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                <title>छोटी उम्र जोखिमों से खेल सेवा की मिसाल बनी ‘परीकुल’</title>
                                    <description><![CDATA[जोखिम भरे काम करना उनकी आदत में शुमार है। उम्र चाहे छोटी हो, लेकिन उसने हौंसले के साथ जो काम अब तक किये हैं, वे काम बड़े-बड़े नहीं कर पाते। गणतंत्र दिवस से पूर्व उन्हें राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार-2020 से सम्मानित किया जाएगा।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/parikuls-bravery-amazing-valor-at-just-13-years-old/article-12513"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/parikul.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">मात्र 13 साल की उम्र में वीरता, शौर्य का अद्भूत ज़ज्बा (Parikul)</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3>तीन साल से केदारनाथ यात्रा में दे रही मेडिकल सेवाएं</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजय मेहरा/सच कहूँ गुरुग्राम/झज्जर।</strong> परींदों को मिलेगी मंजिल यकीनन-ये फैले हुये उनके पर (पंख) बोलते हैं, वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर-जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं। ऐसे ही हुनर की मल्लिका हैं परीकुल (Parikul) । जोखिम भरे काम करना उनकी आदत में शुमार है। उम्र चाहे छोटी हो, लेकिन उसने हौंसले के साथ जो काम अब तक किये हैं, वे काम बड़े-बड़े नहीं कर पाते। गणतंत्र दिवस से पूर्व उन्हें राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार-2020 से सम्मानित किया जाएगा। मूलरूप से झज्जर जिला के गांव खरहर की रहने वाली मात्र 13 साल की नौवीं कक्षा की छात्रा परीकुल भारद्वाज समाज में नेतृत्व, प्रेरणा तथा ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों में दी जाने वाली निस्वार्थ सेवाओं का एक जीवंत उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">परीकुल भारद्वाज को ऊंचे पर्वतों पर किसी की जान बचाने के लिए गहन प्रशिक्षण हासिल है। परीकुल ने यह प्रशिक्षण इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी), राष्ट्रीय आपदा एवं बचाव प्रबंधन (एनडीआरएफ) और वायु सेना के संयुक्त तत्वावधान में मिला है। वे अत्याधिक ऊंचाईयों पर अपनी गतिविधियों द्वारा समाजहित में योगदान देने वाली, लोगों की जान बचाने के लिए कार्य करने वाली सबसे कम उम्र के पहली लड़की है। उसने समाज के प्रति असाधारण, साहस, बहादुरी भरे काम अपने जुनून और समर्पित सेवा भाव के साथ किये हैं। वह बिना किसी वर्ग, पंथ, धर्म या जाति की परवाह किये उच्च शिखरों पर अपनी स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">केदारनाथ तीर्थ यात्रियों को हर साल देती है मेडिकल सेवा</h3>
<p style="text-align:justify;">जिन गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे और अभिभावक खेल-कूद समेत घूमने-फिरने की योजना बनाते हैं, उस समय में परीकुल भारद्वाज अपनी सेवा भावना के साथ पहुंच जाती है केदारनाथ यात्रा में। परीकुल लगातार वर्ष 2017, 2018 और 2019 से ग्रीष्मावकाश के दौरान हिमालय की ऊंची चोटियों पर नि:स्वार्थ रूप से 45 दिनों तक केदारनाथ यात्रियों को 14000 फीट पर माइनस 7 डिग्री तापमान में चिकित्सा सेवाएं देती आ रही हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बर्फीली हवाओं के बीच बीमारों की बचाई जान</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;"> 2 जून 2019 को 14000 फीट की ऊंचाई पर अचानक बर्फीली हवायें चली ।</li>
<li style="text-align:justify;"> तूफान आया तो परिकुल भारद्वाज ने वहां बीमार पड़े लोगों की जान बचाकर साहसिक कार्य किया।</li>
<li style="text-align:justify;">परीकुल ने ऐसी अवस्था में मरीजों को केदारनाथ स्थित सिक्स सिग्मा के शिविर तक पहुंचाया।</li>
<li style="text-align:justify;">इस तरह से आपदा के समय भी परीकुल पहुंचती हैं और लोगों की सहायता करती हैं।</li>
</ul>
<h3>राष्ट्रपति करेंगे परीकुल को सम्मानित</h3>
