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                <title>Shaheed - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>मणिपुर में हुई गोलीबारी में शहीद हुआ महलां चौक का गुरदीप सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[शहीद का पैतृक गांव महलां में राजकीय व सैन्य सम्मान से अंतिम संस्कार संगरूर (गुरप्रीत सिंह/नरेश कुमार)। Sangrur News: हाल ही में मणिपुर में हुई गोलीबारी की घटना में नजदीकी कस्बा महलां चौक के सैनिक गुरदीप सिंह शहीद हो गए। जैसे ही शहादत की खबर उनके पैतृक गांव महलां पहुंची, पूरे गांव में शोक की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/gurdeep-singh-of-mehlan-chowk-was-martyred-in-the-firing-incident-in-manipur/article-81749"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/sangrur.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">शहीद का पैतृक गांव महलां में राजकीय व सैन्य सम्मान से अंतिम संस्कार</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>संगरूर (गुरप्रीत सिंह/नरेश कुमार)।</strong> Sangrur News: हाल ही में मणिपुर में हुई गोलीबारी की घटना में नजदीकी कस्बा महलां चौक के सैनिक गुरदीप सिंह शहीद हो गए। जैसे ही शहादत की खबर उनके पैतृक गांव महलां पहुंची, पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। हर आंख नम थी और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मणिपुर में असामाजिक तत्वों द्वारा की गई गोलीबारी के दौरान गुरदीप सिंह ने कर्तव्य निभाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। बुधवार दोपहर सेना के विशेष वाहन द्वारा उनका पार्थिव शरीर पूरे राजकीय सम्मान के साथ गांव लाया गया। इसके बाद महलां में सैन्य एवं सरकारी सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">शहीद गुरदीप सिंह को हजारों लोगों ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी। सेना की टुकड़ी ने हथियार झुकाकर उन्हें सलामी दी। इसके उपरांत विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों ने पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। पंजाब सरकार की ओर से एस.डी.एम. सुनाम गगनदीप सिंह तथा कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा की तरफ से उनके ओ.एस.डी. तपिंदर सिंह सोही ने शहीद के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र रखकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। पंजाब पुलिस की ओर से डी.एस.पी. डॉ. आर.के. बाजवा ने भी श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर एस.डी.एम. गगनदीप सिंह ने कहा कि शहीद गुरदीप सिंह के निधन से परिवार को जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई कभी संभव नहीं है। Sangrur News</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Fire: हांसी दिल्ली हाईवे पर वाहन में लगी आग, लाखों का हुआ नुकसान" href="http://10.0.0.122:1245/eicher-cargo-vehicle-coming-from-rohtak-to-hansi-caught-fire/">Fire: हांसी दिल्ली हाईवे पर वाहन में लगी आग, लाखों का हुआ नुकसान</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 21:18:23 +0530</pubDate>
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                <title>बरनाला का अग्निवीर जवान ड्यूटी दौरान शहीद</title>
                                    <description><![CDATA[एक साल पहले की थी ज्वाइनिंग | Barnala News बरनाला (सच कहूँ न्यूज)। Barnala News: हाल ही में गांव मेहता का अग्निवीर जवान जम्मू-कश्मीर में ड्यूटी के दौरान शहीद हो गया था। बुधवार उनके पैतृक गांव में सरकारी सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। जानकारी अग्निवीर शहीद सुखविंदर सिंह (22), सेवानिवृत्त सूबेदार नायब […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/agniveer-soldier-of-barnala-martyred-while-on-duty/article-56472"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/barnala-news-2.