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                <title>PM Housing Scheme: हरियाणा में गरीब के घर का सपना अधूरा, सरकार नाराज</title>
                                    <description><![CDATA[हैरानी की बात तो यह है कि सरकार की तरफ से 2 लाख मकान देने का टारगेट तय किया हुआ है और अभी तक यह सरकार सिर्फ 2294 लोगों का ही लोन पास बैंकर्स से पास करवाने में सफल हुई है। यह आंकड़ा मात्र टारगेट से 1 फीसदी है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/dream-of-poors-house-in-haryana-is-incomplete-government-angry/article-13008"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/prime-minister-housing-sche.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;"><span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">PM Housing Scheme</span></span>: वित्त साल 2019-20 निजी बैंकों ने एक पैसा नहीं दिया लोन</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3>बैंकर्स समिति की बैठक में बिजनेस रोकने की दी चेतावनी</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>अश्वनी चावला/सच कहूँ चंडीगढ़।</strong> खुद का घर हो अपना यह सपना संजोए हरियाणा के 50 हजार से ज्यादा लोगों ने प्रदेश सरकार के पास प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब, जरूरतमंद लोगों ने मकान बनाने के लिए आवेदन तो कर दिया, लेकिन निजी बैंकों द्वारा ऋण न दिए जाने से उनका सपना, सपना बनकर ही रह गया। निजी बैंकों की तरफ से किए जा रहे भेदभाव से हरियाणा सरकार इस कद्र नाराज है कि वह इन बैंकों का प्रदेश में कारोबार रोकने पर विचार कर रही है। हरियाणा के सभी प्राइवेट बैंकों के संचालकों को प्रदेश स्तरीय बैंकर्स समिति की मीटिंग दौरान सरकार ने सख्त हिदायत जारी करते हुए साफ कह दिया गया है कि अगर उन्होंने योजना के तहत आम लोगों को ऋण पास नहीं किए गए तो राज्य में निजी बैंकों को कारोबार देने से इंकार कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन बैंकों में छोटे-मोटे बैंक ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े निजी बैंक शामिल हैं। जो कि हरियाणा में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लोगों को लोन देने में कोई ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि सरकार की तरफ से 2 लाख मकान देने का टारगेट तय किया हुआ है और अभी तक यह सरकार सिर्फ 2294 लोगों का ही लोन पास बैंकर्स से पास करवाने में सफल हुई है। (PM Housing Scheme) यह आंकड़ा मात्र टारगेट से 1 फीसदी है। निजी बैंक की तरफ से वित साल 2019-20 में एक भी नया पैसा लोन के रूप में नहीं दिया गया है। जिसको लेकर सरकारी विभाग काफी ज्यादा चिंतित हैं। इसमें सबसे ज्यादा स्थानीय सरकार सबसे ज्यादा चिंतित है। क्योंकि आम लोगों को घर बनाकर देने में सबसे बड़ा टारगेट स्थानीय सरकार के पास ही है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आदेशों के बावजूद ऋण मेले नहीं लगा रहे बैंक</h3>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा के मुख्य सचिव की तरफ से पिछले महीने 13 दिसंबर को एक आदेश जारी करते हुए सभी बैंकर्स को कहा गया था कि वह ऋण मेले लगाते हुए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आम लोगों से उनके आवेदन लें और उस आवेदन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए ज्यादा से ज्यादा ऋण दें। हरियाणा के मुख्य सचिव की तरफ से सख्त आदेशों के बावजूद भी ज्यादातर प्राइवेट बैंकर्स की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की गई है। जिसके चलते लोन देने के मामले में आज भी जीरो पर ही खड़े हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिर्फ 2294 लोगों लोन पास</h3>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा सरकार की तरफ से तय किए गए टारगेट के अनुसार कुल 2 लाख लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान दिए जाने हैं। परंतु हरियाणा में अभी तक 2294 के केस को ही मंजूरी देते हुए पास किया गया है। इस मे 379 करोड़ 45 लाख का लोन मंजूर हुआ है। जबकि यह टारगेट से काफी ज्यादा नीचे है और इसको लेकर हरियाणा सरकार चिंतित भी है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">डेढ़ लाख तक सब्सिडी, केन्द्र सरकार की है योजना</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ उठाने वाले लोगों को न सिर्फ सस्ते दर पर मकान मिलेंगे बल्कि उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत डेढ़ लाख रुपए तक की सब्सिडी भी मिलेगी अपना खुद का मकान लेने के पश्चात इस स्कीम के तहत सरकार की तरफ से डेढ़ लाख रुपए तक की सब्सिडी जारी की जाती है और अभी तक हरियाणा में मात्र 2294 ऐसे केस सामने आए हैं। जो कि मकान पाने के साथ साथ सब्सिडी लेने के भी हकदार बने हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">इन बैंकों ने नहीं दिया एक पैसे का लोन</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">बंधन बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">एचडीएफसी बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">डीसीबी</li>
<li style="text-align:justify;">फेडरल बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">आईडीबीआई बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">इंडसइंड बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">कर्नाटका बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">करूर व्यस्या बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">कोटक महिंद्रा बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">आरबीएल बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">नैनीताल बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">यस बैंक</li>
<li style="text-align:justify;">साउथ इंडियन बैंक</li>
</ul>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2020 19:48:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरणास्त्रोत : गरीब का निमंत्रण</title>
                                    <description><![CDATA[एक बार महात्मा बुद्ध एक गांव में ठहरे थे। और उस गांव के एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया की मेरे घर भोजन करो। बुद्ध ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। क्योंकि वह व्यक्ति सुबह जल्दी आ गया था। वह जानता था उसका नम्बर बाद में तो नहीं आ पायेगा। इससे पहले और […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/invitation-of-poor/article-12879"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/invitaion.