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                <title>Gutter Life - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>गटर में डूबती जिंदगी</title>
                                    <description><![CDATA[आजाद भारत में औसतन हर दूसरे-तीसरे दिन एक सफाईकर्मी की मौत गटर साफ करने के दौरान होती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद केंद्र सरकार ने इन मौतों को रोकने के लिए तो अभी तक ठोस पहल नहीं शुरू की है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के मुताबिक हर 5 दिन में एक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/gutter-life/article-9905"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/gutter-life.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आजाद भारत में औसतन हर दूसरे-तीसरे दिन एक सफाईकर्मी की मौत गटर साफ करने के दौरान होती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद केंद्र सरकार ने इन मौतों को रोकने के लिए तो अभी तक ठोस पहल नहीं शुरू की है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के मुताबिक हर 5 दिन में एक सफाई कर्मचारी की मौत गटर में होती है। देश भर में मैला प्रथा के खात्मे और सीवर-सेप्टिक टैंक में मौतों को रोकने के लिए काम कर रहे संगठन- सफाई कर्मचारी आंदोलन ने देश भर से करीब 1800 ऐसी मौतों का आंकड़ा जुटाया है। सेप्टिक टैंक यानी मलकुंड की सफाई मानव द्वारा करवाना हमारे देश में आम बात है। कई सालो से यह प्रथा चली आ रही है। हमें विकासशील देश का टैग मिला हुआ है जो कि कब विकसित में तब्दील होगा पता नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">सेप्टिक टैंक में काम करने वाले लोग ज्यादातर गरीब वर्ग से होते हैं जिन्हें हमारे देश में अंग्रेजी शब्दावली के अनुसार शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राइब के नाम से जाना जाता है और देश की भाषा के अनुसार ना जाने कौन-कौन से जाती का नाम दिया जाता है। आजादी के 73 सालों बाद भी आज सेप्टिक टैंक कि सफाई ये भीतर जाकर करते हैं, इनके पास मशीनों से साफ करने के लिए उपयुक्त संसाधन बहुत ही कम हंै। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में आज भी सेप्टिक टैंक कि सफाई लोग भीतर जाकर करते हैं, और इसमें कुछ लोगों की मौत भी हो जाती है, पर बात वही है ना चलता है तो चलने दो। देश के विभिन्न भागों में मलकुंड की सफाई करते हर साल सैंकड़ों लोग अकाल मौत के शिकार हो जाते हंै। ये लोग सफाई करते समय वे जहरीली गैसों को बर्दास्त नहीं कर पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">सेप्टिक टैंक के भीतर बहुत सी जहरीली गैसें होती हैं जिससे कि उसके भी भीतर जो भी जाता है, वह उसमें ठीक तरह से सावधानी ना लेने के कारण या गैस ना बर्दास्त करने के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठता है। यह गैसें बहुत जहरीली होती हैं जो कि श्वास द्वारा भीतर जाती हंै और दिमाग को सुन्न कर देती है जिससे भीतर गया हुआ व्यक्ति अपना संतुलन खोने लगता है। मान लिया की हम विकासशील देश हैं हमारे पास गांव देहात में उचित मशीनी उपकरणों की कमी होती है लेकिन ये मान लेना कठिन है की शहरों में ये सुविधा उपलब्ध ना हो खासकर के देश के प्रमुख महानगरों में, तो सुनकर बड़ा ही दुख होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में औसतन 10 से 15 मौतें प्रति माह सिर्फ सेप्टिक टैंक में भीतर सफाई करते समय जहरीली गैसों के प्रभाव से होती हंै, सरकार इन मुद्दों को गंभीर रूप से नहीं लेती इसी वजह से इतनी दिक्कतें आती हैं। जो लोग इस काम को करते हैं वे अपनी रोजी रोटी के लिए करते हैं, पर उनको रोजगार सुविधापूर्ण दिया जाए तो काम बहुत ही आसानी से होगा। इस सफाई प्रणाली के कार्य में पिछड़े वर्ग के लोग काम करते हैं जिनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही आते हैं लेकिन वोट बैंक की सरकारें इन्हें भी बाटने में कोई कसर नहीं छोड़ती।</p>
<p style="text-align:justify;">एनडीए के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। आधुनिकीकरण पर बल देकर इन कार्यों को सुचारू रूप से चलाने की आवश्यकता है, अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम कल भी विकासशील थे और आने वाले कल में भी विकासशील ही रहेंगे क्योंकि यही सब को छोटे छोटे कार्यों में सुधार करने से ही देश आगे बढ़ेगा, और खासकर उन ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है जो इन हथकंडो को अपनाते है। अगर काम करवाने वाला ही सुधार जाए तो तो करने वाले को तो कोई तकलीफ होगी ही नहीं।<br />
<strong><em>-हर्ष शर्मा</em></strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jul 2019 14:28:02 +0530</pubDate>
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                <title>कैसे बचेगी गटर में दम तोड़ती जिन्दगी</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। से सभी लोग सेप्टिक अटैक की सफाई करने के लिये उसमें उतरे थे। सेप्टिक टैंक में कीचड़ होने से सभी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/how-to-survive-in-gutter-life/article-3659"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/gutter.