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                <title>परिवार ही घर को मन्दिर बनाता है</title>
                                    <description><![CDATA[देश एवं दुनिया को परिवार के महत्व को बताने के लिए World Family Day हर साल 15 मई को मनाया जाता है। प्राणी जगत एवं सामाजिक संगठन में परिवार सबसे छोटी इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य होकर ही अपनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/family-makes-home-a-temple/article-61759"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-09/family-day.jpg" alt=""></a><br /><p>देश एवं दुनिया को परिवार के महत्व को बताने के लिए World Family Day हर साल 15 मई को मनाया जाता है। प्राणी जगत एवं सामाजिक संगठन में परिवार सबसे छोटी इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य होकर ही अपनी जीवन यात्रा को सुखद, समृद्ध, विकासोन्मुख बना पाता है। उससे अलग होकर उसके अस्तित्व को सोचा नहीं जा सकता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता अनेक परिवर्तनों से गुजर कर अपने को परिष्कृत करती रही है, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों में परिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है।</p>
<h3 class="entry-title td-module-title"><a title="Sirsa News : 76वीं सीनियर वाटर पोलो चैंपियनशिप के लिए चुने गए हरियाणा के जल धुरंधर" href="http://10.0.0.122:1245/trial-of-water-polo-players-concluded-at-msg-bhartiya-khel-gaon/">Sirsa News : 76वीं सीनियर वाटर पोलो चैंपियनशिप के लिए चुने गए हरियाणा के जल धुरंधर</a></h3>
<p>हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में पल (World Family Day) रहे हों लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि एवं जीवन की परिपूर्णता-सार्थकता अनुभव करते हैं। परिवार का महत्व न केवल भारत में बल्कि दुनिया में सर्वत्र है, यही कारण है कि अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस परिवार संस्था को मजबूती देने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य युवाओं को परिवार के प्रति जागरूक करना है ताकि युवा तथाकथित आधुनिक के प्रवाह में अपने परिवार से दूर न हों। परिवार दो प्रकार के होते हैं- एक एकल परिवार और दूसरा संयुक्त परिवार। एकल परिवार में पापा- मम्मी और बच्चे रहते हैं। संयुक्त परिवार में पापा- मम्मी, बच्चे, दादा दादी, चाचा-चाची, बड़े पापा, बड़ी मम्मी, बुआ इत्यादि रहते हैं।</p>
<p>इस दिवस को मनाने की घोषणा सर्वप्रथम 15 मई 1994 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने की थी। संयुक्त परिवार टूटने एवं बिखरने की त्रासदी को भोग रहे लोगों के लिये यह दिवस बहुत अहमियत रखता है। बढ़ती जवाबदारी और जरूरतों को पूरा कर पाने का भय ही वह मुख्य कारण है जो अब संयुक्त परिवारों के टूटने का कारण बना है। जबकि वास्तव में मानव सभ्यता की अनूठी पहचान है संयुक्त परिवार और वह जहाँ है वहीं स्वर्ग है। रिश्तों और प्यार की अहमियत को छिन्न-भिन्न करने वाले पारिवारिक सदस्यों की हरकतों एवं तथाकथित आधुनिकतावादी सोच से बुढ़ापा कांप उठता है। संयुक्त परिवारों का विघटन और एकल परिवार के उद्भव ने जहां बुजुर्गांे को दर्द दिया है वहीं बच्चों की दुनिया को भी बहुत सारे आयोजनों से बेदखल कर दिया है। दुख सहने और कष्ट झेलने की शक्ति जो संयुक्त परिवारों में देखी जाती है वह एकल रूप से रहने वालो में दूर-दूर तक नही होती है।</p>
<h3>परिवार में रहने से तनावमुक्त व प्रसन्नचित्त रहते हैं | World Family Day</h3>
<p>आज के अत्याधुनिक युग में बढ़ती महंगाई और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए संयुक्त परिवार समय की मांग कहे जा सकते हैं। हम पुराने युगों की बात करें या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर भी बात करें तो आज की ही तरह पहले भी परिवारों का विघटन हुआ करता था। लेकिन आधुनिक समाज में परिवार का विघटन आम बात हो चुकी है और उसने जीवन को जटिल से जटिलतर कर दिया है। ऐसे में परिवार न टूटे इस मिशन एवं विजन के साथ अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। परिवार के बीच में रहने से आप तनावमुक्त व प्रसन्नचित्त रहते हैं, साथ ही आप अकेलेपन या डिप्रेशन के शिकार भी नहीं होते, यही नहीं परिवार के साथ रहने से आप कई सामाजिक बुराइयों से अछूते भी रहते हैं। समाज की परिकल्पना परिवार के बगैर अधूरी है और परिवार बनाने के लिए लोगों का मिलजुल कर रहना व जुड़ना बहुत जरूरी है। हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हों लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं।</p>
<p>भारत गांवों का देश है, परिवारों का देश है, शायद यही कारण है कि न चाहते हुए भी आज हम विश्व के सबसे बड़े जनसंख्या वाले राष्ट्र के रूप में उभर चुके हैं और शायद यही कारण है कि आज तक जनसंख्या दबाव से उपजी चुनौतियों के बावजूद, एक ‘परिवार’ के रूप में, जनसंख्या नीति बनाये जाने की जरूरत महसूस नहीं की। ईंट, पत्थर, चूने से बनी दीवारों से घिरा जमीं का एक हिस्सा घर-परिवार कहलाता है जिसके साथ ‘मैं’ और ‘मेरापन’ जुड़ा है। संस्कारों से प्रतिबद्ध संबंधों की संगठनात्मक इकाई उस घर-परिवार का एक-एक सदस्य है। हर सदस्य का सुख-दुख एक-दूसरे के मन को छूता है। प्रियता-अप्रियता के भावों से मन प्रभावित होता है। घर-परिवार जहां हर सुबह रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा की समुचित व्यवस्था की जुगाड़ में धूप चढ़ती है और आधी-अधूरी चिंताओं का बोझ ढोती हुई हर शाम घर-परिवार आकर ठहरती है। कभी लाभ, कभी हानि, कभी सुख, कभी दुख, कभी संयोग, कभी वियोग, इन द्वंद्वात्मक परिस्थितियों के बीच जिंदगी का कालचक्र गति करता है। भाग्य और पुरुषार्थ का संघर्ष चलता है।</p>
<h3>घर-परिवार निश्चित रूप से पूजा का मंदिर है</h3>
<p>आदमी की हर कोशिश ‘घर-परिवार’ बनाने की रहती है। सही अर्थों में घर-परिवार वह जगह है जहां स्नेह, सौहार्द, सहयोग, संगठन सुख-दुख की साझेदारी, सबमें सबक होने की स्वीकृति जैसे जीवन-मूल्यों को जीया जाता है। जहां सबको सहने और समझने का पूरा अवकाश है। अनुशासन के साथ रचनात्मक स्वतंत्रता है। निष्ठा के साथ निर्णय का अधिकार है। जहां बचपन सत्संस्कारों में पलता है। युवकत्व सापेक्ष जीवनशैली से जीता है। वृद्धत्व जीए गए अनुभवों को सबके बीच बांटता हुआ सहिष्णु और संतुलित रहता है। ऐसा घर-परिवार निश्चित रूप से पूजा का मंदिर बनता है। संयुक्त परिवारों की परम्परा पर आज धुंधलका छा रहा है, परिवार टूटता है तो दीवारें भी ढहती हैं, आदमी भी टूटता है और समझना चाहिए कि उसका साहस, शक्ति, संकल्प, श्रद्धा, धैर्य, विश्वास बहुत कुछ टूटता/बिखरता है।</p>
<p>क्रांति और विकास की सोच ठंडी पड़ जाती है और जीवन के इसी पड़ाव पर फिर परिवार का महत्व सामने आता है। परिवार ही वह जगह है भाग्य की रेखाएं बदलने का पुरुषार्थी प्रयत्न होता है। जहां समस्याओं की भीड़ नहीं, वैचारिक वैमनस्य का कोलाहल नहीं, संस्कारों के विघटन का प्रदूषण नहीं, तनावों की त्रासदी की घुटन नहीं। कोई इसी परिवाररूपी घेरे के अंधेरे में रोशनी ढूंढ लेता है। बाधाओं के बीच विवेक जमा लेता है। भीड़ में अकेले रह जाता है। दुख में सुख का संवेदन कर लेता है। घर-परिवार को सिर्फ अपनी नियति मानकर नहीं बैठा जा सकता। क्योंकि इसी घर में मंदिर बनता है और कहीं घर ही मंदिर बन जाता है। कहते हैं कि आपका काम, रबड़ की गेंद है, जिस पर जितना जोर देते हैं, वह उतना ऊंचा उठता है। पर आपका परिवार कांच की गेंदें हैं, जो हाथ से छूटती हैं तो टूट ही जाती हैं।</p>
<p>कई बार हम सब भूल जाते हैं कि जीवन में सबसे जरूरी क्या है। हम इधर-उधर की बातों में इतना डूब जाते हैं कि जो सच में जरूरी है, उसे छोड़ देते हैं। हम परिवार की खुशियों के नाम पर सामान तो खरीदने में लगे रहते हैं, पर उन चीजों पर ध्यान नहीं देते जो परिवार में सबको संतुष्टि का एहसास कराती हैं, सबको जोड़ती है। ‘परिवार’ शब्द हम भारतीयों के लिए अत्यंत ही आत्मीय होता है। अपने घर-परिवार में अपने आपका होना ही जीवन का सत्य है। यह प्रतीक्षा का विराम है। यही प्रस्थान का शुभ मुहूर्त है। उम्मीद है जल्द ही समाज में संयुक्त परिवार की अहमियत दुबारा बढ़ने लगेगी और लोगों में जागरूकता फैलेगी कि वह एक साथ एक परिवार में रहें जिसके कई फायदे हैं। इंसानी रिश्तों एवं पारिवारिक परम्परा के नाम पर उठा जिन्दगी का यही कदम एवं संकल्प कल की अगवानी में परिवार के नाम एक नायाब तोहफा होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Sep 2024 16:40:58 +0530</pubDate>
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                <title>सतलुज-यमुना लिंक नहर मामला : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अहम बिंदु</title>
                                    <description><![CDATA[Sutlej-Yamuna Link: सतलुज-यमुना लिंक नहर मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब सरकार (Punjab Government) को नहर का सर्वे कराने का आदेश दिया है। दशकों से चल रहे इस मामले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इतना सख्त रवैया अपनाया है। कोर्ट ने पंजाब सरकार से इस मामले में राजनीति […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/sutlej-yamuna-link-canal-case-important-points-of-supreme-court-order/article-53324"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-10/supreme-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Sutlej-Yamuna Link: सतलुज-यमुना लिंक नहर मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब सरकार (Punjab Government) को नहर का सर्वे कराने का आदेश दिया है। दशकों से चल रहे इस मामले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इतना सख्त रवैया अपनाया है। कोर्ट ने पंजाब सरकार से इस मामले में राजनीति नहीं करने को कहा है। इस सख्ती से यह भी साबित हो गया है कि कोर्ट ने समझ लिया है कि यह मामला पंजाब और हरियाणा के बीच आपसी बातचीत से नहीं सुलझ सकता। केंद्र को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इन आदेशों से हरियाणा को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट के आदेश का केवल एक ही बिंदु पंजाब के पक्ष में नजर आता है, जो पंजाब की दलीलों से काफी मेल खा रहा है। Sutlej-Yamuna Link</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा है कि पंजाब में पानी की उपलब्धता कितनी है, इसकी भी रिपोर्ट दी जाए। अदालत में पंजाब की मुख्य दलील यही रही है कि उसके पास जरूरत से ज्यादा पानी नहीं है तो फिर दूसरे राज्यों को पानी कैसे दिया जाए। अदालत के आदेश का बिंदु पंजाब के लिए लाभदायक साबित हो सकता, बशर्ते बदल रही परिस्थितियों में पानी की उपलब्धता चिंताजनक हो। यह बात वास्तव में वजनदार है कि आज स्थिति वैसी नहीं है जैसी 50 साल पहले थी, आबादी बहुत बढ़ गई है, पानी की घरेलू खपत के साथ-साथ पानी की बबार्दी भी बढ़ गई है। पानी का उपयोग केवल घरेलू उपयोग के लिए नहीं हो रहा, वाहनों को धोने के लिए भी धड़ल्ले से हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। जहां तक पंजाब-हरियाणा का संबंध है, दोनों राज्यों में अधिक पानी की खपत वाली फसलें बोने का चलन है, दोनों राज्य धान का रकबा कम करने में विफल रहे हैं और पानी की मांग बढ़ती जा रही है। इसी प्रकार, वर्षा की कमी के कारण नदियों का जल स्तर सामान्य दिनों में अच्छा नहीं रहा। भूमिगत जल का उपयोग लगातार बढ़ रहा है और बड़ी संख्या में ब्लॉकों को ब्लैक जोन घोषित किया जा चुका है। इन परिस्थितियों में नदियों में पानी की उपलब्धता की कमी भी एक नया मुद्दा बन जाएगा। किस राज्य को कितना पानी दिया जाएगा, यह एक नया मुद्दा होगा जिसके लिए पानी की जरूरतों का वर्गीकरण और उसका महत्व जैसे बिंदु चर्चा का विषय बनेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में राजनीतिक कारणों के चलते यह भुगौलिक व प्राकृतिक महत्व वाला विषय भावनात्मक बन चुका है। जल वितरण के सिद्धांतों को प्राकृतिक सिद्धांतों, स्थानीय हितों और राष्ट्रीय हितों के संबंध में तय करना होगा। पंजाब को बाढ़ के रूप में नुकसान भी उठाना पड़ता है। सवाल यह भी उठता है कि क्या जल प्राप्त करने वाले राज्य नुकसान की भरपाई में हिस्सा लेंगे? इस संवेदनशील मुद्दे पर दोनों राज्यों को सद्भाव और मानवता की भावना से पानी बचाने पर बल देने के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों तथा कृषि तकनीक पर जोर देना चाहिए। पानी की मांग में गिरावट दर्ज करनी होगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Indian Railways: रामेश्वरम से फिरोजपुर तक वाया हनुमानगढ़ ट्रेन शुरू" href="http://10.0.0.122:1245/rameshwaram-to-firozpur-via-hanumangarh-train-started/">Indian Railways: रामेश्वरम से फिरोजपुर तक वाया हनुमानगढ़ ट्रेन शुरू</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Oct 2023 16:31:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>G20 Summit: जी-20 सम्मेलन से नए विश्व की संरचना संभव</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: हिंसा, आतंक एवं युद्ध से संत्रस्त दुनियाभर की नजरें 9 और 10 सितंबर को दिल्ली में होने वाले जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं। यह सम्मेलन इसलिए भी खास है कि भारत इस साल जी-20 का अध्यक्ष होते हुए दुनिया को नई दिशाएं एवं नए आयाम दिए हैं। सम्मेलन ऐसे समय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/structure-of-new-world-possible-through-conference/article-52017"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g-20-summit.