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                <title>Divorce - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>तीन तलाक पर रोक</title>
                                    <description><![CDATA[आखिरकार केंद्र की एनडीए सरकार ने तीन तलाक की कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है। राज्य सभा में बिल अटकने के कारण व सरकार के अंतिम साल में होने के कारण ओर कोई रास्ता भी नहीं था। नि:संदेह इस निर्णय के राजनीतिक पहलू भी हैं। फिर भी देश की करोड़ों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/stay-on-three-divorce/article-6010"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/three-divocs.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आखिरकार केंद्र की एनडीए सरकार ने तीन तलाक की कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है। राज्य सभा में बिल अटकने के कारण व सरकार के अंतिम साल में होने के कारण ओर कोई रास्ता भी नहीं था। नि:संदेह इस निर्णय के राजनीतिक पहलू भी हैं। फिर भी देश की करोड़ों मुस्लमान महिलाओं को पुरूष प्रधान समाज की गुलामी से निकालना जरूरी था।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल रोटी न बढ़िया पका सकना, कपड़े प्रैस करते सलवट रह जाने, लड़की पैदा होने पर तलाक इत्यादि बातों पर महिलाओं को दुखों में डालना समाज के कुरूप चेहरे की निशानी हैं। तलाक देने के तरीके भी अजीबो-गरीब थे और रिश्तों को मूली-गाजर की तरह लिया जाता था। फोन और वट्सएप पर तलाक दिए जाते रहे हैं। यह कुरीति बहुत पहले खत्म होनी चाहिए थी। धर्म के नाम पर तलाक होते रहे। तलाक के खिलाफ बोलना भी ईशनिंदा की तरह ही माना जाता था।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल भारतीय समाज की यह बड़ी समस्या है कि कुरीति को बचाने के लिए धर्मों की दुहाई दी जाती है। धर्म व विज्ञान दोनों की नजर में यह अत्याचार है। लोकतंत्र भी इसी सिद्धांत का समर्थक है। अब वक्त महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी देने का है। राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल एक दशक से अधिक समय से लटका हुआ है। राज्यों ने अपने स्तर पर पंचायती चुनाव में 50 प्रतिशत तक आरक्षण दिया है। एक देश में एक सिद्धांत लागू होना चाहिए। तीन तलाक खत्म करने से ही हिंदू, सिख परिवारों में बढ़ रहे तलाक के रुझान को भी रोकने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महानगरों से चली यह बुराई गांवों तक पहुंच गई है। महिलाओं पर अत्याचार की इंतहा हो गई है। बच्चियों के साथ गैंगरेप आम बात हो गई है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून व्यवस्था को मजबूत करने के साथ भारतीय संस्कृति के पुन : जागरण की आवश्यकता है। महिलाओं को आर्थिक तौर पर भी आत्मनिर्भर बनाना होगा। आर्थिक मजबूती महिलाओं की सामाजिक पहरेदार बनेगी लेकिन अभी तक हालात यह हैं कि देश में पुरुष व महिलाएं दोनों के लिए रोजगार पानी समस्या बनी हुई है। बेरोजगारी भी एक बड़ी समस्या है। सरकार को रोजगार के अवसरों को खोजने की आवश्यकता है। वैश्वीकरण के नकारात्मक पक्ष ने सामाजिक रिश्तों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है। महिलाओं पर अत्याचार रोकने के साथ-साथ भारतीय सामाजिक रिश्तों की अहमीयत को भी बहाल करना होगा।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Sep 2018 09:13:16 +0530</pubDate>
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                <title>मानसून सत्र का आज आखिरी दिन, राज्यसभा में पेश होगा संशोधित ट्रिपल तलाक बिल</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली(एजेंसी)। संसद के मानसून सत्र का आज आखिरी दिन है। आज केंद्र सरकार राज्यसभा में अति महत्वपूर्ण तीन तलाक बिल को पेश कर सकती है. गुरुवार को ही मोदी कैबिनेट ने इस बिल में संशोधन किए हैं जिसके बाद अब ये बिल पास होने की उम्मीद जताई जा रही है। बता दें कि इससे पहले […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/monsoon-session-today-is-last-day-the-rajya-sabha-in-the-present-will-modify-the-triple-divorce-bill/article-5294"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/treepal-talaq.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">
