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                <title>आरबीआई और सरकार: विवाद और समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा विवाद फिलहाल सुलझ गया है। इसे अच्छा संकेत इसलिए माना जाना चाहिए कि रिजर्व बैंक वह सर्वोच्च निकाय है,जो देश के बैंकिंग तंत्र को नियंत्रित करता है। ऐसे में अगर किन्हीं मुद्दों पर सरकार के साथ शीर्ष बैंक का टकराव होता तो बाजार, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/rbi-and-government-disputes-and-solutions/article-6677"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/rbi-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा विवाद फिलहाल सुलझ गया है। इसे अच्छा संकेत इसलिए माना जाना चाहिए कि रिजर्व बैंक वह सर्वोच्च निकाय है,जो देश के बैंकिंग तंत्र को नियंत्रित करता है। ऐसे में अगर किन्हीं मुद्दों पर सरकार के साथ शीर्ष बैंक का टकराव होता तो बाजार, उद्योग जगत या संपूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता था। व्यापक तौर पर देखा जाए तो सरकार जहाँ अर्थव्यवस्था,नकदी और ऋण की कमी को लेकर चितिंत थी,वहीं आरबीआई प्रबंधन मानकों को लेकर।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों असहमति एक बड़े संकट में बदल गई थी और कहा जा रहा था कि सरकार आरबीआई की धारा-7 का इस्तेमाल करने जा रही है। इस धारा के तहत वह आरबीआई को अपना निर्णय मानने को बाध्य कर सकती है। यह पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन -7 लागू करने पर चर्चा हो रही है। सेक्शन -7 लागू होने के बाद बैंक कारोबार से जुड़े फैसले आरबीआई गर्वनर के बजाए रिजर्व बैंक के “बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स लेंगे। यानी सरल शब्दों में कहें तो सेक्शन -7 कहीं न कहीं आरबीआई गवर्नर के अधिकारों को कमजोर करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सेक्शन-7 की चर्चा से विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि रिजर्व बैंक के एक डिप्टी गवर्नर ने तो सरकारी दखल पर गंभीर नतीजों की बात तक कह डाली। पिछले पखवाड़े इस विवाद को थामने के लिए कुछ प्रयास किए गए लेकिन ऐसी अटकल थी कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। अगर ऐसा होता तो यह देश की नीति निर्माण व्यवस्था के लिए बड़ा झटका होता। आरबीआई के कामकाज और स्वायत्तता में सरकार की ऐसी दखल उस पर शिकंजा कसना ही है,ताकि केंद्रीय बैंक सरकार की इच्छानुरूप ही फैसले करे। इस परिदृश्य में यह बहुत राहत की बात है कि आरबीआई एवं सरकार के बीच तनाव फिलहाल रुका।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा विवाद की नींव इस साल फरवरी में तब पड़ी जब रिजर्व बैंक ने एनपीए के मसले पर बैंकों पर कठोरता बरतनी शुरू की। सरकारी बैंक डूबता कर्ज यानी एनपीए की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में बैंकों ने नियमों को ताक पर रखते हुए जिस तरह अंधाधुंध कर्ज बांटे थे,उसी से एनपीए की समस्या खड़ी हुई थी और इसीलिए अब रिजर्व बैंक ने बैंकों पर सख्ती की थी। ऐसे में कदम उठा कर रिजर्व बैंक ने कुछ गलत नहीं किया था। लेकिन सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच विवाद यहीं तक ही सीमित नहीं रहा। जुलाई में सरकार ने रिजर्व बैंक पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वह छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज देने के मामले में ढील दे। बैंकों के डूबते कर्ज की वजह से केंद्रीय बैंक ने व्यवसायिक बैंकों पर इन उद्योगों को कर्ज देने के मामले में सख्ती कर दी थी,इस वजह से अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता दिखा।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन सवाल है कि अब क्या होगा?आरबीआई बोर्ड ने चार विवादास्पद मसलों पर चर्चा की : आरबीआई का आर्थिक पूँजी ढ़ाचा(ईसीएफ अर्थात इकॉनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क),घाटे और फंसे कर्ज की समस्या से जूझ रहे बैंकों के लिए तात्कालिक सुधारात्मक कदम ढांचा(पीसीए,यानी प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन ),संकटग्रस्त मझोले,छोटे और सूक्ष्म उपक्रमों के लिए ऋण पुनर्गठन की योजना और बैंकों के लिए बेसिक नियामकीय पूँजी ढांचा। