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                <title>Dr. Lohia - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Dr. Lohia RSS Feed</description>
                
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                <title>डॉ. लोहिया और राष्ट्र की मौजूदा समस्याएं</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्र व्यवस्था में बेहतर बदलाव के लिए डॉ. लोहिया ने सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन की बात कही थी। उनका स्पष्ट कहना था कि गैर-बराबरी को खत्म किए बिना समतामूलक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद की स्थापना पर बल दिया। उन्होंने पूंजीवाद की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/current-problems-of-dr-lohia-and-nation/article-6230"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/dr-lohia.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राष्ट्र व्यवस्था में बेहतर बदलाव के लिए डॉ. लोहिया ने सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन की बात कही थी। उनका स्पष्ट कहना था कि गैर-बराबरी को खत्म किए बिना समतामूलक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद की स्थापना पर बल दिया। उन्होंने पूंजीवाद की आलोचना करते हुए कहा था कि पूंजीवाद कम्युनिज्म की तरह ही जुआ, अपव्यय और बुराई है और दो तिहाई विश्व में पूंजीवाद पूंजी का निर्माण नहीं कर सकता। वह केवल खरीद-फरोख्त ही कर सकता है जो हमारी स्थितियों में महज मुनाफाखोरी और कालाबाजारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. लोहिया ने यह भी कहा था कि मैं फोर्ड और स्टालिन में कोई फर्क नहीं देखता। दोनों बड़े पैमाने के उत्पादन, बड़े पैमाने के प्रौद्योगिकी और केंद्रीकरण पर विश्वास करते हैं जिसका मतलब है दोनों एक ही सभ्यता के पुजारी हैं। लोहिया ने गरीबी और युद्ध को पूंजीवाद की दो संतानें कहा। साम्यवाद पर कटाक्ष करते हुए कहा कि साम्यवाद दो-तिहाई दुनिया को रोटी नहीं दे सकता। उन्होंने आदर्श समाज व राष्ट्र के लिए एक तीसरा रास्ता सुझाया-वह है समाजवाद का। उन्होंने देश के सामने समाजवाद का सगुण और ठोस रुप प्रस्तुत किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि समाजवाद गरीबी के समान बंटवारें का नाम नहीं बल्कि समृद्धि के अधिकाधिक वितरण का नाम है। बिना समता के समृद्धि असंभव है और बिना समृद्धि के समता व्यर्थ है। डॉ. लोहिया का स्पष्ट मानना था कि आर्थिक बराबरी होने पर जाति व्यवस्था अपने आप खत्म हो जाएगी और सामाजिक बराबरी स्थापित होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए सामाजिक समता पर आधारित दुष्टिकोण अपनाना होगा। सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए जाति व्यवस्था के विरुद्ध लड़ाई द्वेष के वातावरण में नहीं, विश्वास के वातावरण में होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जाति व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि जाति प्रणाली परिवर्तन के खिलाफ स्थिरता की जबर्दस्त शक्ति है। यह शक्ति वर्ततान क्षुद्रता और झुठ को स्थिरता प्रदान करती है। लेकिन दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज इक्कीसवीं सदी में भारत की राजनीति जाति व्यवस्था पर केन्द्रित है। डॉ. लोहिया अक्सर चिंतित रहा करते थे कि आजादी के उपरांत भारतीय समाज का स्वरुप क्या होगा। उन्हें आशंका थी कि सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में समाज के वंचित, दलित और पिछड़े तबके को समुचित भागीदारी मिलेगी या नहीं। उनकी उत्कट आकांक्षा हाशिए पर खड़े लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा में सम्मिलित करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वे समाज के अंतिम पांत के अंतिम व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों के हिमायती थे। आजादी के बाद पंडित नेहरु के नेतृत्व में गठित सरकार के खिलाफ वे आम जनता की आवाज बनते देखे गए। उन्होंने नेहरु सरकार की समाजनीति की जमकर आलोचना की। नेहरु सरकार को जाति-परस्ती और कुनबा-परस्ती का पोषक बताया। लोहिया ने नाइंसाफी और गैर-बराबरी खत्म करने के लिए देश के समक्ष सप्तक्रांति का दर्शन प्रस्तुत किया। नर-नारी समानता, रंगभेद पर आधारित विषमता की समाप्ति, जन्म तथा जाति पर आधारित समानता का अंत, विदेशी जुल्म का खात्मा तथा विश्व सरकार का निर्माण, निजी संपत्ति से जुड़ी आर्थिक असमानता का नाश तथा संभव बराबरी की प्राप्ति, हथियारों के इस्तेमाल पर रोक और सिविल नाफरमानी के सिद्धांत की प्रतिष्ठापना तथा निजी स्वतंत्रताओं पर होने वाले अतिक्रमण का मुकाबला।