<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/thinking/tag-624" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>thinking - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/624/rss</link>
                <description>thinking RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आर्थिक मुद्दे राजनीतिक सोच से नहीं निपटते</title>
                                    <description><![CDATA[नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने इस बात को कबूल किया है कि अभी दो अंकों की विकास दर भारत के लिए सपना ही है, जिसके लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। मीटिंग में मुद्दों की बात तो हुई पर कारणों पर विचार करने के लिए जोर नहीं दिया गया। कहनेभर को यह केन्द्र व […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/economic-issues-do-not-deal-with-political-thinking/article-4307"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/modi-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने इस बात को कबूल किया है कि अभी दो अंकों की विकास दर भारत के लिए सपना ही है, जिसके लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। मीटिंग में मुद्दों की बात तो हुई पर कारणों पर विचार करने के लिए जोर नहीं दिया गया। कहनेभर को यह केन्द्र व राज्य की मीटिंग थी लेकिन में एकजुटता नजर नहीं आई। दरअसल अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए चुनावी वायदों व वास्तविकता में बड़ा अंतर है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तक नीतियों को लागू करने के लिए व्यवहारिक जोर नहीं दिया जाता तब तक अच्छे परिणम नहीं मिल सकते। अभी तक सरकारी योजनाएं बेसिर-पैर घूमती हैं। कृषि की दुर्दशा मिटाने को केंद्र द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई है पर इस योजना का फायदा किसानों को कम बीमा कंपनियों को अधिक हुआ। तमिलनाडू के एक किसान को फसल के नुकसान होने पर महज सात रुपए दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी हालत में अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान की उम्मीद कैसे की जा सकती है? बिहार में गठबंधन सरकार ने ही इस योजना को लागू करने से मना कर दिया है। राज्य सरकार व केन्द्र सरकार द्वारा कंपनियों को दिया जा रहा प्रीमियम बीमा कंपनियों के लिए मोटी कमाई बना हुआ है। कई योजनाओं में के न्द्र तथा राज्यों की हिस्सेदारी के लिए कोई योजनाबंदी ही नहीं। उधर दलितों के लिए वजीफा योजना में के न्द्र सरकार का बड़ा हिस्सा है, अचानक केन्द्र सरकार अपना हिस्सा बंद कर देती है बाद में यह योजना राज्य के गले की फांस बन जाती है। ऐसी योजना के लिए ना केन्द्र कुछ देता है ना ही खाली खजाने का सामना कर रही राज्य सरकारें कुछ कर पा रही हैं</p>
<p style="text-align:justify;">। निष्कर्ष के तौर पर योजना सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है। आर्थिक मामलों संबंधी राज्यों तथा केन्द्र के बीच सहमति नहीं। कम से कम कृषि प्रधान देश के लिए एक सामूहिक योजना तो बनाई जा सकती है। कर्ज माफी के लिए केन्द्र राज्यों को कोरा जवाब दे चुका है। भाजपा की सरकार वाले राज्य कर्जा माफी की घोषणा करते हैं परंतु केन्द्र भाजपा सरकार ही कर्ज माफी की मांग को वाजिब नहीं मानती। वोट की राजनीति पर तर्क का कोई अर्थ नजर नहीं आ रहा। यदि यह कहा जाए कि अनाज की खरीद को छोड़कर देश में कोई कृषि नीति ही नहीं है, तो गलत नहीं होगा। विकास दर में बढ़ोत्तरी के लिए वोट बैंक की नीति से ऊपर उठ कर कुछ करना होगा। आर्थिक मामलों से राजनीतिक सोच द्वारा निपटना मुश्किल ही नहीं असंभव है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/economic-issues-do-not-deal-with-political-thinking/article-4307</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/economic-issues-do-not-deal-with-political-thinking/article-4307</guid>
                <pubDate>Tue, 19 Jun 2018 08:25:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-06/modi-4.jpg"                         length="29022"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘अलजजीरा’ की आतंकी सोच पर उठी आवाज</title>
