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                <title>politics - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Youth : बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्यगत दशकों में जिन युवाओं (Youth) द्वारा राजनीति में प्रभावी प्रवेश लिया गया था, वे अब लगभग उम्रदराज होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर के अधिकांश स्थापित राजनीतिज्ञ बीते समय में युवा नेता के रूप में राजनीति में वर्चस्व स्थापित किए हुए थे। समय की धारा का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/youth-are-the-near-future/article-58494"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/whatsapp-image-2024-06-09-at-10.48.38-am.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्यगत दशकों में जिन युवाओं (Youth) द्वारा राजनीति में प्रभावी प्रवेश लिया गया था, वे अब लगभग उम्रदराज होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर के अधिकांश स्थापित राजनीतिज्ञ बीते समय में युवा नेता के रूप में राजनीति में वर्चस्व स्थापित किए हुए थे। समय की धारा का प्रवाह निरंतर गतिमान होता है। इस आधार पर इन दिनों राजनीति में नए स्वरूप में युवाओं की एक नई पौध आकार लेती दिखाई देती है। यही नहीं अपितु इस पौध को व्यापक रूप से जनमत के बहुमत द्वारा स्वीकार भी किया गया है। ऐसी स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि बुजुर्गवार नेता सत्ता और संगठन में अपने वर्चस्व का परित्याग करना नहीं चाहते। इसके चलते बहुत स्वाभाविक है कि विभिन्न राजनीतिक दलो में आंतरिक रूप से वर्चस्व की लड़ाई दिखाई दे। इस संदर्भ में राजनीतिक दलों का निर्णायक कदम, समय की मांग है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी राजनीति में सत्ता का रसास्वादन कर लेने के उपरांत कोई भी राजनेता इससे वंचित नहीं होना चाहता। यह भी एक मनोविज्ञान है कि राजनीति में एक दूसरे को धकेल कर अपनी जगह बनाने की मनोवृति दिखाई देती है। राजनीति में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ती उम्र के साथ-साथ कम नहीं होती, अपितु बढ़ती ही चली जाती है। इन दिनों विशेष रूप से हिंदी भाषी राज्यों में उक्त परिस्थितियां राजनीतिक उलटफेर का कारण बनते हुए नजर आती है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल कांग्रेस में ही है। दरअसल किसी न किसी रूप में हर किसी दल के समक्ष उक्त स्थिति निर्मित होना अवश्यंभावी है। बेहतर हो यदि विभिन्न राजनीतिक दल इन तमाम संदर्भों में अपना अभिमत ऐसा कोई संकट आने के पूर्व ही स्पष्ट रूप से घोषित कर देवें।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक योग्यता का प्रश्न है, पुरानी और नई पीढ़ी के पक्ष विपक्ष में अलग-अलग तर्कसम्मत दृष्टिकोण व्यक्त किए जा सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। दरअसल दोनों ही वर्ग में बेहतरीन तालमेल ही श्रेयस्कर होगा। इस संदर्भ में एक कदम आगे बढ़कर विभिन्न राजनीतिक दलों में सक्रिय राजनीति की अधिकतम आयु सीमा सुनिश्चित कर देनी चाहिए। यही नहीं अपितु सत्ता में भागीदारी होने पर भी पृथक रूप से एक निश्चित आयु सीमा निर्धारित कर देनी चाहिए। रहा सवाल वनवास का, तो वरिष्ठ नेताओं को दिशा निर्देशक के रूप में स्थापित किया जा सकता है । नए दौर में नई सोच की आज देश प्रदेश को जरूरत है। बीते दौर की राजनीति के पट्टी पहाड़े भी अब अप्रासंगिक सिद्ध हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में समय रहते राजनीतिक दलों को संज्ञान ले लेना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी इस समय देश प्रदेश में युवा वर्ग की स्थानीय से लेकर शीर्ष स्तर तक राजनीति में सक्रिय भागीदारी नए आयाम स्थापित कर रही है। ऐसे में यदि सत्ता या संगठन का दामन संभाले बुजुर्गवार युवाओं के लिए स्थान रिक्त नहीं करेंगे, तो असंतोष तो पनपेगा ही। इस संदर्भ में यह गौर करने लायक है कि कल के युवा नेता आज वृद्धावस्था को प्राप्त करते जा रहे हैं लेकिन पदलिप्सा से उबरना नहीं चाहते। दरअसल इन्हें अपना मनोविज्ञान बदलने की जरूरत है। बेहतर हो यदि सक्रिय राजनीति में आयुबंधन हो न हो, लेकिन पदासीन होने की स्थिति में आयु बंधन का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए। राजनीति में यह प्रयोग काफी हद तक सफल सिद्ध हो सकता है। सक्रिय राजनीति से विदाई का तरीका सम्मानजनक भी तो हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय देश-प्रदेश में युवा वर्ग की प्रधानता है। युवा मतदाता का स्वाभाविक रुझान युवा प्रत्याशी पर ही अधिक रहता है। हालांकि राजनीतिक प्रतिबद्धता भी अपनी जगह महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। जैसे-जैसे शिक्षा का विस्तार होता जा रहा है, वैसे-वैसे युवा वर्ग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के परिपालन में सक्षम सिद्ध हो रहे हैं। यही नहीं अपितु निरंतर परिवर्तित दौर में राजनीति के तौर-तरीकों में भी व्यापक बदलाव आया है। कहीं-कहीं तो ऐसा प्रतीत होता है कि जहां अनुभव घुटने टेक देता है, वहां नई सोच कैसी भी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम सिद्ध होती है। निश्चित रूप से तकनीकी दुनिया में युवाओं की बौद्धिक क्षमता में भी आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। विषयों को समझने की गहरी समझ युवा रखने लगे हैं। बावजूद इस सबके अनुभव के महत्व को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सामंजस्य ही अंतिम समाधान हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर वर्तमान संदर्भों के चलते विभिन्न राजनीतिक दलों को उक्त विषय के बारे में स्पष्ट नीति घोषित कर देनी चाहिए। माना कि यह सब इतना आसान भी नहीं होगा लेकिन वर्तमान नेतृत्व को इस संदर्भ में दृढ़निश्चय करना जरूरी है। अन्यथा जो कुछ घटनाक्रम आज कांग्रेस में चलता दिखाई दे रहा है ,उसकी अन्य दलों में पुनरावृति होने की संभावना से एकदम इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में बेहतर यही रहेगा कि दोनों ही वर्ग को परस्पर एक दूसरे के पूरक के रूप में सक्रिय रखा जाए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Jun 2024 11:12:01 +0530</pubDate>
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                <title>Lok Sabha Election : रोजगार के मुद्दे गायब, आरोप-प्रत्यारोप का दौर</title>