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">एक बार महात्मा बुद्ध एक गांव में ठहरे थे। और उस गांव के एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया की मेरे घर भोजन करो। बुद्ध ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। क्योंकि वह व्यक्ति सुबह जल्दी आ गया था। वह जानता था उसका नम्बर बाद में तो नहीं आ पायेगा। इससे पहले और लोग निमंत्रण न दे वह बहुत सुबह उठ बुद्ध की गंध कुटी के सामने आ बैठा। उस की बड़ी तमन्ना थी की जीवन में एक बार बुद्ध उसके यहाँ भी भोजन ग्रहण करें। वह निमंत्रण दे ही रहा था कि इतनी देर में गांव के किसी धनव्यक्ति ने आकर बुद्ध को कहा कि आज का भोजन निमंत्रण मेरे ग्रहण करें। बुद्ध ने कहा आज का तो निमंत्रण आ चुका है। इस प्रेमी ने आज अपने घर बुलाया हैे। उस अमीर ने उस आदमी की तरफ देखा और कहां, इस का निमंत्रण, शायद इस के पास तो अपने खाने के लिए भी कुछ नहीं होगा। इसके तो खुद कई-कई फाँकें पड़े होते हंै। तब उसने उसकी तरफ देख कर उससे पूछा क्या मैं कुछ गलत कह रहा हूं। उस व्यक्ति ने गर्दन हिला कर हामी भर दी। इस के पास कुछ तो खिलाने के लिए होगा तभी तो यह इतनी दूर से मुझे निमंत्रण देने के लिए आया है। जो भी हो इसके पास जो भी होगा, अब निमंत्रण तो इसी का स्वीकार कर चुका हूं। और इसी के घर भोजन करूंगा। जाओ गृह पति आप भोजन की तैयारी करो आज का भोजन आपके यहाँ है। भगवान बुद्ध गये। उस आदमी को भरोसा भी न था कि बुद्ध उसके घर पर भी कभी भोजन ग्रहण करने के लिए आएँगे। उसके पास कुछ भी न था खिलाने को वस्तुत:। वह अमीर ठीक कह रहा था। रूखी रोटियां थीं। सब्जी के नाम पर गरीब किसान जो बरसात के दिनों में कुकुरमुत्ते पैदा हो जाते हंै—लकड़ियों पर, गंदी जगह में—उस कुकुरमुत्ते को इकट्ठा कर लेते है। उसी की सब्जी बनाकर खाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुकुरमुत्ते पायजनस हो जाता है। जहरीले हो जाते है, सांप वगैरा के गुजरने के कारण। बुद्ध के लिए उसने कुकुरमुत्ते की सब्जी बनाई। वह एक दम कड़वे जहर थे। मुंह में रखना मुश्किल था। लेकिन उसके पास एक ही सब्जी थी। तो भगवान बुद्ध ने यह सोच कर कि अगर मैं कहूं कि यह सब्जी कड़वी है। तो यह कठिनाई में पड़ेगा; उसके पास कोई दूसरी सब्जी नहीं है। वह उस जहरीली सब्जी को खा गये। जैसे ही बुद्ध वहां से निकले, उस आदमी ने जब सब्जी को चखा तो वह तो हैरान हो गया। यह क्या यह तो कड़वी जहर सब्जी है। वह भागा हुआ आया और उसने कहा कि आप क्या करते रहे? वह तो जहर है। वह छाती पीटकर कर रोने लगा। लेकिन बुद्ध भगवान ने कहा, तू जरा भी चिंता मत कर। क्योंकि जहर मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। क्योंकि मैं उसे जानता हूं वो अमृत है। तू जरा भी चिंता मत कर घर जा। इस तरह बुद्ध ने लोगों में प्रेम भरा।</h4>
<p> </p>
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<p>Invitation, Poor</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Feb 2020 21:03:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के नाम पर गरीबों को गुमराह कर रही भाजपा सरकार: कुमारी शैलजा</title>
                                    <description><![CDATA[भाजपा आम आदमी की हितैषी नहीं है। भाजपा अपने पांच साल से अधिक के शासनकाल में हुए कार्यों की जवाबदेही से बचने के लिए जाति धर्म संप्रदाय के नाम पर दंगे करवा रही है। उन्होंने भाजपा -जजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि दोनों दल परस्पर विरोधी दल हैं ।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/bjp-government-misleading-the-poor-in-the-name-of-national-population-register-kumari-selja/article-12581"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/kumari-selja.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">महंगाई सातवें आसमान को छू रही है: कांग्रेस (Kumari Selja)</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा(सुनील वर्मा)।</strong> हरियाणा कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष कुमारी शैलजा ने (Kumari Selja) कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के नाम पर गरीबों को गुमराह कर रही है। उन्होंने शनिवार को कहा कि भारतीय सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी भाईचारे की सभ्यता है जिसे बदला नहीं जा सकता। कुमारी शैलजा शनिवार को कांग्रेस भवन में प्रदेश स्तरीय सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर बोल रही थी। उन्होंने कहा कि गरीबों तथा पिछड़ा वर्ग के लोगों में अशिक्षा ज्यादा होने के कारण उनके पूर्वज अपनी जन्म तिथि का सही तरीके से बता नहीं पाते इसलिए राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर बनाना बेमानी है। उन्होंने कहा कि देश में प्रदेश में जहां नौजवानों को नौकरी नहीं मिल रही ,मजदूर गरीब के हाथ खाली है किसान व्यापारी मरा पड़ा है महंगाई सातवें आसमान को छू रही है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> कांग्रेस देश को विकास की राह पर लेकर आई : कुमारी शैलजा</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">पिछले पिछले छह वर्ष में जी डीपी दर निम्न स्तर पर चली गई है।</li>
<li style="text-align:justify;">भाजपा आम आदमी की हितैषी नहीं है।</li>
<li style="text-align:justify;">भाजपा अपने पांच साल से अधिक के शासनकाल में हुए कार्यों की ।</li>
<li style="text-align:justify;">जवाबदेही से बचने के लिए जाति धर्म संप्रदाय के नाम पर दंगे करवा रही है।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong><em> -उन्होंने भाजपा -जजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि दोनों दल परस्पर विरोधी दल हैं । सरकार पर न तो पार्टी को विश्वास है और न ही विधायकों को। सम्मेलन को पार्टी के प्रदेश महासचिव डॉ राकेश, पूर्व विधायक बर सिंह बेनीवाल, होशियारी लाल शर्मा, डॉ सुभाष जौधपुरिया, डबवाली के विधायक अमित सिहाग, प्रदेश महिला कांग्रेस के अध्यक्ष सुधा भारद्वाज सहित कई कांग्रेसी नेताओं ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आज भाजपा गांधी और नेहरू का नाम मिटाना चाहती है लेकिन ऐसा संभव नहीं है।</em></strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jan 2020 19:02:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>&amp;#8230;ताकि ठंड से कोई न मरे</title>
                                    <description><![CDATA[देश में राजनीतिक समीकरणों के बदलते हुए मौसम भी बदल रहा है। देश की जनता हर बात के लिए हर वक्त तैयार रहती है लेकिन हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि इस बार सर्दी से कोई न मरे।इसके लिए हमें न किसी सरकार से उम्मीद करनी है और न ही किसी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/government-will-save-the-poor-from-winter/article-7026"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/winter.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में राजनीतिक समीकरणों के बदलते हुए मौसम भी बदल रहा है। देश की जनता हर बात के लिए हर वक्त तैयार रहती है लेकिन हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि इस बार सर्दी से कोई न मरे।इसके लिए हमें न किसी सरकार से उम्मीद करनी है और न ही किसी नेता की सहायता लेनी है। केंद्र व राज्य सरकारें इस तरह की योजनाओं के लिए हर बार अथक प्रयास करते हुए गरीबों के लिए तमाम सुविधाओं की व्यवस्था करती है लेकिन इसके बाद भी कड़ाके की सर्दी से देशभर में सालाना बहुत सी जानें खो जाने का सिलसिला जारी है। जैसा कि देश मे सर्दी पूरी चरम सीमा पर आ गई है। खबरिया चैनलों व पेपरों की हेडलाइन बदलने लगी है। हर रोज सुबह अखबार में व शाम को चैनलों पर यह दिखाई व सुनाई देने ही वाला है। कडाके की ठंड से इतने लोगो की मौत शासन लापरवाह व प्रशासन मौन। लेकिन इस बार हम ऐसी खबरों को देखना नहीं चाहते।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके निपटने के दो रास्ते हैं। पहला तो इसकी निंदा की जाए व राज्य सरकारों को टाइट करते हुए इस ओर उनका ध्यान आर्कषित करवाया जाए। यह काम हर किसी के बसकी बात नही व यह करना थोड़ा मुश्किल भी होगा। दूसरा, आप को स्वयं को ही नेता, सरकार या गरीबों का मसीहा समझते हुए इस काम को अंजाम दें जो बेहद सरल रहेगा। अपने पुराने कपड़े किसी को बेंचें व फेके नहीं। वह कपड़े राह चलते या किसी एनजीओ को दें दें। जिन लोगों के पास कार है वो पुराने कपड़े अपनी कार में रखें व जहां भी रास्ते में या कहीं भी अन्य स्थान पर ठंड से ठिठुरता दिखे तो उसको दें। इसका अलावा जो लोग बाकी साधन से चलते हंै वो अपने सुविधा अनुसार कपड़ो का वितरण कर सकते हैं। कई जगह देखा जाता है कि लोग कपडों के बदले चाय पीने वाले कप,बर्तन या अन्य छोटी मोटी चीज ले लेते हैं</p>
