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                <title>malnutrition - Sach Kahoon Hindi</title>
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                            <item>
                <title>मिड-डे-मील में ज्यादा चावल खाने से कुपोषण का शिकार हो रहे बच्चे!</title>
                                    <description><![CDATA[निरोगी हरियाणा की स्क्रीनिंग में हुआ खुलासा फतेहाबाद में 1904 में से 125 बच्चे मिले कुपोषित | Fatehabad News फतेहाबाद (सच कहूँ ब्यूरो)। सरकारी स्कूल में बच्चों को दिए जा रहे मिड-डे-मील  (Midday Meal) में चावल की मात्रा अत्याधिक परोसने से बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। प्रदेश सरकार द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/children-becoming-victims-of-malnutrition-due-to-eating-too-much-rice-in-mid-day-meal/article-51897"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/midday-meal.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">निरोगी हरियाणा की स्क्रीनिंग में हुआ खुलासा</h3>
<ul style="text-align:justify;">
<li>फतेहाबाद में 1904 में से 125 बच्चे मिले कुपोषित | Fatehabad News</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>फतेहाबाद (सच कहूँ ब्यूरो)।</strong> सरकारी स्कूल में बच्चों को दिए जा रहे मिड-डे-मील  (Midday Meal) में चावल की मात्रा अत्याधिक परोसने से बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। प्रदेश सरकार द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभाग को बच्चों में कुपोषण को रोकने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। तीनों विभागों द्वारा लगाए गए कैम्पों में पता चला है कि बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाना, इसका बड़ा कारण है। Fatehabad News</p>
<p style="text-align:justify;">इन विभागों ने स्क्रीनिंग की तो 1904 में से 125 बच्चे कुपोषण का शिकार मिले। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक के विद्यार्थियों को मिड-डे मील दिया जा रहा है, लेकिन इसका बजट इतना कम है कि रेसिपी बन ही नहीं पा रही है। इसके अलावा जो रेसिपी दी गई है, उसे छात्र खाना पसंद नहीं करते हैं। चावल की रेसिपी को कम करके गेहूं को बढ़ावा दिया जाए, ताकि कुपोषण को खत्म किया जा सके। निरोगी हरियाणा और जिला आरंभिक हस्तक्षेप केंद्र की स्क्रीनिंग रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। Fatehabad News</p>
<p style="text-align:justify;">निरोगी हरियाणा द्वारा जिले में स्क्रीनिंग की गई, इसमें 125 बच्चे कुपोषण का शिकार मिले हैं। इसके अलावा स्कूलों में जाकर विद्यार्थियों की स्क्रीनिंग कर रही जिला आरंभिक हस्तक्षेप केंद्र की टीम को अप्रैल से अगस्त माह तक 91 बच्चे कुपोषण का शिकार मिले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 1904 बच्चों की स्क्रीनिंग हुई है। इसमें 49 लड़के और 42 लड़कियां कुपोषण का शिकार मिली हैं। Fatehabad News</p>
<p style="text-align:justify;">निरोगी हरियाणा के तहत फतेहाबाद जिले में 4 लाख 62 हजार लोगों की स्क्रीनिंग होनी है। अब तक एक लाख लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। इसमें 125 बच्चे कुपोषण का शिकार मिले हैं। इसके पीछे कारण ये है कि बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पा रहा है। इसको लेकर माता-पिता को जागरूक किया जा रहा है।<br />
<strong>                                                                                      -मेजर डॉ. शरद तुली, उप सिविल सर्जन</strong></p>
<p style="text-align:justify;">स्कूलों में कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक के विद्यार्थियों को मिड-डे मील दिया जा रहा है, लेकिन बजट इतना कम है कि रेसिपी बन ही नहीं पा रही है। इसके अलावा जो रेसिपी दी गई है उसे छात्र खाना पसंद नहीं करते हैं। चावल की रेसिपी को कम करके गेहूं को बढ़ावा दिया जाए ताकि कुपोषण को खत्म किया जा सके।<br />