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: हिंसा, आतंक एवं युद्ध से संत्रस्त दुनियाभर की नजरें 9 और 10 सितंबर को दिल्ली में होने वाले जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं। यह सम्मेलन इसलिए भी खास है कि भारत इस साल जी-20 का अध्यक्ष होते हुए दुनिया को नई दिशाएं एवं नए आयाम दिए हैं। सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-ताइवान की तनातनी और उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण को लेकर असुरक्षा एवं अशांति की चिंताओं से घिरी हुई है। हालांकि जी-20 सुरक्षा संबंधी मुद्दों का नहीं, आर्थिक मुद्दों का मंच है, लेकिन सुरक्षा, शांति एवं युद्धमिुक्त से होकर ही आर्थिक उन्नति के रास्ते खुलते हैं। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">सुरक्षा चिंताओं ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को जिस तरह प्रभावित कर रखा है, जी-20 देशों के लिए इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना संभव नहीं है। जी-20 के सदस्य देशों की संयुक्त रूप से दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में करीब 85 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 75 फीसदी की भागीदारी है। इस मंच के अध्यक्ष होने के नाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक उन्नति के लिए शांति का सन्देश दिया है, उनका कहना है कि ‘यह युग युद्ध का नहीं है’ सन्देश फिर दुनिया को देने की जरूरत है। चीन की विस्तारवादी नीतियों पर अंकुश के लिए भी सम्मेलन में निर्णायक रूपरेखा एवं दिशाएं तय होनी चाहिए। जाहिर है, दिल्ली शिखर सम्मेलन में जो भी फैसले किए जाएंगे, पूरी दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे एवं उसी से नई विश्व संरचना संभव होगी।</p>
<h3>विश्व इतिहास के अगले पृष्ठ सचमुच में स्वर्णिम होंगे | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">समूची दुनिया युद्ध नहीं चाहती, अहिंसा एवं शांति की तेजस्विता ही विश्वजनमत की सबसे बड़ी अपेक्षा है, अब अहिंसा कायरता नहीं है बल्कि उन्नत एवं आदर्श विश्व संरचना का आधार है। अब एक दौर अहिंसा का चले, उसकी तेजस्विता का चले तो विश्व इतिहास के अगले पृष्ठ सचमुच में स्वर्णिम होंगे, जी-20 के माध्यम से आर्थिक उन्नति के रास्ते कपोतों के मुंह में गेहूं की बाली लिये होंगे। लेकिन इसकी सबसे बड़ी बाधा चीन एवं रूस पर निर्णय एवं निर्णायक रूपरेखा को तैयार करना ही होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दूसरे देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकों पर सबकी नजरें टिकी थीं, पर दोनों सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे। इससे सम्मेलन के उद्देश्यों और संभावनाओं पर खास असर नहीं पड़ेगा। जब अमरीका, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष सम्मेलन में भाग लेने वाले हैं तो दुनिया की मौजूदा चुनौतियों से निपटने की कोई न कोई दिशा जरूर उभरेगी। इसकी संभावनाएं इसलिए भी बढ़ गई हैं, क्योंकि भारत ने नीदरलैंड्स, मिस्र, स्पेन, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात और बांग्लादेश समेत नौ ऐसे देशों को भी आमंत्रित किया है, जो जी-20 के सदस्य नहीं हैं।</p>
<h3>मोदी ने दुनिया को एक परिवार बनाने की ओर कदम बढ़ाये हैं | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत ने सारी वसुधा को अपना परिवार मानते हुए ही जी-20 के अध्यक्षीय दायित्व को संभाला है। आज से एक सदी पूर्व अमरीका के शिकागो में सर्वधर्म सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों को ‘बहिनों और भाइयों’ के रूप में सम्बोधित कर स्वामी विवेकानंद ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भारतीय भावना का ही विचार तो दिया था, जिसे सुनकर वहां उपस्थित सभी प्रतिनिधि आश्चर्यचकित रह गये और इस संबोधन से गद्गद् होकर बहुत देर तक करतल ध्वनि करते रहे। आज भी मोदी उसी वसुधैव कुटुम्बकम मंत्र को जी-20 का उद्घोष एवं लोगों बनाकर दुनिया को एक परिवार बनाने की ओर कदम बढ़ाये हैं, लेकिन इन राहों में चीन एवं रूस जैसे महत्वाकांक्षी देश कांटे बो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, दुनिया के देशों को यह समझना होगा कि इस वक्त चीन और रूस, दोनों ही अपने हिसाब से दुनिया को संचालित करना चाहते हैं। दोनों की मंशा अपने पड़ोसी देशों की संप्रभुता को नष्ट करने की है और साथ ही, इस सरासर अन्यायपूर्ण व अमानवीय कृत्य में वे जी-20 जैसे मंचों का समर्थन भी चाहते हैं। कैसे भुला दिया जाए कि पुतिन यूक्रेन के खिलाफ बाकायदा युद्ध लड़ रहे हैं, तो चीन ताइवान व भारतीय इलाकों पर लगातार गिद्ध दृष्टि गड़ाकर बैठा है? इसके बावजूद दुनिया में निरंतर सशक्त होते भारत को न तो निराश होना चाहिए और न हार मानकर बैठ जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत को अपनी परम्परा से मिली ऊर्जा से दुनिया में शांति, सुख एवं समृद्धि की कामना एवं प्रयत्न करते रहना हैं। इतिहास साक्षी है कि सभी प्राणियों के सुख-शांति की कामना करने वाले हमारे पूर्वजों ने कहीं भी राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति का लक्ष्य रखकर आक्रमण नहीं किया, किसी देश पर अतिक्रमण नहीं किया, किसी देश की सीमाओं पर कब्जा नहीं किया। यदि कहीं संघर्ष की स्थिति आई थी तो लक्ष्य रहा सज्जनों का परित्राण और दुष्टों का विनाश।</p>
<h3>जी-20 में चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग आ रहे हैं | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त जहां कहीं वे गये, वहां अपने सद्व्यवहार और ज्ञान के बल पर उन्होंने भाईचारे और भारतीय संस्कृति की पताका ही लहराई न कि सत्ता के मद में किसी पर आक्रमण किया। आज भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में गिरावट के लिए अकेले चीनी राष्ट्रपति जिम्मेदार हैं। एकाधिक ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि भारत में होने वाले शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग आ रहे हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि जोड़ने-जुड़ने के शिखर मंच पर चीन की ओर से तोड़ने-टूटने की बातें नहीं होंगी। निश्चित ही भारत ने अपनी अध्यक्षता में जी-20 को और ज्यादा समावेशी मंच बनाया है, अनेक नये देशों को इस मंच से जोड़ा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रयासों से अफ्रीकी संघ भी जी-20 से जुड़ा, जबकि पहले इस मंच पर अफ्रीका के लोगों की आवाज नहीं थी। वैश्विक आर्थिक संकट से उबरने के लिए 1999 में जब जी-20 का गठन किया गया था तो शुरूआत में सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और प्रमुख बैंक गवर्नर ही सम्मेलन में बुलाए जाते थे। दिल्ली सम्मेलन में पहली बार करीब 40 देशों के राष्ट्राध्यक्ष व कई वैश्विक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होने वाले हैं, निश्चित ही यह सम्मेलन अनूठा एवं विलक्षण होगा और भारत ने इसकी गरिमा के अनुकूल तैयारियां भी भव्य एवं अद्वितीय की है।</p>
<h3>पुतिन यूक्रेन के साथ युद्ध की वजह से आने में असमर्थ हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह सम्मेलन सदस्य देशों के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के आधार तलाशने के प्रयास तेज करने का अच्छा मौका है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन यूक्रेन के साथ युद्ध की वजह से आने में असमर्थ हैं। इसके पीछे उनकी कोई गहरी कूटनीति नहीं है। बावजूद इसके देखने वाले रूस-चीन के शीर्ष नेताओं की जी-20 को गंभीरता से न लेने एवं उनकी बेरूखी का कोई तो मतलब निकालेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा इसलिए भी होगा, क्योंकि जी-20 में शांतिप्रिय पश्चिमी देशों का वर्चस्व हैै। इसके अलावा, शांति के पक्षधर और पंचशील की बुनियाद रखने वाले युद्ध विरोधी भारत के पास इसकी अध्यक्षता है, जिसे लेकर शुरू से चीन असहज है। उसकी असहजता का कारण उसकी विस्तारवादी गतिविधियों एवं कूटनीति पर पानी फिरना है। भारत के विरोध में वह अलग-थलग है। कूटनीति के जानकार मानते हैं कि शी जिनपिंग ने अपने देश का नया नक्शा ऐसे समय में यूं ही नहीं जारी कराया था।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन के नए नक्शे में कई देशों की सीमाओं का उल्लंघन है। चीन ने केवल भारत के अरुणाचल समेत कुछ इलाकों को ही अपने नये नक्शे में नहीं दिखाया है बल्कि मलेशिया, फिलीपींस, विएतनाम को भी अपने नक्शे में दिखाया है। भारत ने इस पर अपना एतराज जाहिर किया है। सत्य तो यह है कि भारतीय संस्कृति एवं राजनीति की सुदीर्घ यात्रा में विश्व-कल्याण और मानव-कल्याण की भावना सदैव सक्रिय रही है। इस संस्कृति के अंतर्गत उपलब्ध संपूर्ण वाङ्मय में वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना अंत:सलिला सरिता के समान सदा प्रवहमान रही है। इसमें व्यक्ति की अपेक्षा समष्टि को, देश के साथ संपूर्ण विश्व को प्रधानता दी गई है। जी-20 दिल्ली सम्मेलन में विश्व-परिवार की भावना को ही बल दिया जायेगा। G20 Summit</p>
<p style="text-align:right;"><strong> ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Sep 2023 13:18:42 +0530</pubDate>
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                <title>Coaching Institute: बच्चों की मनोदशा को समझें कोचिंग संस्थान</title>
                                    <description><![CDATA[Coaching Institute: इंजीनियर और डॉक्टर बनने की चाह लिए लाखों की तादाद में बच्चे राजस्थान के कोटा में अपना अस्थाई आशियाना बनाते हैं। नीट और आईआईटी जेईई में जगह बनाने के लिए जी जान लगा देते हैं। खाने, सोने और रहने जैसे तमाम चुनौतियों के बीच पढ़ने को प्राथमिकता दिए रहते हैं। साप्ताहिक, पाक्षिक और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/coaching-institute-should-understand-the-mood-of-children/article-51887"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/kota-junction.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Coaching Institute: इंजीनियर और डॉक्टर बनने की चाह लिए लाखों की तादाद में बच्चे राजस्थान के कोटा में अपना अस्थाई आशियाना बनाते हैं। नीट और आईआईटी जेईई में जगह बनाने के लिए जी जान लगा देते हैं। खाने, सोने और रहने जैसे तमाम चुनौतियों के बीच पढ़ने को प्राथमिकता दिए रहते हैं। साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक आदि टेस्ट से भी गुजरते रहते हैं। अधिक अंक पाने की होड़ में सब कुछ मानो लुटाने के लिए तैयार रहते हैं। कम नींद और अधिक पढ़ाई के बीच सामंजस्य बनाना 11वीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए किसी संकट से कम नहीं है और यह संकट तब विकराल रूप ले लेता है जब तमाम कोशिशों के बावजूद अंकों का ग्राफ ढलान पर होता है। Rajasthan News</p>
<h3>इन दिनों कोटा फलक पर है | Coaching Institute</h3>
<p style="text-align:justify;">नतीजन एक अबोध छात्र आत्महत्या को अंतिम विकल्प समझने लगता है। गौरतलब है कि इन दिनों कोटा फलक पर है जिसमें पहला कारण इंजीनियर और डॉक्टर बनने की पहचान के रूप में तो दूसरा बढ़ते दबाव के बीच व्यापक होती आत्महत्या के चलते। आंकड़ा यह बताता है कि साल 2023 में महज 8 महीने में 24 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं जिसमें दो बच्चों ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में एक ही दिन में आत्महत्या को अंजाम दिया। Coaching Institute</p>
