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                <title>Avoid - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>दीवाली से पहले मिलावटखोरी के मार से बचें</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान वैश्विक दुनिया का आधार ही बाजार व्यवस्था पर टिका हुआ है। बाजारवाद के इस आधुनिक युग में मनुष्य अपनी दैनिक उपभोग की वस्तुओं की पूर्ति बाजार के माध्यम से करता है। हम अपने दैनिक जीवन में उपभोग योग्य खाद्य पदार्थों मसलन दूध, दही, घी, मिठाई, सब्जी, पनीर, सरसों तेल, चावल, दाल और की खरीदारी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/avoid-adulteration/article-6523"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/adulteration.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक दुनिया का आधार ही बाजार व्यवस्था पर टिका हुआ है। बाजारवाद के इस आधुनिक युग में मनुष्य अपनी दैनिक उपभोग की वस्तुओं की पूर्ति बाजार के माध्यम से करता है। हम अपने दैनिक जीवन में उपभोग योग्य खाद्य पदार्थों मसलन दूध, दही, घी, मिठाई, सब्जी, पनीर, सरसों तेल, चावल, दाल और की खरीदारी स्थानीय दुकान या फिर शहरों में अवस्थित बाजार के माध्यम से करते है। खाद्य पदार्थों के अलावा हम सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुओं साबुन, शैम्पू, हेयर आॅयल, इत्र, कास्मेटिक क्रीम की खरीददारी भी स्थानीय दुकान से करते है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक ओर मिलावटी खाद्य पदार्थ जहाँ हमारे स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते है तो वही दूसरी तरफ सौन्दर्य प्रसाधन में मिलावट से हमारा रुप बिगड़ जाता है और सुन्दर दिखने के बजाय हम और कुरुप दिखने लगते है। शैम्पू एवं हेयर आॅयल में मिलावट के कारण असमय बाल झड़ने की समस्या उत्पन्न हो जाती है तो वही साबुन और कॉस्मेटिक क्रीम में मिलावट हमारे चेहरे की चमक और सुन्दरता को बर्बाद करके छोड़ देता है। खाद्य पदार्थों में मिलावट से समाज के सभी धर्मों एवं वर्गों के उपभोक्ता बुरे तरीके से प्रभावित होते है।</p>
<p style="text-align:justify;">साधारणतया: किसी खाद्य पदार्थों को तब मिलावटी पदार्थों की श्रेणी में रखा जाता है। जिसके उपभोग मात्र से मनुष्य बीमार हो जाता है या अभीष्ट पदार्थ का पोषक तत्व समाप्त होता है या पोषक तत्वों में बड़ी मात्रा में कमी आ जाती है। किसी खाद्य पदार्थ या अन्य जनोपयोगी वस्तुओं में मिलावट के मुख्य दो ही कारण होते है। पहली अवस्था में दुकानदार अधिकतम लाभ कमाने के लोभ से वस्तुओं में मिलावट करता है तो वही मिलावट करने की दूसरी अवस्था तब उत्पन्न होती है, जब बाजार में मांग की मात्रा पूर्ति से अधिक हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, दोनों अवस्था में मिलावटखोरों का एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना ही होता है। खाद्य पदार्थों में समान्यतया तीन तरह से मिलावट की जाती है। पहला, वे चीजें जिसका इस्तेमाल इंसानों के लिए खतरनाक है। दूसरा, किसी समान में उससे कम कीमत या गुणवत्ता वाले पदार्थ का मिलाया जाना। तीसरा , ऐसी चीजों को मिलाना जो पूरी तरह या आंशिक रुप से उस पदार्थ के बहुमूल्य पोषक तत्वों को कम कर दें। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत मे सबसे ज्यादा मिलावट दूध, खाने के तेल, घी, चीनी, शहद और मसालों में की जाती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि देश में बेचे जाने वाले 68.7 फीसद दूध और दूध से बने सामान में मिलावट पाई गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि भारत में सरसों तेल का उत्पादन उसके उपभोग के स्तर से कम है। सरसों तेल को उपभोग स्तर तक पहुंचाने के उद्देश्य से सरसों तेल में व्यापक स्तर पर आजीमोन नामक खतरनाक रसायन की मिलावट की जाती है। खतरनाक रसायन आजीमोन मिलावट युक्त सरसों के तेल के उपयोग से कई तरह की गंभीर बीमारियों का खतरा है। मिलावटखोरी की गंभीर समस्या से भारत को रु-ब-रु कराते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि 2025 तक भारत के 87 फीसद लोगों को मिलावटी खाना खानें के कारण गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। मिलावटी खाना का सेवन करने से कई तरह की बीमारियों का शिकार मनुष्यों को होना पड़ रहा है। लिवर, पेट में गड़बड़ी, कैंसर, उल्टी, दस्त, जोड़ों में दर्द, ह्दय संबंधी परेशानियाँ एवं फूड प्वाइजनिंग की जड़ मिलावट युक्त खाद्य पदार्थ ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मिलावटी खाना खाने की वजह से कई बार महिलाओं का गर्भपात हो जाता है। इसके अलावा , मानव मस्तिष्क को भी नुकसान पहुंचता है। जो बच्चे लंबे समय तक मिलावटी खानें का सेवन करते है, उनकी सोचने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। इसके बाद नवम्बर, 2014 में मिलावटी दूध पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को फटकार लगाई। कोर्ट ने एकबार फिर राज्यों से कानून में संशोधन या नया कानून लाए जाने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत नें मिलावट खोरी के सवाल पर सरकार से पूछा था कि सरकार मिलावटखोरी के अपराध के लिए उम्रकैद की सजा का प्रावधान लाने के बारे में सोच रही है या नहीं? लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कोई जवाब देना उचित नहीं समझा।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर अगस्त, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने मिलावट को गंभीर मुद्दा बताते हुए राज्य सरकारों को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006 को प्रभावी तरीके से लागु करने के निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट के बार बार निर्देश देने के बावजूद सरकार ने मिलावटखोरी जैसे अति संवेदनशील मुद्दे को अपने एजेंडे से बाहर रखा है। होना तो यह चाहिए था कि खाद्य मानकों से छेड़छाड़ या मिलावट करने वाले या गुणवत्ता में कोताही बरतने वालों को आतंकवादियों जैसी ही सजा मिलनी चाहिए। आखिर वे लोगों की जिदंगी से खिलवाड़ करते हैं और अपने स्वार्थ को साधने के लिए खाने- पीने की वस्तुओं को जरिया बनाते है। मिलावटखोर भी अपना स्वार्थ साधने के लिए पूरे समाज को वैसे ही नुकसान पहुंचाते है, जैसे कोई आतंकवादी। अत: आतंकवादियों एवं मिलावटखोरों के सजा की प्रकृति एक समान होनी चाहिए</p>
<p style="text-align:justify;">यह समय की मांग है कि हम सभी को मिलकर ईमानदारीपूर्वक मिलावटखोरी के खिलाफ जंग छेड़ना होगा। हमें दुनिया के विकसित देशों से प्रेरणा लेकर मिलावटखोरी के खिलाफ सख्त कानून बनाने होंगे। अमेरिका और यूरोप के अन्य देशों में यह व्यवस्था है कि वहाँ अगर किसी कंपनी के सामान पर मिलावट की आंशका होती है तो उसे तब तक के लिए बैन कर दिया जाता है, जबतक कि उसे क्लीन चिट न मिल जाए। भारत में इसी तरह का कानून बनाए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावे हम सभी को जागरुक होकर वैसे होटल, रेस्टॉरेंट और दुकानदार का सार्वजनिक बहिष्कार करना चाहिए, जहाँ थोड़ा भी मिलावट की आशंका दिखे। जबतक मिलावटखोरी के कालाबाजार को नेस्तनाबूद नहीं किया जाता, तब तक विश्व की महाशक्ति एवं विश्वगुरु बनने का हमारा सपना मृगमरीचिका के ही जैसे रहेगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>कुन्दन कुमार</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 31 Oct 2018 08:38:23 +0530</pubDate>
