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                <title>After All - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>आखिर मिल ही गया चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का मलबा</title>
                                    <description><![CDATA[आज की ताजा खबर | नासा ने कहा, ‘नासा के मून मिशन ने भारतीय अंतरिक्ष यान चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का पता लगाया है
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/after-all-the-debris-of-chandrayaan-2-vikram-lander/article-11599"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/after-all-the-debris-of-chandrayaan-2-vikram-lander.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">नासा ने तस्वीर पोस्ट कर की पुष्टि | Vikram Lander</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी)।</strong> अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान <strong>( The debris of Chandrayaan-2 Vikram Lander )</strong> नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) को चांद की सतह पर भारतीय ‘चंद्रयान-2’ के विक्रम लैंडर के तीन टुकड़े मिले हैं। नासा ने सोमवार देर रात डेढ़ बजे ट्वीट कर यह जानकारी दी। नासा ने अपने ट्वीट में एक तस्वीर पोस्ट की है, जिसमें विक्रम लैंडर के प्रभाव बिंदु और उस क्षेत्र को दिखाया गया है, जहां मलबा मिला है। नासा ने कहा, ‘नासा के मून मिशन ने भारतीय अंतरिक्ष यान चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का पता लगाया है।’</p>
<h3>चाँद के इतने नजदीक पहुंचना बड़ी उपलब्धि | Vikram Lander</h3>
<p>नासा ने अपने बयान में कहा है कि चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के क्षतिग्रस्त होने के बावजूद चंद्रमा के सतह के इतने करीब पहुंचना एक अद्भुत उपलब्धि है।</p>
<h2>चेन्नई के इंजीनियर की मेहनत लाई रंग</h2>
<p style="text-align:justify;">चेन्नई के इंजीनियर शानमुगा सुब्रमण्यन ने नासा की इन तस्वीरों पर बहुत मेहनत की। इसके बाद दुर्घटनाग्रस्त हुए चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के मलबे का पता लगा लिया गया। सर्वप्रथम सुब्रमण्यन ने नासा को इसके लिए सूचित किया और कुछ वक्त के बाद नासा ने इस संबंध में पुष्टि कर दी। नासा ने शानमुगा के इस सहयोगा के लिए शुक्रिया करते हुए उनके प्रयास की तारीफ की है। बता दें कि शानमुगा सुब्रमण्यन उर्फ शान मकैनिकल इंजिनियर और कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं। फिलहाल वह चेन्नई में ही लेनॉक्स इंडिया टेक्नोलॉजी सेंटर में टेक्निकल आर्किटेक्ट के तौर पर काम कर रहे हैं।</p>
<ul>
<li>सात सितंबर को चंद्रमा के दक्षिणी छोर पर हा रही थी सॉफ्ट लैंडिंग।</li>
<li>उसी वक्त चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का इसरो के नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटा।</li>
<li>चाँद की सतह से महज 2.1 किमी. दूर रह गया था विक्रम लैंडर।</li>
<li>क्रैश स्थल से 750 मीटर दूर मिला मिला मलबा।</li>
<li>मलबे के तीन सबसे बड़े टुकड़े 2गुणा 2 पिक्सेल के।</li>
<li>नीले और हरे डॉट्स के माध्यम से दिखाया मलबे वाला क्षेत्र।</li>
</ul>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Dec 2019 12:07:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>आखिर चीन झुका</title>
                                    <description><![CDATA[मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के रास्ते में रुकावट बने चीन को आखिर राष्टÑीय दबाव के सामने झुकना पड़ा है। सबूतों की जांच का तर्क देने वाले चीन ने अब बयान दिया है कि वह भारत के दर्द को समझता है और इस मामले को जल्द हल कर लिया जाएगा। दरअसल संयुक्त राष्ट्र […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के रास्ते में रुकावट बने चीन को आखिर राष्टÑीय दबाव के सामने झुकना पड़ा है। सबूतों की जांच का तर्क देने वाले चीन ने अब बयान दिया है कि वह भारत के दर्द को समझता है और इस मामले को जल्द हल कर लिया जाएगा। दरअसल संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा कौंसिल में प्रस्ताव आने से पूर्व व बाद दोनों स्थितियों में अमेरिका ने भारत का मजबूती से सहयोग दिया। चीन द्वारा मसूद का बचाव करने पर फ्रांस ने जिस प्रकार सख्त अंदाज से जैश–ए-मोहम्मद के खाते फ्रीज करने की घोषणा की थी, वह चीन के लिए बड़ा झटका था।