<p style="text-align:justify;">पड़ताल बताती है कि साल 2015 से कोटा में होने वाले आत्महत्या के आंकड़े सरकार ने जुटाना शुरू किया है जो 2023 में अभी सर्वाधिक की ओर है। आत्महत्या के बढ़ते मामलों से सरकार, समाज, कोचिंग संस्थान और अभिभावक से लेकर पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी बेशक चिंतित है मगर इसे लेकर कोई रणनीति अभी तक सामने नहीं आई कि आखिर नौनिहालों की आत्महत्या कैसे रोकी जाये। कोई पंखे से लटक रहा है तो कोई ऊँचे भवन से छलांग लगा रहा है जो हर हाल में सभ्य समाज के माथे पर बल लाने वाला विषय है। Coaching Institute</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे इसके कारणों को वर्गीकृत किया जाए तो पहली जिम्मेदारी अभिभावक की ओर होती है। भारतीय दिमागी तौर पर अनेक अपेक्षाओं से भरे हैं और उसी के अनुपात में कई दबाव को स्वयं पर प्रभावी किये रहते हैं। इस बात को बिना जाने-समझे अभिभावक बच्चों को प्रतिस्पर्धा की उस होड़ में झोंक देते हैं कि उसमें डॉक्टर या इंजीनियर बनने की क्षमता है भी या नहीं। बच्चे दोस्ती करने की उम्र में एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं और अंकों के दबाव में अध्ययन को अपनी मनोदशा पर इतना प्रभावी कर लेते हैं कि गलत कदम के लिए भी तैयार हो जाते हैं। प्रत्येक बच्चे के दबाव सहने और पढ़ने-लिखने की क्षमता है उसे दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ बनाने की फिराक में मनोवैज्ञानिक दबाव से बाज आएं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारी-भरकम फीस चुका देना और घर से जरूरी खर्चे भेज देना और अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर देना यह अभिभावक के लक्षण के लिए सही नहीं है। कोचिंग में क्या हो रहा है, बच्चे जहां रहते हैं वहां के पर्यावरण और उनके विचार में क्या ताल-मेल है कहीं वह अतिरिक्त दबाव से तो नहीं जूझ रहा है। ऐसा तो नहीं कि उसके मन मस्तिष्क में तुलनात्मक कुछ ऐसा चल रहा है जिससे आप अज्ञान बने हुए हैं आदि तमाम बातें इसलिए जानना जरूरी है ताकि अभिभावक अपने बच्चों को बचा पायें। Coaching Institute</p>
<p style="text-align:justify;">जिन बच्चों ने ऐसी तमाम समस्याओं के चलते अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय लिया उनके माता-पिता आज इस बात का अफसोस कर रहे होंगे कि काश समय रहते हम अपने बच्चे के मन को पढ़ पाते। स्वयं बच्चों का मन न पढ़ पाने वाले अभिभावक उसे पढ़ने के लिए कोटा भेज देते हैं। सवाल है कि क्या कम उम्र के बच्चे घर से दूर रहकर बहुत खुश रहेंगे इसकी उम्मीद थोड़ी कम ही है। इंजीनियर और डॉक्टर बनाने की चाह में कई अभिभावकों ने इस मामले में नासमझी तो की होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के कोटा में सैकड़ों की तादाद में कोचिंग सेंटर हैं जिसमें आधा दर्जन कोचिंग सेंटर पूरे देश में अपनी पहचान रखती है। इन सेंटरों में अध्ययन करने वाले ये अबोध बच्चे इस मनोदशा से गुजरते हैं इनकी पहचान कोचिंग संस्थानों को भी होनी चाहिए। लाखों रुपये बच्चों से जुटाने वाले संस्थान केवल पढ़ाने और टेस्ट में नम्बर लाने तथा अंतिम नतीजे में उसे एक प्रोडक्ट के रूप में इस्तेमाल करने तक ही सीमित न हों बल्कि उसके दिमाग पर बढ़ता दबाव भी अपनी खुली आंखों से देखें और समझें। परेशानी की स्थिति में अभिभावक से सम्पर्क साधे और बच्चे के स्वास्थ्य और उसके रखरखाव को लेकर अपनी जिम्मेदारी निभाने से कोचिंग स्वयं को न रोके।</p>
<p style="text-align:justify;">शायद यही कारण है कि राजस्थान सरकार ने कोचिंग संस्थानों में दो माह तक किसी भी प्रकार के टेस्ट की पाबंदी लगा दी है। इसे लेकर प्रशासन का मत है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर टेस्ट का बुरा प्रभाव पड़ता है। गौरतलब है कि न केवल टेस्ट का बच्चों पर दबाव होता है बल्कि जब अंकों को सार्वजनिक किया जाता है तो यह एक अलग तरीके की मनोदशा का विकास करता है। कोटा में कोचिंग कारोबार जिस अवस्था में है उसके इर्द-गिर्द हर प्रकार के बाजार का होना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां हजारों की तादाद में मान्यता प्राप्त हॉस्टल हैं साथ ही निजी कमरे भी किराये पर बच्चे लेते हैं। जहां कम-ज्यादा किराये का दबाव स्वाभाविक है। आर्थिक दबाव भी बच्चों के मन:स्थिति पर कमोबेश असर तो डाल ही रहा होगा। ऐसे में मकान मालिक या हॉस्टल संचालक की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वो बच्चों की आर्थिक वेदना को भी समझे। पढ़ाई, टेस्ट और अंकों की होड़ आदि के दबाव के साथ आर्थिक दबाव भी उसके मन मस्तिष्क को गलत अनुभव जरूर करा रहा होगा। Rajasthan News</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि राजस्थान में जयपुर और सीकर जिला भी अच्छा खासा कोचिंग का विस्तार ले चुका है। स्वयं के व्याख्यान के दौरान मैंने महसूस किया कि सीकर का प्रिंस कॉलेज जो स्नातक और परास्नातक के साथ-साथ सिविल सेवा परीक्षा ही नहीं बल्कि डॉक्टर, और इंजीनियर सहित रक्षा सेवा में भी कोचिंग प्रदान करता है और स्वयं में एक अनूठा संस्थान है। 40 हजार के अधिक विद्यार्थी वाला यह परिसर मोबाइल मुक्त है तथा छात्रों की सुरक्षा के मामले में कहीं अधिक उत्कृष्ट है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे शैक्षणिक दबाव तनाव का कारण तो है, असफलता और निराशा की भावनाएं कभी भी प्रभावी हो सकती है। अवसाद, चिंता और विकार जैसी मानसिक समस्याएं भी आत्महत्या में भूमिका निभा रही हैं। तनाव, अकेलेपन और उपेक्षा की स्थितियां भी बच्चों को मुसीबत दे रही हैं। यह समझना कहीं अधिक आवश्यक है कि पढ़ाई प्रोडक्ट नहीं है और बच्चे किसी फैक्ट्री में नहीं है। इंजीनियर, डॉक्टर की तैयारी का मतलब यह कहीं से नहीं है कि बच्चों पर उनकी उम्र से अधिक बोझ डाला जाये, उन्हें नौनिहाल जीवन से काट दिया जाये और केवल प्रतिस्पर्धा से जोड़ दिया जाये। जानकारी तो यह भी मिलती है कि सालों से तैयारी करने और कोचिंग संस्थाओं में लाखों की फीस भरने के बावजूद जब बच्चों का चयन नहीं होता है तो वह सुसाइड जैसा कदम उठा लेता है। Rajasthan News</p>
<p style="text-align:justify;">अभिभावक को यह समझ लेना चाहिए कि बच्चा स्वस्थ रहेगा और जीवित रहेगा तभी कुछ बनने की ललक भी सम्भव होगी और कोचिंग संस्थान भी यह समझ लें कि केवल फीस लेकर अपनी तिजोरी भरने और बच्चों के दिमाग में दबाव भरने तक ही सीमित न रहें। जबकि समाज के लोगों को इस बात का चिंतन-मनन करना चाहिए कि आईएएस, पीसीएस या डॉक्टर, इंजीनियर न बनने की स्थिति के बावजूद एक अच्छे इंसान बनने की दरकार बनी रहती है ऐसे में असफल या कम अंक प्राप्त बच्चे या प्रतियोगी उपेक्षा नहीं बल्कि सम्मान की दृष्टि से देखें। फिलहाल माता-पिता के लिए उसकी संतान सर्वोपरि है, सबसे अधिक चिंता वह स्वयं करें और कोचिंग संस्थान भी बच्चों की मनोदशा से अनभिज्ञ न रहें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्रशासनिक चिंतक </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Fig Water Benefits: दो भीगे अंजीर, बदल दे बिगड़े स्वास्थ्य की तकदीर एक्सपर्ट की राय, फायदे जाए नहीं गिनाए" href="http://10.0.0.122:1245/two-soaked-figs-can-change-the-fate-of-poor-health-experts-opinion-the-benefits-are-not-counted/">Fig Water Benefits: दो भीगे अंजीर, बदल दे बिगड़े स्वास्थ्य की तकदीर एक्सपर्ट की राय, फायदे जाए नहीं ग…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 03 Sep 2023 13:18:26 +0530</pubDate>
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                <title>Brics Summit 2023: ब्रिक्स में संभावनाओं की नई विवेचना</title>
                                    <description><![CDATA[Brics Summit 2023: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 22 से 24 अगस्त के बीच 15वें ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन किया गया। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये 5 ऐसे देशों का समूह है जो लगभग दुनिया की आधी आबादी से युक्त है और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं एशिया महाद्वीप समेत यूरेशिया को समेटे हुए है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/new-interpretation-of-possibilities-in-brics/article-51607"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/briks.gif" alt=""></a><br /><div class="vJOb1e aIfcHf">
<div class="iRPxbe">
<div class="n0jPhd ynAwRc tNxQIb nDgy9d">
<p style="text-align:justify;">Brics Summit 2023: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 22 से 24 अगस्त के बीच 15वें ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन किया गया। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये 5 ऐसे देशों का समूह है जो लगभग दुनिया की आधी आबादी से युक्त है और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं एशिया महाद्वीप समेत यूरेशिया को समेटे हुए है। सभी देशों के शीर्ष नेतृत्व की भागीदारी सम्मेलन में हमेशा रही है मगर इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चीन के राष्ट्रपति ने जहां इसमें शिरकत की वहीं रूस की ओर से विदेश मंत्री ने भागीदारी की। Brics Summit 2023</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि भारत के प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति रही। हालांकि वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स के प्रभाव पर अपने विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि दुनिया भर में ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ रहा है। ब्रिक्स का तात्पर्य ब्राजील, रूस, चाइना, इण्डिया और दक्षिण अफ्रीका होता है। फिलहाल यूक्रेन युद्ध के बीच सम्पन्न ब्रिक्स सम्मेलन कई उलझे सवालों को शायद ही सुलझा पाया हो। मगर तमाम वैश्विक समूहों की तुलना में यह संगठन कई उतार-चढ़ाव के बावजूद अपनी प्रासंगिकता को बरकरार बनाये हुए है। तकनीकी पक्ष यह भी है कि चीन ब्रिक्स का सदस्य होने के नाते मंच भरपूर साझा करता है मगर डोकलाम विवाद, उत्तरी लद्दाख में घुसपैठ और भारत की सीमा पर समस्या खड़ा करने के साथ पाकिस्तानी आतंकियों का बड़ा समर्थक है, जो हर लिहाज से भारत के विरूद्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस व पूर्व में सोवियत संघ भारत का नैसर्गिक मित्र है जो हर परिस्थितियों में चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की बात हो सदैव भारत का पक्षधर रहा है। ब्राजील के साथ भारत की जहां संतुलित दोस्ती है, वहीं दक्षिण अफ्रीका के साथ तो औपनिवेशिक सत्ता से अब तक नजदीकी का एहसास बना हुआ है। महात्मा गांधी का टॉलस्टॉय का जिक्र व भारत की विविधता की ताकत समेत कई ऐसे प्रभावशाली संदर्भ ब्रिक्स सम्मेलन में बेहतर चर्चा से भरे थे। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स की प्रासंगिकता और इसकी प्रगतिशीलता को काफी बेहतर करार देते हुए इसके विस्तार पर भी जोर दिया। एक रिपोर्ट से भी पता चलता है 40 से अधिक देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की रूचि व्यक्त की है। यदि ऐसा होता है तो इस समूह की वैश्विक स्थिति और सघन व प्रगाढ़ हो जायेगी। फलस्वरूप जी-7 जैसे देशों को कड़ी टक्कर भी मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि 2016 में भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स को एक समूह के रूप में परिभाषित किया गया था जो उत्तरदायी, समावेशी और सामूहिक समाधान से युक्त है। अब इसे 7 साल और बीत गये है जाहिर है अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना, नवाचार को प्रेरित करना और बड़े अवसरों को बढ़ावा देना ब्रिक्स देशों की जिम्मेदारी होनी चाहिए। परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण यह भी है कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने चन्द्रयान-3 को सफलतापूर्वक चांद के दक्षिणी हिस्से पर उतारकर दुनिया में यह संदेश दे दिया कि वह ब्रिक्स में ही नहीं बल्कि संसार में उसकी ताकत तकनीकी तौर पर बेहतर हुई है और यह सब ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ही हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने 5 सूत्री प्रस्ताव रखते हुए भारत की ताकत को न केवल और बड़ा किया है बल्कि ब्रिक्स के तमाम सदस्यों के लिए भी एक सारगर्भित मापदण्ड को प्रारूपित किया है। मसलन अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग, स्किल मैपिंग, पारम्परिक चिकित्सा समेत विभिन्न पहलुओं को भी विमर्षीय बनाया। देखा जाये तो लगभग दो दशकों में ब्रिक्स ने एक लम्बी और शानदार यात्रा तय की है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जब ब्रिक्स का पहली बार प्रयोग वर्ष 2001 में गोल्डमैन साक्स ने अपने वैश्विक आर्थिक पत्र द वर्ल्ड नीड्स बेटर इकोनोमिक ब्रिक्स में किया था जिसमें इकोनोमीट्रिक के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि आने वाले समय में ब्राजील, रूस, भारत एवं चीन की अर्थव्यवस्थाओं का व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूपों में विश्व के तमाम आर्थिक क्षेत्रों पर नियंत्रण होगा तब यह अनुमान नहीं रहा होगा कि आतंकवाद से पीड़ित भारत से मंचीय हिस्सेदारी रखने वाला चीन पाकिस्तान के आतंकियों का बड़ा समर्थक सिद्ध होगा। हालांकि चीन और भारत के बीच रस्साकशी वर्षों पुरानी है जबकि ब्रिक्स का एक अन्य सदस्य रूस भारत का दुर्लभ मित्र है। साफ है कि पांच देशों के इस संगठन में भी नरम-गरम का परिप्रेक्ष्य हमेशा से निहित रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2016 में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में सदस्य देशों ने जिस तर्ज पर बैठकों में आतंक के खिलाफ एक होने का निर्णय लिया उससे भी यह साफ था कि मंच चाहे जिस उद्देश्य के लिए बनाये गये हों पर प्राथमिकताओं की नई विवेचना समय के साथ होती रहेगी और यह आज भी मानो इसमें समाहित है। सितम्बर 2016 की उरी घटना के बाद भारत ने जिस विचारधारा के तहत पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकियों को सर्जिकल स्ट्राइक के तहत निशाना बनाया वह भी देश के लिए किसी नई अवधारणा से कम नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही पड़ोसी बांग्लादेश समेत विश्व के तमाम देशों ने भारत के इस कदम का समर्थन करके यह भी जता दिया कि आतंक से पीड़ित देश को जो बन पड़े उसे करना चाहिए। