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                <title>अपराधी बने नेता: पार्टियां दे रही सुपारी</title>
                                    <description><![CDATA[हम छोटे-मोटे चोरों को फांसी की सजा दे देते हैं और बडे अपराधियों को सार्वजनिक पदों के लिए चुन लेते हैं। यह तथ्य भारत की कटु सच्चाई को उजागर करता है। एक सांसद और विधायक का बिल्ला माफिया डॉनों, कातिलों और अपराधियों के लिए एक रक्षा कवच का कार्य करता है तथा बिहार विधान सभा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/criminal-became-leader-parties-are-giving-supari/article-19392"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/criminal-became-leader-parties-are-giving-supari.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:center;"><strong>हम छोटे-मोटे चोरों को फांसी की सजा दे देते हैं और बडे अपराधियों को सार्वजनिक पदों के लिए चुन लेते हैं। यह तथ्य भारत की कटु सच्चाई को उजागर करता है। एक सांसद और विधायक का बिल्ला माफिया डॉनों, कातिलों और अपराधियों के लिए एक रक्षा कवच का कार्य करता है तथा बिहार विधान सभा चुनावों के इस राजनीतिक मौसम में खूनी अपराधियों का बोलबाला है।</strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;">राजनीतिक दल विधान सभा चुनावों के लिए अपराधियों को टिकट दे रहे हैं। अपराधियों से नेता बने लोग बुलेट प्रूफ जैकेट अर्थात एमएलए बनने की होड में हैं। अपराधी बने नेता और जो जीता वो सिकंदर के इस नए युग में आपका स्वागत है। ऐसे वातावरण में जहां पर साध्य महत्वपूर्ण बन जाता है न कि साधक और विजेता का बोलबाला रहता है, बाहुबलियों, हत्यारों, गैंगस्टरों की प्रत्येक पार्टी में बड़ी मांग है किंतु लगता है चुनावी राजनीति में ईमानदारी से अधिक अपराधियों का महत्व है और यह चुनाव भी कोई अलग नहीं है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">बिहार विधान सभा के पहले चरण के चुनावों में 1066 उम्मीदवारों में से 319 की आपराधिक पृष्ठभूमि है। इस सूची में गया में सर्वाधिक 49 उम्मीदवार, उसके बाद भोजपुर में 39, रोहतास में 37 और बक्सर में 33 उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि है। उसके बाद पटना, जहानाबाद औरंगाबाद, जमुई आदि का स्थान आता है। मोकामा के वर्तमान विधायक छोटे सरकार अर्थात सिंह जेल में विधि विरुद्ध कार्यकलाप निवारण अधिनियम के अधीन बंद हैं। उन्होंने जेल से बाहर आकर राजद के टिकट पर अपना नामांकन पत्र भरा है। उन्होंने अपने चुनाव शपथ पत्र में घोषणा की है कि उनके विरुद्ध हत्या के सात मामलों सहित 38 गंभीर आपराधिक मामले हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">राजनीतिक दलों ने न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों के बावजूद अपराधियों को टिकट दिया है। इसी वर्ष फरवरी में उच्चतम न्यायालय ने पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि वे अपना अपराधिक पृष्ठभूमि का ब्यौरा दें और निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया था कि वे इन उम्मीदवारों के विधि विरुद्ध कायकलापों का ब्यौरा प्रकाशित करें और उनके नामांकन के कारण स्पष्ट करें ताकि मतदाता इस सूचना के आधार पर अपने मत का प्रयोग कर सकें। इसका उद्देश्य आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतरने से रोकना था किंतु इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अनेक उम्मीदवारों ने अपने घनिष्ठ रिश्तेदारों को टिकट दिलवाकर इन नियमों की धज्जी उड़ायी। हत्या के मामलों में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे तीन माफिया डॉनों की पत्नियों को राजद ने टिकट दिया। जद (यू) और लोजपा ने ऐसे दो-दो माफिया डॉनों की पत्नियों को टिकट दिया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">एक पूर्व मुख्यमंत्री से जब यह पूछा गया कि उनके मंत्रिमंडल में 22 मंत्री आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं तो उन्होंने कहा, मुझे अपने मंत्रियों के अतीत की कोई परवाह नही है। सरकार में शामिल होने के बाद वे अब अपराधों में संलिप्त नहीं है और वे आपराधिक गतिविधियों को रोकने में सहायता करने के लिए तैयार हैं। आप जनता से पूछिए कि उन्होंने उन्हें क्यों चुना है। आप इस मुख्यमंत्री के इस तर्क का क्या उत्तर देंगे? हमारे अपराधियों से राजनेता बने हमारे विधायकों को एक विजयी ट्राफी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके चलते आज राज्य माफिया डॉनों, उनकी सेना, उनके सशस्त्र ब्रिगेडों का युद्धस्थल बन गया है और इस बात की कोई परवाह नहीं करता है कि वे आज समाज और राष्ट्र के लिए सबसे बडा खतरा बन गए हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">आज माफिया डॉन जेल में बैठकर चुनाव जीतते हैं। कुछ विधायक जेल में ही अपना दरबार लगाते हैं। उन्हें वहां घर जैसी सारी सुविधाएं मिलती हैं। वे अपने चमचों को सेलफोन के माध्यम से निर्देश देते हैं और जेल से ही अपना साम्राज्य चलाते हैं, वहीं से आदेश देते हैं और किसी की हिम्मत नहीं कि उनके आदेशों का पालन न करें। ऐसे कुछ नेता गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत का सहारा लेते हैं और कुछ भाग जाते हैं तथा जब स्थितियां अनुकूल होती हैं तो आत्मसमर्पण करते हैं। ऐसे अपराधियों का तिरस्कार करने के बजाय वे चुनावों में जीत जाते हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">कुछ लोग अपराधियों के राजनीतिकरण को हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास का एक चरण कह सकते हैं किंतु त्रासदी यह है कि आज केवल महत्वपूर्ण यह रह गया है कि अपराधी किस पक्ष में है। उनके पक्ष में या हमारे पक्ष में। आज सारे दल एक जैसे हैं केवल अपराधी नेताओं की संख्या में अंतर है और उनके बीच लेनदेन चलता रहता है। वे एक दूसरे की सहायता करते रहते हैं और अपराधियों और पार्टियों के बीच परस्पर लाभ और मैत्री के चलते हमारे नेतागण ऐसे कानून को पारित करने का विरोध करते हैं जिससे अपराधीकरण, भ्रष्टाचार और विश्वसनीयता के संकट की महामारियों से राजनीति को मुक्ति दिलायी जा सके।