<strong>                                                            -देवेंद्र सिंह दहिया, राज्य चेयरमैन, राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ</strong></p>
<p style="text-align:justify;">जिला आरंभिक हस्तक्षेप केंद्र की तरफ से स्कूलों में जाकर टीमें छात्रों की स्क्रीनिंग कर रही है। स्क्रीनिंग के दौरान जो छात्र कुपोषण का शिकार मिल रहे हैं उनके मां-बाप को जागरूक किया जा रहा है। जरूरत अनुसार जांच भी करवाई जा रही है ताकि बच्चों में कमियों का पता चल पाए और समय रहते उपचार शुरू किया जा सके।<br />
<strong>                                                                         -सुखदेव सिंह, मैनेजर, जिला आरंभिक हस्तक्षेप केन्द्र</strong></p>
<h3 style="text-align:justify;">रेसिपी पसंद नहीं कर रहे छात्र | Fatehabad News</h3>
<p style="text-align:justify;">सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र कुपोषण का शिकार न हो इसको लेकर मिड-डे मील दिया जा रहा है। विशेषज्ञों से जब बात की गई तो सामने आया कि मिड डे मील का बजट इतना ज्यादा नहीं है कि बच्चों को पूरा पौष्टिक आहार दिया जा सके। ऐसे में कम बजट के चलते विद्यार्थियों को मिड डे मील में चावल ज्यादा परोसे जा रहे हैं जबकि पौष्टिक माना जाने वाले गेहूं की नाममात्र मात्रा ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यानि मिड डे मील में 60 फीसदी चावल आइटम है तो 40 फीसदी गेहूं की रेसिपी दी जा रही है। कुक भी चावल की रेसिपी बनाकर खुश है, क्योंकि चावल बनाने में उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती और ये जल्द ही बन जाते हैं जबकि गेहूं की रेसिपी बनाने में मेहनत और समय दोनों ज्यादा लगता है। इसका असर छात्रों की सेहत पर पड़ रहा है। गेहूं की रेसिपी की बात की जाए तो नमकीन दलिया बनाया जाता है, जिसे छात्र खाना पसंद नहीं करते हैं। Fatehabad News</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="नशा मुक्ति जागरूकता साइकिल रैली का खरखौदा पहुंचने पर स्वागत" href="http://10.0.0.122:1245/drug-de-addiction-awareness-cycle-rally-welcomed-on-reaching-kharkhoda/">नशा मुक्ति जागरूकता साइकिल रैली का खरखौदा पहुंचने पर स्वागत</a></p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/children-becoming-victims-of-malnutrition-due-to-eating-too-much-rice-in-mid-day-meal/article-51897</link>
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                <pubDate>Sun, 03 Sep 2023 16:33:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुपोषण मुक्त हरियाणा के लिये प्रयास जारी</title>
                                    <description><![CDATA[चंडीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)। हरियाणा सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग को 33.7 प्रतिशत अधिक बजट आवंटन किया है जिससे कुपोषण (Malnutrition Free Haryana) से निपटने और महिलाओं के पोषण स्तर में वृद्धि के लक्ष्यों को हासिल किया जाएगा। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उनका शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना बहुत […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/efforts-continue-for-malnutrition-free-haryana/article-32529"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-04/malnutrition-free-haryana.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> हरियाणा सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग को 33.7 प्रतिशत अधिक बजट आवंटन किया है जिससे कुपोषण (Malnutrition Free Haryana) से निपटने और महिलाओं के पोषण स्तर में वृद्धि के लक्ष्यों को हासिल किया जाएगा। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उनका शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना बहुत जरूरी है लेकिन कुपोषण के कारण अक्सर बच्चों का शारीरिक विकास रुक जाता है। बच्चों के पोषण स्तर को सुधारने और ‘कुपोषण मुक्त हरियाणा’ के लिए सरकार हर भरसक प्रयास कर रही है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कुपोषण दूर करने के लिए सरकार चला रही कार्यक्रम</h4>