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ब्रिक्स के माध्यम से 2016 में गोवा में सभी सदस्यों समेत भारत और चीन का एक मंच पर होना और प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि आतंक के समर्थकों को दण्डित किया जाना चाहिए, में भी बड़ा संदेश छुपा हुआ था जाहिर है यह संदेश चीन के कानों तक भी पहुंचे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो ब्रिक्स पांच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है जहां विश्व भर की 43 फीसदी आबादी रहती है और पूरे विश्व के जीडीपी का 30 फीसदी स्थान यही घेरता है। इतना ही नहीं वैश्विक पटल पर व्यापार के मामले में भी यह 20 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी रखता है। अब तक जोहान्सबर्ग सहित 15 ब्रिक्स सम्मेलन हो चुके हैं। इसका पहला सम्मेलन जून 2009 में रूस में आयोजित हुआ था। विवेचना और संदर्भ यह भी है कि क्या कोविड-19 के आर्थिक संकट से अभी भी देश बाहर नहीं निकल पाये हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती और चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। ब्रिक्स देशों के लिए नवीनता इस सुस्ती से निपटने का सबसे कारगर तरीका होगा जिसके लिए सदस्यों के बीच पारदर्शिता, सारगर्भिता और सच्ची आत्मीयता की तिकड़ी भी होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया जानती है कि भारत को नीचा दिखाने के लिए चीन पाकिस्तान की हर गलतियों पर साथ देता है। फिर वह चाहे आतंक को ही बढ़ावा देने वाली क्यों न हो परन्तु चीन के लिए यह भी समझना ठीक रहेगा कि वह दुनिया के निशाने पर है और भारत दुनिया की निगाहों में बसता है। नीति एवं कूटनीति के तर्ज पर देखें तो भारत ब्रिक्स सम्मेलन में मन-माफिक सफलता हासिल कर ली है। जोहान्सबर्ग का ब्रिक्स सम्मेलन भारत के चन्द्रयान-3 की सफलता के साथ जोड़कर जरूर देखा जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सबके बावजूद सुविचारित और विवेचित दृष्टिकोण यह भी है कि दुनिया में भारत की बढ़ी साख का प्रभाव ब्रिक्स सम्मेलन में भी देखने को मिला। शायद यही कारण है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय नियमों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के आधार पर सभी देशों को संयुक्त रूप से लिखना चाहिए न कि किसी मजबूत देश के कहने पर। साथ ही यह भी चिंता कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए और विभाजनकारी नीतियों से दूर रहना चाहिए। फिलहाल यह सम्मेलन आगे आने वाले सम्मेलन तक विमर्श और विवेचना की अगुवाई करता रहेगा। Brics Summit 2023</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक</strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sat, 26 Aug 2023 16:06:10 +0530</pubDate>
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                <title>West Africa&amp;#8217;s: पश्चिम अफ्रीका के बिगड़ते हालात</title>
                                    <description><![CDATA[West Africa’s: नाइजर में तख्तापलट के बाद स्थिति गंभीर हो गई है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों के संगठन इकोनॉमिक कम्यूनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट ( ईसीओडब्लयूएएस) अर्थात इकोवास ने नाइजर के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का एलान किया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने वहां रहने वाले भारतीय नागरिकों को नाइजर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/west-africas-worsening-situation/article-51326"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/afrika-contory.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">West Africa’s: नाइजर में तख्तापलट के बाद स्थिति गंभीर हो गई है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों के संगठन इकोनॉमिक कम्यूनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट ( ईसीओडब्लयूएएस) अर्थात इकोवास ने नाइजर के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का एलान किया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने वहां रहने वाले भारतीय नागरिकों को नाइजर छोड़ने की सलाह दी है। हालांकि, तख्तापलट को अंजाम देने वाले सेना के कमांडर जनरल अब्दुर्रहमान ने देश में जल्द चुनाव करवाकर सत्ता हस्तांतरण की बात कही है। लेकिन साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को धमकाते हुए मामले से दूर रहने की हिदायत दी है। West Africa’s</p>
<p style="text-align:justify;">नाइजर में हुए तख्तापलट की घटना को विस्तृत परिपेक्ष में देखें तो तीन बड़े सवाल निकल कर सामने आते हैं। प्रथम, नाइजर में तख्तापलट की घटना क्यों हुई? द्वितीय, जिस तरह से इकोवास ने नाइजर में सैन्य हस्तक्षेप का एलान किया है, उसका आधार क्या है? और तृतीय, नाइजर में लोकतंत्र की बहाली के लिए पश्चिमी देश किस रणनीति पर आगे बढ़ेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि बुर्किना फासो और माली की तरह नाइजर में भी पश्चिमी देशों की रणनीति केवल बयानों तक ही सिमट कर रह जाए। West Africa’s</p>
<p style="text-align:justify;">नाइजर में तख्तापलट का इतिहास कोई नया नहीं है। साल 1960 में नाइजर को फ्रांस के औपनिवेशिक शासन से आजादी मिली थी। तब से अब तक यहां चार बार तख्तापलट हो चुका है। साल 2021 में मोहम्मद बजौम पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से हुए सत्ता हस्तांरण में नाइजर के राष्ट्रपति बने थे। नाइजर को विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अमेरिका और फ्रांस जैसी पश्चिमी ताकतों के साथ मजबूत संबंध बनाए। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। शासन में सेना के दखल को सीमित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतांत्रिक सुधारों की इस प्रकिया से सेना नाखुश थी। देश के भीतर एक के बाद एक हो रही जिहादी घटनाएं बजौम के सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर रही थीं। बीते तीन सालों में नाइजर में अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने कई हमले किए हैं। हमलों में नाइजर के कई सैनिक हताहत हुए हैं। महंगाई पर नियंत्रण नहीं लगा पाने के कारण देश की आवाम बजौम सरकार के खिलाफ लामबंद हो रही थी। सेना भला ऐसे माकूल अवसर को कब हाथ से जाने देती। ऐसे में प्रेसिडशियल गार्ड ने सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति और खराब सामाजिक और आर्थिक प्रबंधन का हवाला देकर राष्ट्रपति बजौम को अपदस्थ कर सत्ता पर कब्जा कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक इकोवास के सैन्य हस्तक्षेप का सवाल है। तो इकोवास का दावा भी हवा-हवाई साबित होता दिख रहा है। दरअसल, नाइजर क्षेत्र के सात देशों- नाइजीरिया, अल्जीरिया, लीबिया, बुर्किना फासो, माली, बेनिन और चाड के साथ सीमाएं साझा करता है। नाइजीरिया, बेनिन, माली और बुर्किना फासो इकोवास के सदस्य हैं। इन चार देशों में से माली और बुर्किना फासो में सैन्य जुंटा का शासन है। अगस्त 2020 में माली में और अक्टूबर 2022 में बुर्किना फासो में तख्तापलट के बाद दोनों देशों में सैन्य जुंटा की सरकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों देशों ने धमकी दी है कि नाइजर पर किया गया कोई भी बल प्रयोग उन पर किया गया बल प्रयोग होगा। संभवत: इसी वैचारिक मोह के चलते माली और बुर्किना फासो का जुटां प्रशासन नाइजर के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। शेष दो देश नाइजीरिया और बेनिन हैं। नाइजीरिया समूह का सबसे बड़ा देश और इकोवास का प्रमुख वित्तपोषक है। लेकिन नाइजीरियाई सीनेटरों ने बल के अलावा अन्य साधनों के उपयोग की बात कहकर राष्ट्रपति बोला टीनूबू को संशय में डाल दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में सत्ता में आए टीनूबू के लिए सीनेटरों की राय को नजरअंदाज करना उनके राजनीतिक भविष्य को मुश्किल में डाल सकता है। बेनिन ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। दूसरी ओर इकोवास के बाहर चाड और अल्जीरिया ने भी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने से इनकार कर दिया है । लीबिया की अपनी मजबूरियां है। कुल मिलाकर तो सैन्य कार्रवाई के नाम पर इकोवास पूरी तरह विभाजित नजर आ रहा है। तो क्या इकोवास पश्चिमी देशों के भरोसे नाइजर को धमकी दे रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">रही बात पश्चिमी देशों की रणनीति की तो सबके अपने-अपने हित हैं। अमेरिका नाइजर का एक अहम सहयोगी है। नाइजर के विकास में अमेरिका का बड़ा योगदान रहा है। दोनों देशों के बीच शांति, सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने की प्रतिबद्वता पर आधारित एक मजबूत साझेदारी है। कट्टरपंथी समूहों से मुकाबला करने और रक्षा क्षमताओं में सुधार के लिए अमेरिका नाइजर की सेना और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर काम कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका लगातार नाइजर की आर्थिक मदद भी करता आ रहा है। बीते दो सालों मे अमेरिका ने करीब 400 मिलियन डॉलर बतौर मानवीय मदद नाइजर को दिए हैं। दूसरी ओर अमेरिका की मिडिल ईस्ट और अफ्रीकी देशों पर नियंत्रण की नीति में नाइजर अहम सहयोगी रहा है। हालांकि, नाइजर के पड़ोसी देश माली और बुर्किना फासो सैन्य तख्तापलट के बाद पश्चिमी देशों के खेमे से निकल कर रूस के करीब आ गए हैं। लेकिन नाइजर के आज भी पश्चिमी देशों के साथ मधुर संबंध हैं ।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक तख्तापलट में रूस का हाथ होने की संभावना भी जताई जा रही है। रूस पर शक की एक बड़ी वजह राजधानी नियामी में निकाला गया मार्च है। दरअसल, नाइजर में तख्तापलट के बाद 30 जुलाई को राजधानी नियामी में एक मार्च निकाला गया। मार्च में बड़ी संख्या में लोग रूसी झंडा लहराते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नाम से नारे लगा रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">कहा तो यह भी जा रहा है कि रूस के मिलिट्री गु्रप येवेगनी प्रिगोझिन ने नाइजर को सुरक्षा का भरोसा दिया है। बदले में नाइजर ने यूरेनियम की खदानों पर वैगनर की हिस्सेदारी का आश्वासन दिया है। यह खबर पश्चिमी देशों के लिए ठीक नहीं है, क्योंकि यूरेनियम की खदानों पर वैगनर का कब्जा होने से इसके दुरूपयोग की संभावना बढ़ गई है। यही वजह है कि तख्तापलट से अमेरिका और उसके सहयोगी देश नाखुश है। Artical Hindi</p>
<p style="text-align:justify;">इकोवास के प्रतिबंधों के कारण देश में आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। यूएस से मिलने वाला सहयोग बंद हो चुका है। प्रतिबंधों के कारण नाइजर की ढाई करोड़ से ज्यादा आबादी तो अंधेरे में डूबी हुई ही है, साथ ही नाइजर के नवजात लोकतंत्र की अभिवृद्धि की कोशिशों को एक बड़ा झटका है। कुल मिलाकर कहें तो हाल-फिलहाल नाइजर के भीतर जो हालात बन रहे हैं, उन्हें देखते हुए लगता है, देश में लोकतंत्र बहाली का काम आसन नहीं रहने वाला है। West Africa’s</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>विदेश</category>
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                <pubDate>Fri, 18 Aug 2023 12:23:12 +0530</pubDate>
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                <title>Monsoon Session: आरोप-प्रत्यारोप से तर-बतर रहा मानसून सत्र</title>
