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                <title>विज्ञान लाभदायक यदि इसे माना भी जाए</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले एक महीने से देश के अलग-अलग राज्यों में आंधी तूफान से भारी नुकसान हुआ। इस दौरान 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। मौसम विभाग की तरफ से अलर्ट जारी करने के बाद जहां नुकसान कम हुआ है वहीं प्रशासन समय अनुसार लोगों को सूचित करने व जरूरी प्रबंध करने में भी कामयाब […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/science-is-profitable-if-it-is-considered/article-4094"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/77-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले एक महीने से देश के अलग-अलग राज्यों में आंधी तूफान से भारी नुकसान हुआ। इस दौरान 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। मौसम विभाग की तरफ से अलर्ट जारी करने के बाद जहां नुकसान कम हुआ है वहीं प्रशासन समय अनुसार लोगों को सूचित करने व जरूरी प्रबंध करने में भी कामयाब हुआ है। विशेष तौर पर मुंबई प्रशासन ने भारी वर्षा के मद्देनजर पूरी चौकसी रखी है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिक जानकारी फायदेमंद साबित हुई है। विज्ञान खोजों के मुताबिक उन गलतियों को भी सुधारने का प्रयास होना चाहिए, जिन कारणों से प्राकृतिक मुसीबतों में लगातार वृद्धि हो रही है। विज्ञान के अनुसार मनुष्य का प्रकृति में अंधाधुंध दखल प्रकृति का संतुलन बिगाड़ रहा है, जिससे वातावरण में अनचाहा बदलाव आ रहा है। बढ़ती आबादी और सड़क निर्माण के लिए करोड़ों वृक्ष काटे जा रहे हैं। नई सड़कें प्रगति और रफ्तार को पंख लगा रही हैं लेकिन ये सड़कें वातावरण के घात की तरफ भी इशारा कर रही हैं। जितने वृक्ष उखाड़े गए उससे ज्यादा गिनती में पौधे लगाए जाने चाहिए। बढ़ रही गर्मी के कारण वर्षा का संतुलन बिगड़ रहा है। देश का एक हिस्सा तप रहा है वहीं दूसरी तरफ बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है। पहाड़ी जंगल घट रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कारखानों के दूषित जल का सही निपटान नहीं हुआ और यह पानी नदियों के पानी को दूषित कर रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। आज विज्ञान का युग है पर विज्ञान के फ ायदे ले रहा प्रशासन और मनुष्य विज्ञान की ही चेतावनियों को मानने को तैयार नहीं है। प्रशासन वातावरण के प्रति लापारवाह है और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को प्रशासन की खिंचाई करनी पड़ रही है। केन्द्र और राज्य सरकार के अपने-अपने पर्यावरण विभाग और प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड हैं जो प्रशासनिक चक्र व्यूह में सफेद हाथी बन कर रह गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतीयों से निपटने का सामर्थ्य बढ़ाने के साथ प्रकृति के क्रोध को शांत करने की आवश्यकता है, जो मनुष्य की गलतियों का परिणाम है। जंगल, नदियां, पहाड़, ग्लेशियर, हवा प्रकृति के उपहार हैं, जिनसे मनुष्य और पशु-पक्षियों का अस्तित्व है। गैर-कानूनी माइनिंग रोकने के लिए मीडिया और कानून बने हैं पर समस्या का हल नहीं हुआ। विकास की परिभाषा से वातावरण को निकाल दिया जाए तो शेष तबाही ही बचती है। मानवीय जीवन को बरकरार रखने के लिए प्रशासन और आम लोगों को वातावरण के प्रति गंभीर होना पड़ेगा।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Jun 2018 15:29:37 +0530</pubDate>
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