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेद की सबसे बड़ी वजह बना आरबीआई के रिजर्व फंड यानी इकॉनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क। आरबीआई से जारी जुलाई, 2017 से जून,2018 के आँकड़ों के मुताबिक यह राशि अभी 9.69 लाख करोड़ रुपए की है। रिजर्व बैंक के बोर्ड में सरकार के प्रतिनिधि के अनुसार रिजर्व बैंक का मुद्रा भंडार बाजार में चलन में मौजूद कुल करेंसी का 12-18.7 फीसदी के बीच होना चाहिए जबकि मौजूदा समय में यह भंडार 27-28 फीसदी है। इस तरह रिजर्व बैंक की तिजोरियों में 3.6 लाख करोड़ की अतिरिक्त रकम पड़ी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार चाहती है कि यह रकम रिजर्व बैंक उसे लाभांश के रुप में दे दे,ताकि उसे विकास कार्यों पर खर्च किया जा सके। रिजर्व बैंक के पास आखिर कितना रिजर्व फंड हो,इस बारे में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघु राम राजन का मानना है कि कम से कम 10 लाख करोड़ रुपया। उनके अनुसार 10 लाख रिजर्व फंड के बाद ही रिजर्व बैंक सरकार को लाभांश के रुप में राशि दे सकती है। रिजर्व बैंक के बोर्ड बैठक में इस मामले पर सहमति बनी कि एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, जो इस मुद्दे पर फैसला करे। समिति में आरबीआई व वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा बाहर के कुछ विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है। समिति की सिफारिशों पर अंतिम फैसला आरबीआई गवर्नर ही करेंगे,क्योंकि आरबीआई की तरफ से गठित हर समिति की सिफारिशों पर अंतिम तौर पर फैसला करने या नहीं करने का अधिकार गवर्नर के पास ही होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब प्रश्न उठता है कि आखिर रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड पर अब तक आरबीआई ने किसी भी सरकार को हाथ रखने क्यों नहीं दिया है? इसे समझने के लिए हमें आरबीआई के इस फंड की प्रकृति को समझना होगा। दुनिया के हर बैंक की तरह आरबीआई भी सरकारी प्रतिभूतियों को जारी करने और उनमें निवेश करने का काम करता है। इसके अलावा वह बैंकों की अल्पावधि और दीर्घावधि जरूरतों के लिए ब्याज पर फंड उपलब्ध कराता है। अतिरिक्त फंड को विदेशों में निवेशित करता है। विदेशी मुद्रा भंडार रखने से भी आरबीआई को कमाई होती है। इन सभी आय एवं राजस्व का एक हिस्सा आरबीआई के रिजर्व फंड के तौर पर जाना जाता है,जिसे इकॉनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क के तहत निर्धारित किया जाता है। पिछले एक वर्ष में आरबीआई का यह फंड 7.58 लाख करोड़ से बढ़कर 9.69 लाख करोड़ रुपए हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन आरबीआई इस फंड को लगातार सुरक्षित रखने की कोशिश करता है, जिसके पीछे ठोस कारण हैं। पहली वजह यह है कि अगर अचानक वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी उथल पुथल आ जाए और देश की विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट हो जाए तो इस फंड का प्रयोग संकट से निपटने में किया जा सकता है। मसलन, 2008-09 के समय जब वैश्विक मंदी गहरा रही थी, तब एक समय इस फंड के इस्तेमाल पर विचार किया गया था। आरबीआई बोर्ड बैठक में दोनों पक्षों ने पीसीए ढांचे को लेकर भी लचीलापन रूख दिखाया।</p>
<p style="text-align:justify;">दो अन्य मुद्दों की बात करें तो आरबीआई ने सरकार की इच्छाओं का काफी हद तक मान रखा। बोर्ड ने आरबीआई प्रबंधन को यह मशविरा दिया कि वह एमएसएमई के कर्जदारों की ऋणग्रस्त मानक परिसंपत्तियों के पुनर्गठन की योजना पर विचार करे। यह सुविधा 25 करोड़ रुपए तक की ऋण सुविधा वाले संस्थानों के लिए तैयार की जानी है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों के पूँजी और जोखिम के 9 फीसदी अनुपात के अनुपालन के लिए समय अवधि में भी इजाफा किया।<br />