<p style="text-align:justify;">वह ऐसा न करें व अपने मन से छोटा सा लालच निकालते हुए किसी गरीब को कपड़े देने का प्रयास करें। जिन वस्तुओं को वो लेते हैं उनकी कीमत कपड़ों की कीमत की अपेक्षा कुछ भी नहीं होती। गली मौहल्ले में घूमने वाले इस तरह के लोग घरों से कपड़ा इक्कठा करके आगे बेच देते हैं। मुझे लगता ऐसा करने से बेहतर गरीब या जरुरत मंदो को कपड़े दिए जाएं तो ज्यादा अच्छा होगा। क्योंकि आपके एक कपड़े से एक व्यक्ति की जान बच सकती है। देश के किसी भी राज्य में या आपके आस पास ही आसानी से वह लोग मिल जाते हैं जिन्हें हम इस तरह के कपड़े दे सकते है। मैनें कुछ इस तरह के लोगों को देखा है जो रात में अपने साथ कपड़े लेकर घूमते हंै जहां भी उन्हें जरुरतमंद लोग मिलते हैं वह उन्हें कपड़े या कम्बल देकर चले जाते है। इसके विपरीत इस प्रकरण की अहम बात यह है आज के युग में हर किसी के पास समय की बेहद कमी है।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकतर लोगों ने अपने समय का वर्गीकरण इस तरह कर रखा है कि उनके पास जिंदगी में किसी अन्य चीजों के लिए समय ही नहीं है या यूं कहें कि इस व्यस्तता भरे जीवन में लोगों के पास अपने लिए तक भी थोड़ा समय नहीं बचा। खासतौर पर महानगरों में तो सूकून, चैन या आराम नाम की चीजें ही लोगो के जीवन से गायब हो गई लेकिन व्हाट्स एप,फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया पर किसी की ठंड लगने से मौत होने की खबर पढ़कर या शेयर करके दुख जताने से बेहतर होगा कि आपके छोटे से प्रयास व थोड़ा सा समय निकालने से यदि किसी की जान बच जाए तो निश्चित तौर पर स्वयं को अच्छा लगेगा।हम अधिकतर काम या घटना सरकार पर छोड़ सकते हैं लेकिन कुछ तो स्वयं करें तो भी देश की कुछ दशा बदल सकती है। कुछ अद्भुत विडम्बना हमारे देश में ही देखने को मिलेगी जिसमें से आर्थिक असामनता मुख्य है। किसी भी देश की सरकार कोई भी दंश झेल सकती है लेकिन भूख या ठंड से मरना किसी भी देश के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले लोग अच्छे व सतकर्मों की बात करा करते थे। कहते थे कि कभी तुमसे किसी का दिल न दुखे और जितना हो अपनी तरफ से लोगों का भला करो लेकिन आज की दुनिया में इन बातों का दूर-दूर तक कोई मायना दिखाई नहीं देता है। बदलते परिवेश में लोगों की जीवनशैली बदली जिससे विचार बदले और अब विचार बदलने से लोगों की भावनाएं बदल रही है।<br />
बहरहाल,गरीबों को ठंड से बचाने के लिए सरकार के साथ हर क्षेत्र की संबंधित एनजीओ व जनता को भी अग्रसर होते हुए कुछ करना चाहिए। आंकड़ों व खबरों पर गुस्सा निकालने की बजाय सब साथ काम करें। हम पुन कमाने के तौर तरीके करते व समझते हैं। देश के बड़े व नामचीन तीर्थ स्थलों पर जाते हैं लेकिन यदि हमें किसी की जिंदगी बचाकर या यूं कहें कि किसी को नई जिंदगी देकर उससे ज्यादा पुण्य यहीं कमा लें तो गलत नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेश सोनी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Dec 2018 08:26:28 +0530</pubDate>
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                <title>अनाज की बहुतायत बनाम भुखमरी</title>
                                    <description><![CDATA[ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने भुखमरी के मसले पर भारत की स्थिति को अभी चिंताजनक बताया है। इस सूचि के अनुसार भारत भुखमरों में 100वें पायदान पर है, जबकि वर्ष 2000 में हालात ठीक थे, तब भारत 87वें पायदान पर था। 15 वर्ष पूर्व भारत में परिस्थितियां ठीक थी। यह मामला जिस तरह ऊपरी तौर पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/abundance-of-grain-vs-starvation/article-3442"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/poor1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने भुखमरी के मसले पर भारत की स्थिति को अभी चिंताजनक बताया है। इस सूचि के अनुसार भारत भुखमरों में 100वें पायदान पर है, जबकि वर्ष 2000 में हालात ठीक थे, तब भारत 87वें पायदान पर था। 15 वर्ष पूर्व भारत में परिस्थितियां ठीक थी। यह मामला जिस तरह ऊपरी तौर पर गंभीर दिख रहा है, सरकार को इस दशा की बारीकी से छानबीन करनी चाहिए कि क्यों देश में भुखमरी बढ़ रही है। देश के अनाज भण्डार इतने ज्यादा भरे हुए हैं कि देश से अनाज संभाला नहीं जा रहा। पिछले वर्षों में प्रतिवर्ष हजारों टन अनाज बर्बाद हो रहा है। यहां तक कि गत वर्ष उच्चतम न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया था कि अनाज को सड़ने न दिया जाए, बल्कि गरीबों में बांट दिया जाए। अफसोस सरकार अदालत के निर्देशों की पालना नहीं कर पा रही।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में केन्द्र व राज्य सरकारों ने कुपोषण मिटाने के लिए सस्ता अनाज, सस्ती दाल व भोजन उपलब्ध कराने की योजनाएं चला रखी हैं। यह प्रशासनिक विफलता ही कही जाएगी कि देश में उक्त योजनाओं व अनाज की भरपूर उपलब्धता के बावजूद भी भुखमरी की डरावनी तस्वीर बनी हुई है। स्कूलों में संचालित मिड-डे-मील योजना एवं सस्ता राशन उपलब्ध करवाने वाली योजनाओं का यदि अक्षरश: पालन हो जाता है, तब देश तेजी से भुखमरी व्यक्त करने वाले आंकड़ों से अपना पिंड छुड़ा सकता है। लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही भोजन उपलब्धता योजनाओं, अनाज भण्डारण की योजनाओं में खामियां रह जाती हैं, जबकि यह सब पात्र लोगों के हिस्से आना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">आम नागरिकों में भी सरकार की पौष्टिक भोजन योजनाओं को लेकर गंभीरता अभी शत्-प्रतिशत नहीं बनी हैं। लाखों परिवार ऐसे हैं, जो सस्ता राशन पाने की योजनाओं, आंगनबाड़ी केन्द्र में उपलब्ध सुविधाओं, मिड-डे-मील योजनाओं की सुविधाओं से अनभिज्ञ हैं व वंचित हैं। देश में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध करवाने के लिए आंगनबाड़ी केन्द्र चल रहे हैं। यहां बच्चों को राज्यवार प्रचलित भोजन दाल, चावल, चपाती उपलब्ध करवाई जा रही है, साथ ही विटामिन-ए भी उपलब्ध करवाया जा रहा है। लेकिन विभिन्न चरणों में नागरिकों की उदासीनता का अवैध लाभ भ्रष्ट लोग उठा रहे हैं।केन्द्रीय व राज्य प्रशासन को भोजन उपलब्ध करवाने वाली योजनाओं की कमियों को तेजी से दूर करने के प्रयास करने होंगे। अभी डिजीटल इंडिया के दौर में योजनाओं को मूर्त रूप लेने में वक्त लग रहा है। तेजी से तरक्की कर रही अर्थव्यवस्था के लिए यह देरी चुनौती हैं।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Oct 2017 04:42:04 +0530</pubDate>