                                    <description><![CDATA[– Lok Sabha Election – देश में अब तक लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) के दो चरण संपन्न हो चुके हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह समय ‘करो या मरो’ की तरह नजर आ रहा है। प्रत्येक क्षेत्र में जोश व उत्साह आवश्यक है लेकिन राजनीतिक दलों का हमलावर रवैया बिल्कुल घटिया स्तर तक पहुंच […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/political-party-lok-sabha-election/article-56898"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/politics-2.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>– Lok Sabha Election –</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">देश में अब तक लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) के दो चरण संपन्न हो चुके हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह समय ‘करो या मरो’ की तरह नजर आ रहा है। प्रत्येक क्षेत्र में जोश व उत्साह आवश्यक है लेकिन राजनीतिक दलों का हमलावर रवैया बिल्कुल घटिया स्तर तक पहुंच गया है। राजनीति के आदर्श गायब होते जा रहे हैं। एक-दूसरे को कोसने की बजाए निजी हमले कर बदमाम किया जा रहा है, वह भी बिना किसी तथ्यों व सबूतों के। दरअसल, नेताओं की यह धारणा बन चुकी है कि ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप करने से ही लोगों में उनकी छवि बनेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति में नेताओं का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। इस आरोप-प्रत्यारोप के दौर में जनता के मुद्दे नजरअंदाज हो जाते हैं। बेरोजगारी, कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे तो शायद अब राजनीति में मुद्दे ही नहीं रहे। एक-दूसरे के लिए नफरत की बजाए सद्भावना और सम्मान की भावना जरूरी है। नेताओं को पूरी जिम्मेदारी से बयान देने चाहिए। साथ ही एक-दूसरे को कोसने की बजाए जनता के मुद्दों पर चर्चा करें। राजनीति में विरोध आवश्यक है लेकिन यह बेबुनियाद या केवल वोट के लिए पैंतरेबाजी न बने।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Apr 2024 10:15:29 +0530</pubDate>
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                <title>देश में फिर शुरू हुई जोड़-तोड़ की राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[Politics of Manipulation: देश की राजनीति में एक बार फिर जोड़-तोड़ की कशमकश जारी है। महाराष्ट्र में राजनीतिक घमासान चरम पर है। इधर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थिति भी शिवसेना जैसी होती जा रही है। पार्टी से बागी हुए अजित पवार ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शामिल होकर न केवल उप-मुख्यमंत्री का पद संभाल लिया है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/politics-of-manipulation/article-49685"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/politics.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Politics of Manipulation: देश की राजनीति में एक बार फिर जोड़-तोड़ की कशमकश जारी है। महाराष्ट्र में राजनीतिक घमासान चरम पर है। इधर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थिति भी शिवसेना जैसी होती जा रही है। पार्टी से बागी हुए अजित पवार ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शामिल होकर न केवल उप-मुख्यमंत्री का पद संभाल लिया है बल्कि चुनाव आयोग के समक्ष अपने गुट को ही वास्तविक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी होने का दावा भी कर दिया है। ऐसी घटनाओं से मतदाता में दुविधा की भावना प्रबल होती है। अब सवाल यह है कि अजित पवार ने पद के लालच में बगावत की है या फिर पार्टी से तंग आकर कोई फैसला लिया है। पार्टी अध्यक्ष शरद पवार ने अपनी बढ़ती उम्र को देखते हुए हाल ही में अपनी बेटी सुप्रिया सुले को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है, इसी बात से अजित नाराज बताए जा रहे थे। Politics of Manipulation</p>
<p style="text-align:justify;">उधर, 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी पार्टियां जोर-आजमाइश कर रही हैं। कांग्रेस, जनता दल, एनसीपी सहित 17 पार्टियां गठबंधन की कोशिश में हैं। इस चलन में मुद्दों की चर्चा बिल्कुल नदारद है, केवल किसी पार्टी विशेष को हराना राजनीति या लोकतंत्र नहीं है, बल्कि राजनीति का संबंध मुद्दों से जुड़ा हुआ है। पार्टियों में एजेंडे की चर्चा से अधिक गठबंधन की चर्चा ज्यादा हो रही है। इसी तरह कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार में भी जल्द सियासी तूफान उठने वाला है। वस्तुत: विचारों/एजेंडे की चर्चा जनता को अपने से जोड़ती है। लोकतंत्र में जनता का भी अहम स्थान है, लेकिन जब बिना किसी एजेंडे के बदलाव, गठबंधन हो जाए तब राजनीति केवल पार्टी नेताओं की कशमकश तक सीमित रह जाती है। Politics</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में राजनीति में विश्वसनीयता व स्पष्टता आवश्यक है लेकिन राजनीति इतनी पेचीदा स्थिति में पहुंच गई है कि आम वोटर को पता ही नहीं होता कि आखिर ये चल क्या रहा है। यदि कोई नेता किसी पार्टी का कट्टर विरोधी होता है और उसे जनता का दुश्मन बताया जाता है, जब वही नेता सत्ता में आ जाता है तो उसे वही पार्टी मां से भी प्यारी और उसे जनता का सेवक कहा जाने लगता है। राजनीति में स्वार्थ इस हद तक बढ़ गया है कि गठबंधन के लिए सिद्धांतों की बलि दी जाती है और केवल पद लेना ही मुख्य उद्देश्य रह जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक ऐसा भी समय था जब गुरमुख सिंह मुसाफिर जैसे नेता को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति हो गई थी, तब मुसाफिर साहब को यह निर्णय पसंद नहीं आया और वह कहीं जाकर छिप गए थे। बड़ी मुश्किल से उन्हें ढूंढा गया, वहीं दूसरी ओर हमने एक ऐसा नेता भी देखा जिसने पंद्रह दिन के अंदर तीन पार्टियां बदल लीं। दलबदल विरोधी कानून बनाने का मुख्य कारण उसी नेता का तख्तापलट था। गठबंधन भी टूट रहे हैं और बन भी रहे हैं। पता नहीं कब किसी नेता को अपने प्रतिद्वंद्वी नेता का पार्टनर बनने का वक्त आ जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। यह चलन राजनीति चमक को फीका कर रहा है। Politics of Manipulation</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="BJP vs Opposition: भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के प्रयास" href="http://10.0.0.122:1245/opposition-unity-efforts-against-bjp/">BJP vs Opposition: भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के प्रयास</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Jul 2023 11:05:46 +0530</pubDate>
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                <title>Editorial : संवैधानिक पदों की गरिमा कायम रहे</title>
