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                <title>Economy - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>देश का विकास और वास्तविक दशा</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर का यह बयान वास्तव में (Development of country) आश्चर्यचकित करने वाला है कि हम किसी भी विकसित देश के समकक्ष हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि भारत के पास वह सब कुछ है जो विश्व के किसी भी विकसित देश के पास है। शायद देश के गरीब, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/development-and-actual-situation-of-the-country/article-61276"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-08/sitchuation.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर का यह बयान वास्तव में (Development of country) आश्चर्यचकित करने वाला है कि हम किसी भी विकसित देश के समकक्ष हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि भारत के पास वह सब कुछ है जो विश्व के किसी भी विकसित देश के पास है। शायद देश के गरीब, वंचित, बेरोजगार और नाखुश करोड़ों लोगों को आश्वासन देने के लिए उनका यह बयान सही है जो दिन-रात अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। न केवल ठाकुर अपितु प्रधानमंत्री भी देश की उपलब्धियों को गिना रहे हैं किंतु वे इस जमीनी वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि न केवल गरीबी अपितु सामाजिक विद्वेष, हिंसा और घृणा हाल के समय में देश में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ठाकुर के इस बयान के साथ ही 30 मार्च को विश्व हैपिनेस रिपोर्ट जारी हुई (Development of country) जिसमें भारत 137 देशों में 126वें स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सोलुशन नेटवर्क द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट 150 देशों के लोगों के बारे में जुटाए गए आंकडों पर आधारित है और इस रिपोर्ट के अनुसार खुशहाली के मामले में भारत, यूक्रेन, इराक, फिलीस्तीन, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे युद्धरत और लगभग दिवालिया देशों से पीछे है। वस्तुत: एशिया में भारत की स्थिति केवल अफगानिस्तान से बेहतर है जो 137वें स्थान पर है। पिछले वर्ष ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 121 देशों में से 107वें स्थान पर था और वह कोरिया, इथोपिया, सूडान, रवांडा, नाइजीरिया और कांगो जैसे देशों से पीछे था। यह किसी विकसित देश का लक्षण नहीं है और यह बताता है कि विकास समाज के सबसे निचले स्तर तक नहीं पहुंचा है।</p>
<h3>खाद्यान्न से वंचित लोगों की स्थिति में कोई सुधार नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">देश में कुछ विशेषज्ञ इस नेटवर्क द्वारा खुशहाली के मापन के बारे में प्रश्न उठाते हैं। यह माना जाता है कि प्रति व्यक्ति आय, भ्रष्टाचार, सामाजिक कल्याण लाभ और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के आधार पर इस खुशहाली का मापन किया जाता है और इसका कोई कारण नहीं है कि इन मानदंडों पर प्रश्न क्यों उठाए जाए क्योंकि लोगों को खुशहाल रखने में आर्थिक और सामाजिक कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं किंतु देश में असमानता, आय में बढ़ती विषमता, व्यापक भ्रष्टाचार, सामाजिक घृणा, हिंसा आदि सामाजिक संबंधों को अस्थिर कर रहे हैं। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि खाद्यान्न से वंचित लोगों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। इसमें पाया गया है कि 6 माह से 23 माह की आयु के बच्चों में पर्याप्त कैलोरी युक्त भोजन की अनुलब्धता वाले बच्चों की संख्या जहां 2016 में 17.2 प्रतिशत थी वह बढ़कर 2021 में 17.8 प्रतिशत पहुंच गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हार्वर्ड स्कूल आॅफ पब्लिक हेल्थ के डॉक्टर डॉ. एसवी सुब्रमणियम के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आंकड़ा असामान्य और अनपेक्षित है। अनुसंधानकर्ताओं ने यह आंकड़ा सरकार के परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से लिया है और जिन्होंने कहा है कि उन बच्चों के बारे में पहला आकलन किया है जिन्हें बिल्कुल भोजन नहीं मिलता है और यह बताता है कि देश के सबसे अधिक गरीब और कमजोर घरों को भोजन उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। अधिकतर राज्यों में ऐसे बच्चों की संख्या में गिरावट आई है किंतु उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या में 10 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 12.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश में ऐसे बच्चों की संख्या 27.4 प्रतिशत और छत्तीसगढ में 24.6 प्रतिशत, झारखंड में 21 प्रतिशत, राजस्थान में 19.8 प्रतिशत और असम में 19.4 प्रतिशत है।</p>
<h3>भारत में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद 80 प्रतिशत लोगों को नुकसान हुआ</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रो. सुब्रमणिम ने कहा है कि यह आंकडा असामान्य और अनपेक्षित है। हमें यह अपेक्षा नहीं है कि छह माह से 23 माह के बच्चों को पूरे 24 घंटे भोजन न मिले। इस संबंध में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा हाल ही में किए गए ट्वीट को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा है कि देश में गरीब लोगों की आय में 50 प्रतिशत, मध्यम वर्ग की आय में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है और धनी लोगों की आय में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद 80 प्रतिशत लोगों को आय का नुकसान हुआ है। राहुल का कहना है कि गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और धनी और धनी होते जा रहे हैं तथा आॅक्सफेम की रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की है। ऐसे अनेक मामले देखने को मिल जाएंगे जो गरीब और वंचित वर्गों की स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसा कि मैंने अनेक लेखों में लिखा है कि योजनाकारों द्वारा विकास को सही ढंग से नहीं समझा जा रहा है क्योंकि किसी भी परियोजना के लाभार्थियों की संख्या को ध्यान में नहीं रखा जाता है। बहुप्रचारित ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम का विस्तार नहीं किया जा रहा है और दूसरी ओर इसके लिए बजट में कटौती की जा रही है। इस योजना के लिए उपलब्ध कराया गया बजट साल में 35 दिन से अधिक का रोजगार देने के लिए पर्याप्त नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक-द पालिटिक्स आॅफ पॉलिटिकल इकोनोमी: हाउ इकोनोमिक्स अबंडन्ड द पूअर में मानवीय मूल्यों पर आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर बल दिया है। वे सभी लोगों के लिए बुनियादी आय के प्रावधान की बात करते हैं और इसे व्यावहारिक बनाने के बारे में अपने कुछ सुझाव देते हैं। सार्वभौम बुनियादी आय के विचार के वितरण के लिए संसाधन जुटाने की वित्तीय कठिनाई और कार्य करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन की संभावना के आधार पर विरोध किया जा रहा है।</p>
<h3>दफ्तरों में बैठे हुए राजनेता वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि पूंजीवाद के माध्यम से पूर्ण रोजगार या गरीबी का उन्मूलन संभव नहीं है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी रणनीति बनाए जाने की आवश्यकता है जो उन निहित स्वार्थों के चंगुल से मुक्त हो जो समाज में गरीबी और असमानता बनाए रखना चाहते हैं। राजनीतिक नेताओं द्वारा बडे-बडे दावों से अशिक्षित और अर्धशिक्षित लोग प्रभावित हो सकते हैं किंतु उनका शिक्षित वर्गों पर कोई प्रभाव नहीं पडता है। कई बार यह देखकर हैरानी होती है कि दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में आलीशान दफ्तरों में बैठे हुए राजनेता या तो जमीनी वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं या वे अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए समुचित और संतुलित आहार के अभाव, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण ग्रामीण क्षेत्र के लोग अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक मानदंडों में गिरावट आ रही है। देश के वास्तविक भविष्य की परवाह किए बिना किसी भी कीमत पर वोट प्राप्त करने की वर्तमान प्रणाली एक बड़ी भूल है और यह कार्य हर सत्तारूढ़ सरकार द्वारा किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि यह स्थिति कब तक जारी रहेगी।</p>
