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                <title>Cinema - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Cinema RSS Feed</description>
                
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                <title>कब हुआ सिनेमा का आविष्कार</title>
                                    <description><![CDATA[चलचित्र यानी सिनेमा के आविष्कार का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं जाता। इसके विकास मे कई आविष्कारकों का योगदान रहा है। लेकिन इतना अवश्य है कि चलचित्र के जन्म का श्रेय किसी हद तक लुमिये बधुओं (फ्रांस) को दिया जा सकता है। हालाकि लुमिये बधुओं से पहले एडीसन, माइब्रिज तथा फ्रीज ग्रीन आदि अनेक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/when-was-the-invention-of-cinema/article-37372"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/history-of-cinema.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चलचित्र यानी सिनेमा के आविष्कार का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं जाता। इसके विकास मे कई आविष्कारकों का योगदान रहा है। लेकिन इतना अवश्य है कि चलचित्र के जन्म का श्रेय किसी हद तक लुमिये बधुओं (फ्रांस) को दिया जा सकता है। हालाकि लुमिये बधुओं से पहले एडीसन, माइब्रिज तथा फ्रीज ग्रीन आदि अनेक वैज्ञानिको ने सिनेमा क्षेत्र मे कार्य किया। चलचित्र या सिनेमा की कहानी 1830 से आरंभ होती है। अनेक व्यक्तियों ने ऐसे घूमने वाले चक्र बनाए जिनके ऊपर चित्र बने होते थे और जब उन्हे घुमाया जाता था तो ये चित्र चलते-फिरते प्रतीत होते थे। सिनेमा का यह आरम्भिक रूप था।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक एडीसन ने काइनेटो स्कोप नामक एक यंत्र बनाया। इसमे लगाने के लिए उसने 158 प्लेटो पर विभिन्न क्रमबद्ध मुद्राओ के फोटो खींचे, जो एक प्रणय-दृष्य से सबंधित थे। गत्ते पर छपे इन चित्रों की एक रील बनाकर इस यंत्र मे फिट की गयी। एक गोल छेद में से जब ये चित्र तेजी से एक-एक कर दर्शक की दृष्टि से गुजरते, तो इनमे गति के कारण सजीवता आ जाती और स्त्री-पुरुष चलते-फिरते नजर आते।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>किसने किया सिनेमा का आविष्कार</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">1880-90 में ब्रिस्टल के रहने वाले विलियम फ्रीज ग्रीन नामक अंग्रेज फोटोग्राफर ने चलते फिरते चित्रों पर अनेक प्रयोग किए। उन्होंने चित्रों के लिए प्रकाशग्राही इमल्सन के लेप वाले सेलुलाइड फिल्मों का इस्तेमालकिया। उन्होंने एक फर्म से अपना कैमरा और प्रोजेक्टर बनवाया और एक पार्क में जाकर कैमरे से कुछ फुट लम्बी एक फिल्म तैयार की। उसे अपनी प्रयोगशाला में धोकर उन्होने जब फिल्म से प्रोजेक्टर पर चढ़ाकर पर्दे पर देखा, तो वे खुशी से उछल पडे।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्दे पर बच्चे स्त्री-पुरुष, घोड़े आदि दौडतें भागते नजर आ रहे थे जैसे वे सचमुच के हो। परन्तु विलियम फ्रीज ग्रीन को अपने आविष्कार का विकास करने और पेटेंट कराने के लिए तत्काल धन न मिल सका। आर्थिक दबाव बढने से उन्होंने अपना ध्यान इस सिनेमा प्रोजेक्टर से हटा लिया ओर दूसरे कार्यो में लग गये।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>रंगमंच</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Sep 2022 12:21:29 +0530</pubDate>
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                <title>रीगल सिनेमा वित्तीय नुकसान के कारण अपने थिएटर करेगा बंद</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन। अमेरिका की दूसरी बड़ी सिनेमा थिएटर कंपनी रीगल सिनेमा कोरोना वायरस के कारण वित्तीय नुकसान को देखते हुए अमेरिका में अपने सभी 543 थिएटर बंद करेगा। कंपनी ने सोमवार को बयान जारी कर इसकी जानकारी दी। रीगल ब्रिटिश पेरेंट कंपनी सिनेवर्ल्ड है। हालांकि सप्ताह के अंत में 50 रीगल के स्थानों पर काम किया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/regal-cinema-will-close-its-theater-due-to-financial-loss/article-18965"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/regal-cinema.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन।</strong> अमेरिका की दूसरी बड़ी सिनेमा थिएटर कंपनी रीगल सिनेमा कोरोना वायरस के कारण वित्तीय नुकसान को देखते हुए अमेरिका में अपने सभी 543 थिएटर बंद करेगा। कंपनी ने सोमवार को बयान जारी कर इसकी जानकारी दी। रीगल ब्रिटिश पेरेंट कंपनी सिनेवर्ल्ड है। हालांकि सप्ताह के अंत में 50 रीगल के स्थानों पर काम किया जाएगा। सिनेवर्ल्ड ने ट्वीट कर कहा, “हम ब्रिटेन और अमेरिका में अस्थायी रुप से सिनेमा को बंद करने के प्रस्ताव की पुष्टि करते हैं लेकिन इस बारे में अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। जैसे ही इस बाबत कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा हम अपने सभी स्टाफ को सूचित करेंगे।” अमेरिका में रीगल एएमसी के बाद दूसरे सिनेमा थिएटर की सबसे बड़ी कंपनी है जिसके 42 राज्यों में 543 थिएटर हैं और 7155 स्क्रीन है। यहां गत मार्च से कोरोना के कारण सिनेमाघर बंद पड़े हैं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 05 Oct 2020 10:23:24 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलायी मृणाल सेन ने</title>