<p>राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 22 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार-2020 देकर सम्मानित करेंगे। सम्मान स्वरूप मेडल, एक लाख रुपये की राशि, 10 हजार रुपये का बुक वाउचर और सर्टिफिकेट दिया जायेगा। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार-2020 सूची में नाम आने पर खुशी जाहिर करते हुए परीकुल के पिता डॉ. प्रदीप भारद्वाज ने कहा कि बेटी परिकुल सामाजिक कार्यों के लिए हमेशा आगे रहती है। यह अवार्ड एक अच्छे विचार व संस्कार का रिजल्ट है। इस क्षेत्र में परीकुल को लाने के पीछे डॉ. प्रदीप का तर्क है कि आज कल बच्चे टीवी, मोबाइल आदि में इतने व्यस्त हो रहे हैं कि उन्हें सामाजिक सेवाओं से कोई सरोकार नहीं रह गया है। वे चाहते थे कि उनकी बेटी इन सब चीजों से दूर रहकर समाज के लिए कुछ करे। उन्हें खुशी है कि जो सोचा वह हो रहा है। बेटी परिवार ही नहीं देश का मान बढ़ा रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अब तक मिले सम्मान व पुरस्कार</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>थलसेनाध्यक्ष द्वारा सराहना</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>इंडिया बुक आॅफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>विश्व के सर्वश्रेष्ठ 100 रिकॉर्ड धारकों में से एक</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सिक्स सिग्मा द्वारा प्रदत्त हाई अल्टिट्यूड अवॉर्ड</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jan 2020 19:18:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बजट महज खानापूर्ति न हो</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्र की एनडीए सरकार अंतिम वर्ष का अंतरिम बजट पेश करेगी। किसान, शहरी व मध्यम वर्ग से लेकर मजदूर तक सरकार से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बढ़ रही महंगाई, घट रहा रोजगार, धीमी गति से चल रहे उद्योग इत्यादि ऐसे मुद्दे हैं जिससे देश की आर्थिकता में बाधा उत्पन्न हुई है। दरअसल सरकारों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">केंद्र की एनडीए सरकार अंतिम वर्ष का अंतरिम बजट पेश करेगी। किसान, शहरी व मध्यम वर्ग से लेकर मजदूर तक सरकार से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बढ़ रही महंगाई, घट रहा रोजगार, धीमी गति से चल रहे उद्योग इत्यादि ऐसे मुद्दे हैं जिससे देश की आर्थिकता में बाधा उत्पन्न हुई है। दरअसल सरकारों का बजट पेश करने का एक फैशन बन गया कि न कोई नया टैक्स लगाओ और न ही पुराने टैक्स बढ़ाओ। सरकार अपनी पूरी ऊर्जा टैक्स वृद्धि के बाद विरोध से बचने पर लगा देती है, जिस कारण सरकार आंकड़ों के हेरफेर से जनता व विपक्ष को उलझाना चाहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले चार वर्षों में किसानों, मजदूर व गरीबों के लिए कोई राहत नहीं मिली, जिससे सीधा जनता को लाभ हो दूसरी तरफ बजट से आगे-पीछे ऐसे फैसले लिए जाते, जो सरकार की अपनी नीतियों के खिलाफ होते हैं। ताजा निर्णय उच्च वर्ग के पिछड़ों को आरक्षण का है, जिसमें 8 लाख से कम वार्षिक आमदन वाले व्यक्ति को पिछड़ा माना गया है। इस हिसाब से 5-7 लाख की आमदन वाले कर्मचारी को आमदन कर के दायरे से बाहर करना चाहिए। सरकार का अपना निर्णय ही इस बार मुश्किल बन सकता है। एक देश में दो नियम नहीं चल सकते। कर्मचारी वर्ग को बढ़ रही महंगाई के बावजूद आमदन कर में कोई राहत नहीं मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार मामूली सी राहत घुमा-फिरा कर देती है। तीन लाख के करीब प्रति माह वेतन और भत्ते लेने वाले सांसदों द्वारा वेतन में वृद्धि की मांग की जा रही है, तो 40-50 हजार रुपए लेने वाले कर्मचारी के वेतन में टैक्स कटौती क्यों? जहां तक कृषि का संबंध है, सरकार ही यह बात कहती है कि कृषि लागत खर्च बढ़ रहे हैं। कृषि मामलों पर मंथन करने के लिए बनाई गई समितियों पर अरबों रुपए खर्च होते हैं और यह खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद किसानों को कोई राहत नहीं मिली। सरकार अपने ही चुनावी मैनीफैस्टो में स्वामीनाथन आयोग की सिफारशें लागू करने का वायदा करती है फिर खुद ही हल्फिया बयान देकर असमर्थता व्यक्त करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जनता