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                <title>परिवार ही घर को मन्दिर बनाता है</title>
                                    <description><![CDATA[देश एवं दुनिया को परिवार के महत्व को बताने के लिए World Family Day हर साल 15 मई को मनाया जाता है। प्राणी जगत एवं सामाजिक संगठन में परिवार सबसे छोटी इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य होकर ही अपनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/family-makes-home-a-temple/article-61759"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-09/family-day.jpg" alt=""></a><br /><p>देश एवं दुनिया को परिवार के महत्व को बताने के लिए World Family Day हर साल 15 मई को मनाया जाता है। प्राणी जगत एवं सामाजिक संगठन में परिवार सबसे छोटी इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य होकर ही अपनी जीवन यात्रा को सुखद, समृद्ध, विकासोन्मुख बना पाता है। उससे अलग होकर उसके अस्तित्व को सोचा नहीं जा सकता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता अनेक परिवर्तनों से गुजर कर अपने को परिष्कृत करती रही है, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों में परिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है।</p>
<h3 class="entry-title td-module-title"><a title="Sirsa News : 76वीं सीनियर वाटर पोलो चैंपियनशिप के लिए चुने गए हरियाणा के जल धुरंधर" href="http://10.0.0.122:1245/trial-of-water-polo-players-concluded-at-msg-bhartiya-khel-gaon/">Sirsa News : 76वीं सीनियर वाटर पोलो चैंपियनशिप के लिए चुने गए हरियाणा के जल धुरंधर</a></h3>
<p>हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में पल (World Family Day) रहे हों लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि एवं जीवन की परिपूर्णता-सार्थकता अनुभव करते हैं। परिवार का महत्व न केवल भारत में बल्कि दुनिया में सर्वत्र है, यही कारण है कि अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस परिवार संस्था को मजबूती देने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य युवाओं को परिवार के प्रति जागरूक करना है ताकि युवा तथाकथित आधुनिक के प्रवाह में अपने परिवार से दूर न हों। परिवार दो प्रकार के होते हैं- एक एकल परिवार और दूसरा संयुक्त परिवार। एकल परिवार में पापा- मम्मी और बच्चे रहते हैं। संयुक्त परिवार में पापा- मम्मी, बच्चे, दादा दादी, चाचा-चाची, बड़े पापा, बड़ी मम्मी, बुआ इत्यादि रहते हैं।</p>
<p>इस दिवस को मनाने की घोषणा सर्वप्रथम 15 मई 1994 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने की थी। संयुक्त परिवार टूटने एवं बिखरने की त्रासदी को भोग रहे लोगों के लिये यह दिवस बहुत अहमियत रखता है। बढ़ती जवाबदारी और जरूरतों को पूरा कर पाने का भय ही वह मुख्य कारण है जो अब संयुक्त परिवारों के टूटने का कारण बना है। जबकि वास्तव में मानव सभ्यता की अनूठी पहचान है संयुक्त परिवार और वह जहाँ है वहीं स्वर्ग है। रिश्तों और प्यार की अहमियत को छिन्न-भिन्न करने वाले पारिवारिक सदस्यों की हरकतों एवं तथाकथित आधुनिकतावादी सोच से बुढ़ापा कांप उठता है। संयुक्त परिवारों का विघटन और एकल परिवार के उद्भव ने जहां बुजुर्गांे को दर्द दिया है वहीं बच्चों की दुनिया को भी बहुत सारे आयोजनों से बेदखल कर दिया है। दुख सहने और कष्ट झेलने की शक्ति जो संयुक्त परिवारों में देखी जाती है वह एकल रूप से रहने वालो में दूर-दूर तक नही होती है।</p>
<h3>परिवार में रहने से तनावमुक्त व प्रसन्नचित्त रहते हैं | World Family Day</h3>
<p>आज के अत्याधुनिक युग में बढ़ती महंगाई और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए संयुक्त परिवार समय की मांग कहे जा सकते हैं। हम पुराने युगों की बात करें या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर भी बात करें तो आज की ही तरह पहले भी परिवारों का विघटन हुआ करता था। लेकिन आधुनिक समाज में परिवार का विघटन आम बात हो चुकी है और उसने जीवन को जटिल से जटिलतर कर दिया है। ऐसे में परिवार न टूटे इस मिशन एवं विजन के साथ अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। परिवार के बीच में रहने से आप तनावमुक्त व प्रसन्नचित्त रहते हैं, साथ ही आप अकेलेपन या डिप्रेशन के शिकार भी नहीं होते, यही नहीं परिवार के साथ रहने से आप कई सामाजिक बुराइयों से अछूते भी रहते हैं। समाज की परिकल्पना परिवार के बगैर अधूरी है और परिवार बनाने के लिए लोगों का मिलजुल कर रहना व जुड़ना बहुत जरूरी है। हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हों लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं।</p>
<p>भारत गांवों का देश है, परिवारों का देश है, शायद यही कारण है कि न चाहते हुए भी आज हम विश्व के सबसे बड़े जनसंख्या वाले राष्ट्र के रूप में उभर चुके हैं और शायद यही कारण है कि आज तक जनसंख्या दबाव से उपजी चुनौतियों के बावजूद, एक ‘परिवार’ के रूप में, जनसंख्या नीति बनाये जाने की जरूरत महसूस नहीं की। ईंट, पत्थर, चूने से बनी दीवारों से घिरा जमीं का एक हिस्सा घर-परिवार कहलाता है जिसके साथ ‘मैं’ और ‘मेरापन’ जुड़ा है। संस्कारों से प्रतिबद्ध संबंधों की संगठनात्मक इकाई उस घर-परिवार का एक-एक सदस्य है। हर सदस्य का सुख-दुख एक-दूसरे के मन को छूता है। प्रियता-अप्रियता के भावों से मन प्रभावित होता है। घर-परिवार जहां हर सुबह रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा की समुचित व्यवस्था की जुगाड़ में धूप चढ़ती है और आधी-अधूरी चिंताओं का बोझ ढोती हुई हर शाम घर-परिवार आकर ठहरती है। कभी लाभ, कभी हानि, कभी सुख, कभी दुख, कभी संयोग, कभी वियोग, इन द्वंद्वात्मक परिस्थितियों के बीच जिंदगी का कालचक्र गति करता है। भाग्य और पुरुषार्थ का संघर्ष चलता है।</p>
<h3>घर-परिवार निश्चित रूप से पूजा का मंदिर है</h3>
<p>आदमी की हर कोशिश ‘घर-परिवार’ बनाने की रहती है। सही अर्थों में घर-परिवार वह जगह है जहां स्नेह, सौहार्द, सहयोग, संगठन सुख-दुख की साझेदारी, सबमें सबक होने की स्वीकृति जैसे जीवन-मूल्यों को जीया जाता है। जहां सबको सहने और समझने का पूरा अवकाश है। अनुशासन के साथ रचनात्मक स्वतंत्रता है। निष्ठा के साथ निर्णय का अधिकार है। जहां बचपन सत्संस्कारों में पलता है। युवकत्व सापेक्ष जीवनशैली से जीता है। वृद्धत्व जीए गए अनुभवों को सबके बीच बांटता हुआ सहिष्णु और संतुलित रहता है। ऐसा घर-परिवार निश्चित रूप से पूजा का मंदिर बनता है। संयुक्त परिवारों की परम्परा पर आज धुंधलका छा रहा है, परिवार टूटता है तो दीवारें भी ढहती हैं, आदमी भी टूटता है और समझना चाहिए कि उसका साहस, शक्ति, संकल्प, श्रद्धा, धैर्य, विश्वास बहुत कुछ टूटता/बिखरता है।</p>
<p>क्रांति और विकास की सोच ठंडी पड़ जाती है और जीवन के इसी पड़ाव पर फिर परिवार का महत्व सामने आता है। परिवार ही वह जगह है भाग्य की रेखाएं बदलने का पुरुषार्थी प्रयत्न होता है। जहां समस्याओं की भीड़ नहीं, वैचारिक वैमनस्य का कोलाहल नहीं, संस्कारों के विघटन का प्रदूषण नहीं, तनावों की त्रासदी की घुटन नहीं। कोई इसी परिवाररूपी घेरे के अंधेरे में रोशनी ढूंढ लेता है। बाधाओं के बीच विवेक जमा लेता है। भीड़ में अकेले रह जाता है। दुख में सुख का संवेदन कर लेता है। घर-परिवार को सिर्फ अपनी नियति मानकर नहीं बैठा जा सकता। क्योंकि इसी घर में मंदिर बनता है और कहीं घर ही मंदिर बन जाता है। कहते हैं कि आपका काम, रबड़ की गेंद है, जिस पर जितना जोर देते हैं, वह उतना ऊंचा उठता है। पर आपका परिवार कांच की गेंदें हैं, जो हाथ से छूटती हैं तो टूट ही जाती हैं।</p>
<p>कई बार हम सब भूल जाते हैं कि जीवन में सबसे जरूरी क्या है। हम इधर-उधर की बातों में इतना डूब जाते हैं कि जो सच में जरूरी है, उसे छोड़ देते हैं। हम परिवार की खुशियों के नाम पर सामान तो खरीदने में लगे रहते हैं, पर उन चीजों पर ध्यान नहीं देते जो परिवार में सबको संतुष्टि का एहसास कराती हैं, सबको जोड़ती है। ‘परिवार’ शब्द हम भारतीयों के लिए अत्यंत ही आत्मीय होता है। अपने घर-परिवार में अपने आपका होना ही जीवन का सत्य है। यह प्रतीक्षा का विराम है। यही प्रस्थान का शुभ मुहूर्त है। उम्मीद है जल्द ही समाज में संयुक्त परिवार की अहमियत दुबारा बढ़ने लगेगी और लोगों में जागरूकता फैलेगी कि वह एक साथ एक परिवार में रहें जिसके कई फायदे हैं। इंसानी रिश्तों एवं पारिवारिक परम्परा के नाम पर उठा जिन्दगी का यही कदम एवं संकल्प कल की अगवानी में परिवार के नाम एक नायाब तोहफा होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Sep 2024 16:40:58 +0530</pubDate>
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                <title>नौकरियां भी देगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस</title>