<p style="text-align:right;">धुर्जति मुखर्जी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</p>
<h3 class="entry-title td-module-title"><a title="हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी गठबंधन में तकरार, बचेगी या रहेगी 2024 में भाजपा सरकार?" href="http://10.0.0.122:1245/dispute-has-increased-in-bjp-jjp-alliance-in-haryana/">हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी गठबंधन में तकरार, बचेगी या रहेगी 2024 में भाजपा सरकार?</a></h3>
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                                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Aug 2024 16:20:48 +0530</pubDate>
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                <title>भारतीय अर्थव्यवस्था ने रच दिया इतिहास, पूरी दुनिया हैरान!</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। देश की अर्थव्यवस्था (Economy) के लिहाज से आज का दिन यादगार बन गया जब भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पहली बार 4 ट्रिलियन डॉलर के पार निकल गई। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से अग्रसर है। भारत की जीडीपी में पिछले कुछ वर्षों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/india-gdp-crosses-four-trillion-dollars/article-55052"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/challenge-to-bring-economy-back-on-track.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> देश की अर्थव्यवस्था (Economy) के लिहाज से आज का दिन यादगार बन गया जब भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पहली बार 4 ट्रिलियन डॉलर के पार निकल गई। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से अग्रसर है। भारत की जीडीपी में पिछले कुछ वर्षों में लगातार वृद्धि हुई है। 2021 में, भारत की जीडीपी 3.2 ट्रिलियन डॉलर थी, 2022 में, यह बढ़कर 3.6 ट्रिलियन डॉलर हो गई और 2023 में, यह बढ़कर 4 ट्रिलियन डॉलर हो गई। जर्मनी अभी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जर्मनी की अर्थव्यवस्था अभी 4.28 ट्रिलियल डॉलर है। चालू वर्ष में अब तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार में 28.1 अरब डॉलर की वृद्धि हो चुकी है। Economy</p>
<h3 style="text-align:justify;">सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ | Economy</h3>
<p style="text-align:justify;">इस बीच देश की आर्थिक तरक्की को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ हो रही है। देश की इस तरक्की के लिए प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी जा रही है। सोशली मीडिया प्लेटफॉर्म पर अधिकांश यूजर कह रहे हैं कि मोदी हो तो सबकुछ मुमकिन हैं। इसके अलावा देश के दिग्गज उद्यमी, नेता और दिग्गज हस्तियां भी प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रही है।केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने एक्स पर पोस्ट किया, ह्लभारत के लिए यह वैश्विक गौरव का क्षण है क्योंकि हमारी जीडीपी 4 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गई है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में नए भारत का उदय। नरेंद्र मोदी जी का नेतृत्व वास्तव में अद्वितीय है। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस आर्थिक तरक्करी के लिए पीएम मोदी की जमकर तारफी की है। उन्होंने एक्स पर लिखा,ह्लगतिशील, दूरदर्शी नेतृत्व ऐसा दिखता है। खूबसूरती से प्रगति कर रहा हमारा नयाभारत ऐसा ही दिखता है। मेरे साथी भारतीयों को बधाई क्योंकि हमारा राष्ट्र 4 ट्रिलियन अरब डॉलर जीडीपी के आंकड़े को पार कर गया है। आपको अधिक शक्ति, आपका अधिक सम्मान, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Earthquake: दो देशों में भूकंप के जोरदार झटके, टूटे शीशे, लोगों में दहशत" href="http://10.0.0.122:1245/moderate-earthquake-felt-in-chinas-tonga-islands/">Earthquake: दो देशों में भूकंप के जोरदार झटके, टूटे शीशे, लोगों में दहशत</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Mon, 20 Nov 2023 17:10:38 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदूषण एजेंसियां प्रदूषण के सही आंकड़े नहीं करती प्रकट!</title>
                                    <description><![CDATA[प्रदूषण से भारत में गरीब सर्वाधिक प्रभावित हैं। विनिर्माण, उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों, सेवाओं, परिवहन और अन्य कार्यकलापों को प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा रहा है और इन पर कर लगाए जा रहे हैं जिससे महंगाई और जीवन की लागत में वृृद्धि हो रही है। इसके अलावा दिल्ली में प्रदूषण एजेंसियों द्वारा प्रदूषण के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/pollution-agencies-do-not-disclose-correct-pollution-figures/article-54444"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/air-pollution-reduces-life-expectancy.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रदूषण से भारत में गरीब सर्वाधिक प्रभावित हैं। विनिर्माण, उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों, सेवाओं, परिवहन और अन्य कार्यकलापों को प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा रहा है और इन पर कर लगाए जा रहे हैं जिससे महंगाई और जीवन की लागत में वृृद्धि हो रही है। इसके अलावा दिल्ली में प्रदूषण एजेंसियों द्वारा प्रदूषण के संबंध में आंकड़ों को प्रकट न करने से भी अनेक प्रश्न उठ रहे हैं। इसलिए यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या सरकारें अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक लागत थोप रही है। Pollution</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदूषण अपने आप में एक बड़ा व्यवसाय बन गया है और इससे गरीब सर्वाधिक प्रभावित हो रहा है। अकेले पेट्रोल पर लगभग 13.6 लाख करोड़ के उपकर और अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाए जा रहे हैं ताकि इसकी खपत में कमी हो। इसके पूर्व के पांच वर्षों में इससे 13 लाख करोड़ रूपए संग्रहित किए गए। Pollution</p>
<p style="text-align:justify;">प्रश्न यह भी उठता है कि इन प्रमुख प्रदूषण पर निगरानी रखने वाली एजेंसियां आईआईटी, कानपुर आदि ने प्रदूषण के मामले में आंकड़े जारी करने बंद क्यों कर दिए हैं। इसका कारण यह है कि नौकरशाही और दिल्ली सरकार में टकराव चल रहा है। जिसके चलते ऐसा लगता है कि वे इन आंकड़ों के बारे में स्वयं आश्वस्त नहंी है।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि संपूर्ण विश्व में प्रदूषण लागत बढाने का एक औजार बन गया है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की सरकारों ने इस संबंध में एक और तरीका निकाला है। वह यह कहकर लोगों की कारें जब्त कर रही हैं कि कार का जीवन समाप्त हो गया है और इस तरह लोगों को प्रताड़ित कर रही हैं कि वे इस संबंध में सामाजिक लागत पर भी ध्यान नहंी दे रही हैं। Pollution</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2019 में नेशनल ग्रीन एयर कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 2022 तक अल्ट्रा फाइन पार्टिकुलेट के स्तर में 20 से 30 प्रतिशत की कमी करने का लक्ष्य रखा गया। केन्द्र सरकार द्वारा सितंबर 2022 में इस लक्ष्य को वर्ष 2026 तक 40 प्रतिशत करने का विस्तार किया गया किंतु वर्ष 2022 में भी कुछ शहरों में प्रदूषण का स्तर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वार्षिक औसत सुरक्षित सीमा से अधिक रहा है। दुकानदारों को दोष दिया जा रहा है कि वे प्लास्टिक के माध्यम से प्रदूषण फैला रहे हैं। किसानों को पराली जलाने के नाम पर प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: बड़े कारपोरेट बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो शीतल पेयों का विनिर्माण करते हैं वे सबसे बड़ी प्लास्टिक प्रदूषक हैं और इसमें अन्य उद्योग तथा ऑटोमोबाइल सेक्टर भी शामिल हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कारों और ट्रैक्टरों से 8 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्टी के अनुसार वायु प्रदूषण में उद्योगों का हिस्सा 51 प्रतिशत है और इसकी लागत लगभग 7 लाख करोड़ हैं क्योंकि इससे श्रमिकों की उत्पादकता और राहत प्रभावित होते