                                    <description><![CDATA[20 जुलाई से 11 अगस्त तक चलने वाला यह मानसून सत्र मणिपुर और अविश्वास प्रस्ताव के लिए ही जाना जाएगा इसमें सकारात्मक दृष्टि से कोई बड़ी पहल शायद ही संभव हुई हो। लोकतंत्र में यह रहा है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत से जनहित को सुनिश्चित करने वाले कानून और कार्यक्रम की उपादेयता सुनिश्चित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/monsoon-session-drenched-in-allegations-and-counter-allegations/article-51156"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/monsoon-session.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">20 जुलाई से 11 अगस्त तक चलने वाला यह मानसून सत्र मणिपुर और अविश्वास प्रस्ताव के लिए ही जाना जाएगा इसमें सकारात्मक दृष्टि से कोई बड़ी पहल शायद ही संभव हुई हो। लोकतंत्र में यह रहा है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत से जनहित को सुनिश्चित करने वाले कानून और कार्यक्रम की उपादेयता सुनिश्चित होती है पर संसद अगर शोर-शराबे की ही शिकार होती रहेगी तो ऐसा सोचना बेमानी होगा। पूरे मानसून सत्र में हुए शोर-शराबे से तो यही लगता है कि गैर मर्यादित भाषा और तनी हुई भंवों के बीच पक्ष और विपक्ष दोनों पानी-पानी तो हुए मगर देश की प्यास बुझाना मुश्किल बना रहा। Monsoon Session</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि मणिपुर हिंसा का मुद्दा लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव तक पहुंचने के बाद सरकार और विरोधी पक्ष के बीच संसद के बाहर और भीतर घमासान जारी रहा। विदित हो कि बीते मई की शुरूआत से ही मणिपुर वर्ग संघर्ष में कहीं अधिक हिंसा से लिप्त रहा जिसे लेकर विपक्ष मुखर था। यह रार तब और पेचीदा हुआ जब विपक्षी गठबंधन ने अविश्वास प्रस्ताव को बहस से पहले संसद में बिना चर्चा किए विधेयक सत्र के शुरू में ही पारित करा लिया। जाहिर है विपक्ष ने ऐतराज करते हुए सरकार पर संसदीय नियमों और परम्पराओं को तोड़ने का आरोप लगाया। 303 सीट वाली अकेले बीजेपी और गठबंधन सहित 350 का आंकड़ा रखने वाली बीजेपी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा क्यों हुई यह नए सिरे से चिंतन का विषय है। Monsoon Session</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष का एक औजार है और कई मौकों पर इसका उपयोग होता रहा है। वजह जो भी हो फिलहाल विरोधियों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था। देखा जाए तो मणिपुर से मानसून सत्र सराबोर था। विपक्षी नेता राहुल गांधी की लगभग साढ़े चार महीने बाद एक बार सदन में एंट्री हुई। गौरतलब है देश की शीर्ष अदालत ने उनकी सजा पर रोक लगाते हुए राहुल गांधी को सदन तक पहुंचाया। सत्ता को अपनी छवि बचाने का पूरा ध्यान था। मानसून सत्र तमाम आरोप-प्रत्यारोप की बाढ़ लिए हुए था। इसमें जनता को क्या फायदा है यह विचारणीय जरूर है कि सत्र आते हैं और बिना खास प्रदर्शन के अगले की बाट जोहने को मजबूर कर देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अविश्वास का प्रस्ताव एक संसदीय प्रस्ताव है जिसे पारम्परिक रूप से विपक्ष द्वारा संसद में एक सरकार को हराने या कमजोर करने की उम्मीद से रखा जाता है। आमतौर पर जब संसद अविश्वास प्रस्ताव में वोट करती है या सरकार विश्वास मत में विफल रहती है तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है या संसद को भंग करने और आम चुनाव की बात शामिल रहती है। फिलहाल इसके आसार दूर-दूर तक नहीं थे क्योंकि 543 सदस्यों वाली लोकसभा में अकेले भाजपा 300 के पार हैं और गठबंधन के साथ यह आंकड़ा कहीं अधिक बढ़त लिए हुए है ऐसे में अविश्वास को लेकर बहस बड़ी हो सकती थी पर सरकार को हिलाया नहीं जा सकता था और हुआ भी यही।</p>
<p style="text-align:justify;">अविश्वास तथा निंदा जैसे प्रस्ताव विपक्षियों के औजार हैं पर इसे कब प्रयोग करना है इसे भी समझना बेहद जरूरी है। इसके पहले साल 2018 के बजट सत्र में भी मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की मांग तेज हुई थी। देखा जाए तो यह दूसरा मौका है जब विरोधी अविश्वास प्रस्ताव को लेकर सजग दिखाई दिए मगर दोनों स्थितियों से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था। पड़ताल बताती है लोकतंत्र के संसदीय इतिहास में सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू सरकार के खिलाफ यह प्रस्ताव अगस्त 1963 में जेबी कृपलानी ने रखा था लेकिन इसके पक्ष में केवल 52 वोट पड़े थे जबकि प्रस्ताव के विरोध में 347 वोट थे।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि मोदी सरकार के विरूद्ध पिछले नौ सालों में दूसरी बार अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की बात हो रही है जबकि इन्दिरा गांधी सरकार के खिलाफ सर्वाधिक 15 बार तथा लाल बहादुर शास्त्री और नरसिम्हाराव राव सरकार को तीन-तीन बार ऐसे प्रस्तावों का सामना करना पड़ा है। नेहरू शासनकाल से अब तक 25 बार अवश्विास प्रस्ताव सदन में लाए जा चुके हैं जिसमें 24 बार ये असफल रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">1978 में ऐसे ही एक प्रस्ताव से सरकार गिरी थी। वैसे मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ दो अविश्वास प्रस्ताव रखे गए थे पहले में तो उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई परन्तु दूसरे प्रस्ताव के समय उनकी सरकार के घटक दलों में आपसी मतभेद थे। हालांकि उन्हें अपनी हार का अंदाजा था और मत विभाजन से पहले इस्तीफा दे दिया था। देखा जाय तो विपक्ष में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी भी एक बार इन्दिरा गांधी के खिलाफ और दूसरी बार नरसिंह राव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रख चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस तभी स्वीकार किया जाता है जब उसके समर्थन में 50 सदस्य हों। मुख्य विपक्षी कांग्रेस के पास कुल 52 का आंकड़ा तो है। हालांकि जिस प्रकार विरोधी इन दिनों इण्डिया के बैनर तले एकजुटता दिखाई गई उससे मनोबल तो बढ़ सकता है मगर बहुमत से भरी सरकार को रौंदा नहीं जा सकता था। मुद्दा यह है कि अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले के पास जब चंद आंकड़े जुटाना भी मुश्किल था तो बड़ी कूबत वाली सरकार की कुर्सी कैसे हिला पाते। खीज के चलते कांग्रेस समेत वामपंथ या अन्य सरकार के विरोधी हो सकते हैं पर इनकी स्थिति भी बहुत दयनीय है। वैसे भाजपा तथा उनके सहयोगियों में सब कुछ अच्छा ही चल रहा है पूरी तरह कहना कठिन है पर सरकार बचाने में उनका मत सरकार के साथ न हो यह भी नहीं हो सकता था।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल अविश्वास प्रस्ताव एक विरोधी संकल्पना है जिसका उपयोग किया जाना कोई हैरत वाली बात नहीं। संदर्भित बात यह है कि सदन का कीमती वक्त रोज हंगामे की भेंट चढ़ता रहा भारी-भरकम पूर्ण बहुमत वाली सरकार का बीते नौ सालों में कोई भी ऐसा सत्र नहीं रहा जिसमें विरोधियों ने सरकार को न घेरा हो। सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक भी यहां काम नहीं आ रही है। एक-दूसरे की लानत-मलानत और छींटाकशी में वक्त बीतता गया। जबकि 2024 मुहाने पर है जहां 18वीं लोकसभा का एक बार फिर गठन होना है। देश के राजनेता जो राजनीति करें वही जनता को देखना होता है चाहे अच्छा करें या अच्छा न करे।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल विपक्ष सत्ता की परछाई होती है। विरोधियों की आपत्ति भी जनहित में काम आती है और सरकार की नीतियां भी हित सुनिश्चित ही करती हैं। ऐसे में भाषा की मर्यादा, जन भावनाओं का सम्मान के साथ ही संसद के भीतर शोर करने की बजाय शान्ति और खुशहाली से जुड़े नियोजन पर काम किया जाए तो सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अच्छा रहेगा। आगे यह ध्यान देना कहीं अधिक जरूरी है कि सत्ता और विपक्ष दोनों संयम का भी पालन करें और सरकार के मंत्री विरोधियों के मामले में दुश्मन की तरह पेश न आएं। यह लोकतंत्र है यहां जनता की ताकत से नेताओं को कूबत मिलती है। सदन कोई जंग का मैदान नहीं है। Monsoon Session</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्रशासनिक चिंतक (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="India Wins Asian Champions Trophy Hockey: भारतीय टीम ने रचा इतिहास, मलेशिया को हरा चौथी बार जीती एशियन हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी" href="http://10.0.0.122:1245/india-wins-asian-champions-trophy-hockey/">India Wins Asian Champions Trophy Hockey: भारतीय टीम ने रचा इतिहास, मलेशिया को हरा चौथी बार जीती एशि…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Aug 2023 15:21:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Imran Khan: सेना व कोर्ट की जुगलबंदी का शिकार हुए इमरान खान</title>
                                    <description><![CDATA[Imran Khan: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को हुई सजा और गिरफ्तारी के दुष्परिणाम समझने के लिए सेना की भूमिका समझनी होगी। सेना और कोर्ट की जुगलबंदी को समझना होगा। पाकिस्तान के लोकतंत्र के भविष्य को देखना होगा। क्या इस घटना से पाकिस्तान में लोकतंत्र कमजोर होगा? पाकिस्तान में अराजकता बढ़ेगी? पाकिस्तान की आर्थिक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/imran-khan-became-victim-of-jugalbandi-of-army-and-court/article-50943"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/artical-imran-khan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Imran Khan: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को हुई सजा और गिरफ्तारी के दुष्परिणाम समझने के लिए सेना की भूमिका समझनी होगी। सेना और कोर्ट की जुगलबंदी को समझना होगा। पाकिस्तान के लोकतंत्र के भविष्य को देखना होगा। क्या इस घटना से पाकिस्तान में लोकतंत्र कमजोर होगा? पाकिस्तान में अराजकता बढ़ेगी? पाकिस्तान की आर्थिक समस्याएं और भी गहराएंगी? पाकिस्तान एक असफल देश के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होगा? क्या सेना और वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व कीमती वस्तुओं को गबन करने और बेचने का हथकंडा बना कर इमरान खान की राजनीतिक छवि को जमींदोज करना चाहते हैं? Imran Khan</p>
<p style="text-align:justify;">पहले तख्तापलट से सेना राजनीतिक नेतृत्व को कुचलती थी और फांसी पर चढ़ाती थी। लेकिन अब कोर्ट को माध्यम बना कर राजनीतिक नेतृत्व का सेना दमन करती है। न्यायिक फैसलों से लोकतंत्र को कुचलने के लिए सेना की नीति बहुत खतरनाक है। पाकिस्तान में असली सत्ता सेना के पास होती है, चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार भी सेना की गुलाम होती है, न्यायपालिका भी गुलाम होती है, सेना ही तय करती है, आंतरिक नीति, विदेश नीति और सुरक्षा नीति। चुनी हुई सरकार तो सिर्फ मोहरा होती है, हाथी के दांत के समान होती है। Pakisthan</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए दुनिया कभी पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व पर विश्वास ही नहीं करती है, उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार ही नहीं करती है और यह मानती है कि जब तक सेना की इच्छा या सहमति नहीं हो तब तक पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व से किसी भी प्रकार की बातचीत या फिर सहमति और असहमति की कूटनीति बेकार है, समय की बर्बादी है। यह भी सही है कि राजनीतिक नेतृत्व सेना की इच्छा और सहमति के बिना न तो आंतरिक सुरक्षा नीति तय कर पाता है और न ही बाह्य सुरक्षा नीति तय कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका जैसा बलवान देश भी पाकिस्तान से अपनी सुविधाओं और हितों की रक्षा को लेकर सेना को ही विश्वास में लेता था। Artical</p>
<h3>सेना की इच्छा की अवहेलना करने का दुष्परिणाम बहुत ही लोमहर्षक | Imran Khan</h3>
<p style="text-align:justify;">सेना की इच्छा की अवहेलना करने वाले लोकतांत्रिक शासकों की स्थिति और दुष्परिणाम बहुत ही लोमहर्षक होते हैं, खतरनाक होते हैं और बेमौत मरने जैसे होते है। जुल्फीकार अली भुट्टों ने सेना की अवहेलना की थी। अपने आप को सेना का भी बॉस समझने की कोशिश की थी। क्या दुष्परिणाम हुआ? दुष्परिणम बहुत ही भयानक हुआ, जहरीला हुआ और हिंसक हुआ। जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्तापलट हो गया। जियाउल हक सीधे तौर पर तानाशाह बन गया। उसने चुने हुए प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो को पकड़ कर जेल में डाल दिया। फर्जी ढंग से मुकदमे चलाए गए, फर्जी ढंग से तथ्य गढेÞ गए। फिर न्यायपालिका गुलाम बन गई। जुल्फीकार अली भुट्टो को फांसी हो गई। भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक भविष्यवान नेता असमय मौत के मुंह में ढकेल दिया गया। नवाज शरीफ ने भी अपने आप को सेना का बॉस समझ लिया था। सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ को हटाने की कोशिश की थी। परवेज मुशर्रफ ने तख्ता पलट दिया और खुद शासक बन गया। नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया गया। सऊदी अरब के हस्तक्षेप से नवाज शरीफ की जान बची थी, फांसी पर चढ़ने से बचे थे। लेकिन सऊदी अरब में निर्वासित जिंदगी जीने के लिए विवश हुए थे। बेनजीर भुट्टो को सरेआम गोलियां मार दी गईं। आरोप सेना पर ही लगा। एक बार फिर नवाज शरीफ पाकिस्तान की राजनीति में प्रविष्ट जरूर हुए पर सेना द्वारा प्रपंच में उनकी हैसियत और छवि डूब गई, सेना की इच्छा की पूर्ति न्यायपालिका की कसौटी पर हो गई। नवाज शरीफ को सजा हुई और वे राजनीति के अयोग्य घोषित कर दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">इमरान खान भी सेना की ही पैदाइश हैं। कभी सेना ने ही उन्हें अपना हथकंडा बनाया था। इस तरह पाकिस्तान की आंतरिक और बाह्य नीतियों पर भी सेना की ही इच्छा और कब्जा रहेगा। इसी कारण चुनावों में धांधली कर इमरान खान को जीताया गया और प्रधानमंत्री बनवाया गया। प्रारंभ में इमरान खान ने सेना की हर स्थितियां-परिस्थितियां अनुकूल बनाई। लेकिन सेना और इमरान खान के बीच में परिस्थिति प्रतिकूल होने के दो कारण प्रमुख रहे। एक बड़ा कारण पीएम नरेन्द्र मोदी हैं और दूसरा कारण सेना का आतंरिक प्रबंधन में हस्तक्षेप है। पीएम नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर से धारा 370 हटा कर पाकिस्तान को बड़ा झटका दिया था