                                    <description><![CDATA[Artificial Intelligence : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से हुई मुलाकात में सुरक्षित और भरोसेमंद साइबर स्पेस, हाई-टेक वैल्यू चेन, जेनरेटिव एआई, 5जी और 6जी टेलीकॉम नेटवर्क जैसे विषयों को रणनीतिक महत्व मिला है। दोनों देश निर्यात नियंत्रण और उच्च-प्रौद्योगिकी वाणिज्य को बढ़ाने के तरीकों का पता लगाने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/artificial-intelligence-will-also-give-jobs/article-49327"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/artificial-intelligence.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Artificial Intelligence : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से हुई मुलाकात में सुरक्षित और भरोसेमंद साइबर स्पेस, हाई-टेक वैल्यू चेन, जेनरेटिव एआई, 5जी और 6जी टेलीकॉम नेटवर्क जैसे विषयों को रणनीतिक महत्व मिला है। दोनों देश निर्यात नियंत्रण और उच्च-प्रौद्योगिकी वाणिज्य को बढ़ाने के तरीकों का पता लगाने के लिए नियमित प्रयास करने पर भी सहमत हुए हैं। साथ ही भारत और अमेरिका ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और क्वांटम कंप्यूटिंग से लेकर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की संपूर्ण श्रृंखला तक के क्षेत्रों में सहयोग के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया है। दोनों देशों की सरकारें उन नीतियों और विनियमों को अपनाने के लिए काम करेंगी जो अमेरिकी और भारतीय उद्योग तथा शैक्षणिक संस्थानों के बीच अधिक प्रौद्योगिकी साझाकरण, सह-विकास और सह-उत्पादन के अवसरों को सुविधाजनक बनाती हैं। इस मुलाकात के बाद से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अब और भी प्रगति देखने को मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। आज इशारे, बोली या चेहरे के संकेतों से बहुत कुछ कर गुजरने की क्षमता हासिल होती जा रही है। इसमें दो राय नहीं कि 21वीं सदी का यह दौर एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का है। हालांकि इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई। लेकिन निर्णायक मुकाम तक पहुंचने में थोड़ा वक्त लगा। इसका मतलब ये नहीं कि यह एकाएक पैराशूट से आ गिरा और दुनिया में छा गया। एआई 1970 के दशक में लोकप्रिय होने लगी थी जब जापान इसका अगुवा बना। 1981 के आते-आते सुपर कम्प्यूटर के विकास की 10 वर्षीय रूपरेखा तथा 5वीं जनरेशन की शुरुआत ने रफ्तार दी। जापान के बाद ब्रिटेन भी चेता उसने एल्बी प्रोजेक्ट तो यूरोपीय संघ ने भी एस्पिरिट की शुरुआत की। अधिक गति देने या तकनीकी रूप से विकसित करने के लिए 1983 में कुछ निजी संस्थानों ने एआई के विकास के लिए माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी संघ बना डाला।</p>
<h3>कृत्रिम बुद्धि की दौड़ इंसानी बुद्धि पर भारी | Artificial Intelligence</h3>
<p style="text-align:justify;">सच तो यही है कि एआई की कहां-कहां और कैसी दखल होगी जिसकी न तो कोई सीमा है और न अंत। हर दिन नए-नए फीचरों के साथ करिश्माई तकनीक पहले से बेहतर विकल्पों के साथ परिवर्तित, सुधारित या विकसित होकर सामने होती है। दुनिया सबसे पहले इसके सहज रूप रोबोट से रू-ब-रू हुई जो सबकी पहुंच में नहीं रहा। लेकिन इस तकनीक ने घर-घर दस्तक देकर अपनी निर्भरता खूब बढ़ाई। अब साल भर में मोबाइल, टीवी, गैजेट्स आउटडेटेड लगने लगते हैं। आगे क्या होगा अकल्पनीय है। सच है कि कृत्रिम बुद्धि की दौड़ इंसानी बुद्धि पर भारी दिखने लगी है। एआई ने व्यापार के पूरे तौर तरीके बदल दिए। हरेक उद्योग, व्यापार इसके बिना अधूरा और अनुपयोगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि या फिर नागरिक शासन प्रणाली सब में जबरदस्त दखल बेइंतहा है। आसमान में सैटेलाइट, उड़ता हवाई जहाज, पटरी पर दौड़ती रेल-मेट्रो सभी कृत्रिम मेधा के नियंत्रण में हैं। घर में साफ-सफाई से लेकर खाना बनाना, टीवी आॅन-आॅफ करना, चैनल बदलना, एसी चालू-बंद करने जैसे काम एआई आधारित होते जा रहे हैं। कल सुरक्षा व्यवस्थाएं भी मानव रहित तकनीक पर आधारित होकर अधिक चाक चौबंद होना तय है। भारत में डीआरडीओ सहित कई स्टार्टअप पर काम चल रहा है। स्वचलित स्वायत्तता के एआई वाले दौर में कल्पना से भी बेहतर उपकरण होंगे जो ज्यादा प्रभावी, आक्रामक तथा सटीक यानी चूक रहित होंगे। एआई से जनसंवाद भी आसान हुआ और लोगों को जल्द समाधान भी मिलने लगा। अब सच्चाई यह है कि जन शिकायतों और निपटारे के बीच इंसान नहीं सिर्फ निष्पक्ष तकनीक है।</p>
<h3>अब एआई सपोर्टेड मशीनें आएंगी | Artificial Intelligence</h3>
<p style="text-align:justify;">हां तकनीक का मतलब सिर्फ यह भी नहीं कि लोग इंटरनेट और डिजिटल टेक्नोलॉजी तक सीमित रहें। अब एआई सपोर्टेड ऐसी मशीनें आएंगी जो इंसानी भावनाओं को भी पहचानेंगी। आगे रोबोट और ड्रोन युद्ध के मैदान तथा अस्पतालों के आॅपरेशन थियेटर में काम करते दिखें तो हैरानी नहीं होगी। एआई पढ़ाने से लेकर भाषण, एंकरिंग से लेकर किचन व घरों की साफ-सफाई और तमाम कामों में सक्षम हो रही है। इसके फायदे और भविष्य सबको समझ आने लगे हैं। कृषि क्षेत्र में कीटनाशकों तथा उर्वरकों का दुरुपयोग रोकने व पशु-पक्षियों से फसल बचाव की क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। शायद ही कोई क्षेत्र बचे जो इससे अछूता रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">खेल के मैदानों में एक-एक मूवमेंट और माइक्रो सेकण्ड तक हुई गतिविधियों की रिकॉर्डिंग से साफ-सुथरे फैसलों का दौर सामने है। कार्पोरेट सेक्टर, रियल स्टेट, विनिर्माण या मशीनों का संचालन यानी सब कुछ एआई आश्रित होकर कामयाब हो रहे हैं। एआई की बैंकों, वित्तीय संस्थानों के डेटा को व्यवस्थित, सुरक्षित और प्रबंधित करने के साथ-साथ तमाम स्मार्ट और डिजिटल कार्डों के सफल संचालन के साथ समुद्र के गहरे गर्भ में खनिज, पेट्रोल, ईंधन की पतासाजी और खुदाई में भूमिका जबरदस्त है। सबने देखा दिल्ली की चालक रहित मेट्रो या दुनिया में बिना ड्राइवर की आॅटोपायलट कार के भविष्य की शुरुआत और टेस्ला को लेकर उत्साह।</p>
<p style="text-align:justify;">एआई तकनीक से जल्द ही चौक-चौराहों पर बिना पुलिस के अचूक स्मार्ट पुलिसिंग की पहरेदारी दिखेगी। अनेकों खूबियों से लैस 360 डिग्री घूमने में सक्षम कैमरे जो हरेक गतिविधियों को भांपने, पहचानने में दक्ष तथा कंट्रोल रूम में तैनात टीम को चुटकियों में सूचना साझा कर मौके पर पहुंचाने में मददगार होंगे। वहीं सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए वरदान बन हरेक वाहन में ऐसी सेंसर प्रणाली विकसित भी हो सकेगी जो खुद-ब-खुद सामने वाली गाड़ी की स्थिति, संभावित चूक या गड़बड़ी को रीड कर स्वत: नियंत्रित हो जाए तो भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।</p>
<h3>आईआरएएसटीई तकनीक ड्राइवरों को सचेत करेगी | Artificial Intelligence</h3>
<p style="text-align:justify;">इस पर भारत में भी काम चालू है। नागपुर में हैदराबाद की एक संस्था के साथ प्रोजेक्ट इंटेलिजेंट सॉल्यूशंस फॉर रोड सेफ्टी थ्रू टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग यानी आईआरएएसटीई तकनीक वाहन चलाते समय संभावित दुर्घटना वाले परिदृश्यों को पहचानेगी और एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम यानी एडीएएस की मदद से ड्राइवरों को सचेत करेगी। भारतीय सड़कों के लिए लेन रोडनेट यानी एलआरनेट से लेन के निशान, टूटे डिवाइडर, दरारें, गड्ढे यानी आगे खतरे की पहले ही जानकारी ड्राइवर को हो जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जेनरेटिव एआई कंपनियों के आंतरिक वित्त विभागों में भी भूमिका निभाएगा। वित्तीय विश्लेषण, मॉडलिंग और पूर्वानुमान जैसी भूमिकाएँ प्रभावित होने की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जब बड़ी मात्रा में डेटा को संसाधित करने और संभावित परिदृश्य और विनियमन रिपोर्ट बनाने की बात आती है तो एआई के पास बढ़त है। अध्ययन में कहा गया है कि विशेष रूप से, एआई के उपयोग के विस्तार का मतलब नौकरी का नुकसान नहीं हो सकता है, लेकिन यह इन नौकरियों के कुछ हिस्सों को कैसे निष्पादित किया जाता है, इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। गूगल और आॅपनएआई (चैटजीपीटी बनाने वाली कंपनी) खुद कहते हैं कि इससे अतिरिक्त नौकरियां पैदा होंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">त्वरित इंजीनियरों और सिस्टम सलाहकारों जैसी नई भूमिकाओं की मांग होगी। एआई को लेकर डर वैसा ही है जैसा हमने 1980 के दशक में कंप्यूटर आने पर देखा था। ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस का उदाहरण सामने है, जो हमें आसमान से धरती की अनजान जगह पर बिना किसी से पूछे सुरक्षित रास्ते से पहुंचाता है। लोकेशन शेयर करने पर मूवमेण्ट की जानकारी देने जैसा सारा कुछ एआई की ही देन है। भारत सहित दुनिया का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, बिग डाटा इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, रियल टाइम डाटा और क्वांटम कम्युनिकेशन में शोध, प्रशिक्षण, मानव संसाधन और कौशल विकास, स्मार्ट मोबिलिटी, स्मार्ट हेल्थकेयर, स्मार्ट कंसट्रक्शन जैसे स्टार्टअप्स को लेकर जबरदस्त होड़, निवेश और क्षमताएँ विकसित करने पर ध्यान केंद्रित है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे तकनीक क्षेत्र में अत्याधिक रोजगार बढ़ेगा तो कई दूसरे क्षेत्रों में कुछ बुरा असर भी दिखेगा। इसको समझने, सीखने और दक्ष होने खातिर साक्षरता भी तो बढ़ेगी। जब ज्यादातर इंसानी जरूरतें जो इंसान पूरा करते थे, मशीनें पूरी करने लगेंगी तो ज्यादा आबादी वाले देशों में नई बहस तय है। सही भी है जो तमाम धार्मिक ग्रंथों में किसी न किसी रूप में लिखा है और जिसका सार यही कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कह सकते है कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी उसी का एक हिस्सा है बस उफान देखना बाकी है। US President Joe Biden</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ (ईटी) की रिपोर्ट के अनुसार, जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से भारत के 5.4 मिलियन आईटी कर्मचारियों में से लगभग एक प्रतिशत प्रभावित होने की संभावना है। शुरूआत में इसका असर सेल्स और सपोर्ट रोल में काम करने वालों पर पड़ सकता है। एक नए अध्ययन के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि जेनरेटिव एआई से आईटी क्षेत्र में 2-3 अरब डॉलर की अतिरिक्त राजस्व क्षमता पैदा होने की भी उम्मीद है। मौजूदा स्थिति के अनुसार, 245 अरब डॉलर के तकनीकी सेवा उद्योग में 3,00,000 कर्मचारी बिक्री और सहायक भूमिकाओं में काम कर रहे हैं। हालांकि,अगले तीन से पांच वर्षों में एआई तकनीक के कारण लगभग 50,000 कर्मचारियों के काम पर असर पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ऋषभ मिश्रा</strong><br />