                                    <description><![CDATA[जन्मदिवस 14 मई के अवसर पर | Mrinal Sen मुंबई। भारतीय सिनेमा जगत में मृणाल सेन का नाम एक ऐसे फिल्मकार के तौर पर शुमार किया जाता है जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिये भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई। 14 मई 1923 को फरीदाबाद अब बंग्लादेश में जन्में मृणाल सेन ने अपनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/rangmanch/mrinal-sen-gave-indian-cinema-a-special-recognition-at-the-international-level/article-15271"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-05/mrinal-sen.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">जन्मदिवस 14 मई के अवसर पर | Mrinal Sen</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई।</strong> भारतीय सिनेमा जगत में मृणाल सेन का नाम एक ऐसे फिल्मकार के तौर पर शुमार किया जाता है जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिये भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई। 14 मई 1923 को फरीदाबाद अब बंग्लादेश में जन्में मृणाल सेन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा फरीदाबाद से हासिल की। इसके बाद उन्होने कलकता के मशहूर स्काटिश चर्च कॉलेज से आगे की पढ़ाई पूरी की ।इस दौरान वह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के मृणाल सेन की रूचि फिल्मों के प्रति हो गयी और वह फिल्म निर्माण से जुड़े पुस्तकों का अध्यन्न करने लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौर में वह अपने मित्र ऋतविक घटक और सलिल चौधरी को अक्सर यह कहा करते कि भविष्य में वह अर्थपूर्ण फिल्म का निर्माण करेगे लेकिन परिवार की आर्थिक स्थित खराब रहने के कारण उन्हें अपना यह विचार त्यागना पड़ा और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में काम करना पड़ा। लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका मन इस काम में नही लगा और उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी। फिल्म के क्षेत्र में मृणाल सेन अपने करियर की शुरूआत कोलकाता फिल्म स्टूडियो में बतौर ..ऑडियो टेकनिशियेन ..से की।</p>
<p style="text-align:justify;">बतौर निर्देशक मृणाल सेन ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म ..रात भौर ..से की । उत्तम कुमार अभिनीत यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह नाकाम साबित हुयी ।इसके बाद वर्ष 1958 में मृणाल सेन की ..नील आकाशे नीचे ..फिल्म प्रदर्शित हुयी। फिल्म की कहानी एक ऐसे चीनी व्यापारी वांगलु पर आधारित होती है जिसे कलकता में रहने वाली बसंती अपने वामपंथी विचारधारा के जरिये प्रभावित करती है।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 13 May 2020 14:58:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिंदी सिनेमा के लिए भयावह सप्ताह : राहुल</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने जाने-माने अभिनेता ऋषि कपूर के निधन पर दुख जताते हुए उनके परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। गांधी ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा, “एक और महान अभिनेता ऋषि कपूर के निधन के साथ भारतीय सिनेमा के लिए यह भयावह सप्ताह बन गया है।” […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/horrible-week-for-hindi-cinema-rahul-gandhi/article-14877"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-04/election-commission-sought-report-on-rahul-gandhis-statement.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली।</strong> कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने जाने-माने अभिनेता ऋषि कपूर के निधन पर दुख जताते हुए उनके परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। गांधी ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा, “एक और महान अभिनेता ऋषि कपूर के निधन के साथ भारतीय सिनेमा के लिए यह भयावह सप्ताह बन गया है।” गौरतलब है कि बुधवार को प्रख्यात अभिनेता इरफान खान का निधन हुआ था। कांग्रेस नेता ने कहा, “ऋषि कपूर एक असाधारण अभिनेता थे और उनके चाहने वाले हर पीढ़ी के लोग थे। लोग उनको बहुत याद करते रहेंगे। उनके परिजनों तथा दुनियाभर में फैले उनके मित्रों तथा फैन के प्रति संवेदना व्यक्त करता हूं।” ऋषि कपूर का आज सुबह मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया। वह कैंसर से पीड़ित थे।</p>