<p style="text-align:justify;">केंद्र और राज्य सरकार द्वारा ‘कुपोषण मुक्त भारत’ के लिए चलाए जा रहे अभियान के बारे में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि पोषण अभियान सिर्फ एक कार्यक्रम न होकर एक जन आंदोलन तथा भागीदारी है। उन्होंने अभियान के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सभी के सहयोग की अपील की है। कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार द्वारा कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। बच्चों को पोषण से परिपूर्ण आहार खिलाया जा रहा है। बच्चों और महिलाओं को खाने में फोर्टिफाइड आटा, चावल और दूध से लेकर कई पोषक चीजों का सेवन करवाया जा रहा है। आंगनवाड़ी केन्द्रों में पोषण वाटिकाएं स्थापित की जा रही हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या है मामला</h4>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि ‘कुपोषण मुक्त हरियाणा’ (Malnutrition Free Haryana) के लिए प्रदेश में चार लाख से अधिक समुदाय आधारित कार्यक्रमों का संचालन किया गया है। दो लाख से अधिक ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस आयोजित किए गए हैं। नौ हजार से अधिक योग, आयुष और पोषण वाटिकाओं की स्थापना की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">पोषण माह में जन आंदोलन डैशबोर्ड पर 58 लाख से अधिक लोगों की भागीदारी रही जबकि पोषण पखवाड़ा में जन आंदोलन डैशबोर्ड पर 21 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। सरकार ने बच्चों के विकास, स्वास्थ्य जांच तथा निगरानी के लिये लगभग 26 हजार ग्रोथ मॉनिटरिंग डिवाइस उपलब्ध करवाए हैं। पोषण अभियान को गति देने के लिए आधारभूत सुविधाओं पर लगभग 429 करोड़ रुपये की राशि खर्च की गई है।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 Apr 2022 21:19:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उप्र में कुपोषण के मुद्दे पर प्रियंका ने घेरा योगी सरकार को</title>
                                    <description><![CDATA[लखनऊ (सच कहूँ न्यूज)। कांग्रेस की महासचिव और उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के लिये पार्टी की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने राज्य में कुपोषण ग्रस्त बच्चों की तादाद में इजाफे के लिये प्रदेश की योगी सरकार को घेरते हुये कहा कि बच्चों के पोषण की चिंता करने के बजाय सरकार और भारतीय जनता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/priyanka-surrounded-yogi-government-on-the-issue-of-malnutrition-in-up/article-28780"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-12/malnutrition-in-up.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> कांग्रेस की महासचिव और उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के लिये पार्टी की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने राज्य में कुपोषण ग्रस्त बच्चों की तादाद में इजाफे के लिये प्रदेश की योगी सरकार को घेरते हुये कहा कि बच्चों के पोषण की चिंता करने के बजाय सरकार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता नफरत भरे भाषण देने में मशगूल हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वाड्रा ने उत्तर प्रदेश में बच्चों में कुपोषण की बढ़ती समस्या को उजागर करने वाली मीडिया रिर्पोटों का हवाला देते हुये बुधवार को कहा कि राज्य में कुपोषण से स्थिति भयावह होती जा रही है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘खबरों के अनुसार देश में सबसे अधिक, 4 लाख अतिकुपोषित बच्चे उत्तर प्रदेश में हैं। उत्तर प्रदेश की 60 से अधिक विधानसभाओं में कुपोषण के हालात भयावह हैं। लेकिन, भाजपा के नेता इन मुद्दों पर बात नहीं करेंगे। उनके भाषणों में नफरत की बातें हैं, बच्चों के लिए न्यूट्रिशन की बात गायब है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>क्या है मामला</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पूरे देश में छह माह से छह साल तक की उम्र के 9.27 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। इनमें 3.98 लाख बच्चे उत्तर प्रदेश में हैं। इतना ही नहीं अयोध्या में पांच साल से कम उम्र के 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं।</p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Dec 2021 12:26:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश में 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित</title>