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">विभिन्न मुद्दों पर हमारे नेताओं में दलीय आधार पर मतभेद होता है किंतु जब इस समस्या का निराकण करने के लिए कदम उठाने की बात आती है तो वे एकजुट हो जाते हैं और देश के विभिन्न राज्यों में कानून और व्यवस्था की स्थिति खराब होने का एक मुख्य कारण यह भी है। यह भी सच है कि राज्य द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं को गिरफ्तार करने और उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने में सफल न होने का मुख्य कारण राज्य ही है। अपराधी राजनेताओं के अवैध हितों को संरक्षण देते है और उसके बदले उन्हें राजनेताओं तथा उनकी पाटियों से संरक्षण मिलता है और सबसे दुख की बात यह है कि इस स्थिति पर किसी को दुख नहीं होता है। हर चुनाव में अपराधियों को टिकट देने पर जनता हैरान नहीं होती है न ही इसको लेकर जनता विरोध करती है और धीरे धीरे यह स्वीकार्य बनता जा रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">फिर इसका उपाय क्या है? हम राजनीतिक कलियुग कहकर इसे नजरंदाज नहीं कर सकते हैं। आज भारत एक नैतिक चौराहे पर खड़ा है विशेषकर इसलिए कि हमारे राजनेताओं ने निम्न नैतिकता और उच्च प्रलोभन की तलाश में महारथ हासिल कर ली है। उच्चतम न्यायालय ने भारत की राजनीति की खामियों को उजागर किया है। भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए अयोग्य घोषित करने हेतु किसी व्यक्ति के विरुद्ध हत्या के कितने आरोप होने चाहिए? हमारे राजनेताओं को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा और ऐसा कानून बनाना होगा जिससे अपराधियों और माफिया डॉनों का राजनीति में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जा सके। क्या हमारे नेता दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राजनीतिक की पवित्रता को बनाए रखेगे? अब हमारा देश छोटे लोगों की बड़ी छाया को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि देश को सबसे बड़ी कीमत अपराधी राजनेता की चुकानी पड़ती है।</h6>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Oct 2020 20:42:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>नेता सुनें अन्यथा जनता नहीं सुनने वाली</title>
                                    <description><![CDATA[भाजपा दिल्ली का विधानसभा चुनाव तीसरी बार भी बुुरी तरह से हार गई है। इस चुनाव ने भाजपा को एक तरह से कांग्रेस की कतार में खड़ा कर दिया है। दिल्ली में भाजपा ने अपने पुराने व स्थानीय नेताओं विजय गोयल, डॉ. हर्षवर्धन, मिनाक्षी लेखी को छोड़कर पूर्व से आए मनोज तिवारी के भरोसे रखा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/leaders-now-listen-otherwise-public-will-not-listen/article-13014"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/leaders.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">भाजपा दिल्ली का विधानसभा चुनाव तीसरी बार भी बुुरी तरह से हार गई है। इस चुनाव ने भाजपा को एक तरह से कांग्रेस की कतार में खड़ा कर दिया है। दिल्ली में भाजपा ने अपने पुराने व स्थानीय नेताओं विजय गोयल, डॉ. हर्षवर्धन, मिनाक्षी लेखी को छोड़कर पूर्व से आए मनोज तिवारी के भरोसे रखा नतीजा सामने है। केन्द्र की सता में बैठकर बीजेपी अपने स्थानीय नेताओं (Leaders) को दरकिनार कर गई या उन लोगों को दरकिनार कर रही है, जो भाजपा को गांवों-शहरों से प्रचंड बहुमत दिलाते हैं। उनकी जगह नये-नये चेहरे आगे किए जाते हैं, जो महज सरकार के साथ चमकते हैं, जिन्हें जमीनी स्तर पर कोई पहचानता नहीं या फिर बीजेपी उन नेताओं को भी नहीं छोड़ रही जिनपर उनके अपने प्रदेश के लोग भी भरोसा नहीं करते। तभी झारखंड में से रघुवर दास, महाराष्ट्र से फड़णवीस को लोगों ने चलता किया है।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में जनता स्थानीय नेताओं के साथियों के भ्रष्टाचार से त्रस्त थी। संगठन, सरकार, टिकिट, कारोबार सब जगह ये लोग हावी थे, जनता ने कहा भगाओ इन्हें। भाजपा का मेहनती कार्यकर्त्ता भी चुप रहा कि जनता जो कर रही है करने दो अन्यथा वह अपने नेताओं के लिए दिन-रात दौड़ता है। केन्द्र में जो टीम है वह भी दो बातों के आसपास ही सिमट गई है, जिनमें राष्ट्रवाद , अल्पसंख्यक राजनीति के सिवाय अन्य मुद्दों की कहीं कोई समझ दिखाई नहीं पड़ रही। राष्ट्रवाद व साम्प्रदायवाद आखिर कब तक साथ देगा? खासकर तब तो बिल्कुल भी साथ नहीं देगा जब प्रदेशों में जनता सरकारी भ्रष्टाचार से कुचली जा रही है। भ्रष्टाचार पर जीरों टोलरेंस की दुहाई बहुत है परंतु अफसरी-कर्मचारी वर्ग में मानों कोई भय ही नहीं है, फिर क्यों कोई भाजपा को वोट देगा? पिछले दिनों सब्जी में प्याज से उपभोक्ता जो रोये हैं, वह वही जानते हैं। अभी रसोई गैस में जो आग लगी है, वह क्या दिल्ली चुनाव तक ही रोक कर रखी गई थी?</h4>
<h4 style="text-align:justify;">आमजन की धारणा में अब भाजपा एवं कांग्रेस में कोई फर्क नहीं दिख रहा। यहां फर्क दिखा वहांं केजरीवाल को भाजपा के प्रचण्ड प्रचार के बाद भी जनता ने तीसरी दफा सत्ता दे दी है। भाजपा के पास अभी नेहरू व वामपंथ को कोसने का राग है, जिसे वह धारा 370 हटाने, नागरिकता संशोधन बिल से लेकर हर उस मामले में छेड़ लेती है, यहां जनता के सवालों का जवाब भाजपा के पास नहीं होता। भाजपा को अपने वैचारिक संस्थानों को व्यवहारिक कसौटियों पर तराशना होगा जो कि वह कर नहीं सकी। जबकि उसे केन्द्र में सरकार चलाते हुए भी 6 साल होने को हैं। अब वह दौर जा रहा है जब नेता कुछ भी करते थे, फिर भी नेता रहते थे, अब नेताओं को जनता की सुननी होगी अन्यथा जनता नहीं सुनने वाली।</h4>
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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2020 12:46:02 +0530</pubDate>
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                <title>नेताओं के लिए शैक्षणिक योग्यता तय करने में हर्ज क्या?</title>
                                    <description><![CDATA[चुनावी दौर में जन प्रतिनिधियों की डिग्री पर फिर सवाल उठाए जाने लगे है। अल्प शिक्षित उम्मीदवारों पर तंज कसे जा रहे है।हालांकि नेता बनने के लिए कोई डिग्री तय नहीं है लेकिन जब देश को आधुनिक और पूर्ण शिक्षित राष्ट्र बनाने की पहल हो रही है तो फिर राज नेताओं का भी शिक्षित होना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/qualifications-for-leaders/article-8687"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-04/ledar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनावी दौर में जन प्रतिनिधियों की डिग्री पर फिर सवाल उठाए जाने लगे है। अल्प शिक्षित उम्मीदवारों पर तंज कसे जा रहे है।हालांकि नेता बनने के लिए कोई डिग्री तय नहीं है लेकिन जब देश को आधुनिक और पूर्ण शिक्षित राष्ट्र बनाने की पहल हो रही है तो फिर राज नेताओं का भी शिक्षित होना जरूरी हो जाता है।आज जब देश में शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने के लिए नीतियां बनाई जा रही है तब सहसा हमारी नजर उन नीतिनिर्धारकों पर पड़ जाती है जो अनपढ़ और अल्प शिक्षित है।