                                    <description><![CDATA[अरबी भाषा की कुख्यात न्यूज चैनल ‘अलजजीरा’ को लेकर सउदी अरब ने दुनिया को सावधान किया है,सउदी अरब ने कहा है कि अब समय आ गया है कि अरबी न्यूज चैनल ‘अलजजीरा’ के आतंकवादी चेहरे को बेनकाब कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह अभिव्यक्ति का माध्यम न होकर आतंकवादियों की सोच और हिंसक उद्देश्य की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-aljajira/article-1727"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/alj-jira.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">अरबी भाषा की कुख्यात न्यूज चैनल ‘अलजजीरा’ को लेकर सउदी अरब ने दुनिया को सावधान किया है,सउदी अरब ने कहा है कि अब समय आ गया है कि अरबी न्यूज चैनल ‘अलजजीरा’ के आतंकवादी चेहरे को बेनकाब कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह अभिव्यक्ति का माध्यम न होकर आतंकवादियों की सोच और हिंसक उद्देश्य की पूर्ति का एक हथकंडा मात्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">इतना ही नहीं, बल्कि सउदी अरब ने कतर के खिलाफ आर्थिक घेराबंदी को समाप्त करने के लिए जो दस सूत्री शर्तें पूरी करने की मांग की है, उसमें अलजजीरा के वित पोषक होने की गलती स्वीकार करने और अलजजीरा को सभी प्रकार की मिल रही सहायताएं बंद करने को कहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अलजजीरा अरबी न्यूज चैनल की धाक कुछ ज्यादा है और अरब दुनिया का वह सबसे ज्यादा देखा जाने वाला न्यूज चैनल है। यूरोप और अमेरिका का मीडिया बहुत पहले से ही अलजजीरा को न्यूज चैनल या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम मानने से इन्कार करता रहा है और अमेरिका व यूरोप के शासन व मीडिया संवर्ग का कहना है कि अलजजीरा किसी भी स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षक नहीं है। वह सिर्फ आतंकवादियों के हित पोषक है, जिसकी अंतिम इच्छा इस्लामिक हिंसा का संरक्षण होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि अलजजीरा यूरोप और अमेरिका के इस विचार का खंडन करता रहा है और कहता रहा है कि उसने यूरोप और अमेरिका की मीडिया को चुनौती दी है, इसीलिए उसके खिलाफ एक साजिश के तहत ऐसा दुष्प्रचार होता रहा है। पर अब अरब जगत में भी अलजजीरा को लेकर विरोध का स्वर उठा है और उसके प्रतिबंध लगाने की मांंग हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या सही में सउदी अरब के आरोप सही हैं? क्या अपनी तानाशाही के खिलाफ उठ रहे बंंवडर को रोकने के लिए अलजजीरा को सउदी अरब ने निशाना बनाया है? क्या यह सही है कि सउदी अरब की वंशवादी तानाशाही के खिलाफ अलजजीरा सक्रिय रहा है? सउदी अरब में ही नहीं, बल्कि अरब के कई देशों में अलजजीरा को लेकर प्रश्न क्यों खडेÞ हो रहे हैं?</p>
<p style="text-align:justify;">सही तो यह है कि अमेरिका और यूरोप में अलजजीरा का प्रसारण अरबी मूल की मुस्लिम आबादी बड़ी सक्रियता और समर्पण के साथ देखती है। अमेरिका और यूरोप के राष्ट्रवादियों का कहना है कि अमेरिका और यूरोप में आईएस की पैठ बढ़ाने में अलजजीरा का प्रसारण मुख्य रूप से जिम्मेदार रहा है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका और यूरोप के हजारों मुस्लिम युवक-युवतियां आईएस की ओर से लड़ने के लिए सीरिया और इराक गये हुए हैं, जिन पर अलजजीरा का प्रभाव भी मुख्य रूप से था।</p>
<p style="text-align:justify;">अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नजर रखने वालों को अलजजीरा जैसे इस्लामिक प्रसारण माध्यमों की सच्चाई जरूर मालूम है। जाहिर तौर पर अलजजीरा जैसे इस्लामिक प्रसारण माध्यम अभिव्यक्ति की स्वतंंत्रता से जुडेÞ हुए नहीं, बल्कि ऐसे संगठन तो इस्लाम की उस सोच से जुडेÞ हुए हैं, जिस सोच को लेकर अलकायदा, आईएस, हिज्जबुल्लाह, हमास जैसे संगठन दुनिया को अपनी हिंसा से मानवता को शर्मसार कर रहे हैं और निर्दोष लोगों की जिंदगियां आतंकवाद व खूनी हिंसा में स्वाहा कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अलजजीरा ने कभी अलकायदा सरगना ओसामा-बिन-लादेन को इस्लाम का हीरो माना था। जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर तालिबान शासन व्यवस्था को उखाड़ फैंका था और अलकायदा सरगना ओसामा-बिन-लादेन को पाकिस्तान में छिपने के लिए विवश किया था, तब अलजजीरा ने अमेरिका के खिलाफ अभियान छेड़ा था और अलकायदा सरगना ओसामा-बिन-लादेन को हीरो बताया था और स्थापित करने की कोशिश की थी कि सही में अलकायदा जैसे संगठन अमेरिका व यूरोप के उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिसे मुस्लिम जगत से समर्थन की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुस्लिम बदरहुड, हमास और हिज्जबुल्लाह जैसे संगठन अरब जगत और मुस्लिम दुनिया में सक्रिय हैं और अपने-आपको इस्लाम का हित-पोषक कहते हैं। मुस्लिम बदरहुड जहां मिस्र और सउदी अरब में पैठ बनाई और मिस्र में सत्ता भी हासिल की थी, वहीं हिज्जबुल्लाह लेबनान और हमास फिलिस्तीन में आतंकवाद की भाषा बोलने का कार्य करते हैं और आतंकवाद को प्रसारित करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">खासकर हमास इस्राइल के खिलाफ वर्षों से आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ खड़ा रहा है। इस्राइल भी हमास की पूरी संरचना को ध्वस्त करने के लिए अभियान चलाता रहा है। मुस्लिम ब्रदरहुड ने लोकतंत्र के नाम पर हुए आंदोलन में सत्ता तो जरूर पायी थी, फिर उसने मिस्र में तानाशाही कायम करने की पूरी कोशिश की थी। मुस्लिम ब्रदरहुड को कतर और ईरान से इस्लामिक फंडिंग मिलती रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अलजजीरा अपने प्रसारण में यह दिखाता रहा है कि इस्राइल के खिलाफ हमास आजादी की लड़ाई लड़ रहा है और इस्राइल मुस्लिम दुनिया को तबाह करना चाहता है। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि मिस्र की सैनिक सरकार के खिलाफ भी अलजजीरा विद्रोह कराने जैसा प्रसारण करता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अलकायदा की इस्लामिक हिंसक सोच से अलजजीरा का जन्म हुआ था। अब यहां यह सवाल उठता है कि अलकायदा की सोच क्या थी? अलकायदा की सोच सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी सोच थी, उसकी सोच अलजजीरा जैसे मीडिया संगठन को हथकंडा बनाकर अपनी पहुंच दुनिया भर में विकसित करनी थी। अलकायदा अपनी इस सोच में कामयाब हुआ। अलजजीरा की शक्ति बढ़ते ही इस्लामिक आतंकवादियों की शक्ति बढ़ी थी और न केवल अरब जगत की मुस्लिम, बल्कि अमेरिका और यूरोप की मुस्लिम भी अलजजीरा को अपना वैचारिक पोषक मान चुकी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण था कि अलकायदा अपनी पैठ पूरी दुनिया में बनाने में कामयाब हुआ था। तालिबान शासन की समाप्ति और ओसामा-बिन-लादेन के मारे जाने के बाद अलकायदा बेहद कमजोर हो गया। इसके बाद अलजजीरा ने आईएस को अपना हितपोषक और वित पोषक बना डाला। उल्लेखनीय है कि कतर न केवल आतंकवादी संगठनों को धन मुहैया कराता है, बल्कि वह अलजजीरा को भी धन मुहैया कराता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मिस्र और सउदी अरब का मानना है कि अलजजीरा उनके देश में विद्रोह कराना चाहता है और अशांति पैदा करना चाहता मिस्र में मुस्लिम बदरहुड आतंकवाद के रास्ते पर है, वहीं सउदी अरब में भी आतंकवादी संगठन अपनी हिंसा से दुनिया को चिंतित कर रहे हैं। निश्चित तौर पर अलजजीरा जैसे न्यूज संगठन आतंकवाद के हित पोषक हैं,</p>
<p style="text-align:justify;">इनके खिलाफ दुनिया भर में आवाज उठनी चाहिए। अब सउदी अरब ने आवाज उठायी है। सउदी अरब की आवाज अलजजीरा के लिए भारी पड़ने वाली है। जब अरब जगत के प्रमुख देशों में अलजजीरा के प्रसारण पर प्रतिबंध लगेगा, तो फिर अलजजीरा की शक्ति कैसे नहीं कमजोर पड़ेगी। भारत में भी अलजजीरा की संपूर्ण सक्रियता को संज्ञान में लेने की जरूरत है।</p>
<p><strong>-विष्णुगुप्त</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-aljajira/article-1727</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-aljajira/article-1727</guid>
                <pubDate>Wed, 28 Jun 2017 23:49:25 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-06/alj-jira.jpg"                         length="117615"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छोटी सोच के बड़े मसीहा</title>