और पाकिस्तान की पूरी हेकड़ी तोड़ डाली थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान की सेना चाहती थी कि इमरान खान अमेरिका को मैनेज करे और पूरे विश्व को भारत के खिलाफ खड़ा कर दे। भारत से युद्ध की भी संभावना तलाशी जाए। लेकिन इमरान खान पूरी कोशिश करने के बाद भी न तो अमेरिका को अपनी ओर झुका सके और न ही शेष दुनिया को भारत विरोधी बना सके। पीएम मोदी के नेतृत्व के सामने दुनिया दुश्मनी मोल लेने के लिए तैयार नहीं हुई, इतना ही नहीं बल्कि मुस्लिम दुनिया यानी कि सऊदी अरब व इस्लामिक आर्गेनाइजेशन के सदस्य देशों ने भी पीएम मोदी की नाराजगी के डर से बहुत तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अफगानिस्तान को लेकर सेना और इमरान खान में मतभेद थे। सरकार के दिन-प्रतिदिन के काम में सेना का हस्तक्षेप खतरनाक ढंग से बढ़ा हुआ था। इस कारण इमरान खान सेना से नाराज थे। वे चाहते थे कि सेना के शीर्ष पद पर बैठने का फैसला हम करें। ऐसे भी इस प्रसंग में इमरान खान की सोच गैर जरूरी या गलत नहीं थी। चुनी हुई सरकार के अधीन ही सेना कार्य करती है। पाकिस्तान के लोकतांत्रिक संविधान में भी इस तरह का प्रावधान है। खासकर सेना अध्यक्ष और आईएसआई की कुर्सी पर बैठने वाले लोगों का भाग्य तय करने का अधिकार इमरान खान को था। इमरान खान ने इसके लिए प्रयास भी किए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आईएसआई और सेनाध्यक्ष को बदलने की कोशिश की थी। सेना को यह कैसे सहन हो सकता था कि उनकी बिल्ली ही उन्हें म्याऊं-म्याऊं बोले और आंख तरेरे। सेना के इशारे पर इमरान खान के खिलाफ बगावत होती है, विद्रोह होता है, गठबंधन के समर्थक दल अलग होते हैं। इमरान खान ने भी सेना का सामना किया, सेना को औकात बताने की कोशिश की, कोर्ट के आदेश के प्रति भी सहानुभूति दिखाने से पीछे हट गए। राजनीतिक स्थिति खतरनाक होने के कारण सेना को अप्रत्यक्ष तौर पर हस्तक्षेप करना पड़ा। इस कारण सेना और इमरान खान की पार्टी के बीच हिंसक स्थितियां भी उत्पन्न हुर्इं। विजयी तो वही होता है, जिसके साथ सेना खड़ी होती है। सेना इमरान खान के खिलाफ खड़ी थी। इसलिए इमरान खान की प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई। Imran Khan</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में जितने भी प्रधानमंत्री और राष्टÑपति के पद पर बैठे हुए राजनीतिज्ञ हैं, उन सबका हस्र न्यायपालिका की कसौटी पर ही हुआ है। आसिफ जरदारी आर्थिक गड़बड़ी की कसौटी पर न्यायपालिका के शिकार बने, नवाज शरीफ भी न्यायपालिका के फैसले के कारण राजनीति के क्षेत्र में अयोग्य घोषित किए गए और उन पर भी सजा की चोट पहुंची है। अब यह तय हो गया कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जो भी बैठेगा उसका हस्र इसी प्रकार से होगा, सेना और कोर्ट की जुगलबंदी इसी तरह से जारी रहेगी। सेना अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए न्यायपालिका का इसी तरह से दुरुपयोग करती रहेगी। सेना को कई प्रकार के हथकंडे आगे भी मिलते रहेंगे। Imran Khan</p>
<p style="text-align:justify;">यह सही है कि इमरान खान ने कुछ कीमती सामानों को निजी बता कर इस्तेमाल किया या फिर उसे निजी संपत्ति मान कर बेच दिया। इमरान खान की यह कार्रवाई जरूर नैतिकता और कानून की दृष्टि से सही नहीं है। इसलिए कि ये कीमती वस्तुएं इमरान खान को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे होने के कारण मिली थी। इसलिए उस पर पूरे पाकिस्तान का अधिकार बनता है। पर न्यायपालिका को लोकतंत्र के प्रति भी सोच विकसित करनी चाहिए थी, चिंता करनी चाहिए थी। सेना और कोर्ट की इस तरह की जुगलबंदी से पाकिस्तान एक सफल देश तो कभी नहीं बनेगा। Imran Khan</p>
<p style="text-align:right;"><strong>विष्णु गुप्त, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं स्वतंत्र पत्रकार</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Chandrayaan-3: आज महबूब को चाँद कहना गलत होगा! जानें कैसे?" href="http://10.0.0.122:1245/today-it-would-be-wrong-to-call-mehboob-the-moon-learn-how/">Chandrayaan-3: आज महबूब को चाँद कहना गलत होगा! जानें कैसे?</a></p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 08 Aug 2023 10:14:57 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Gyanvapi mosque: ज्ञानवापी का मामला अदालत पर छोड़ना बेहतर</title>
                                    <description><![CDATA[Gyanvapi mosque: ज्ञानवापी परिसर का सर्वे आरंभ हो चुका है। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सर्वे की रिपोर्ट के बाद सच सबके सामने आ जाएगा। और इस सर्वे के आधार पर न्यायालय को भी निर्णय सुनाने में सहायता मिलेगी। ज्ञानवापी का मामला काफी लंबे से विवादों में है। इसे लेकर हिंदू व मुस्लिम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/it-is-better-to-leave-the-case-of-gyanvapi-to-the-court/article-50901"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/gyanvapi-mosque.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Gyanvapi mosque: ज्ञानवापी परिसर का सर्वे आरंभ हो चुका है। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सर्वे की रिपोर्ट के बाद सच सबके सामने आ जाएगा। और इस सर्वे के आधार पर न्यायालय को भी निर्णय सुनाने में सहायता मिलेगी। ज्ञानवापी का मामला काफी लंबे से विवादों में है। इसे लेकर हिंदू व मुस्लिम दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं। लेकिन अंतिम निर्णय तो न्यायालय को ही करना है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा सर्वे को न्यायहित में अनिवार्य माना है। अंजुमन इंतेजामिया कमेटी ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसकी तुरंत सुनवाई को मंजूरी भी दी है, लेकिन सर्वे जारी रहेगा। Gyanvapi mosque</p>
<p style="text-align:justify;">इस विवाद को अदालत के भरोसे छोड़ दिया जाना बेहतर है, लेकिन ऐसे अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य हैं, जो इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का ही एक हिस्सा है, जिस पर मुगल काल में जबरन कब्जा कर मस्जिद खड़ी कर दी गई। कुछ समय पहले जब वजू खाने में शिवलिंग होने की बात सामने आई तब भी दीवारों और स्तंभों पर हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बात उजागर हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">देश-विदेश के अनेक पुरातत्व विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने भी इस बात को माना है कि ज्ञानवापी, विश्वनाथ मंदिर के हिस्से में ही बनाई गई और ऐतिहासिक शिवलिंग भी इसके नीचे दबा हो सकता है। एक नंदी प्रतिमा भी है, जो मस्जिद की तरफ मुंह करते हुए खड़ी है, जिसके आधार पर हिंदू पक्ष का दावा है कि भीतर शिवलिंग है। ये साक्ष्य कई पुस्तकों से संकलित किए गए हैं। यह बादशाह औरंगजेब की हुकूमत के दस्तावेजों से भी स्पष्ट है कि 1669 में मंदिर को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण कराया गया था। इस संदर्भ में वाराणसी की जिला अदालत ने दो कोर्ट कमिश्नरों की अध्यक्षता में ज्ञानवापी परिसर का सर्वे कराया था। Gyanvapi mosque Survey</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने भी अयोध्या विवाद का फैसला एएसआई के सर्वे और खुदाई के आधार पर दिया था। एएसआई भारत सरकार की संस्था है और इसके पुरातात्विक निष्कर्षों को अधिकृत और विज्ञान-सम्मत माना जाता रहा है। इलाहाबाद अदालत ने मस्जिद कमेटी की दलीलों को खारिज कर दिया कि सर्वे से मस्जिद को नुकसान पहुंच सकता है। इन दावों को बेदम करार दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष द्वारा खुदाई से ढांचे को होने वाले नुकसान की आशंका जताए जाने पर एएसआई को निर्देश दिया कि सर्वे के अत्याधुनिक तरीके अपनाए जाएं, जिससे इमारत को किसी तरह की क्षति न पहुंचे। एएसआई ने भी अदालत को आश्वस्त किया है कि आजकल बिना फर्श खोदे या दीवारों की ऊपरी परत को खुरचे भी भीतरी जानकारी हासिल करना संभव है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है अयोध्या में खुदाई इसलिए हुई थी क्योंकि विवादित स्थल पर कोई इमारत नहीं थी। सर्वे वैज्ञानिक होगा और किसी भी तरह की खुदाई नहीं की जाएगी। ग्राउंड पेनिट्रेरटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक का इस्तेमाल कर सर्वे किया जाएगा। फोटोग्राफी का भी इस्तेमाल किया जाएगा। बहरहाल चूंकि न्यायालय के आदेशानुसार सर्वे होगा और इसमें मस्जिद के ढांचे को क्षति न पहुंचे इसकी सावधानी रखी जाएगी, तब एतराज करने की बजाय मुस्लिम पक्ष को सहयोग करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">14 मई, 2022 को जिन वकीलों ने सर्वे में भूमिका अदा की थी, उनके मुताबिक ज्ञानवापी के भीतर पान के पत्ते के आकार की फूल की आकृतियां, त्रिशूल, स्वास्तिक, दीवार पर अंकित श्लोक और 4 तहखाने भी हैं। काफी संख्या में कमल के फूल की कलाकृति पत्थरों पर खुदी दिखी। एक खंभे पर हिंदी में 7 पंक्तियों में कुछ शब्द उकेरे दिखे। छत वाले तीन गुंबदों के अंदर त्रिशंकु शिखरनुमा आकृतियां दिखीं। भीतरी भाग मंदिर-सा लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर से पश्चिम दीवार के कोने पर मंदिर का मलबा पड़ा है, जिसमें देवी-देवताओं की कलाकृतियां और अन्य शिलापट्ट थे। शिलापट्ट पर शेषनाग की आकृति अंकित है। एक और शिलापट्ट पर सिंदूरी रंग की उभरी हुई कलाकृति है। देव-विग्रह में 4 मूर्तियों की आकृतियां थीं। दीपक जलाने की जगह बनी हुई थी। दीवारें, नींव, खंभा, कुंड, गर्भगृह का दरवाजा, वजूखाने की ओर नंदी का मुख, घंटियां आदि की आकृतियां छपी हुई नहीं, उकेरी हुई थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अहम प्रश्न यह है कि क्या किसी मस्जिद में ऐसी कलाकृतियां, आकृतियां और संरचनाएं होती हैं? स्कंदपुराण में भी ज्ञानवापी का विस्तृत उल्लेख है। कहा जाता है कि मस्जिद करीब 400 साल या 600 साल अथवा 1000 साल पुरानी है, इस तथ्य पर भी मुस्लिम संगठनों, नेताओं और धर्मगुरुओं में मतैक्य नहीं है। दरअसल दलीलें ये भी दी जा रही हैं कि उपासना स्थल कानून, 1991 के मद्देनजर इस मस्जिद से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। Gyanvapi mosque</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल इसकी अंतिम व्याख्या तो सर्वोच्च अदालत ही करेगी, लेकिन इस कानून की संवैधानिकता पर सवाल करने वाली कुछ याचिकाएं शीर्ष अदालत के ही विचाराधीन हैं। सभी पक्षों को उस निर्णय की भी प्रतीक्षा करनी चाहिए। किसी भी सुव्यवस्थित देश में अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा एक मानवीय जरूरत है। भारत का संविधान इसकी गारंटी देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्ञानवापी के अलावा मथुरा की शाही मस्जिद का मामला भी ऐसा ही है। ये दोनों हिंदुओं की आस्था के बड़े केंद्र हैं। इनको लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बना रहे तो ये भावी पीढ़ियों के लिए भी तकलीफदेह होगा। होना तो ये चाहिए था कि स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद एक निश्चित समयावधि में ऐसे सभी मामलों को सुलझा लिया होता, जिससे कि व्यर्थ के तनाव न पैदा होते। कोई भी फैसला वैज्ञानिक सबूतों और ऐतिहासिक तथ्यों की रोशनी में होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक मीडिया साक्षात्कार में ज्ञानवापी मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि, अगर ज्ञानवापी को मस्जिद कहेंगे तो विवाद तो होगा ही। सरकार ज्ञानवापी विवाद का समाधान चाहती है। वर्तमान स्थितियों में ऐसा नहीं लगता है कि मुस्लिम पक्ष योगी आदित्यनाथ के सुझाव को स्वीकार करेंगे। ज्ञानवापी का प्रकरण चूंकि अदालत की निगरानी में है इसलिए उसका निर्णय तो अब वहीं से होना ठीक रहेगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ.आशीष वशिष्ठ, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं स्वतंत्र पत्रकार</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Aug 2023 14:17:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Communalism: रोम-रोम में राम और खुदा है, फिर क्यूँ ये समाज जल रहा है !</title>