चन्द माह पहले छत्तीसगढ़ में एक अनपढ़ मंत्री अपनी सपथ नहीं पढ़ सके,तो वहीं मध्यप्रदेश की साक्षर महिला मंत्री गणतंत्र दिवस पर मुख्यमंत्री के संदेश का पठन नहीं कर सकी। वहीं बीते साल कर्नाटक में 8वीं पास एमएलए जी.टी.देवगौड़ा को उच्च शिक्षा मंत्री बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इन उदाहरणों से समझा जा सकता है देश के ऐसे नीति निमार्ता,देश के लिए योग्य है या नहीं।अब यह सवाल उठना लाजमी है कि ऐसे अल्प शिक्षित मंत्री समझ के बिना उच्च शिक्षा के नियम कैसे बनाएंगे?जिसको शासन के मुलभूत नियमों की जानकारी नहीँ है वो भला क्या सुशासन कायम कर पायेगा!इसके इतर अगर संसद पर नजर डाले तो पता चलता है कि 23 फीसदी सांसद ऐसे है जो निरक्षरता से लेकर 12 वीं तक पास है।जिनमें से 1 निरक्षर है,5 साक्षर है,6 पांचवी पास है,9 आठवीं पास है,48 दसवी पास है और 57 बारहवीं पास सांसद हैं।वहीँ 12 सांसदों ने अपनी शैक्षणिक योग्यता नहीं बताई है।आज जब हम ‘न्यू इंडिया’ और ‘पढ़ेगा इंडिया बढ़ेगा इंडिया’की बात करते है तब नेताओं की शिक्षा को लेकर भी सवाल उठने ही चाहिये।</p>
<p style="text-align:justify;">यह विडम्बना ही है कि हमारे संविधान में एमएलए और एमपी के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय नही की गई हैं बल्कि केवल अनुुुभव को तरजीह दी गई है।आज जब चपरासी से लेकर अफसर तक के लिए शैक्षणिक योग्यता तय है तब नेताओं के लिए उच्च शिक्षा की अनिवार्य योग्यता होनी ही चाहीये क्योंकि ये ही नियम कायदे बनाते हैं और देश को चलाते हैं। जैसे हरियाणा राज्य में पंचायत,पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्य के चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता 8 वीं और 10 वीं पास अनिवार्य की जा चुकी है तब ऐसी स्थिति में एमपी और एमएलए के लिए भी न्यूनतम शैक्षिक योग्यता स्नातक तक अनिवार्य किये जाने की जरूरत ओर बढ़ जाती हैं।हालांकि राजस्थान में भी पहले यही नियम बनाया गया था लेकिन सत्ता बदलते ही वर्तमान सरकार ने इसको रद्द कर दिया है।वेल एज्यूकेटेड जन नेता आज बदलते डिजिटल युग की मांग है।</p>
<p style="text-align:justify;">उच्च शिक्षित नेता ही सही अर्थ में सार्थक नीतियाँ बना सकते है और समाज को सही दिशा दे सकते है।अगर राजनीती में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय की जाए तो इससे न केवल राजनीति में शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग बल्कि योग्य,उच्च शिक्षित युवा भी आगे आएंगे जिससे देश के विकास में भी बड़ा योगदान हो सकेगा।उच्च शिक्षित जनप्रतिनिधि जनहित से जुड़े मुद्दों की गहराई को आसानी से समझते हुए उसके समाधान के लिए बेहतर प्रयास कर सकते हैं जबकि अनपढ़ या अल्प शिक्षित जनप्रतिनिधि कई मुद्दों को सुलझाने में खुद उलझे रहते हैं। कई बार मुद्दों के तकनीकी पेंच को समझ नहीं पाते हैं।ऐसे में जनहित के कई महत्वपूर्ण मुद्दे गौण हो जाते है। इसके अलावा देश में अब तक राजनीति में शिक्षा की अनिवार्यता पर जोर नहीं दिया गया है इसके चलते आपराधिक छवि वाले लोगों का राजनीति में प्रवेश आसानी से हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अशिक्षित होने पर भी आपराधिक छवि के लोग जनप्रतिनिधि बन बैठते हैं। शिक्षा की अनिवार्यता से राजनीति में शिक्षित और अच्छे लोगों को आगे आने का मौका मिलेगा।उच्च शिक्षा की अनिवार्यता से युवाओं का राजनीति में भी रुझान बढ़ेगा। उच्च शैक्षणिक योग्यता को पूरी करने पर उनके लिए राजनीति में कैरियर बनाने के रास्ते खुलेंगे। साफ छवि और नए लोगों को आगे आने का मौका मिल सकेगा। इससे युवाओं के मन में राजनीति की गलत छवि भी सुधारी जा सकती है ।इसके अलावा शिक्षित जनप्रतिनिधि समाज को भी सही दिशा देने में सक्षम होंगे ।सरकारी योजनाओं का लाभ जनता को मिले और लोगों को ज्यादा से ज्यादा फायदा मिले इसके लिए उच्च शिक्षित जनप्रतिनिधि योजना अनुसार काम करते हुए जनता की समस्याओं को बेहतर और गहरा से समझते हुए उन को लाभान्वित कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नौकरशाही में आने के लिए जहां तमाम तरह की शिक्षा व्यवस्था लागू है उससे कर्मचारी व अधिकारी वर्ग तो सरकारी कार्यों को संपादित करने में सक्षम रहते हैं लेकिन उन कार्यों को समझने में अल्प शिक्षित या अनपढ़ जनप्रतिनिधि अक्षम होते हैं ।जिसके चलते नौकरशाहों और राजनेताओं में समन्वय स्थापित नहीं हो पाता है। शिक्षित राजनेता आपसी समन्वय से नौकरशाहों को ठीक प्रकार से निर्देशित कर सकते हैं। राजनीति में उच्चतर शिक्षा की योग्यता लागू करने से राजनीतिक पार्टियों को परेशानी तो हो सकती है लेकिन अभी तक राजनीतिक पार्टियां क्षेत्रीय वर्चस्व के आधार पर उम्मीदवार का चयन करते हैं चाहे वह शिक्षित हो या अशिक्षित। कई बार अनपढ़ जनप्रतिनिधि जनता के बीच में अपनी एक पैठ बना लेते हैं और उसी के बल पर चुनाव जीत जाते हैं लेकिन शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य करने से उनकी यह पैठ काम नहीं आएगी। केवल योग्य व्यक्ति ही मान्य होगा।आज का युुुुग तकनीक का युग है और उच्च शिक्षित जनप्रतिनिधि ही तकनीक को आसानी से समझते हुए कार्यो को श्रेष्ठ तरीके से सम्पादित कर सकते है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश को विकसित बनाने,विकास कार्य करवाने और शिक्षा की दिशा में अग्रसर कार्य करवाने के लिए नेताओं का उच्च शिक्षित होना आज के समय की मांग हैं।इसके अलावा जन प्रतिनिधियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र भी तय की जानी चाहिए ताकि योग्य युवाओं को आगे आने का उचित अवसर मिल सके।इसको लेकर नियम बनाया जाना चाहिए।आज के दौर में राजनीति को रोजगार की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए।जब देश में उच्च शिक्षित बेरोजगार बढ़ रहे है तो ऐसे में राजनीति में इनको अवसर मिलना चाहिए ताकि इनको कुछ काम करने का मोका मिले।अगर हम दूसरे विकसित देशों से तुलना करें तो हम समझ सकते है कि वहां के देश के विकास में शिक्षित राज नेताओं का योगदान काफी महत्वपूर्ण रहा है।अब हमारे देश में पहल होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;">नरपत दान चारण</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Apr 2019 19:47:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मिड-डे-मील योजना: सात खंडों के 271 स्कूल मुखिया नहीं अपलोड कर रहे डाटा</title>