                                    <description><![CDATA[Editorial: संवैधानिक पद पर आसीन राज्यपाल एवं चुनी हुई सरकारों के बीच टकराव की स्थितियां अनेक बार बनती रही हैं। गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच इस तरह का टकराव एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन यह टकराव न केवल लोकतंत्र के लिए बल्कि शासन-व्यवस्थाओं पर एक बदनुमा दाग की तरह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/may-the-dignity-of-constitutional-posts-be-maintained/article-49119"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/politics-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Editorial: संवैधानिक पद पर आसीन राज्यपाल एवं चुनी हुई सरकारों के बीच टकराव की स्थितियां अनेक बार बनती रही हैं। गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच इस तरह का टकराव एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन यह टकराव न केवल लोकतंत्र के लिए बल्कि शासन-व्यवस्थाओं पर एक बदनुमा दाग की तरह है। तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में ऐसी स्थितियां बढ़-चढ़कर देखने को मिली हैं। इन सभी राज्यों में गैर-भाजपा सरकार है और एक बात कॉमन है वो बात है राज्य सरकार का राज्यपाल के साथ विवाद। बीते कुछ समय से इन पांचों राज्यों में राज्यपाल बनाम राज्य सरकार का वाक-युद्ध भी देखने को मिला। Politics</p>
<p style="text-align:justify;">सभी राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच बयानबाजी चलती रहती थी। हाल ही में यह विवाद पंजाब मं देखने को मिला। पंजाब सरकार ने विधान सभा में बिल पारित कर राज्यपाल को राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के पद से हटा दिया है। ऐसे माहौल में राज्यपाल के संवैधानिक पद की महत्ता और प्रासंगिकता का चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। वास्तव में राज्यपाल के पद के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। यह पद केंद्र और राज्यों की तर्ज पर संसदीय प्रणाली को लागू करने के लिए सृजित किया गया था। Politics</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल के पद पर स्थापित व्यक्ति की राजनीतिक पृष्ठभूमि ही समस्या पैदा करती है। पिछले 4-5 दशकों से यह चलन रहा है कि केंद्र में सत्तापक्ष दल ही अपने किसी एक नेता को राज्यपाल नियुक्त करता रहा है। राज्यपाल के पद को अराजनीतिक रखना आवश्यक है। दूसरी ओर, यह बात भी नहीं है कि प्रत्येक राजनीतिक नेता राज्यपाल के पद पर जाकर पार्टीवाद में फंस जाता है। दूसरी तरफ देश में ऐसी अराजनीतिक शख्सियतों की भी कोई कमी नहीं है जो पूरी निष्ठा से इस पद पर कार्य कर सकते हैं, फिर भी गैर-राजनीतिक व्यक्तियों की नियुक्ति से टकराव कम होने की संभावना अधिक है। विवाद से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। Editorial</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार के लिए शब्दों का मर्यादा और सम्मान बनाए रखना भी आवश्यक है। संघर्ष समय की बबार्दी है। धैर्य और सद्भावना नेताओं की विशेषता का अंग है। राज्यपाल पद की गरिमा और मर्यादा को लेकर सवाल उठाने वालों की मंशा पर भी ध्यान देना होगा। पर राज्यपाल से भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपने को केंद्र के सत्तारूढ़ दल का प्रतिनिधि मान कर उसकी विचारधारा के अनुरूप राज्य सरकार से काम करवाने का प्रयास करने के बजाय पद की गरिमा के अनुरूप काम करें। Politics</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jun 2023 15:23:06 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>राजनीति में भी हो सहिष्णुता</title>
                                    <description><![CDATA[हिन्दुस्तान की राजनीति (Politics) ने अब एक नई राह पकड़ ली है। असहिष्णुता (Intolerance) की राह, नफरत व बदलाखोरी की राह। राजनीति में सिद्धांत, उसूल, मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं। सिद्धांत केवल एक बचा है वो है साम, दाम, दंड भेद से सत्ता प्राप्त करना। आज विपक्ष का काम केवल विरोध करना और सत्ता […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/tolerance-in-politics/article-48035"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/politics.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिन्दुस्तान की राजनीति (Politics) ने अब एक नई राह पकड़ ली है। असहिष्णुता (Intolerance) की राह, नफरत व बदलाखोरी की राह। राजनीति में सिद्धांत, उसूल, मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं। सिद्धांत केवल एक बचा है वो है साम, दाम, दंड भेद से सत्ता प्राप्त करना। आज विपक्ष का काम केवल विरोध करना और सत्ता पक्ष का काम येन प्रकारेण विरोध को कुचलना। इसी कशमकश में समय बीत जाता है। संसद में स्वस्थ बहस अब बीते जमाने की बात हो गई है। किसी बिल को पारित करते वक्त उसके नफा-नुकसान पर जो चर्चा होनी चाहिए वह चर्चा न होकर व्यक्तिगत कटाक्ष ही अब चर्चा का विषय बन गया है और इसी शोरगुल में बिना किसी चर्चा के बिल पास हो जाते हैं और कानून का रूप ले लेते हैं। यह प्रथा देश के लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। देश की नई बनी संसद पर अब कोहराम मचा हुआ है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="सावधान! हो सकता है गर्म सर्द ! दोपहर में कम से कम निकलें बाहर : सिविल सर्जन" href="http://10.0.0.122:1245/get-out-at-least-in-the-afternoon-civil-surgeon/">सावधान! हो सकता है गर्म सर्द ! दोपहर में कम से कम निकलें बाहर : सिविल सर्जन</a></p>
<p style="text-align:justify;">विपक्षी पार्टियों का कहना है कि संसद की नई इमारत प्रधानमंत्री (PM) नरेन्द्र मोदी का महिमामंडित करने के लिए बनाई गई, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। एक तरफ देश कोरोना काल में आर्थिक संकट से गुजर रहा था वहीं दूसरी ओर संसद की नई ईमारत का शिलान्यास हो रहा था। अब संसद के नए भवन के उद्घाटन की बारी है। 28 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नई संसद का उद्घाटन करेंगे। इसके विरोध में कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने मोर्चा खोल दिया है। 