<strong>असिस्टेंट प्रोफेसर, स्तंभकार एवं प्रेरक वक्ता </strong><br />
<strong>मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Jun 2023 15:54:39 +0530</pubDate>
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                <title>स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित ग्रामीण भारत</title>
                                    <description><![CDATA[अक्सर हम देखते सुनते आए हैं कि असली भारत गांवों में बसता है। (Rural India) लेकिन गांव के लोगों की सेहत का ख्याल रखने वाले चिकित्सा केंद्र इक्कीसवीं सदी के भारत में भी बदत्तर स्थिति में ही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा विशेषज्ञों की काफी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/rural-india-deprived-of-health-facilities/article-47945"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/rural-india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अक्सर हम देखते सुनते आए हैं कि असली भारत गांवों में बसता है। (Rural India) लेकिन गांव के लोगों की सेहत का ख्याल रखने वाले चिकित्सा केंद्र इक्कीसवीं सदी के भारत में भी बदत्तर स्थिति में ही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा विशेषज्ञों की काफी कमी देखी जा रही है। जो देश में शहरों और गांवों के बीच एक ऐसी खाई को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसके परिणाम आगामी भविष्य में काफी भयावह हो सकते हैं। भारत की कल्पना बिना गांवों के नहीं की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही देश कितना भी तरक्की कर ले, लेकिन गांवों में करीब 80 फीसदी चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी होना अपने आप में कई सवालों को जन्म देने वाला है। अब ऐसे में स्वस्थ भारत, खुशहाल भारत कैसे बनेगा? यह सवाल काफी अहम हो जाता है। दरअसल महात्मा गांधी ने कहा था कि, ‘स्वास्थ्य ही वास्तविक पूँजी है न कि सोना चांदी के टुकड़े।’ अब गांवों में अगर मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं और स्वास्थ्य केंद्र ही सुविधाओं के टोटे से जूझ रहे हैं। फिर ग्रामीण भारत की हालत कैसे सुधर सकती है?</p>
<h3>ग्रामीण क्षेत्रों में सर्जन डॉक्टरों की लगभग 83 प्रतिशत कमी है (Rural India)</h3>
<p style="text-align:justify;">देश के ग्रामीण और दूर-दराज के अंचल स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भी काफी आदिम अवस्था में और पिछड़े हुए हैं। जिसकी बानगी रूरल हैल्थ स्टैटिस्टिक्स 2021- 22 पेश करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सर्जन डॉक्टरों की लगभग 83 प्रतिशत कमी है। बालरोग चिकित्सकों की 81.6 फीसदी और फिजिशियन की 79.1 प्रतिशत कमी है। यही स्थिति प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञों की है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी अमूमन 72.2 प्रतिशत कमी है। इतना ही नहीं देश के ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) के हालात भी ठीक नहीं। ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट ने ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चिंता जाहिर की है, तो यह जायज है।</p>
<p style="text-align:justify;">हम ग्लोबल लीडर बनने का दिवास्वप्न देखकर ही खुश नहीं हो सकते। जब तक कि वास्तविक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन न आए। गौरतलब है कि जनवरी 2023 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को शहरी क्षेत्रों के समान स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकार है। कोर्ट ने आगे अपने वक्तव्य में कहा कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए बाध्य है, ग्रामीण आबादी की देखभाल के लिए योग्य डॉक्टरों की नियुक्ति की जानी चाहिए। जस्टिस बी.आर. गवई और बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा कि स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने में ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिए।</p>
<h3>भारत के ग्रामीण क्षेत्र स्वास्थ्य सुविधाओं में इतने पीछे क्यों</h3>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी देखा जाए तो हम एक संवैधानिक देश में रहते हैं। जहां संविधान की प्रस्तावना ही हम भारत के लोग से शुरू होती है और जिस संविधान के लिखित स्वरूप में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के लोककल्याणकारी राज्य का चित्रण किया गया हो। वहां लोगों के साथ भेदभाव शहर और गांव के आधार पर कदापि नहीं होना चाहिए। आज दुनिया के हर क्षेत्र में जब तेजी से तरक्की हो रही है, फिर भारत के ग्रामीण क्षेत्र स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में इतने पीछे क्यों हैं? इस पर बहस की जरूरत है, न कि पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का ख़्वाब दिखाकर ग्रामीण और दूर-दराज में रहने वाली जनता के जीवन जीने के अधिकार को छीन लेना!</p>
<p style="text-align:justify;">एक आंकड़े के अनुसार देश में गरीब परिवारों का जीवनकाल, 20 प्रतिशत समृद्ध परिवारों के मुकाबले औसतन 7 साल तक छोटा होता है। अब इसे न्याय की तराजू पर रखकर तौलिए, फिर सहज अंदाजा होगा कि लोकतंत्र में लोगों की कीमत क्या है? कहीं लोकतंत्र और संवैधानिक देश भी अर्थतंत्र की चौखट पर आकर घुटने टेकने को मजबूर तो नहीं? एक मुख्य सवाल यह भी है, क्योंकि जिस देश में ईलाज पर होने वाला आधे से अधिक खर्च किसी व्यक्ति की जेब से होता हो। फिर देश में 27 रुपए कमाकर गरीबी रेखा से बाहर निकल जाने वाला व्यक्ति खाएगा क्या और कोई बीमार पड़ा तो इलाज कराएगा कैसे?</p>
<p style="text-align:justify;">हम सभी ये बात भलीभांति समझते हैं कि सुदूर अंचलों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का आधार पीएचसी सेंटर ही होते हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि जब कोई गरीब अपने परिजनों के इलाज के लिए इन सेंटर्स पर पहुँचते हैं, तो बेशुमार खामियां ही नजर आती हैं। भारत में चीन की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में 3,100 मरीजों पर मात्र एक बिस्तर है और कई राज्यों में यह आंकड़ा और भी दयनीय स्थिति में है। मालूम हो कि बिहार में अठारह हजार ग्रामीणों पर सिर्फ एक बिस्तर की व्यवस्था है और उत्तर प्रदेश में 3,900 मरीजों पर एक बिस्तर की व्यवस्था है। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में छब्बीस हजार की आबादी पर एक एलोपैथिक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर अवश्य होना चाहिए। अब एक गांव का गरीब व्यक्ति इलाज के लिए पैसे जोड़े या बच्चों की शिक्षा के लिए? यह उसके लिए लाख टके का सवाल होता है।</p>
<h3>असंख्य ऐसी समस्याएं हैं, जिससे ग्रामीण जूझ रहे हैं (Rural India)</h3>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य और शिक्षा लोकतांत्रिक देश में मुफ्त या सस्ती और सुलभ होनी चाहिए, लेकिन हमारे देश में हालत इसके ठीक उलट है। शिक्षा और स्वास्थ्य देश में कमाई का जरिया बन चुका है। बशर्ते कि इसी बीच केंद्र सरकार ने कुछ ऐसे प्रयास किए हैं, ताकि ग्रामीण और गरीब लोगों तक सस्ती और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुँच सके। आज ग्रामीण क्षेत्रों में बस एक ही समस्या स्वास्थ्य से जुड़ी हुई नहीं है, अपितु ऐसी असंख्य समस्याएं हैं, जिससे ग्रामीण लोग जूझ रहे हैं। पीने योग्य साफ पानी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अच्छी सड़कें और रोजगार के साधन जैसी समस्याओं पर अक़्सर नेताओं को भी विचार-विमर्श करते हुए देखा जा सकता है, लेकिन होता वही है ढाक के तीन पात। जिस वजह से जमीनी हकीकत आज भी खराब है और सिर्फ कागजों में ही देश के गांवों की हालत गुलाबी कही जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश का दुर्भाग्य तो देखिए संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन जीने की स्वतंत्रता का अधिकार देने वाले देश में संवैधानिक व्यवस्था तले कई स्वास्थ्य केंद्र तो ऐसे सुदूर अंचलों में हैं, जहां वर्षों से डॉक्टर झांककर देखने तक नहीं आए कि सरकारी बिल्डिंग बची भी है कि वह भी धराशायी हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा यह बताने के लिए काफी है कि अभी भी हमें इस क्षेत्र में काफी सुधार करने की आवश्यकता है। सुधार सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में ही करने की आवश्यकता नहीं, जरूरत तो मानसिकता में बदलाव की भी है। फिर वह चाहें हुक्मरानी व्यवस्था की मानसिकता हो या फिर ग्रामीण क्षेत्र में पर्याप्त जागरूकता की। देश में आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार का रोग गाढ़ा होता चला गया। जिसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर साफ देखा जा सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में कहीं सरकारें स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सभी को आत्मनिर्भर होने को न कह दें? डर तो अब इस बात का भी सता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि बिहार जैसे राज्य में 31 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्रों पर न पानी की सुविधा है और न ही बिजली की। इतना ही नहीं बरसात के मौसम में अस्पताल के अंदर पानी भर जाने की वीडियोज तो लगभग हर किसी ने वायरल होते देखी ही होगी। यह किसी एक राज्य की समस्या नहीं है अपितु समूचा भारत ही स्वास्थ्य सेवाओं में बदहाली की मार झेल रहा है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्र में आम जन या तो झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज कराने को विवश है या फिर झाड़फूंक के जरिए अपनी बीमारियों से निजात पाने का प्रयास करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी डॉक्टर की ग्रामीण क्षेत्र में ड्यूटी होने के बावजूद वह गांवों में नहीं जाते है, बल्कि शहरों में अपना खुद का प्राइवेट क्लिनिक शुरू कर देते हैं। ऐसे में असमानता की मार आज भी गरीब लोग झेल रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देकर राजनीतिक दल अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं। ऐसे में अगर सचमुच में गरीब और ग्रामीणों की सुध किसी को लोकतंत्र के बरक्स लेनी है, तो उन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुँचाने की आवश्यकता है और यह दृढ़ इच्छाशक्ति और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से ही संभव है। जिस दिशा में देश को आगे ले जाने की महती आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>सोनम लववंशी, वरिष्ठ लेखिका एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखिका के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 May 2023 17:30:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राज्याभिषेक से उठते सवाल!</title>
                                    <description><![CDATA[अंग्रेज वर्षों से भारत को येन-केन प्रकारेण उपहास का पात्र बनाते रहते हैं। वे अक्सर हिंदू धार्मिक प्रथाओं-परम्पराओं, सामाजिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को लक्षित करते हुए टीका-टिप्पणी करते रहते हैं। वे उदारवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति भारतीयों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हुए भारत को शासन-प्रशासन के बारे में गाहे-बगाहे सलाह भी देते हैं। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/questions-arising-from-the-coronation/article-47849"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/prince-charls1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अंग्रेज वर्षों से भारत को येन-केन प्रकारेण उपहास का पात्र बनाते रहते हैं। वे अक्सर हिंदू धार्मिक प्रथाओं-परम्पराओं, सामाजिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को लक्षित करते हुए टीका-टिप्पणी करते रहते हैं। वे उदारवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति भारतीयों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हुए भारत को शासन-प्रशासन के बारे में गाहे-बगाहे सलाह भी देते हैं। हालांकि, वे शायद ही कभी अपने स्वयं के समाज की निष्पक्ष और नियमन समीक्षा करते हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="टीवी की बजाय अब चलती-फिरती स्क्रीन जेब में लेकर घूमते हैं क्रिकेट के दीवाने" href="http://10.0.0.122:1245/cricket-match-on-mobile/">टीवी की बजाय अब चलती-फिरती स्क्रीन जेब में लेकर घूमते हैं क्रिकेट के दीवाने</a></p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में 6 मई 2023 को सम्पन्न King charles III का राज्याभिषेक समारोह एक ऐसा ही प्रसंग है। इस समारोह में एक 74 वर्षीय व्यक्ति को औपचारिक रूप से राजा की पदवी प्रदान की गई। यह पद उसे वंशानुगत प्राप्त हुआ है। माँ से बेटे को हस्तांतरित यह पद ज्येष्ठाधिकार की सामंती परंपरा द्वारा वैधता और वर्चस्व प्राप्त करता है। यह मध्यकालीन परम्परा एक परिवार विशेष को यूनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमंडल देशों का राज्य प्रमुख होने का वंशानुगत अधिकार प्रदान करती है। लोकतांत्रिक समाज में ऐसी मध्यकालीन व्यवस्था को वैधता प्रदान करना और उसका धूम-धड़ाके से प्रदर्शन करना हास्यास्पद और चिंतनीय है। उल्लेखनीय है कि नेपाल जैसे अपेक्षाकृत छोटे और नवजात लोकतंत्र ने भी ऐसी सामंती व्यवस्था को विदाई दे दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह राज्याभिषेक समारोह सम्राट के शासन के दैवीय अधिकार को पुष्ट करता है, (King charles III) जोकि आधुनिक उदार लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। एक उदार लोकतंत्र के भीतर एक वंशानुगत संवैधानिक राजतंत्र की उपस्थिति और महिमामंडन उसमें अंतर्निहित विरोधाभास का प्रकटन है। यह सामंती समारोह अपने आप में एक अनपेक्षित, अनावश्यक और अप्रासंगिक कार्यक्रम था। यह ईसाई पंथ के प्रतीकों और परम्पराओं से भी परिपूर्ण था। समारोह के दौरान, सिंहासनारूढ़ राजा ने इंग्लैंड के चर्च और उसके कानून को बनाए रखने की शपथ ली। पवित्र तेल से पादरी द्वारा राजा का अभिषेक किया गया। ‘क्राउन आॅफ सेंट एडवर्ड’ के रूप में जाना जाने वाला मुकुट कैंटरबरी के आर्कबिशप और इंग्लैंड के चर्च के धर्मगुरु जस्टिन वेल्बी द्वारा राजा को पहनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समारोह में तमाम पूर्व-शासित राज्यों को आमंत्रित किया गया था। (King charles III) उन राज्यों के प्रतिनिधियों ने ‘मैं कसम खाता हूँ कि मैं आपकी महिमा के प्रति, और आपके उत्तराधिकारियों और उपाधिकारियों के प्रति सच्ची निष्ठा अदा करूंगा। हे भगवान, मेरी मदद करें।’ घोषणा करके मध्यकालीन शैली में राजा और राजतन्त्र में अपनी आस्था और निष्ठा व्यक्त की। यह प्रथा आज के समय में अत्यंत बेतुकी है। इस अवसर पर अन्य धर्मों और राज्यों के प्रतिनिधियों से उपहार प्राप्त करना औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है। यह ईसाई धर्म के वर्चस्व और अन्य सभी धर्मों की दोयमता को भी प्रकट करता है। यह राज्याभिषेक ईसाई धर्म के अनुष्ठानों और राजा या राज्य-प्रमुख के अपने ईसाई विश्वासों का प्रकटन करता है। जिस देश की अघोषित राष्ट्रीय विचारधारा धर्मनिरपेक्ष उदारवाद है, उस देश में पंथ विशेष को सार्वजनिक जीवन और राजकीय कार्यक्रमों में प्रदर्शित करना विरोधाभाषपूर्ण है।</p>
<p style="text-align:justify;">मत-पंथ और राज्य संवेदनशील विषय हैं (King charles III) जिन्हें सावधानीपूर्वक अलग रखने की आवश्यकता होती है। मत-पंथ और राज्य को मिलाना आपत्तिजनक है यह सामाजिक विभाजन, अलगाव और असहिष्णुता को जन्म दे सकता है। यह वास्तव में हैरान करने वाला है कि रिकॉर्ड स्तर पर बेरोजगारी और जीवनयापन के गंभीर संकट से त्रस्त देश में करदाताओं ने दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक के राज्याभिषेक को वित्त पोषित किया। इस कार्यक्रम के व्यय का अनुमान $100 मिलियन से अधिक है। एक अनिर्वाचित, वंशानुगत राज्य प्रमुख पर इतना सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है, यह अनैतिक और अकल्पनीय है। नि:संदेह, ब्रिटेन को अपने मध्यकालीन अतीत की धूमधाम के बजाय वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं और चुनौतियों का संज्ञान लेकर उनके समाधान की दिशा में सक्रिय होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">तथाकथित शाही परिवार की लोकप्रियता हर बीतते दिन के साथ कम होती जा रही है। (King charles III) इसकी समकालीन शक्ति इसकी शानोशौकत और तमाशेबाजी में ही निहित है। लंदन की सड़कों पर भी यह भावना प्रदर्शित हुई, जहां प्रदर्शनकारियों ने ‘नॉट माय किंग’ के नारे लगाए। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को लंदन की सड़कों से केवल एक विपरीत विचार व्यक्त करने के लिए जबरन हटा दिया जाना निराशाजनक अनुभव था। उनके शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए नए सार्वजनिक व्यवस्था कानूनों का इस्तेमाल ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पश्चिमी समाज के उदारवादी दावों’ की कलई खोलता है। हालाँकि, यूके अक्सर अन्य देशों की उनके प्रचारवादी और अधिनायकवादी दृष्टिकोण के लिए आलोचना करता है, लेकिन वह अपने आत्म-परीक्षण में प्राय: असमर्थ रहता है। ‘जो शीशे के घरों में रहते हैं, उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए’ यह कहावत ब्रिटेन के तथाकथित संभ्रांत, उदार और धर्म-निरपेक्ष समाज के लिए सही सबक और संदेश है।