                                    <description><![CDATA[निदेशालय ने जताई आपत्ति, मांगा स्पष्टीकरण सच कहूँ/सुनील वर्मा सरसा। मिड-डे-मील योजना का डाटा आॅटोमेटिक मॉनिटरिंग सिस्टम पोर्टल (एएमएसपी) पर जिले के सात खंडों के 271 सरकारी स्कूलों के मुखिया, इन्चार्ज द्वारा अपलोड नहीं किया गया हैं। वर्किंग डे में विभाग द्वारा दिए गए नम्बर 15544 पर रजिस्टर्ड मोबाईल से मिड-डे-मील संबंधी जानकारी उपलब्ध न […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2 style="text-align:justify;">निदेशालय ने जताई आपत्ति, मांगा स्पष्टीकरण</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/सुनील वर्मा</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा।</strong> मिड-डे-मील योजना का डाटा आॅटोमेटिक मॉनिटरिंग सिस्टम पोर्टल (एएमएसपी) पर जिले के सात खंडों के 271 सरकारी स्कूलों के मुखिया, इन्चार्ज द्वारा अपलोड नहीं किया गया हैं। वर्किंग डे में विभाग द्वारा दिए गए नम्बर 15544 पर रजिस्टर्ड मोबाईल से मिड-डे-मील संबंधी जानकारी उपलब्ध न करवाने पर निदेशालय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए जिला के सभी खंडों के स्कूल मुखिया व इंचार्ज से स्पष्टीकरण मांगा गया है। जिला के सात खंडों में कुल 829 स्कूल है। जिनमें से 558 स्कूल मुखिया अपना डाटा रोजाना अपलोड कर रहे है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि 271 स्कूल ऐेसे है जहां के मुखिया मिड-डे-मील का डाटा एसएमएस नहीं कर रहे हैं। इनमें सरसा के सबसे अधिक 53 स्कूल है जो मिड-डे-मील की रिपोर्ट नहीं भेज रहे हैं। बता दें कि मिड-डे मील को लेकर लगातार शिकायतें आ रही थी। जिनमें समय पर मील नहीं दिए जाने, तो कहीं गुणवत्तापरक भोजन दिए जाने के मामले सामने रहे हैं। इसके लिए शिक्षा विभाग की ओर से पोर्टल शुरू किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">पोर्टल पर रोज मील की डिटेल स्कूल मुखियाओं को देनी होती है। इस रिपोर्ट में स्कूल मुखिया या इंचार्ज को राशन कितने बच्चों ने खाया और कितना बचा इसकी पूर्ण डिटेल पोर्टल पर अपलोड करनी होती है। अब जब जिला के विद्यालयों के मुखिया, इन्चार्ज द्वारा प्रतिदिन एसएमएस क्यों नहीं भेजा जा रहा है, इस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है और साथ ही जल्द से जल्द सभी खंडों का डाटा 100 प्रतिशत पूरा करने के भी निर्देश जारी किए गए हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">रोजाना 15544 पर एसएमएस कर भेजनी होती है डिटेल</h2>
<p style="text-align:justify;">मिड-डे- मील को लेकर शिक्षा विभाग की ओर से एसएमएस की सेवा भी शुरू की गई। इसमें स्कूल मुखियाओं को सभी मील की रोजाना की डिटेल 15544 पर एसएमएस करनी है। जिसके बाद यह आॅटोमेटिक पोर्टल पर पहुंच जाएगी। जबकि पोर्टल पर अपलोड के लिए पहले स्कूल मुखिया को रजिस्टर में एंट्री करनी होगी। इसके बाद बीईओज को यह डाटा भेजना होगा। वहां से फिर पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">किस ब्लॉक में कितने स्कूल नहीं भेज रहे रिपोर्ट</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ब्लॉक का नाम,   कुल स्कूल,     रिपोर्ट करने वाले स्कूल,      रिपोर्ट न भेजने वाले स्कूल</strong><br />
बड़ागुढ़ा,             107,                  69,                                 38<br />
डबवाली,             133,                  92,                                41<br />
ऐलनाबाद,          97,                    66,                                31<br />
नाथूसरी ,           136,                  94,                                 42<br />
ओढां,                 83,                   52,                                  31<br />
रानियां,              126,                 91,                                  35<br />
सरसा,                145,                 94,                                  53</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘जिला के उपजिला शिक्षा अधिकारी पवन सुथार ने बताया कि जिन स्कूलों के मुखिया द्वारा मिड-डे-मील संबंधी डाटा नहीं भेजा जा रहा, उनसे विभाग ने स्पष्टीकरण मांगा है। जल्द से जल्द 100 प्रतिशत डाटा अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/sirsa-school-leaders-not-uploading-data/article-7651</link>
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                <pubDate>Tue, 12 Feb 2019 18:54:26 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तिरुवनंतपुरम: माकपा और भाजपा नेताओं के घर पर बम से हमले, अब तक 1700 गिरफ्तार</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश का आदेश दिया हिंदू संगठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ, जबकि राज्य की माकपा सरकार पक्ष में भाजपा के स्थानीय नेता ने कहा- मोदी का रविवार को होने वाला केरल दौरा टला तिरुवनंतपुरम (एजेंसी)। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/sabarimala-bjp-leaders-and-cpm-houses-attacked-with-bombs/article-7222"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-01/attacked-.jpg" alt=""></a><br /><h2>सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश का आदेश दिया</h2>
<ul>
<li>हिंदू संगठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ, जबकि राज्य की माकपा सरकार पक्ष में</li>
<li>भाजपा के स्थानीय नेता ने कहा- मोदी का रविवार को होने वाला केरल दौरा टला
<p><strong>तिरुवनंतपुरम (एजेंसी)।</strong> सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ केरल में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों में तेजी आई है। माकपा के थालासेरी विधायक एएन शमसीर के घर पर शुक्रवार देर रात बम से हमला किया गया। इससे पहले भाजपा सांसद वी मुरलीधरन, माकपा के कन्नूर जिला सचिव पी शशि और पार्टी कार्यकर्ता विशक के घरों पर भी बम फेंके गए। हमले में विशक घायल हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने करीब तीन महीने पहले मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। भाजपा और हिंदू संगठन इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। वहीं, राज्य की माकपा सरकार कोर्ट के फैसले को लागू कराने के पक्ष में है। माकपा ने अपने नेताओं के घरों पर हुए हमलों के लिए आरएसएस के स्वयंसेवकों को, जबकि भाजपा ने माकपा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराया है। राज्य में 1738 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है। 1108 मामले दर्ज किए गए हैं।</p></li>
</ul>
<h2>मोदी का केरल दौरा टला</h2>
<p>इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राज्य में रविवार को होने वाला दौरा टाल दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में भाजपा के एक स्थानीय वरिष्ठ नेता के हवाले से यह जानकारी दी गई। भाजपा नेता ने कहा, ‘‘पीएम की पठानमथिट्टा यात्रा 6 जनवरी को कुछ अन्य व्यस्तताओं के कारण स्थगित कर दी गई है। इसका मौजूदा स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन हम इस स्थिति को और बढ़ाना नहीं चाहते।’’</p>