हैं। Pollution</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: भारत ने वर्ष 2070 तक प्रदूषण के मामले में पश्चिमी मानदंडों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है किंतु उसे गरीब लोगों की कारों और टैज्क्टरों के बारे में उदारता से सोचना चाहिए। प्रत्येक नई कार या ट्रैक्टर के निर्माण और पुरानी कारों को नष्ट करने से अधिक प्रदूषण होता है और इससे गरीब लोग और गरीब लोग हो रहे हैं क्योंकि इससे उनकी गतिशीलता प्रभावित होती है और इससे अधिक प्रदूषण बढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: बड़े अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय हर जगह सबसे बड़े प्रदूषक हैं। भारत की शीर्ष 12 कंपनियां जिनमें एक सरकारी कंपनी भी हैं, उन्हें सर्वाधिक प्रदूषण करने वाला घोषित किया गया है। ब्रेक फ्री फ्राम प्लास्टिक द्वारा 2022 में किए गए एक ऑडिट के अनुसार भारत में पाया जाने वाला सबसे आम प्लास्टिक उत्पाद फूड पैकेजिंग, घरेलू उत्पाद और अन्य पैकेजिंग मैटेरियल हैं। उत्तर भारत में चीनी मिलें और अन्य उद्योग सर्वाधिक जल और वायु प्रदूषण पैदा करती हैं। वे खुलेआम नदियों में प्रदूषक छोड़ रहे हैं और केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड के मानदंडों का उल्लंघन कर रहे हैं। Pollution</p>
<p style="text-align:justify;">तथाकथित कठोर मानदंडों से किराया बढा है, पार्किंग शुल्क बढ़ा है और यह समझ नहंी आता है कि शुल्क बढ़ाकर किस तरह से प्रदूषण पर नियंत्रण लगता है। सेन्टर फोर पालिसी रिसर्च ने वर्ष 2019 में कहा था कि पर्यावरणीय विनियामक तंत्र को मानदंडों के पालन और कार्यान्वयन में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इंडिया स्पेंड ने वर्ष 2014 से वर्ष 2017 तक प्रदूषण के बारे में रिपोर्टों और आंकड़ों का विश्लेषण किया और यह बताता है कि केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर सरकारों ने पर्यावरण विनियमनों का कड़ाई से पालन नहीं कराया है और वे इस मामले में उदासीन रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एसोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जेएसडब्ल्यू स्टील 2020 में चुनावी ट्रस्टों को चंदा देने वाला सबसे बडा चंदादाता था। टाटा समूह की प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने अपना 75 प्रतिशत चंदा सत्तारूढ दलों को दिया है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों ने 206 प्रदूषण करने वाले उद्योगों में से 146 उद्योगों को सामान्य जांच से छूट दी है और उन्हें स्वत: निगरानी तथा तृतीय पक्ष प्रमाण का विकल्प दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">केन्द्र की बिजनेस रिफोर्म एक्शन प्लान जिसे वर्ष 2014 से लागू किया जा रहा है, उसने उद्योगों के संबंध में पर्यावरण संरक्षण कम करने के लिए प्रोत्साहन दिया है। विश्व बैंक का कहना है कि विकास के नाम पर अनियमित औद्योगिकीकरण के कारण लोग अनेक तरह से प्रभावित हो रहे हैं। स्थानीय लोग, आदिवासी समुदायों का बलपूर्वक विस्थापन हो रहा है और स्थानीय पर्यावरण तथा आजीविका के स्रोतों के प्रदूषण के कारण उन्हे खराब स्थितियों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 10 शहर हैं और भारत में विश्व में सर्वाधिक वायु प्रदूषण है। यह तथ्य विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उजागर किया है। भारत के पूर्व आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु की राय है कि इनमें से अनेक समस्याओं का मुख्य कारण बड़े व्यवसायों के अनुकूल नीतियां अपनाना है। इसका तात्पर्य यह है कि उद्योगों का लाभ बढ रहा है और उसकी कीमत गरीब लोगों पर विभिन्न तरह के प्रभारों के रूप में थोपा जा रहा है और यह सब कुछ प्रदूषण को निंयत्रित करने के नाम पर किया जा रहा है और इसके चलते मुद्रा स्फीति निरंतर बढती जा रही है। अर्थात गरीब लोगों पर भारी लागत थोपी जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले 15 माह से मुद्रा स्फीति की दर बढती रही है और इससे लोगों की वित्तीय व्यवस्था डगमगाई है। भारतीय रिजर्व बैंक भी मुद्रा स्फीति के बारे में अत्यधिक चिंतित है। डालर के मुकाबले रूपया लगभग 83 रूपए है और यदि रूपया कमजोर होता गया जो जीवन की लागत बढती जाएगी। बैटरी और विंड पैनल अपशिष्ट भी एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं। 8 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया कि सरकारें महत्वाकांक्षी सामुहिक वचन-वायदे कर रही हैं किंतु वे इस संबंध में सही कदम नहीं उठा रहे है। जिसके चलते ये सामुहिक वायदे और संकल्पों का कार्यान्वयन नहीं किया जा रहा है।Pollution</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि यूरोप इस संबंध में 1979 से इस संबंध में कदम उठा रहा है किंतु यूनान और स्पेन सर्वाधिक प्रदूषक देश रहे हैं। प्रदूषण बढता जा रहा है और किसी तरह इस पर अंकुश लगाने के लिए लोगों पर अधिक लागत थोपी जा रही है। प्रदूषण के सबसे बड़े राजस्व संग्राहक होने के बावजूद इस संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की गयी है। विश्व समुदाय को इस संबंध में अपनी विफलता स्वीकार करनी चाहिए और गरीबों को अच्छे दिन दिखाने के नाम पर उन पर थोपी गयी लागत को हटाना चाहिए। Pollution</p>
<p style="text-align:right;"><strong>शिवाजी सरकार, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार<br />
(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Thu, 02 Nov 2023 19:36:16 +0530</pubDate>
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                <title>Economy crisis: युद्ध का असर, वैश्विक अर्थव्यवस्था के डगमगाते कदम !</title>
                                    <description><![CDATA[Economy crisis: वैश्विक स्तर पर विभिन्न देश आर्थिक समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं। साथ ही, रूस यूक्रेन के बीच युद्ध अभी थमा भी नहीं था कि आतंकवादी संगठन हमास ने इजराइल पर हमला कर दिया, जिससे अब इजराइल एवं हमास के बीच युद्ध छिड़ गया है और अब तो एक तरह से लेबनान भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/impact-of-war-wavering-steps-of-global-economy/article-53627"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-10/global-economy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Economy crisis: वैश्विक स्तर पर विभिन्न देश आर्थिक समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं। साथ ही, रूस यूक्रेन के बीच युद्ध अभी थमा भी नहीं था कि आतंकवादी संगठन हमास ने इजराइल पर हमला कर दिया, जिससे अब इजराइल एवं हमास के बीच युद्ध छिड़ गया है और अब तो एक तरह से लेबनान भी इस युद्ध में कूद गया है। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने अपनी विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट-2023 में कहा है कि चालू वित्त वर्ष 2023-24 में जहां वैश्विक विकास दर तीन प्रतिशत रहेगी, वहीं भारत की विकास दर 6.3 प्रतिशत रहेगी। आज भी भारत दुनिया में सबसे तेज विकास दर वाला देश है। Economy crisis</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि अमेरिका और रूस के साथ-साथ दुनिया के अधिकांश देश भारत के साथ लगातार आर्थिक मित्रता बढ़ा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने विश्व आर्थिक अनुमान में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस साल पहले के अनुमान से कहीं अधिक तेजी से बढ़ेगी। साथ ही, इस साल और अगले साल भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। वैसे, एक चिंताजनक अनुमान यह भी है कि विश्व स्तर पर महंगाई के चलते दुनिया में विकास दर थोड़ी धीमी रहेगी। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप सहित विश्व भर के अनेक देशों में तेल व ऊर्जा का संकट बढ़ाया है। इसके अलावा अब अरब क्षेत्र में युद्ध छिड़ गया है, तो चिंता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। Economy crisis</p>