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में आम जनता भी चीन के रवैये से नाराज थी। आम लोगों ने चीन को आर्थिक तौर पर नुक्सान पहुंचाने की घोषणा कर दी थी। दरअसल फ्रांस, इंग्लैंड सहित यूरोप के अधिकतर देश आतंकवाद की आग में झुलस चुके हैं। यूरोप व अमेरिकी देशों में आतंकवाद के खिलाफ भारी रोष है। इन हालातों में चीन का लंबे समय तक आतंकवादियों का बचाव करना मुश्किल है, दूसरी तरफ चीन आर्थिक रूप से मजबूत बन रहा है और उसके उत्पाद विश्व भर में बिक रहे हैं। चीनी वस्तुओं का बायकाट उसकी आर्थिकता के लिए भारी नुकसानदेय है। भारत सरकार को चीन पर दबाव बनाने के लिए बहुपक्षीय व दीर्घकालीन नीतियां अपनाने की जरूरत है। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं विशेष कर परमाणु ताकत वाले देशों में युद्ध पूरी तरह से असंभव है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान की घेराबन्दी के लिए चीन को समझ से काम लेना चाहिए। चीन का रुख बदला है लेकिन इसे पूरी तरह भारत के हित में नहीं कहा जा सकता। चीन ने यह फैसला दबाव में लिया है न कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी किसी वचनबद्धता का पालन किया है। आतंकवाद के खिलाफ मजबूत देशों के दोहरे मापदंड ही इस समस्या का बड़ा कारण हैं। भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की एक परिभाषा और एक ही राय को स्थापित करने के लिए अन्य प्रयास करने होंगे, ताकि चीन जैसे देश आतंकवादियों का बचाव करने से संकोच करें। आतंकवाद को मानवता विरोधी जघन्य अपराध के तौर पर पेश करने के लिए अभियान छेड़ना होगी। फिलहाल चीन का रवैया ऐसा लग रहा है कि वह भारत का साथ देने की बजाय भारत के विरोध को ही शांत करने की कोशिश कर रहा है। मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने तक भारत को चुप नहीं बैठना होगा।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/after-all-china-bend/article-8124</link>
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                <pubDate>Mon, 18 Mar 2019 20:07:02 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आखिर बीच चौराहे इतना जानलेवा गुस्सा क्यों?</title>
                                    <description><![CDATA[जानलेवा मारपीट होती जा रही है आम दिसबंर के पहले पखवाड़े की नई दिल्ली के पांडव नगर और मयूर विहार में दो युवकों की रोडरेज (Why The Intersection Between This Is So Fierce Anger?) में हत्या अब कोई नई बात नहीं रही है। यह कोई अकेली दिल्ली की घटना भी नहीं है। इस तरह की रोडरेज […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h1>जानलेवा मारपीट होती जा रही है आम</h1>
<p>दिसबंर के पहले पखवाड़े की नई दिल्ली के पांडव नगर और मयूर विहार में दो युवकों की रोडरेज (Why The Intersection Between This Is So Fierce Anger?) में हत्या अब कोई नई बात नहीं रही है। यह कोई अकेली दिल्ली की घटना भी नहीं है। इस तरह की रोडरेज की घटनाएं देश के किसी भी कोने में होना अब आमबात होती जा रही है। देश में जिस तरह से महंगाई की दर बढ़ रही है लगभग उसी तरह से रोडरेज की घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है।</p>
<p>प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करें तो आम राह मारपीट और जान लेने की घटनाओं में औसतन प्रतिदिन तीन लोगों की जान जा रही है। केंन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों पर ही एक नजर डालें तो रोडरेज के मामलों की संख्या 5 लाख के करीब पहुंच गई है। हांलाकि यह आंकड़े 2016 के हैं पर यह भी साफ हो रहा है कि देश में इस तरह की घटनाओं की विकास दर सबसे उंची यानी की दस फीसदी तक पहुंच रही है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडू, महाराष्टÑ, मध्यप्रदेश, केरल और उत्तरप्रदेश रोडरेज की घटनाओं में अग्रणी प्रदेश हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह अपने आप में गंभीर और चिंतनीय है