19 राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री द्वारा नई संसद के उद्घाटन कार्यक्रम का संयुक्त रूप से बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। इन राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री द्वारा नई संसद के उद्घाटन पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि संसद का प्रमुख राष्ट्रपति होता है, अत: संसद का उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यपालिका का प्रमुख होता है, विधायिका का नहीं। माकपा (CPM) महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा है कि संसद के शिलान्यास और उद्घाटन दोनों अवसरों पर महामहिम राष्ट्रपति को दूर रखना बिल्कुल ही न्यायोचित नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि संसद देश के गौरव की प्रतीक है, जिसमें हमने सभी को निमंत्रण दिया है। इस गौरवशाली क्षण पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। विपक्षी पार्टियों का विवाद खड़ा करने की आदत बन गई है। राष्ट्रपति देश के प्रमुख होते हैं, तो प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा (BJP) नेता हरदीप पुरी का कहना है कि राष्ट्रपति किसी भी सदन के सदस्य नहीं होते, ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन करना बिल्कुल न्यायसंगत है। इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप एक सीमा तक तो सही होते हैं लेकिन जहां देश की प्रतिष्ठा का सवाल हो तो तमाम राजनीतिक पार्टियों को अपने मतभेद भुलाकर एकजुटता दिखानी चाहिए। सत्तारूढ़ दल को भी विपक्षी पार्टियों के तर्कसंगत सुझाव को मानन चाहिए और विपक्षी दलों को भी केवल विरोध के नाम पर विरोध नहीं करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 May 2023 09:31:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गर्मी के पारे ने सभी राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लगाया</title>
                                    <description><![CDATA[भाजपा की 2024 की तैयारी भी गर्मी की आगोश में आई अन्य दलों के तो बुरे हालात नोएडा (सच कहूँ/जगदीश शर्मा)। कहते हैं कि भाजपा का केंद्रीय संगठन एक ऐसा संगठन है, चाहे गर्मी हो या ठंड उसके कार्यकर्ता संगठन द्वारा आगामी चुनाव (Election) की तैयारी में लग जाते हैं। अन्य दल चाहे कांग्रेस हो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/summer-mercury-put-an-end-to-all-political-activities/article-47993"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/politics-2.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">भाजपा की 2024 की तैयारी भी गर्मी की आगोश में आई</h3>
<ul style="text-align:justify;">
<li style="text-align:justify;">अन्य दलों के तो बुरे हालात</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>नोएडा (सच कहूँ/जगदीश शर्मा)।</strong> कहते हैं कि भाजपा का केंद्रीय संगठन एक ऐसा संगठन है, चाहे गर्मी हो या ठंड उसके कार्यकर्ता संगठन द्वारा आगामी चुनाव (Election) की तैयारी में लग जाते हैं। अन्य दल चाहे कांग्रेस हो या सपा, बसपा, लोकदल आम आदमी पार्टी, सभी भाजपा कार्यकर्ताओं की होड़ करने की बजाय चुप्पी साधे रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन्हें उन्हें चुनाव में मुंह की खानी पड़ती है। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश की।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब तपत भरी गर्मी ने सभी राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लगा दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि आगामी लोकसभा चुनाव 20 24 की तैयारी भाजपा ने शुरू कर दी है।<br />
यह तैयारी पूरे देश में हो रही है लेकिन नोएडा में गर्मी के चलते चुनावी गतिविधियां बिल्कुल सुनने पड़ी हैं।<br />
यहां संगठन की बजाय मौजूदा सांसद डॉ महेश शर्मा की टीम जनपद गौतम बुद्ध नगर ही नहीं अपने पूरे लोकसभा क्षेत्र में वोट बनवाने का काम कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश की विपक्षी पार्टी सपा ने नोएडा महानगर के पद पर अध्यक्ष की नियुक्ति की है। जिसका स्वागत भी जोरदार नहीं हो पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">वह अब तक पुराने सपा कार्यकर्ताओं से भी नहीं मिल पाए हैं। ने हीं अब तक कोई संगठन के बैनर तले कार्य कर पाए हैं ।<br />
सपा के तो यहां पूर्व से भी बुरे हालात हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यकर्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सपा प्रमुख नोएडा में आखिर क्या चाहते हैं, जो ऐसे नेताओं को अध्यक्ष बनाकर भेज रहे हैं जिनका संगठन में कोई महत्व नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही हालात बसपा के हैं, हालांकि मौजूदा समय में प्रदेश में बसपा के हालात किसी से छुपी नहीं है।<br />
लेकिन बसपा का वोट बैंक फिर से बसपा के खाते में लाया जा सकता है। बशर्ते मजबूत नेताओं को बसपा में जोड़ा जाए।<br />
हालांकि लोकदल का तो नोएडा में वैसे ही कोई महत्व नहीं है।<br />
अब बात करते हैं कांग्रेस की कांग्रेस में नेताओं की कमी नहीं है।<br />
यहां भी कांग्रेसी केवल छपास रोगी हैं।<br />
अगर कांग्रेसी एकजुट होकर किसी भी मुद्दे को उठाएं तो कांग्रेस को नोएडा में मजबूत होने से कोई नहीं रोक सकता।<br />
लेकिन यहां आपसी फूट के चलते कांग्रेस की नैया डूब रही है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/summer-mercury-put-an-end-to-all-political-activities/article-47993</link>
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                <pubDate>Tue, 23 May 2023 20:37:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>पदों का लालच और राजनीति का सिद्धांत</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान में कांग्रेस की सरकार में आंतरिक खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही। (Editorial) यह खींचतान जहां पुराने और युवा नेताओं के बीच है, वहीं कुर्सी का मोह भी इस खींचतान की बुनियाद है। सत्ताधीश नेताओं को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ तो मुख्यमंत्री विपक्षी दलों के चुनौतियों से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/greed-for-positions-in-politics/article-47418"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/ashok-gehlot-sachin-pilot.jpeg" alt=""></a><br /><p>राजस्थान में कांग्रेस की सरकार में आंतरिक खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही। (Editorial) यह खींचतान जहां पुराने और युवा नेताओं के बीच है, वहीं कुर्सी का मोह भी इस खींचतान की बुनियाद है। सत्ताधीश नेताओं को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ तो मुख्यमंत्री विपक्षी दलों के चुनौतियों से निपटने की रणनीति बनाता है, वहीं दूसरी तरफ वह अपनी पार्टी में बने अन्य गुटों पर भी नजर रखनी है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="पेट्रोलियम मंत्रालय की सलाहकार समिति ने की डीजल गाड़ियों पर बैन की सिफारिश" href="http://10.0.0.122:1245/consultative-committee-of-petroleum-ministry-recommends-ban-on-diesel-vehicles/">पेट्रोलियम मंत्रालय की सलाहकार समिति ने की डीजल गाड़ियों पर बैन की सिफारिश</a></p>