                                    <description><![CDATA[Communalism: भारत एक विविधता पूर्ण देश है, यहाँ प्रत्येक कोस पर भाषा और रीति रिवाज बदल जाते हैं। रीति रिवाज संपन्न इस देश की खूबसूरती है कि विभिन्न जाति, धर्म के संस्कार और चलन यहाँ एक सुन्दर गुलदस्ते का रूप लगते हैं। भारत (India) की भौतिक संपन्नता के कारण कालान्तर में कई विदेशी आक्रान्ताओं की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/there-is-ram-and-god-in-every-rome-then-why-this-society-is-on-fire/article-50834"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/bhaichara.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Communalism: भारत एक विविधता पूर्ण देश है, यहाँ प्रत्येक कोस पर भाषा और रीति रिवाज बदल जाते हैं। रीति रिवाज संपन्न इस देश की खूबसूरती है कि विभिन्न जाति, धर्म के संस्कार और चलन यहाँ एक सुन्दर गुलदस्ते का रूप लगते हैं। भारत (India) की भौतिक संपन्नता के कारण कालान्तर में कई विदेशी आक्रान्ताओं की कुदृष्टि तो इस देश पर लगी ही रही साथ ही यहां की सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करने के लिए भी चीनी यात्रियों से लेकर अरब, ईरान से सूफी संत, इस देश की ओर आकर्षित होते रहे। यदि कोई शरणार्थी बन कर भी आया तो उसे भी सहजता से इस देश ने स्वीकार कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण था कि विभिन्न तरह की सभ्यता का संगम भारत देश में विद्यमान है। जिस भी आगंतुक सम्प्रदाय या जाति, धर्म ने यहाँ की संकृति को आत्मसात कर लिया वह ना केवल पारसी समुदाय की भांति तरक्की के रास्ते पर चलने लगा अपितु निज की सांस्कृतिक विरासत को भी पल्लवित करता रहा। किंतु जहाँ भी किसी समुदाय ने विशेषाधिकार के स्तर के बावजूद अपने स्वार्थ की खातिर स्वयं की जाति धर्म को सर्वोपरि माना तो यहीं से वैमनस्य का बीज उत्पन्न होने लगा, जिसे समय-समय पर अवसाद की खाद से सींचा गया और फिर घृणा के इसी वृक्ष से साम्प्रदायिकता के फल का जन्म लेने लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">नफरत के इस पेड़ के दिए इस साम्प्रदायिकता रूपी फल का नशा कुछ इस कदर होता है कि अन्य जाति, धर्म के लोग भी इसका स्वाद बदले की आग में चखने लगे जिसका परिणाम ये हुआ कि ना केवल इस देश का विभाजन हुआ बल्कि साम्प्रदायिकता की आग में जलने के लिए सदियों के लिए एक मंच तैयार हो गया। इसी साम्प्रदायिकता के फलस्वरूप ही समय-समय पर देश के विभिन्न राज्यों से अलगाववाद की चिंगारी सुलगती रहती है। अपने को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे को हेय दृष्टि से देखने का ही परिणाम है कि भारत संघ में आज साम्प्रदायिकता की जरा सी चिंगारी एक दावानल का रूप धारण कर लेती है। जिसकी आग में पूरा समाज जलने लगता है। India</p>
<p style="text-align:justify;">साम्प्रदायिक हिंसा एक प्रकार की हिंसा है, जो किसी धर्म, पंथ या संप्रदाय विशेष के लोगों के बीच होती है। इसके अंतर्गत सभी प्रकार की हिंसा, झड़पें व दंगे शामिल किए जाते हैं, जो धार्मिक, पंथ या सामाजिक संप्रदाय के बीच होते हैं। जो लोग इस नफरत की आग का शिकार हो जाते हैं। अक्सर उनका साम्प्रदायिकता से कुछ लेना-देना नहीं होता। जिनकी सम्पत्ति को लूटा जाता है या आगजनी की जाती है वे अक्सर बेकसूर होते हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति को धार्मिक दंगों में नष्ट कर देना तो जैसे धार्मिक उन्माद में आम हो चला है।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी की धार्मिक भावनाओं को उकसाने और फिर प्रतिक्रिया स्वरूप कानून अपने हाथ में लेकर उन्माद फैलाना यह सिद्ध करता है कि देश की माटी से उपजे ये उन्मादी, अपने देश के ना होकर किसी पराये मुल्क में रह रहे हों। इस साम्प्रदायिकता के विष से उपजे दंगाई इस बात से भी गुरेज नहीं करते कि जिस सम्पत्ति की हानि उनके द्वारा की जा रही है, वह उन्हीं के देश के करदाताओं की अर्जित कमाई से बनी हुई है और उन्हीं लोगों के कल्याण के लिए निवेश की गई है। इस नाशवान संसार में जहां रोम-रोम में राम है और कण-कण में खुदा व्याप्त है। उसी की खुदाई को साम्प्रदायिकता की आग में खाक किया जा रहा है। समाज इस मुहाने पर आ चुका है कि इंसान, इंसानियत को विस्मृत कर बेशर्मी की सारी हदें पार कर रहा है। Bharat</p>
<p style="text-align:justify;">एक रिपोर्ट के अनुसार चार वर्ष के बीच देश में सांप्रदायिक या धार्मिक दंगों के 2,900 से अधिक मामले दर्ज किए गए। हालांकि समय-समय पर सरकार द्वारा हिंसा भड़काने की क्षमता वाली फर्जी खबरों और अफवाहों के प्रसार पर नजर रखने, उनका प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करने और ऐसा करने वाले व्यक्तियों से सख्ती से निपटने के लिए कहा गया है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो के 2021 के अपराध आंकड़ों के अनुसार, देशभर में सांप्रदायिक हिंसा के 378 मामले दर्ज किए गए हैं। श्री राम मंदिर आंदोलन की प्रतिक्रिया में सेवकों को जिंदा जला देने के फलस्वरूप गुजरात दंगे हों, फिर उस प्रतिक्रिया में मुंबई बम धमाके, इसी साम्प्रदायिकता के जहर की उपजी श्रृंखला है, जो देश में आपसी सौहार्द को समाप्त कर रही है। हालिया घटना दिल्ली में देखने को मिली जहाँ बेकसूर राहगीरों पर पत्थरों की बौछार की गई और यात्रियों से भरे सार्वजनिक वाहनों पर हमला किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा के मेवात में दंगाइयों ने हिन्दू समुदाय पर हमला करने की जो रणनीति अपनाई, जिसमें किशोर और युवा पीढ़ी का इस्तेमाल किया गया, वो यह सोचने को मजबूर करती है कि हमारे समाज का किशोर और युवा वर्ग, जिसके हाथों देश का उज्ज्वल भविष्य लिखा जाना था, वह किस कदर एक समुदाय के प्रति नफरत की आग में अपनी तरुणाई के साथ अपने देश को खाक करने में लगा हुआ है। अब इसी घटना के प्रतिक्रिया स्वरूप यदि दंगों की आग फैलती है तो ये भारत जैसे संवेदनशील समाज के लिए घातक है, जो पहले ही विदेशी शक्तियों की आँख की किरकिरी बना हुआ है। जब तक एक समुदाय दूसरे समुदाय को अपमानित करता रहेगा, तब तक के सामाजिक सौहार्द कायम नहीं हो सकता। शिवभक्तों पर हमला या थूक फेंकना या फिर किसी धार्मिक स्थल के समक्ष डीजे संगीत के साथ शस्त्र प्रदर्शन ही कुछ इस तरह की हरकतें हैं, जो साम्प्रदायिकता के मुहाने पर खड़े संवेदनशील समाज में ज्वाला का काम करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी धार्मिक स्थल पर हथियारों का जखीरा इकठ्ठा हो जाने के पीछे भी विदेशी शक्तियों द्वारा पोषित स्लीपर सेल की भूमिका ही कही जा सकती है। ये नकारात्मक शक्तियां स्लीपर सेल के रूप में सारे देश में फैली हुई हैं, जो देश की जड़ों को खोखला कर रही हैं। आम आदमी के घर में आधुनिक अस्त्र-शस्त्र की मौजूदगी इस स्लीपर सेल का समाज में विद्यमान होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो कि सोशल मीडिया पर फैली फेक न्यूज के बूते पर पूरे देश को जला पाने का सामर्थ्य रखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज यदि समाज पर दृष्टि डाली जाए तो यहाँ ऐसी वृतियाँ पनप रही हैं, जिनमें नैतिक शिक्षा व सदाचार की अपेक्षा अनैतिकता व भ्रष्ट आचरण को महत्त्व दिया जा रहा है। यही कारण है कि सोशल मीडिया समाज में धार्मिक कट्टरवाद व राष्ट्रविरोध का एक बेलगाम लश्कर तैयार करने में लगा हुआ है। यह जानबूझकर किया जाने वाला कृत्य देश की आन्तरिक शक्तियों की तरफ से हो या फिर विदेशी ताकतों के माध्यम से हो रहा हो पर इसको हवा देने का कार्य सत्ता लोलुपता के गणित में उलझी कुछ शक्तियों के हाथ से इनकार नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">समाज में इस तरह का वातावरण तैयार किया जा रहा है, जिसमें देशद्रोह की पोस्ट का इस्तेमाल समाज में आग लगाने के लिए किया जा रहा है और अफसोस यह कि इन पोस्ट के समर्थन करने वालों का एक बुद्धिजीवी वर्ग भी अचानक प्रकट हो जाता है। यह समाज में नैतिक दिवालिएपन का ही परिणाम है कि इन मीडिया साइट को धर्मान्तरण संवेदनहीन मुद्दों के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाने के मामले भी उजागर हो रहे हैं। अधिकतर दंगों में स्लीपर सेल द्वारा फैलाई जा रही नफरतों के पैगाम ही हैं, जो सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर पहुंचाए जा रहे हैं। छोटे-छोटे कस्बे व गांव भी इंटरनेट की पहुँच से समाज में इन जहरीली पोस्ट के माध्यम से वैमनस्यता का केंद्र बनते जा रहे है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज यदि हमें अपने सामाजिक ताने-बाने को बचाना है तो हमें अपने परिवार के युवा व किशोर वर्ग को ऐसा मार्गदर्शन देना होगा ताकि उनका नैतिक व चारित्रिक उत्थान हो सके। शासन के द्वारा कानून बनाने की अपेक्षा पारिवारिक माहौल इस दिशा में ज्यादा सार्थक परिणाम दे सकता है। Communalism</p>
<p style="text-align:right;"><strong>मुनीष भाटिया, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Earthquake: भूकंप के जोरदार झटके, तीव्रता 5.2, सहमे लोग, भूकंप से बचने के लिए उठाएं ये कदम" href="http://10.0.0.122:1245/strong-tremors-of-earthquake-magnitude-5-2-people-in-panic/">Earthquake: भूकंप के जोरदार झटके, तीव्रता 5.2, सहमे लोग, भूकंप से बचने के लिए उठाएं ये कदम</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Aug 2023 15:14:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>National Education Policy: बेहतर प्रशिक्षण से मिलेगा नई शिक्षा नीति का लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[National Education Policy: शिक्षा ज्ञान रूपी ऐसा हथियार है, जिसके बल पर कोई भी देश उन्नति की ओर अग्रसर होता है। पर जिस प्रकार किसी भी हथियार को चलाने के लिए विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होती है,उसी प्रकार नई शिक्षा नीति को देशभर में लागू करने के लिए बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था करने की सख्त […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/new-education-policy-will-benefit-from-better-training/article-50628"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/national-eduication-policy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">National Education Policy: शिक्षा ज्ञान रूपी ऐसा हथियार है, जिसके बल पर कोई भी देश उन्नति की ओर अग्रसर होता है। पर जिस प्रकार किसी भी हथियार को चलाने के लिए विशेष ट्रेनिंग की जरूरत होती है,उसी प्रकार नई शिक्षा नीति को देशभर में लागू करने के लिए बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था करने की सख्त जरूरत है। पुराने ढर्रे पर चल रही प्रशिक्षण व्यवस्था नई शिक्षा नीति लागू करने में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। आज भारत देश चाहे नई शिक्षा नीति बनने के 3 वर्ष पूरे कर रहा हो, इस उपलक्षय में दिल्ली में प्रगति मैदान में अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन भी चल रहा है। इस शिक्षा सम्मेलन का उद्घाटन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया, यह अच्छी बात है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में यह पल देशभर के लिए किसी बड़ी खुशी से कम नहीं है। लेकिन नई शिक्षा नीति में जिस कौशल विकास की बात कही गई है, उसे लागू करना देशभर के शिक्षण संस्थानों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह चुनौती सिर्फ और सिर्फ ट्रेनिंग की वजह से है, क्योंकि हमारे देश में नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार कर इसे लागू करने के लिए राज्यों को दे दिया गया है। पर इसे लागू करने वाले शिक्षकों को नई शिक्षा नीति की ट्रेनिंग कैसे दी जाएगी, इसकी व्यवस्था अभी तक नहीं की गई है? दूसरी तरफ पहले से ही देश के सभी जिलों में जिला स्तर पर चल रहे प्रशिक्षण संस्थानों में वही पुराने शिक्षक वही पुराना ढर्रा है। इसमें अभी तक कोई बदलाव न कर पाना चिंता का विषय है। यदि वर्तमान स्थिति की बात करें तो नई शिक्षा नीति के तहत प्रशिक्षण की व्यवस्था अभी तक देशभर के कुछ ही शिक्षण संस्थान व विश्वविद्यालय कर पाए हैं। सिर्फ इतना बदलाव देखने को मिला है। National Education Policy</p>
<p style="text-align:justify;">डिप्लोमा इन एजुकेशन व बैचलर इन एजुकेशन के स्थान पर नई शिक्षा नीति के कोर्स लागू किए जा रहे हैं। लेकिन 90 फीसदी शिक्षण संस्थानों में अभी भी डिप्लोमा इन एजुकेशन, बैचलर इन एजुकेशन व मास्टर इन एजुकेशन उन्हीं पुराने तौर-तरीकों से चलती आ रही है, जो वर्षों पुराने हैं। ऐसी स्थिति में प्रशिक्षण संस्थानों में जहां से देश भर के भावी शिक्षक प्रशिक्षण लेते हैं, उनके शिक्षकों को पहले प्रशिक्षण देने की सख्त जरूरत है। जब तक उन्हें नई शिक्षा नीति के बारे में विवरणात्मक रूप से नहीं पता होगा तब तक वे भावी शिक्षकों को उचित ट्रेनिंग नहीं दे सकेंगे। देश की राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में राष्ट्रीय स्तरीय आखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन चल रहा है। उससे इस सम्मेलन में आने वाले शिक्षकों व विद्यार्थियों को फायदा तो मिलेगा। लेकिन जब तक प्रशिक्षण के लिए बनाए गए सभी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को शिक्षा नीति के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं किया जाएगा तब तक नई शिक्षा नीति के फायदों की उम्मीद नहीं की जा सकती। National Education Policy</p>