                                    <description><![CDATA[कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभिन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति, धर्म, स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही हैं, पर कहते हैं न कि ‘हाथी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभिन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति, धर्म, स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही हैं, पर कहते हैं न कि ‘हाथी के दांत दिखाने के कुछ और, खाने के कुछ और ही होते हैं।’ उसी तरह हम पूरी दुनिया को दिखाते कुछ और हैं और वास्तविक सच्चाई कुछ और ही होती है।<br />
हमारे समाज में जाति एंव धर्म के नाम पर बहुत पहले से ही लड़ाईयां होती आ रही हैं और कभी-कभी उम्मीद भी कम ही लगती है कि ये लड़ाई कभी खत्म हो पाएंगी। लेकिन इन सबके बीच भी जो एक बड़ा भेदभाव आज भी दिख रहा है, वे है प्रादेशिक आधार पर किया जाने वाला भेदभाव। समाज का बड़ा और पढ़ा-लिखा तबका आज भी इस भेदभाव को करने में पीछे नहीं है।<br />
पूर्वोत्तर के राज्यों से आने वाले लोगों को समाज में आज भी नेपाली या चीनी कहकर बुलाया जाता है, जबकि उनकी नागरिकता भी इसी देश की होती है और उनकी देशभक्ति भी इसी देश के प्रति ही होती है। देशभक्ति के मामले में तो कई बार इनकी देशभक्ति तथाकथित देशभक्तों से ज्यादा ही देखने को मिल जाती है। पूर्वोत्तर राज्यों पर चीन अपनी नजर गड़ाए किस तरह बैठा रहता है, ये बात किसी से छुपी नहीं है, केन्द्र सरकार की अधिकांश योजनाओं से अछूते रहने वाले ये लोग फिर भी अपने देश के प्रति देशभक्ति रखते, और शायद ही देश की कभी सार्वजनिक रुप से बुराई करते हैं। लेकिन उत्तर भारत समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो राह चलते अपने देश की अन्य देशों से तुलना कर देश की कमियों की बौछार बताने लगता हैं। भेदभाव का सामना सिर्फ पूर्वोत्तर भारत के लोग ही नहीं करते, बल्कि इस भेदभाव का सामना दक्षिण के राज्यों को भी करना पड़ता है और अगर आप बिहार से या बंगाल से हैं, तो कुछ जगह तो बकायदा आपके लिए स्लोगन भी बनाकर रखे जाते हैं, जिसके जरिए आपको नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है।<br />
इस तरह का भेदभाव अगर समाज का अशिक्षित वर्ग करे, तो एकबार को दु:ख भी कम होता है, क्योंकि समझा जा सकता है कि शिक्षा के अभाव में वे ऐसा बोल रहे हैं, लेकिन जब यही भेदभावपूर्ण बातें उच्च शिक्षित और बौद्धिक वर्ग के लोग करते हैं, तो बुरा लगता है। देश का भविष्य कहे जाने वाले युवा भी भेदभाव करने के मामले में पीछे नहीं है, बल्कि वे तो इस मामले में इन तथाकथित बौद्धिक वर्ग से कुछ ज्यादा ही आगे हैं। क्योंकि दोस्तों के बीच होने वाले मजाक और लड़ाई में कई बार ये लोग क्षेत्रीय पहचान को आधार बनाकर एक-दूसरे का मजाक बनाने लगते हैं।<br />
कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि क्षेत्रीय भेदभाव को कम करने का प्रयास किया जा रहा है और ये भी कह दिया जाता है कि ये प्रयास बहुत हद तक सफल भी हुए हैं, लेकिन फिर क्यों हर बार अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर के लोगों को यह कहना पड़ता और साबित करना पड़ता है कि वे नेपाली और चीनी नहीं है। आखिर क्यों हर बार एक बिहारी को संकोच होता है ये बताने में की, वे बिहार से है?<br />
देश भले ही चांद पर पहुंच जाए, लेकिन क्षेत्रीय भेदभाव की सोच अभी तक जमीन से ऊपर उठने का नाम नहीं ले रही। हालांकि समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो भेदभाव से परे समानता का व्यवहार करते हैं। इसीलिए सबको एक ही तराजू में तोलना भी उचित नहीं होगा, लेकिन देश क्या करे, जब भेदभाव करने वालों का पलड़ा, न करने वालों पर भारी पड़ जाए? समाज की इस सोच में एकाएक बदलाव आना सम्भव नहीं है और न ही किसी एक व्यक्ति से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि वह बदलाव ला देगा। इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर पहले अपनी सोच को अगर बदला जाए, तो धीरे-धीरे समाज में भी बदलाव आ ही जाएगा और जब तक समाज में ये व्यापक बदलाव नहीं आता, तब तक देश सही मायनों में पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक नहीं हो पाएगा। <em>सुप्रिया सिंह</em></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/little-thinking-big-messiah/article-558</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/little-thinking-big-messiah/article-558</guid>