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                <title>समय का मोल पहचानें, शक्ति क्षरण से बचें</title>
                                    <description><![CDATA[डॉ. दीपक आचार्य व्यक्ति की अपनी पूरी जिन्दगी में 50 फीसदी से ज्यादा वह समय होता है जिसको वह फालतू के कामों और बेकार की सोच में गंवा देता है। जो व्यक्ति जीने का अर्थ समझते हैं वे हर क्षण को कीमती मानकर उसका पूरा उपयोग करने की कला में पारंगत हो जाते हैं और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/identify-the-value-of-time-avoid-power-degradation/article-4073"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/time-1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>डॉ. दीपक आचार्य</strong></p>
<p style="text-align:justify;">व्यक्ति की अपनी पूरी जिन्दगी में 50 फीसदी से ज्यादा वह समय होता है जिसको वह फालतू के कामों और बेकार की सोच में गंवा देता है। जो व्यक्ति जीने का अर्थ समझते हैं वे हर क्षण को कीमती मानकर उसका पूरा उपयोग करने की कला में पारंगत हो जाते हैं और जीवन में सफलता के झण्डे गाड़ते हुए मार्गदर्शी और प्रेरणा पुंज बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या 90 फीसदी से अधिक है जिनका ज्यादातर समय अनुपलब्धिमूलक और निरर्थक गुजर जाता है। इनमें से भी अधिकांश समय सोने, बेवजह बोलने अर्थात बकवास करने और सुनने में गुजर जाता है। हम इतना अधिक बोलते और सुनते हैं जिसकी हमें आवश्यकता ही नहीं होती मगर बोलना और सुनना तथा फालतू के कामों में रमे रहना आदमी की फितरत में सर्वोपरि होता है और ऐसे में उसे वे सारे काम बेकार लगते हैं जो इनके सिवा हैं।ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बेजा इस्तेमाल से इनकी कार्यक्षमता का ह्रास होता है तथा जीवन की पूणार्यु तक पहुँचते-पहुँचते ये जवाब देने लग जाती हैं जबकि इनका सही और युक्तिपूर्वक इस्तेमाल किया जाए तो आजीवन इनकी क्षमता बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हर व्यक्ति के जीवन में 70 फीसदी समय ऐसा होता है जिसके बारे में यदि वह जान ले तो निहाल हो जाए, मगर अधिकतर लोगों में न जानने की जिज्ञासा होती है न कुछ कर पाने की ललक। बहुत सारे लोग पशुओं की तरह ही जीते हैं। इनके लिए जिन्दगी केवल खाने-पीने और सोने तक ही सीमित रहा करती है। इसके अलावा उनके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है।और इस खान-पान और अपने-पराये के चक्कर में अधिकांश लोग अपनी सारी नैतिकता और मानवीय मूल्यों को भुला देते हैं। जो समय हमारे सामने है उसके बारे में जानकर पूरा-पूरा उपयोग कर लिया जाए तो हमारी जिन्दगी सुनहरी रश्मियों से भरी-पूरी रह सकती है और इसका लाभ न सिर्फ हमें, बल्कि उन सभी को प्राप्त होता है जो हमारे सम्पर्क में एक बार भी आ जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन मेंं आने वाले ऐसे तमाम अवसरों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। इन अवसरों को शक्ति संचय का माध्यम बनाकर हम दुनिया में चाहें जो कर सकने का सामर्थ्य पा सकते हैं। बात चाहे सफर की हो, कहीं प्रतीक्षा की हो या उन क्षणों की जब हमारे पास कोई दूसरा काम न हो। इन अवसरोंं पर आत्मचिन्तन करें और उनका रचनात्मक प्रवृत्तियों के लिए उपयोग करें। कई बार बैठकों, सभाओं और समारोहों का