कि सामान्य सी बात पर बीच राह सड़क पर हंगामा हो जाता है और एक दूसरे की जान (Why The Intersection Between This Is So Fierce Anger?) लेने में कोई देरी नहीं होती। जानलेवा मारपीट आम होती जा रही है। लगता है जैसे देश में अब संवेदनशीलता और सहनशक्ति जवाब देती जा रही है और गुस्सा और केवल गुस्सा ही रह गया है। मजे की बात यह है कि इस तरह की घटनाओं के पीछे कोई बड़ा कारण या आपसी रंजिश नहीं होती। लगभग मरने और मारने वाले दोनों का ही इरादा भी इस तरह का नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">अपितु होता है तो केवल और केवल मात्र छोटी सी बात पर इस कदर गुस्से का हावी होना होता है कि दूसरे की जान तक लेने में देरी नहीं लगती। मजे की बात यहां तक है कि यह सब होता है केवल देरी से बचने के लिए। यानी की आगे वाले ने साइड नहीं दी, अचानक ब्रेक लगे और एक के बाद एक गाड़ियों का आपस में भिड़ते जाना, आगे जाम होने के कारण लगातार हार्न बजाते जाना या किसी कारण से हल्की सी टच हो जाना जैसी घटनाएं बीच चैराहे आपस में गाली-गलौच, गुत्थम गुत्थ और यहां तक कि गोली चलाकर या चाकू या अन्य हथियारों से या अन्य तरह से पीट पीट कर जान लेना सामान्य होता जा रहा है। आखिर इतना आक्रोश या यों कहें कि इतना गुस्सा या इतना उबाल क्यों? यह अपने आप में विचारणीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे अधिक मजे की बात यह है कि आज हम अपने आपको सबसे अधिक शिक्षित, समझदार, आधुनिकतम, दयाभावी कहने में नहीं हिचकते। जीव-जंतुओं तक के जीवन को बचाने के लिए आगे आने लगे हैं। सोशियल मीडिया पर तो जैैसे ज्ञान के भण्डारी ही बन गए हैं। एक से बढ़कर एक प्रवचन सूक्तियां सोशियल मीडिया पर पोस्ट होना आम होती जा रही है। यह सब होने के बाद भी बीच चौराहे जरा सी बात पर जानलेवा लड़ाई आम होती जा रही है। यहां यह साफ हो जाना चाहिए कि माव लिंचिंग या लिंचिंग तरह की घटनाओं को इससे अलग करके देखना होगा। यह तो सीधे-सीधे वह आक्रोश है जो बिना किसी सोच समझ के बीच सडक में छोटी सी बात पर विफर जाता है। आखिर इतना आक्रोश समाज में आ कैसे रहा है? लोगों की सामाजिकता कहां जाती जा रही है। मजे की बात यह कि इस तरह की घटनाओं के चश्मदीद लोग समझाइश के स्थान पर मूक दर्शक बने रह जाते हैं या फिर अब तो वीडियो बनाने में जुट जाते हैं, यह नहीं देखते कि समझा बुझाकर लड़ते हुए लोगों को अलग कर दें।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल आज हम दोहरी जिंदगी जीने लगे हैं। हमारी कथनी और करनी में अधिक अंतर आ गया है। आज हर व्यक्ति ज्ञानी होता जा रहा है। दुनिया में दूसरा कोई उससे अधिक ज्ञानवान हो ही नहीं सकता। सारी संवेदनाएं उसी में समाहित है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज के लोगों की, लोग इसलिए कह रहा हूं कि यह कमोबेस पूरे समाज की तस्वीर है और इसके लिए केवल युवाओं को ही दोष नहीं दिया जा सकता, सहनशक्ति जवाब दे गई है। गुस्से में आग बबूला होने में क्षण भर भी नहीं लगता। प्रतिस्पर्धा और मेरी कमीज दूसरे की कमीज से कम उजली क्यों की उदेड़बुन में केवल पैसा और पैसा की दौड़ में मानवीय संवेदना खोती जा रही हैं। प्रतिस्पर्धा और केवल प्रतिस्पर्धा की दौड़ में व्यक्ति आपा खोता जा रहा है। फिर संयुक्त परिवार का विघटन, एकल परिवार और उसमें भी पति पत्नी दोनों के नौकरीपेशा होने की स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। देखा जाए तो सामाजिक ताना-बाना टूटने का ही परिणाम है कि रोडरेज की घटनाएं आम होती जा रही है। व्यक्ति की अपनी कुंठाएं और आए दिन की दौड़भाग अंदर की आग को आक्रोश में बदल देती है और लोग जरा सी बात पर मरने मारने को उतारु हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बिना आगा-पीछा सोचे एक दूसरे की जान लेने में क्षण भर भी नहीं सोचते। आखिर समाज जा किस दिशा में रहा है। केवल और केवल मात्र सुख सुविधाओं की दौड़ में लगे रहे और मानवीय संवेदनाएं इसी तरह से प्रभावित होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब समाज तेजी से विघटन की और बढ़ने लगेगा। एक बात साफ हो जानी चाहिए कि समाज विज्ञानियों को अभी से गंभीरता से इस तरह की मानसिकता में बदलाव की दिशा में काम करना होगा, नहीं तो आने वाली पीढ़ी हमें किसी हालत में माफ करने वाली नहीं हैं। युवाओं के दिल में बसे आक्रोश को सही व सकारात्मक दिशा देनी होगी। समाज विज्ञानियों व बुद्धिजीवियों के चेतने का समय आ गया है और उन्हें इन स्थितियों का निराकरण आज की परिस्थितियों में ही खोजना होगा।      <strong><em>राजेन्द्र शर्मा</em></strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Jan 2019 19:42:53 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>आखिर भूख से मौत कब तक</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले साल झारखंड के गिरिडीह जिले में भूख से 45 वर्षीय मीना मुसहर की मौत हो गई। मृतक महिला अपने बेटे के साथ कचरा बीनने का काम करती थीं। पिछले चार दिन से कमाई नहीं होने के कारण भूखे रहने से महिला की मौत हो गई। गौरतलब है कि इससे पहले सिमडेगा जिले के करीमती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/after-all-till-death/article-4046"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/b.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले साल झारखंड के गिरिडीह जिले में भूख से 45 वर्षीय मीना मुसहर की मौत हो गई। मृतक महिला अपने बेटे के साथ कचरा बीनने का काम करती थीं। पिछले चार दिन से कमाई नहीं होने के कारण भूखे रहने से महिला की मौत हो गई। गौरतलब है कि इससे पहले सिमडेगा जिले के करीमती गांव में पिछले साल सितंबर में 11 वर्षीय संतोषी की भी भूख से मौत हो गई थी। दरअसल भूख से मौत हमारे मुल्क के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन यह खबर जरा ठहर कर सोचने के लायक है। इस चमकते न्यू इंडिया में जो पकवान की थाली डाइनिंग टेबल तक पहुंचाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर वे लोग ही एक निवाले के लिए क्यों तरस जाते हैं। सुनहरे विकास का दावा करने वाली और डिजिटल इंडिया का दिन-प्रतिदिन दंभ भरने वाली सरकार इन दर्दनाक मौतों पर क्यों चर्चा नहीं करती। विडंबना है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी आम आदमी रोटी के अधिकार के लिए तरस रहा है या तड़प तड़प कर अपने प्राण दे रहा है। विचारणीय है कि ‘सबका साथ-सबका विकास’ का दावा करने वाली सरकार के शासन में असमानता की खाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। वैश्विक असमानता सूचकांक में भारत इस वक्त दुनिया के 180 मुल्कों में 135वें स्थान पर है।</p>
<p style="text-align:justify;">यानी हमारे यहां ‘आर्थिक विकास’, ‘ग्रोथ रेट’ और तमाम तरह के कर-सुधारों का लाभ सबको नहीं मिल पा रहा है। कुछ लोग खूब तरक्की कर रहे हैं, जबकि बहुत सारे लोग बेहाल हो रहे हैं। इससे असमानता तेजी से बढ़ रही है। पता नहीं क्यों अपने देश के अमीर लोग इस स्थिति से तनिक भी विचलित नहीं नजर आते। वे क्यों नहीं सोचते कि दुनिया उन्हें ‘भुक्खड़ों और बर्बाद लोगों के महादेश’ का ‘अमीर’ मानती है? वे अपने इस निजी और राष्ट्रीय-अपमान से आहत क्यों नहीं होते?बेरोजगारी से त्रस्त युवा, हालातों से पस्त मजदूर, एंबुलेंस तक से महरूम अपने कंधे पर बेटे की लाश ढ़ोने को मजबूर पिता, भूख से मरी बेटियों की मां, दवाई की कमी से काल के गाल में समाने वाले बच्चे की मां, सवाल नहीं कर पाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि उनके आंखों में आंसू तो हैं लेकिन उनके पास शब्द नहीं है। साल 2030 तक भारत को भूखमुक्त करने का संकल्प लिया गया है, लेकिन क्या मौजूदा हालात के मद्देनजर ये संभव हो पाएगा। हमारे यहां सरकार ने अनाज को सस्ता करने की कोशिश तो की है लेकिन वो सस्ता अनाज गरीबों के पेट तक कैसे पहुंचेगा, वहां वो फेल हो गई है। एक सर्वे के मुताबिक देश का लगभग 20 फीसदी अनाज भंडारण क्षमता के अभाव में बेकार हो जाता है, तो अनाज का एक बड़ा हिस्सा लोगों तक पहुंचने की बजाय कुछ सरकारी गोदामों में, तो कुछ इधर-उधर अव्यवस्थित ढंग से रखने की वजह से सड़ जाता है। ऐसे में जिनके हाथ में देश का भावी भविष्य है, उनका वर्तमान काफी कमजोर, भूखा और कुपोषित है, जिसके लिए जल्द से जल्द कदम उठाने होंगे वरना कोई शक नहीं कि स्थिति बद से बदतर हो सकती।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 Jun 2018 10:10:13 +0530</pubDate>
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