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                <title>भारत को भूख मुक्त करने की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व खाद्य असुरक्षा रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। यहां पर लगभग 19.46 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं और यह संख्या चीन की तुलना में 5.58 करोड़ अधिक है। संयुक्त राष्टÑ संघ की यह वार्षिक भूख रिपोर्ट खाद्य और कृषि संगठन द्वारा तैयार की जाती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-hunger-free-challenge/article-3387"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/poor-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व खाद्य असुरक्षा रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। यहां पर लगभग 19.46 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं और यह संख्या चीन की तुलना में 5.58 करोड़ अधिक है। संयुक्त राष्टÑ संघ की यह वार्षिक भूख रिपोर्ट खाद्य और कृषि संगठन द्वारा तैयार की जाती है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि इस वर्ष सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना है। इन लक्ष्यों में पहला लक्ष्य गरीबी और भूख को मिटाना है। विश्व में प्रत्येक चार भूखे लोगों में से एक भारत में है और भूख मिटाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इस संबंध में अन्य प्राधिकारियों के आकलन अलग-अलग हैं। अंतर्राष्टÑीय एजेंसियों द्वारा कुपोषण का आकलन जातीय विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसके कारण भारत के बारे में आंकड़े बढ़-चढ़कर सामने आते हैं। तथापि भारत में स्थिति बहुत गंभीर है और इसमें तुरंत सुधार किए जाने की आवश्यकता है और भुखमरी को समाप्त करना हमारे अपने हित में भी है। कुपोषण के दो रूप हो सकते हैं। पहले रूप में भोजन में कैलोरी की पर्याप्त मात्रा नहीं होती है और दूसरा रूप संक्रमण है जो लिए गए भोजन में कैलोरी के प्रभाव को प्रभावित करता है। भूख और कुपोषण एक नहंी हैं। भूख के कारण कुपोषण होता है क्योंिक गरीब अपने भोजन को संतुलित नहीं बना पाता है और इसका मुख्य कारण प्रोटीन युक्त भोजन का अभाव है। कुपोषण तथा भूख को सामान्यतया एक ही अर्थों में प्रयोग किया जाता है किंतु वे दोनों अलग-अलग हैं। कुपोषण भोजन में पोषक तत्वों का अभाव है जबकि भुखमरी में भोजन हीं नहीं मिल पाता है और इसके कारण अन्य विकृतियां पैदा हो जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महानगरों में लोग भव्य शादियों को देखते हैं और उनमें भारी मात्रा में खाने की बर्बादी होती है। वहीं दूसरी ओर अनेक लोगों को खाना नहंी मिल पाता है। ये दोनों साथ-साथ चलते हैं और इस विषमता को देखते हुए लगता है वास्तव में हमारा देश अतुलनीय है। कृषि आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है और यह रोजगार के अवसर देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसका सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान है। भारत विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है। यहां सबसे अधिक भैसें हैं। भारत सब्जियां, फलों उत्पादन में विश्व में सबसे बड़ा देश है। इसके बावजूद देश से भूख समाप्त नहंी की जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक रिपोर्टों में कहा गया है कि विश्व में सभी के लिए पर्याप्त खाद्यान्न है। भूख का कारण गरीबी, खराब आर्थिक प्रणाली, युद्घ, जनसंख्या वृद्घि, खाद्य नीति, खराब कृषि और जलवायु परिवर्तन है। विश्व की तरह हमारे देश में भी भूख और कुपोषण का कारण अपर्याप्त उत्पादन की बजाय खाद्यान्नों पर सबकी पहुंच और खराब वितरण प्रणाली है। भारत में भूख का एक बड़ा कारण खाद्यान्नों की बर्बादी है। तत्कालीन कृषि और खाद्य मंत्री शरद पवार ने 2013 में कहा था कि प्रति वर्ष लगभग 8.3 बिलियन डालर मूल्य के खाद्यान्नों की बर्बादी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भंडारण सुविधाओं के अभाव के कारण आस्टेÑलिया के कुल फसल उत्पादन के बराबर 21 मिलियन टन गेहूं की देश में बर्बादी होती है। संयुक्त राष्टÑ विकास कार्यक्रम ने भी खाद्यान्न क्षेत्र में बर्बादी को एक मुख्य समस्या बताया है। इसके अनुसार भारत में 40 प्रतिशत खाद्यान्न बर्बाद होते हंैं और यह मंहगाई का भी मुख्य कारण है। हमारे देश में एक ओर खाद्यान्नों की अत्यधिक बर्बादी होती है तो एक ओर भुखमरी है। खाद्यान्नों की बर्बादी तीन स्तरों पर होती है। उत्पादन, भंडारण, परिवहन और विपणन स्थान और इन सभी स्थानों पर खाद्यान्नों की बर्बादी को रोका जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लोबल फूड बैंकिंग नेटवर्क नामक संगठन की स्थापना भूख का मुकाबला करने, पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए किया गया है। इसका उद्देश्य विश्व में खाद्यान्न बैंकों की स्थापना करना है। इंडिया फूड बैंकिंग नेटवर्क ने देश को भूख और कुपोषण मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है और 2020 तक प्रत्येक जिले में एक फूड बैंक बनाने का लक्ष्य रखा है। भारत के संदर्भ में परंपरागत मूल्यों को नजरंदाज नहंी किया जा सकता है जहां पर भूखे को भोजन कराने की परंपरा है। धार्मिक स्थानों पर मुफ्त भोजन कराया जाता है। भूख से संबंधित विकृति के कारण विश्व में करोडों लोग हमेशा संकट की स्थिति में रहते हैं। कुपोषण के शिकार अमीर और गरीब दोनों बन सकते हैं और इनसे अनेक विकृतियां होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भूख मुक्त भारत का तात्पर्य है कि भोजन के अभाव में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। वर्तमान आथिक और सामाजिक दशाओं में यदि राजनीतिक इच्छा शक्ति और जनता का सहयोग हो तो भूख की समस्या से निपटा जा सकता है। कठिनाई कुपोषण का मुकाबला करने में है जिसमें भोजन उपलब्ध कराने वाले और उपभोक्ता दोनों को कुछ ज्ञान होना चाहिए। यदि लोग दो मिनट में खाना तैयार करने, अलग-अलग तरह के स्वाद आदि के प्रति आकर्षित होते हैं तो भुखमरी तो कम होगी किंतु कुपोषण बढ़ता जाएगा। भूख और कुपोषण सामान्यतया गरीबी से जुड़े हैं। हम मध्यम और उच्च वर्गों में अस्वस्थकर भोजन की आदतों के कारण कुपोषण की समस्या के प्रति उदासीन हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये लोग अस्वस्थकर खाद्य आदतों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं जिसके कारण उनमें तनाव, मधुमेह, जैसी जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां हो जाती हैं। जबकि दूसरी ओर यदि गरीब कुपोषित बच्चों को पर्याप्त और संतुलित भोजन मिले तो वे कुपोषण से बच सकते हैं। इसलिए हम आंकड़ों पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं कर सकते हैं। आंकड़ों का वास्तविक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कुपोषण की प्रकृति और कारणों का अलग-अलग विश्लेषण किया जाना चािहए ताकि समुचित उपाय किए जा सकें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डा. एस़ सरस्वती</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Oct 2017 04:16:13 +0530</pubDate>