देरी से शुरू होना, बस या रेल विलम्ब से आना, कहीं काम के लिए जाने पर लम्बे समय तक प्रतीक्षा करते रहने की विवशता या और कोई ऐसा समय, जिसके बारे में हमें यह कहना पड़ता है कि समय काट रहे हैं या प्रतीक्षा कर रहे हैंं, इसका उपयोग अपने हक में शक्ति संचय के लिए अवश्य हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन में सफर के अवसर हों या कहीं भी किसी काम के लिए प्रतीक्षा की विवशता, इन क्षणों में कुढ़े नहीं, न ही रंज या खीज निकालें। इन अवसरों का महत्त्व समझें और इनका दोहन करें। कुछ नहीं तो इन क्षणों को साधना का माध्यम बनाएँ और जिस किसी भगवान या ईष्ट में रुचि हो, उनके किसी छोटे से मंत्र का मन ही मन लगातार जप करते रहें। यों तो आम आदमी घर-गृहस्थी के फण्डों में घनचक्कर होने की वजह से साधना या ईश्वर स्मरण के लिए समय नहीं निकाल पाता है लेकिन सफर और प्रतीक्षा ये दो ऐसे सुअवसर पर हैं जिनका सदुपयोग किया जाना संभव है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन क्षणों में हरि स्मरण का फायदा यह होगा कि हम फालतू की चर्चाओं, निन्दा और आलोचनाओंं आदि से दूर रह पाएंगे और दूसरा ईश्वरीय ऊर्जा लगातार संग्रहित होनी शुरू हो जाएगी जिसका लाभ हमें पूरी जिन्दगी अपने आप प्राप्त होता रहता है। केवल इन्हीं क्षणों का ईमानदारी के साथ ईश्वर स्मरण मात्र में ही उपयोग कर लिया जाए तो सिद्धि और सफलता में ये खूब मददगार हो सकते हैं, यह कई साधकों का अनुभव है। इसी प्रकार स्वाध्याय, स्वास्थ्य लाभ की मुद्राएं और विद्वजनों से सत्संग या चर्चा भी की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ नहीं तो इन क्षणों में उद्विग्न हुए बिना निर्विचार की स्थिति लाने का प्रयास करें। यदि कोई भी व्यक्ति मात्र पाँच-दस मिनट के लिए भी निर्विचार हो जाए तो उसे असीम मानसिक शांति का अहसास होगा। यह भी अनुभूत है। ये भी न कर पाएँ तो अपनी रुचि के कामों का चिन्तन करें और इनसे संबंधित गतिविधियों के बारे में चर्चा करें या व्यवहार में लाएं। इससे भी बौद्धिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक बल बढ़ने लगता है। इससे शरीर ऊब और थकान से भी दूर रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़े-बड़े लोग जिनका अधिकांश समय सफर में गुजरता है वे इसी प्रकार साधना से सिद्धि प्राप्त करने का मार्ग खोज लेते हैं। जबकि ऐसा नहीं करने वाले लोग प्रतीक्षा करते-करते इतना थक जाते हैं कि उन्हें हर थोड़ी-थोड़ी देर में उबासियाँ आनी शुरू हो जाती है, बार-बार झल्ला उठते हैं और प्रतीक्षा के अंत न होने की बात कहते हुए खिसियाते रहते हैं। ये स्थितियां मनुष्य को कमजोर ही करती हैं और इससे चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है जो अन्ततोगत्वा किसी न किसी तनाव और बीमारी को जन्म देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सारी स्थितियों से बचने का एकमात्र यही उपाय है कि जहाँ कहीं प्रतीक्षा करनी पड़े, लम्बा सफर हो तथा हमारे पास कोई काम नहीं हो तब इसी प्रकार की साधना करें। छोटे-छोटे समय का दोहन करते हुए शक्ति संचय की आदत पड़ जाने पर हम किसी भी परिस्थिति में कहीं भी रहें, न कभी तनाव होगा, न खीज या गुस्से की स्थिति आएगी। बल्कि ऐसे मौके जब भी आएंगे, आनंद देंगे। समय का अपने हक में इस्तेमाल कर लेने की कला सीख जाने पर जीवन के कई सारे आनंद बहुगुणित हो जाते हैं और इसी से व्यक्तित्व की सफलता को मिलने लगती हैं ऊंचाइयां।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Jun 2018 09:00:09 +0530</pubDate>
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