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">एक साल पहले की थी ज्वाइनिंग | Barnala News</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>बरनाला (सच कहूँ न्यूज)।</strong> Barnala News: हाल ही में गांव मेहता का अग्निवीर जवान जम्मू-कश्मीर में ड्यूटी के दौरान शहीद हो गया था। बुधवार उनके पैतृक गांव में सरकारी सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। जानकारी अग्निवीर शहीद सुखविंदर सिंह (22), सेवानिवृत्त सूबेदार नायब सिंह पौने दो साल पहले भारतीय सेना में सिपाही के रूप में शामिल हुआ था। Barnala News</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले, उन्होंने गुरु नानक स्कूल घुन्नस से 12वीं कक्षा उत्तीर्ण की और अपनी डिग्री प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। इस दौरान उन्हें अग्निवीर सेना में नौकरी मिल गई। बुधवार सुबह जब अग्निवीर जवान का शव कर्नल सोनू कुमार के नेतृत्व में सेना के वाहन से पहुंचा तो ग्रामीणों की आंखों से आंसू नहीं रुक रहे थे। इस बीच सभी ने केंद्र सरकार से मांग की है कि शहीद अग्निवीर सिपाही को शहीद का दर्जा दिया जाए। Barnala News</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="पाकिस्तानी ड्रोन और अढ़ाई किलो हैरोइन मिली" href="http://10.0.0.122:1245/pakistani-drone-and-two-and-a-half-kilos-of-heroin-found-in-anupgarh-district/">पाकिस्तानी ड्रोन और अढ़ाई किलो हैरोइन मिली</a></p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Apr 2024 21:23:27 +0530</pubDate>
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                <title>प्रेरणास्त्रोत : शहीद भगत सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[किसी महान विचारक ने कहा है, ‘अपने समस्त आदर्शों का लक्ष्य अपने देश, ईश्वर और सत्य को बनाओ। फिर यदि तुम मरते हो या असफल होते हो, तो एक बलिदानी के रूप में मरोगे।’ भगत सिंह को फाँसी से एक दिन पहले प्राणनाथ मेहता ने एक पुस्तक ‘लेनिन की जीवनी’ दी। इस पुस्तक को पढ़ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/inspirational-source-shaheed-bhagat-singh/article-12711"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/shaheed-bhagat-singh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">किसी महान विचारक ने कहा है, ‘अपने समस्त आदर्शों का लक्ष्य अपने देश, ईश्वर और सत्य को बनाओ। फिर यदि तुम मरते हो या असफल होते हो, तो एक बलिदानी के रूप में मरोगे।’ भगत सिंह को फाँसी से एक दिन पहले प्राणनाथ मेहता ने एक पुस्तक ‘लेनिन की जीवनी’ दी। इस पुस्तक को पढ़ने में वे इतना तल्लीन हो गए कि सुधि नहीं रही कि उन्हें आज फाँसी लगनी है। जल्लाद उन्हें लेने जेल की कोठरी में आ गए। अभी एक पृष्ठ पढ़ना शेष रह गया था। वे हाथ उठाकर बोले, ‘ठहरो, एक बड़े क्रांतिकारी की दूसरे बड़े क्रांतिकारी से मुलाकात हो रही है।’ जल्लाद वहीं ठिठक गए। भगतसिंह ने पुस्तक समाप्त की, फिर कहा, ‘चलो, और वे मस्ती भरे कदमों से फाँसी के तख्ते की ओर बढ़ने लगे। 23 मार्च 1931 की संध्या, 7 बज रहे हैं और फाँसी के तख्त की ओर तीन नवयुवक बढ़ रहे हैं, बीच में भगतसिंह हैं। उन्होंने अपनी दायीं भुजा राजगुरु की बायीं भुजा में तथा अपनी बायीं भुजा सुखदेव की दायीं भुजा में डाल दी। तीनों ने नारे लगाए, ‘इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।’ फिर गीत गाया और देखते-ही-देखते वे फाँसी पर झूल गए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">लालच का अंत</h3>