<p> </p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/horrible-week-for-hindi-cinema-rahul-gandhi/article-14877</link>
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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2020 11:43:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सीएए जैसे उपद्रवी मसलों पर न बनें फिल्में</title>
                                    <description><![CDATA[मेरी हमेशा से कोशिश रही है कि मैं ऐसा करूं जिसमें जादुई छुअन हो। अपने काम के साथ न्याय कर सकूं।
आजकल आइटम गाना फिल्म का जरुरी हिस्सा बन गया है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/do-not-make-films-on-issues-like-caa/article-12258"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/cinema.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;"> सिनेमा के बदलते रूप को आप किस रूप में देखते हो?</h2>
<p style="text-align:justify;">गीतों के मुखड़े किसी भी बेरंग जीवन में रंग भरने का असरदार जरिया होते हैं। लेकिन मुखड़े खुद अब बेरंग हो गए हैं। भारतीय सिनेमा पिछले दो दशकों से एकदम बदल चुका है। एक जमाना था जब फिल्मों में दो पार्ट हुआ करते थे, पहला स्टोरी का तो और दूसरा गानों का। अब न ढंग की स्टोरी रही, न ही गाने। इसे समय की मांग कह लो, या फिर समय का बदलाव! रीमिक्स के दौर में सब पीछे छूट गया। रीमिक्स के नाम पर संगीत के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है। इसके लिए मैं प्रत्यक्ष रूप से किसी आधुनिक गीतकार को दोषी नहीं मानता। दोषी वो हैं जो ऐसे गीतों को बढ़ावा देते हैं। वह कौन हैं बताने की शायद जरूरत नहीं!</p>
<h2 style="text-align:justify;"> नए-पुराने गीतकारों में प्रतिस्पर्धा का दौर भी चल पड़ा है?</h2>
<p style="text-align:justify;">आज हर दूसरे दिन नई आवाज सुनने को मिलती है। पर, मैं इसे प्रतियोगिता नहीं मानता। प्रतियोगिता सुनने वालों में होती है वह खुद फर्क तय करते हैं। हां, वैसे किसी भी कलाकार के लिए एक स्वस्थ प्रतियोगिता बहुत जरूरी है। नहीं तो उसकी कला में निखार कैसे आएगा। प्रतियोगिताएं कलाकार को आगे ले जाने का काम करती हैं। जितना मुश्किल होगा, गाने का स्तर उतना अच्छा होगा। लेकिन प्रतियोगिता सामान्य लेबल की होनी चाहिए। गीतों का गला नहीं घोटना चाहिए। नए प्रयोगों में कोई बुराई नहीं, लेकिन अपने कल्चर को रखना ही चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;"> काफी समय से आपने कोई विज्ञापन नहीं लिखा?</h2>
<p style="text-align:justify;">ठण्डा मतलब कोका कोला’ एवं ‘बार्बर शॉप-ए जा बाल कटा ला’ जैसे प्रचलित विज्ञापन हैं जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली। विज्ञापनों की अगल विधा है कम समय अवधि में बहुत कुछ दशार्ना। डिमांड बहुत रहती है, पर स्पेस की कमी के चलते मेरे विज्ञापन समय सीमा में फिट नहीं बैठते। मेरा फोकस हमेशा से गीतों पर ही रहा है। जो मेरी पहचान भी है। मेरी हमेशा से कोशिश रही है कि मैं ऐसा करूं जिसमें जादुई छुअन हो। अपने काम के साथ न्याय कर सकूं। आजकल आइटम गाना फिल्म का जरुरी हिस्सा बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ठीक है इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन कितने लोग शोले के महबूबा-महबूबा जैसा आइटम गीत बना रहे हैं। मुगले-आजम और मदर इंडिया में भी आइटम गाना था, लेकिन आज बिना जरुरत इसे फिल्म में ठूंसा जा रहा है। आइटम सॉन्ग का मतलब अधनंगी लड़कियां और शोर-शराबा करना ही रह गया है। हेलेन भी आइटम सांग किया करतीं थी लेकिन आज कोई उनका मुकाबला कर सकता है क्या, शायद नहीं? रही बात विज्ञापनों की तो अब प्रत्येक विज्ञापन में फूहड़ता परोसी जा रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"> दर्शक अब सिनेमा को गंभीरता से नहीं लेते?</h2>
<p style="text-align:justify;">कई कारण हैं? सिनेमा के प्रति दर्शकों की तल्लीनता अब पहले जैसी नहीं रही। इसी कारण दर्शक सिनेमा को अब गंभीरता से नहीं लेते। दो-तीन दशक पहले नाम मात्र के गीतकार-संगीतकार हुआ करते थे लेकिन सब एक से बढ़ कर एक टेलैंटेड और मेहनती। उनके लिए गीत-संगीत ही सबकुछ होता था। एक टीम की तरह गीतकार, संगीतकार, गायक, निमार्ता, निर्देशक बैठते थे और फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से गाना तैयार करते थे। आज अनगिनत गीतकार और संगीतकार ,गायक हैं, लेकिन इस भीड़ में कुछों की ही बराबरी उस दौर के गीत-संगीतकारों से की जा सकती है। ऐसा नहीं है कि आज अच्छे गाने नहीं बनते, लेकिन आज गायक और संगीतकार के दिमाग में गाने के अलावा और भी हजारों चीजें घूमती रहती हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;"> विशुद्व गीतों को आखिर बढ़ावा कौन दे रहा है?</h2>