स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक ने सरकार की अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया है। पिछले वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की रैंकिंग को बढ़ाने वाले क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मूडीज का कहना है कि बेसल-3 मानक के लिए बैंकों को अतिरिक्त समय देने से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसके अतिरिक्त मूडीज ने एनपीए के 25 करोड़ रुपए तक के जोखिम वाले लोन से भी भारतीय बैंकों पर असर पड़ने की आशंका जताई है। अच्छा होगा कि सरकार,रिजर्व बैंक के स्वायत्तता का सम्मान करे। साथ ही रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड का प्रयोग अति आपातकालीन परिस्थितियों के लिए रिजर्व बैंक के विवेक पर ही प्रयोग हो,अन्यथा आर्थिक संकट से निकलने का आखिरी रास्ता भी आपातकाल में बंद हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>राहुल लाल</strong></p>
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                <pubDate>Sat, 24 Nov 2018 10:53:24 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिका-रूस आईएनएफ संधि पर विवाद को खत्म करें: संरा</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र 23 अक्टूबर (वार्ता) संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अमेरिका और रूस के बीच इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्स (आईएनएफ) संधि को लेकर हाल ही में उभरे विवादों काे खत्म करने के लिए दोनों देशों के बीच वार्ता होने की उम्मीद जताई है। रूस की समाचार एजेंसी तास के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र महासचिव के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/russia-us-resolve-disputes-over-inf-treaty-un/article-6397"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/sara.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>संयुक्त राष्ट्र 23 अक्टूबर (वार्ता)</strong></p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अमेरिका और रूस के बीच इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्स (आईएनएफ) संधि को लेकर हाल ही में उभरे विवादों काे खत्म करने के लिए दोनों देशों के बीच वार्ता होने की उम्मीद जताई है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस की समाचार एजेंसी तास के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता फरहान हक ने कहा,“ महासचिव आईएनएफ संधि पर अमेरिका की टिप्पणी से वाकिफ हैं और उन्हें अब भी उम्मीद है कि दोनों देश इस विवाद का समाधान निकालने में सक्षम हैं।”</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को कहा था कि अमेरिका आईएनएफ संधि से रूस की वजह से पीछे हट रहा है क्योंकि वह समझौतों के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। इसके साथ ही ट्रम्प ने कहा कि रूस और चीन ऐसे हथियारों के विकास को रोकने में गारंटी प्रदान करते हैं तो वह रूस और चीन के साथ आईएनएफ संधि से संबंधित एक नए समझौते पर हस्ताक्षर करने से इंकार नहीं करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आईएनएफ संधि ने परिचालन और गैर-परिचालन मध्यम दूरी (1,000-5,500 किलोमीटर) और कम दूरी (500-1,000 किलोमीटर) तक जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों को हटा दिया था। इस संधि के तहत सोवियत संघ ने 1,846 मिसाइलों जबकि अमेरिका ने 846 मिसाइलों को हटा दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि आईएनएफ संधि पर वाशिंगटन में आठ दिसंबर 1987 को हस्ताक्षर किए गए थे और यह एक जून 1988 से लागू हुयी थी। वर्ष 1992 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बेलारूस, कजाखिस्तान और यूक्रेन भी इस संधि से जुड़ गए थे।</p>