<p>वास्तव में प्रत्येक पार्टी अपना यूथ विंग बनाए हुए हैं। पार्टी का उद्देश्य जहां एक विंग के (Editorial) माध्यम से युवा वोटरों तक पहुंच बनाना है वहीं पार्टी गतिविधियों को मजबूती देने के लिए उनका प्रयोग करना है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने यूथ को नेतृत्व देने की नीति बनाई, जिसके फायदा-नुकसान दोनों ही हैं। फायदा तो यह हुआ कि युवा राजनीति में सक्रिय हुए, जिससे युवाओं में देश व सामाजिक मुद्दों के प्रति सजगता, गंभीरता व जिम्मेवारी पैदा हुई है। तस्वीर का दूसरा पहले नुकसानदेह साबित हुआ कि युवा नेता राजनीति को जनसेवा समझने की बजाए मलाइदार पदों पर विराजमान होने के लिए तरह-तरह की मांग करने लगे। जिस कारण पुराने व नए नेताओं के बीच मनमुटाव पैदा हो रहा है।</p>
<p>विशेष रूप से जब सख्त अनुशासन न हो या कार्रवाई में देरी हो तब बात बड़े स्तर पर बिगड़ जाती है। पार्टियां यह दलील देती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के चलते पार्टियों के भीतर मतभेद होना स्वाभाविक है। जहां तक राजस्थान का मामला है, यह खींचतान भी पुराने नेताओं व यूथ के बीच जारी है। कई बार खींचतान के चलते पार्टियों को नुकसान भी हुआ है। पंजाब कांग्रेस इसका उदारहण है। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह बनाम नवजोत सिद्धू के बीच खींचतान के कारण विधानसभा चुनावों में पार्टी को खूब किरकिरी हुई। कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो गए। ऐसा ही मध्य प्रदेश में घटित हुआ, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत से कमलनाथ सरकार गिर गई।</p>
<p>राजस्थान की मौजूदा परिस्थितियां भी पंजाब जैसी बनी हुई हैं। कांग्रेस में दूसरे गुट के नेता सचिन पायलट पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर शाब्दिक प्रहार करते रहे, फिर भूख हड़ताल पर बैठे और अब उन्होंने यात्रा शुरु करने का ऐलान कर दिया है। यह घटना कांग्रेस हाईकमान के लिए चुनौती बन हुई है। वास्तव में सभी पार्टियों को चाहिए कि वे अपने नेताओं को अनुशासन सिखाएं और उन्हें राजनीति के मूल उद्देश्यों से परिचित करवाएं। उन्हें बताया जाना चाहिए कि राजनीति कोई पैसा कमाने का धंधा नहीं बल्कि जनसेवा है। पुराने नेताओं को भी चाहिए किसी लालच में न रहकर वे नए व युवा नेताओं को अवसर व सम्मान दें, ताकि राजनीति में नई विचारधारा से विकास को गति दी जा सके।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 May 2023 09:30:21 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>विपक्ष की एकता के प्रयत्न</title>
                                    <description><![CDATA[देश की राजनीति का रुख 2024 की ओर मुड़ चुका है। राष्ट्रीय स्तर और प्रदेश स्तर के राजनीतिक दल 2024 की तैयारियों, दांव-पेंच और तिकड़मों में व्यस्त हो गए हैं। जिन राज्यो में इस वर्ष चुनाव होने हैं वहां का माहौल कुछ ज्यादा ही गर्माया हुआ है। विपक्ष इस बार 2024 का चुनाव फतेह करने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-trend-of-the-country-politics-has-turned-towards-2024/article-43787"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-02/politics.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की राजनीति का रुख 2024 की ओर मुड़ चुका है। राष्ट्रीय स्तर और प्रदेश स्तर के राजनीतिक दल 2024 की तैयारियों, दांव-पेंच और तिकड़मों में व्यस्त हो गए हैं। जिन राज्यो में इस वर्ष चुनाव होने हैं वहां का माहौल कुछ ज्यादा ही गर्माया हुआ है। विपक्ष इस बार 2024 का चुनाव फतेह करने का अवसर गंवाना नहीं चाहता। लेकिन विपक्ष की जीत के बीच में एकता की एक बड़ी बाधा खड़ी है, जो उसे दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने नहीं दे रही है। विपक्ष ने 2014 और 2019 के आम चुनाव में एकता के प्रयास किये थे, लेकिन उसका अंजाम सर्वविदित है। असल में विपक्ष मोदी सरकार को केंद्र की सत्ता से हटाना तो चाहता है लेकिन चाहकर भी उसमें एकता स्थापित नहीं हो पाती, और उसके मंसूबे धरे के धरे रह जाते हैं। इस बार भी नए सिरे से कोशिशें शुरू हुई हैं। अब यह देखना अहम होगा कि 2024 में विपक्ष मोदी को किस प्रकार चुनौती देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने विपक्ष की धुरी बनने का प्रयास किया था। उन्होंने स्वयं को विपक्ष का मुख्य चेहरा साबित करने के लिए कोलकाता से प्रयास किया, लेकिन दाल गलती न देख वो दिल्ली से दूरी बनाए हुए हैं। महाराष्ट्र से शरद पवार ने भी विपक्ष का मुख्य चेहरा बनने की कोशिश की। महाराष्ट्र में महाअघाड़ी गठबंधन बनाने के बाद से उन्हें ऐसा लग रहा था कि महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस और शिव सेना का सफल गठबंधन देश की राजनीति को एक नयी दिशा दिखाएगा। चूंकि इस गठबंधन के सूत्रधार और कर्ताधर्ता वहीं हैं, ऐसे में विपक्ष में उनके नाम पर सहमति बनने में अधिक दिक्कत पेश नहीं आएगी। उद्वव ठाकरे की सरकार गिरने के बाद से महाअघाड़ी कितने दिन तक मंच पर रहेगा ये गंभीर प्रश्न है। ऐसे में विपक्ष का चेहरा बनने के शरद पवार के प्रयासों पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों में पिछले कुछ वक्त से लगातार एकजुट होने की बात की जा रही है। ऊपरी तौर पर सभी दल इसे स्वीकार कर रहे हैं लेकिन अंदर की सच्चाई कुछ और ही सामने आ रही है। हाल ही में नीतीश कुमार ने कांग्रेस के सामने विपक्षी एकता का पत्ता चला है। लेकिन, इस पर कांग्रेस ने नीतीश के बयान का स्वागत भी किया और कई सवाल भी खड़े कर दिए। इससे स्पष्ट हो गया है कि विपक्षी एकता फिलहाल एक अवधारणा के तौर पर ही काम कर रही है। नीतीश कुमार ने विपक्षी एकजुटता के लिए कांग्रेस की पहल का आग्रह किया है। उनका दावा है कि यदि 2024 में भाजपा बनाम विपक्ष का साझा उम्मीदवार के आधार पर चुनाव लड़ा जाता है, तो भाजपा 100 सीटों तक सिमट सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">नीतीश के अतिउत्साह में कहे गए इस आंकड़े का गणित और राजनीति के लिहाज से क्या आधार है लेकिन कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष यह जानता है कि कोई गलतफहमी पालना ठीक नहीं है। बहरहाल कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता जयराम रमेश ने नीतीश के आग्रह और अपील का स्वागत किया है, लेकिन बिना नाम लिए यह तंज भी कसा है कि कुछ लोग विपक्ष की बैठकों में भाग लेते हैं, विपक्षी एकता के सरोकार भी लगातार जताते रहे हैं, लेकिन वे सत्ता-पक्ष की गोद में भी बैठते रहे हैं। असल में कांग्रेस नीतीश के रवैये को लेकर भी खुश नहीं है। श्रीनगर में बुलावे पर नहीं आना जबकि केसीआर के बुलावे पर अखिलेश, केजरीवाल का साथ रैली करना और नीतीश का उनसे मिलना भी कांग्रेस को नागवार गुजरा है। मायावती का रुख भी कांग्रेस गठबंधन के लिहाज से सही नहीं मानती है। इसीलिए कांग्रेस के सूत्र कहते हैं कि, इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता सम्भव नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस हमेशा भाजपा का वैचारिक विरोध करती रही है। विपक्षी गठबंधन पर कांग्रेस अपने रायपुर राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान विमर्श करेगी और फिर कोई रणनीति तय करेगी। जयराम रमेश ने नीतीश ही नहीं, सभी विपक्षी दलों को यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के बिना कोई भी विपक्षी एकता सफल नहीं हो सकती, लिहाजा विपक्ष को कांग्रेस की छतरी तले ही एकजुट होना है। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या राहुल गांधी विपक्ष का चेहरा बन पाएंगे? सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष राहुल गांधी को अपना नेता मानकर उनका नेतृत्व स्वीकार कर पाएगा?</p>
<p style="text-align:justify;">भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस कितना मजबूत हुई ये तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन एक बात तो है कि राहुल राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी जगह बनाने में काफी हद तक सफल रहे जो उन्हें दूसरे विपक्षी नेताओं से कुछ ऊपर रखने में सहायक होगी। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि ममता, अखिलेश, केसीआर जैसे क्षेत्रीय छत्रप उनकी रहनुमाई शायद ही स्वीकार करेंगे क्योंकि कांग्रेस उनके राज्य में अपना हिस्सा मांगे बिना नहीं रहेगी जो उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। राजनीतिक पंडितों के अनुसार, यदि इस साल होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक के चुनावों में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती है तो राहुल गांधी की 2024 की दावेदारी को और ज्यादा मजबूती मिल जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी की मजबूती से क्षेत्रीय दल असहज ही होंगे क्योंकि कांग्रेस की मजबूती का मतलब है कि उनका अपने-अपने राज्य में जनाधार कम हो जाएगा। ऐसे में विपक्ष मोदी का मुकाबला तो करना चाहता है कि लेकिन वो कांग्रेस को मजबूत होते देखना नहीं चाहता है। ऐसे में राष्ट्रीय मोर्चा की संभावनाएं क्षीण हैं, क्योंकि विपक्ष के भीतर ही विपक्ष मौजूद है। हालिया त्रिपुरा चुनाव का ही उदाहरण लें, तो एक तरफ वामदल और कांग्रेस का गठबंधन था, तो उनके विरोध में तृणमूल कांग्रेस चुनावी अखाड़े में है। इसके समानांतर केरल में वाममोर्चा और कांग्रेसी मोर्चा आमने-सामने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, बंगाल आदि राज्यों में विपक्षी एकता की दिशा और दशा ही भिन्न है। वहां कई नेता प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाएं पाले हुए हैं। यह दीगर है कि उनके राज्यों के बाहर उनकी स्वीकृति ‘शून्य’ सी है। वहीं आम आदमी पार्टी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक और मिजोरम राज्यों में सभी सीटों पर चुनाव लडने की रणनीति पर काम कर रही है। यह राजनीति कांग्रेस और नीतीश के विपक्षी इरादों के बिल्कुल विपरीत है। दरअसल विपक्षी एकता के बयान तो खूब आते रहे हैं, लेकिन प्रयास नहीं किए जा पा रहे हैं, जबकि आम चुनाव करीब 15 माह दूर ही हैं। चुनाव की दृष्टि से यह बहुत समय नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस देश भर में ‘हाथ से हाथ’ जोड़ने के दिवास्वप्नों में ही डूबी है। उसे लगता है कि राहुल गांधी की यात्रा का प्रभाव और प्रयोग बेहद सफल रहा है, और राहुल गांधी मोदी का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गए हैं। चुनावी यथार्थ यह भी है कि देश के 17 राज्यों में कांग्रेस का एक भी सांसद नहीं है। कुल मिलाकर कांग्रेस को पता है कि वो अपनी कीमत पर अपनी जमीन क्षेत्रीय दलों के हवाले नहीं करना चाहती है और कई राज्यों में क्षेत्रीय दल कांग्रेस को दोबारा पनपने या मजबूत होने नहीं देना चाहते। हालांकि, कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, 2024 के पहले राज्यों के चुनावों के बाद दिसम्बर के आस-पास गठबंधन की सही तस्वीर सामने आएगी, तब सबकी असली स्थिति भी सामने होगी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आज जो विपक्षी मोर्चा आकार ग्रहण कर सकता है, वह संपूर्ण लामबंदी नहीं होगा। राष्ट्रीय मोर्चा भी नहीं होगा। राज्यों के स्तर पर, सुविधा के मुताबिक, गठबंधन किए जा सकते हैं।<br />
<strong>                                     (यह लेखक के अपने विचार हैं) राजेश माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
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                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Feb 2023 10:03:30 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>क्या गहलोत पर गिरेगी गाज, सचिन पायलट को पहनाया जाएगा ताज? अब सोनिया गांधी करेगी फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कहा जा रहा है कि गहलोत के करीबी नेताओं पर रविवार को हुए घटनाक्रम के मामले में गाज गिर सकती है। रिपोर्ट सोनिया गांधी के पास पहुंच गई है। उधर राजस्थान (Rajasthan Politics) के सरकारी मुख्य सचेतक एवं जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री डा महेश जोशी ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/rajasthan-politics-ashok-gehlot-vs-sachin-pilot/article-38320"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/ashok-gehlot-sachin-pilot1.