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                <title>छोटी उम्र जोखिमों से खेल सेवा की मिसाल बनी ‘परीकुल’</title>
                                    <description><![CDATA[जोखिम भरे काम करना उनकी आदत में शुमार है। उम्र चाहे छोटी हो, लेकिन उसने हौंसले के साथ जो काम अब तक किये हैं, वे काम बड़े-बड़े नहीं कर पाते। गणतंत्र दिवस से पूर्व उन्हें राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार-2020 से सम्मानित किया जाएगा।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/parikuls-bravery-amazing-valor-at-just-13-years-old/article-12513"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/parikul.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">मात्र 13 साल की उम्र में वीरता, शौर्य का अद्भूत ज़ज्बा (Parikul)</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3>तीन साल से केदारनाथ यात्रा में दे रही मेडिकल सेवाएं</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजय मेहरा/सच कहूँ गुरुग्राम/झज्जर।</strong> परींदों को मिलेगी मंजिल यकीनन-ये फैले हुये उनके पर (पंख) बोलते हैं, वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर-जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं। ऐसे ही हुनर की मल्लिका हैं परीकुल (Parikul) । जोखिम भरे काम करना उनकी आदत में शुमार है। उम्र चाहे छोटी हो, लेकिन उसने हौंसले के साथ जो काम अब तक किये हैं, वे काम बड़े-बड़े नहीं कर पाते। गणतंत्र दिवस से पूर्व उन्हें राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार-2020 से सम्मानित किया जाएगा। मूलरूप से झज्जर जिला के गांव खरहर की रहने वाली मात्र 13 साल की नौवीं कक्षा की छात्रा परीकुल भारद्वाज समाज में नेतृत्व, प्रेरणा तथा ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों में दी जाने वाली निस्वार्थ सेवाओं का एक जीवंत उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">परीकुल भारद्वाज को ऊंचे पर्वतों पर किसी की जान बचाने के लिए गहन प्रशिक्षण हासिल है। परीकुल ने यह प्रशिक्षण इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी), राष्ट्रीय आपदा एवं बचाव प्रबंधन (एनडीआरएफ) और वायु सेना के संयुक्त तत्वावधान में मिला है। वे अत्याधिक ऊंचाईयों पर अपनी गतिविधियों द्वारा समाजहित में योगदान देने वाली, लोगों की जान बचाने के लिए कार्य करने वाली सबसे कम उम्र के पहली लड़की है। उसने समाज के प्रति असाधारण, साहस, बहादुरी भरे काम अपने जुनून और समर्पित सेवा भाव के साथ किये हैं। वह बिना किसी वर्ग, पंथ, धर्म या जाति की परवाह किये उच्च शिखरों पर अपनी स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">केदारनाथ तीर्थ यात्रियों को हर साल देती है मेडिकल सेवा</h3>
<p style="text-align:justify;">जिन गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे और अभिभावक खेल-कूद समेत घूमने-फिरने की योजना बनाते हैं, उस समय में परीकुल भारद्वाज अपनी सेवा भावना के साथ पहुंच जाती है केदारनाथ यात्रा में। परीकुल लगातार वर्ष 2017, 2018 और 2019 से ग्रीष्मावकाश के दौरान हिमालय की ऊंची चोटियों पर नि:स्वार्थ रूप से 45 दिनों तक केदारनाथ यात्रियों को 14000 फीट पर माइनस 7 डिग्री तापमान में चिकित्सा सेवाएं देती आ रही हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बर्फीली हवाओं के बीच बीमारों की बचाई जान</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;"> 2 जून 2019 को 14000 फीट की ऊंचाई पर अचानक बर्फीली हवायें चली ।</li>
<li style="text-align:justify;"> तूफान आया तो परिकुल भारद्वाज ने वहां बीमार पड़े लोगों की जान बचाकर साहसिक कार्य किया।</li>