<p style="text-align:justify;">पुरोहित कपिल दो सोने की मोहरें पाने के लिए राजा को आशीर्वाद देने गए। राजा ने कहा, ‘‘जितना चाहिए माँग लो।’’ कपिल के मन में लोभ आया। वे बोले, ‘‘राजन् सोचकर बताता हूँ।’’ कपिल सोचने लगे, ‘‘दो सोने की मोहरों से क्या होगा? चार माँग लूँ? अरे, जब राजा ही मन माँगी इच्छा पूरी कर रहा है तो चार से क्या होगा? आठ माँग लूँ।’’ क्रमश: उनकी इच्छा बढ़ती चली गई और वे सोचने लगे कि क्यों न राजा का राज्य ही माँग लूँ। पर थोड़ी दूर चलने के बाद उन्हें झटका लगा, ‘‘अरे, यह क्या? मैं दो सोने की मोहरें माँगने आया था और अपने लोभ में राजा का राज्य ही माँगने चल पड़ा! धिक्कार है मेरी आत्मा को।’’ असल में पुरोहित को समझ में आ गया था कि ज्यों-ज्यों लाभ बढ़ता है, त्यों-त्यों लोभ बढ़ता है। यही लोभ अनर्थ का मूल है। इस सत्य को समझने के साथ ही वे लालच की मानसिकता से ऊपर उठ गए।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Jan 2020 20:47:50 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>अशफाक उल्ला खां: मां भारती का अमर पुत्र</title>
                                    <description><![CDATA[स्वाधीनता संग्राम की कालावधि में भारत माता की पावन रज में लोट-लोट कर बड़े हुए युवकों ने मां की आराधना में निज जीवन के सुवासित पुष्प चढ़ाये हैं। हंसते हुए फांसी के फंदों को चूम कर स्वयं गले में धारण कंठहार बना लिया तो वहीें कालचक्र की छाती पर अपनी वीरता की गाथा भी रुधिर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/shaheed-ashfaq-ulla-khan/article-7043"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/veer.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्वाधीनता संग्राम की कालावधि में भारत माता की पावन रज में लोट-लोट कर बड़े हुए युवकों ने मां की आराधना में निज जीवन के सुवासित पुष्प चढ़ाये हैं। हंसते हुए फांसी के फंदों को चूम कर स्वयं गले में धारण कंठहार बना लिया तो वहीें कालचक्र की छाती पर अपनी वीरता की गाथा भी रुधिर से अंकित कर दी। इन वीरों में ही एक ऐसा नर-नाहर महनीय व्यक्तित्व है जिसे जिसे तीन फांसी और दो काले पानी की सजा हुई थी। वह थे मां भारती के अमर पुत्र अशफाक उल्ला खां जिसे सभी क्रान्तिकारी स्नेह से ‘कुंवर जी’ कहा करते थे।<br />
अशफाक का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन के नजदीक एक जमींदार परिवार में हुआ था। पिता मो0 शफीक उल्ला खां और माता मजहूरुन्निशा बेगम शिशु के जन्म पर फूले न समाये थे। अशफाक अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हे घर में सभी प्यार से ‘अच्छू’ बुलाते थे। बचपन से ही खेलने, तैरने, घुड़सवारी करने, बंदूक से निशाना साधने और शिकार करने का शौक था। मजबूत ऊंची कद-काठी और बड़ी आंखों वाले सुन्दर गौरवर्णी आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अशफाक रामप्रसाद बिस्मिल की ही भांति उर्दू के अच्छे शायर थे। साथ ही हिन्दी और अंग्रेजी में भी कविताएं और लेख लिखते थे। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। एक बार शाहजहांपुर के आर्य समाज मंदिर में रामप्रसाद बिस्मिल के साथ बैठे क्रान्तिकारी दल के बारे में गहन चर्चा कर रहे थे कि तभी मंदिर को नष्ट एवं अपवित्र करने की मंशा से आये दंगाईयों पर अशफाक ने अपनी पिस्तौल तान कर कहा था कि यदि कोई भी आगे बढ़ा और नुकसान हुआ तो लाशें बिछा दूंगा। अशफाक का यह रौद्र रूप देख दंगाई उल्टे पांव भाग खड़े हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">अशफाक का परिवार बहुत पढ़ा लिखा नहीं था जबकि ननिहाल पक्ष के लोग उच्च शिक्षित और महत्वपूर्ण नौकरियों में थे। ननिहाल के लोगों ने 1857 की पहली स्वतंत्रता की लड़ाई में साथ नहीं दिया था तो लोगों ने गुस्से में उनकी कोठी में आग लगा दी थी जो आज भी ‘जली कोठी’ नाम से क्षेत्र में प्रसिद्ध है। वर्ष 1920 में अपने बड़े भाई रियासत उल्ला खां के सहपाठी मित्र रामप्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में आने के बाद अशफाक मन में भी अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना भर गई और वह अंग्रेजो को देश से भगााने के लिए युवाओं को जोड़ने लगे थे। इसी बीच बंगाल के क्रान्तिकारियों से भी सम्पक बना और एक संगठन बनाने का निर्णय लिया गया। विदेश में रह रहे लाला हरदयाल भी