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                <title>गरीबों को ऋण नहीं बचत चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[विकास विशेषज्ञ रॉबर्ट वोगल ने एक बार कहा था ‘‘ग्रामीण वित्त के आधे भूले भुलाए लोग।’’ और अब संपूर्ण विश्व में इस बात को स्वीकार किया जा रहा है कि व्यक्तिगत वित्त के सबसे बुनियादी साधन छोटे बैंक हैं। नाजुक समय पर सही वित्तीय साधनों का उपलब्ध होना इस बात का निर्धारण करता है कि क्या […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/do-not-loan-to-poor-need-savings/article-3373"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/poor.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विकास विशेषज्ञ रॉबर्ट वोगल ने एक बार कहा था ‘‘ग्रामीण वित्त के आधे भूले भुलाए लोग।’’ और अब संपूर्ण विश्व में इस बात को स्वीकार किया जा रहा है कि व्यक्तिगत वित्त के सबसे बुनियादी साधन छोटे बैंक हैं। नाजुक समय पर सही वित्तीय साधनों का उपलब्ध होना इस बात का निर्धारण करता है कि क्या गरीब परिवार इस अवसर का उपयोग गरीबी से निकलने के लिए या ऋण के जाल से बचने में कर सकता है या नहीं। गरीब लोगों को सामान्य बैंकिंग उपायों की आवश्यकता नहीं है। उन्हें ऐसे उपाय चाहिए जो उनकी जटिल वित्तीय स्थिति से उन्हें उभारे। क्योंकि उन्हें निरंतर वित्त और आय की आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी आय में अंतर को देखते हुए गरीब अक्सर बीमारी या परिवार में मृत्यु या किसी अन्य कारण से उनके परिवार की वित्तीय स्थिति बिगड़ जाती है और कई बार वे अपने घर, मकान और आय के साधनों को भी बेच देते हैं और इन कारणों से उनका परिवार संकट में फंस जाता है। जिसके चलते गरीब दयनीय स्थिति में जीने के लिए बाध्य होते हैं। माइक्रो क्रेडिट के लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, किंतु कर्ज तो कर्ज ही है। इससे जोखिम बढ़ता है और कई बार कर्जदार पर दबाव भी बढ़ता है। बचत से व्यक्ति ऐसे जोखिम को आसानी से सह लेता है और उस पर वित्तीय भार भी कम पड़ता है तथा विशेष रूप से महिलाओं के लिए बचत महत्वपूर्ण है। सामान्यतया गरीब परिवार चाहे छोटी ही राशि सही किंतु बचत अवश्य करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वे अनेक तरह के अनौपचारिक साधन अपनाते हैं। जैसे घर में पैसा छिपाना, रिश्तेदारों को कर्ज देना, पड़ोसियों के साथ बचत समूह बनाना, जमा संग्राहक की सेवाएं लेना, पशु धन या अन्य वस्तुओं की खरीद करना आदि। किंतु ये उपाय विश्वसनीय या सुरक्षित नहीं हैं। गरीब लोगों को बचत करने में सबसे बड़ी समस्या बचत खाते उपलब्ध न होना है जहां पर वे अपनी राशि जमा कर सकें। यह पैसा घर में किसी डब्बे में रखा जाता है और वह तब आसानी से खर्च हो जाता है जब कभी पड़ोसी संकट में हो या कोई उनसे सहायता मांगे। माइक्रो फाइनेंसर से अपनी आवश्यकता के लिए ऋण लेने और अपनी आय में से उसका साप्ताहिक भुगतान करना पड़ता है। जिसके चलते घर की महिलाओं के पास बचाने के लिए पैसा नहीं बच पाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जो संस्थान बचत छोड़कर ऋण देने को बढावा देते हैं वे वास्तव में गरीब ग्राहकों को बंधुआ बना देते हैं। बच्चे की प्राथमिक शिक्षा के लिए ऋण लेना तब आवश्यक हो जाता है जब व्यक्ति बचत करने की स्थिति में न हो। स्वास्थ्य समस्या या परिवार में भोजन की कमी, विवाह, अंतिम संस्कार या सामाजिक समारोहों के लिए उन्हें बार-बार ऋण लेना पड़ता है। घर के आवश्यक सामान के लिए उन्हें ऊंची ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता है जिससे वे ऋण जाल में फंस जाते हैं। वित्तीय संस्थानों को समझना होगा कि उन्हें गरीब लोगों के लिए सुरक्षित और लचीले बचत साधन उपलब्ध कराने होंगे।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Oct 2017 04:52:55 +0530</pubDate>
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                <title>10 रुपये में मिलेगा खाना, राहुल ने किया &amp;#8216;इंदिरा कैंटीन&amp;#8217; का उद्घाटन</title>
                                    <description><![CDATA[बेंगलुरु। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को बेंगलुरू में इंदिरा कैंटीन का उद्धाटन किया। इस मौके पर राहुल गांधी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की तारीफ करते हुए कहा कि यह गरीबों को सस्ता और अच्छा खाना मुहैया कराने के लिए शुरू किया गया है। यहां 5 रु. में नाश्ता और 10 रु. […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/rahul-inaugurates-indira-canteen/article-3144"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/indira-canteen.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलुरु।</strong> कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को बेंगलुरू में इंदिरा कैंटीन का उद्धाटन किया। इस मौके पर राहुल गांधी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की तारीफ करते हुए कहा कि यह गरीबों को सस्ता और अच्छा खाना मुहैया कराने के लिए शुरू किया गया है। यहां 5 रु. में नाश्ता और 10 रु. में खाना मिलेगा। राहुल ने कहा कि ये गर्व की बात है कि राज्य की कांग्रेस सरकार सस्ते दाम पर खाना मुहैया करवा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से गरीबों के बारे में सोचती रही है, इसी कड़ी में बेंगलुरु में इंदिरा कैंटीन की शुरुआत की गई है। यहां श्रमिक और गरीब लोग महज 10 रुपए में भोजन कर सकेंगे। यहां उन्हें हाइजेनिक भोजन मिलेगा। कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार के इस फैसले को कर्नाटक में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"> 25-30 वैराइटी का खाना होगा तैयार</h2>
<p style="text-align:justify;">राहुल ने ट्वीट किया था , “मैं आज बेंगलुरु में कैंटीन के इनॉगरेशन के फंक्शन में शामिल रहूंगा और एक पब्लिक मीटिंग भी करूंगा।” प्रारंभिक चरण में, 101 कैंटीन हर दिन 5 रुपये में शाकाहारी टिफिन (नाश्ता) और 10 रुपये में दोपहर का भोजन और इसी दाम में रात का भोजन मुहैया कराएंगी। वहीं, अक्टूबर में महात्मा गांधी के 150वें जन्मदिन के अवसर पर शेष बचे 97 वार्डों में भी ऐसी कैंटीन खोले जाएंगे। कैंटीन के लिए 12 बेस किचन बनाए गए हैं। यहां 25-30 वैराइटी का खाना तैयार होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य कर्नाटक को भूख मुक्त बनाना है। राज्य में हर महीने गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) को ‘अन्न भाग्य योजना’ के 7 किलोग्राम चावल मुफ्त प्रदान किया जा रहा है, ताकि वे दो वक्त भोजन प्राप्त कर सके।”</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Aug 2017 03:33:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली एनसीआर की डेढ़ फीसदी आबादी भिखारी</title>