<p> </p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Oct 2018 10:11:41 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>विवादों में घिरे गांव डरोली भाई के सरपंच के उपचुनाव</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेसी उम्मीदवार विजेता करार, शिअद व आप ने बताया धक्केशाही आप व शिअद वर्करों ने डीसी दफ्तर के बाहर लगाया धरना प्रदर्शनकारियों ने मोगा-फिरोजपुर हाइवे किया जाम मोगा (सच कहूँ न्यूज)। सत्ताधारी कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी के लिए साख का सवाल बने मोगा हलके के ऐतिहासिक गांव डरोली भाई के सरपंच […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/sarpanch-bypolls-in-disputes/article-2955"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/protest-3.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">कांग्रेसी उम्मीदवार विजेता करार, शिअद व आप ने बताया धक्केशाही</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>आप व शिअद वर्करों ने डीसी दफ्तर के बाहर लगाया धरना</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>प्रदर्शनकारियों ने मोगा-फिरोजपुर हाइवे किया जाम</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>मोगा (सच कहूँ न्यूज)।</strong> सत्ताधारी कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी के लिए साख का सवाल बने मोगा हलके के ऐतिहासिक गांव डरोली भाई के सरपंच के उपचुनाव विवादों के घेरे में आ गए हैं। बीती देर रात प्रशासन ने कांग्रेस उम्मीदवार नाहर सिंह को विजेता करार दे दिया परंतु अकाली दल और आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की तरफ से इसे सरेआम धक्काशाही करार दिया गया है। इसी मुद्दे को लेकर सोमवार को गांव वासियों ने आप तथा शिअद नेताओं के नेतृत्व में स्थानीय डिप्टी कमिश्नर दफ्तर के बाहर रोष धरना देकर जिला प्रशासन और पंजाब सरकार खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी की।</p>
<h3 style="text-align:justify;">धांधली का आरोप</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रदर्शकारियों ने मोगा-फिरोजपुर हाईवे जाम कर दिया । चुनाव में हारने वाले उम्मीदवार शिंगारा सिंह और जगदीश सिंह ने आरोप लगाया कि चुनाव दौरान धांधली हुई है। दोनों उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि वोटों से 10 दिन पहले ही कांग्रेसी यह कह रहे थे कि यह चुनाव हर हाल में जीतना है ।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या जरूरत थी चुनाव करवाने की</h3>
<p style="text-align:justify;">रोष धरने को संबोधित करते आम आदमी पार्टी के जिला मोगा के प्रधान एडवोकेट रमेश ग्रोवर, केवल संघ ड्रोली, सीनियर नेता अजय शर्मा, अमित पुरी, अकाली दल के गुरजंट सिंह रामूवाला, काऊंसलर मनजीत सिंह धंमू मोगा, बिन्दर बिलासपुर आदि ने कहा कि यदि कांग्रेस सरकार अपने उम्मीदवार को जिताना ही चाहती थी तो चुनाव करवाने की क्या जरूरत थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कानून के तहत कार्रवाई करो: डीसी</h3>
<p style="text-align:justify;">जिला मोगा डिप्टी कमिश्नर दिलराज सिंह ने प्रदर्शकारियों को कानूनी ढंग के साथ पटीशन डालने की बात कही है। उन्होंने कहा कि जो भी फैसला होगा वह कानून को ध्यान में रखते किया जाएगा। प्रशासनिक आधिकारियों ने किसी किस्म की धक्केशाही से साफ इन्कार किया।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <pubDate>Mon, 07 Aug 2017 06:53:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिक्किम का इलाका हमारा, भारत को नियम सिखाने की जरूरत: चीन</title>
                                    <description><![CDATA[बीजिंग. चीन ने सिक्किम सेक्टर में सड़क बनाने को जायज ठहराया है। बीजिंग ने कहा है कि 1890 के सिनो-ब्रिटिश ट्रीटी के तहत यह एरिया उसके इलाके में आता है और इसके कोई शक की गुंजाइश नहीं है। चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन लू कांग ने कहा कि इस ट्रीटी (संधि) के मुताबिक सिक्किम […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/china-india-sikkim-road-and-border-disputes/article-1704"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/sikkim.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बीजिंग. चीन ने सिक्किम सेक्टर में सड़क बनाने को जायज ठहराया है। बीजिंग ने कहा है कि 1890 के सिनो-ब्रिटिश ट्रीटी के तहत यह एरिया उसके इलाके में आता है और इसके कोई शक की गुंजाइश नहीं है। चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन लू कांग ने कहा कि इस ट्रीटी (संधि) के मुताबिक सिक्किम का प्राचीन नाम झी (zhe) था। वहीं, बीजिंग ने अपने सरकारी मीडिया के जरिए कहा है कि चीन तो सीमा को विवाद का मुद्दा बनाने से बचता है, लेकिन इस बार भारत को नियम सिखाने की जरूरत है।</p>
