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                <title>Sparrow - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>शिक्षाविद बनवारी लाल का प्रयास लाया रंग, गूंजने लगी चिड़ियों की चहचहाहट</title>
                                    <description><![CDATA[ऐलनाबाद(सच कहूँ/सुभाष)। गौरैया यानी घरेलू चिड़िया के सिमट रहे प्राकृतिक आवास के कारण हमारे आसपास इनकी चहचहाहट की गूंज कम सुनाई देने लगी है। ऐसे में विलुप्त हो रही गौरैया को बचाने के लिए ऐलनाबाद शहर में सर्वप्रथम रक्तदान की मुहिम चलाने वाले शिक्षाविद बनवारी लाल सहारण ने गौरैया के संरक्षण के लिए अपने निवास […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/banwari-lal-saharan-trying-to-save-the-extinct-sparrow/article-31640"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/sparrow-special.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ऐलनाबाद(सच कहूँ/सुभाष)।</strong> गौरैया यानी घरेलू चिड़िया के सिमट रहे प्राकृतिक आवास के कारण हमारे आसपास इनकी चहचहाहट की गूंज कम सुनाई देने लगी है। ऐसे में विलुप्त हो रही गौरैया को बचाने के लिए ऐलनाबाद शहर में सर्वप्रथम रक्तदान की मुहिम चलाने वाले शिक्षाविद बनवारी लाल सहारण ने गौरैया के संरक्षण के लिए अपने निवास को ही गौरेया का आवास यानि घर पर घोंसले बना दिये है। बनवारी लाल सहारण के प्रयासों ने न केवल गौरैया की आबादी बढ़ी, बल्कि घर के अंदर ही चहचहाहट बढ़ गई है। बनवारी लाल सहारण ने गत्ते के डिब्बों से ऐसे घोंसले तैयार किए, जिन्हें गौरैया ने अपना आशियाना बनाने के लिए चुना। बनवारी लाल सहारण शहर में ही एक निजी स्कूल में शिक्षक के साथ-साथ समाजसेवी है। ऐलनाबाद में रक्त दाताओं को जागरूक करने का बीड़ा भी सबसे पहले इन्होंने उठाया था।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>किसान की मित्र हैं गौरैया</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">विशेष वार्तालाप में बनवारी लाल सहारण ने बताया कि उनके साथ इस मुहिम में पूरा परिवार जुड़ा हुआ है। हमारा प्रयास रहता है कि गौरैया को अपने आसपास ही आवास मुहैया कराया जाए। गौरैया किसान की मित्र हैं क्योंकि यह हानिकारक कीड़ों को खाती है। गौरैया का पर्यावरण के साथ गहरा सम्बन्ध है। अमूमन यह पक्षी वहां पर रहना पसंद करता है जहां पर मनुष्यों की आबादी हो। इसलिए यह हमारे घरों में ही अपना छोटा सा आशियाना बनाने की तलाश में रहती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>ऐसे लगाएं अपने घरों के अंदर गौरैया के घोंसले</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">बनवारी लाल सहारण ने बताया कि घोंसले लगाते समय हमें कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि किसी तरह के जानवर व बरसात आंधी में गौरैया को कोई नुकसान ना हो। घोंसलों को लगते समय इनके ऊपर गर्मियों में दोपहर व शाम की धूप सीधी न पड़े। जब इनके अंडे देने का समय हो (मार्च से सितंबर) तब घोंसलों में किसी भी तरह की घास फू स न डालने की बजाय 8-10 फुट दूरी पर डाल सकते हैं। ये भी ध्यान रखें कि रात के समय इनके घोंसलों के आसपास तेज लाइट न जलाएं।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Mar 2022 10:33:42 +0530</pubDate>
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                <title>भीष्म साहनी के बालमन की वह गौरैया</title>
                                    <description><![CDATA[गौरैया हमारी प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फूदकती और बिखेरे गए चावल या अनाज के दाने को चुगती। कभी प्यारी गौरैया घर की दीवार पर लगे आइने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती है। लेकिन बदलते वक्त के साथ आज गौरैया का बयां बेहद कम दिखाई नहीं देता है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/the-sparrow-of-balmans-of-bhisham-sahni/article-3624"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/chidiya.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गौरैया हमारी प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फूदकती और बिखेरे गए चावल या अनाज के दाने को चुगती। कभी प्यारी गौरैया घर की दीवार पर लगे आइने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती है। लेकिन बदलते वक्त के साथ आज गौरैया का बयां बेहद कम दिखाई नहीं देता है। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोसले लटके होते और गौरैया के साथ उसके चूजे चीं-चीं-चीं का शोर मचाते। बचपन की यादें आज भी जेहन में ताजा हैं लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई है। दुनिया भर में 20 मार्च को गौरैया संरक्षण दिवस के रुप में मनाया जाता है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद ई दिलावर के प्रयासों से इस दिवस को चुलबुली चंचल गौरैया के लिए रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इंसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर कर दिया है। विज्ञान और विकास हमारे लिए वरदान साबित हुआ है। लेकिन दूसरा पहलू कठिन चुनौती भी पेश कर रहा है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इंसान और उसकी बस्ती के पास अधिक रहना पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत पायी जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती हैं। इसका जीवन काल दो साल का होता है। यह पांच से छह अंडे देती है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है. लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वनज 25 से 35 ग्राम तक होता है। यह अधिकांश झुंड में रहती है। यह अधिक दो मील की दूरी तय करती है। गौरैया को अंग्रेजी में पासर डोमेस्टिकस के नाम से बुलाते हैं। गौरैया घास के बीजों को अपने भोजन के रुप में अधिक पसंद करती है। पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह चिंता का सवाल है। इस पक्षी को बचाने के लिए वन और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कोई खास पहल नहीं दिखती है। दुनिया भर के पर्यावरणविद् इसकी घटती आबादी पर चिंता जाहिर कर चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ती आबादी के कारण जंगलों का सफाया हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में पेड़ काटे जा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों में बाग-बगीचे खत्म हो रहे हैं। इसका सीधा असर इन पर दिख रहा है। गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे, उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध करते थे।ल् ोकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता है। गगन चुम्बी ऊंची इमारतें और संचार क्रांति इनके लिए अभिशाप बन गयी। शहर से लेकर गांवों तक मोबाइल टावर एवं उससे निकलते रेडिएशन से इनकी जिंदगी संकट में है। दुनिया भर में कई तरह के खास दिन हैं ठीक उसी तरह 20 मार्च का दिन भी गौरैया संरक्षण के लिए निर्धारित है। लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा की इसकी शुरूवात सबसे पहले भारत के महाराष्ट्र से हुई। गौरैया गिद्ध के बाद सबसे संकट ग्रस्त पक्षी है। दुनिया भर में प्रसिद्ध पर्यावरणविद मोहम्मद ई दिलावर नासिक से हैं और वह बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विज्ञान और विकास के बढ़ते कदम ने हमारे सामने कई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। जिससे निपटना हमारे लिए आसान नहीं है। विकास की महत्वाकांक्षी इच्छाओं ने हमारे सामने पर्यावरण की विषम स्थिति पैदा की है। जिसका असर इंसानी जीवन के अलावा पशु-पक्षियों पर साफ दिखता है। इंसान के बेहद करीब रहने वाली कई प्रजाति के पक्षी और चिड़िया आज हमारे बीच से गायब हैं। उसी में एक है स्पैरो यानी नन्ही सी वह गौरैया। समय रहते इन विलुप्त होती प्रजाति पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गिद्धों की तरह गैरैया भी इतिहास बन जाएगी और यह सिर्फ गूगल और किताबों में ही दिखेगी। सिर्फ सरकार के भरोसे हम इंसानी दोस्त गौरैया को नहीं बचा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति प्रेमियों को अभियान चलाकर लोगों को मानव जीवन में पशु-पक्षियों के योगदान की जानकारी देनी होगी। इसके अलावा स्कूली पाठ्यक्रमों में हमें गौरेया और दूसरे पक्षियों को शामिल करना होगा। आज के 20 साल पूर्व प्राथमिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में गौरैया की उपस्थिति थी। लेकिन आज अंग्रेजी संस्कृति हम पर इतनी हावी हो गयी कि हम खुद अपनी प्राकृतिक विरासत से दूर होते जा रहे हैं। इस पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रभुनाथ शुक्ल</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Mar 2018 06:34:33 +0530</pubDate>
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