                                    <description><![CDATA[सड़कों पर भीख मांगता बचपन नई दिल्ली (एजेंसी)। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की करीब डेढ़ प्रतिशत आबादी भिखारियों की है, जिससे रोजाना आम लोगों का पाला पड़ता है, लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि इनमें से ज्यादातर की स्थिति उन डिग्रीधारी नौकरी पेशा लोगों से काफी अच्छी है, जो मेहरबानी कर उनके कटोरे में एक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/1-5-percent-population-of-delhi-ncr-are-beggars/article-2569"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/child-begging.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सड़कों पर भीख मांगता बचपन</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की करीब डेढ़ प्रतिशत आबादी भिखारियों की है, जिससे रोजाना आम लोगों का पाला पड़ता है, लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि इनमें से ज्यादातर की स्थिति उन डिग्रीधारी नौकरी पेशा लोगों से काफी अच्छी है, जो मेहरबानी कर उनके कटोरे में एक रुपये का सिक्का डाल आगे बढ़ जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में कुल कितने भिखारी हैं, इसके सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। ‘नारीजन’ नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने एक सर्वे में बताया है कि एनसीआर की तीन करोड़ आबादी में डेढ़ प्रतिशत भिखारी हैं। यह आबादी शरीर ढकने वाला वस्त्र भी भिक्षा पात्र से हासिल करती हैं। चिंताजनक बात यह भी है कि दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगता बचपन या तो नशीली दवाओं का शिकार हो रहा है या अपराधियों की गिरफ्त में आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुलाब के फूलों के साथ नोएडा सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन के पास भीख मांगने बैठा बिहार के शिवहर जिले का 26 वर्षीय सुनील साहनी कहता है, ‘मेरे लिए कोई व्यवसाय महत्व नहीं रखता है, क्योंकि इससे भीख मांगने का मेरा काम बाधित होता है। मैं रोजाना दो शिफ्ट में 1200 से 1500 रुपये कमा लेता हूँ।’</p>
<h2 style="text-align:justify;">यह कोई सम्मानजनक काम नहीं</h2>
<p style="text-align:justify;">सुनील इस पेशे से हर महीने 36 से 45 हजार रुपये कमा लेता है, जो उन्हें चंद सिक्के देने वाले नौकरी पेशा लोगों की कमाई से अधिक है। सुनील बचपन में पोलियो का शिकार हो गया था और फिलहाल वह दोनों पांव से लाचार है। उसके कंधों पर माँ के अलावा छोटे भाई-बहन का जिम्मा है। वह कतई नहीं चाहता कि उसके छोटे-भाई को यह दिन देखना पड़े। वह कहता है, ‘यह कोई सम्मानजनक काम नहीं है, जब चाहे कोई भी हमें धमकाकर चला जाता है।’</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ भिखारी अपना नाम-पता जाहिर नहीं करना चाहते। गत दो वर्षों से एक मेट्रो स्टेशन के बाहर बैठने वाले दोनों हाथों से दिव्यांग अशोक (नाम परिवर्तित) इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ‘एक तो मैं ब्राह्मण हूँ, ऊपर से बहन की शादी भी करनी है। अगर सही पता ठिकाना छप गया तो मेरी बहन से शादी कौन करेगा?’ वैसे अशोक जहां बैठता है, वहां सामान्य दिनों में एक घंटे की आमदनी 70 से 100 रुपये है। कोई सात-आठ साल पहले थ्रेसर में हाथ चले जाने और बाद में संक्रमण के कारण उसे अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े। इलाज में छह बीघा जमीन बिक गई और पौने 12 लाख रुपये खर्च हो गए, इसके बावजूद उसके हाथ बच नहीं सके। उसे पेट पालने के लिए भीख मांगने का विकल्प ही बेहतर नजर आया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कोई किसी की मदद नहीं करता</h2>
<p style="text-align:justify;">अशोक ने अपनी मदद के लिए गांव के ही एक बेरोजगार युवक को बुलाया है। नारायण नामक युवक अब अशोक की हर जरूरत पूरी करता है और बदले में उसे मुफ्त में रहने के लिए कमरा मिला हुआ है। बीच के समय में वह अपनी रेहड़ी से कुछ कमाई भी कर लेता है। नारायण ने कहा, ‘मैं तो पूरी तरह संतुष्ट हूं। रोज 100 से 200 रुपये कमा लेता हूँ, सो अलग।</p>
<p style="text-align:justify;">इन भिखारियों से बातचीत से पता चलता है कि उन्हें परिवार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती, जिसके कारण उन्हें इस धंधे की ओर रुख करना पड़ता है। जन्म से अष्टावक्र दिव्यांग इरफान मलिक ने कहा, ‘हम चार भाई हैं, लेकिन कोई किसी की मदद नहीं करता। सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी उठा रहे हैं।’ कुछ भिखारी ऐसे भी हैं, जो अपने पूरे परिवार के साथ भीख मांगते हैं। इनमें कई महिलाएं भी होती हैं, जो प्रतिदिन 250 से 300 रुपये कमा लेने का दावा करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>एनसीआर की तीन करोड़ आबादी में डेढ़ प्रतिशत भिखारी हैं। यह आबादी शरीर ढकने वाला वस्त्र भी भिक्षा पात्र से हासिल करती है। चिंताजनक बात यह भी है कि दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगता बचपन या तो नशीली दवाओं का शिकार हो रहा है या अपराधियों की गिरफ्त में आ रहा है।</em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>नारीजन, स्वयंसेवी संस्था</em></strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/1-5-percent-population-of-delhi-ncr-are-beggars/article-2569</link>
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                <pubDate>Sun, 23 Jul 2017 09:40:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘मैं गरीब हूं’, इबारत गरीबी का मजाक है</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान में गरीबों का मखौल उड़ाने का एक गंभीर मामला सामने आया है, जो हमारी राजनीति के साथ-साथ प्रशासनिक मूल्यहीनता एवं दिशाहीनता का परिचायक है। राजनीतिक लाभ लेने के लिये किस तरह सरकार के द्वारा जनयोजनाआेंं को भुनाने के प्रयत्न होते हैं, उसका राजस्थान एक घिनौना एवं अमानवीय उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुआ है। गौरतलब है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/i-am-poor-the-statement-is-poverty-joke/article-1943"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/poor.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजस्थान में गरीबों का मखौल उड़ाने का एक गंभीर मामला सामने आया है, जो हमारी राजनीति के साथ-साथ प्रशासनिक मूल्यहीनता एवं दिशाहीनता का परिचायक है। राजनीतिक लाभ लेने के लिये किस तरह सरकार के द्वारा जनयोजनाआेंं को भुनाने के प्रयत्न होते हैं, उसका राजस्थान एक घिनौना एवं अमानवीय उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि राज्य के दौसा जिले में बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों के घरों की दीवारों पर उकेर दिया गया है- ‘मैं गरीब हूं, मैं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन लेता हूं।’ कोई भी अपनी मर्जी से अपने घर की दीवार पर यह नहीं लिखना चाहेगा। दौसा में हजारों घरों पर यह लिखा मिलेगा, तो समझा जा सकता है कि अधिकारियों के निर्देश पर ही ऐसा हुआ होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारियों को निर्देश सत्ता से जुड़े शीर्ष नेतृत्व ने ही प्रदत्त किया होगा, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र को दूषित करती है, जनभावनाओं को आहत करती हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घटना को गंभीरता से संज्ञान लेते हुए त्वरित कार्यवाही करके एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज का भौतिक दिमाग कहता है कि घर के बाहर और घर के अन्दर जो है, बस वही जीवन है। लेकिन राजनीतिक दिमाग मानता है कि जहां भी गरीब है, वही राजनीति के लिये जीवन है, क्योंकि राजनीति को उसी से जीवन ऊर्जा मिलती है। यही कारण है कि इस देश में सत्तर साल के बाद भी गरीबी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है, जितनी गरीबी बढ़ती है उतनी ही राजनीतिक जमीन मजबूती होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि सत्ता पर काबिज होने का मार्ग गरीबी के रास्ते से ही आता है। बहुत बड़ी योजनाएं इसी गरीबी को खत्म करने के लिये बनती रही हैं और आज भी बन रही हैं। लेकिन गरीब खत्म होते गये और गरीबी आज भी कायम है। हम जिन रास्तों पर चल कर एवं जिन योजनाओं को लागू करके देश में क्रांति की आशा करते हैं वे ही योजनाएं कितनी विषम और विषभरी हैं,</p>
