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                <title>Good Governance - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>नागरिक अधिकार पत्र प्रशासन की पारदर्शिता को सुनिश्चित करता &amp;#8216;हथियार&amp;#8217;</title>
                                    <description><![CDATA[Good Governance: सुशासन प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। सुशासन के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही दोनों तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान हों। सिटिजन चार्टर (नागरिक अधिकार पत्र) एक ऐसा हथियार है जो कि प्रशासन की जवाबदेहिता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है। जिसके चलते प्रशासन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/citizens-charter-is-a-weapon-ensuring-transparency-of-administration/article-54550"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/good-governance.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Good Governance: सुशासन प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। सुशासन के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही दोनों तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान हों। सिटिजन चार्टर (नागरिक अधिकार पत्र) एक ऐसा हथियार है जो कि प्रशासन की जवाबदेहिता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है। जिसके चलते प्रशासन का व्यवहार आम जनता (उपभोक्ताओं) के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील रहता है। दूसरे अर्थों में प्रशासनिक तंत्र को अधिक जवाबदेह और जनकेन्द्रित बनाने की दिशा में किये गये प्रयासों में सिटिजन चार्टर एक महत्वपूर्ण नवाचार है। Citizen’s Charter</p>
<p style="text-align:justify;">दो टूक कहें तो इस अधिकार के मामले में कथनी और करनी में काफी हद तक अंतर रहा है। देश भर में विभिन्न सेवाओं के लिए सिटिजन चार्टर लागू करने के मामले में अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर सुनवाई करने से ही इंकार कर दिया था। शीर्ष अदालत का तर्क था कि संसद को इसे लागू करने के निर्देश दे सकते हैं। इस मामले को लेकर न्यायालय ने याचिकाकत्र्ता के लिए बोला कि वे सरकार के पास जायें जबकि सरकारों का हाल यह है कि इस मामले में सफल नहीं हो पा रहीं हैं। यूपी में पहली बार योगी सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा था कि सिटिजन चार्टर को कड़ाई से लागू करेंगे पर स्थिति कितनी संतोषजनक है यह पड़ताल का विशय है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में कई वर्शों से आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। इसके साथ ही साक्षरता दर में पर्याप्त वृद्धि हुई और लोगों में अधिकारों के प्रति जागरुकता आई। नागरिक और अधिकार और अधिक मुखर हो गये तथा प्रशासन को जवाबदेह बनाने में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित की। अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें तो विश्व का नागरिक पत्र के सम्बंध में पहला अभिनव प्रयोग 1991 में ब्रिटेन में किया गया जिसमें गुणवत्ता, विकल्प, मापदण्ड, मूल्य, जवाबदेही और पारदर्शिता मुख्य सिद्धांत निहित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है ऐसे में शासन और प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि जनता की मजबूती के लिए हर सम्भव प्रयास करें साथ ही व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह के साथ मूल्यपरक बनाये रखें। इसी तर्ज पर ऑस्ट्रेलिया में सेवा चार्टर 1997 में, बेल्जियम में 1992, कनाडा 1995 जबकि भारत में यह 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में इसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया गया। पुर्तगाल, स्पेन समेत दुनिया के तमाम देश नागरिक अधिकार पत्र को अपनाकर सुशासन की राह को समतल करने का प्रयास किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी सुशासन के मामले में कहीं अधिक गम्भीर दिखाई देते हैं परन्तु सर्विस फर्स्ट के अभाव में यह व्यवस्था कुछ हद तक आशातीत नहीं रही। हालांकि भारत सरकार द्वारा इसे लेकर एक व्यापक वेबसाइट भी तैयार की गई जिसका प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा दशकों पहले लांच की गई थी। वैसे सुशासन को निर्धारित करने वाले तत्वों में राजनीतिक उत्तरदायित्व सबसे बड़ा है। यही राजनीतिक उत्तरदायित्व सिटिजन चार्टर को भी नियम संगत लागू कराने के प्रति जिम्मेदार है। सुशासन के निर्धारक तत्व मसलन नौकरशाही की जवाबदेहिता, मानव अधिकारों का संरक्षण, सरकार और सिविल सेवा