बिस्मिल से सम्पर्क साधे हुए थे और संगठन बनाकर उसका संविधान लिखने का निर्देश दे रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच अशफाक कांग्रेस दल में अपने लोगों की सहभागिता चाहते थे। इसलिए 1920 के अहमदाबाद अधिवेशन में बिस्मिल और अन्य साथियोे ंके साथ अशफाक शामिल हुए। लौटकर भी सम्पर्क बना रहा और 1922 के गया अधिवेशन में भी जाना हुआ। लेकिन गांधी जी द्वारा बिना किसी से पूछे असहयोग आंदोलन वापस लेने से युवाओं का मन खराब हुआ और वहां से लौटने के बाद अपना एक दल बनाने की बात हुई। और तब 1924 में बंगाल से आये क्रान्तिकारियों के सहयोग से ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ अस्तित्व में आई। 1 जनवरी, 1925 को ‘दि रिवोल्यूशनरी’ नाम से अंग्रेजी में चार पन्ने का एक विचार पत्र निकाला गया जो एक प्रकार से दल का घोषणा पत्र ही था। जिसमें प्रत्येक पन्ने पर ऊपर लिखा हुआ था, ‘चाहे छोटा हो या बड़ा, गरीब हो या अमीर, प्रत्येक को मुफ्त न्याय और समान अधिकार मिलेगा।’</p>
<p style="text-align:justify;">इस पत्रक को पूरे देश के प्रमुख शहरों और सार्वजनिक स्थानों पर चिपकाया गया। ताकि अधिक से अधिक जनता पढ़ सके। दल के काम को बढ़ाने के लिए धन की आवश्यकता थी लेकिन दल को कोई भी सेठ-साहूकार चन्दा नहीं दे रहा था। संयोग से इसी बीच योगेश चन्द्र बनर्जी और शचीन्द्रनाथ सान्याल पर्चों के साथ बंगाल जाते समय पकड़ लिए गये। अब दल की पूरी जिम्मेदारी बिस्मिल और अशफाक पर आ गई। धन प्राप्ति के लिए अमीरों के यहां दो डकैतियां भी डाली गईं लेकिन पर्याप्त धन नहीं मिल सका और दो आम लोगों की न चाहते हुए हत्या भी हो गई। इससे बिस्मिल का मन बहुत क्षुब्ध हुआ और आईन्दा राजनैतिक डकैती न डालने का निश्चय कर अब सरकारी खजाना लूटने की योजना बनी। बैठक में बिस्मिल ने प्रस्ताव रखा कि काकोरी से ट्रेन द्वारा जाने वाले खजाने को लूटा जाये। बैठक में उपस्थित सभी साथी सहमत थे लेकिन अशफाक ने यह कहते हुए इस प्रस्ताव का जोरदार विरोध किया कि अभी हमारी ताकत अंग्रेज सरकार सो सीधे लड़ने की नहीं है और खजाना लूटने के बाद पुलिस हमारे पीछे पड़ जायेगी और दल बिखर जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर अशफाक को कायर और मृत्यु से डरने वाला कहा गया। अन्तत: अशफाक ने सहमति देते हुए कहा कि वह मौत से नहीं डरते और यह समय ही तय करेगा। तो योजनानुसार 26 अगस्त की शाम को ‘8 डाउन लखनऊ-सहारनपुर पैसेन्जर ट्रेन’ में 10 क्रान्तिकारी सवार हुए। जैसे ही काकोरी से खजाना लादकर ट्रेन आगे बढ़ी तो राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने जंजीर खींच दी। अशफाक ने लपक कर ड्राईवर की कनपटी पर माउजर धर दिया। गार्ड ने मुकाबला करने की कोशिश की लेकिन बिस्मिल ने उसे जमीन पर औंधे मुंह गिरा कर काबू में कर लिया। खजाने की तिजोरी उतारी गई लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद भी ताले नहीं खुले। समय जाता देख अशफाक ने अपनी माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ाकर घन से तिजोरी तोड़ने को पिल पड़े। अशफाक के जोरदार प्रहारों से तिजोरी में एक बड़ा छेद हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">चांदी के सिक्के और रुपया चादरों में समेटा गया और निकल गये। लेकिन जल्दबाजी में एक चादर छूट गई जो बाद में पुलिस की खोजबीन में क्रान्तिकारियों को पकड़ने का अहम जरिया बनी। इस घटना से अंग्रेज सरकार की बहुत किरकिरी हुई । और क्रान्तिकारियों को पकड़ने के लिए ईनाम घोषित किये गये। पुलिस की जांच एवं खुफिया खोजबीन से पूरे देश में एक साथ 26 सितम्बर 1925 को क्रान्तिकारियों के कई ठिकानों पर छापा मारकर 40 क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन पुलिस तब भी अशफाक और चन्द्रशेखर आजाद को पकड़ने में नाकाम रही। अशफाक पुलिस को चकमा देकर नेपाल चले गये।</p>