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चय ही, कथनी और करनी का द्वैत उनकी नैतिक आभा को धूमिल करता है। (King charles III) लंबे औपनिवेशिक अतीत और श्रेष्ठता-बोध के बावजूद ब्रिटेन भारत की समृद्ध और वैविध्यपूर्ण संस्कृति, विकसित लोकतंत्र और राजतन्त्र की समूल समाप्ति से बहुत कुछ सीख सकता है। निर्वाचित नेताओं/शासकों की अवधारणा (गण-व्यवस्था) प्राचीन भारत की सामान्य विशेषता थी, जिसे बहुत बाद में शेष विश्व ने भी अपनाया। भारत का पूर्ण विकसित संसदीय लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देता है। शासन को जवाबदेह, संवेदनशील और पारदर्शी बनाता है। भारतीय लोकतंत्र किसी भी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करता है (जैसा कि अनुच्छेद 15 में कहा गया है) और गणतंत्रवाद, कानून के समक्ष समानता, तथा मत-पंथ व राज्य के स्पष्ट अलगाव जैसे मूल्यों में आस्था रखते हुए उनका कार्यान्वयन भी करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ये सिद्धांत भारतीय संविधान की आत्मा, आधुनिक भारतीय (King charles III) राज्य की नींव और भारतीय संस्कृति के सनातन मूल्य हैं। भारत के राष्ट्रपति ‘संविधान के संरक्षण, रक्षा और बचाव’ की शपथ लेते हैं, जबकि ब्रिटिश सम्राट ‘स्वधर्म की रक्षा’ की शपथ लेते हैं। ब्रिटेन मध्यकालीन राजशाही के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रणाली का ‘कॉकटेल’ है। लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक प्रणाली अथवा संरचना मात्र नहीं है, यह किसी भी राष्ट्र की आत्मा है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि हर इंसान की जरूरतें और आकांक्षाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, समानता की भावना और शोषणमुक्त दुनिया बनाने की इच्छा ने सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप को जन्म दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय इतिहास में विभिन्न युगों के दौरान, (King charles III) नागरिक समाज की यह गहन विचारणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती रही है, जिसने लंबी पराधीनता के बावजूद भारत को लोकतंत्र का पालना बनाया है। ब्रिटेन में मौजूद रॉयल्टी और नोबल्टी तथा हाउस आॅफ लॉर्ड्स और हाउस आॅफ कॉमन्स जैसे सामाजिक/राजनीतिक पदानुक्रम लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध हैं। कुल मिलाकर, भारत का लोकतांत्रिक अनुभव ब्रिटेन को समावेशिता बढ़ाने, संवैधानिक मूल्यों/व्यवस्थाओं को दृढ़ करने, सांस्कृतिक बहुलता और विविधता का सम्मान करने की दिशा में मार्गदर्शक अंतर्दष्टि प्रदान करता है। भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रथाओं से सीखकर ब्रिटेन अपनी खुद की लोकतांत्रिक व्यवस्था को और समृद्ध व सुदृढ़ कर सकता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>प्रो. रसाल सिंह, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 May 2023 09:49:48 +0530</pubDate>
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                <title>सेहत की बदहाली बता रही सच्चाई</title>
                                    <description><![CDATA[भारत संयुक्त राष्ट्र की एक रपट में यह जानकारी दी गई है कि (ill health) प्रसव एवं उसके पश्चात जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में जिन देशों की स्थिति बहुत नकारात्मक पाई गई है, उसमें भारत की तस्वीर सबसे खराब है। भारत में प्रसव के दौरान महिलाओं, मृत शिशुओं के जन्म और नवजात शिशुओं की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ill-health-telling-the-truth/article-47715"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/aritcal.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत संयुक्त राष्ट्र की एक रपट में यह जानकारी दी गई है कि (ill health) प्रसव एवं उसके पश्चात जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में जिन देशों की स्थिति बहुत नकारात्मक पाई गई है, उसमें भारत की तस्वीर सबसे खराब है। भारत में प्रसव के दौरान महिलाओं, मृत शिशुओं के जन्म और नवजात शिशुओं की मौत के मामले सबसे ज्यादा हैं। सन् 2020-2021 में दुनिया के अलग-अलग देशों में तेईस लाख नवजात शिशुओं की मौत हो गई, जिनमें से भारत में मरने वालों की संख्या सात लाख अठासी हजार रही है। यह चिन्ताजनक स्थिति भारत का एक कड़वा सच है लेकिन एक शर्मनाक सच भी है और इस शर्म से उबरना जरूरी है। सवाल है कि विकास के ढांचे में शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? सवाल यह भी है कि जिस दौर में केंद्र सरकार स्वास्थ्य को लेकर सबसे ज्यादा संवेदनशील होने और प्राथमिकता में सबसे ऊपर मानकर काम करने का दावा कर रही है, उसमें आज भी प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजात की मौत के मामले क्यों अधिक हैं?</p>
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<p style="text-align:justify;">दरअसल, जच्चा-बच्चा मौतों को लेकर यह दुखद एवं त्रासद तस्वीर नई नहीं है। (ill health) लंबे समय से यह विडंबना एक तरह से स्थिर और कायम है कि प्रसव के दौरान महिलाओं या नवजात की जान चली जाती है। चिकित्सा सुविधाओं का दायरा फिलहाल इतना है कि उस तक बहुत सारे जरूरतमंद परिवारों की पहुंच नहीं है या फिर वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी है। सरकार की योजनाओं एवं समुचित बजट में प्रावधान के बावजूद उसकी असरकारी तस्वीर सामने न आने का बड़ा भ्रष्टाचार भी है। कहीं-ना-कहीं हमारे विकास के मॉडल में खामी है। ऐसा लगता है कि हमारे यहां विकास के लुभावने स्वरूप को मुख्यधारा की राजनीति का मुद्दा बनाने एवं चुनाव में वोट हासिल करने में तो कामयाबी मिली है, लेकिन इसके बुनियादी पहलुओं को केंद्र में रखकर जरूरी कदम नहीं उठाए गए या उन पर अमल नहीं किया गया। यह बेवजह नहीं है कि नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भी इस मामले में हमसे बेहतर स्थिति में पहुंच गए, जो अपनी बहुत सारी बुनियादी जरूरतों तक के लिए आमतौर पर भारत या दूसरे देशों पर निर्भर रहते हैं।</p>
<h3>दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है (ill health)</h3>
<p style="text-align:justify;">साफ है कि हमारी प्रगति की तस्वीर काफी विसंगतिपूर्ण है और ताजा (ill health) रिपोर्ट भारत की एक बड़ी जनसंख्या की बदहाली का अकेला सबूत नहीं है। खुद देश में सरकार एवं अन्य एजेन्सियों की तरफ से कराए गए सर्वेक्षण और कई दूसरे अध्ययनों के जरिए कंगाली, भुखमरी और कुपोषण के दहलाने वाले आंकड़े समय-समय पर विकास की शर्मनाक तस्वीर प्रस्तुत करते रहे हैं। एक बड़े तबके के बीच महिलाओं को गर्भधारण के बाद जिन पोषक तत्वों की जरूरत होती है, कई कारणों से उससे वे वंचित होती हैं। इसका सीधा असर उनकी सेहत, शारीरिक क्षमता और प्रसव पर पड़ता है, जिसमें कई बार प्रसव के समय महिला की जान चली जाती है या बच्चा इतना कमजोर पैदा होता है कि उसे बचाया नहीं जा पाता। यह स्थिति तब है जब महिलाओं की सेहत और प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर सरकारों की ओर से अनेक तरह की योजनाओं और कार्यक्रमों का संचालन हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि सुरक्षित प्रसव के लिए प्रसूता महिलाओं को अस्पतालों में सुविधाएं (ill health) और नगदी सहायता मुहैया कराई जाती है। 2005 से लागू जननी सुरक्षा योजना की शुरूआत ही गर्भवती महिलाओं और नवजात की सेहत में सुधार लाने के मकसद से हुई थी। इसके तहत कई राज्यों में गर्भवती महिलाओं के खाते में छह हजार रुपए दिए जाते हैं, ताकि जच्चा-बच्चा को जरूरी पोषण मिल सके। एक तरफ भारत खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं। वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है। भारत में महिलाओं की पचास फीसदी से अधिक आबादी एनीमिया यानी खून की कमी से पीड़ित है। इसलिए ऐसे हालात में जन्म लेने वाले बच्चों का कम वजन होना लाजिमी है। राइट टु फूड कैंपेन नामक संस्था का विश्लेषण है कि पोषण गुणवत्ता में काफी कमी आई है।</p>
<h3>भारत की विशाल आबादी एक चुनौती</h3>
<p style="text-align:justify;">केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार मंत्रालय ने जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम की शुरूआत की और इसके दो साल बाद इसके तहत दी जाने वाली सुविधाओं का विस्तार हुआ और उसमें जन्म के बाद नवजात के पोषण और इलाज की सहूलियत भी शामिल की गई। कायदे से अनेक योजनाओं और कार्यक्रमों के बाद जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में स्थिति में सुधार आना चाहिए था। मगर आखिर ऐसा क्यों है कि तमाम प्रयासों के बावजूद प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मौत का सिलसिला आज भी कायम है। समूचे देश में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दिए जाने के दावे के दौर में यह तस्वीर एक तरह से आईना दिखाती है कि जमीनी स्तर पर हकीकत क्या है और अभी कितना कुछ किया जाना बाकी है। रिपोर्टें बताती हैं कि ऐसी गंभीर समस्याओं से लड़ते हुए हम कहां से कहां पहुंचे है। इसी में एक बड़ा सवाल यह भी निकलता है कि जिन लक्ष्यों को लेकर भारत अपने प्रयासों के दावे कर रहा है, उनकी कामयाबी कितनी नगण्य एवं निराशाजनक है। कुपोषण, गरीबी, भूख में सीधा रिश्ता है और भारत की विशाल आबादी इसके लिये एक चुनौती बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के जीवन में अनेक वित्तीय, सामाजिक और स्वास्थ्य विषयक दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं, वैज्ञानिक तथ्य यह है कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह कर देने और फिर उनके मां बन जाने का सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। वे जीवन भर शारीरिक रूप से कमजोर और बीमारियों से घिरी रहती हैं। वे स्वस्थ बच्चों को जन्म नहीं दे पातीं। कम उम्र में ही उनकी मौत हो जाती है। शिशु और मातृ मृत्यु दर पर काबू पाना इसी वजह से चुनौती बना हुआ है। भूखे या अधपेट रह जाने वाली जनसंख्या में दुनिया में हुए इस इजाफे में तीन करोड़ लोग केवल भारत के हैं। इसमें पीने के पानी, कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षा और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के अभाव को जोड़ लें तो हम देख सकते हैं कि भारत आजादी के अमृत काल में भी असल में वंचितों की दुनिया है।</p>