<h1 style="text-align:center;">राष्‍ट्रीय ताकत के मामले में वह चीन से बहुत पीछे है</h1>
<p style="text-align:justify;">टाइम्‍स ऑफ इंडिया के अनुसार, लेख में चेतावनी भरे अंदाज में यह भी कहा गया है कि भले ही जीडीपी विकास को लेकर भारत का मनोबल काफी बढ़ गया है, मगर उसे याद रखना चाहिए कि राष्‍ट्रीय ताकत के मामले में वह चीन से बहुत पीछे है। सीमा मुद्दों पर भारत चीन की बराबरी नहीं कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेख के अनुसार, चीन सीमा विवादों को मुद्दा बनाने से बचता है। बीजिंग की मूल नीति भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाने की है, मगर यह आपसी सम्मान पर आधारित होना चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:center;">भारतीय सैनिकों की गलती है या यह भारतीय सरकार की कोई रणनीति है</h2>
<p style="text-align:justify;">
गौरतलब है कि चीन ने सिक्किम क्षेत्र में भारतीय सैनिकों द्वारा सीमा पार करने का आरोप लगाया है। इस संबंध में लेख में कहा गया है कि लेख में यह साफ नहीं है कि यह भारतीय सैनिकों की गलती है या यह भारतीय सरकार की कोई रणनीति है। जो भी मकसद हो चीन अपनी बात पर कायम रहेगा। उसे भारतीय सैनिकों को किसी भी तरह वापस जाने के लिए बाध्य करना चाहिए और चीन में सड़क निर्माण का कार्य रुकना नहीं चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jun 2017 04:17:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>विवादों के कारण लटकी अकाली दल की लंबी सीट</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति: ‘आप’ की लोकप्रियता व जनता के समर्थन से घबराए अकाली नेताओं की मुश्किलें भरी राहें, टिकट बंटवारे में असमंजस्य जलालाबाद सहित एक दर्जन सीटें भी शामिल सुखबीर दो सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर दुविधा में जलालाबाद से ‘आप’ नेता भगवंत मान लड़ रहे हैं चुनाव ChandiGarh, Ashwani Chawla:  शिरोमणी अकाली दल अब तक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/long-delayed-by-disputes-sad-seat/article-413"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/maan-badal.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>राजनीति: ‘आप’ की लोकप्रियता व जनता के समर्थन से घबराए अकाली नेताओं की मुश्किलें भरी राहें, टिकट बंटवारे में असमंजस्य</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>जलालाबाद सहित एक दर्जन सीटें भी शामिल</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सुखबीर दो सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर दुविधा में </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>जलालाबाद से ‘आप’ नेता भगवंत मान लड़ रहे हैं चुनाव</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>ChandiGarh, Ashwani Chawla:</strong>  शिरोमणी अकाली दल अब तक अपने हिस्से की 94 सीटों में से 82 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुका है लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि अभी तक पार्टी के दो प्रमुख चेहरों, सीएम प्रकाश सिंह बादल और डि΄टी सीएम व पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल के नाम की अभी तक घोषणा नहीं कर सका है। इन दोनों सीटों पर किसी किस्म की कोई चुनौती नहीं है। इसके बावजूद इन सीटों पर किसी के नाम की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके अलावा अपनी बेटी का जबरन गर्भ गिराने के आरोप में सजा झेल रही बीबी जागीर कौर को भी भुलत्थ से टिकट देने के मामले में पार्टी फंसी नजर आ रही है। मोहाली, बरनाला सीटें ऐसी हैं जहां पार्टी को अभी तक कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है। सुखबीर बादल जिन दो सशक्त उम्मीदवारों को इन सीटों पर उतारना चाहते हैं वे दोनों ही चुनाव लड़ने से पीठ दिखा रहे हैं। भटिंडा की दो सीटें, भटिंडा ग्रामीण और भुच्चो मंडी आंतरिक विवाद के कारण फंसी हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>भगवंत-घुबाया के कारण फंसी तीन सीटें</strong><br />