                                    <description><![CDATA[आरटीआई में हुआ खुलासा नई दिल्ली (एजेंसी)। देश में 33 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं और इनमें से आधे से अधिक गंभीर रूप से कुपोषित की कैटेगरी में आते हैं। कुपोषित बच्चों वाले राज्यों में महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात टॉप पर हैं। ये बात हम नहीं बल्कि महिला और बाल विकास मंत्रालय कह रहा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/more-than-33-lakh-children-are-malnourished-in-the-country/article-28193"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/embarrassed-by-the-phenomenon-of-malnutrition.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;">आरटीआई में हुआ खुलासा</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> देश में 33 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं और इनमें से आधे से अधिक गंभीर रूप से कुपोषित की कैटेगरी में आते हैं। कुपोषित बच्चों वाले राज्यों में महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात टॉप पर हैं। ये बात हम नहीं बल्कि महिला और बाल विकास मंत्रालय कह रहा है। मंत्रालय ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने निर्धन से निर्धनतम लोगों में कोविड महामारी से स्वास्थ्य और पोषण संबंधी संकट और अधिक बढ़ने संबंधी आशंका जताते हुए अनुमान व्यक्त किया कि 14 अक्टूबर, 2021 की स्थिति के अनुसार देश में 17,76,902 बच्चे अत्यंत कुपोषित तथा 15,46,420 बच्चे अल्प कुपोषित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मंत्रालय ने एक आरटीआई अर्जी के जवाब में कहा कि 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के आंकड़ों से कुल 33,23,322 बच्चों के आंकड़े आये। ये आंकड़े पिछले साल विकसित पोषण ऐप पर पंजीकृत किए गए, ताकि पोषण के परिणामों पर निगरानी रखी जा सके। मंत्रालय के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि आंगनवाड़ी व्यवस्था में 8.19 करोड़ बच्चों में से केवल 33 लाख कुपोषित हैं, जो कुल बच्चों का केवल 4.04 प्रतिशत है। ये संख्या अपने आप में चिंताजनक है, लेकिन पिछले साल नवंबर की तुलना में ये और अधिक चिंता पैदा करते हैं। नवंबर 2020 से 14 अक्टूबर, 2021 के बीच गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की संख्या में 91 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, इस संबंध में दो तरह के आंकड़े हैं, जो आंकड़ों के संग्रह के विविध तरीकों पर आधारित हैं। पिछले साल अत्यंत कुपोषित बच्चों (छह महीने से लेकर छह साल तक) की संख्या 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा गिनी गई और केंद्र को बताई गई। ताजा आंकड़े पोषण ट्रैकर ऐप से लिए गए हैं, जहां आंकड़े सीधे आंगनवाड़ियों द्वारा दर्ज किए जाते हैं तथा केन्द्र इन्हें प्राप्त करता है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Nov 2021 11:08:08 +0530</pubDate>
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                <title>कुपोषित बच्चों की बढ़ती संख्या चिंताजनक</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में स्वास्थ्य को लेकर एक और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार जहां दुनियाभर में लोगों का औसत कद बढ़ रहा है, वहीं आम भारतीयों का कद लगातार घट रहा है। विज्ञान पत्रिका ओपन एक्सेस साइंस जर्नल (प्लोस वन) में छपे इस अध्ययन में कहा गया है कि भारतीय पुरुषों और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/the-growing-number-of-malnourished-children-is-worrying/article-27460"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-10/embarrassed-by-the-phenomenon-of-malnutrition.