<h3>आम नागरिकों का स्वास्थ्य वहां के विकास की सचाई बयां करता है</h3>
<p style="text-align:justify;">आत्मनिर्भर भारत एवं सशक्त भारत के निर्माण के लिये हमें अपनी विकास योजनाओं को नए सिरे से गढ़ना होगा, जिनमें स्वास्थ्य और शिक्षा के मद में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक निश्चित प्रतिशत आवंटन अनिवार्य होना चाहिए। किसी भी देश में आम नागरिकों का स्वास्थ्य वहां के विकास की सचाई को बयां करता है। लोगों की सेहत की स्थिति इस बात पर निर्भर है कि उन्हें भरपेट, उचित चिकित्सा सुविधाएं, शिक्षा और संतुलित भोजन मिले। इस लिहाज से देखें तो विकास और अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ने के तमाम दावों के बीच भारत में अपेक्षित प्रगति संभव नहीं हो सकी है। गौरतलब है कि प्रसव एवं उसके पश्चात जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में भारत की स्थिति काफी दुखद, त्रासदीपूर्ण एवं चिंताजनक है। यह कैसा विकास है? यह कैसे आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होते कदम है? भूख, कुपोषण, अभाव, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी की त्रासदी को जी रहा देश कैसे विकसित राष्ट्रों में शुमार होगा, कैसे विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनेगा?</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 May 2023 10:01:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>बैंकिंग क्षेत्र सजग और मजबूत</title>
                                    <description><![CDATA[अमरीका में बैंकिंग क्षेत्र में संकट और इसके चलते अमरीकी बैंकों के शेयरों में (Banking) गिरावट के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर शक्तिकांत दास इस दावे को दोहरा रहे हैं कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली सुदृढ़ है, भारत में विभिन्न कारकों के चलते बैंकों का लाभ बढ़ता जा रहा है जिसमें बेहतर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/banking-sector-alert-and-strong/article-47510"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/banking.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमरीका में बैंकिंग क्षेत्र में संकट और इसके चलते अमरीकी बैंकों के शेयरों में (Banking) गिरावट के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर शक्तिकांत दास इस दावे को दोहरा रहे हैं कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली सुदृढ़ है, भारत में विभिन्न कारकों के चलते बैंकों का लाभ बढ़ता जा रहा है जिसमें बेहतर वसूली और कडी निगरानी के चलते सरकारी और निजी दोनों बैंकों की स्थिति में सुधार आया है। वस्तुत: छोटे बैंक भी अपने आपरेशन में सक्रिय हैं। बैंकिंग क्षेत्र इसलिए भी उत्साहित है कि अजय बंगा विश्व बैंक के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। आईसीआरए के वित्तीय क्षेत्र के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सह प्रमुख अनिल गुप्ता का कहना है कि वर्तमान में अमरीकी बैंकों की तुलना में भारतीय बैंक मजबूती दिखा रहे हैं और वे विनियामक द्वारा उनके वर्तमान पूंजी स्तर, स्वस्थ परिसंपत्ति गुणवत्ता और कड़ी निगरानी बनाए रखने के चलते ऐसा कर पा रहे हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="एक ऐसा करामाती पेड़, जिसकी करोड़ों की कमाई कर देगी आपको मालामाल" href="http://10.0.0.122:1245/chandan-ki-kheti-chandan-ki-kheti-kese-kare/">एक ऐसा करामाती पेड़, जिसकी करोड़ों की कमाई कर देगी आपको मालामाल</a></p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: पिछले तीन वर्षों में दो बड़े बैंकों की विफलता के बाद भारत ने जमा पर (Banking) बीमा कवर की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये प्रति खाता कर दिया है। भारतीय ऋण दाता अमरीकी बैंकिंग क्षेत्र में उथल- पुथल से पैदा होने वाले प्रभावों को सहने में सक्षम हैं। हाल ही में यूबीएस ने स्विस बैंक के्रडिट सुशी का अधिग्रहण किया। इस संबंध में वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसवी ग्लोबल का कहना है कि सुदृढ़ वित्त पोषण प्रोफाइल, उच्च बचत दर और सरकार का समर्थन आदि ऐसे कारक हैं जो वित्तीय संस्थानों को सहायता करते हैं और उसी के आधार पर हम उनकी रेटिंग करते हैं। भारतीय बैंकों के पास अपने घाटे को कम करने के लिए सरकारी प्रतिभूति पोर्टफोलियो के रूप में पर्याप्त बफर है क्योंकि ब्याज दर में वृद्धि हो रही है। 24 मार्च 2023 की स्थिति के अनुसार बैंक ऋण 136.8 करोड़ रुपये है जो एक वर्ष पूर्व की तुलना में 17.8 लाख करोड़ अधिक है। जैसा कि सभी जानते हैं कि अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में पिछले वर्ष मई से 250 मूलांक की वृद्धि की है।</p>
<h3>बैंक लाभ चालू वित्त वर्ष के पहले नौ माहों में बढ़कर 70167 करोड़ रुपये हुआ</h3>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों ने कहा कि भारतीय बैंकों के वर्तमान पंूजी स्तर, स्वस्थ (Banking) परिसंपत्ति गुणवत्ता को देखते हुए वे किसी भी प्रकार के तनाव और दबाव को झेलने की बेहतर स्थिति में है इसलिए इस माह रेपो रेट में कोई वृद्धि नहीं की गई है। खुशी की बात यह है कि भारतीय बैंकों द्वारा कुल दिए गए ऋण के अनुपात में सकल गैर-निष्पादनकारी संपत्तियों में गिरावट आ रही है। सितंबर 2018 में ऐसी गैर-निष्पादनकारी संपत्तियां 16.8 प्रतिशत थीं और मार्च 2022 में यह 5.9 प्रतिशत थीं और दिसंबर 2022 में यह 5.53 प्रतिशत रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: सरकारी क्षेत्र के सभी बैंक लाभ में है और 2021-22 में उनका समग्र लाभ 66543 करोड़ रुपये था जो चालू वित्त वर्ष के पहले नौ माहों में बढ़कर 70167 करोड़ रुपये हो गया है। यह बात वित्त राज्य मंत्री ने लोक सभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताई। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा पिछले आठ वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं जैसे ऋण अनुशासन जिम्मेदारी से ऋण देने, बैंकिंग प्रशासन में सुधार, प्रौद्योगिकी का प्रयोग, बैंकों का एकीकरण और निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए कदम उठाना आदि।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच वित्त मंत्रालय ने सरकारी बैकों से कहा है कि वे शीर्ष कारपोरेट ऋण खातों पर कड़ी निगरानी रखें और एक ऐसी योजना प्रस्तुत करें कि मुख्य क्षेत्रों में व्यापारिक जोखिमों से किस तरह से निपटा जाए। अतीत में भारतीय बैंकों को ऋणग्रस्त कंपनियों को ऋण देने से संकट का सामना करना पड़ता था। बैंकों से यह भी कहा गया है कि वे अपनी व्यापारिक बहियों के बारे में मार्क टू मार्केट प्रभाव पर भी निगरानी रखें क्योंकि ब्याज दरें बढ़ रही हैं और अपनी नकदी या तरलता बनाए रखें। यह बताता है कि सरकार बैंकों का लाभ बढ़ाने के लिए कड़ी निगरानी के माध्यम से अशोध्य ऋणों को रोकने के लिए कृत संकल्प है। इसके अलावा अवसंरचना पर बढ़ते व्यय, परियोजनाओं के त्वरित कार्यान्वयन और सुधारों के जारी रखने से बैंकिंग क्षेत्र को और बढ़ावा मिलेगा।</p>
<h3>भारत में डिजिटल माध्यमों से ऋण वितरण में पांच गुना वृद्धि हुई</h3>
<p style="text-align:justify;">ये सभी कारक सकारात्मक वृद्धि का संकेत देते हैं क्योंकि बढ़ते व्यवसाय (Banking) से बैंकों की ऋण आवश्यकताएं बढ़ेंगी। प्रौद्योगिकी की प्रगति से बैंकों को अपनी कार्य कुशलता बनाए रखने में सहायता मिली है। इससे भी लाभ में वृद्धि होगी। हाल के वर्षों में भारत में फिनटेक और माइक्रो फाइनेसिंग में वृद्धि हुई है। भारत में वित्तीय वर्ष 2018 में डिजिटल रिवेन्यू 75 बिलियन अमरीकी डालर था और वित्तीय वर्ष 2023 तक इसके 1 ट्रिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचने की संभावना है। भारत में डिजिटल माध्यमों से ऋण वितरण में पांच गुना वृद्धि हुई है। इसके अलावा कमजोर बैंकों के सुदृढ़Þ बैंकों के साथ विलय से भी बैंकिंग क्षेत्र को बढ़ावा मिला है। धनी लोगों द्वारा बैंकों की राशि में हेराफेरी करने के घोटालों के बावजूद यह भी सच है कि बैंकों की पहुंच बढ़ी है तथा छोटे व्यापारी और विनिमार्ताओं को ऋण मिला है। उदाहरण के लिए मुद्रा ऋण बहुत कम ब्याज दरों पर छोटे उद्यमियों को दिए जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यद्यपि निजीकरण सफल रहा है किंतु सरकारी क्षेत्र के बैंकों को प्रचालनात्मक स्वायत्तता और प्रशासनिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। ये सरकारी बैंक बोर्ड द्वारा प्रशासित हों और उन पर भारतीय रिजर्व बैंक का विनियमन हो। भारतीय रिजर्व बैंक ने इंडियन बैंक एसोसिएशन से ये बदलाव करने की सिफारिश की है। सरकारी क्षेत्र के बैंकों के अशोध्य ऋणों के संबंध में सुधार की आवश्यकता है। नेशनल एसेट््स रिकंस्ट्रक्शन कंपनी के गठन के बाद आगामी वर्षों में इस समस्या का समाधान होने की संभावना है। ऋणदाताओं को ऐसे मामलों को अंतरित करने के लिए सहमत होना होगा और ऐसा करना उनके हित में भी होगा क्योंकि अशोध्य ऋणों के संभावित के्रताओं के संबंध में बैंकों को सिर्फ एक ऐसे ऋण लेने वाले के साथ संव्यवहार करना आसान होगा और इससे समस्याओं के समाधान को बढ़ावा मिलेगा।</p>
<h3>सहकारी तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार करना होगा</h3>