<li style="text-align:justify;">परीकुल ने ऐसी अवस्था में मरीजों को केदारनाथ स्थित सिक्स सिग्मा के शिविर तक पहुंचाया।</li>
<li style="text-align:justify;">इस तरह से आपदा के समय भी परीकुल पहुंचती हैं और लोगों की सहायता करती हैं।</li>
</ul>
<h3>राष्ट्रपति करेंगे परीकुल को सम्मानित</h3>
<p>राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 22 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार-2020 देकर सम्मानित करेंगे। सम्मान स्वरूप मेडल, एक लाख रुपये की राशि, 10 हजार रुपये का बुक वाउचर और सर्टिफिकेट दिया जायेगा। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार-2020 सूची में नाम आने पर खुशी जाहिर करते हुए परीकुल के पिता डॉ. प्रदीप भारद्वाज ने कहा कि बेटी परिकुल सामाजिक कार्यों के लिए हमेशा आगे रहती है। यह अवार्ड एक अच्छे विचार व संस्कार का रिजल्ट है। इस क्षेत्र में परीकुल को लाने के पीछे डॉ. प्रदीप का तर्क है कि आज कल बच्चे टीवी, मोबाइल आदि में इतने व्यस्त हो रहे हैं कि उन्हें सामाजिक सेवाओं से कोई सरोकार नहीं रह गया है। वे चाहते थे कि उनकी बेटी इन सब चीजों से दूर रहकर समाज के लिए कुछ करे। उन्हें खुशी है कि जो सोचा वह हो रहा है। बेटी परिवार ही नहीं देश का मान बढ़ा रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अब तक मिले सम्मान व पुरस्कार</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>थलसेनाध्यक्ष द्वारा सराहना</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>इंडिया बुक आॅफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>विश्व के सर्वश्रेष्ठ 100 रिकॉर्ड धारकों में से एक</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>सिक्स सिग्मा द्वारा प्रदत्त हाई अल्टिट्यूड अवॉर्ड</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jan 2020 19:18:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजस्थान:  सरकारी स्कूल में मिले 50 हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान के सीकर जिले के पाटन कस्बे के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के परिसर में उच्च पुरा पाषाण कालीन उपकरण मिले हैं। इन उपकरणों के मिलने से कस्बे की सभ्यता के लगभग पचास हजार वर्ष पुरानी होने के संकेत मिले हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/fifty-thousand-years-old-civilization-found-in-this-government-school/article-12051"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/civilization.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:justify;">सीकर जिले के सरकारी विद्यालय के परिसर में शोधकर्ताओं व विद्वानों ने साक्ष्य खोजे | civilization</h1>
<h5>Edited By Vijay Sharma</h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>सीकर (एजेंसी)।</strong> राजस्थान के सीकर जिले के पाटन कस्बे के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के परिसर में उच्च पुरा पाषाण कालीन <strong>(civilization)</strong> उपकरण मिले हैं। इन उपकरणों के मिलने से कस्बे की सभ्यता के लगभग पचास हजार वर्ष पुरानी होने के संकेत मिले हैं। राजकीय महाविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ मदन लाल मीना ने बताया कि तंवरावाटी का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता रहा है। पाटन पंचायत समिति के विभिन्न इलाकों में शोधकर्ताओं व विद्वानों ने समय समय पर आदिकाल के मानव की उपस्थिति के साक्ष्य खोजे हैं। पूर्व में इलाके के सोहनपुराए बागेश्वर, भींतरो, सेड की डूंगरी, लालोडा व बाडलवास में उच्च पुरा पाषाण युगीन प्रस्तर उपकरण प्राप्त हुए हैं। इसी क्रम में पाटन कस्बे में पाये गये प्रस्तर उपकरण यहां के समृद्ध इतिहास का संकेत देते हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">मिले हैंडएक्स व स्क्रेपर | civilization</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>डॉ मीना ने जब कस्बे के इतिहास की खोज को प्रारंभ किया तो उन्हें आश्चर्यजनक परिणाम मिले। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>यहां क्वार्टजाइट प्रस्तर पर निर्मित दो उपकरण हैंड एंकर्स व स्क्रेपर मिले हैं। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>जो कस्बे में उच्च पुरा पाषाण युगीन आदिमानव की उपस्थिति के भौतिक साक्ष्य हैं। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>लम्बे समय तक काम में लेने के कारण उनकी धार खत्म हो चुकी है। </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>डॉ मीना के अनुसार कस्बे का इतिहास शोध का विषय बन चुका है।</strong></li>
</ul>
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<p><span class="tlid-translation translation" lang="en" xml:lang="en"><span title="">Fifty, </span></span>Thousand, Years, Old, Civilization, Found, Government, School</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/fifty-thousand-years-old-civilization-found-in-this-government-school/article-12051</link>
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                <pubDate>Sat, 28 Dec 2019 06:24:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बड़ी खोज: इथोपिया में मिली 38 लाख साल पुरानी मानव खोपड़ी</title>
                                    <description><![CDATA[शोधकर्ताओं ने इसको एमआरडी के नाम दिया है। अदीस अबाबा। इथोपिया में पुरातत्वविदों को 38 लाख साल पुरानी एक खोपड़ी का अवशेष मिला है, जो मनुष्य के विकास के बारे में हमारी वर्तमान समझ को बदल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह किसी छोटे लूसी (प्राचीन मनुष्य की प्रजाति) का अवशेष होगा, जो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/3-8-million-year-old-human-skull-found-in-ethiopia/article-10345"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-08/human-head.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने इसको एमआरडी के नाम दिया है।</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>अदीस अबाबा।</strong> इथोपिया में पुरातत्वविदों को 38 लाख साल पुरानी एक खोपड़ी का अवशेष मिला है, जो मनुष्य के विकास के बारे में हमारी वर्तमान समझ को बदल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह किसी छोटे लूसी (प्राचीन मनुष्य की प्रजाति) का अवशेष होगा, जो मानव के विकास के संबंध में अब तक की अवधारणाओं को पूरी तरह बदल सकता है। नेचर नामक पत्रिका में इस खोपड़ी के बारे में विस्तार से बताया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने इस खोपड़ी को ‘एमआरडी’ के नाम दिया है। क्लीवलैंड म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के पुरातत्वविद योहानेस हैले सेलासी ने कहा कि यह खोपड़ी लगभग तीन लाख वर्ष से अधिक पुराने होमीनिड का जीवाश्म है। लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के फ्रेड स्पूर ने कहा कि यह मानव विकास का एक और प्रतीक बनने के लिए तैयार है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">पहले भी मिल चुके हैं अवशेष</h2>