<p style="text-align:justify;">नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद लागू करने की प्रक्रिया देशभर के राज्यों में इसी प्रकार चलती रहेगी। पर इस नई शिक्षा नीति को मूर्त रूप देने के लिए देश के शिक्षा मंत्रालय व राज्यों के शिक्षा मंत्रालयों को प्रशिक्षण व्यवस्था के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। नई शिक्षा नीति के अनुरूप एक ट्रेनिंग सेल का गठन कर आॅनलाइन या आॅफलाइन मोड में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट भविष्य की शिक्षा के लिए बहुत अच्छा तैयार किया गया है। यदि इस शिक्षा नीति के नियमों के तहत पढ़ाई करवाई जाए तो वास्तव में भारत देश की तस्वीर बदल सकती है। क्योंकि यही एक ऐसी शिक्षा नीति है,जिसमें विद्यार्थियों को अपने बलबूते पर अपनी मर्जी के अनुसार विषय चुनने की इजाजत दी गई है। पर इस बात का भी ख्याल रखना होगा जो विद्यार्थी भविष्य में शिक्षक बनना चाहते हैं,उनके विषय संयोजन पर भी ध्यान देना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">विषय संयोजन के बिना शिक्षक बनने की चाह अधूरी रह सकती है। नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग द्वारा करवाए गए एक सर्वे के अनुसार देशभर में 60 फीसदी भावी शिक्षक ऐसे हैं, जिन्होंने स्नातक स्तरीय डिग्री हासिल करने के बाद डिप्लोमा इन एजुकेशन या बैचलर इन एजुकेशन तो उत्तीर्ण कर ली है, पर उनके पास जानकारी ना होने की वजह से सब्जेक्ट संयोजन नहीं है। यही सब्जेक्ट संयोजन शिक्षक बनने के लिए सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरण के तौर पर यदि किसी को सामाजिक विज्ञान का अध्यापक बनना है तो उसके पास इतिहास व भूगोल में से कोई एक विषय होना अनिवार्य है। इसके अलावा इतिहास,भूगोल, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान व लोक प्रशासन में से दूसरा विषय चुनना होता है। यदि किसी भी शिक्षक के पास इन विषयों का संयोजन नहीं है तो वह जब तक शिक्षक नहीं बन सकता जब तक वह अपने सब्जेक्ट का संयोजन पूरा नहीं करता। अब यहां बात आती है सब्जेक्ट संयोजन कैसे बने? ऐसे विद्यार्थी जिनके पास सब्जेक्ट कंबीनेशन नहीं होता उन्हें दोबारा फिर एडिशनल तौर पर स्नातक स्तरीय पढ़ाई करनी पड़ती है। इसके बाद जाकर वे शिक्षक पद के लिए योग्य माने जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा हम नहीं बल्कि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था कह रही है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने पूरे देश के लिए ऐसे नियम बनाए हैं। इसी नियम को वर्तमान में केंद्र सरकार लागू भी कर चुकी है। स्वायत्त संस्थाएं केंद्रीय विद्यालय संगठन व नवोदय विद्यालय संगठन जैसे स्कूलों में भी शिक्षकों की भर्ती इसी एजुकेशन सिनेरियो के अनुसार हो रही है। यही एक सबसे बड़ी बात है जो भी भावी शिक्षक को बनना चाहता है,उसे बारहवीं/इंटर स्तर पर ही संयोजन के सब्जेक्ट दिए जाने चाहिए ताकि भविष्य में उसे किसी भी प्रकार की समस्या का सामना ना करना पड़े। शनिवार को देश की राजधानी दिल्ली में शिक्षा सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर बल दिया की शिक्षा से ही देश का भाग्य बदलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी यह बात 100 फीसदी सही है। पर बात घूम कर वहीं आती है। प्रशिक्षण… जब तक देश भर के शिक्षण महाविद्यालयों में नई शिक्षा नीति के अनुरूप प्रशिक्षित शिक्षक नहीं होंगे, तब तक नई शिक्षा नीति को लागू करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। भारत देश के पहले विधि मंत्री बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने भी यह बात कही थी कि शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जिसे जो पिएगा वही दहाड़ेगा। पर यह शेरनी का दूध मिले कैसे? पहली बात तो प्रशिक्षण नहीं है। दूसरी बात वर्तमान में शिक्षा प्रतिवर्ष महंगी होती जा रही है। महंगी शिक्षा गरीब तबके के लोगों व मध्यम स्तर के लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। जब तक आमजन की पहुंच में शिक्षा नहीं होगी, तब तक शिक्षा को पाना बड़ा ही मुश्किल कार्य है। National Education Policy</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. संदीप सिंहमार, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Punjab &amp; Haryana Weather Today: पंजाब हरियाणा में फिर बारिश का अलर्ट, 2 अगस्त से होगी भारी बारिश" href="http://10.0.0.122:1245/punjab-haryana-weather-today/">Punjab &amp; Haryana Weather Today: पंजाब हरियाणा में फिर बारिश का अलर्ट, 2 अगस्त से होगी भारी बारि…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Mon, 31 Jul 2023 12:00:57 +0530</pubDate>
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                <title>eGramSwaraj: ग्रामीण सुशासन को ई-ग्राम स्वराज की दरकार</title>
                                    <description><![CDATA[eGramSwaraj: साल 2025 तक देश में इंटरनेट की पहुंच 90 करोड़ से अधिक जनसंख्या तक हो जाएगी जो वर्तमान में 70 करोड़ है। तकनीक किस गति से अपना दायरा बढ़ा रही है यह बढ़े हुए सुशासन से आंक सकते हैं। गौरतलब है कि ई-गवर्नेंस से प्रशासनिक कार्य एवं सेवाओं की दक्षता तथा गुणवत्ता में सुधार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/rural-good-governance-needs-e-gram-swaraj/article-50580"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/egramsavraj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">eGramSwaraj: साल 2025 तक देश में इंटरनेट की पहुंच 90 करोड़ से अधिक जनसंख्या तक हो जाएगी जो वर्तमान में 70 करोड़ है। तकनीक किस गति से अपना दायरा बढ़ा रही है यह बढ़े हुए सुशासन से आंक सकते हैं। गौरतलब है कि ई-गवर्नेंस से प्रशासनिक कार्य एवं सेवाओं की दक्षता तथा गुणवत्ता में सुधार होता है और यह भ्रष्टाचार को कम करने का औजार भी है। जाहिर है ऐसी दोनों परिस्थितियों में सुशासन की बयार बहना संभव है। भारत गांवों का देश है और डिजिटल इंडिया का विस्तार व प्रसार शहर तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। नि:संदेह गांव तक इसकी पहुंच को बढ़ाने की पुरजोर कोशिश हो रही है और ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ई-गवर्नेंस से प्रखर हुई ई-ग्राम समाज अभियान की अवधारणा को भी बल मिलेगा मगर तकनीक यदि रोड़ा बनी रही तो ई-ग्राम स्वराज की अवधारणा जाहिर है कमजोर भी होगी। eGramSwaraj</p>
<p style="text-align:justify;">इससे गांव के डिजिटलीकरण का सपना अधूरा रहेगा और 1922 में जो सपना महात्मा गांधी ने गांव के लिए देखा था वह भी कसमसाहट में भी रह जाएगा। विदित हो कि आगामी अक्टूबर 2023 से गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) पोर्टल से ही पंचायतों में खरीद को अनिवार्य किया जाना है। लाख टके का सवाल यह है कि जब इंटरनेट सेवाएं आधी पंचायतों तक भी नहीं पहुंची है तो इस पोर्टल से जुड़े सपने को जमीन कैसे मिलेगी। स्पष्ट कर दें कि जनवरी 2023 तक लगभग 81 हजार पंचायतों तक ही इंटरनेट सेवाएं पहुंच पायी हैं जबकि संसद की स्थायी समिति को मंत्रालय द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग पौने तीन लाख पंचायतें हैं। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि हजारों पंचायतों में सेवा शुरू होने वाली है और छ: माह में इसे और गति देते हुए आगामी दो वर्श में शत-प्रतिशत पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ दिया जाएगा। Rural</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि स्टार्टअप से लेकर मोटे अनाज पर जोर समेत कई संदर्भ पिछले कुछ समय से फलक पर है। उत्पाद, उद्यम और बाजार ई-ग्राम स्वराज की अवधारणा में एक अनुकूल वातावरण ला सकते हैं। मगर इसके लिए इंटरनेट की सेवाएं समुचित रूप से बहाल करनी होंगी। दावे राजनीतिक दृश्टि से कुछ भी हों मगर सुशासन का दृश्टिकोण यह कहता है कि समावेशी ढांचा बिना सुनिश्चित किए ग्रामीण विकास को उचित रूप दिया ही नहीं जा सकता जिसके कारण लोक सशक्तिकरण एक चुनौती बना रहेगा। ई-गवर्नेंस की दृश्टि से देखें तो इसका भी टिकाऊ पक्ष इंटरनेट कनेक्टिविटी ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी साल के फरवरी में पेश बजट में भी किसानों को डिजिटल ट्रेनिंग देने की बात देखी जा सकती है मगर यह कैसे सम्भव होगा यह भी सोचनीय मुद्दा है। गांव में 8 करोड़ से अधिक महिलाएं जो व्यापक पैमाने पर स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उत्पाद करने का काम कर रही हैं और इन्हें देश-विदेश में बाजार मिले इसके लिए भी तकनीक तो चाहिए। इंटरनेट एण्ड मोबाइल एसोसिएशन के सर्वे पर आधारित एक रिपोर्ट जो थोड़ी पुरानी है उससे पता चलता है कि 2020 में गांव में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 30 करोड़ तक पहुंच चुकी थी। देखा जाए तो औसतन हर तीसरे ग्रामीण के पास इंटरनेट सुविधा है। पौने तीन लाख पंचायतों में 80 हजार पंचायतों तक इंटरनेट की पहुंच इसी आंकड़े को तस्तीक करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरा भारत साढ़े छ: लाख गांवों से भरा है और इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में 42 फीसद ग्रामीण महिलाएं हैं। गांव में महिलाओं की श्रम शक्ति में हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। कृषि क्षेत्र में अभी भी 60 प्रतिशत के साथ यह बढ़त लिए हुए है। इतना ही नहीं बचत दर सकल घरेलू उत्पाद का 33 प्रतिशत इन्हीं से सम्भव है और डेयरी उद्योग में तो महिलाएं ही छायी हैं जहां 94 फीसद का आंकड़ा देखा जा सकता है। इंटरनेट की बढ़त से चौतरफा सम्भावनाओं में बाढ़ आना स्वाभाविक तो है मगर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह सुलभ के साथ कहीं अधिक सस्ता भी हो।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचायती राज मंत्रालय, पंचायतों को पारदर्शी और सशक्त बनाने के लिए कई अभियान और कार्यक्रम चला रहा है। पंचायतों को इस बात के लिए भी निर्देशित किया गया है कि ग्राम पंचायत स्तर पर किसी भी मद में पैसे का लेन-देन फिलहाल यूपीआई से ही किया जाए जिस हेतु 15 अगस्त 2023 का लक्ष्य रखा गया। स्पश्ट है कि डिजिटल लेन-देन व ई-गवर्नेंस को यहां तवज्जो देने की बात है मगर इसका भी पूरा ताना-बाना इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भर है। इसके अलावा मंत्रालय की केन्द्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने राज्यों से यह भी कहा है कि राज्य विशेष की सभी पंचायतों में जीईएम पोर्टल के माध्यम से ही वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-फरोख्त को केन्द्रीय वित्त आयोग द्वारा अनिवार्य किया जा रहा है। यहां भी ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने की बात है बशर्ते चुनौती में इंटरनेट सेवा ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यों में इंटरनेट सेवा की पड़ताल यह बताती है कि लगभग पूरे देश में हालत कमोबेश कमजोर और एक जैसी है मसलन उत्तर प्रदेश मे 58189 पंचायतों में महज 5014 पंचायतें इंटरनेट से जुड़ पायी हैं। यह आंकड़ा इस बात का उदाहरण है कि पंचायतें इंटरनेट सेवा के मामले में बहुत बेहतर नहीं बल्कि चिंतनीय अवस्था में है। उत्तराखण्ड में यही आंकड़ 7791 के मुकाबले 1010 पर है। इसी क्रम में राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश समेत सभी राज्यों की हालत कुछ ऐसी ही है। पंजाब इस मामले में कहीं अधिक बेहतर अवस्था लिए हुए है। यहां कि 13241 पंचायतों में 9483 पंचायतें इंटरनेट से सरोकार रखती है जबकि हरियाणा में 6220 पंचायतों के मुकाबले इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले पंचायतों की संख्या 3570 है। देखा जाए तो गुजरात में 14359 पंचायतों में 11167 का जुड़ाव इंटरनेट से है जो अपने आप में एक बेहतर आंकड़ा तो हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दावे अपनी जगह है नीयत और नीति में भी कोई संदेह नहीं है मगर ई-ग्राम स्वराज में पंचायतों की तकनीकी स्थिति को देखते हुए यह आंकलन आसान है कि अभी एड़ी-चोटी का जोर लगाना बाकी है। लेकिन एक हकीकत यह है कि जनवरी में किए गए तमाम दावो को छ: महीने बीत चुके हैं, हो सकता है कि पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ने का क्रम बीते छ: महीने में बड़ा रूप लिया हो मगर यह कहना अतार्किक सा प्रतीत होता है कि अक्टूबर से जीईएम पोर्टल से ही पंचायते अनिवार्य रूप से खरीद मामले से जुड़ जाएंगी। इसका सबसे बड़ा कारण फिर वही तकनीक की चुनौती ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वोकल फॉर लोकल का नारा कोरोना काल में तेजी से बुलंद हुआ। मोटे अनाज को लेकर इन दिनों चर्चा खूब जोरों पर है। अच्छे बीज, अच्छी सीख और अच्छी खेती समेत मुनाफे से भरी बिकवाली की अगर कोई बड़ी चुनौती है तो वह तकनीक का समुचित न होना ही है। गांव श्रम का सस्ता रास्ता है लेकिन वित्तीय कठिनाईयों के चलते संसाधन की कमी से जूझते कौशलयुक्त ग्रामीण श्रम शहर का रास्ता पकड़ लेता है। जिसका सबसे बड़ा असर ग्राम स्वराज की उस अवधारणा पर पड़ता है जो राश्ट्रपति महात्मा गांधी का सपना था। ग्रामीण उद्यमी वित्तीय रूप से सशक्त होंगे व तकनीक से युक्त होंगे तो जाहिर है गांवों का देश भारत उन्नति का परिचायक हो जाएगा। फलस्वरूप सुशासन का सपना पाले सरकार को भी इसकी पूरी परिभाशा गढ़ने का अवसर मिलेगा। Good Governance</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्रशासनिक चिंतक (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                <pubDate>Sun, 30 Jul 2023 10:07:20 +0530</pubDate>
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