<p style="text-align:justify;">इसका अन्दाजा दौसा में गरीबों के घरों के बाहर सरकार के द्वारा लिखी गयी इबारत से पता चल जाता है । सभी कुछ अभिनय है, छलावा है, फरेब है। सब नकली, धोखा, गोलमाल, विषमताभरा। प्रधानमंत्री जी का लोक राज्य, स्वराज्य, सुराज्य, रामराज्य का सुनहरा स्वप्न ऐसी नींव पर कैसे साकार होगा? यहां तो सब अपना-अपना साम्राज्य खड़ा करने में लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी योजनाओं की विसंगतियां ही हैं कि गांवों में जीवन ठहर गया है। बीमार, अशिक्षित, विपन्न मनुष्य मानों अपने को ढो रहा है। शहर सीमेन्ट और सरियों का जंगल हो गया है। मशीन बने सब भाग रहे हैं। मालूम नहीं खुद आगे जाने के लिए या दूसरों को पीछे छोड़ने के लिए। कह तो सभी यही रहे हैं–बाकी सब झूठ है, सच केवल रोटी है।</p>
<p style="text-align:justify;">रोटी केवल शब्द नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी परिभाषा समेटे हुए है अपने भीतर। जिसे आज का मनुष्य अपनी सुविधानुसार परिभाषित कर लेता है। रोटी कह रही है-मैं महंगी हूँ तू सस्ता है। यह मनुष्य का घोर अपमान है। रोटी कीमती, जीवन सस्ता। मनुष्य सस्ता, मनुष्यता सस्ती। और इस तरह गरीब को अपमानित किया जा रहा है, यह सबसे बड़ा खतरा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस खतरे को महसूस किया, जबकि लोकतंत्र को हांकने वालों को इसे पहले महसूस करना चाहिए। घोर विडम्बना तो यह भी है कि ये शब्द लिखवाने के लिए बीपीएल परिवारों को कुछ पैसे भी दिए गए थे। ऐसी इबारत हर लिहाज से घोर आपत्तिजनक है। मानवाधिकार आयोग ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया है</p>
<p style="text-align:justify;">और इसका संदेश साफ है कि गरीब आदमी की भी गरिमा है, जिससे खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए, उसे अपमानित नहीं किया जा सकता। पीडीएस यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों को मिलने वाला राशन कोई खैरात नहीं है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत उन्हें मिलता है, जो कि उनका अधिकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या अपने इस अधिकार का इस्तेमाल वे अपमानित होकर ही कर सकते हैं? महीने में दस या पंद्रह किलो गेहूं के लिए अगर दौसा के हजारों परिवारों ने अपने घर की बाहरी दीवार पर गरीब होने की घोषणा लिखवाना मंजूर किया, तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तरक्की के तमाम दावों के बावजूद वे कैसी असहायता की हालत में जी रहे हैं और उनके कल्याण की बात करने वाले राजनेता कितनी एय्याशी भोग रहे हैं। सरकारी योजनाओं की जमीन एवं सच्चाई कितनी भयावह एवं भद्दी है, हमारी सोच कितनी जड़ हो चुकी है, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हम भ्रष्टाचार के मामले में तो दुनिया में अव्वल हैं ही, लेकिन गरीबी के मामले में भी हमारा ऊंचा स्थान है। गत दिनों एक शोध संस्थान द्वारा ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानी विश्व भूख सूचकांक जारी किया था। इस सूचकांक ने बताया कि भारत में भुखमरी के कगार पर जीने वालों और अधपेट सोने को मजबूर लोगों की तादाद सबसे ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर गरीबों के साथ अपमानजनक व्यवहार पर कोई अध्ययन हो, तो उसमें भी भारत नंबर एक पर ही दिखेगा। गरीब होने की सूचना घरों पर जबरन पुतवाने की घटना से राजस्थान सरकार को शर्म एवं धिक्कार का सामना करना पड़ रहा है। जनता की नजरों में उसका कद इस एक घटना से गिरा है, वह आलोचना का पात्र बनी है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानवाधिकार आयोग के नोटिस के बाद मामले के तूल पकड़ने पर उसने अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने की कोशिश शुरू कर दी। राज्य के पंचायत मंत्री ने सफाई दी कि ऐसा कोई भी आदेश राज्य सरकार की तरफ से नहीं दिया गया था। पर आदेश के बगैर, संबंधित इबारत लिखवाने की बात कर्मचारियों को कैसे सूझी, और इसके लिए दिए गए पैसे कहां से आए? ऐसी कार्यवाही से प्रशासन को क्या लाभ है?</p>
<p style="text-align:justify;">अक्सर राजनेताओं या अधिकारियों पर जब इस तरह की अनुचित एवं अमानवीय कार्यवाहियों की जबावदेही तय होती है, जनता का विरोध उभरता एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि का नाश होता है तो इन निरुत्तर एवं जवाबदेही स्थितियों में सभी अपना पल्ला झाड़ने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर यह सरकारी आदेश नहीं था तो राज्य सरकार यह सफाई क्यों दे रही है कि गरीब होने की घोषणा दीवार पर अंकित करने के पीछे इरादा राशन वितरण में होने वाली हेराफेरी रोकना था।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर यह बात थी, तो राज्य सरकार निर्णय की जवाबदेही लेने से बच क्यों रही है? लेकिन इसी के साथ दूसरा सवाल यह उठता है कि अनियमितता और गड़बड़ी रोकने का कोई और तरीका उसे क्यों नहीं सूझा?</p>
<p style="text-align:justify;">जो हुआ वह गरीबों के अपमान के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी मखौल है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से चार हफ्तों के भीतर जो स्पष्टीकरण मांगा है उसमें दोषियों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा देने को भी कहा है। कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए होगी, या किसी और का दोष किसी और के सिर मढ़ दिया जाएगा!</p>
<p style="text-align:justify;">गांधी और विनोबा ने सबके उदय के लिए ‘सर्वोदय’ की बात की गई। उसे निज्योदय बना दिया। जे. पी. ने जाति धर्म से राजनीति को बाहर निकालने के लिए ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया। जो उनको दी गई श्रद्धांजलि के साथ ही समाप्त हो गया। ‘गरीबी हटाओ’ में गरीब हट गए। स्थिति ने बल्कि नया मोड़ लिया है कि जो गरीबी के नारे को जितना भुना सकते हैं, वे सत्ता प्राप्त कर सकते हैं। कैसे समतामूलक एवं संतुलित समाज का सुनहरा स्वप्न साकार होगा? कैसे मोदीजी का नया भारत निर्मित होगा?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Tue, 04 Jul 2017 23:17:06 +0530</pubDate>
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                <title>अन्नदाता कब तक बना रहेगा केवल मतदाता</title>