<p style="text-align:justify;">गौर करने की बात है कि दुनिया भर में एक तिहाई से ज्यादा तेल की आपूर्ति अरब देशों से ही होती है। ऐसे में, यदि आपूर्ति प्रभावित होती है, तो दुनिया भर में हाहाकार की स्थिति बन जाएगी। भारत में अब तो त्यौहारी मौसम की शुरुआत होने जा रही है। नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, क्रिसमस दिवस, नव वर्ष, महाशिवरात्रि, होली, आदि जैसे बड़े त्यौहार आने वाले हैं, जिन्हें भारत के नागरिक बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं एवं इन त्यौहारों का भारतीय अर्थव्यवस्था में भारी योगदान रहता है। साथ ही, भारत में अब धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन भी बहुत तेज गति से बढ़ रहा है, जिससे निश्चित ही भारत के आर्थिक विकास को बल मिलेगा। वहीं भारत भी युद्धग्रस्त क्षेत्रों को शांति की अपील कर चुका है, जिसमें सबकी भलाई ही है। Economy crisis</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="FD Rates: आरबीआई के फैसले का प्रभाव, अपना बचत खाता खाली कर रहे लोग एफडी में दिखा रहे रूचि!" href="http://10.0.0.122:1245/best-fd-rates-for-senior-citizen/">FD Rates: आरबीआई के फैसले का प्रभाव, अपना बचत खाता खाली कर रहे लोग एफडी में दिखा रहे रूचि!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Oct 2023 15:56:13 +0530</pubDate>
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                <title>Economy: अर्थव्यवस्था-गिरती घरेलू बचत एवं बढ़ती महंगाई से त्रस्त</title>
                                    <description><![CDATA[Economy: आगामी लोकसभा (Lok Sabha) एवं विधानसभा चुनाव (Assembly elections) के मध्यनजर महंगाई का लगातार बढ़ते रहना चिंता का विषय है। घरेलू बचत, महंगाई, बढ़ता व्यक्तिगत कर्ज, बढ़ते व्यक्तिगत खर्चे आदि को लेकर निम्न एवं मध्यम वर्ग परेशान है। इस परेशानी के समाधान की बजाय सत्ता एवं विपक्ष दल एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/economy-suffered-by-falling-domestic-savings-and-rising-inflation/article-52995"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/mehngai.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Economy: आगामी लोकसभा (Lok Sabha) एवं विधानसभा चुनाव (Assembly elections) के मध्यनजर महंगाई का लगातार बढ़ते रहना चिंता का विषय है। घरेलू बचत, महंगाई, बढ़ता व्यक्तिगत कर्ज, बढ़ते व्यक्तिगत खर्चे आदि को लेकर निम्न एवं मध्यम वर्ग परेशान है। इस परेशानी के समाधान की बजाय सत्ता एवं विपक्ष दल एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा मासिक बुलेटिन में माना है कि खाद्य मुद्रास्फीति को काबू करना कठिन साबित हो रहा है। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">आरबीआई द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की घरेलू बचत दर वित्त वर्ष 2022-23 में पांच दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गई। 18 सितंबर को जारी इन आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2022-23 में देश की शुद्ध घरेलू बचत पिछले साल की तुलना में 19 फीसदी कम रही है। 2021-22 में देश की शुद्ध घरेलू बचत जीडीपी के 7.2 फीसदी पर थी जो इस साल और घटकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 5 दशक के निचले स्तर 5.1 प्रतिशत पर आ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक मोर्चों पर भारत की तस्वीर आशा का संचार कर रही है, लेकिन आर्थिक मोर्चें पर चिन्ता का सबब लगातार बना हुआ है, हालांकि समूची दुनिया में आर्थिक असंतुलन बना हुआ है, भारत ने फिर भी खुद को काफी संभाले हुए हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था इस पैमाने पर भी आंकी जाती है कि उसकी घरेलू बचत, प्रति व्यक्ति आय और क्रयशक्ति की स्थिति क्या है। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में करीब पचपन फीसद की गिरावट आई और यह सकल घरेलू उत्पाद के 5.1 फीसद पर पहुंच गई। वित्त मंत्रालय ने घरेलू बचत में गिरावट पर सफाई देते हुए कहा है कि लोग अब आवास और वाहन जैसी भौतिक संपत्तियों में अधिक निवेश कर रहे है। इसका असर घरेलू बचत पर पड़ा है। मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि संकट जैसी कोई बात नहीं है। सरकार ने यह भी कहा है कि पिछले दो साल में परिवारों को दिए गए खुदरा ऋण का 55 फीसद आवास, शिक्षा और वाहन पर खर्च किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">परिवारों के स्तर पर वित्त वर्ष 2020-21 में 22.8 लाख करोड़ की शुद्ध संपत्ति जोड़ी गई थी। 2021-22 में लगभग सत्रह लाख करोड़ और वित्तवर्ष 2022-23 में 13.8 लाख करोड़ रुपये की वित्तीय संपत्तियां बढ़ी हैं। इसका मतलब है कि लोगों ने एक साल पहले और उससे पहले के साल की तुलना में इस साल कम वित्तीय संपत्तियां जोड़ी हैं। सरकार के अनुसार ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वे अब कर्ज लेकर घर और वाहन जैसी भौतिक संपत्तियां खरीद रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आंकड़ों के मुताबिक पिछले दो साल में आवास और वाहन ऋण में दोहरे अंक में वृद्धि हुई है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि महामारी के बाद से लोग काफी सचेत हुए हैं। वे जोखिम वाले निवेश से बच रहे हैं। दूसरी बात बचत खातों पर ब्याज पर दर बहुत आकर्षक नहीं हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा आयोजित बी-20 बैठक में बोलते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा भी कि ब्याज दरें बढ़ाकर महंगाई नियंत्रित करने की कीमत आर्थिक विकास को चुकानी भारी पड़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार चाहे जो तर्क दे पर घरेलू बचत गिरना कोई शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। घरेलू बचत सामान्य सरकारी वित्त और गैर-वित्तीय कंपनियों के लिए कोष जुटाने का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रभावी जरिया होती है। देश की कुल बचत में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाली बचत का लगातार गिरना निम्न और मध्यम वर्ग ही नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता की बात है।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार महंगाई का बढ़ना भी न केवल आमजन के लिये बल्कि सरकार के लिये चिन्ता का कारण है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के अनुमानों से पता चलता है कि जुलाई (7.4 प्रतिशत) की तुलना में अगस्त में यह घटकर 6.8 फीसदी हो गई है। यहां तक कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई भी जुलाई के उच्चतम स्तर पर 11.5 फीसदी से घटकर अगस्त में 9.94 प्रतिशत हो गई। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">इन संकेतों से भले ही राहत की सांसें मिली हो, बावजूद इसके यह अब भी ज्यादा है। यह गिरावट मुख्यत: सब्जियों की कीमतों में कमी के कारण आई है, जो जुलाई की 37.4 फीसदी की तुलना में अगस्त में 26.1 प्रतिशत थी। हालांकि अनाज और दालों में महंगाई दोहरे अंकों में बनी हुई है, जिनमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के मद्देनजर गिरावट की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही। आरबीआई ने स्वीकारा है कि खाद्य मुद्रास्फीति को काबू करना कठिन साबित हो रहा है। मगर अधिकारियों को महंगाई कम करने का महत्वपूर्ण काम सौंपा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पष्ट है कि दबाव और प्रतिबंधों के माध्यम से महंगाई को काबू में करने के प्रयास काफी हद तक नाकाम रहे हैं। घरेलू आपूर्ति में कमी के कारण कई खाद्य वस्तुओं, विशेषकर अनाज व दालों में महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है। गेहूं का उत्पादन गरमी और बेमौसम बारिश के कारण प्रभावित है। यही कारण है कि मई 2022 में गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। चावल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। दालों का भी यही हाल है। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">महंगाई अक्सर सत्तापक्ष के लिये राजनीतिक चुनौती बनती रही है, चुनावों में हार-जीत को बहुत गहराई से प्रभावित करने में महंगाई आधार बनती रही है। महंगाई कम करने के लिए हमें वैकल्पिक रास्ते तलाशने होंगे, जो आर्थिक विकास या किसानों के हितों को प्रभावित किए बिना उपभोक्ताओं की रक्षा करे। विकृत एवं असंतुलित बाजार व्यवस्था ने भी अनेक आर्थिक विसंगतियों को जन्म दिया है। एक आदर्श व्यवस्था का चिन्तन ही वर्तमान की आर्थिक समस्याओं का समाधान हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान सरकार ने गरीबी दूर करने में सफलता पाई है, लेकिन उसकी सोच अमीरी बढ़ाने की भी रही है। छोटे उद्योग, सबके पास अपना काम, हर व्यक्ति के लिये रोजगार की सुनिश्चितता, कोई भी इतना बड़ा न हो कि जब चाहे अपने से निर्बल को दबा सके। एक आदमी के शक्तिशाली होने का मतलब है, कमजोरों पर निरन्तर मंडराता खतरा। एक संतुलन बने। सबसे बड़ी बात है मानवीय अस्तित्व और मानवीय स्वतंत्रता की। इस पर आंच न आये और आवश्यकताओं की पूर्ति भी हो जाये, ऐसी अर्थव्यवस्था की आज परिकल्पना आवश्यक है। तभी बढ़ती महंगाई, आय असंतुलन एवं घटती बचत पर काबू पाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आय असमानता, महंगाई, बेरोजगारी एक कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना है। यह जब गंभीर रूप से उच्चतम स्तर पर पहुंच जाती है तो उदार आर्थिक सुधारों के लिए सार्वजनिक समर्थन कम हो जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत में नव उदारवादी नीतियों से आर्थिक वृद्धि दर को जरूर पंख लगे हैं, लेकिन इससे अमीरों की जितनी अमीरी बढ़ी है, उस दर से गरीबों की गरीबी दूर नहीं हुई है। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">परिणामस्वरूप आर्थिक असमानता की खाई साल दर साल चौड़ी होती जा रही है। इसलिए हमारे नीति निर्माताओं तथा योजनाकारों को इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए कि सर्व समावेशी विकास के लक्ष्य को कैसे हासिल करें? ताकि हाशिये पर छूटे हुए वंचितों, पिछड़ों तथा शोषितों को विकास की मुख्यधारा में लाया जा सके। वर्तमान में आर्थिक असमानता से उबरने का सबसे बेहतर उपाय यही होगा कि वंचित वर्ग को अच्छी शिक्षा, अच्छा रोजगार उपलब्ध कराते हुए सुदूरवर्ती गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए सरकार को अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर कहीं ज्यादा खर्च करना होगा। स्वास्थ्य और शिक्षा पर कहीं ज्यादा राशि आवंटित करनी होगी। अभी इन मदों पर हमारा देश बहुत ही कम खर्च करता है। भारत में वह क्षमता है कि वह नागरिकों को एक अधिकारयुक्त जीवन देने के साथ ही समाज में व्याप्त असमानता को दूर कर सकता है। Economy</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="New Rules From 1st October: बदल रहा है महीना, हो रहे हैं बदलाव एक अक्तूबर से जिंदगी में आएगा नया पड़ाव" href="http://10.0.0.122:1245/the-month-is-changing-changes-are-taking-place-a-new-phase-will-come-in-life-from-october-1st/">New Rules From 1st October: बदल रहा है महीना, हो रहे हैं बदलाव एक अक्तूबर से जिंदगी में आएगा नया पड़ा…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 Sep 2023 18:17:20 +0530</pubDate>
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                <title>देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ी खबर</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। वैश्विक अर्थव्यवस्था (Economy) की अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में वर्ष 2023-24 की पहली तिमाही में मजबूत घरेलू मांग और निवेश के समर्थन से सकल घरलू उत्पाद (जीडीपी) (वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन) में एक साल पहले इसी अवधि की तुलना में 7.8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। इस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/india-economy-news/article-51822"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/challenge-to-bring-economy-back-on-track.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> वैश्विक अर्थव्यवस्था (Economy) की अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में वर्ष 2023-24 की पहली तिमाही में मजबूत घरेलू मांग और निवेश के समर्थन से सकल घरलू उत्पाद (जीडीपी) (वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन) में एक साल पहले इसी अवधि की तुलना में 7.8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। इस तरह भारत ने अप्रैल-जून 2023 की तिमाही में चीन के जीडीपी में वृद्धि को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे तेजी से वृद्धि कर रही बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन की आलोच्य तिमाही की वृद्धि 6.3 प्रतिशत थी। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा गुरुवार शाम को जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘2023-24 की पहली तिमाही में स्थिर कीमतों पर ( आधार वर्ष 2011-12 ) पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 40.37 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर रहने का अनुमान है, जबकि 2022-23 की पहली तिमाही में यह 37.44 लाख करोड़ रुपये था। Economy</p>
<h3 style="text-align:justify;">भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर अप्रैल-जून 2023 की तिमाही में रही 7.8 प्रतिशत</h3>
<p style="text-align:justify;">इस तरह यह सालाना आधार पर जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दशार्ता है। 2022-23 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि 13.1 प्रतिशत थी। पिछले साल के आंकड़ों में निम्न तुलनात्मक आधार का भी प्रभाव था। विशेषज्ञों ने पहली तिमाही के जीडीपी के आंकड़ों के बाजार के अनुमानों के अनुरूप बताया है लेकिन जिंस की कीमतों में गिरावट के बावजूद विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि का आंकड़ा कम रहने पर थोड़ी निराशा जतायी है । विनिर्माण क्षेत्र ने पहली तिमाही में 4.7 प्रतिशत की वृद्धि दिखायी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023-24 की पहली तिमाही में कृषि-वानिकी-मत्स्य पालन क्षेत्र का उत्पादन पिछले साल इसी अवधि की तुलना में 3.5 प्रतिशत बढ़ा तथा खनन क्षेत्र का उत्पादन की वृद्धि 5.8 प्रतिशत रही । पिछले वर्ष इन क्षेत्रों की इसी तिमाही की वृद्धि दर क्रमश: 2.4 प्रतिशत और 9.5 प्रतिशत थी।</p>
<p style="text-align:justify;">विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि एक साल पहले के 6.1 प्रतिशत की तुलना में 4.7 प्रतिशत रही जबकि बिजली,गैस, जलापूर्ति और अन्य जन सुविधाओं के क्षेत्र में उत्पादन वृद्धि 2.9 प्रतिशत रही । पिछले वर्ष इसी दौरान जनसुविधा क्षेत्र की वृद्धि 14.9 प्रतिशत थी। अप्रैल-जून 2023 की तिमाही में निर्माण क्षेत्र की वृद्धि 7.9 प्रतिशत और व्यापार, होटल, परिवहन संचार एवं प्रसारण और अन्य सेवाओं के क्षेत्र में उत्पादन सालाना आधार पर 9.2 प्रतिशत बढ़ा । एक साल पहले इन क्षेत्रों की वृद्धि दर क्रमश: 16 प्रतिशत और 25.7 प्रतिशत थी। वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवा क्षेत्र ने आलोच्य तिमाही में एक साल पहले के 8.5 प्रतिशत की तुलना में 12.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जबकि लोक-प्रशासन रक्षा और ऐसी अन्य सेवाओं के क्षेत्र की वृद्धि 7.9 प्रतिशत (पिछले वर्ष 21.3 प्रतिशत) रही। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">प्रथमिक कीमत पर सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) 2023-24 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत दर्ज किया गया जबकि करों में शुद्ध रूप से 7.7 प्रतिशत की वृद्धि रही। आंकड़ों के अनुसार 2023-24 की पहली तिमाही में वर्तमान कीमतों पर जीडीपी 70.67 लाख करोड़ रुपये रहा जो 2022-23 की पहली तिमाही के 65.42 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 8.0 प्रतिशत की वृद्धि दशार्ता है । 2022-23 की पहली तिमाही में वर्तमान मूल्य पर जीडीपी में 27.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2023-24 की पहली तिमाही में जीडीपी में व्यय के हिस्से के रूप में सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) पर व्यय 29.3 प्रतिशत रहा जो पिछले वर्ष इसी दौरान 29.1 प्रतिशत रहा। जीएफसीएफ का आंकड़ा अर्थव्यवस्था में पूंजीगत निवेश के रुझान को दशार्ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने कहा, ‘पहली तिमाही की जीडीपी वृद्धि के आंकड़े हमारी उम्मीद के अनुरूप है पर इसमें अलग अलग हिस्सों के योगदान की स्थिति पर कुछ आश्चर्य होता है । जिंसों की कीमतों में वार्षिक आधार पर गिरावट के चलते आदर्श रूप से विनिर्माण क्षेत्र की फर्मों के परिचालन लाभ में वृद्धि और इस क्षेत्र के उत्पादन के मूल्य में तेज वृद्धि होनी चाहिए थी , पर इस क्षेत्र ने जिस तरह निराश किया वह आश्चर्यजनक है। उन्होंने कहा कि सेवाओं के क्षेत्र में निरंतर मजबूत वृद्धि बनी हुई है। Economy</p>