आम आदमी पार्टी ने जलालाबाद सीट पर भगवंत मान को खड़ा कर इसे पंजाब की सबसे हॉट सीट बना दिया है। इसी सीट पर दो बार सुखबीर बादल भारी मतों से जीत चुके हैं। लेकिन इस बार लड़ाई इसलिए भी दिलचस्प है कि जिस राय सिख बिरादरी की वोटों से सुखबीर जीतते रहे हैं उनका नेता शेर सिंह घुबाया इन दिनों अकाली दल से नाराज है और उनके बारे में चर्चा है कि वह किसी भी समय कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। ऐसे में सुखबीर को यह दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। सुखबीर के सीट बदलने और दो सीटों पर खड़े होने का मैसेज गलत जाने की संभावना को देखते हुए ही अभी तक उनके नाम का ऐलान नहीं हो रहा है। राय सिख बिरादरी की वोट को देखते हुए ही आम आदमी पार्टी ने पहले ही मोहन सिंह फलियांवाला को फिरोजपुर रूरल से टिकट दे दिया है। पार्टी उनकी जलालाबाद में मदद ले सकती है। ऐसा हुआ तो सुखबीर बादल के लिए मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि इसीलिए धूरी, लंबी और मोहाली की सीट पर अभी तक किसे के नाम की घोषणा नहीं हुई है।</p>
<p><strong>गुलशन से नाराजगी के बीच फंसे कोटफत्ता</strong><br />
भटिंडा ग्रामीण व भुच्चो मंडी पर भी अभी फैसला नहीं हुआ है। दरअसल पूर्व सांसद परमजीत कौर गुलशन को भटिंडा रूरल सीट देने का फैसला हो गया है लेकिन पार्टी की जिला इकाई उनके खिलाफ है। सुखबीर बादल, जिला सिकंदर सिंह मलूका आदि उन्हें टिकट नहीं देना चाहते लेकिन परमजीत गुलशन की पैरवी खुद सीएम प्रकाश सिंह बादल कर रहे हैं। ऐसे में इस सीट के मौजूदा विधायक दर्शन सिंह कोटफत्ता को भुच्चो मंडी शिफ्ट करने का फैसला नहीं हो पा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>पटियाला सीट से नहीं मिल रहा उम्मीदवार</strong><br />
मोहाली सीट जनरल होने के बावजूद सुखबीर बादल इस सीट पर दलित उम्मीदवार कुलवंत सिंह को उतारना चाहते हैं जो इस समय मोहाली नगर निगम के मेयर हैं। पता चला है कि उन्होंने चुनाव लड़ने से साफ इंकार कर दिया है। उधर, लगभग यही हालत ट्राइटेंड ग्रुप के चेयरमैन राजिंदर गुप्ता का है। सुखबीर बादल बरनाला में एक रैली के दौरान लगभग उनकी सीट घोषित कर आए थे लेकिन राजिंदर गुप्ता ने अभी तक चुनाव लड़ने की हामी नहीं भरी है। उनकी न के बाद संभव है कि पार्टी अपने मौजूदा विधायक प्रेम मित्तल को बरनाला से टिकट दे दे। मित्तल की मानसा से सीट कट चुकी है। पटियाला सीट पर भी पार्टी को उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। पिछले उपचुनाव में हिंदू कैंडीडेट भगवान दास जुनेजा को यहां से उतारकर नया प्रयोग किया गया था जो फेल हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जागीर कौर अपने दामाद के लिए चाहती हैं टिकट</strong><br />
लुबाणा बिरादरी बाहुल भुलत्थ सीट पर भी पार्टी को उम्मीदवार की तलाश है। अकाली दल की दिग्गज नेता बीबी जागीर कौर इस समय इस सीट से विधायक हैं लेकिन उन्हें अपनी बेटी के गर्भ गिराने के केस में सजा होने के कारण मामला फंसा हुआ है। वह अपने दामाद के लिए सीट चाहती हैं लेकिन सर्वे में सीट बीबी जागीर कौर के लिए सुरक्षित बताई जाती है। यह से उनका मुकाबला आम आदमी पार्टी के सुखपाल खैहरा से है। इंद्रबीर बुलारिया के अकाली दल को छोड़कर जाने के बाद, यहां से भी पार्टी को कोई सशक्त उम्मीदवार नहीं मिल रहा है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Dec 2016 00:40:47 +0530</pubDate>
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