<p style="text-align:justify;">पुरातत्वविदों ने वर्ष 2001 में चाड में टूमई (सहेलंथ्रोपस टेडेंसिस की प्रजाति के जीव) के लगभग सात लाख वर्ष पुराने अवशेष खोजे थे, जिन्हें मानव वंश का पहला प्रतिनिधि माना जाता है। अर्डी (होमीनिड की एक अन्य प्रजाति) 1994 में इथोपिया में पाई गई थी और माना जाता है कि यह लगभग 45 लाख साल पुरानी है और लूसी के अवशेषों को इथोपिया में ही वर्ष 1974 में खोजा गया था, जो लगभग 32 लाख वर्ष पुराने हैं। लूसी को ऑस्ट्रेलोपिथेकस एफरेंसिस भी कहा जाता है। यह सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाला और सबसे अधिक अध्ययन की जाने वाली प्रारंभिक मानव प्रजाति है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">वर्नसो-मिल की साइट से मिले जीवाश्म</h2>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने कहा कि पुरातत्ववेत्ताओं ने जो नई खोपड़ी ‘एमआरडी’ खोजी है, वह ऑस्ट्रेलोपेथेकस एनामेंसिस प्रजाति के जीवों से संबंधित है। फरवरी 2016 में पूवरेत्तर इथोपिया के अफार क्षेत्र में वर्नसो-मिल की एक साइट पर खोदाई के दौरान लूसी के कुछ अवशेष मिले थे। पहली नजर में यह आधुनिक मनुष्यों की खोपड़ी की तरह ही दिखाई देती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि ऑस्ट्रेलोपेथेकस के बारे में लोग अभी बहुत ज्यादा नहीं जानते। पुरातत्वविदों को इसका जो जीवाश्म मिला है, वह लगभग 39 लाख साल पुराना है</p>
<h2 style="text-align:justify;">मिलेंगी अहम जानकारियां</h2>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने कहा कि इन जीवाश्मों के मिलने से लाखों साल पहले विलुप्त हो चुके होमिनिड्स के बारे में कई अहम जानकारियां मिल सकती है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह खोज मानव विकास के बारे में मौजूद वर्तमान विश्वास को चुनौती दे सकती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">हजारों वर्षों तक साथ रहे एनामेंसिस और एफरेंसिस</h2>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन के सह-लेखक और मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी के स्टेफनी मेलिलो ने कहा कि पहले हमारा अनुमान था कि एनामेंसिस (एमआरडी) समय के साथ धीरे-धीरे एफरेंसिस (लुसी) में बदला होगा, लेकिन होमीनिड के जीवाश्मों के अध्ययन से पता चलता है कि इन दोनों प्रजातियों का अस्तित्व लगभग दस लाख वर्षो तक रहा। इसका मतलब है कि यह मानव विकास की हमारी समझ को बदल कर रख सकता है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Aug 2019 10:53:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वृद्ध जीवन के उजालों का स्वागत करें</title>
                                    <description><![CDATA[एक अक्टूबर को सम्पूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया जाता है। समाज और नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाने और मार्गदर्शन के लिए वरिष्ठ नागरिकों के योगदान को सम्मान देने के लिए इस आयोजन का फैसला संयुक्त राष्ट्र ने 1990 में लिया था। इस दिन पर वरिष्ठ नागरिकों और बुजुर्गों का सम्मान किया जाता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/welcome-the-brightness-of-old-age/article-6088"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/welcome-the-brightness-of-old-age-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक अक्टूबर को सम्पूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया जाता है। समाज और नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाने और मार्गदर्शन के लिए वरिष्ठ नागरिकों के योगदान को सम्मान देने के लिए इस आयोजन का फैसला संयुक्त राष्ट्र ने 1990 में लिया था। इस दिन पर वरिष्ठ नागरिकों और बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है। वरिष्ठों के हित के लिए चिन्तन भी होता है। प्रश्न है कि दुनिया में वृद्ध दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई?</p>