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में स्वास्थ्य को लेकर एक और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार जहां दुनियाभर में लोगों का औसत कद बढ़ रहा है, वहीं आम भारतीयों का कद लगातार घट रहा है। विज्ञान पत्रिका ओपन एक्सेस साइंस जर्नल (प्लोस वन) में छपे इस अध्ययन में कहा गया है कि भारतीय पुरुषों और महिलाओं की औसत लंबाई तेजी से कम हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2005-06 और 2015-16 के बीच वयस्क पुरुषों और महिलाओं की लंबाई में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गयी है। इससे सबसे ज्यादा चिंताजनक पहलू यह सामने आया है कि लंबाई कम होने के पीछे आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि की भी बड़ी भूमिका है। देश में सुविधा-संपन्न लोगों का सामाजिक कद हमेशा से ऊंचा रहा है, लेकिन अब यह भेद कद-काठी में भी झलकने लगा है। जहां संपन्न लोगों की औसत लंबाई में कोई ज्यादा कमी नजर नहीं आती है, वहीं गरीबों की औसत लंबाई लगातार घट रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे ज्यादा गिरावट गरीब और आदिवासी महिलाओं में देखी गई है। अध्ययन के मुताबिक, एक पांच साल की अनुसूचित जनजाति बच्ची की औसत लंबाई सामान्य वर्ग की बच्ची से लगभग दो सेंटीमीटर कम पाई गई। पुरुषों के मामले में किसी भी वर्ग के लिए स्थिति अच्छी नहीं है। सभी वर्ग के पुरुषों की औसत लंबाई करीब एक सेंटीमीटर कम हुई है। अगर वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें, तो ये तथ्य चिंता जगाते हैं, क्योंकि दुनिया में लोगों की औसत लंबाई बढ़ रही है। कुछ वैज्ञानिक इन आंकड़ों से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि औसत लंबाई उससे कहीं ज्यादा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक, मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और झारखंड में पुरुषों की औसत लंबाई अन्य राज्यों के पुरुषों के मुकाबले सबसे कम है। मेघालय, त्रिपुरा, झारखंड और बिहार में महिलाओं की औसत लंबाई सबसे कम है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और केरल के पुरुषों की लंबाई औसत लंबाई से कहीं ज्यादा है। इसी तरह पंजाब, हरियाणा और केरल की महिलाओं की लंबाई महिलाओं की औसत लंबाई से अधिक है।</p>
<p style="text-align:justify;">शुरूआत में यदि बच्चे की लंबाई कम रह गयी, तो बाद में उसकी वृद्धि की संभावना बेहद कम रह जाती है। कुपोषण दूर करने के लिए लगभग सभी प्रदेश सरकारें आंगनबाड़ी और स्कूलों में पोषण कार्यक्रम संचालित कर रही हैं। बावजूद इसके कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ना चिंताजनक है। शहरी संपन्न वर्ग के बच्चों में मोटापा बढ़ता जा रहा है। बाहरी खेलों में हिस्सा लेना शहरी बच्चों ने पहले ही कम कर दिया था। कोरोना काल में तो यह एकदम बंद हो गया। आधुनिकता के दौर का बच्चों के विकास में बड़ी बाधा है। बच्चों में खेलने-कूदने की आदतें घट रही है, घर का खानपान छोड़ बाहरी सामान ज्यादा खाने लगे हैं। आॅनलाइन गेमों व मोबाइल ने बच्चों को घरों में कैद कर दिया है। सरकारों को चाहिए कि बच्चों को स्कूलों में खेलकूद यानि पुरात्तन खेलों की तरफ उन्हें प्रोत्साहित किया जाए। आज जरूरत इन मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने और इसे विमर्श के केंद्र में लाने की है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Oct 2021 10:35:41 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>देश में बढ़ रही भुखमरी व कुपोषण चिंता का विषय</title>