<p style="text-align:justify;">डिजिटलीकरण के मोर्चे पर भारत पिछले दो तीन वर्षों से तेजी से आगे बढ़ रहा है। (Banking) भारत में भुगतान और वित्तीय सेवा उत्पादों के वितरण के संबंध में अनेक वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियां हैं। एक सफल नया प्रयोग यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस या यूपीआई है जिसे नेशनल पेमेंट कारपोरेशन आॅफ इंडिया ने विकसित किया है और जिसे भारत के केन्द्रीय बैंक द्वारा विनियमित किया जा रहा है। यह एक रीयल टाइम पेमेंट प्रणाली है जो विभिन्न बैंकों के बीच धन राशि के अंतरण में मोबाइल प्रयोक्ताओं को अुनमति दे रहा है। वर्तमान में प्रमुख बैंकों का 70 प्रतिशत लेनदेन डिजिटल चैनलों द्वारा किया जा रहा है। बैंकों और फिनटेक कंपनियों के बीच सहयोग से आगामी वर्षों में इस संबंध में कुछ नए प्रयोग देखने को मिलेंगे क्योंकि आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस और डाटा अनेलिसिस में प्रगति के साथ इस क्षेत्र में भी प्रगति होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय बैंकों की मजबूती अर्थव्यवस्था के लिए एक शुभ संकेत है। बैंकों को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ानी होगी तथा छोटे तथा मध्यम किसानों तथा व्यापारियों की सहायता करनी होगी ताकि उनकी आय बढ़ सके। इसके अलावा सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार करना होगा और जनता के बीच व्यापक स्तर पर अपनी पहुंच बनानी होगी। नि:संदेह बैंकों द्वारा वित्त पोषण ग्रामीण जनसंख्या को अपने व्यवसाय को बेहतर ढंग से विस्तार करने में मदद करेगा और इससे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच की खाई भी कम होगी।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>धुर्जति मुखर्जी वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/banking-sector-alert-and-strong/article-47510</link>
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                <pubDate>Fri, 12 May 2023 10:13:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>पृथ्वी संरक्षण से ही बचेगा मानव अस्तित्व</title>
                                    <description><![CDATA[पृथ्वी सभी ग्रहों में से अकेला ऐसा ग्रह है जिस पर अभी तक जीवन संभव हैं। (Artical) मनुष्य होने के नाते, हमें प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने वाली गतिविधियों में सख्ती से शामिल होना चाहिए और पृथ्वी को बचाना चाहिए क्योंकि यदि पृथ्वी रहने के लायक नहीं रही तो मनुष्य का विनाश निश्चित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/human-existence-will-survive-only-by-protecting-the-earth/article-47420"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/earth.jpg" alt=""></a><br /><p>पृथ्वी सभी ग्रहों में से अकेला ऐसा ग्रह है जिस पर अभी तक जीवन संभव हैं। (Artical) मनुष्य होने के नाते, हमें प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने वाली गतिविधियों में सख्ती से शामिल होना चाहिए और पृथ्वी को बचाना चाहिए क्योंकि यदि पृथ्वी रहने के लायक नहीं रही तो मनुष्य का विनाश निश्चित है। पृथ्वी हमें हरित समृद्धि से समृद्ध जीवन बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह हमें संदेश देती है कि हमारे स्वास्थ्य, हमारे परिवारों, हमारी आजीविका और हमारी धरती को एक साथ संरक्षित करने का समय आ गया है।</p>
<p>दुनिया में पृथ्वी के विनाश, प्रकृति प्रदूषण एवं जैविक संकट को लेकर काफी चर्चा हो रही है। (Artical) पौधे जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है चाहे इंसान हो, जानवर हो या अन्य जीवित चीजें। वे हमें भोजन, आॅक्सीजन, आश्रय, ईंधन, दवाएं, सुरक्षा और फर्नीचर देते हैं। वे पर्यावरण, जलवायु, मौसम और वातावरण के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक हैं। हमें वनों की कटाई को रोककर और वनीकरण को बढ़ावा देकर वन्यजीवों की देखभाल करनी चाहिए।</p>
<h3>हर जगह प्रकृति का दोहन एवं शोषण जारी है | Artical</h3>
<p>आज विश्व भर में हर जगह प्रकृति का दोहन एवं शोषण जारी है। जिसके कारण पृथ्वी पर अक्सर उत्तरी ध्रूव की ठोस बर्फ का कई किलोमीटर तक पिघलना, सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत में छेद होना, भयंकर तूफान, सुनामी और भी कई प्राकृतिक आपदाओं का होना आदि ज्वलंत समस्याएं विकराल होती जा रही है, जिसके लिए मनुष्य ही जिम्मेदार हैं। ग्लोबल वार्मिग के रूप में जो आज हमारे सामने हैं।</p>
<p>ये आपदाएँ पृथ्वी पर ऐसे ही होती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी से जीव-जन्तु व वनस्पति का अस्तिव ही समाप्त हो जाएगा। जीव-जन्तु अंधे हो जाएंगे। लोगों की त्वचा झुलसने लगेगी और कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ जाएगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती इलाके चपेट में आ जाएंगे। कोरोना महामारी जैसी व्याधियां रह-रहकर जीवन संकट का कारण बनती रहेगी।</p>
<h3>अनेक शहर पानी की कमी से परेशान | Artical</h3>
<p>जल, जंगल और जमीन इन तीन तत्वों से पृथ्वी और प्रकृति का निर्माण होता है। यदि यह तत्व न हों तो पृथ्वी और प्रकृति इन तीन तत्वों के बिना अधूरी है। विश्व में ज्यादातर समृद्ध देश वही माने जाते हैं जहां इन तीनों तत्वों का बाहुल्य है। बात अगर इन मूलभूत तत्व या संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। आधुनिकीकरण के इस दौर में जब इन संसाधनों का अंधाधुन्ध दोहन हो रहा है तो ये तत्व भी खतरे में पड़ गए हैं। अनेक शहर पानी की कमी से परेशान हैं। आप ही बताइये कि कहां खो गया वह आदमी जो स्वयं को कटवाकर भी वृक्षों को कटने से रोकता था?</p>
<p>गोचरभूमि का एक टुकड़ा भी किसी को हथियाने नहीं देता था। जिसके लिये जल की एक बूंद भी जीवन जितनी कीमती थी। अब वही मनुष्य अपने स्वार्थ एवं सुविधावाद के लिये सही तरीके से प्रकृति का संरक्षण न कर पा रहा है और उसके कारण बार-बार प्राकृतिक आपदाएं कहर बरपा रही है। रेगिस्तान में बाढ़ की बात अजीब है, लेकिन हमने राजस्थान में अनेक शहरों में बाढ़ की विकराल स्थिति को देखा हैं। जब मनुष्य पृथ्वी का संरक्षण नहीं कर पा रहा तो पृथ्वी भी अपना गुस्सा कई प्राकृतिक आपदाओं के रूप में दिखा रही है। वह दिन दूर नहीं होगा, जब हमें शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा।</p>
<p>आज चिन्तन का विषय न तो युद्ध है और न मानव अधिकार, न कोई विश्व की राजनैतिक घटना और न ही किसी देश की रक्षा का मामला है। चिन्तन एवं चिन्ता का एक ही मामला है लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही गर्मी, सिकुड़ रहे जलस्रोत विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास।</p>
<h3>आज जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा संकट | Artical</h3>
<p>बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन- ये सब पृथ्वी एवं पृथ्वीवासियों के लिए सबसे बड़े खतरे हैं और इन खतरों का अहसास करना ही विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस का ध्येय है। प्रतिवर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। हर चीज की उपलब्धता कम हो रही है। आक्सीजन की कमी हो रही है। साथ ही साथ हमारा सुविधावादी नजरिया एवं जीवनशैली पर्यावरण एवं प्रकृति के लिये एक गंभीर खतरा बन कर प्रस्तुत हो रहा हैं।</p>
<p>आज जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है। अगर पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाए तो मानव जीवन कैसे सुरक्षित एवं संरक्षित रहेगा? पृथ्वी है तो सारे तत्व हैं, इसलिये पृथ्वी अनमोल तत्व है। इसी पर आकाश है, जल, अग्नि, और हवा है। इन सबके मेल से प्रकृति की संरचना सुन्दर एवं जीवनमय होती है। अपने-अपने स्वार्थ के लिए पृथ्वी पर अत्याचार रोकना होगा और कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ध्यान केंद्रित करना होगा।</p>
<h3>आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की</h3>
<p>अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से औद्योगिक क्रांति पर नियंत्रण करना होगा, क्योंकि उन्हीं के कारण कार्बन उत्सर्जन और दूसरी तरह के प्रदूषण में बढ़ोतरी हुई है। यह देखा गया है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है। अगर प्रकृति के साथ इस प्रकार से खिलवाड़ होती रही तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब हमें शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा।</p>
<p>आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर विशेष बल दिया जाए, जिसमें मुख्यत: धूप, खनिज, वनस्पति, हवा, पानी, वातावरण, भूमि तथा जानवर आदि शामिल हैं। इन संसाधनों का अंधाधुंध दुरुपयोग किया जा रहा है, जिसके कारण ये संसाधन धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर हैं। प्रकृति के संरक्षण को सभी देशों की सरकारों एवं विभिन्न गैर-राजनैतिक संगठनों ने बड़ी गम्भीरता से लिया है और इस पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया है। ऐसे भी अनेक तरीके हैं जिनमें आम आदमी भी इनके संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 May 2023 09:51:14 +0530</pubDate>