<p style="text-align:justify;">क्यों वृद्धों की उपेक्षा एवं प्रताड़ना की स्थितियां बनी हुई है? चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि हम पतन के इस गलत प्रवाह को रोके। क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल वृद्धों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है। वृद्ध अपने ही घर की दहलीज पर सहमा-सहमा खड़ा है, उसकी आंखों में भविष्य को लेकर भय है, असुरक्षा और दहशत है, दिल में अन्तहीन दर्द है। इन त्रासद एवं डरावनी स्थितियों से वृद्धों को मुक्ति दिलानी होगी। सुधार की संभावना हर समय है। हम पारिवारिक जीवन में वृद्धों को सम्मान दें, इसके लिये सही दिशा में चले, सही सोचें, सही करें। इसके लिये आज विचारक्रांति ही नहीं, बल्कि व्यक्तिक्रांति की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज का वृद्ध समाज-परिवार से कटा रहता है और सामान्यत: इस बात से सर्वाधिक दु:खी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्व देता है। समाज में अपनी एक तरह से अहमितय न समझे जाने के कारण हमारा वृद्ध समाज दु:खी, उपेक्षित एवं त्रासद जीवन जीने को विवश है। वृद्ध समाज को इस दु:ख और कष्ट से छुटकारा दिलाना आज की सबसे बड़ी जरुरत है। आज हम बुजुर्गों एवं वृद्धों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के साथ-साथ समाज में उनको उचित स्थान देने की कोशिश करें ताकि उम्र के उस पड़ाव पर जब उन्हे प्यार और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तो वो जिंदगी का पूरा आनंद ले सके। वृद्धों को भी अपने स्वयं के प्रति जागरूक होना होगा, जैसाकि जेम्स गारफील्ड ने कहा भी है कि यदि वृद्धावस्था की झुर्रियां पड़ती है तो उन्हें हृदय पर मत पड़ने दो। कभी भी आत्मा को वृद्ध मत होने दो।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रश्न है कि आज हमारा वृद्ध समाज इतना कुंठित एवं उपेक्षित क्यों है? अपने को समाज में एक तरह से निष्प्रयोज्य समझे जाने के कारण वह सर्वाधिक दु:खी रहता है। वृद्ध समाज को इस दु:ख और संत्रास से छुटकारा दिलाने के लिये ठोस प्रयास किये जाने की बहुत आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय को समाप्त करने के लिए और लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाने का निर्णय लिया। वृद्धों की समस्या पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में सर्वप्रथम अर्जेंटीना ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया था। तब से लेकर अब तक वृद्धों के संबंध में अनेक गोष्ठियां और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं। वर्ष 1999 को अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग-वर्ष के रूप में भी मनाया गया। इससे पूर्व 1982 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वृद्धावस्था को सुखी बनाइए जैसा नारा दिया और सबके लिए स्वास्थ्य का अभियान प्रारम्भ किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक पेड़ जितना ज्यादा बड़ा होता है, वह उतना ही अधिक झुका हुआ होता है। यानि वह उतना ही विनम्र और दूसरों को फल देने वाला होता है, यही बात समाज के उस वर्ग के साथ भी लागू होती है, जिसे आज की तथाकथित युवा तथा उच्च शिक्षा प्राप्त पीढ़ी बूढ़ा कहकर वृद्धाश्रम में छोड़ देती है। वह लोग भूल जाते हैं कि अनुभव का कोई दूसरा विकल्प दुनिया में है ही नहीं। अनुभव के सहारे ही दुनिया भर में बुजुर्ग लोगों ने अपनी अलग दुनिया बना रखी है। जिस घर को बनाने में एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है, वृद्ध होने के बाद उसे उसी घर में एक तुच्छ वस्तु समझ लिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़े बूढ़ों के साथ यह व्यवहार देखकर लगता है जैसे हमारे संस्कार ही मर गए हैं। बुजुर्गों के साथ होने वाले अन्याय के पीछे एक मुख्य वजह सामाजिक प्रतिष्ठा मानी जाती है। तथाकथित व्यक्तिवादी एवं सुविधावादी सोच ने