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कहा जा रहा है कि गहलोत के करीबी नेताओं पर रविवार को हुए घटनाक्रम के मामले में गाज गिर सकती है। रिपोर्ट सोनिया गांधी के पास पहुंच गई है। उधर राजस्थान (Rajasthan Politics) के सरकारी मुख्य सचेतक एवं जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री डा महेश जोशी ने कहा है कि रविवार के घटनाक्रम से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कोई लेना देना नहीं हैं और एक भी विधायक को कांग्रेस विधायक दल की बैठक के लिए संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल के घर जाने के लिए नहीं कहा गया था। डा. जोशी ने आज मीडिया से कहा कि वह चाहते हैं कि उन्हें स्पष्टीकरण का मौका मिले और अगर आलाकमान उन्हें इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण के लिए नोटिस देता है तो हम यह सारी बातें उसमें उल्लेख करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर आलाकमान कोई सजा भी देगा तो भुगतने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि परसों जो हुआ उसमें गहलोत का कोई लेना देना नहीं हैं। नोटिस के बारे में पूछने पर कहा कि अभी तक कोई नोटिस नहीं मिला हैं लेकिन वह चाहते हैं कि उन्हें नोटिस दे ताकि स्पष्टीकरण देने का मौका मिले। उन्होंने कहा कि पार्टी नेता वेणुगोपाल का ट्वीट बैठक का एजेंडा था जिसमें कोई रायशुमारी का जिक्र नहीं था। वहीं रविवार के घटनाक्रम की रिपोर्ट खड़गे ने सोनिया गांधी को सौंप दी है। सूत्रों के अनुसार, अब सोनिया गांधी को फैसला लेना है कि गहलोत को मुख्यमंत्री से हटाकर सचिन पायलट को सीएम बनाया जाएगा या नहीं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>रविवार के घटनाक्रम से गहलोत का कोई लेना देना नहीं: जोशी</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हमने कभी नहीं कहा कि हमारी तीनों बातें प्रस्ताव का हिस्सा बने, हमने सिर्फ इतना कहा कि यह बात यह आलाकमान तक पहुंचा दी जाये, इसके बाद आलाकमान के फैसले पर एक लाइन का प्रस्ताव हो जायेगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश प्रभारी अजय माकन को कोई भ्रम हुआ है, हमें तो बैठक का एजेंडा ही पता नहीं था। उन्होंने कहा कि हमने आलाकमान के प्रति वफादारी में कोई कमी नहीं रखी हैं। कोई हमारी वफादारी पर शक खडा करेगा तो हम उस वफादारी को सिद्ध करेंगे और वफादारी तो सिद्ध कर दी है। अगर हमारी वफादारी नहीं होती तो कब की ही सरकार गिर गई होती।</p>
<p style="text-align:justify;">डा जोशी ने कहा कि बैठक में रायशुमारी के बारे में कोई सूचना नहीं थी। उन्होंने कहा कि जब विधाायक दल की बैठक में रायशुमारी का एजेंडा नहीं था तो उन पर आरोप क्यों लगाये जा रहे है। बैठक में रायशुमारी होगी, यह हमारे पास एजेंडा नहीं था। बैठक से पहले चर्चा एवं शंका हुई, उसके समाधान के लिए विधायक दल की बैठक से पहले रायशुमारी के लिए विधायक इकट्ठे हुए। सैनिक कल्याण राज्य मंत्री राजेन्द्र सिंह गुढ़ा के बयान पर उन्होंने कहा कि इस पर वह टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं लेकिन उनसे अनुरोध है कि उनकी बातें ऐसी लगनी चाहिए कि मंत्री बोल रहा है।</p>
<hr />
<p><a title="Bharatpur : जलती चिता से महिला का शव निकाला, जानें क्या है मामला" href="http://10.0.0.122:1245/suspicion-of-murder-of-woman-in-land-dispute/">Bharatpur : जलती चिता से महिला का शव निकाला, जानें क्या है मामला</a></p>
<hr />
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Sep 2022 10:48:47 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सचिन पायलट को रोकने के लिए हाईकमान से भिड़ा गहलोत खेमा</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का नामांकन करने से पहले आज होने वाली कांग्रेस विधायक दल की बैठक संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल के घर जुटे गहलोत खेमे के विधायकों के नहीं आने एवं उनके इस्तीफे देने विधानसभा अध्यक्ष डा सी पी जोशी के घर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/rajasthan-politics-gehlot-camp-clashed-with-high-command/article-38239"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/ashok-gehlot-sachin-pilot.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का नामांकन करने से पहले आज होने वाली कांग्रेस विधायक दल की बैठक संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल के घर जुटे गहलोत खेमे के विधायकों के नहीं आने एवं उनके इस्तीफे देने विधानसभा अध्यक्ष डा सी पी जोशी के घर जाने के बाद नहीं हो पाई। गहलोत खेमे के विधायकों को कहना है कि वे चाहते है कि सियासी संकट (Rajasthan Politics) के समय गहलोत का जिन 102 विधायकों ने साथ दिया उनमें से किसी को भी नया मुख्यमंत्री बना दो और इसके बाद गहलोत को मुख्यमंत्री से हटा दो।</p>
<p style="text-align:justify;">खाद्य मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने मीडिया से कहा कि विधायकों की यही भावना है कि इन 102 विधायकों में से किसी को भी मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है उन्हें मंजूर है लेकिन भाजपा के षडयंत्र को कामयाबा नहीं होने दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि अगर कोई नाराजगी है तो पार्टी के मुखिया सुनेंगे तो दूर भी हो जायेगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>गहलोत खेमे के विधायक के नहीं आने से कांग्रेस विधायक दल की बैठक नहीं हो पाई | Rajasthan Politics</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री निवास पर शाम सात बजे आयोजित इस बैठक में भाग लेने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे एवं पार्टी के प्रदेश प्रभारी अजय माकन पर्यवेक्षक के रुप में जयपुर पहुंचे लेकिन बैठक शुरू होने से पहले गहलोत खेमे के विधायकों के धारीवाल के घर पहुंचने से यह बैठक शुरू होने में देरी होने लगी और बताया गया कि अब यह बैठक आठ बजे शुरू होगी लेकिन आठ बजे भी बैठक शुरू नहीं हो पाई और इसके बाद रात नौ बजे तक यह बैठक नहीं शुरू हुई और इसके बाद धारीवाल के घर जुटे मंत्री एवं विधायक अपना इस्तीफा लेकर डा जोशी के घर पहुंच गये। बताया गया है कि गहलोत खेमे के 82 विधायकों ने अपने इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे हैं। विधायकों ने डा जोशी से मुख्यमंत्री बनने का आग्रह किया है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>धारीवाल के घर 92 विधायक मौजूद</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले खाचरियावास ने कहा कि धारीवाल के घर 92 विधायक मौजूद है और सभी विधायक डा जोशी के घर जा रहे है। उन्होंने कहा कि विधायकों की भावना समझनी चाहिए। सियासी संकट के समय जब ये विधायक होटलों में बंद थे और संघर्ष किया उनकी भावना समझनी चाहिए। उनसे पूछा गया कि क्या सचिन पायलट के प्रति इतनी नफरत क्यों है, इस पर उन्होंने कहा कि नफरत नहीं हैं और यहां बैठक में किसी का नाम नहीं लिया गया है। उन्होंने बताया कि ये सभी विधायक अपने इस्तीफे देने उनके घर जा रहे हैं। उधर विधायक एवं मुख्यमंत्री के सलाहकार संयम लोढ़ा का कहना है कि यहां 82 विधायक हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>गहलोत का शक्ति प्रदर्शन</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जादूगर कहे जाने वाले गहलोत का यह शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है और गहलोत ने ताकत दिखाई और फिर साबित कर दिया है कि विधायक उनके पक्ष में हैं। डा सी पी जोशी के घर पहुंचे कुछ विधायकों का यह भी कहना है कि अशोक गहलोत को हटाना है तो डा सी पी जोशी को मुख्यमंत्री बना दो। उल्लेखनीय है कि बैठक के लिए पूर्वउपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और कई विधायक मुख्यमंत्री निवास पहुंच चुके थे लेकिन धारीवाल के घर जुटे विधायकों के नहीं आने से बैठक खटाई में पड़ गई। अब सभी की नजरे कांग्रेस आलाकमान पर टिकी है कि वह क्या फैसला लेगा।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Sep 2022 10:13:11 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>झारखंड में राजनीतिक हलचल तेज, राज्यपाल दिल्ली, अमित शाह से होगी मुलाकात</title>