सोसायटी के मध्य सहयोग, कानून का शासन आदि तभी लागू हो पायेंगे जब प्रशासन और जनता के अर्न्तसम्बंध पारदर्शी और संवेदनशील होंगे जिसमें सिटिजन चार्टर महत्वपूर्ण पहलू है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को सरकरी दफ्तरों में बिना रिश्वत दिए अपना कामकाज निपटाने के लिए यदि सात दशक तक इंतजार करना पड़े तो शायद यह गर्व का विषय तो नहीं होगा। जिस प्रकार सिटिजन चार्टर के मामले में राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक संवेदनहीनता देखने को मिल रही है वह भी इस कानून के लिए ही रोड़ा रहा है। सूचना का अधिकार कानून के साथ अगर सिटिजन चार्टर भी कानूनी शक्ल, सूरत ले ले तो यह पारदर्शिता की दिशा में उठाया गया बेहतरीन कदम होगा और सुशासन की दृष्टि से एक सफल दृष्टिकोण करार दिया जायेगा। जिन राज्यों में पहले से सिटिजन चार्टर कानून अस्तित्व में है वहां कोई नये तरीके की अड़चन देखी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने नागरिक चार्टर का आंतरिक व बाहरी मूल्यांकन अधिक प्रभावी, परिणामपरक और वास्तविक तरीके से करने के लिए मानकीकृत मॉडल हेतु पेशेवेर एजेंसी की नियुक्ति दशकों पहले किया था। इस एजेंसी ने केन्द्र सरकार के पांच संगठनों और आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारों के एक दर्जन से अधिक विभागों के चार्टरों के कार्यान्वयन का मूल्यांकन भी कुछ साल पहले किया था। रिपोर्ट में रहा कि अधिकांश मामलों में चार्टर परामर्श प्रक्रिया के जरिये नहीं बनाये गये। इनका पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। नागरिक चार्टर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए किसी प्रकार की कोई धनराशि निर्धारित नहीं की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">उक्त मुख्य सिफारिशें यह परिलक्षित करती हैं कि सिटिजन चार्टर को लेकर लेकर जितनी बयानबाजी की गई उतना किया नहीं गया। यद्यपि सिटिजन चार्टर प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है तथापि भारत में यह अधिक प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा। इसके कारण भी हतप्रभ करने वाले हैं। पहला यह कि सर्वमान्य प्रारूप का निर्धारण नहीं हो पाया, अभी भी कई सरकारी एजेंसियां इसका प्रयोग नहीं करती हैं। स्थानीय भाषा में इसे लेकर बढ़ावा न देना, इस मामले में उचित प्रशिक्षण का अभाव तथा जिसके लिए सिटिजन चार्टर बना वही नागरिक समाज भागीदारी के मामले में वंचित रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी की पुरानी सरकार सबका साथ, सबका विकास की अवधारणा से युक्त थी तब भी सिटिजन चार्टर को लेकर समस्याएं कम नहीं हुईं। उल्लेखनीय है कि भारत में नागरिक चार्टर की पहल 1997 में की गयी जो कई समस्याओं के कारण बाधा बनी रही। नागरिक चार्टर की पहल के कार्यान्वयन से आज तक के अनुभव यह बताते हैं कि इसकी कमियां भी बहुत कुछ सिखा रही हैं। जिन देशों ने इसे एक सतत् प्रक्रिया के तौर पर अपना लिया है वे सघन रूप से निरंतर परिवर्तन की राह पर हैं। जहां पर रणनीतिक और तकनीकी गलतियां हुई हैं वहां सुशासन भी डामाडोल हुआ है। चूंकि सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है ऐसे में लोक सशक्तीकरण ही इसका मूल है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुशासन के भीतर और बाहर कई उपकरण हैं। सिटिजन चार्टर मुख्य हथियार है। सिटिजन चार्टर एक ऐसा माध्यम है जो जनता और सरकार के बीच विश्वास की स्थापना करने में अत्यंत सहायक है। एनसीजीजी का काम सुशासन के क्षेत्र में शोध करना और इसे लागू करने के लिए आसान तरीके विकसित करना है ताकि मंत्रालय आसानी से सुशासन सुधार को लागू कर सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, ई-ऑक्शन को बढ़ावा देना, अर्थव्यवस्था की समस्याओं का हल तलाशना, आधारभूत संरचना, निवेश पर जोर, जनता की उम्मीद पूरा करने पर ध्यान, नीतियों को तय समय सीमा में पूरा करना, इतना ही नहीं सरकारी नीतियों में निरंतरता, अधिकारियों का आत्मविश्वास बढ़ाना और शिक्षा, स्वास्थ, बिजली, पानी को प्राथमिकता देना ये सुशासनिक एजेंण्डे मोदी के सुशासन के प्रति झुकाव को दर्शाते हैं। लोकतंत्र नागरिकों से बनता है और सरकार अब नागरिकों पर शासन नहीं करती है बल्कि नागरिकों के साथ शासन करती है। ऐसे में नागरिक अधिकार पत्र को कानूनी रूप देकर लोकतंत्र के साथ-साथ सुशासन को भी सशक्त बनाया जाना चाहिए। Citizen’s Charter</p>
<p style="text-align:right;"><strong>सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ लेखक एवं प्रशासनिक चिंतक </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Ration Card News: ताऊ खट्टर ने दी राशन कार्ड धारकों को ये बड़ी सौगात!" href="http://10.0.0.122:1245/tau-khattar-gave-this-big-gift-to-the-ration-card-holders/">Ration Card News: ताऊ खट्टर ने दी राशन कार्ड धारकों को ये बड़ी सौगात!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