समाज की संरचना को बदसूरत बना दिया है। सब जानते हैं कि आज हर इंसान समाज में खुद को बड़ा दिखाना चाहता है और दिखावे की आड़ में बुजुर्ग लोग उसे अपनी शान-शौकत एवं सुंदरता पर एक काला दाग दिखते हैं। बड़े घरों और अमीर लोगों की पार्टी में हाथ में छड़ी लिए और किसी के सहारे चलने वाले बूढ़ों को अधिक नहीं देखा जाता, क्योंकि वह इन बूढ़े लोगों को अपनी आलीशान पार्टी में शामिल करना तथाकथित शान के खिलाफ समझते हैं। यही रुढ़िवादी सोच उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग की तरफ चली आती है। आज बन रहा समाज का सच डरावना एवं संवेदनहीन है।</p>
<p style="text-align:justify;">वृद्धावस्था जीवन का अनिवार्य सत्य है। जो आज युवा है, वह कल बूढ़ा भी होगा ही, लेकिन समस्या की शुरूआत तब होती है, जब युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों को उपेक्षा की निगाह से देखने लगती है और उन्हें अपने बुढ़ापे और अकेलेपन से लड़ने के लिए असहाय छोड़ देती है। आज वृद्धों को अकेलापन, परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षा, तिरस्कार, कटुक्तियां, घर से निकाले जाने का भय या एक छत की तलाश में इधर-उधर भटकने का गम हरदम सालता रहता। वृद्धों को लेकर जो गंभीर समस्याएं आज पैदा हुई हैं, वह अचानक ही नहीं हुई, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति तथा महानगरीय अधुनातन बोध के तहत बदलते सामाजिक मूल्यों, नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन आने, महंगाई के बढ़ने और व्यक्ति के अपने बच्चों और पत्नी तक सीमित हो जाने की प्रवृत्ति के कारण बड़े-बूढ़ों के लिए अनेक समस्याएं आ खड़ी हुई हैं। इसीलिये सिसरो ने कामना करते हुए कहा था कि जैसे मैं वृद्धावस्था के कुछ गुणों को अपने अन्दर समाविष्ट रखने वाला युवक को चाहता हूं, उतनी ही प्रसन्नता मुझे युवाकाल के गुणों से युक्त वृद्ध को देखकर भी होती है, जो इस नियम का पालन करता है, शरीर से भले वृद्ध हो जाए, किन्तु दिमाग से कभी वृद्ध नहीं हो सकता। वृद्ध लोगों के लिये यह जरूरी है कि वे वार्धक्य को ओढ़े नहीं, बल्कि जीएं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, नई जीवनशैली और नए मूल्य बूढ़ों को समाज में कोई जगह नहीं देते, बल्कि उन्हें उनकी जगह से भी विस्थापित करते हैं। विकास की अबाध गति उन्हें असहाय छोड़ देती है और वे निसहाय से अपने अतीत के गलियारों में डोलने लगते हैं। आज का समाज सेवानिवृत्त होते ही उस व्यक्ति को नकार देता है, वह चाहे जितना ही साधनसंपन्न हो, उसकी पूछ कम हो जाती है और लोग उसे अभिवादन की सामान्य औपचारिकता प्रदान करने में भी कोताही करने लगते हैं। ऐसे में स्वार्थ का यह नंगा खेल स्वयं अपनों से होता देखकर वृद्धजनों को किन मानसिक आघातों से गुजरना पड़ता होगा, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">वृद्धावस्था मानसिक व्यथा के साथ सिर्फ सहानुभूति की आशा जोहती रह जाती है। इसके पीछे मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां काम करती हैं। वृद्धजन अव्यवस्था के बोझ और शारीरिक अक्षमता के दौर में अपने अकेलेपन से जूझना चाहते हैं पर इनकी सक्रियता का स्वागत समाज या परिवार नहीं करता और न करना चाहता है। बड़े शहरों में परिवार से उपेक्षित होने पर बूढ़े-बुजुर्गों को ओल्ड होम्स में शरण मिल भी जाती है, पर छोटे कस्बों और गांवों में तो ठुकराने, तरसाने, सताए जाने पर भी आजीवन घुट-घुट कर जीने की मजबूरी होती है। यद्यपि ह्यओल्ड होम्स की स्थिति भी ठीक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले जहां वृद्धाश्रम में सेवा-भाव प्रधान था, पर आज व्यावसायिकता की चोट में यहां अमीरों को ही प्रवेश मिल पा रहा है। ऐसे में मध्यमवर्गीय परिवार के वृद्धों के लिए जीवन का उत्तरार्द्ध पहाड़ बन जाता है। हमें समझना होगा कि अगर समाज के इस अनुभवी स्तंभ को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहा तो हम उस अनुभव से भी दूर हो जाएंगे, जो इन लोगों के पास है। वृद्ध दिवस मनाना तभी सार्थक होगा जब हम उन्हें परिवार में सम्मानजनक जीवन देंगे। उनके शुभ एवं मंगल की कामना करेंगे। <em><strong>ललित गर्ग</strong></em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Oct 2018 12:31:45 +0530</pubDate>
