमैन राजिंदर गुप्ता का है। सुखबीर बादल बरनाला में एक रैली के दौरान लगभग उनकी सीट घोषित कर आए थे लेकिन राजिंदर गुप्ता ने अभी तक चुनाव लड़ने की हामी नहीं भरी है। उनकी न के बाद संभव है कि पार्टी अपने मौजूदा विधायक प्रेम मित्तल को बरनाला से टिकट दे दे। मित्तल की मानसा से सीट कट चुकी है। पटियाला सीट पर भी पार्टी को उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। पिछले उपचुनाव में हिंदू कैंडीडेट भगवान दास जुनेजा को यहां से उतारकर नया प्रयोग किया गया था जो फेल हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जागीर कौर अपने दामाद के लिए चाहती हैं टिकट</strong><br />
लुबाणा बिरादरी बाहुल भुलत्थ सीट पर भी पार्टी को उम्मीदवार की तलाश है। अकाली दल की दिग्गज नेता बीबी जागीर कौर इस समय इस सीट से विधायक हैं लेकिन उन्हें अपनी बेटी के गर्भ गिराने के केस में सजा होने के कारण मामला फंसा हुआ है। वह अपने दामाद के लिए सीट चाहती हैं लेकिन सर्वे में सीट बीबी जागीर कौर के लिए सुरक्षित बताई जाती है। यह से उनका मुकाबला आम आदमी पार्टी के सुखपाल खैहरा से है। इंद्रबीर बुलारिया के अकाली दल को छोड़कर जाने के बाद, यहां से भी पार्टी को कोई सशक्त उम्मीदवार नहीं मिल रहा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Dec 2016 00:40:47 +0530</pubDate>
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