पिस रही है। राजनैतिक नेताओं की जायदाद दिनों दिन बढ़ रही हैं। उद्योग संबंधी नीतियां भी खत्म होने की कगार पर हैं। रोजगार के नाम पर अमीर वर्ग के लोग कर्जे ले रहे हैं, दूसरी तरफ बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है। कर्ज लेकर विदेश फरार होने का सिलसिला जारी है, जिससे देश में आर्थिक संकट गहरा गया है। बजट महज खानापूर्ति बनकर न रह जाए, इसीलिए लोग हितैषी, अर्थ शास्त्रीय व स्पष्ट नजरिए की जरूरत है। सरकार बजट से देश के विकास की तस्वीर खींच सकती है। देश का पैसा लूटने वालों पर लगाम कसी जाए और किसानों, मजदूरों, गरीबों को भीख की नहीं, बल्कि सहायता की जरूरत है। बजट में सरकार को जिम्मेवारी का एहसास होना चाहिए।</p>
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                <pubDate>Wed, 30 Jan 2019 20:02:57 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकतंत्र सिर्फ बड़ों का खेल नहीं है</title>
                                    <description><![CDATA[लोकतंत्र (Democracy is not just a game of elders) का मतलब केवल चुनाव सरकार के गठन या शासन से नहीं है लोकतंत्र की परिभाषा इससे व्यापक है जिसमें राज्य समाज और परिवार सहित हर प्रकार के समूह पर सामूहिक निर्णय का सिद्धांत लागू होता है। केवल राज्य के स्तर पर लोकतंत्र के लागू होने से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/democracy-is-not-just-a-game-of-elders/article-6861"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/vote-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लोकतंत्र<strong> (Democracy is not just a game of elders)</strong> का मतलब केवल चुनाव सरकार के गठन या शासन से नहीं है लोकतंत्र की परिभाषा इससे व्यापक है जिसमें राज्य समाज और परिवार सहित हर प्रकार के समूह पर सामूहिक निर्णय का सिद्धांत लागू होता है। केवल राज्य के स्तर पर लोकतंत्र के लागू होने से हम लोकतान्त्रिक नहीं हो जायेंगें इसे सामाज के अन्य संगठनों पर लागू करना भी उतना ही जरूरी है। इस सम्बन्ध में डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी चेताया था कि भारत सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र न रहे बल्कि यह सामाजिक लोकतंत्र का भी विकास करे। सहभागिता लोकतंत्र का मूल तत्त्व है लेकिन हमारे यहां इसे मतदान तक ही सीमित कर दिया गया है, चुनाव के दौरान हम अपने प्रतिनिधियों को चुनते तो हैं लेकिन इसके बाद अपना नियंत्रण खो देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां चुनाव और मतदान का आधार भी लोगों के वास्तविक जीवन से जुड़े मुद्दे नहीं होते हैं बल्कि यहां मुख्य रूप से ऐसे भावनात्मक और प्रतिगामी मुद्दे हावी होते हैं जिनका लोकतान्त्रिक मूल्यों से कोई मेल नहीं होता अलबत्ता कई मामलों में तो ये न्याय समानता और बंधुत्व जैसे हमारे संविधान के बुनियादी मूल्यों की धजियां उड़ाते दिखाई पड़ते हैं। शायद लोकतंत्र कि अपनी इसी समझ के कारण हम इसे बच्चों का खेल नहीं समझते हैं। भारतीय संविधान सभी बच्चों को कुछ खास अधिकार प्रदान करता है जिसके तहत बच्चों को सही ढंग से पालन पोषण आजादी इज्जत के साथ बराबरी अवसर व सुविधाएं पाने का अधिकार है। हालांकि 18 साल की उम्र से पहले वे वोट नहीं डाल सकते हैं लेकिन इससे एक नागरिक के तौर पर उनकी महत्वता कम नहीं हो जाती है हमारा संविधान बच्चों को वे सारे अधिकार भी देता है जो भारत का नागरिक होने के नाते किसी भी बालिग स्त्री पुरुष को दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समाज के तौर पर हमारे बीच यह समझ जरूरी है कि हम बच्चों को भी एक ऐसी स्वंतंत्र इकाई के तौर पर स्वीकार करें जिनकी खुद सोच सकते हैं उनकी अपनी एक राय हो सकती है वे निर्णय भी ले सकते हैं और किसी भी विषय पर अपनी उम्र के हिसाब से उनका अपना स्वतंत्र मूल्यांकन भी हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन सीआरसी में भी बच्चे की सोच का सम्मान करने और उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने की बात की गयी है। लेकिन दुर्भाग्य से हम बच्चों के सोचने विचारने और उनकी खुद को अभिव्यक्त