<h2>800 साल से चली आ रही प्रथा</h2>
<p>28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में हर उम्र की महिला को प्रवेश देने की इजाजत दी थी। इस फैसले के खिलाफ केरल के राजपरिवार और मंदिर के मुख्य पुजारियों समेत कई हिंदू संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। हालांकि, अदालत ने सुनवाई से इनकार कर दिया। इससे पहले यहां 10 से 50 साल उम्र की महिला के प्रवेश पर रोक थी। यह प्रथा 800 साल पुरानी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरे राज्यभर में विरोध हुआ।</p>
<h2>आदेश के बाद 3 बार खुला मंदिर</h2>
<p>आदेश के बाद 16 नवंबर को तीसरी बार मंदिर खोला गया। मंदिर 62 दिनों की पूजा के लिए खुला, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी विरोध के चलते 1 जनवरी तक कोई महिला मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाई थी।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Jan 2019 11:27:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ममता के विपक्षी दलों के नेताओं से मिलने की उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। तीन दिवसीय दौरे पर दिल्ली आयीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के इस दौरान राष्ट्रीय विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए इन दलों के शीर्ष नेताओं से मिलने की संभावना है। वह उन्हें आगामी 19 जनवरी की रैली के लिए आमंत्रित भी करेंगी। तृणमूल के सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/mamata-hopes-to-meet-leaders-of-opposition-parties/article-5066"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/mamata-hopes-meet-leaders-opposition-parties.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong></p>
<p style="text-align:justify;">तीन दिवसीय दौरे पर दिल्ली आयीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के इस दौरान राष्ट्रीय विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए इन दलों के शीर्ष नेताओं से मिलने की संभावना है। वह उन्हें आगामी 19 जनवरी की रैली के लिए आमंत्रित भी करेंगी। तृणमूल के सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के मंगलवार या बुधवार को संसद के सेंट्रल हॉल जाने का कार्यक्रम है और वह विपक्षी दलों के नेताओं में शामिल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर आगामी 19 जनवरी को कोलकाता में ‘संघीय एवं भाजपा विरोधी ताकतों’ की रैली के लिए आमंत्रित कर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुश्री बनर्जी ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से भी मुलाकात का समय मांगा है और उनसे असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) के मुद्दे पर चर्चा करने करने की संभावना है। वह कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस द्वारा मंगलवार को आयोजित सम्मेलन में व्याख्यान भी देंगी। पार्टी सूत्रों के अनुसार सुश्री बनर्जी का वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और वर्तमान भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा से भी मिलने का कार्यक्रम है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के भी उनसे मिलने की उम्मीद है।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Jul 2018 06:48:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बैंक डिफाल्टरों की लिस्ट में टॉप पर नेताओं के रिश्तेदार, विधायक भी शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[4 करोड़ 50 लाख रुपए वापिस नहीं करने के चलते डिफाल्टर घोषित | Bank Defaulter सच कहूँ/अश्वनी चावला/चंडीगढ़। हरियाणा के किसानों की भलाई के लिए बनाया गया कोआपरेटिव एग्रीकल्चर व ग्रामीण विकास बैंक हरियाणा के कुछ राजनेताओं के परिवारों की लूट की भेंट चढ़ गया है। कोआपरेटिव बैंक से राजनीतक लोगों ने अपने रसूख के चलते रिश्तेदारों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h1 style="text-align:center;">4 करोड़ 50 लाख रुपए वापिस नहीं करने के चलते<br />
डिफाल्टर घोषित | Bank Defaulter</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/अश्वनी चावला/</strong>चंडीगढ़। हरियाणा के किसानों की भलाई के लिए बनाया गया कोआपरेटिव एग्रीकल्चर व ग्रामीण विकास बैंक हरियाणा के कुछ राजनेताओं के परिवारों की लूट की भेंट चढ़ गया है<strong>।</strong> कोआपरेटिव बैंक से राजनीतक लोगों ने अपने रसूख के चलते रिश्तेदारों को लोन तो जरुर दिलवाया परन्तु उस लोन की आज तक वापसी नहीं हो पाई है। कोआपरेटिव बैंक ने ऐसे राजनेताओं के रिश्तेदारों को 4 करोड़ 50 लाख रुपए वापिस नहीं करने के चलते डिफाल्टर <strong>(Bank Defaulter)</strong> घोषित कर दिया है। इस मामले में मौजूदा भाजपा की सरकार इन डिफाल्टरों पर कोई भी कार्रवाई करने में बेबस नजर आ रही है क्योंकि इन डिफाल्टर में ज्यादातर राजनीतक लीडरों के रिश्तेदार व खुद विधायक शामिल हैं।</p>
<h2>कोआपरेटिव बैंक से राजनेताओं के परिवारों की लूट की भेंट चढ़ गया | Bank Defaulter</h2>
<p style="text-align:justify;">जानकारी अनुसार को आपरेटिव एग्रीकल्चर व दिहाती विकास बैंक हरियाणा की तरफ से हरियाणा में रहने वाले किसानों व किसानी से जुड़े हुए लोगों को व्यपार में मदद करने के लिए लोन देता है जिससे किसान जमीन खरीदने या फिर किसानी से जुड़े अन्य कामों में उस लोन को खर्च किया जा सकता है। को आपरेटिव बैंक में राजनीतक दखल ज्यादा होने के कारण विधायक व संसद मेम्बरों सहित उनके परिवार वाले बहुत ही आसानी से इस बैंक से लोन लेकर पिछले कई सालों से अपना काम चला रहे है। इन राजनीतिक घरानों की तरफ से लोन तो लिया जा रहा है परन्तु उसकी वापिसी नहीं की जा रही है। जिस कारण राजनीतक घरानों व उन से जुड़े हुए लोगो की तरफ को आपरेटिव बैंक का 4 करोड़ 50 लाख 13 हजार 274 रुपए का बकाया खड़ा हुया है और यह सभी डिफाल्टर घोषित किये हुए हैं।</p>
<h1 style="text-align:center;">डॉ. के वी सिंह के रिश्तेदार सबसे बड़े डिफाल्टर | Bank Defaulter</h1>
<ul>
<li>कांग्रेस के लीडर डॉ के वी सिंह के रिश्तेदार को आपरेटिव बैंक के सभी से बड़े डिफाल्टर हैं।</li>
<li>डॉ केवी सिंह के 12 रिश्तेदारों ने एक ही दिन 14 मई 2008 को 10-10 लाख का लोन लिया था</li>
<li>कुछ ही समय बाद यह सारे ही डिफाल्टर हो गये।</li>
<li>सभी से को आपरेटिव बैंक ने बयाज सहित 17-17 लाख से ज्यादा लेना है।</li>
<li>डॉ के वी सिंह के रिश्तेदारों ने बैंक के 2 करोड़ रुपए लौटाने हैं।</li>