                                    <description><![CDATA[रांची (एजेंसी)। झारखंड में राजनीतिक हलचल के बीच राज्यपाल रमेश बैस शुक्रवार को रांची से हवाई जहाज से नई दिल्ली चले गए। उनकी दिल्ली यात्रा को लेकर राजभवन की ओर से किसी तरह का आधिकारिक वक्तव्य जारी नहीं किया गया, लेकिन राज्यपाल के दिल्ली दौरे को लेकर कई तरह की चचार्ओं का बाजार गर्म है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/politics-agitation-intensifies-in-jharkhand/article-37371"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/jharkhand.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची (एजेंसी)।</strong> झारखंड में राजनीतिक हलचल के बीच राज्यपाल रमेश बैस शुक्रवार को रांची से हवाई जहाज से नई दिल्ली चले गए। उनकी दिल्ली यात्रा को लेकर राजभवन की ओर से किसी तरह का आधिकारिक वक्तव्य जारी नहीं किया गया, लेकिन राज्यपाल के दिल्ली दौरे को लेकर कई तरह की चचार्ओं का बाजार गर्म है। इससे पहले राज्य में सत्ताारूढ यूपीए नेताओं के एक शिष्टमंडल ने कल राज्यपाल से मुलाकात कर उनसे मुख्यूमंत्री हेमंत सोरेन के लाभ के पद मामले में जल्द स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया था। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को एक ज्ञापन भी सौंपा था। इस बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में पांच सितम्बर को राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाये जाने का फैसला किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सत्र में बहुमत साबित करने के लिए सरकार की ओर से सदन में विश्वाीस प्रस्तांव रखा जा सकता है। राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा है राज्यपाल नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मिल सकते हैं। यह भी संभावना जतायी जा रही है कि राज्यपाल पीएम और गृह मंत्री से मिलकर राज्य की ताजा राजनीतिक हालात को लेकर कोई रिपोर्ट दे सकते हैं। अब राज्य के लोगों की निगाहें राज्यपाल के दिल्ली की गतिविधियों पर टिक गयी हैं।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Sep 2022 12:01:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिहार: अपहरण केस में घिरे कानून मंत्री, सीएम नीतीश कुमार को कोई जानकारी नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[नीतीश मंत्रिमंडल में बाहुबलियों की भरमार, बिहार में डरावने दिनों की वापसी तय : सुशील पटना (एजेंसी)। इन दिनों बिहार के कानून मंत्री विवादों में घिरे हुए है। विपक्ष सरकार पर हमलावर है। बिहार के कानून मंत्री पर अपहरण का गंभीर आरोप है। इसी को लेकर बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/bihar-law-minister-surrounded-in-kidnapping-case/article-36699"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/nitish-government-once-again-in-bihar.gif" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>नीतीश मंत्रिमंडल में बाहुबलियों की भरमार, बिहार में डरावने दिनों की वापसी तय : सुशील</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>पटना (एजेंसी)।</strong> इन दिनों बिहार के कानून मंत्री विवादों में घिरे हुए है। विपक्ष सरकार पर हमलावर है। बिहार के कानून मंत्री पर अपहरण का गंभीर आरोप है। इसी को लेकर बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने कहा कि महागठबंधन सरकार के मंत्रिमंडल में बाहुबलियों की भरमार कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रदेश में डरावने दिनों की वापसी सुनिश्चित कर दी है। मोदी ने बयान जारी कर कहा कि सुरेन्द्र यादव, ललित यादव, रामानंद यादव और कार्तिकेय कुमार जैसे विधायक मंत्री बनाये गए, जिनके नाम से इलाके में लोग कांपते हैं। उन्होंने कहा कि इन लोगों पर आर्म्स ऐक्ट, यौन शोषण, हत्या के प्रयास और अपहरण जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा नेता ने कहा कि नया मंत्रिमंडल पूरी तरह असंतुलित है। इसमें एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समुदाय के 13 मंत्री (33 फीसद) हैं, जबकि कानू, तेली, कायस्थ, कलवार, कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज से एक भी मंत्री नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि महागठबंधन-2 में राजपूत और मैथिल ब्राह्मण मंत्रियों की संख्या भी कम कर दी गयी है। आपको बता दें कि कार्तिकेय कुमार को लेकर बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया है। दरअसल, कार्तिकेय कुमार पर कोर्ट का वारंट जारी हुआ है। उन पर अपहरण का गंभीर आरोप है और उन्होंने खुद कानून मंत्री की शपथ ली है। इसी वजह से बिहार की राजनीति गर्म हो गई है। इस मामले पर आज सीएम नीतिश कुमार ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>भाजपा हुई हमलावर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कहा कि शेष जातियों को केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व दिया गया। कोइरी समाज के केवल दो मंत्री बनाये गए और जो उपेंद्र कुशवाहा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विरासत के दावेदार हैं, वे शपथ ग्रहण के समय नदारद थे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार ने अतिपिछड़ा समाज की रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री बनाया था, जबकि महागठबंधन में किसी अति पिछड़ा को उपमुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। भाजपा सांसद ने कहा कि वित्त विभाग राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को मिलना चाहिए था। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि इन सारी विसंगतियों के बावजूद लालू प्रसाद को धन्यवाद कि उन्होंने जनता का मनोरंजन करने के लिए बड़े पुत्र को भी मंत्री बनवा दिया।</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Aug 2022 14:19:28 +0530</pubDate>
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