                                    <description><![CDATA[देश में किसान आंदोलन की चर्चा है, सरकार अपने बिल वापिस लेने को तैयार नहीं दिख रही वहीं किसान भी रोज अपनी रणनीति बनाकर न केवल आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं वहीं भारत बंद, टोल फ्री जैसे कदम भी उठा चुके हैं। इस सबके बीच भारतीयों के लिए विचलित कर देने वाली बात है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/increasing-starvation-and-malnutrition-in-the-country-is-a-matter-of-concern/article-20611"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/persistence-of-hunger-and-malnutrition.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में किसान आंदोलन की चर्चा है, सरकार अपने बिल वापिस लेने को तैयार नहीं दिख रही वहीं किसान भी रोज अपनी रणनीति बनाकर न केवल आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं वहीं भारत बंद, टोल फ्री जैसे कदम भी उठा चुके हैं। इस सबके बीच भारतीयों के लिए विचलित कर देने वाली बात है। पहली तो वर्ष 2020 की हंगर इंडेक्स सर्वे रिपोर्ट ने भारत की हालत को बेहद खराब बताया है, जोकि चिंता का विषय है। नोटबंदी, से शुरू हुई खस्ताहालत जीएसटी व कोरोना लॉकडाउन में इतनी गंभीर हो चुकी है कि भारत भुखमरी के मामले में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश से भी पिछड़ गया है। भुखमरी से कुपोष्ण पनपता है, भारत में हर तीन में से एक बच्चा कुपोषित है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुपोषण से भावी पीढ़ी के दिमाग, कद-काठी का विकास बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है।देश हालांकि खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है परन्तु खाद्यान्न के अलावा दूध, सब्जियों की देश में भारी कमी है। जो भोजन उपलब्ध है गरीब परिवारों के पास उसे खरीद पाने की क्षमता भी नहीं बची है। ये सब इस कारण भी बहुत कष्ट कर हो रहा है कि सरकार सामाजिक स्वास्थ्य की योजनाओं में बजट को घटा रही है या समय पर उसका भुगतान नहीं कर रही। लॉकडाउन के कारण स्कूल व आंगनबाड़ी केन्द्रों का संचालन बुरी तरह डगमगा गया है, जहां गरीब बच्चों को दोपहर का पौष्टिक भोजन मिलता था। इसके विपरीत सरकार का जोर धार्मिक आधार पर कानून बनाने या थोपने पर ज्यादा है, कभी एनआरसी या लव-जिहाद पर सरकार फिक्रमंद है। कभी गौरक्षा की आड़ में देश में हिंसा व वर्ग विभेद हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब किसान आंदोलन को भी खालिस्तानी, विदेशी चंदे एवं वामपंथी विचारधारा की उपज बताया जा रहा है। किसानों की मांग सिर्फ इतनी है कि उन्हें कृषि फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाता रहे व कांट्रेक्ट फार्मिंग को बढ़ावा न दिया जाए ताकि किसान का भी पेट भरता रहे और वह देश का भी पेट भरता रह सके। भारत में करोड़ों किसान व मजदूर कृषि कार्यों से अपना जीवन-यापन करते हैं ऐसे में कृषि का व्यापारीकरण हो जाने से सीमांत किसानों व खेत-मजदूरों में भुखमरी एवं गरीबी बढ़ेगी जबकि देश पहले ही भुखमरी व कुपोषण से जूझ रहा है। सामाजिक सुरक्षा पर देश में परिस्थितियां बेहद डरावनी हो गई हैं। सरकार को जल्द ही सामाजिक स्वास्थ्य की सुरक्षा पर सकारात्मक निर्णय लेने चाहिए। कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भुखमरी एवं कुपोषण से सीधा संबंध है, कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा नहीं मिलेगा तो देश में सामाजिक गरीबी बढ़ेगी, बढ़ती गरीबी भुखमरी व कुपोषण को बढ़ाएगी जिससे देश का विकास ही नहीं दुनिया में प्रभाव भी घटेगा।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 17 Dec 2020 10:02:23 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कुपोषण बनाम जिन्दगी की जंग</title>
                                    <description><![CDATA[रमेश सर्राफ धमोरा भारत की बढ़ती जनसंख्या में काफी बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। यहां कुपोषण एक तरह से जीवन का हिस्सा बन गया है। इस क्षेत्र के बच्चे या अन्य क्षेत्रों के कुपोषित बच्चे अगर बच भी जाते हैं तो उपयुक्त पोषण न मिल पाने के कारण उनके शरीर और दिमाग को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/malnutrition-vs-life/article-4095"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/88.