<strong>नई दिल्ली(एजेंसी)। </strong>संसद के मानसून सत्र का आज आखिरी दिन है। आज केंद्र सरकार राज्यसभा में अति महत्वपूर्ण तीन तलाक बिल को पेश कर सकती है. गुरुवार को ही मोदी कैबिनेट ने इस बिल में संशोधन किए हैं जिसके बाद अब ये बिल पास होने की उम्मीद जताई जा रही है। बता दें कि इससे पहले कांग्रेस ने इस बिल में कई तरह की कमियां बताई थीं, जिसके बाद बिल को संशोधित किया गया है। गौरतलब है कि गुरुवार को ही राज्यसभा में उपसभापति के चुनाव हुए हैं, इस चुनाव में एनडीए के हरिवंश सिंह ने बड़ी जीत हासिल की है। यही कारण है कि एनडीए की स्थिति अभी मजबूत नज़र आ रही है। ऐसे में केंद्र सरकार चाहेगी कि सत्र का अंत होते हुए वह तीन तलाक जैसे महत्वपूर्ण बिल को पास करवा पाए।</p>
<h2>अब मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार होगा</h2>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि नए बिल में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) के मामले को गैर जमानती अपराध तो माना गया है लेकिन संशोधन के हिसाब से अब मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार होगा। साथ ही विधेयक में एक और संशोधन किया गया है जिसमें पीड़ित के रिश्तेदार जिससे उसका खून का रिश्ता हो भी शिकायत दर्ज कर सकता है. बता दें कि पिछले सत्र में राज्यसभा में इस विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में तीखी नोक-झोंक देखने को मिली थी। जब विपक्ष की तरफ से विधेयक को त्रुटिपूर्ण बताते हुए प्रवर समिति में भेजने की मांग की गई थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">संशोधित तीन तलाक बिल में क्या खास</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;">ट्रायल से पहले पीड़िता का पक्ष सुनकर मजिस्ट्रेट दे सकता है आरोपी को जमानत।</li>
<li style="text-align:justify;">पीड़िता, परिजन और खून के रिश्तेदार ही एफआईआर दर्ज करा सकते हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">मजिस्ट्रेट को पति-पत्नी के बीच समझौता कराकर शादी बरकरार रखने का अधिकार होगा।</li>
<li style="text-align:justify;">एक बार में तीन तलाक बिल की पीड़ित महिला मुआवजे की अधिकार।</li>
</ul>
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<p> </p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Aug 2018 08:58:46 +0530</pubDate>
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                <title>तीन तलाक महिलाओं से क्रूरता</title>
                                    <description><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला: संविधान से ऊपर नहीं कोई पर्सनल लॉ बोर्ड इलाहाबाद: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘तीन तलाक’ को महिलाओं के साथ क्रूरता करार देते हुए वीरवार को कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। तीन तलाक मसले पर उच्च न्यायालय में दाखिल दो याचिकाओं पर न्यायाधीश सुनीत कुमार ने वीरवार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/three-divorced-women-toughness/article-445"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला: संविधान से ऊपर नहीं कोई पर्सनल लॉ बोर्ड</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>इलाहाबाद: </strong>इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘तीन तलाक’ को महिलाओं के साथ क्रूरता करार देते हुए वीरवार को कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। तीन तलाक मसले पर उच्च न्यायालय में दाखिल दो याचिकाओं पर न्यायाधीश सुनीत कुमार ने वीरवार को यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि तीन तलाक असंवैधानिक है। यह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन करता है।<br />