<p style="text-align:justify;">मिलवुड केन इंटरनेशनल के संस्थापक एवं सीईओ नीश भट्ट ने कहा,‘निवेश में सुधार, घरेलू मांग में वृद्धि, सेवा और कृषि क्षेत्र की तगड़ी वृद्धि जैसे कई कारकों ने पहली तिमाही में भारत के जीडीपी को 7.8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि आलोच्य तिमाही में भारत की वृद्धि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के 6.3 प्रतिशत से ऊपर रही और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था की अपनी ख्याति बनाए हुए है। रियल एस्टेट क्षेत्र की परामर्श कंपनी नाइट फ्रैंक इंडिया के निदेशक (अनुसंधान) विवेक राठी ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की यह वृद्धि घरलू उपभोग और निवेश की गतिविधियों में तेजी की बदौलत है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="तरनतारन में हेरोइन बरामद" href="http://10.0.0.122:1245/heroin-seized-in-tarn-taran/">तरनतारन में हेरोइन बरामद</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Sep 2023 15:22:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने दी आर्थिक मंदी की चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[ब्रुसेल्स (एजेंसी)। यूरोपीय अर्थव्यवस्था के आयुक्त पाओलो जेंटिलोनी ने चेतावनी दी है कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है और ऊर्जा संकट और उच्च मुद्रास्फीति के कारण कम से कम सर्दियों के महीनों के लिए संकुचन की भविष्यवाणी की गई है। जेंटिलोनी ने सोमवार को यूरोग्रुप के एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘अगर हम उच्च […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/eu-officials-warn-of-economic-slowdown/article-39670"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/european-union.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्रुसेल्स (एजेंसी)।</strong> यूरोपीय अर्थव्यवस्था के आयुक्त पाओलो जेंटिलोनी ने चेतावनी दी है कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है और ऊर्जा संकट और उच्च मुद्रास्फीति के कारण कम से कम सर्दियों के महीनों के लिए संकुचन की भविष्यवाणी की गई है। जेंटिलोनी ने सोमवार को यूरोग्रुप के एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘अगर हम उच्च आवृत्ति संकेतक और आर्थिक भावना को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि कई चीजें इस सर्दी में आर्थिक गतिविधियों में संकुचन की ओर इशारा करती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है मामला</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">यूरोग्रुप के अध्यक्ष पास्कल डोनोहो ने कहा कि हर कोई जानता है कि यूरो क्षेत्र में अर्थव्यवस्था अक्टूबर में धीमी हो रही है और इस क्षेत्र के लिए आर्थिक विकास 0.5 प्रतिशत रही। यूरो क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले 19 देशों के वित्त मंत्रियों ने सोमवार को ब्रसेल्स में यूरोजोन के आर्थिक विकास के साथ-साथ उच्च ऊर्जा कीमतों के प्रभाव को कम करने के लिए बजटीय उपायों पर चर्चा करने के लिए मुलाकात की। आयोग के अनुमानों के अनुसार, यूरो क्षेत्र की सरकारों ने अब तक सामूहिक रूप से वर्ष के लिए ऊर्जा समर्थन पर लगभग 200 बिलियन यूरो, या यूरोपीय संघ (ईयू) के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.25 प्रतिशत खर्च किया है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 08 Nov 2022 11:18:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आर्थिकी को मजबूत करने में त्योहारों का योगदान</title>
                                    <description><![CDATA[सतीश सिंह कोरोना के बाद दुर्गा पूजा के लिए धन का सबसे प्रमुख स्रोत प्रायोजन है। बैंकों से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल में कारोबार करने वाली कंपनियां, उपभोक्ता सामान से जुड़ी कंपनियाँ ने इस वर्ष दुर्गा पूजा को प्रायोजित किया है। नामचीन पूजा पंडाल, पंडाल के द्वार, खंभे, बैनर और स्टॉल प्रायोजन के लिए मुहैया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/contribution-of-festivals-in-strengthening-the-economy/article-38671"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-10/unique-holi-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><em><strong>सतीश सिंह कोरोना के बाद दुर्गा पूजा के लिए धन का सबसे प्रमुख स्रोत प्रायोजन है। बैंकों से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल में कारोबार करने वाली कंपनियां, उपभोक्ता सामान से जुड़ी कंपनियाँ ने इस वर्ष दुर्गा पूजा को प्रायोजित किया है। नामचीन पूजा पंडाल, पंडाल के द्वार, खंभे, बैनर और स्टॉल प्रायोजन के लिए मुहैया करवाते हैं। विज्ञापन से भी दुर्गा पूजा के लिए पैसे आते हैं।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">भारत उत्सवधर्मियों का देश है। यहाँ त्योहारों को उत्सव की तरह मनाने का चलन है। त्योहार लोगों के जीवन में उल्लास का रंग भर देते हैं साथ ही साथ देश की आर्थिकी को भी मजबूत करने का काम करते हैं। ये रोजगार सृजन के भी स्रोत हैं। त्योहारों से स्थायी रोजगार सृजित नहीं होते हैं, लेकिन स्थानीय कामगारों, कलाकारों और शिल्पकारों को अस्थायी तौर पर कुछ दिनों या कुछ महीनों के लिए जरूर रोजगार मिल जाता है। इससे निजी अंतिम उपभोग में इजाफा होता है, जिससे मांग और आपूर्ति में बेहतरी आती है। साथ ही, विविध क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में इजाफा होता है। पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड और ओडिसा में यह पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है। हालांकि, कमोबेश यह त्योहार देशभर में मनाया जाता है। इस पूजा के दौरान प्रतिमा बनाने वाले कुम्हार, दुर्गा माँ के जेवर बनाने वाले कलाकार, नाटक करने वाले कलाकार, नृत्य-संगीत, होटल, रेस्टोरेंट, पर्यटन आदि उद्योगों को बढ़ावा मिलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूनेस्को ने 2021 में दुर्गा पूजा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित कर दिया है, जिससे कयास लगाये जा रहे हैं कि हर साल पूजा के दौरान पर्यटकों की आवक में तेजी आयेगी, जिसमें विदेशी पर्यटकों की संख्या अधिक रहेगी। कोलकाता के रहवासियों ने यूनेस्को के प्रति अपनी कृतज्ञता एक कार्निवल आयोजित करके की है। इस साल 1 अक्तूबर से 5 अक्तूबर के दौरान भी कोलकाता में देश और विदेश से दुर्गा माँ के भक्त शामिल होकर इस त्योहार का आनंद लेंगे। वर्ष 2019 में दुर्गा पूजा के दौरान हुए कारोबार पर ब्रिटिश काउंसिल ने एक अध्ययन किया है, जिसके अनुसार वर्ष 2019 के दौरान दुर्गा पूजा में 32,377 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ, जो पश्चिम बंगाल की कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.58 प्रतिशत था। इस राशि में खुदरा क्षेत्र की हिस्सेदारी 27,364 करोड़ रुपये की थी। एक अनुमान के अनुसार इस साल देश में दुर्गा पूजा के दौरान लगभग 1.25 से 1.5 लाख करोड़ रुपए के कारोबार होने का अनुमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना के बाद दुर्गा पूजा के लिए धन का सबसे प्रमुख स्रोत प्रायोजन है। बैंकों से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल में कारोबार करने वाली कंपनियां, उपभोक्ता सामान से जुड़ी कंपनियों ने इस वर्ष दुर्गा पूजा को प्रायोजित किया है। नामचीन पूजा पंडाल, पंडाल के द्वार, खंभे, बैनर और स्टॉल प्रायोजन के लिए मुहैया करवाते हैं। विज्ञापन से भी दुर्गा पूजा के लिए पैसे आते हैं। इस वर्ष दीवाली पूरे देश में 24 अक्तूबर को धूमधाम से मनाया जायेगा। दीवाली में लक्ष्मी माँ की पूजा की जाती है, जिन्हें धन की देवी माना जाता है। इस त्योहार में दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच मिठाइयों का आदान-प्रदान किया जाता है। कुम्हार दीये और खिलौने बनाते हैं। लोग पटाखा जलाकर खुशी का इजहार करते हैं, जिसके कारण पटाखे का कारोबार बड़े पैमाने पर किया जाता है। दीवाली से दो दिन पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सोना, चांदी और धातु के बर्तन खरीदने का रिवाज है। नए वाहन भी इस त्योहार में खूब खरीदे जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अखिल भारतीय व्यापार परिसंघ (सीएआईटी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार कोरोना महामारी के बावजूद वर्ष 2021 में दीवाली के दौरान 1.25 लाख करोड़ रुपए का कारोबार किया गया था, जो विगत 10 सालों का रिकॉर्ड था। सीएआईटी के मुताबिक देशभर में चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मुहिम चलाये जाने की वजह से चीन को वर्ष 2019 में लगभग 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था और स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों, कुम्हारों आदि की कमाई में तेजी आई थी। ई-कॉमर्स कंपनियां भी इस साल दीवाली में जबरदस्त कारोबार होने की उम्मीद कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सीएआईटी के अनुमान के अनुसार दीवाली में कुल कारोबार 1.5 से 1.75 लाख करोड़ रुपए की सीमा को पार कर सकता है, क्योंकि विगत 2 सालों से आमजन कोरोना महामारी की वजह से परेशान थे और इस साल वे खुद को उत्सव के रंग में सराबोर करना चाहते हैं। भारत विविधताओं से भरा देश है और यहाँ हर 12 कोस में बोली, रहन-सहन, भाषा और पानी बदल जाती है, लेकिन इस बदलाव को त्योहार एक रंग में रंग देते हैं। इंसान की जिंदगी में अनेक मुश्किलें हैं, जिससे वह अक्सर घबरा जाता है। त्योहार हमें मुश्किलों के बीच जीना सिखाते हैं। साथ ही, हमें आर्थिक रूप से सबल बनाने का काम भी करते हैं।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-युवा लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