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। से सभी लोग सेप्टिक अटैक की सफाई करने के लिये उसमें उतरे थे। सेप्टिक टैंक में कीचड़ होने से सभी मजदूर उसमें धंस गये व दम घूट जाने की वजह से उनकी मौत हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के विभिन्न हिस्सो में हम आये दिन इस प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित खबरें समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं। देश में हर साल काफी लोग गटर की सफाई करने के दौरान दम घुटने से मारे जाते हैं। हर मौत का कारण ये वही गटर है जिसके आस पास से हम गुजरना भी पसंद नहीं करते हैं। सरकार और सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने की बात करते हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता है। सीवर की गंदगी से उन्हें लाइलाज बीमारियां हो जाती है जो आखिर में उन्हें मौत के मुंह में ले जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के विभिन्न हिस्सो में पिछले छ: माह में गटर की सफाई करने के दौरान 100 से अधिक व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। अधिकतर टैंक की सफाई के दौरान मरने वालों की उम्र 20 से 50 वर्ष के लोगों की होती है। देश के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लोगों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देश भी। इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं। इस कारण इनके मरने पर ना तो कहीं विरोध दर्ज होता है और न ही भविष्य में ऐसी दुर्घटनाएं रोकने के उपाय।</p>
<p style="text-align:justify;">यह विडंबना है कि सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सीवर की सफाई के लिए केवल मशीनों का ही उपयोग किया जाना। इसके बावजूद इन सफाई कर्मचारियों को बिना किसी तकनीक यंत्र के शरीर पर सरसों का तेल लगाकर गटर में सफाई करने उतारा जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि समय बीते के साथ-साथ वे कई तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश भर में 27 लाख सफाई कर्मचारी हैं। जिसमें 7 लाख 70 हजार सरकारी सफाई कर्मचारी है। 20 लाख सफाई कर्मचारी ठेके पर काम करते हैं। औसतन एक सफाईकर्मी की मासिक कमाई 5 से 8 हजार रुपये प्रति महीना है। 90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 बरस से पहले हो जाती है। 60 फीसदी सफाईकर्मी कॉलरा, अस्थमा, मलेरिया और कैंसर जैसी बिमारियों से पीड़ित होते हैं। इस कार्य में बीमा की भी कोई सुविधा नहीं होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट के निदेर्शों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से सम्बंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकॉर्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, आवश्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लग कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाल कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं जैसे निदेर्शों का पालन होता कहीं नहीं दिखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भूमिगत सीवरों ने भले ही शहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, लेकिन इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इन अंधेरे नालो ने और भी अंधेरा कर दिया है। देश में दो लाख से अधिक लोग जाम हो गए सीवरों को खोलने, मेनहोल में घुस कर वहां जमा हो गई गाद, पत्थर को हटान के काम में लगे हैं। कई-कई महीनों से बंद पड़े इन गहरे नरक कुंडों में कार्बन मोनो आॅक्साईड, हाईड्रोजन सल्फाइड, मीथेन जैसी दमघोटू गैसें होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सभी सरकारी दिशा-निदेर्शों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकन के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मा और कान को ढंकन का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। मुंबई हाईकोर्ट का निर्देश था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है।</p>
<p style="text-align:justify;">सफाई का काम करने के बाद उन्हें नहाने के लिए साबुन व पानी तथा पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं इनको अभी तक नहीं मिल पा रही है। एक तरफ दिनों दिन सीवर की लंबाई में वृद्वि हो रही है वहीं दूसरी मजदूरों की संख्या में कमी आई।</p>
<p style="text-align:justify;">सीवर सफाई में लगे कुछ श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एग्जिमा और ऐसे ही चर्मरोग हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की शिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी । भूख न लगना उनका एक आम रोग है । इतना होने पर भी सीवरकर्मियों को उनके जीवन की जटिलताओं की जानकारी देने के लिए न तो सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुए हैं और न ही किसी स्वयंसेवी संस्था ने इसका बीड़ा उठाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">गटर की सफाई करने वालो की जान तो जाती ही है, इसके साथ ही इनका पूरा परिवार भी अनाथ हो जाता है। आमदनी का स्रोत खत्म हो जाता है। मासूम बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ दो वक्त के खाने की भी परेशानी हो जाती है। मरने वालों का पूरा परिवार बेसहारा हो जाता है। देश में जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान प्रतिवर्ष दम घुटने से काफी लोग मारे जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पता चलता है कि हमारी गंदगी साफ करने वाले हमारे ही जैसे इंसानों की जान कितनी सस्ती है। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना पड़ता है। इन लोगों के यहां रोटी-बेटी का रिश्ता करने में उनके ही समाज वाले परहेज करते हैं।अब सवाल यह है कि सरकारें नर्क जैसी जिंदगी गुजार रहे और सीवर मैनो की दर्दनाक मोतों के सिलसिलें को रोकने के लिए कभी सोचेगीं भी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-रमेश सर्राफ धमोरा</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Mar 2018 02:51:34 +0530</pubDate>
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