अदालत ने फैसले में कहा, ‘मुस्लिम पति को स्वेच्छाचारिता से, एकतरफा तुरंत तलाक देने की शक्ति की धारणा इस्लामिक रीतियों के मुताबिक नहीं है। यह आम तौर पर भ्रम है कि मुस्लिम पति के पास कुरान के कानून के तहत शादी को खत्म करने की स्वच्छंद ताकत है।’ अदालत ने कहा, ‘पूरा कुरान पत्नी को तब तक तलाक देने के बहाने से व्यक्ति को मना करता है जब तक वह विश्वसनीय और पति की आज्ञा का पालन करती है।’ उन्होंने कहा, ‘इस्लामिक कानून व्यक्ति को मुख्य रूप से शादी तब खत्म करने की इजाजत देता है जब पत्नी का चरित्र खराब हो, जिससे शादीशुदा जिंदगी में नाखुशी आती है। लेकिन गंभीर कारण नहीं हों तो कोई भी व्यक्ति तलाक को उचित नहीं ठहरा सकता चाहे वह धर्म की आड़ लेना चाहे या कानून की।’ अदालत ने 23 वर्षीय महिला हिना और उम्र में उससे 30 वर्ष बड़े पति की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। हिना के पति ने ‘अपनी पत्नी को तीन बार तलाक देने के बाद’ उससे शादी की थी। पश्चिम उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले दंपत्ति ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर पुलिस और हिना की माँ को निर्देश देने की मांग की थी कि वे याचिकाकर्ताओं का उत्पीड़न बंद करें और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।<br />
अदालत ने कहा, ‘जो सवाल अदालत को परेशान करता है वह यह है कि क्या मुस्लिम पत्नियों को हमेशा इस तरह की स्वेच्छाचारिता से पीड़ित रहना चाहिए? क्या उनका निजी कानून इन दुर्भाग्यपूर्ण पत्नियों के प्रति इतना कठोर रहना चाहिए? क्या इन यातनाओं को खत्म करने के लिए निजी कानून में उचित संशोधन नहीं होना चाहिए? न्यायिक अंतरात्मा इस विद्रूपता से परेशान है?’ अदालत ने टिप्पणी की, ‘आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष देश में कानून का उद्देश्य सामाजिक बदलाव लाना है। अदालत ने टिप्पणी की, ‘भारत प्रगतिशील राष्ट्र है, भौगोलिक सीमाएं ही किसी देश की परिभाषा तय नहीं करतीं। इसका आकलन मानव विकास सूचकांक सहित कई अन्य पैमाने पर किया जाता है, जिसमें समाज द्वारा महिलाओं के साथ होने वाला आचरण भी शामिल है। इतनी बड़ी आबादी को निजी कानून के मनमानेपन पर छोड़ना प्रतिगामी है, समाज और देश के हित में नहीं है। यह भारत के एक सफल देश बनने में बाधा है और पीछे की तरफ धकेलता है।’<br />
इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में भी एक मामला विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट में आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(एआईएमपीएलबी) तीन तलाक का समर्थन और केन्द्र सरकार इसका विरोध कर रही है। एआईएमपीएलबी ने कहा है कि तीन तलाक की व्यवस्था में परिवर्तन की कोई गुंजाईश नहीं है। उसने कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा तलाक को अन्तिम रूप देने से पहले सहमति बनाने के लिए तीन माह की ‘नोटिस की अवधि’ को अनिवार्य करने के सुझावों को भी नकार दिया है। इसके पहले 1986 में सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो मामले पर फैसले के बाद केन्द्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को कुछ शर्तों के साथ जीवनपर्यन्त भरण-पोषण वृत्ति का हक देने के लिए कानून बनाया था।<br />
%%%%<br />
इस्लामिक कानून व्यक्ति को मुख्य रूप से शादी तब खत्म करने की इजाजत देता है जब पत्नी का चरित्र खराब हो, जिससे शादीशुदा जिंदगी में नाखुशी आती है। लेकिन गंभीर कारण नहीं हों तो कोई भी व्यक्ति तलाक को उचित नहीं ठहरा सकता चाहे वह धर्म की आड़ लेना चाहे या कानून की।’ <em>(एजेंसी)। </em></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Dec 2016 00:27:07 +0530</pubDate>
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