<p style="text-align:justify;">संतोष आनंद व मोहम्मद अजीज जैसे फनकारों की कदर नहीं होगी, तो विशुद्वता अपने आप पनपने लगेगी। वैसे देखा जाए अब बॉलीवुड में शॉट गानों की मेकिंग स्पीड तेजी से पकड़ चुकी है। शुद्व गानों में विशुद्वता घोलने का एक कारण यह भी हो सकता है। कुछ फिल्मकार बिना गीत के भी फिल्में बनाने लगे हैं। फिल्म में गाना न हो, तो वो अच्छी फिल्म को डुबो भी सकता है। फिल्मों में गानों को डालने का सेलेक्शन भी अब गलत होने लगा है। ऐसे में गानों की आत्मा को मारने के समान होता है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">आप केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष हैं, बदलाव ला सकते हो?</h2>
<p style="text-align:justify;">कई फिल्मों के सीन काटे गए हैं और कई फिल्मों पर रोक भी लगाई है। आजकल कुछ इस तरह ही फिल्में बन रहीं हैं जो बतातीं है कि लोगों की पसंद बड़ी तेजी से बदल रही है। शाहरुख खान बड़े जबरदस्त कलाकार हैं उनकी अपनी जगह है। लेकिन गीत-संगीत तो इन सबसे बढ़ कर रहा है। ढेरों ऐसी फिल्में हैं जो गानों के बल पर ही चलीं और आज भी लोग गानों से खिचें थियेटर चले आते हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;"> सीएए के खिलाफ हो रहे आंदोलन को आप किस रूप में देखते हो?</h2>
<p style="text-align:justify;">सरकार की नीतियों और नियत के खिलाफ विरोध करना जनमानस और विपक्षी दलों का मौलिक अधिकार होता है। पर, दायरे में रहकर, किसी को कोई नुकसान न हो। लेकिन मौजूदा मूवमेंट में ऐसा देखने को नहीं मिला। सरकारी संपत्तियों को सरेआम आग के हवाले करना, बसों को जलाना, तोड़फोड़ करना व हुड़दंग मचाने को आंदोलन नहीं कह सकते। इसके पीछे निश्चित रूप से कुछ और ही होता है। मुझे लगता है इस तरह के मसलों पर फिल्मों का निर्माण भी नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>रमेश ठाकुर</em></strong></p>
<p> </p>
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</span></span></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jan 2020 20:30:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दर्शकों के टेस्ट के हिसाब से ही बदला है सिनेमा</title>
                                    <description><![CDATA[पूरे देश में आगजनी, बसे-कारें जलाई जा रही हैं। पुलिसकर्मियों और राहगीरों पर पत्थरबाजी हो रही है।
 अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को लगता है कि एक्ट उनके खिलाफ है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/cinema-has-changed-according-to-audience-testing/article-11923"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/singer-actor-arun-bakshi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong><em>-सिंगर-एक्टर अरूण बख्शी सिनेमा के ऐसे मंझे हुए कलाकार हैं जिन्होंने ठहरे हुए और बदलते हुए फिल्म जगत का दौर देखा है। करीब दो सौ से ज्यादा फिल्में करने के बाद आज भी उसी गति से काम कर रहे हैं जो बीस साल पहले करते थे। अरूण बख्शी को अभिनेता के अलावा गायक के रूप में ज्यादा जाना जाता है। कई फिल्मों में उन्होंने हिट गाने गाए हैं। अभिनेता अरूण बख्शी की फिल्मी यात्रा पर डॉ. रमेश ठाकुर ने विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।</em></strong></p>
<h3 style="text-align:justify;"> आप पंजाब से ताल्लुक रखते हो, मायानगरी में कैसे पहुंचे?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> पंजाब-हरियाणा की मिट्टी में खेल और रचनात्मक दोनों मिश्रण है। मैं लुधियाना पंजाब से ताल्लुक रखता हूं। मेरी शिक्षा-दीक्षा भी वहीं से हुई। मैं क्रिकेटर बनना चाहता था। बहुत अच्छा मीडियम पेसर बॉलर हुआ करता था। लेकिन इसी बीच मेरा रेडियो से जुड़ना हुआ। गाना तो शुरू से ही गाता था। मेरी मम्मी अच्छी सिंगर थी इसलिए गायकी मुझे घर से प्राप्त हुई। बचपन में कोई भी बात मैं निराले अंदाज में प्रस्तुत करता था। बस, यही सबकुछ भांप कर एक दिन पिताजी ने कहा कि तुम्हारी जगह यहां नहीं, बल्कि फिल्मी दुनिया में है। हालांकि शुरूआत में मैंने खुद को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन किस्मत को यही मंजूर था। करीब दो सौ से ज्यादा फिल्में कर चुका हूं। सिलसिला शुरू से अबतक उसी गति से चल रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में सबका सहयोग परस्तर तरीके से मिल रहा है। यात्रा निरंतर चालू है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> पर्दे पर आपने ज्यादातर विलेन की ही भूमिका निभाई, कोई खास कारण?