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रमेश सर्राफ धमोरा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">भारत की बढ़ती जनसंख्या में काफी बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। यहां कुपोषण एक तरह से जीवन का हिस्सा बन गया है। इस क्षेत्र के बच्चे या अन्य क्षेत्रों के कुपोषित बच्चे अगर बच भी जाते हैं तो उपयुक्त पोषण न मिल पाने के कारण उनके शरीर और दिमाग को काफी हानि पहुंच चुकी होती है। 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 4 करोड़ 40 लाख बच्चों का विकास कुपोषण के कारण अवरूद्ध हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वे पढ़ाई नहीं कर पाते और जल्दी ही जीविकोपार्जन में लग जाते हैं। किसी भी समाज की खुशहाली का अनुमान उसके बच्चों और माताओं को देख कर लगाया जा सकता है। पर जिस समाज में हर साल तीन लाख बच्चे एक दिन भी जिंदा नहीं रह पाते और करीब सवा लाख माताएं हर साल प्रसव के दौरान मर जाती हैं, उस समाज की दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। जब देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, तब ऐसा होना शर्मनाक ही नहीं एक घृणित अपराध है। कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 21 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। देश में बाल कुपोषण 1998-2002 के बीच 17.1 प्रतिशत था, जो 2012-16 के बीच बढकर 21 प्रतिशत हो गया। दुनिया के पैमाने पर यह काफी ऊपर है। एक रपट के मुताबिक पिछले 25 सालों से भारत ने इस आंकड़े पर ध्यान नहीं दिया और न ही इस स्थिति को ठीक करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2017 में शामिल जिबूती, श्रीलंका और दक्षिण सूडान ऐसे देश हैं, जहां बाल कुपोषण का आंकड़ा 20 प्रतिशत से अधिक है।</p>
<p style="text-align:justify;">आंकड़े बताते हैं कि पोषण की कमी का नतीजा होता है बाल कुपोषण और ऐसे बच्चे संक्रमण के आसानी से शिकार हो जाते हैं, इनका वजन तेजी से कम होने लगता है और इन्हें स्वस्थ होने में बहुत समय लगता है। एक वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत कुपोषण की गंभीर समस्या से ग्रस्त है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में मां बनने की उम्र वाली आधी महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं। वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2017 में भारत सहित 140 देशों में कुपोषण की स्थिति पर गौर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के मुताबिक इन देशों में कुपोषण के तीन महत्वपूर्ण रूप हैं जिनमें बच्चों में विकास की कमी, मां बनने की उम्र वाली महिलाओं में खून की कमी और अधिक वजन वाली वयस्क महिलाएं शामिल हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार पांच वर्ष से कम के 38 प्रतिशत बच्चे विकासहीनता से प्रभावित हैं जिसमें बच्चों की लंबाई पोषक तत्वों की कमी के कारण अपनी उम्र से कम रह जाती है और इससे उनकी मानसिक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार की एजेंसी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 93.4 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। सरकार द्वारा देशभर के 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल मिलाकर 966 पोषण पुनर्वास केंद्र संचालित किये जा रहे हैं। पोषण पुनर्वास केंद्रो पर 2015-16 में लगभग 1,72,902 बच्चों को भर्ती कराया गया था। उनमें से 92,760 सफलतापूर्वक बचाया गया था। सरकार के अनुसार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में वृद्वि के लिये की गई है, ताकि गंभीर रूप से कुपोषण से ग्रस्त और चिकित्सीय जटिलताओं वाले बच्चों के इलाज के लिए उन्हें भर्ती कराया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों को वहां चिकित्सा और पोषण चिकित्सीय देखभाल की भी सुविधा दी जाती है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब दस लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। सामाजिक कार्यकतार्ओं का कहना है कि कुपोषण को चिकित्सीय आपातकाल करार दिया जाए क्योंकि, ये आंकड़े अति कुपोषण के लिए आपातकालीन सीमा से ऊपर हैं। कुपोषण की समस्या हल करने के लिए नीति बनाने और उसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त बजट की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया के देशों से बहुत ज्यादा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की देख-रेख में हुए सर्वे में पता चला है कि बिहार में सिर्फ 7.5 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार और पोषण मिल पाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों पर आधारित गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट एंड यू क्राय के अध्ययन में पता चला है कि उत्तर प्रदेश में भी 10 में से 9 बच्चों को पर्याप्त आहार और पोषण नहीं मिलता। राज्य में महज 5.