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सप्तक्रांति में लोहिया के वैचारिक और दार्शनिक तत्वों का पुट है। साथ ही भारत को वर्तमान संकट से उबरने का मूलमंत्र भी। लोहिया स्त्री-पुरुष की बराबरी और समानता के प्रबल हिमायती थे। वे अक्सर स्त्रियों को पुरुष पराधीनता के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत देते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देकर ही एक स्वस्थ और सुव्यवस्थित समाज का निर्माण किया जा सकता है। स्त्री-पुरुष, अमीरी-गरीबी और सामाजिक भेदभाव के लिए वे सिर्फ सरकारों को ही जिम्मेदार ठहराते थे। वे सरकारों द्वारा आम आदमी की उपेक्षा पर अक्सर कहा करते थे कि सत्ता सदैव जड़ता की ओर बढ़ती है और निरंतर निहित स्वार्थों और भ्रष्टाचारों को पनपाती है। विदेशी सत्ता भी यही करती है। अंतर केवल इतना है कि वह विदेशी होती है,</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए उसके शोषण के तरीके अलग होते हैं। किंतु जहां तक चरित्र का सवाल है, चाहे विदेशी शासन हो या देशी शासन, दोनों की प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को विकसित करने में व्यक्त होती है। उन्होंने जनता का आह्नान करते हुए कहा था कि देशी शासन को निरंतर जागरुक और चौकस बनाना है तो प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों को समझे और जहां कहीं भी उस पर चोट होती हो, या हमले होते हों उसके विरुद्ध अपनी आवाज उठाए। गौर करें तो डॉ. लोहिया की कही बातें वर्तमान भारतीय शासन व्यवस्था पर सटीक बैठती हंै। आज देश में गैर-बराबरी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, जातिवाद, क्षेत्रवाद और आतंकवाद जैसी समस्याएं गहरायी हैं। यह सही है कि देश तरक्की का आसमान छू रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों में व्यापक गिरावट के कारण अमीरी-गरीबी की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। जनवादी होने का मुखौटा चढ़ा रखी सरकारें बुनियादी कसौटी पर विफल हैं। और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने में नाकाम हैं। नागरिक समाज के प्रति रवैया संवेदनहीन है। लोहिया ने बेहतरीन समाज निर्माण के लिए सत्तातंत्र को चरित्रवान होना जरुरी बताया था। उनका निष्कर्ष था कि सत्यनिष्ठा और न्यायप्रियता पर आधारित शासनतंत्र ही लोक व्यवस्था के लिए श्रेयस्कर साबित हो सकता है। लोहिया भारतीय भाषाओं को समृद्ध होते देखना चाहते थे। उन्हें विश्वास था कि भारतीय भाषाओं के समृद्ध होने से देश में एकता मजबूत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोहिया का दृष्टिकोण विश्वव्यापी था। उन्होंने भारत पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने के लिए महासंघ बनाने का सुझाव दिया। आज भी यदा-कदा उस पर बहस चलती रहती है। उन्होंने भारत की सुरक्षा को लेकर हिमालय नीति बनाई जिसका उद्देश्य था नेपाल, भूटान, सिक्किम (तब) आदि उत्तर-पूर्व के छोटे-छोटे देशों में बसने वाली आबादी के साथ भाईचारे के संबंध बनाना तथा भारत की उत्तर सीमा पर स्थित प्रदेशों में लोकतांत्रिक आंदोलनों को मजबूत कर भारतीय सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने चीन द्वारा तिब्बत पर आक्रमण कर उसे अपने कब्जे में लेने की घटना को शिशु हत्या करार दिया। नागरिक अधिकारों को लेकर लोहिया का दृष्टिकोण साफ था। उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र में सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा को अनुचित मानने का मतलब होगा भक्त प्रहलाद, चार्वाक, सुकरात, थोरो और गांधी जैसे महान सत्याग्रहियों की परंपरा को नकारना। सिविल नाफरमानी को न मानना सशस्त्र विद्रोह को आमंत्रित करना। लेकिन बिडंबना यह है कि भारत की मौजूदा सरकारें लोहिया के उच्च आदर्शो को अपनाने के बजाए तानाशाही पर आमादा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के बाद से ही नागरिक अधिकारों का पुलिसिया दमन जारी है। सत्ता की रक्षा के लिए देश, समाज और संविधान से घात कर रही हैं। लोहिया ने राजनीति में तिकड़म और तात्कालिक स्वार्थ को हेय बताया। जबकि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में यह नीतियां सत्ता प्राप्ति की आधार बन रही हैं। सत्तातंत्र द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी पर लोहिया ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस गति से हम लोग अपने प्रधानमंत्रियों के लिए समाधि-स्थल बना रहे हैं, यह शहर जल्दी ही, जिंदा लोगों के बजाए मुर्दों का शहर हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भविष्य की पीढ़ियों को इन मूर्तियों, संग्रहालयों और चबूतरों में से बहुतेरों को हटाना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई आदमी मरे तो तीन सौ बरस तक उसका सिक्का या स्मारक मत बनाओं और तब फैसला हो जाएगा कि वह आदमी वक्ती था या इतिहास का था। लेकिन दुर्भाग्य है कि देश के रहनुमा यह समझने को तैयार नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वे अपने-अपने राजनीतिक पुरोधाओं की मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण पर जनता की गाढ़ी कमाई खर्च कर रहे हैं। सार्वजनिक हित की योजनाओं का नामकरण भी राजनेता विशेष के नाम पर किया जा रहा है। यह लोकतंत्र की प्रवृत्ति के अनुरुप नहीं है। इससे समाज व राष्ट्र की एकता-अखण्डता और पंथनिरपेक्षता प्रभावित होगी। समस्याओं के निराकरण के बजाए अराजकता बढ़ेगी। भारत के वर्तमान संकट का हल लोहिया के सिद्धांतो में तलाशा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>अरविंद जयतिलक</strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Fri, 12 Oct 2018 15:27:01 +0530</pubDate>
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                <title>डॉ लोहिया ने जलाई थी गोवा मुक्ति संग्राम की अलख</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता भारत का खूबसूरत शहर गोवा 18 जून को क्रांति दिवस के रूप में मनाता है। इस दिन समाजवादी नेता डॉ. क्टर राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का शंखनाद किया था। यह दिन गोवा की आजादी की लडाई के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/dr-lohia-had-burnt-alive-for-the-liberation-struggle-of-goa/article-4262"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/dr-lohia.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता भारत का खूबसूरत शहर गोवा 18 जून को क्रांति दिवस के रूप में मनाता है। इस दिन समाजवादी नेता डॉ. क्टर राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का शंखनाद किया था। यह दिन गोवा की आजादी की लडाई के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पुर्तगालियों के 550 वर्ष के शासन से गोवा को आजादी दिलाने वाले डॉक्टर लोहिया ने 18 जून को गोवा के लोगों को एकजुट होने और पुर्तगाली शासन के खिलाफ लड़ने का संदेश दिया था। भारत को 1947 में आजादी मिल गई थी, लेकिन इसके 14 साल बाद भी गोवा पर पुर्तगाली अपना शासन जमाये बैठे थे। 19 दिसम्बर, 1961 को भारतीय सेना ने आॅपरेशन विजय अभियान शुरू कर गोवा, दमन और दीव को पुर्तगालियों के शासन से मुक्त कराया था</p>
<p style="text-align:justify;">18 जून 1946 को डॉ. राम मनोहर लोहिया ने गोवा जाकर स्थानीय निवासियों को पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन करने के लिए प्रेरित किया था। लंबे अरसे तक चले आंदोलन के बाद 19 दिसम्बर 1961 को गोवा को पुर्तगाली आधिपत्य से मुक्त कराकर भारत में शामिल कर लिया गया था। 1946 में आज ही के दिन डॉ.क्टर राममनोहर लोहिया ने पुर्तगालियों के खिलाफ आंदोलन का नारा दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">तब अंग्रेजी साम्राज्य डूब रहा था, कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि अंग्रेजों के जाते ही पुर्तगाली भी गोवा से कूच कर जाएंगे। पर स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया सहमत नहीं थे कि बिना आंदोलन छेड़े ऐसा संभव हो पाएगा। हालांकि गोवा को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करवाने में कई साल और लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवा की आजादी का शंखनाद समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने किया था। आज भी वहाँ के लोकगीतों में डॉ. लोहिया का वर्णन पौराणिक नायकों की तरह होता है। गोवा की आजादी में लोहिया और उनके समाजवादी साथियों का बड़ा योगदान था।</p>
<p style="text-align:justify;">लोहिया ने पहली बार गोवा के आजादी के मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया और लोगों का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुए। अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए मगर गोवा पर पुर्तगाल का कब्जा बना रहा। लोहिया गोवा मुक्ति आंदोलन के महान सेनानी थे। उन्होंने 1942 से ही गोवा मुक्ति आंदोलन का बीड़ा उठाया।</p>