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> नब्बे का ऐसा दौर था। जब अमरीश पुरी, प्राण, ओमपुरी, रंजीत, शक्ति कपूर, कादर खान जैसे आइकॉनिक अदाकारों को विलेन के किरदारों में ही दर्शक देखनो पसंद करते थे। दर्शक उनके निगेटिव किरदारों के दीवाने हुआ करते थे। इस जमात में मैं भी शामिल था। डायरेक्टरों की उस वक्त गैंग हुआ करती थी। उन लोगों ने ठान लिया था कि हमें विलेन ही बनाएंगे। इसलिए हम भी उनके चुंगल से कभी आजाद ही नहीं हो सके। लेकिन सभी आपस में परिवार के सदस्यों की तरह काम किया करते थे।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> पिछले साल अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर गंभीर आरोप लगाकर काफी हंगामा काट दिया था?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> नाना पाटकेर बहुत सुलझे हुए इंसान हैं। मैंने उनके साथ कई फिल्में की हैं। मेरे जैसे कई कलाकार यही कहेंगे कि नाना बहुत सहयोगधर्मी इंसान हैं। आरोप लगाने वाली मोहतरमा काफी पहले ही फिल्म इंडस्ट्री छोड़ चुकी हैं। अचानक अवतरित होकर ये आरोप लगाते हैं इससे उनकी मंशा आसानी से भांपी जा सकती है। व्यक्तिगत तौर पर मैं उनके आरोपों से ज्यादा इस्तेफाक नहीं रखता। नाना को फिल्मी दुनिया के अलावा पूरा संसार अच्छे कामों के लिए जानता है इसलिए उनपर लगे आरोप पूरी तरह से निराधार ही कहे जाएंगे। मुझे लगता है कि किसी का बेवजह चरित्रहनन नहीं किया जाना चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिनेमा में आपकी शुरूआत गायकी से हुई या अदाकारी के साथ?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> दोनों एक साथ। गोविंदा-चंकी पांडे अभिनीत फिल्म आंखे का गाना ‘बड़े का बंदर’ बहुत हिट हुआ। इसके अलावा अक्षय पर फिल्माया गाना ‘झूले-झूले लाल’ आज भी डिस्को पार्टियों मे लगाातर बजता है। मैंने करीब 350 गाने गाये हैं। कर्मा फिल्म में गाने के लिए लक्ष्मीकांत प्यारे लाल मुझे घर से जबरदस्ती उठाकर ले गए थे। अमिताभ बच्चन जी पर भी मेरे कई गाने फिल्माए गए हैं। मुझे अमीन साहनी जैसे लोगों का साथ मिला था, जिसे मैं असल पूंजी मानता हूं। वह मेरी गायकी और आवाज से काफी प्रभावित थे। अदाकारी करने से ज्यादा मुझे गाना गाने में अच्छा लगता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> सिनेमा का पर्दा अब पहले के मुकाबले बदल चुका है। इसमें आप खुद को कैसे फिट मानते हो?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> देखिए, बदलाव प्रकृति का नियम है उस लिहाज से सभी को बदलना होता है और बदलना भी चाहिए? पहले के गानों और फिल्मों में ठहराव होता है स्थिरता रहती थी। लेकिन अब वह ठहराव नहीं रहा। हर चीज तेज गति से भाग रही है। पुराने गानों का रिमिक्स किया जाने लगा है। दर्शक और बाजार के हिसाब से सब कुछ तय होता है। मुझे पहले भी मजा आता था और अब भी भरपूर आ रहा है। दरअसल जिसमें सबों का भला हो, उसी को करना चाहिए। फिल्म इंडस्ट्री भी उसी राह पर चल रही है। वैसे आपको बता दूं, फिल्में और गाने दर्शकों के टेस्ट के हिसाब से तैयार होते हैं। फास्ट म्यूजिक सुनने के हम आदी हो चुके हैं। पहले तीन घंटे की फिल्में बनती थी। अब दो या सवा दो घंटे में ही सिमट जाती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> जीवन में कुछ ऐसा जिसको पाने की कोई ख्याहिश रह गई हो?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> फिल्म इंडस्ट्री ने उम्मीद से ज्यादा प्यार और सम्मान दिया है। जीवन की कुछ कश्तूरी हैं जिसे पाने की चाहत है। पर, समय के साथ उसे भी प्राप्त कर लूंगा। मुझे गंभीर रोल करने में मजा आता है। कलर टीवी के कार्यक्रम इश्क का रंग सफेद में मेरा जो रोल है वैसे रोल करने में भी मजा आता है। फिल्म इंडस्ट्री के सभी बड़े और नवोदित कलाकारों के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है। प्रभू से यही मांग करूंगा, ये सिलसिला यूं ही बदस्तूर जारी रहे।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> नागरिकता संशोधन एक्ट को लेकर पूरे देश में जो उपद्रव हो रहा है उसे आप कैसे देखते हैं?</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> मैं क्या, कोई भी इस मूवमेंट को नहीं देखना चाहता। पूरे देश में आगजनी, बसे-कारें जलाई जा रही हैं। पुलिसकर्मियों और राहगीरों पर पत्थरबाजी हो रही है। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को लगता है कि एक्ट उनके खिलाफ है। जबकि, सरकार बार-बार कह रही है कि उनके खिलाफ नहीं है। उनको डरने की जरूरत नहीं? बावजूद इसके सड़कों पर उपद्रव मचा रहे हैं। समझ में नहीं, आता ऐसा करने से उन्हें हासिल क्या होगा। अपने देश की संपत्तियों को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। आंदोलनकारियों को एक्ट के संबंध में समझना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>–<em>रमेश ठाकुर</em></strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sun, 22 Dec 2019 20:04:08 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सिनेमाहॉल के अंदर ले जा सकते हैं घर का खाना</title>