</ul>
<h2>विधायक व सांसद खुद डिफाल्टर, लम्बी है लिस्ट | Bank Defaulter</h2>
<p style="text-align:justify;">आपरेटिव बैंक से लोन लेने वालों में दर्जनों विधायक व संसद मेम्बरों सहित उनके राजनीतक लीडरों व रिश्तेदारों ने एक ही दिन में कई कई लोन लेकर डिफाल्टर किया है और लोन वापसी नहीं की जा रही है। ऐसे विधायकों व संसद मेम्बरों सहित राजनीतक घरानों की लिस्ट बहुत ही ज्यादा लम्बी है, जिसमे कांग्रेस व इनेलों के ज्यादा लीडर व उनके परिवारिक मेम्बर शामिल हं।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/top-the-list-of-leaders-relative-bank-defaulter/article-4805</link>
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                <pubDate>Thu, 12 Jul 2018 10:31:03 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजस्थान के नेताओं से वन-टू-वन मिलेंगे अमित शाह, चुनावी रोडमैप पर चर्चा</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर (एजेंसी)। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बुधवार को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित प्रदेश के एक दर्जन नेताओं को दिल्ली तलब किया है। राजस्‍थान विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस मुलाकात को अहम माना जा रहा है। बता दें इस राज्‍य में करीब छह माह बाद चुनाव होने हैं। अमित शाह बुधवार दोपहर तीन बजे भाजपा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/amit-shah-to-meet-one-two-one-from-rajasthan-leaders/article-4140"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/shaa.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (एजेंसी)। </strong>भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बुधवार को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित प्रदेश के एक दर्जन नेताओं को दिल्ली तलब किया है। राजस्‍थान विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस मुलाकात को अहम माना जा रहा है। बता दें इस राज्‍य में करीब छह माह बाद चुनाव होने हैं। अमित शाह बुधवार दोपहर तीन बजे भाजपा मुख्यालय में मुख्यमंत्री सहित अन्य नेताओं के साथ पहले तो सामूहिक तौर पर बैठक करेंगे और फिर वन-टू-वन मुलाकात का दौर भी चलेगा। इस बैठक में राज्य विधानसभा चुनाव की तैयारियों और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चर्चा होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक में अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल प्रदेश के नेताओं के साथ विधानसभा चुनाव के रोडमैप पर चर्चा करेंगे। चुनाव अभियान को लेकर रणनीति भी बनाई जाएगी। विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की यात्राओं के कार्यक्रम, मुख्यमंत्री द्वारा जुलाई से निकाली जाने वाली यात्रा, पार्टी विस्तारकों एवं पोलिंग बूथ मैनेजमेंट पर चर्चा होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बुधवार को होने वाली बैठक में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर, राजस्थान के प्रभारी अविनश खन्ना, महामंत्री भूपेन्द्र यादव, केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल, सीआर चौधरी, राज्यसभा सदस्य रामनारायण डूडी, मदनलाल सैनी, भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री चन्द्रशेखर, राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया, परिवहन मंत्री युनूस खान, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अरुण चतुर्वेदी और ग्रामीण विकास मंत्री राजेन्द्र राठौड़ मौजूद रहेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से 16 अप्रैल को इस्तीफा देने वाले अशोक परनामी ने उम्मीद जताई कि अगले सप्ताह तक पार्टी को नया चेहरा मिल जाएगा। गौरतलब है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अशोक परनामी से इस्तीफा मांगने के साथ ही केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को नया अध्यक्ष बनाने का मानस बनाया था, लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खेमे ने गजेन्द्र सिंह का विरोध करते हुए दिल्ली में जबरदस्त लॉबिंग की थी । इस कारण नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा रोक दी थी।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Jun 2018 10:56:26 +0530</pubDate>
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                <title>वंशवादी परिपाटी खत्म कब होगी?</title>
                                    <description><![CDATA[आदमी आजाद है, देश भी स्वतंत्र है। राजा गए रानी गई, अब तो प्रजातंत्र है। वोट छोटा सा मगर शक्ति में अनंत है, अब तो प्रजातंत्र है। किसी ने खूबसूरती से प्रजातंत्र को परिभाषित किया है। पर वास्तव में प्रजातंत्र में प्रजा की सुनवाई हो पा रही है? क्या जो अवसर, समता की गारंटी हमारा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/when-will-the-dynastic-tradition-be-over/article-3341"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-09/vote.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आदमी आजाद है, देश भी स्वतंत्र है। राजा गए रानी गई, अब तो प्रजातंत्र है। वोट छोटा सा मगर शक्ति में अनंत है, अब तो प्रजातंत्र है। किसी ने खूबसूरती से प्रजातंत्र को परिभाषित किया है। पर वास्तव में प्रजातंत्र में प्रजा की सुनवाई हो पा रही है? क्या जो अवसर, समता की गारंटी हमारा संविधान लेता है, उसको प्रजातंत्र के खेवनहार उपलब्ध करा पाते हैं?</p>
<p style="text-align:justify;">मत की शक्ति प्रजातंत्र में मिली, क्या उसका सही प्रयोग हो रहा है? या राजनीति वाले साधक उसको भी ताक पर रख दिए हैं। सवाल तो बहुतेरे हैं, लेकिन वास्तविकता में आदमी आजाद है, देश भी स्वतंत्र है, कि पंक्ति आज के दौर में फसाना ही लगती है। जब राजनीति नेताओं के लिए अर्थनीति का साधन बन जाए। सत्ता परिवारवाद की गोदी में सिमट जाए। जनता का जनतंत्र में कोई प्रत्यक्ष योगदान न रह जाए, जनता को कठपुतलियों की तरह सियासतदान नचाने लगें, तो फिर लगता यहीं है, कि न तो राजा गए, न रानी गई, बल्कि देश को लूटने की एक समानांतर व्यवस्था ने डेरा जमा लिया है। देश की व्यवस्था संविधान के अनुरूप चलता है, लेकिन वास्तविकता की जड़ को खोदकर देखा जाए, तो सच्चाई की परत कुछ और? ही दिखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जो प्रजातंत्र के खोखला होने की मोहर लगाने का काम करती है। संविधान में जातिवादी व्यवस्था को खत्म करने की बात की गई, लेकिन क्या आज तक देश की व्यवस्था से जातिवादी की जकड़न टूटी, क्या अवसर की समता प्राप्त हुई, सबको समान न्याय उपलब्ध हो सका, गरीब मिटी, परिवारवाद की राजनीति छिन्न-भिन्न हुई, उत्तर फिर न में ही मिलता है। फिर किस लोकतंत्र और जनवादी व्यवस्था की बात देश में होती है?</p>