करने कि उनकी क्षमता को लेकर हम जागरूक नहीं हैं इसके बदले हम इस बात पर यकीन करते हैं कि बच्चों में इतनी क्षमता नहीं होती है कि वे अपने बारे में सोच सकें या खुद की राय बना सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">हम चाहते हैं कि बच्चे हमारे द्वारा निर्धारित किये गये सांचे के अनुसार ढल जायें, परिवार और समाज में उनकी अभियक्ति को लेकर हम निरंकुश हैं और कभी कभी इससे असुरक्षित भी महसूस करते हैं। जबकि हकीकत ये है कि हर बच्चे का अपना एक खास व्यक्तित्व होता है और कई बार उनकी मौलिकता हमें एक नयी दिशा दे सकती है। यदि हम बच्चों के विचरों नजरिये और मैलिकता पर यकीन करेंगें तो इससे हमारी दुनिया ज्यादा बेहतर होगी। बच्चे को हमेशा से ही बड़ों का आदर करने कि सीख दी जाती है लेकिन इस सीख को रिवर्स करके बड़ों को इसे खुद पर भी लागू करने कि जरूरत है बड़ो को भी बच्चों के साथ उतने ही आदर सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिये जितना कि वे खुद के लिये बच्चों से उम्मीद करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बाल सहभागिता का अर्थ है बच्चों से सम्बंधित मसलों और निर्।ायों में बच्चों को शामिल करना यह एक प्रक्रिया है जिसमें बच्चों को जरूरी जानकारी देनाए उनके विचारों को अहमियत देना उन्हें इसे व्यक्त करने का मौका देनाए उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुननाए और उन्हें प्रभावित करने वाले निर्णयों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल करना है। दुर्भाग्य से हमारे समाज में बच्चों की सोच के लिये कोई मूल्य है इसलिये हमारे जैसे देशों में बाल सहभागिता को लेकर लोगों की सोच में बदलाव से करने की जरूरत है जिससे यह कवायद महज महज दिखावटी और कागजी बनकर ना रह जाये।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें यह समझना होगा कि अगर बच्चों को मौका मिले तो वे खुद को अपनी पूरी स्वाभिकता और सरलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। उनकी यह मौलाकिता बहुमूल्य है जो हमारी इस दुनिया को और खूबसरत बना सकती है। बच्चे भले ही वोटर ना हों लेकिन वे इस मुल्क के वर्तमान बाशिंदे जरूर हैं उन्हें इसी नजरिये से देखने की जरूरत है। लोकतंत्र को लेकर हम बड़ों की समझ भले ही ही सीमित हो लेकिन वास्तव में इसका दायरा इतना व्यापक है कि इसमें इसमें परिवार स्कूल बच्चे और समाज के सभी संगठन शामिल है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>जावेद अनीस</strong></p>
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                <pubDate>Sat, 08 Dec 2018 08:27:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिर्फ अपने नहीं बल्कि देश के लिए भी जीएं</title>
                                    <description><![CDATA[हरि शंकर आचार्य बीकानेर के लक्ष्मण मोदी के प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे झुग्गी-झोंपड़ियों में बीतते हैं। इस दौरान वे बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें व्यक्तित्व निर्माण के गुर सिखाते हैं। मोदी सप्ताह में एक बार इन बच्चों को अपने घर ले जाते हैं। उन्हें टीवी दिखाते हैं। कम्प्यूटर और लेपटॉप चलाना सिखाते हैं। एक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/live-not-just-for-yourself-but-for-the-country/article-4074"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/life1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>हरि शंकर आचार्य</strong></p>
<p style="text-align:justify;">बीकानेर के लक्ष्मण मोदी के प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे झुग्गी-झोंपड़ियों में बीतते हैं। इस दौरान वे बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें व्यक्तित्व निर्माण के गुर सिखाते हैं। मोदी सप्ताह में एक बार इन बच्चों को अपने घर ले जाते हैं। उन्हें टीवी दिखाते हैं। कम्प्यूटर और लेपटॉप चलाना सिखाते हैं। एक महीने में एक बार विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों और शिक्षण संस्थाओं का भ्रमण करवाते हैं। बच्चों में राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा हो सकें, इसके दृष्टिगत इन बच्चों के साथ सार्वजनिक स्थानों पर लगे अवैध पोस्टर-हॉर्डिंग हटाते हैं। सफाई अभियान चलाते हैं और पॉलीथीन के दुरूपयोग के बारे में बताते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अभावों में जी रहे इन लोगों तथा इक्कीसवीं सदी में मुख्यधारा से वंचित इन बच्चों को देखकर उनके मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा हुई। इसी भाव के साथ वे इस बस्ती में पहुंचे। एक चौपहिया वाहन अपनी ओर आते देख बच्चों ने उसे घेर लिया। मोदी उतरे और उनके हाथों मे कुछ नहीं था, तो एक बारगी बच्चे निराश हो गए। बच्चों को लगा जैसे हर कोई उनकी गरीबी और असमर्थता को देखकर उन्हें आर्थिक सहायता और कुछ सामान दे जाते हैं, मोदी भी उसी ध्येय से आए होंगे, लेकिन मोदी ने कहा वे बच्चों को पढ़ाने आए हैं। यह सुनकर भी उनके मन में कोई उत्सुकता देखने को नहीं मिली, क्योंकि वे इससे पहले भी ऐसे दावे देख चुके थे। लेकिन मोदी मानो ‘धुन के धनी’ थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने अगले ही दिन से वहां क्लास लगानी शुरू कर दी। पांच बच्चों से शुरू हुआ यह सिलसिला 28 तक पहुंच गया। उनकी लगन देखकर बच्चों के अभिभावकों ने पढ़ाई के लिए एक झोंपड़ी बना दी। अब मोदी प्रतिदिन यहां आते और उन्हें पढ़ाते। पढ़ाई के साथ वे बच्चों को सिखाते, अभिवादन का सलीका और शरीर को साफ-सुथरा रखने की कला। पांच-छह महीनों में ही इन बच्चों को अक्षर ज्ञान हो गया। अब इन बच्चों का दाखिला पास के एक सरकारी स्कूल में करवा दिया गया और भामाशाहों के सहयोग से स्कूल डेज्स, बस्ते और कॉपियां भी आ गईं। फिर इन बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूटर भी लगा दिया गया। मोदी इन बच्चों को अपने घर ले जाते। वहां भी एक क्लास-रूम बन गया।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चे यू-ट्यूब पर कार्टून और बच्चों की फिल्मे देखते। इन्होंने सैनिक स्कूल का भ्रमण किया। योग और प्राणायाम सीखा। साथ ही सीखा स्वावलम्बी बनकर जीने का तरीका। मोदी का जुनून यहां भी नहीं रुका। अब मोदी इन बच्चों को शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर ले जाते हैं। इन स्थलों के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में बताते हैं। प्रमुख सर्किलों और ऐतिहासिक भवनों पर लोगों द्वारा पोस्टर एवं हॉर्डिंग लगाकर इनकी सुंदरता को बिगाड़ दिया जाता, तो मोदी खुद भी इनकी सफाई करते और बच्चों से भी करवाते हैं। पिछले दो-ढाई सालों में मोदी इन बच्चों के साथ परिजन की तरह जुड़ चुके हैं। इस दौरान बच्चों के व्यवहार और रहन-सहन के सलीके में भी आमूलचूल परिवर्तन आ गया है। अब ये बच्चे किसी के सामने भीख के लिए हाथ नहीं फैलाते। झोपड़ियों में आने वालों को बेवजह परेशान नहीं करते।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कुछ समय पूर्व जो छोटा सा सपना देखा, वह आज साकार होने की ओर अग्रसर है। इसके लिए मोदी को किसी ने प्रेरित नहीं किया, बल्कि उनके दिल में इसके प्रति संवेदनशीलता की भावना जगी। ऐसा करना मोदी के लिए जरूरी नहीं था और वह भी आम चलन की भांति इन झोपड़ियों और इनमें रहने वाले लोगों के प्रति हीन भावना या क्षणिक संवेदना जताकर भूल सकते थे, लेकिन इन्होंने समाज को कुछ देने का मन बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक संकल्प लिया और इसे पूरा करने में जुट गए। भविष्य में यदि इनमें से एक या दो बच्चे भी अच्छा मुकाम हासिल कर लेंगे तो उनके मन में सदैव मोदी के प्रति कृतज्ञता का भाव रहेगा, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। तो इस ‘संडे का फंडा’ यह है कि हमें सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि देश और समाज को कुछ देने के जुनून के साथ जीना चाहिए। इस दिशा में किए गए हमारे छोटे-छोटे प्रयास पिछड़े लोगों को मुख्यधारा से जोड़ देते हैं और यह देश को विकास के पथ पर ले जाने में सूक्ष्म लेकिन ठोस भूमिका निभाते हैं।</p>
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                <pubDate>Sun, 10 Jun 2018 09:06:06 +0530</pubDate>
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