                                    <description><![CDATA[गोरखपुर(एजेंसी)। सिनेमाहॉलों में खाने-पीने के सामान बाहर से ले जाने पर कोई रोक नहीं है। कतई जरूरी नहीं कि आप सिनेमाहॉल परिसर के स्टाल से ही सामान खरीदें। सूचना का अधिकार के तहत दी गई जानकारी में कमिश्नर, वाणिज्य कर, उत्तर प्रदेश ने बताया है कि सिनेमाहॉल/ मल्टीप्लेक्स संचालकों को ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;"><strong>गोरखपुर(एजेंसी)।</strong> सिनेमाहॉलों में खाने-पीने के सामान बाहर से ले जाने पर कोई रोक नहीं है। कतई जरूरी नहीं कि आप सिनेमाहॉल परिसर के स्टाल से ही सामान खरीदें। सूचना का अधिकार के तहत दी गई जानकारी में कमिश्नर, वाणिज्य कर, उत्तर प्रदेश ने बताया है कि सिनेमाहॉल/ मल्टीप्लेक्स संचालकों को ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया गया है, जिससे कि वह बाहर से खरीदे हुए खाने-पीने के सामान के प्रयोग पर रोक लगा सकें। यही नहीं चलचित्र नियमावली, 1951 के अंतर्गत दिए लाने वाले लाइसेंस की शर्त में यह भी प्राविधान है कि प्रेक्षागृह के भीतर चाय, कॉफी, दूध, शीतल पेय, या ऐसी कोई भी खाद्य सामग्री, जो मुहर बंद पैकेट में न हो, का विक्रय करने की अनुमति नहीं होगी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">सिनेमाहाल में बाहर से सामान को लाने पर करते हैं मनाही</h2>
<p style="text-align:justify;">आमतौर पर दर्शकों को सिनेमाहॉल/मल्टीप्लेक्स के भीतर बाहर से खरीदे हुए खाने-पीने के सामान को सुरक्षा जांच के नाम पर नहीं ले जाने दिया जाता है। मजबूरी में लोगों को परिसर के भीतर के स्टॉल से ही सामान खरीदना होता है। यहां सामान, खुले बाजार की अपेक्षा ऊंची कीमत पर मिलता है। गोरखपुर के आरटीआइ कार्यकर्ता आनंद रुंगटा ने इस बाबत वाणिज्य कर विभाग से आरटीआइ के तहत जानकारी मांगी थी। कमिश्नर वाणिज्य कर कार्यालय, उत्तर प्रदेश ने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि बाहर से खरीदे हुए वही सामान प्रेक्षागृह के भीतर ले जा सकते हैं, जो सीलबंद पैकेट या बोतल में हो।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राय: सिनेमाहॉलों में खाद्य पदार्थ खुले में मिलते हैं। इन पर एमआरपी भी छपी नहीं होती। उत्तर प्रदेश सिनेमेटोग्राफी (26वां संशोधन) नियमावली 2018 के अनुसार भी सिनेमाहॉल मालिक मुहरबंद पैकेटों में ही सामान बेच सकते हैं। एक अन्य आरटीआइ के जवाब में ज्वाइंट कमिश्नर जीएसटी मुख्यालय, लखनऊ ने बताया है कि सिनेमाहॉल के भीतर खाद्य सामग्री बेचते हुए बिल देना एवं नियमानुसार जीएसटी पंजीयन कराना अनिवार्य है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कमाई का असल जरिया है खान-पान</h2>
<p style="text-align:justify;">सिनेमाहॉल परिसर की कैंटीन से सामान खरीदने पर जोर देने के पीछे दरअसल कमाई का खेल है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते वर्ष जुलाई से सितंबर की अवधि में देश के दो बड़े मल्टीप्लेक्स चेन ने फूड एवं वेबरिजेस श्रेणी में क्रमश: 25 और 42 फीसद की बढ़त दर्ज की, यह पिछले नौ माह में सर्वाधिक बढ़त थी। विशेषज्ञों के मुताबिक बॉक्स ऑफिस से होने वाली कमाई पर निर्भर रहने में जोखिम को देखते हुए सिनेमाहॉल फूड एंड वेबरिजेस को आय के अतिरिक्त और मजबूत स्रोत के रूप में विकसित करने पर फोकस कर रही हैं।बीते वर्ष बांबे हाइकोर्ट ने तो सिनेमाहॉल के भीतर इंटरवल में टिफिन ले जाने की भी अनुमति दी थी। हालांकि बाद में इस आदेश को चैलेंज किया गया था, जिस पर सुनवाई होनी शेष है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">नियम पालन करना जरूरी</h2>
<p style="text-align:justify;">आरटीआइ कार्यकर्ता आनंद रुंगटा का कहना है कि खाने-पीने के सामान बाहर से ले जाने पर रोक का नियम नहीं है। लोगों को इस संबंध में जागरुक होना चाहिए। सामान लेते समय बिल जरूर लें। सिनेमाहॉल संचालकों को भी इन नियमों का पालन करना चाहिए।</p>
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                                            <category>रंगमंच</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Jan 2019 13:34:22 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पुण्यतिथि: सिनेमा जगत के पितामह थे व्ही शांताराम</title>