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                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Oct 2022 10:13:50 +0530</pubDate>
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                <title>भारत की आर्थिक वृद्धि 2022-23 की पहली तिमाही में रही 13.5 प्रतिशत</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली। आर्थिक गतिविधियों में सुधार के बीच देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में चालू वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 13.5 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया। पिछले वित्त वर्ष 2021-22 की इसी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 20.1 प्रतिशत थी। पिछले वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में कोविड महामारी की दूसरी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/india-economic-growth-in-the-first-quarter-of-2022-23-stood-at-13-5-percent/article-37288"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/india-economy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली।</strong> आर्थिक गतिविधियों में सुधार के बीच देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में चालू वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 13.5 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया। पिछले वित्त वर्ष 2021-22 की इसी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 20.1 प्रतिशत थी। पिछले वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में कोविड महामारी की दूसरी लहर ने आर्थिक गतिविधियों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया था। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की जारी रिपोर्ट में कहा गया है,“ अनुमान है कि वर्ष 2011-12 कीमतों पर आधारित वास्तविक जीडीपी 2022-23 की पहली तिमाही में 36.85 लाख करोड़ रुपये के स्तर को प्राप्त कर लिया है जो 2021-22 की पहली तिमाही में 32.46 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 13.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। 2021-22 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 20.1 प्रतिशत थी। ”</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2022-23 की पहली में वर्तमान कीमतों पर जीडीपी 64.95 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि 2021-22 में की पहली तिमाही में चालू कीमत पर जीडीपी 51.27 लाख करोड़ रुपये था। इस तरह यह वर्तमान कीमतों पर जीडीपी में चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 26.7 प्रतिशत की वृद्धि रही। 2021-22 में चालू कीमत पर जीडीपी में 32.4 प्रतिशत की वद्धि दर्ज की गयी थी। एनएसओ के आंकड़ों से पता चलता है कि चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में कृषि क्षेत्र में सालाना आधार पर 4.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में 4.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस अवधि के दौरान खनन क्षेत्र में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। श्रम प्रधान क्षेत्रों में माने जाने वाले निर्माण क्षेत्र में जून तिमाही में सालाना आधार पर 16.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रमुख देशों की कमजोर मांग ने हाल के कुछ महीनों में देश के निर्यात को प्रभावित किया है जबकि मासिक जीएसटी संग्रह, ऑटो बिक्री, बिजली की खपत और हवाई यातायात वृद्धि जैसे जल्दी-जल्दी आने वाले आंकड़े घरेलू मांग में मजबूत बनी रहने का संकेत दे रहे हैं। बीआर अंबेडकर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के कुलपति एन आर भानुमूर्ति ने इन आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए कहा, “ पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि 13-15 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान था। कुछ ने इसे 17 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया। इस तरह यह सामान्य अनुमान के निचले दायरे में ही रही। इसका मुख्य कारण बाहरी झटके (यूक्रेन युद्ध और वैश्विक जिंस बाजार में तेजी तथा आपूर्ति श्रृंखला में अड़चनें) हैं।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Sep 2022 09:52:18 +0530</pubDate>
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                <title>श्रीलंका में अर्थव्यवस्था ध्वस्त, भारतीय और अमेरिकी अधिकारी करेंगे दौरा</title>
                                    <description><![CDATA[कोलंबो। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने बुधवार को संसद में अपने दिए एक विशेष बयान में कहा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और भारत के अधिकारी देश में आर्थिक स्थिति पर चर्चा करने के लिए गुरुवार को श्रीलंका का दौरा करेंगे। उन्होंने कहा, ”अगले सोमवार को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के प्रतिनिधियों का एक दल भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/economy-collapses-in-sri-lanka-indian-and-american-officials-will-visit/article-34783"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/sri-lanka-economic.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कोलंबो।</strong> श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने बुधवार को संसद में अपने दिए एक विशेष बयान में कहा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और भारत के अधिकारी देश में आर्थिक स्थिति पर चर्चा करने के लिए गुरुवार को श्रीलंका का दौरा करेंगे। उन्होंने कहा, ”अगले सोमवार को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के प्रतिनिधियों का एक दल भी श्रीलंका पहुंचेगा।” इस दौरान प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि देश अब ईंधन, गैस, बिजली और भोजन की कमी से कहीं अधिक गंभीर स्थिति का सामना कर रहा है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है। विक्रमसिंघे ने कहा, ”आज हमारे सामने यही सबसे गंभीर मुद्दा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन मुद्दों को केवल श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करके ही सुलझाया जा सकता है और इसके लिए हमें सबसे पहले हमारे सामने आने वाले विदेशी मुद्रा भंडार में कमी का समाधान करना होगा।” अधिकारियों ने कहा, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन के नेतृत्व में भारत सरकार का एक शीर्ष-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल एक विशेष विमान से गुरुवार को श्रीलंका पहुंचेगा, ताकि आगे की आर्थिक सहायता के लिए यहां की जमीनी स्थिति का आकलन किया जा सके। श्रीलंका में प्रतिनिधिमंडल का यह दौरा सिर्फ तीन घंटे लिए होगा। इस दौरान वे राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे दोनों के साथ बातचीत करेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा, अगले सोमवार को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के प्रतिनिधियों का एक दल भी श्रीलंका पहुंचेगा।