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                <title>हमले में 24 वर्षीय महिला की मौत, दो प्रवासी मजदूर घायल</title>
                                    <description><![CDATA[सो रहे प्रवासी मजदूरों पर अज्ञात युवकों ने किया कातिलाना हमला पुलिस ने मौके पर पहुंचकर लिया घटना का जायजा लुधियाना (राम गोपाल राएकोटी)। गांव पंडोरी के एक मछली फार्म पर रहते प्रवासी मजदूरों पर कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने तेजधार हथियारों से हमला कर दो अन्य मजदूरों को गंभीर रूप में घायल कर दिया जबकि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/24-year-old-woman-killed-two-migrant-laborers-injured-in-attack/article-4734"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/hmla-copy.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">सो रहे प्रवासी मजदूरों पर अज्ञात युवकों ने किया कातिलाना हमला</h2>
<ul style="text-align:justify;">
<li>पुलिस ने मौके पर पहुंचकर लिया घटना का जायजा</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong> लुधियाना (राम गोपाल राएकोटी)। </strong>गांव पंडोरी के एक मछली फार्म पर रहते प्रवासी मजदूरों पर कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने तेजधार हथियारों से हमला कर दो अन्य मजदूरों को गंभीर रूप में घायल कर दिया जबकि एक महिला की हत्या कर दी गई। पुलिस से से प्राप्त जानकारी अनुसार गांव पंडोरी में लुधियाना फिरोजपुर मुख्य मार्ग पर स्थित मछली फार्म पर प्रवासी मजदूर सुधीर और विनोद इसकी संभाल के लिए नियुक्त किए हुए हैं। सुधीर कुछ दिनों से अपने गांव हाजीपुर बिहार गया हुआ है। बीती रात अपने काम कार से फ्री हो कर सुधीर की पत्नी संगीता।</p>
<p style="text-align:justify;">सुधीर की माता रामकली देवी, सुधीर की भतीजी व विनोद कुमार सो गए तो आधी रात को कुछ अज्ञात व्यक्ति मछली फार्म पर आए व इन सो रहे प्रवासियों पर तेजधार हथियारों से हमला कर दिया, जिस के परिणाम स्वरूप संगीता की मौत हो गई व विनोद और रामकली गंभीर रूप में घायल हो गए, जिनको ईलाज के लिए लुधियाना के एक निजी अस्पताल में दाखिल करवाया गया है। थाना प्रमुख दाखा विक्रमजीत सिंह के अनुसार इन मजदूरों ने हमलावरों का डट कर मुकाबला किया और मृतक संगीता ने हमले की जानकारी मोबायल फोन के द्वारा अपने बिहार गए अपने पति सुधीर को भी दी।</p>
<p style="text-align:justify;">हमले की जानकारी मिलते ही सुधीर ने इस हमले की जानकारी अपने अन्य साथियों को दी, जिन्होंने तुरंत गांव के सरपंच सत्तपाल सिंह को इस बारे बताया। जब सरपंच व अन्य व्यक्ति फार्म पर पहुँचे तो हमलावर फरार हो चुके थे। सरपंच सत्तपाल सिंह ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने घटना स्थल पर पहुंचकर शव को अपने कब्जे में लेकर घायलों को लुधियाना में ईलाज के लिए दाखिल करवाया। घटनास्थल पर लुधियाना देहाती के एसएसपी सुरजीत सिंह, एसपीडी रुपिन्दर भारद्वाज, सीआईए स्टाफ, डोग स्क्वाइड, फिंगर पिंट विशेषज्ञ व मोबाइल फॉरैंसिक लैब टीम मौके पर पहुंची व सारी जांच करने उपरांत एसएसपी सुरजीत सिंह ने कहा कर इस मामले को 24 घंटो में सुलझा लिया जाएगा।</p>