                                    <description><![CDATA[मुंबई (वार्ता)। सिनेमा जगत के पितामह व्ही शांताराम को एक ऐसे फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर अर्थपूर्ण फिल्में बनाकर लगभग छह दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों में अपनी खास पहचान बनायी।व्ही शांताराम मूल नाम राजाराम वानकुदरे शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/punyathithi-vay-shantaram-was-the-father-of-the-cinema-world/article-6518"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/vay-shantaram.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई (वार्ता)।</strong> सिनेमा जगत के पितामह व्ही शांताराम को एक ऐसे फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर अर्थपूर्ण फिल्में बनाकर लगभग छह दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों में अपनी खास पहचान बनायी।व्ही शांताराम मूल नाम राजाराम वानकुदरे शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। उनक रूझान बचपन से ही फिल्मों की ओर था और फिल्मकार बनना चाहते थे।</p>
<h2>जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था</h2>
<p style="text-align:justify;">हालांकि करियर के शुरूआती दौर में गंधर्व नाटक मंडली में उन्होंने पर्दा उठाने का भी काम किया । वर्ष 1920 में व्ही शांताराम बाबू राव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कंपनी से जुड़ गये और उनसे फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने लगे। शांताराम ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1921 में प्रदर्शित मूक फिल्म “सुरेख हरण” से की। इस फिल्म में उन्हें बतौर अभिनेता काम करने का अवसर मिला।</p>
<h2 style="text-align:justify;">गोपाल कृष्णा, खूनी खंजर, रानी साहिबा और उदयकाल जैसी फिल्में निर्देशित</h2>
<p style="text-align:justify;">इस बीच व्ही शांताराम की मुलाकात भी जी दामले, एस कुलकर्णी, एस फतेलाल और के.आर धाइबर से हुयी जिनकी सहायता से उन्होंने वर्ष 1929 में प्रभात कपंनी फिल्मस की स्थापना की। प्रभात कंपनी के बैनर तले व्ही शांतराम ने गोपाल कृष्णा, खूनी खंजर, रानी साहिबा और उदयकाल जैसी फिल्में निर्देशित करने का मौका मिला । वर्ष 1932 में प्रदर्शित फिल्म “अयोध्यचे राजा” व्ही शांताराम के सिने करियर की पहली बोलती फिल्म थी। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फिल्म “सैरंधी” को वह रंगीन बनाना चाहते थे। इसके लिये उन्होंने जर्मनी का दौरा किया और वहां के लैब अगफा लैबोरेटरी में फिल्म को प्रोसेसिंग के भेजा लेकिन तकनीक कारण से फिल्म पूर्णत रंगीन नहीं बन सकी।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">शांताराम ने कुछ दिनों जर्मनी में रहकर फिल्म निर्माण की तकनीक भी सीखी।</li>
<li style="text-align:justify;">वर्ष 1937 में प्रदर्शित फिल्म “संत तुकाराम” शांताराम निर्देशित अहम फिल्मों में शुमार की जाती है।</li>
<li style="text-align:justify;">फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट होने के साथ साथ पहली भारतीय फिल्म थी जिसे मशहूर वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित की गयी।</li>
<li style="text-align:justify;">वर्ष 1936 में ही व्ही शांताराम के करियर की एक और सुपरहिट फिल्म “अमर ज्योति” प्रदर्शित हुयी।</li>
<li style="text-align:justify;">यह फिल्म उनकी उन गिनी चुनीचंद फिल्मों में शामिल है जिनमें एक्शन और स्टंट का उपयोग किया गया था।</li>
<li style="text-align:justify;">इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने नारी शक्ति को रूपहले पर्दे पर पेश किया था।</li>
</ul>
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<p style="text-align:justify;">Punyathithi, Vay Shantaram, Father, Cinema, World , Entertainment</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>रंगमंच</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Oct 2018 09:20:39 +0530</pubDate>
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                <title>भोजपुरी सिनेमा में डेब्यू करेगी आकांक्षा अवस्थी</title>