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Jun 2022 10:12:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजपक्षे परिवार संभाल नहीं पाया अर्थव्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के त्यागपत्र देने तथा हिंसक घटनाओं के साथ श्रीलंका का वर्तमान संकट और गहरा हो गया है। राष्ट्रपति गोताबया राजपक्षे, जो प्रधानमंत्री के छोटे भाई भी हैं, ने हिंसक घटनाओं में कई लोगों के मारे जाने के बाद सेना को विशेषाधिकार दे दिया है। इस कदम को लेकर भी सवाल उठ रहे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/mahinda-rajapaksa-family-could-not-handle-the-economy/article-33282"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/pm-mahinda-rajapaksa.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के त्यागपत्र देने तथा हिंसक घटनाओं के साथ श्रीलंका का वर्तमान संकट और गहरा हो गया है। राष्ट्रपति गोताबया राजपक्षे, जो प्रधानमंत्री के छोटे भाई भी हैं, ने हिंसक घटनाओं में कई लोगों के मारे जाने के बाद सेना को विशेषाधिकार दे दिया है। इस कदम को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जैसा कि सर्वविदित है, इस संकट की पृष्ठभूमि यह है कि सरकार के विभिन्न निर्णयों, जैसे- आॅर्गेनिक खेती को अनिवार्य करना, करों में बड़ी छूट देना आदि, से देश की अर्थव्यवस्था और राजस्व को बड़ा झटका लगा। कोरोना महामारी ने पर्यटन को तबाह कर दिया, जो श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है तथा विदेशी मुद्रा के आय का सबसे बड़ा स्रोत भी। राजपक्षे सरकार में इस परिवार से ही आठ सदस्य थे और बजट का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी परिवार के नियंत्रण में था। इसके बावजूद यह परिवार गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सार्थक व प्रभावी हस्तक्षेप करने में असफल रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस साल के शुरू में ही संकट के बेहद गंभीर होने के स्पष्ट संकेत आ चुके थे। तब यह कहा जा रहा था कि सरकार कुछ ठोस कदम उठायेगी और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी बातचीत की संभावना जतायी जा रही थी, पर कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। राजपक्षे परिवार की कार्यशैली में भी सुधार नहीं हुआ। जब पिछले महीने श्रीलंका विदेशी कर्जों की किस्त चुकाने में असमर्थ रहा, तब देश के भीतर और बाहर साफ संदेश गया कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। देश के भीतर बढ़ते असंतोष को कम करने के लिए महिंदा राजपक्षे ने सरकार में कुछ फेर-बदल किया, पर इससे न तो स्थिति में कोई सुधार आया और न ही लोगों का रोष कम हुआ। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार के दो शीर्षस्थ पदों पर राजपक्षे बंधु ही काबिज रहे। इसलिए लोगों की सारी नाराजगी इस परिवार से है।</p>
<p style="text-align:justify;">वित्तीय सहायता के लिए अभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से जो बातचीत चल रही है, उस संबंध में आ रही खबरों से संकेत मिलता है कि श्रीलंका के सामने कड़ी शर्तें रखी जा रही हैं, जिनमें अर्थव्यवस्था में बड़े सुधार भी शामिल हैं। राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक तनाव से भी स्थिति बिगड़ रही है। एक उम्मीद यह की जा सकती है कि कोरोना काल से दुनिया के उबरने के साथ-साथ श्रीलंका में पर्यटकों का आना शुरू हो। इससे अर्थव्यवस्था को थोड़ा सहारा मिल सकता है और लोगों की आमदनी का एक जरिया मिलेगा। श्रीलंका में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनकी बड़ी मांग यह है कि दोनों भाई अपना पद छोड़ दें। यदि वहां कोई नयी राजनीतिक पहल होती है, तो वह राजपक्षे परिवार के सत्ता में रहते संभव नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने तो त्यागपत्र दे दिया है, पर उनके भाई अभी भी देश के राष्ट्रपति हैं। पहले इन्हीं भाइयों के प्रयासों से श्रीलंकाई संविधान में संशोधन कर राष्ट्रपति को बहुत अधिक अधिकार दिया जा चुका है। श्रीलंका के गृहयुद्ध में तमिल समुदाय के भयानक दमन को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिकायतें हैं। यह मसला देश की आंतरिक शांति व स्थिरता के लिए भी एक प्रश्नचिह्न है।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 May 2022 09:48:30 +0530</pubDate>
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                <title>चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[चालू वित्त वर्ष 2022-23 के पहले माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रहण 1.68 लाख करोड़ रुपये हुआ, जो जुलाई, 2017 में इस कराधान प्रणाली के लागू होने के बाद से सर्वाधिक मासिक संग्रहण है। यह आंकड़ा अप्रैल, 2021 की तुलना में 20 प्रतिशत तथा इस साल मार्च से लगभग 18 प्रतिशत अधिक है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/economy-growing-despite-challenges/article-33010"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/indian-economy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चालू वित्त वर्ष 2022-23 के पहले माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रहण 1.68 लाख करोड़ रुपये हुआ, जो जुलाई, 2017 में इस कराधान प्रणाली के लागू होने के बाद से सर्वाधिक मासिक संग्रहण है। यह आंकड़ा अप्रैल, 2021 की तुलना में 20 प्रतिशत तथा इस साल मार्च से लगभग 18 प्रतिशत अधिक है। पिछले साल के हिसाब से देखें, तो बीते अप्रैल में आयातित वस्तुओं से 30 प्रतिशत तथा घरेलू लेन-देन (इसमें आयातित सेवाएं भी शामिल हैं) से 17 प्रतिशत अधिक राजस्व हासिल हुआ है। यह कराधान मार्च की बिक्री के आधार पर हुआ है। इसका एक अर्थ तो यह है कि मुद्रास्फीति के कारण मांग में कमी के बावजूद कारोबारी गतिविधियां बढ़ रही हैं। इससे दूसरा संकेत यह मिलता है कि कारोबारियों में कर देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि उचित कर संग्रहण के लिए अनेक कदम उठाये गये हैं, जैसे- लोगों को समय से कर देने के लिए प्रोत्साहित करना, कराधान प्रणाली को सरल व प्रभावी बनाना तथा समुचित कर न चुकानेवालों के विरुद्ध कार्रवाई करना। इन प्रयासों में डाटा विश्लेषण और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल बड़ा कारगर साबित हुआ है। इस उपलब्धि पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यों के प्रयासों की सराहना करते हुए भरोसा जताया है कि सबकी साझा कोशिशों से देश की अर्थव्यवस्था लगातार बेहतरी की ओर बढ़ रही है। इसमें एक पहलू यह भी है कि अलग-अलग राज्यों में राजस्व संग्रहण में बड़ी असमानता है। पिछले साल अप्रैल के मुकाबले इस साल अप्रैल में मणिपुर में 33 प्रतिशत और बिहार में दो प्रतिशत कम जीएसटी संग्रहण हुआ है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में 90, उत्तराखंड में 33, नागालैंड में 32, ओड़िशा में 28 और महाराष्ट्र में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इनमें आयातित वस्तुओं से प्राप्त राजस्व शामिल नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">ये आंकड़े सुधार के विषम परिणामों की ओर संकेत करते हैं। जो राज्य कम कर हासिल कर रहे हैं, उनके औद्योगिक एवं व्यावसायिक विकास पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। खबरों की मानें, तो केंद्र सरकार कुछ वस्तुओं पर लगनेवाले सेस (अधिकर) को जीएसटी में शामिल करने की योजना बना रही है ताकि राज्यों के राजस्व की कमी की भरपाई हो सके। ऐसा करना सराहनीय है, लेकिन आखिरकार राजस्व में बढ़ोतरी आर्थिक विकास से ही संभव हो सकती है। यदि जीएसटी में लगातार बढ़ोतरी को बीते वित्त वर्ष के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के संग्रहण के आंकड़ों के साथ रखकर देखें, तो एक उत्साहवर्द्धक तस्वीर उभरती है। वित्त वर्ष 2021-22 में प्रत्यक्ष करों में 49 और अप्रत्यक्ष करों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी तथा कुल कर संग्रहण 27.07 लाख करोड़ रुपये का हुआ था। यह न केवल बजट अनुमानों से अधिक था, बल्कि 2020-21 की राजस्व प्राप्ति से 34 प्रतिशत अधिक था। स्पष्ट है कि घरेलू और वैश्विक चुनौतियों का सामना करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था प्रगति के पथ पर है।</p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://twitter.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 May 2022 10:02:48 +0530</pubDate>
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