<p style="text-align:justify;">वहां से कानपुर आकर गणेश शंकर विद्यार्याी के प्रेस में भी रहे फिर बनारस, राजस्थान, बिहार, भोपाल होते हुए दिल्ली पहुंचे। उनकी योजना पासपोर्ट बनवाकर देश से बाहर जाने की थी। लेकिन दिल्ली में किसी मित्र के विश्वासघात के कारण खुफिया पुलिस अधिकारी इकरामुल हक द्वारा पकड़े गये। हालांकि अदालत द्वारा काकोरी कांड का फैसला 6 अप्रैल 1926 को दिया जा चुका था। लेकिन अशफाक और शचीन्द्रनाथ बख्शी के विरुद्ध फिर सें पूरक केस दायर किया गया। जिसका फैसला 13 जुलाई को आया जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खं, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी एवं 16 अन्य को चार वर्ष से लेकर काले पानी तक की सजाएं दी गईं। अदालत के आदेश के पालन करते हुए 19 दिसम्बर 1927, सोमवार को फैजाबाद जेल में अशफाक को फांसी दे दी गई। स्वतंत्रता की बलि बेदी पर मां भारती के एक और सपूत ने अपनी आहुति देकर जननी की कोख को गौरव प्रदान किया। आने वाली पीढ़ियां आपसे प्रेरित होती रहेंगी।]</p>
<p style="text-align:right;"><strong>प्रमोद दीक्षित</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Dec 2018 09:56:14 +0530</pubDate>
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                <title>वाह! जरूरतमंदों को राशन देकर शहीद संदीप इन्सां को दी श्रद्धांजलि</title>
                                    <description><![CDATA[गांंव बजीर नगर में आयोजित नामचर्चा में उमड़ी साध-संगत सच कहूँ-अशोक राणा कलायत। साध-संगत द्वारा उपमंडल के गांंव बजीर नगर में 25 अगस्त को पंचकूला हिंसा में शहीद हुए संदीप इन्सां की याद में जिला स्तरीय नामचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें सैंकड़ों की संख्या में डेरा अनुयायी व रिश्तेदारों ने पहुंचकर संदीप इन्सां का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/tribute-to-shaheed-sandeep-insan/article-4281"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/shaheed.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">गांंव बजीर नगर में आयोजित नामचर्चा में उमड़ी साध-संगत</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ-अशोक राणा</strong><br />
<strong>कलायत।</strong> साध-संगत द्वारा उपमंडल के गांंव बजीर नगर में 25 अगस्त को पंचकूला हिंसा में शहीद हुए संदीप इन्सां की याद में जिला स्तरीय नामचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें सैंकड़ों की संख्या में डेरा अनुयायी व रिश्तेदारों ने पहुंचकर संदीप इन्सां का श्रद्धांजलि दी। इससे पूर्व रामपाल इन्सां ने विनती का भजन बोलकर नाम चर्चा की शुरूआत की।</p>
<p style="text-align:justify;">शहीद संदीप इन्सां के भाई कुलदीप इन्सां ने बताया कि उन्होंने सन् 2000 में डेरा सच्चा सौदा से नामदान प्राप्त किया था। उनमें सेवा भावना कूट-कूट कर भरी थी। शमशेर सिंह इन्सां, बिजेंद्र सिंह इन्सां ने कहा कि संदीप इन्सां के अंदर बचपन से ही मानवता सेवा का जज्बा भरा हुआ था।</p>
<h1 style="text-align:center;">जरूरतमंद परिवारों को एक माह का राशन किया वितरित</h1>
<p style="text-align:justify;">नामचर्चा के दौरान शहीद संदीप इन्सां की पत्नी रजनी इन्सां ने पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की प्रेरणा पर चलते हुए जरूरतमंद परिवारों को फूड बैंक से एक माह राशन भेंट किया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अवसर पर ब्लाक भंगदीदास धर्मपाल इन्सां, 25 मैंबर डॉ. ओमप्रकाश इन्सां, 15 मेंबर सुरेंद्र इन्सां, माता इसेरो इन्सां, जगरुपत्नी रजनी इन्सां, बंशीलाल, कश्मीर सिंह, कुलदीप इन्सां, वजीर इन्सां, सीनू इन्सां, मनीषा इन्सां, संजीव इन्सां, शोबित, अंत्रा, रामफल, सिंदर इन्सां, सुदेश इन्सां, सनीता इन्सां, रामकिशन इन्सां, किताबा इन्सां, सतपाल इन्सां, अशोक इन्सां सहित बड़ी संख्या में साध संगत मौजूद रही।</p>
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                <pubDate>Mon, 18 Jun 2018 10:21:29 +0530</pubDate>
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