                                    <description><![CDATA[मुंबई (एजेंसी)। टीवी की जानी मानी अभिनेत्री आकांक्षा अवस्थी भोजपुरी सिनेमा में डेब्यू करने जा रही है। उतरन, राजा की आयेगी बारात, खेल किस्मत का समेत कई टीवी सीरियल में अपने अभिनय का जौहर दिखा चुकी आकांक्षा अवस्थी ‘दबंग सरकार’ के जरिये भोजपुरी सिनेमा में डेब्यू करने जा रही है। फिल्म में आकांक्षा के अपोजिट […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/rangmanch/akanksha-awasthi-will-debut-in-bhojpuri-cinema/article-4032"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/awasthi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई (एजेंसी)। </strong>टीवी की जानी मानी अभिनेत्री आकांक्षा अवस्थी भोजपुरी सिनेमा में डेब्यू करने जा रही है। उतरन, राजा की आयेगी बारात, खेल किस्मत का समेत कई टीवी सीरियल में अपने अभिनय का जौहर दिखा चुकी आकांक्षा अवस्थी ‘दबंग सरकार’ के जरिये भोजपुरी सिनेमा में डेब्यू करने जा रही है। फिल्म में आकांक्षा के अपोजिट खेसारी लाल यादव की मुख्य भूमिका है।आकांक्षा ने बताया की वह फिल्म दबंग सरकार में शिक्षिका के किरदार में नजर आयेंगी जो गरीब बच्चो को पढ़ाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आकांक्षा ने कहा कि खेसारीलाल यादव के साथ यह उनकी पहली फिल्म हैं और उन्हें खेसारी के साथ पहली बार काम करने में बहुत डर लगा रहा था। खेसारी लाल के साथ काम करके उन्हें बहुत अच्छा लगा हैं। दबंग सरकार को लेकर खेसारी लाल यादव ने बहुत ज्यादा मेहनत की हैं वो नया लुक पाने के लिए अपना वजन कम किया हैं और सिक्स एब्स बनाये हैं, फिल्म में उनका किरदार काफी हटकर होगा। ‘दबंग सरकार’ एक अलग जॉनर की फिल्म है, जिसके डायलॉग, म्यूजिक, एक्शन पर काफी बारीकी से काम किया गया है। फिल्म बहुत अच्छी है। दर्शक जिस प्रकार की फिल्म चाहते हैं यह उसी प्रकार की फिल्म हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आकांक्षा ने कहा, “मैंने कई हिंदी टीवी सीरियल में काम किया है, मैं लगभग 10 साल में अभिनय कर रही हु. मैं लख्ननऊ से मुंबई एक्टिंग करने नहीं आई थी लेकिन मजाक-मजाक में मैंने एक ऑडिसन दिया और उसमे आकांक्षा का चुनाव हो गया। भोजपुरी फिल्म ‘दबंग सरकार’ के लिए मैंने अपना दस किलो वजन भी बढ़ाया है और इस फिल्म के शूटिंग के दौरान मैंने अपने को-स्टार खेसारी लाल यादव के साथ बहुत कुछ सीखा।”</p>
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                                                            <category>रंगमंच</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 Jun 2018 12:57:48 +0530</pubDate>
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                <title>सिनेमा का लोगों के जीवन पर प्रभाव : सोनम कपूर</title>
                                    <description><![CDATA[मुंबई (वार्ता)। बॉलीवुड अभिनेत्री सोनम कपूर का कहना है कि सिनेमा का लोगों के जीवन पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है इसलिये कलाकारों को अच्छी तरह से और बड़ी जिम्मेदारी से समझ लेना चाहिए। सोनम ने कहा कि सिनेमा के दूरगामी परिणाम होते है, ऐसे में बॉलीवुड के कलाकारों को उनकी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। उन्होंने कहा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/rangmanch/as-per-sonam-kapoor-life-of-people-influenced-by-cinema/article-3680"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/sonam.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>मुंबई (वार्ता)। </strong>बॉलीवुड अभिनेत्री सोनम कपूर का कहना है कि सिनेमा का लोगों के जीवन पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है इसलिये कलाकारों को अच्छी तरह से और बड़ी जिम्मेदारी से समझ लेना चाहिए। सोनम ने कहा कि सिनेमा के दूरगामी परिणाम होते है, ऐसे में बॉलीवुड के कलाकारों को उनकी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सिनेमा का लोगों की मानसिकता पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, जिसके चलते हमें उनके प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। सबसे मुश्किल काम किसी बड़ी फिल्म को ना कहना होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी कभी मुझे लगता है कि यदि मैंने वह फिल्म कर ली होती तो आज वह हिट होती और मुझे और भूमिकाएं करने को मिलती। मेरी कई फिल्में व्यवसाय की दृष्टि से सफल रही है। हम सभी को एक बात सीखनी चाहिए कि हम में साहस और अच्छी नीयत होना चाहिए। सोनम ने अपने करियर के दौरान ‘पैडमैन’, ‘नीरजा’, ‘दिल्ली 6’, ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘खूबसूरत’ और ‘पैड मैन’ जैसी फिल्मों में कई सकारात्मक भूमिकाएं निभाई है और वह इस प्रकार की भूमिकाओं की खोज में ही रहती हैं। सोनम ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि किसी भी भूमिका की लंबाई मायने रखती है। उसमें यह मायने रखता है कि क्या वह सशक्त है। उस भूमिका का फिल्म की कहानी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।</p>
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                                                            <category>रंगमंच</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Mar 2018 03:32:21 +0530</pubDate>
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