<p style="text-align:justify;">आज आजादी के बाद देश की स्थिति यह है, कि देश से राजवंश की व्यवस्था भले चली गईं, लेकिन वह सामंती व्यवस्था अभी भी राजनीति में हावी है, अगर देश का वास्तविक विकास और अंतिम छोर तक विकास की यात्रा को पहुँचाना है। वंशवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना होगा। तभी देश के अधिक से अधिक हाथ तक सत्ता की पहुँच हो पाएगी, और तभी जाकर स्वस्थ लोकतंत्र अच्छे से पुष्पित और पल्लवित होकर निखर कर सामने आ पाएगा। इसके साथ दबे- कुचलों की आवाजें भी सुनाई पड़ेगी। हमारा सुंदर सा लोकतंत्र कुछ घरानों की राजनीति तक सीमित होता जा रहा है, यह देश के सियासतदार समय-समय पर कबूलते भी है, लेकिन दुर्भाग्य यह है, कि इसको दूर करने का सार्थक प्रयास कहीं से नहीं दिखता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज वंशवादी साया जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला वंश से चलकर मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा सईद से होते हुए , दक्षिण भारत में करुणानिधि, मारन और देवेगौड़ा के वंश तक पहुँचती है। यह वंशवादी राजनीति की रासलीला रूपी पटकथा यही समाप्त नही होती। इसकी ताकत का पता उड़ीसा से भी चलता है, जहां पिछले पंद्रह वर्षों से पटनायक वंश की हुकूमत है। इस ज्वर से पीडित उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य हिंदी भाषी राज्य भी हैं, जहाँ पर वंशवादी राजनीति ने स्वस्थ लोकतंत्र का गला घोंटने का काम किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज देश की आवाम मूलभूत रोटी, पानी और बिजली के लिए जूझती है, तो उसका कारण राजनीति की नई वंशवादी व्यवस्था ही है। एक सर्वे के मुताबिक देश मे वर्तमान संसद में वंशवादी सांसदों की संख्या में दो प्रतिशत और सरकार में ऐसे मंत्रियों की संख्या में 12 प्रतिशत की कमी आई है। जो कुछ शुभ संकेत माना जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पैट्रिक फ्रेंच ने 2012 में अपनी एक किताब में देश के बारे में लिखा था, यदि वंशवाद की यही राजनीति चलती रही, तो भारत की दशा उन दिनों जैसी हो जाएगी जब यहां राजा महाराजाओं का शासन हुआ करता था। आंकड़े के खेल में इस गतिशील संसद में वंशवाद की राजनीति में कुछ फीसद का सुधार हुआ है। पिछली संसद में 29 फीसद राजनीतिक घरानों से थे, तो इस बार यह आंकड़ा 21 पर रुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">2011 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक 18 से 30 वर्ष की उम्र वाले युवा मतदाता सामान्यतया वंशवादी राजनीति की मुखालफत करते हैं, परन्तु जब राजनीतिक घराने से युवा उम्मीदवार आता है तो वे उसे ही मत देने को वरीयता देते हैं। इस प्रथा को भी बंद करना होगा, अगर वर्तमान रजवाड़े की शक़्ल से देश को आजादी चाहिए, तो। अब जब देश की राजनीति में वंशवादी व्यवस्था के जनक यह मान रहे हैं, कि देश वंशवाद से ग्रसित है, तो वह रवायत अब जरूर दूर होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-महेश तिवारी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 Sep 2017 03:46:30 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>शाह के बयान से 75+ के 25 नेताओं को उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली: अमित शाह ने शनिवार को मध्यप्रदेश में यह कहकर सबको चौंका दिया कि 75 साल से ज्यादा उम्र के नेताओं को चुनाव नहीं लड़ाने का पार्टी में कोई नियम नहीं है। न ही ऐसी कोई परंपरा है। बीजेपी हाईकमान के रुख में इस लचीलेपन से पार्टी के 75+ के करीब 25 नेताओं में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong> अमित शाह ने शनिवार को मध्यप्रदेश में यह कहकर सबको चौंका दिया कि 75 साल से ज्यादा उम्र के नेताओं को चुनाव नहीं लड़ाने का पार्टी में कोई नियम नहीं है। न ही ऐसी कोई परंपरा है। बीजेपी हाईकमान के रुख में इस लचीलेपन से पार्टी के 75+ के करीब 25 नेताओं में एक बार फिर सक्रिय राजनीति में लौटने की उम्मीद जग गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, 2014 में नरेंद्र मोदी ने 75 पार के नेताओं को कैबिनेट में नहीं रखा था। वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तक को मार्गदर्शक मंडल तक सीमित कर दिया था। उसी दौरान पार्टी में स्पष्ट कर दिया गया था कि चुनाव लड़ने की अधिकतम आयु सीमा 75 साल है। बीजेपी शासित राज्यों में भी यही फॉर्मूला अपनाया गया। गुजरात में मुख्यमंत्री रहीं आनंदीबेन पटेल को 75 की उम्र पार होते ही कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। उन्होंने यह आयु सीमा पूरी होने से महीने पहले ही पद छोड़ दिया था। फेसबुक पोस्ट में उम्र ही उन्होंने इस्तीफे की वजह बताई थी।</p>
<h1 style="text-align:justify;">इन्हें हो चुका नुकसान</h1>
<p style="text-align:justify;">लालकृष्ण आडवाणी (89), मुरली मनोहर जोशी (83)। मंत्री और राष्ट्रपति पद से वंचित रहे। संगठन में मार्गदर्शक मंडल तक सीमित। जिसकी आजतक एक भी बैठक नहीं हुई। आनंदीबेन पटेल (75) गुजरात की मुख्यमंत्री थीं, पद से उम्र के फार्मूले की वजह से हटना पड़ा। नजमा हेपतुल्ला (77) मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद थीं और केंद्र में अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री। 75 की उम्र होने पर न चाहते हुए पद छोड़ना पड़ा। अब राज्यपाल। यशवंत सिन्हा (84) झारखंड के हजारीबाग से जीतते रहे हैं। अटल सरकार में वित्त-विदेश मंत्री रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार टिकट बेटे को मिला। जून 2015 में कहा- ‘बीजेपी में 75 पार के लोगों को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया है।’ उत्तराखंड के पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी (82) को मंत्री नहीं बनाया। जसवंत सिंह (79), अरुण शौरी (75), लालजी टंडन (82), कल्याण सिंह (85), केशरी नाथ त्रिपाठी (82) समेत कई नेता उम्र की वजह से सक्रिय राजनीति से दूर कर दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Aug 2017 00:03:22 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शरद-नीतीश गुट की बैठक आज, यादव के Party में रहने पर हो सकता है फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[पटना: जेडीयू के बागी नेता शरद यादव और नीतीश कुमार की शनिवार को अलग-अलग मीटिंग होनी है। पार्टी महासचिव पद से हटाए गए अरुण श्रीवास्तव और राज्यसभा सांसद अली अनवर ने कहा शरद यादव और उनके समर्थक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का बहिष्कार करेंगे। यह गुट श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में अपनी अलग बैठक करेगा। नीतीश […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/sharad-nitish-group-meeting-today/article-3222"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/jdu-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>पटना:</strong> जेडीयू के बागी नेता शरद यादव और नीतीश कुमार की शनिवार को अलग-अलग मीटिंग होनी है। पार्टी महासचिव पद से हटाए गए अरुण श्रीवास्तव और राज्यसभा सांसद अली अनवर ने कहा शरद यादव और उनके समर्थक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का बहिष्कार करेंगे। यह गुट श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में अपनी अलग बैठक करेगा। नीतीश कुमार इसी दौरान पार्टी कार्यकारिणी की बैठक कर रहे होंगे। माना जा रहा है कि शरद पार्टी में रहेंगे या नहीं, इस पर फैसला हो सकता है।  अनवर ने कहा- नीतीश सत्ता का दुरूपयोग कर रहे हैं। शरद का गुट पार्टी के चुनाव चिन्ह तीर पर भी अपना दावा करेगा। यादव गुट जल्द ही इलेक्शन कमीशन जाएगा</p>
<h1 style="text-align:justify;">शरद सबसे पुराने नेता</h1>
<p style="text-align:justify;">अरुण ने कहा जेडीयू में शरद सबसे पुराने नेता हैं। नीतीश तो समता पार्टी के नेता थे। इसलिए जेडीयू के संस्थापक शरद हैं। हम चुनाव आयोग को यही बात बताकर तीर चुनाव चिह्न की मांग करेंगे। नीतीश कुमार को पार्टी के दस सांसदों और 71 विधायकों के अलावा केवल पांच राज्यों का समर्थन प्राप्त है।</p>
<h1 style="text-align:justify;">अब आमने-सामने आए शरद-नीतीश</h1>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि शरद यादव ने गुरुवार को दिल्ली में साझा विरासत बचाओ सम्मेलन किया था। इसमें राहुल गांधी समेत कांग्रेस, राजद और अन्य दल के कई नेता आए थे। बिहार में बीजेपी के साथ सरकार बनाने के बाद नीतीश और शरद यादव आमने-सामने आ गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों अमित शाह से मुलाकात के बाद नीतीश ने कहा था वो (शरद यादव) अपना रास्ता चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। पूरी पार्टी से विचार के बाद ही हमने यह फैसला लिया था। सबकी सहमति के बाद ही बीजेपी के साथ आए और बिहार में सरकार बनाई। मैं कुछ भी करने से पहले पार्टी के लोगों से जरूर पूछता हूं। शरद ने पिछले दिनों नीतीश के फैसले के खिलाफ राज्य में तीन दिन की यात्रा की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/other-news/sharad-nitish-group-meeting-today/article-3222</link>
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                <pubDate>Fri, 18 Aug 2017 22:31:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टेरर फंडिंग: कश्मीर में 12 जगहों पर NIA के छापे, 7 अलगाववादी नेता गिरफ्तार</title>
                                    <description><![CDATA[श्रीनगर: टेरर फंडिंग केस (Terror Funding) में एनआईए (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर में 12 जगहों पर छापे मारे। श्रीनगर, बारामुला और हंदवाड़ा में जांच एजेंसी ने कार्रवाई की। इस मामले में एनआईए कश्मीर के बड़े अलगाववादी नेता और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी के बेटों नईम और नसीम से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/nia-raids/article-3139"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/nif.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>श्रीनगर:</strong> टेरर फंडिंग केस <strong>(Terror Funding)</strong> में एनआईए (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर में 12 जगहों पर छापे मारे। श्रीनगर, बारामुला और हंदवाड़ा में जांच एजेंसी ने कार्रवाई की। इस मामले में एनआईए कश्मीर के बड़े अलगाववादी नेता और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी के बेटों नईम और नसीम से पूछताछ कर चुकी है। गिलानी को पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता माना जाता है। एजेंसी गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह (अल्ताफ फंटूश) समेत कश्मीर के 7 अलगाववादी नेताओं को अरेस्ट भी कर चुकी है।</p>
<h1 style="text-align:justify;">जहूर वटाली के करीबियों पर छापेमारी | Terror Funding</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;">छापेमारी में कारोबारी जहूर वटाली के करीबियों के यहां भी छापेमारी हुई है।</li>
<li style="text-align:justify;">इनकी अधिकतर संपत्ति दुबई, मुंबई, दिल्ली और चंडीगढ़ में है।</li>
<li style="text-align:justify;">जहूर वटाली के जिस ड्राइवर के यहां पर छापेमारी हुई है उसका नाम मोहम्मद अकबर है।</li>
<li style="text-align:justify;">इसके अलावा तराहमा में भी शफी के यहां पर छापे मारे गए हैं. शफी पेशे से वकील है।</li>
</ul>
<h1 style="text-align:justify;">गिलानी के दामाद अरेस्ट | Terror Funding</h1>
<p style="text-align:justify;">एनआईए ने इस केस में इसी साल 24 जुलाई को कश्मीर के 7 अलगाववादी नेताओं को अरेस्ट किया था। इनमें फारूख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे (JKLF लीडर), नईम खान, अल्ताफ अहमद शाह (अल्ताफ फंटूश), अयाज अकबर, टी. सैफुल्लाह, मेराज कलवल और शहीद-उल-इस्लाम शामिल हैं। अल्ताफ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख गिलानी के दामाद हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">छापे में मिले थे लश्कर-हिजबुल के लेटरहेड्स | Terror Funding</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;">एनआईए ने इस मामले में 3 जून को देश में 24 जगहों पर छापे मारे थे।</li>
<li style="text-align:justify;">कश्मीर में 14, दिल्ली में 8 और हरियाणा के सोनीपत में 2 जगहों पर छापे मारे गए थे।</li>
<li style="text-align:justify;">इस दौरान अलगाववादी नेताओं के घरों, ऑफिस और उनके कमर्शियल ठिकानों पर कार्रवाई की गई।</li>
<li style="text-align:justify;">दिल्ली में 8 हवाला डीलर्स और ट्रेडर्स के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी।</li>
<li style="text-align:justify;">– कश्मीर में कार्रवाई के दौरान 2 करोड़ रुपए और प्रॉपर्टी से जुड़े कागजात जब्त किए गए।</li>
<li style="text-align:justify;">लश्करे-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के लेटरहेड्स, लैपटॉप, पेन-ड्राइव्स भी मिले थे।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Aug 2017 01:10:42 +0530</pubDate>
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