<p style="text-align:justify;">15 जून 1946 को पंजिम में डॉ. लोहिया की सभा हुई जिसमें तय हुआ 18 जून से सविनय अवज्ञा प्रारम्भ होगा। पुलिस ने टैक्सी वालों को मना कर दिया था। डॉ. लोहिया मड़गाँव सभा स्थल घोड़ागाड़ी से पहुँचे। घनघोर बारिश, 20 हजार की जनता और मशीनगन लिए हुए पुर्तगाली फौज। गगनचुम्बी नारों के बीच डॉ. लोहिया के ऊपर प्रशासक मिराण्डा ने पिस्तौल तान दिया, लेकिन लोहिया के आत्मबल और आभामण्डल के आगे उसे झुकना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">पांच सौ वर्ष के इतिहास में गोवा में पहली बार आजादी का सिंहनाद हुआ। लोहिया गिरफ्तार कर लिए गए। पूरा गोवा युद्ध-स्थल बन गया। पंजिम थाने पर जनता ने धावा बोल कर लोहिया को छुड़ाने का प्रयास किया। एक छोटी लड़की को जयहिन्द कहने पर पुलिस ने काफी पीटा। 21 जून को गवर्नर का आदेश हुआ कि आम-सभा व भाषण के लिए सरकारी आदेश लेने की आवश्यकता नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">लोहिया चौक पर झण्डा फहराया गया। गोवा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा पुर्तगाल को तीन माह की नोटिस देकर लोहिया लौट आए। 26 जून 1946 के अंक में महात्मा गांधी ने लेख लिख कर लोहिया की गिरफ्तारी का पुरजोर विरोध किया।</p>
<p style="text-align:justify;">तीन महीने पश्चात डॉ. लोहिया दोबारा गोवा के मड़गाँव के लिए चले। उन्हें कोलेम में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 29 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक उन्हें आग्वाद के किले में कैदी बनाकर रखा गया, बाद में अनमाड़ के पास लाकर छोड़ा गया। 2 अक्टूबर को अपने जन्मदिन के दिन गांधी जी ने लार्ड बेवेल से लोहिया की रिहाई के लिए बात की। लोहिया पर गोवा-प्रवेश के लिए मनाही हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवा मुक्ति आंदोलन के इतिहास में जिन लोगों ने अपना खून पसीना बहाया और जेल की यंत्रणा सही इस दिन उनका समरण देशवासियों के लिए जरुरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवा आंदोलन में समाजवादी नेता डॉ. लोहिया और उनके साथियों की भूमिका अविसमरणीय है जिन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए गोवा को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोहिया के लम्बे जनजागरण के बाद गोवा को आजादी मिली थी।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Mon, 18 Jun 2018 08:43:32 +0530</pubDate>
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                <title>नारी अस्मिता के प्रबल पैरोकार थे डॉ. लोहिया</title>
                                    <description><![CDATA[डॉ.लोहिया नर-नारी समानता के प्रबल पैरोकार थे। वे अक्सर स्त्रियों को पुरुष की पराधीनता के खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिम्मत देते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देकर ही एक स्वस्थ और सुव्यवस्थित समाज का निर्माण किया जा सकता है। वे पुरुषों द्वारा लादी गयी नारी की पराधीनता और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/dr-lohia-was-the-strong-advocate-of-womens-asmita/article-3649"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/dr.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">डॉ.लोहिया नर-नारी समानता के प्रबल पैरोकार थे। वे अक्सर स्त्रियों को पुरुष की पराधीनता के खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिम्मत देते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देकर ही एक स्वस्थ और सुव्यवस्थित समाज का निर्माण किया जा सकता है। वे पुरुषों द्वारा लादी गयी नारी की पराधीनता और स्त्रियों द्वारा उसकी सहज स्वीकृति के सख्त विरुद्ध थे। उन्हें कतई पसंद नहीं था कि औरतें घूंघट और पर्दे में रहें और पुरुष समाज उनका शोषण और अनादर करता रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">वे स्त्रियों को पुरुषों की तरह मुखर व निडर देखना चाहते थे। यही वजह है कि उन्हें ऐसी स्त्रियां पसंद थी जिनमें अपने स्वाभिमान की रक्षा और दमदारी से अपनी बात कहने की ताकत थी। उनका नारी आदर्श द्रौपदी थी जिसने अपने चीरहरण के समय पांडवों की चुप्पी पर सवाल दागा और कौरवों के अत्याचार के विरुद्ध तनकर खड़ी हुई। जाति और योनि के कटघरे लेख में डॉ. लोहिया ने नर-नारी समानता के