                                    <description><![CDATA[चाहे तमिलनाडु हो, आन्ध्रप्रदेश हो, महाराष्ट्र हो या फिर मध्यप्रदेश पूरे देश की पेट की भूख मिटाने वाला हमारे देश का किसान आज आजादी के 70 साल बाद भी खुद भूख से लाचार है। देश का यही अन्नदाता अपनी ही सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए पांच दिनों से शांतिपूर्ण आन्दोलन कर रहा था, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-farmers/article-1698"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/farrmer.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चाहे तमिलनाडु हो, आन्ध्रप्रदेश हो, महाराष्ट्र हो या फिर मध्यप्रदेश पूरे देश की पेट की भूख मिटाने वाला हमारे देश का किसान आज आजादी के 70 साल बाद भी खुद भूख से लाचार है। देश का यही अन्नदाता अपनी ही सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए पांच दिनों से शांतिपूर्ण आन्दोलन कर रहा था, तो छटे दिन अचानक क्यों वो उन उपद्रवियों से भी खतरनाक हो गया, जिन पर पैलेटगन के उपयोग से भी मानवाधिकारों के हनन की बातें उठती हैं, लेकिन किसानों पर काबू पाने के लिए गोलियों का सहारा ले लिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे भी शर्मनाक यह कि सरकार न तो किसानों की तकलीफ समझ पाई, न उनका आक्रोश और न ही परिस्थितियों को। शायद इसीलिए अपने अफसरों को बचाने में जुट गई। गृहमंत्री कहते रहे कि गोली पुलिस ने नहीं चलाई, आन्दोलन में असामाजिक तत्वों का बोलबाला था और एक जांच कमेटी का गठन कर दिया गया, यह जानने के लिए कि गोली ‘किसने’ चलाई, जबकि महत्वपूर्ण एवं जांच का विषय यह था कि गोली ‘क्यों’ चलाई गई।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समय था, जब देश आर्थिक रूप से इतना कमजोर था कि पूरी आबादी दो वक्त का भोजन भी ठीक से नहीं कर पाती थी। ये वो दिन थे, जब युद्ध के हालात में देश के प्रधानमंत्री को देश की जनता से एक वक्त उपवास करने की अपील करनी पड़ी थी। पूरे देश के साथ लाल बहादुर शास्त्री स्वयं एक समय का भोजन करके देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। ये ही वो दौर था, जब देश के किसानों ने सरकार के सहयोग से वो मेहनत की कि देश की मिट्टी सोना उगलने लगी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान की बात करें, तो वो मध्यप्रदेश जो कभी “बीमारू राज्य” हुआ करता था, इन्हीं किसानों की कमर-तोड़ मेहनत के दम पर लगातार 5 बार कृषि कर्मण अवार्ड जीत चुका है। विचारणीय है कि अब उसी राज्य में किसानों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों हुआ? किसान आंदोलन में असामाजिक तत्व कैसे और क्यों आ गए? वजह कोई भी हो, अन्तत: यह केवल सरकार एवं प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही के सिवाय और कुछ नहीं है। सवाल तो बहुत हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था का काफी हिस्सा कृषी पर आधारित होने के बावजूद क्यों किसानों को कर्ज माफी की मांग उठानी पड़ रही है?</p>
<p style="text-align:justify;">यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि किसानों की ताजा मुश्किल मौसम की मार या फिर कम पैदावार नहीं है। इनकी तकलीफ यह है कि सरकार की नीतियों के कारण बेहतर मानसून एवं पैदावार के बावजूद फसल के सीजन में प्याज, आलू, टमाटर और अन्य सब्जियों के दाम एक से दो रुपए तक गिर गए, तो कमाई तो छोड़िये, यह सोचिए कि क्या वे ऐसे में अपनी लागत भी निकाल पाएंगे? हमारे देश के नेता आखिर कब तक अन्नदाता को केवल मतदाता समझ कर अपने स्वार्थ की रोटियां सेकते रहेंगे?</p>
<p style="text-align:justify;">सत्ता पाने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियां किसानों को कर्ज माफी का लालच दिखा देती हैं, जबकि वे खुद इस बात को जानती हैं कि यह कोई स्थाई हल नहीं है। इससे न तो किसान सक्षम बनेगा और न ही देश की अर्थव्यवस्था। नेताओं की सोच केवल चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने तक सीमित रहती है और किसान कर्ज माफी के तत्कालीन लालच में आ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब किसान जागा है, तो पूरा जागे। इस बात को समझे कि भले ही अपनी फसल वो एक या दो रुपए में बेचने को विवश है, लेकिन इस देश का आम आदमी उसके दाम एक-दो रूपए नहीं, कहीं ज्यादा चुकाता है, तो यह सस्ता अनाज किसकी झोलियां भर रहा है? किसान इस बात को समझे कि उसकी जरूरत कर्ज माफी की भीख नहीं, अपनी मेहनत का पूरा हक है। इसलिए वह सरकार की नीतियां अपने हक में मांगे, बैंकों के लोन नहीं। दूसरी तरफ, सरकार को भी चाहिए कि पूरे देश को जीवन देने वाला स्वयं अपना जीवन लेने के लिए भविष्य में कभी भी विवश न हो।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डॉ. नीलम महेंद्र</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jun 2017 03:00:19 +0530</pubDate>
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                <title>गरीबी की भेंट चढ़ा पूरा परिवार ,  परिवार के 5 सदस्यों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[चार भाई-बहनों समेत खुद खाया जहर  मरने वालों में दो भाई नाबालिग थे कपूरथला । गरीबी के कारण 21 साल के एक व्यक्ति ने कथित तौर पर अपने चार छोटे भाई-बहनों को जहर मिला बर्गर खिला दिया और खुद भी अपनी जान दे दी। मरने वाले चार सभी बच्चे नाबालिग थे और उसमें दो लड़कियां […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/5-family-members-suicides-due-to-poverty/article-1474"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/note.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">चार भाई-बहनों समेत खुद खाया जहर</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong> मरने वालों में दो भाई नाबालिग थे</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>कपूरथला ।</strong> गरीबी के कारण 21 साल के एक व्यक्ति ने कथित तौर पर अपने चार छोटे भाई-बहनों को जहर मिला बर्गर खिला दिया और खुद भी अपनी जान दे दी। मरने वाले चार सभी बच्चे नाबालिग थे और उसमें दो लड़कियां शामिल थीं। यह घटना मंगलवार रात यहां के लक्ष्मी नगर इलाके में हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संदीप शर्मा ने बताया कि 21 वर्षीय अभिमन्यु का परिवार भयंकर गरीबी में था, जिसके कारण उसे इस प्रकार का कदम उठाना पड़ा। शर्मा ने बताया कि अभिमन्यु बाजार से बर्गर लाया था और कथित तौर पर इसमें कोई जहरीला पदार्थ मिला दिया और सभी बच्चों से इसे खाने को कहा। उसने खुद भी यह जहरीला बर्गर खाया और अपनी जान दे दी। चिकित्सा अधिकारी अनूप मेघ के मुताबिक अनु(18 वर्ष), अर्चना (8 वर्ष)और अर्शु (15)ने स्थानीय सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया, जबकि अभिमन्यु और अनुराग (12), जो शारीरिक तौर पर अक्षम थे, की जालंधर के अस्पताल में मौत हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अभिमन्यु ने अपनी सात साल की बहन आरती को भी यह बर्गर खिलाया था, जो इस समय अस्पताल में भर्ती है। आरती को बर्गर खाने के बाद जल्दी ही उल्टी हो गई थी। मरने वाले अभिमन्यु ने एक चिट्ठी छोड़ी है, जिसमें लिखा है, ‘पापा, मैं आपको याद कर रहा हूं और मुझे यह सब करने के लिए माफ कर देना, क्योंकि हम सब परिवार पर बोझ थे।’ मृतक के पिता किशोर ठाकुर इस घटना के समय शहर में नहीं थे। वह पेशे से नाई हैं। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया कर लिया है और मामले की जांच कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Jun 2017 07:13:55 +0530</pubDate>
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