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार और पोषण मिल पाता है। यह आंकड़ा पूरे देश में सबसे कम है। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में जन्म के पहले घंटे में चार में से तीन बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता। राज्य में जन्म लेने वाले छह से 59 महीनों के दो तिहाई बच्चे एनीमिया के शिकार होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के बारां और मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में एक अध्ययन से पता चला है कि देश के गरीब इलाकों में बच्चे ऐसी मौतों का शिकार होते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। यह रिपोर्ट कुपोषण की स्थिति पर रोशनी डालती है। इसमें उन स्थितियों का विश्लेषण किया गया है, जिन्हें रोका जा सकता है, जिनके कारण भारत में नवजात शिशुओं और बच्चों की मौत होती है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार भारत में प्रतिदिन 3000 बच्चे कुपोषण के कारण मौत का शिकार हो जाते हैं। भारत को विश्व की तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों में गिना जा रहा है, किन्तु दूसरी ओर यह विश्व में सबसे ज्यादा कुपोषण से ग्रस्त देश भी है। कुपोषण के कारण जिन बच्चों की क्षमता पर्याप्त विकसित नहीं हो पाती, उनके कारण 2030 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 46 करोड़ डॉलर की हानि होगी। भारत को कुपोषण के कारण अपने सकल घरेलू उत्पाद के करीब चार फीसदी की क्षति होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उद्योग संगठन एसोचैम और कंसल्टेंसी फर्म ईवाई की ओर से संयुक्त रूप से प्रकाशित एक शोध पत्र में कहा गया है कि महिलाओं और बच्चों पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। दुनिया के करीब 50 फीसदी कुपोषित बच्चे भारत में हैं। शोध पत्र में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों का जिक्र किया गया है, जिसमें छह से 59 महीने के करीब 60 फीसदी बच्चों को रक्तहीनता से पीड़ित बताया गया है। रिर्पोट के मुताबिक भारत में सिर्फ 10 फीसदी बच्चों को पर्याप्त भोजन मिल पाता है। महिलाएं और लड़कियों की स्थिति भी रोजाना पोषण की खुराक के मामले में ठीक नहीं है, जबकि उनके लिए केन्द्र सरकार ने प्रमुख कार्यक्रम शुरू किए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">15 से 49 साल उम्र वर्ग में 58 फीसदी गर्भवती और 55 फीसदी महिलाएं जो गर्भवती नहीं हैं, रक्तहीनता से पीड़ित हैं।<br />
भारत में कुपोषण को दूर करने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। आयोडिन युक्त नमक, विटामिन ए एवं आयरन सप्लीमेंट, स्तनपान आदि कुछ ऐसे उपाय किए जा रहे हैं जो सकारात्मक दृष्टि देते हैं। स्वच्छ भारत मिशन की सफलता ने भी कुपोषण की राह में एक कदम आगे बढ़ाया है। उम्मीद है कि कुपोषण की शर्मनाक स्थिति से भारत जल्दी ही छुटकारा पा सकेगा। सरकार का रवैया इस दिशा में कोई खास उत्साहजनक नहीं है। देश के सकल घरेलू उत्पाद का 1.4 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है, जो कि काफी कम है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं को दूरस्थ गांव-देहात तक पहुंचाना होगा और देश के हर नागरिक को समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिलना सुनिश्चित करना होगा। तभी भारत में नवजात शिशुओं की मौत पर रोक लगाई जा सकती है।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Jun 2018 15:33:58 +0530</pubDate>
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