                <pubDate>Mon, 19 Dec 2016 00:22:41 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्कूलों को जला देने से पढ़ने की सोच नहीं जल जाती</title>
                                    <description><![CDATA[कश्मीर में आतंक व पथराव रोजमर्रा की बात है। इससे भारतीय सुरक्षा बल अपने तरीके से निपट भी रहे हैं। लेकिन सबसे दु:खद बात है कश्मीर में स्कूलों का जलाया जाना। बुरहान वानी को मरे हुए अब पांच महीने को चुके हैं, तब से कश्मीर में स्कूलों को जलाया जा रहा है, तो अब तक […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/burned-schools-but-not-thinking-of-reading/article-423"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/school-burn.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कश्मीर में आतंक व पथराव रोजमर्रा की बात है। इससे भारतीय सुरक्षा बल अपने तरीके से निपट भी रहे हैं। लेकिन सबसे दु:खद बात है कश्मीर में स्कूलों का जलाया जाना। बुरहान वानी को मरे हुए अब पांच महीने को चुके हैं, तब से कश्मीर में स्कूलों को जलाया जा रहा है, तो अब तक करीब 32 स्कूल जल चुके हैं। यह आतंकियों की ऐसी कोशिश है, जो कश्मीर की एक पूरी पीढ़ी को अनपढ़, जाहिल बना देने पर आमादा है, जो सिर्फ कट्टरवाद की भाषा समझें। जब किसी क्षेत्र के लोग दिमागी रूप से पिछड़ जाते हैं, तब उनकी सुरक्षा, उनकी बेहतरी के लिए लड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। हालांकि कश्मीर में इस वर्ष भयंकर हिंसा में भी 94 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थी बोर्ड परीक्षाओं में शामिल हुए, जो भारत के बच्चों की बहादुरी की मिसाल है। बच्चों का परीक्षाओं में इस हद तक शामिल होना आतंकियों को साफ संकेत है कि भले ही उनके स्कूल जला दो, लेकिन उनके पढ़ने की सोच को नहीं जला पाओगे। भारत में पहले से स्कूली स्तर पर अनेकों दुश्वारियां हैं। कहीं स्कूलों में भवन नहीं हैं, कहीं बच्चों के लिए पीने का पानी व शौचालय नहीं है। अनेकों स्कूल ऐसे भी हैं, जहां पूरे अध्यापक या शिक्षण सामग्री नहीं है। जब मामला कश्मीर जैसे अशांत एवं दुर्गम क्षेत्रों का हो तो तकलीफें और भी ज्यादा हैं। ऐसे में आतंकियों का स्कूलों पर चोरी-छिपे हमले करना, उन्हें जलाते जाना बेहद गंभीर चुनौती है। राज्य के सुरक्षा तंत्र व केन्द्रीय सुरक्षा संगठनों को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा। यहां सबसे पीड़ादायक बात यह है कि इन स्कूलों को राख बनाने वाले लोग भी उन्हीं स्कूलों के आसपास के कुछ बुरहान वानी होंगे। लेकिन उन लोगों को समझना होगा कि वह जिन लोगों की आजादी की लड़ाई का दम भरते हैं, उन्हें ही अनपढ़ क्यों रखना चाह रहे हैं? इन स्कूलों में उनके ही छोटे भाई-बहन पढ़ते हैं। ये स्कूल उन्हीं के बाप-दादाओं की खून-पसीने की कमाई से बने हैं। स्कूल जलाने वालों को यदि पाकिस्तान की सहायता पर भरोसा है, तब उन्हें यह भी देखना होगा कि स्वयं पाकिस्तान में स्कूलों, अस्पतालों, गांवों-कस्बों के क्या हालात हैं। खैर अगर जलाने वालों को अपनों की इतनी ही फिक्र हो, तो वह ऐसा करें ही क्यों। लेकिन केन्द्र व राज्य सरकार को चाहिए कि वह जलाए गए स्कूलों को सेना की सहायता से पुन: रातों-रात बनाना शुरु करें, ताकि जो लोग शिक्षा के विरोधी हैं, उन्हें सबक सिखाया जा सके कि वह लाख यत्न कर लें, लेकिन कश्मीरियों की तरक्की व अमन को वह मिटा नहीं पाएंगे।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/burned-schools-but-not-thinking-of-reading/article-423</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/burned-schools-but-not-thinking-of-reading/article-423</guid>
                <pubDate>Tue, 06 Dec 2016 07:07:10 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2016-12/school-burn.jpg"                         length="38620"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        