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                <title>साम, दाम और दंड में फंसा लोकतंत्र</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नाटक से निकला संदेश पूरी राजनीति को बदबूदार बना रहा है। राज्यपाल के विवेक का विवेक के विशेषाधिकार भी मजाक बन गया। सियासत और सत्ता के इस जय पराजय के खेल में कौन जीता और कौन पराजित हुआ यह सवाल तो अंतिम सीढ़ी का है। यह राजनीतिक दलों और उनके अधिनायकों के लिए महत्वपूर्ण हो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/democracy/article-3695"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-05/77.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कर्नाटक से निकला संदेश पूरी राजनीति को बदबूदार बना रहा है। राज्यपाल के विवेक का विवेक के विशेषाधिकार भी मजाक बन गया। सियासत और सत्ता के इस जय पराजय के खेल में कौन जीता और कौन पराजित हुआ यह सवाल तो अंतिम सीढ़ी का है। यह राजनीतिक दलों और उनके अधिनायकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की तंदुरुस्ती के लिए कभी भी सकारात्मक नहीं कहा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह राजनीतिक संस्थाओं के लिए भी सबक है जो सत्ता और सिंहासन विस्तार की नीति में विश्वास रखते हैं उनके लिए सिंहासन ही सबकुछ है। राजनीति के केंद्र में लोकहितक कभी भी प्रमुख मसला नहीं होता। वह साम्राज्य विस्तार में अधिक विश्वास रखती है। एकाधिकार शासन प्रणाली में यह बात आम है, लेकिन दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में ऐसा कम होता है लेकिन अब लोकतंत्र की छांव में भी सामंतवाद की बेल पल्लवित हो रही है। सत्ता के केंद्रिय बिंदु में संविधान नहीं साम, दाम, दंड और भेद की नीति अहम हो चली है।</p>
<p style="text-align:justify;">सत्ता के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को फुटबाल नहीं बनाया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था का हर स्थिति में अनुपालन होना चाहिए। यहां सवाल कांग्रेस की नैतिक जीत और भाजपा की पराजय का नहीं है। प्रश्न संवैधानिक अधिकारों का है, जिनकी तरफ देखा तक नहीं जाता और दलीय प्रतिबद्धता की अंधभक्ति में आंख बंद कर फैसले लिए जाते हैं। राजनीति सत्ता के लिए किसी हद तक गिर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसा कि कर्नाटक में गिरी और पूर्व में गिरती आ रही है। भाजपा एक और राज्य कर्नाटक पर विजय प्राप्त कर जहां कांग्रेस मुक्त भारत के अपने मिशन को सफल करना चाहती थी। वहीं कांग्रेस गोवा, मणिपुर और मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद मोदी और शाह के हाथों मिली पराजय का बदला चुकाना चाहती थी। राजनीति में यह प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन वह पूरी तरह दलीय प्रतिबद्धता से परे और स्वस्थ हो।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन जब जिम्मेदार संस्थाएं अपने संवैधानिक अधिकारों का त्याज्य कर किसी विशेष संदर्भ में उसका प्रयोग करने लगे तो यह उचित नहीं है। कर्नाटक फसाद की मूल वजह कांग्रेस और भाजपा की दुराग्रह से ग्रसित राजनीति है। भाजपा के थिंक टैंक अल्पमत में भी कर्नाटक में सरकार बना पूर्व की पुनरावृत्ति दुहराना चाहते थे और एक अलग तरह का संदेश देना चाहते थे। अमितशाह कर्नाटक मिशन को सफल कर यह देश की जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश में थे कि 2019 के असली दावेदार वही हैं। अमितशाह अपने राजनैतिक कौशल का झंडा गाड यह संदेश देना चाहते थे ़हम अल्पमत में हो या बहुमत में सरकार तो हमीं बनाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस हमारी रणनीति और चुनावी मैनेजमेंट के सामने कहीं नहीं टिकती है। लेकिन उनकी सारी रणनीति धरी की धरी रह गयी। अधिक से अधिक कीचड़ में कमल खिलाने की उनकी सोच बेगार गयी। 2019 के लिए लोगों में जो एक सोच पैदा करना चाहते थे उसकी बखिया उधड़ गयी। भाजपा अपने ही बुने जाल में बुरी तरफ उलझ गयी। वह अपने सियासी तीर से संवैधानिक पीठों को भी बौना साबित करना चाहती थी, लेकिन यह उसका दिवा स्वप्न निकला। भाजपा के चाणक्य मोटू इस पर कांग्रेस के च्रकव्यूह में फंस गए।</p>
<p style="text-align:justify;">कामदार पर नामदार की नीति भारी पड़ी। पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल है कि जब कांग्रेस ने राज्यपाल वुजभाई वाला को जेडीएस और कांग्रेस के 117 विधायकों की सूची सौंप दी फिर उसे सरकार बनाने के लिए क्यों नहीं आमंत्रित किया गया। कांग्रेस प्रतिनिधि मंडल को मिलने तक का वक्त नहीं दिया गया। जबकि येदियुरप्पा के लिए राजभवन के दरवाजे खुले रहे। जब कांग्रेस और जेडीएस के पास सरकार चलाने के लिए दो-तिहाई बहुमत था, फिर वह भाजपा को क्यों आमंत्रित किया गया। भाजपा के चाणक्य आखिर येदियुरप्पा की जगहंसाई क्यों कराई।</p>
<p style="text-align:justify;">ढ़ाई दिन का मुख्यमंत्री बनने को क्यों मजबूर किया। संविधान क्या कहता है, वह बहुमत की बात करता है या फिर सबसे बड़े दल की। अगर बहुमत की बात थी तो फिर महामहिम राज्यपाल को विवेक का इस्तेमाल करने की क्या जरुरत थी। राज्यपाल एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, उसका किसी दल से ताल्लुकात या उसके प्रति झुकाव अलोकतांत्रिक और घातक है। अगर नियम सबसे बड़े दल का है तो फिर गोवा, मणिपुर और मेघालय में भाजपा और दूसरे गठबंधित दलों को क्यों आमंत्रित किया गया। निश्चित तौर यह संवैधानिक असमंजस की स्थिति है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल जैसे प्रमुख संवैधानिक पदों पर राजनैतिक दलों से नियुक्तियों की व्यवस्था बंद होनी चाहिए। प्रमुख सचिवों की तरह यहां भी प्रशासनिक अफसरों की नियुक्ति होनी चाहिए या फिर राज्यपाल के लिए भी राष्टÑपति जैसी चुनावी व्यवस्था अमल में लायी जानी चाहिए। संविधान में राज्यपालों के विवेक का अधिकार खत्म होना चाहिए। विवेक का अधिकार ही राजनीतिक और दलीय स्वामिभक्ति को बढ़ा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि राज्यपाल दलीय प्रतिबद्धता से उभर नहीं पाते जिसकी वजह है लोकतंत्र बेशर्म होता है और कर्नाटक जैसी घटना हमारे सामने होती है। इसके अलावा दो-तिहाई बहुमत के की आड़ में भी लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक बंद होना चाहिए। सबसे अधिक मतपाने वाले दल को सत्ता सौंपी जानी चाहिए या फिर बहुत की अंकीय गणित पर विराम लगना चाहिए। सबसे बड़े राजनीतिक दल को सरकार चलाने का मौका मिलना चाहिए। दलबदल कानून पूरी प्रतिबद्धता के साथ लागू होना चाहिए। क्योंकि आम तौर यह होता है कि जोड़-तोड़ से सरकार बना ली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरे दल से टूटे विधायक सरकार में शामिल हो सत्ता आनंद भोगते हैं जबकि उस पर फैसला बेहद विलंब से आता है जिसकी वजह से दल बदल कानून भी बेमतलब साबित होता है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने वाली इस व्यवस्था पर विराम लगना चाहिए। संविधान संशोधन के जरिए यह व्यवस्था होनी चाहिए की चुनाव के बाद कोई भी सदस्य अपने मूल दल से साल भर बाद पाला बदल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कर्नाटक विश्वासमत में यह बात भी सामने आयी की अगर कोई भी कांग्रेस या जेडीएस का विधायक भाजपा के पक्ष में मतदान करता तो उसकी सदस्या खत्म नहीं होती। इस तरह के लचीने कानून कहीं न कहीं से रिसोर्ट और हार्स टेडिंग संस्कृति को बढ़ावा देते हैं, इस तरह की छूट पर लगाम लगनी चाहिए। कांग्रेस अगर समय रहते सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा न खटखटाती तो येदियुरप्पा और भाजपा को बहुमत सिद्ध करने से कोई नहीं रोक सकता था। क्योंकि राज्यपाल की तरफ से पूरे 15 दिन का वक्त दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">उस स्थिति में सब कुछ सामान्य होता और भाजपा आराम से बहुमत साबित कर लेती। इसी रणनीति के तहत भाजपा ने येदियुरप्पा को मुख्मंत्री पद की शपथ दिलाई थी। यह अमितशाह की सोची समझी रणनीति थी, लेकिन कांग्रेस की सक्रियता से वह काम नहीं आयी और भाजपा को मात खानी पड़ी। देश की सर्वोच्च अदालत के हस्तक्षेप की वजह से यह संभव हुआ। क्योंकि भाजपा को अपनी गोंट विठाने का पूरा वक्त नहीं मिल पाया। जिसकी वजह लोकतत्र की गला घोंटने की एक कोशिश नाकाम हो गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतांत्रित व्यवस्था की सेहत दुरुस्त रखने के लिए राजनीतिक दलों को सत्ता और सिंहासन की राजनीति से अलग हटना होगा। हलांकि इस गलत व्यवस्था के लिए सिर्फ भाजपा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। इसकी पूरी जबाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी कांग्रेस की है। पूर्व में कर्नाटक, झारखंड, बिहार, जम्मू-कश्मीर, आंध्रप्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस गलत परंपरा को उदाहरण हैं। राज्यपाल जैसी संस्था का दुरपयोग कांग्रेस की परंपरा रही है। एक-दो नहीं दर्जनों उदाहरणों से भारतीय लोकतंत्र का इतिहास रंगा पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र के लिए आज जो सबसे घातक नीति साबित हो रही है उसका बीज कांग्रेस ने ही कभी बोया जब दुनिया के सबसे संवृद्धिशाली लोकतंत्र में उसकी तूती बोलती थी। यह कहावत उस पर फीट बैठती है कि जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय। कर्नाटक, गोवा, मणिपुर और मेघालय पर उसे घड़ियाली आंसू बहाने की आवश्यकता नहीं है। संवैधानिक कीचड़ तो कांग्रेस का ही फैलाया है अब वह रायता बन फैल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-प्रभुनाथ शुक्ल</strong></p>
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                <pubDate>Sun, 20 May 2018 21:27:32 +0530</pubDate>
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