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                                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Jul 2018 07:31:04 +0530</pubDate>
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                <title>पुराने वायदों पर नई पॉलिश</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने का वायदा फिर दोहराया है। यह वायदा पुराने वायदे पूरे करने की बजाय उसे चमकाकर नया रूप देना है। एनडीए ने अपने चुनाव मनोरथ पत्र में स्वामी नाथन कमिशन की सिफारिशों को लागू करने का वायदा किया था जो देश भर के किसान […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/new-polish-on-old-futures/article-4352"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/kisan-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने का वायदा फिर दोहराया है। यह वायदा पुराने वायदे पूरे करने की बजाय उसे चमकाकर नया रूप देना है। एनडीए ने अपने चुनाव मनोरथ पत्र में स्वामी नाथन कमिशन की सिफारिशों को लागू करने का वायदा किया था जो देश भर के किसान संगठनों की मांग भी थी। यह वायदा इसी सरकार से पूरा होना चाहिए था। यदि स्वामीनाथन कमिशन की सिफारिशें लागू हो जातीं तो खेती संकट काफी हद तक दूर हो सकता था।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा समय किसानों को आमदनी दोगुना होने के फिकर से ज्यादा फिकर खर्चे पूरे करने और थोड़ी बहुत आमदनी बढ़ाने का है। दोगुनी-तिगुनी आमदनी के वायदे प्रशासन में शगूफे बन गए हैं। आज किसान खुदकुशी कर रहे हैं। केन्द्र सरकार ही एक राज्य में वही फसल अन्य राज्यों के मुकाबले एक हजार रुपये मंहगी खरीद रही है। सारे देश के लिए एक खेती नीति क्यों नहीं बन रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर भी यदि सरकार की इच्छा किसानों की आमदनी दोगुना करने की है तो इसके लिए सन् 2022 तक पूरे पांच वर्षों का इंतजार क्यूं? कर्मचारियों का डीए तथा अन्य भत्ते हर साल बढ़ाये जाते हैं फिर किसान को लंबे समय इंतजार करने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। कहने को किसानों को ‘अन्नदाता’ जैसे विशेषण से नवाजा जाता है पर किसान की हालत की तरफ गौर नहीं कि या जा रहा। यदि 2022 के राजनीति मायने देखे जाएं तो यह मौखिक चुनाव घोषणा पत्र ही है क्योंकि आमदनी दोगुना करने के वायदे से लोकसभा चुनाव 2019 के लिए वोट मांगने का मकसद स्पष्ट है।</p>
<p style="text-align:justify;">नि:संदेह किसानों को कर्ज माफी ही खेती संकट का एकमात्र हल नहीं। इसके लिए खेती के ढांचे को मजबूत करना जरूरी है, जिस में जमीन की सेहत को लेकर सस्ते बीज, खाद के साथ-साथ कीटनाशकों का जरूरत अनुसार उपयोग तथा मार्केटिंग पर जोर देना जरूरी है पर स्वामीनाथन कमिशन रिपोर्ट पर सरकार का स्पष्टीकरण नहीं आना हैरानीजनक है।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान की जरूरतों को सरकारी कर्मचारियों की तरह देखने की आवश्यकता है। खेती फसलों के भाव से ना तो किसान संतुष्ट हैं तथा ना ही वो खेती विशेषज्ञ जिनसे सरकार सलाह लेती है। खेती संबंधी फै सले राजनीति नुक्तों की बजाय अर्थ शास्त्री नुक्ते से लिए जाएं तो खेती संकट का हल निकल सकता है। किसानों को दोगुना या तिगुनी आमदनी की जरूरत नहीं बल्कि खेती फसलों को थोक भाव कीमत सूचक से जोड़ने की है। खेती संकट के हल के लिए पांच वर्ष मोंने किसी भी तरह जायज नहीं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">HINDI NEWS </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">FACEBOOK</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">TWITTER</a> पर फॉलो करें।</strong></h4>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 21 Jun 2018 09:23:36 +0530</pubDate>
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