सवाल पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने तार्किकतापूर्वक स्त्री को पराधीन बनाने वाली वह हर संस्कृति, नैतिकता, परंपरा और मूल्यों पर चोट किया है जो नर-नारी समानता के विरुद्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस निबंध में उन्होंने एक स्थान पर लिखा है कि जब मैं कहा करता हूं कि द्रौपदी हिंदुस्तान की सच्चे माने में प्रतीक है, सावित्री उसके जितनी नहीं, तब इसी अंग को देखकर कहता हूं कि वह ज्ञानी, समझदार, बहादुर, हिम्मतवाली और हाजिरजवाब थी। न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि दुनिया में मुझे द्रौपदी जैसी औरत नहीं मिली। उन्होंने इस निबंध में एक स्थान पर सीता और सावित्री के पतिव्रत धर्म का महिमामंडन करने वालों से सवाल किया है कि क्यों हमारे समूचे इतिहास में पत्नीव्रत का उदाहरण नहीं मिलता?</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल वे यह कहना चाहते हैं कि जब एक स्त्री पतिव्रत धर्म का पालन कर सकती है तो एक पुरुष क्यों नहीं? उन्होंने जाति और योनि के कटघरे में एक स्थान पर समाज से सवाल पूछा है कि एक औरत जिसने तीन बार तलाक दिया और चौथी बार फिर शादी करती है और एक मर्द जो चैथी बार इसलिए शादी करता है कि उसकी एक के बाद एक पत्नियां मर गयी तो इन दोनों में कौन ज्यादा शिष्ट और नैतिक है? डॉ. लोहिया ने परंपरा और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार की सख्त मुखालफलता की है। यही वजह है कि उन्हें पद्मिनी का जौहर पसंद नहीं था बल्कि वे रजिया बेगम की बहादूरी के कायल थे।</p>
<p style="text-align:justify;">एक सभा में उन्होंने श्रोताओं से प्रश्न भी किया कि तुम्हें कैसी स्त्रियां अच्छी लगती हैं? क्या वे जो पति के मरने के बाद जौहर कर लेती हैं या वे जो जीवित रहकर सारे कष्टों को उठाते हुए अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करती हैं? डॉ. लोहिया को राजमहलों में रहने वाली रानियां भी पसंद नहीं थी। वह उस रुसी स्त्री नटाली के बेहद प्रशंसक थे जो जर्मन सेना के बीच सफाई का कार्य करते हुए अपने देश की जीत के लिए जान को जोखिम में डालकर जासूसी करती रही और हजारों जर्मन सैनिकों की मौत सुनिश्चित की।</p>
<p style="text-align:justify;">वे चंद्रगुप्त मौर्य कालीन विषकन्याओं के भी प्रशंसक थे जो राष्ट्र के निमित्त अपने प्राणों का उत्सर्ग करने से तनिक भी नहीं हिचकती थी। डॉ. लोहिया स्त्रियों के सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के प्रति भी संवेदनशील थे। उन्हें कतई पसंद नहीं था कि स्त्रियां गुलामों की तरह पुरुषों के सामने लाचार नजर आएं। वे सभी जाति की स्त्रियों को शैक्षिक और सामाजिक रुप से पिछड़ा मानते थे। यही वजह है कि वह उनके लिए विशेष अवसरों की वकालत करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">महिलाओं को नौकरियों में आरक्षण देने के उनके सुझाव को दोनों पिछड़ा वर्ग आयोगों ने (कालेलकर और मंडल आयोग) ने स्वीकारा भी। वे संसद और विधानमंडलों में भी महिलाओं के आरक्षण चाहते थे। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि डॉ. लोहिया और उनकी विचारधारा को अपना आदर्श मानने वाले सियासी दल भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण के पक्षधर नहीं हैं। वे कुतर्कों का आश्रय लेकर आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उसी का परिणाम है कि आज देश में लैंगिक भेदभाव की स्थिति बनी हुई है और महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है। आज सरकार हो या संसद, विधानसभा हो या विधान परिषदें, उच्च न्यायालय हो या उच्चतम न्यायालय, आइएएस हों या बैंक कर्मचारी सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फैसले लेने वाले उच्च पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी उनकी आबादी की तुलना में बहुत ही कम है।</p>
<p style="text-align:justify;">जनसंख्या के मुताबिक संसद में भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की अपेक्षा कम है। अगर महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित कर दिया जाए तो संसद में भी उनका प्रतिनिधित्व सम्मानजनक हो सकता है। बेहतर होगा कि राजनीतिक दल इस दिशा में ठोस पहल कर लोहिया के सपनों को पूरा करें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-रीता सिंह</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 23 Mar 2018 05:53:51 +0530</pubDate>
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