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                <pubDate>Sun, 05 Nov 2023 16:24:40 +0530</pubDate>
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                <title>eGramSwaraj: ग्रामीण सुशासन को ई-ग्राम स्वराज की दरकार</title>
                                    <description><![CDATA[eGramSwaraj: साल 2025 तक देश में इंटरनेट की पहुंच 90 करोड़ से अधिक जनसंख्या तक हो जाएगी जो वर्तमान में 70 करोड़ है। तकनीक किस गति से अपना दायरा बढ़ा रही है यह बढ़े हुए सुशासन से आंक सकते हैं। गौरतलब है कि ई-गवर्नेंस से प्रशासनिक कार्य एवं सेवाओं की दक्षता तथा गुणवत्ता में सुधार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/rural-good-governance-needs-e-gram-swaraj/article-50580"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/egramsavraj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">eGramSwaraj: साल 2025 तक देश में इंटरनेट की पहुंच 90 करोड़ से अधिक जनसंख्या तक हो जाएगी जो वर्तमान में 70 करोड़ है। तकनीक किस गति से अपना दायरा बढ़ा रही है यह बढ़े हुए सुशासन से आंक सकते हैं। गौरतलब है कि ई-गवर्नेंस से प्रशासनिक कार्य एवं सेवाओं की दक्षता तथा गुणवत्ता में सुधार होता है और यह भ्रष्टाचार को कम करने का औजार भी है। जाहिर है ऐसी दोनों परिस्थितियों में सुशासन की बयार बहना संभव है। भारत गांवों का देश है और डिजिटल इंडिया का विस्तार व प्रसार शहर तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। नि:संदेह गांव तक इसकी पहुंच को बढ़ाने की पुरजोर कोशिश हो रही है और ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ई-गवर्नेंस से प्रखर हुई ई-ग्राम समाज अभियान की अवधारणा को भी बल मिलेगा मगर तकनीक यदि रोड़ा बनी रही तो ई-ग्राम स्वराज की अवधारणा जाहिर है कमजोर भी होगी। eGramSwaraj</p>
<p style="text-align:justify;">इससे गांव के डिजिटलीकरण का सपना अधूरा रहेगा और 1922 में जो सपना महात्मा गांधी ने गांव के लिए देखा था वह भी कसमसाहट में भी रह जाएगा। विदित हो कि आगामी अक्टूबर 2023 से गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) पोर्टल से ही पंचायतों में खरीद को अनिवार्य किया जाना है। लाख टके का सवाल यह है कि जब इंटरनेट सेवाएं आधी पंचायतों तक भी नहीं पहुंची है तो इस पोर्टल से जुड़े सपने को जमीन कैसे मिलेगी। स्पष्ट कर दें कि जनवरी 2023 तक लगभग 81 हजार पंचायतों तक ही इंटरनेट सेवाएं पहुंच पायी हैं जबकि संसद की स्थायी समिति को मंत्रालय द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग पौने तीन लाख पंचायतें हैं। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि हजारों पंचायतों में सेवा शुरू होने वाली है और छ: माह में इसे और गति देते हुए आगामी दो वर्श में शत-प्रतिशत पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ दिया जाएगा। Rural</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि स्टार्टअप से लेकर मोटे अनाज पर जोर समेत कई संदर्भ पिछले कुछ समय से फलक पर है। उत्पाद, उद्यम और बाजार ई-ग्राम स्वराज की अवधारणा में एक अनुकूल वातावरण ला सकते हैं। मगर इसके लिए इंटरनेट की सेवाएं समुचित रूप से बहाल करनी होंगी। दावे राजनीतिक दृश्टि से कुछ भी हों मगर सुशासन का दृश्टिकोण यह कहता है कि समावेशी ढांचा बिना सुनिश्चित किए ग्रामीण विकास को उचित रूप दिया ही नहीं जा सकता जिसके कारण लोक सशक्तिकरण एक चुनौती बना रहेगा। ई-गवर्नेंस की दृश्टि से देखें तो इसका भी टिकाऊ पक्ष इंटरनेट कनेक्टिविटी ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी साल के फरवरी में पेश बजट में भी किसानों को डिजिटल ट्रेनिंग देने की बात देखी जा सकती है मगर यह कैसे सम्भव होगा यह भी सोचनीय मुद्दा है। गांव में 8 करोड़ से अधिक महिलाएं जो व्यापक पैमाने पर स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उत्पाद करने का काम कर रही हैं और इन्हें देश-विदेश में बाजार मिले इसके लिए भी तकनीक तो चाहिए। इंटरनेट एण्ड मोबाइल एसोसिएशन के सर्वे पर आधारित एक रिपोर्ट जो थोड़ी पुरानी है उससे पता चलता है कि 2020 में गांव में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 30 करोड़ तक पहुंच चुकी थी। देखा जाए तो औसतन हर तीसरे ग्रामीण के पास इंटरनेट सुविधा है। पौने तीन लाख पंचायतों में 80 हजार पंचायतों तक इंटरनेट की पहुंच इसी आंकड़े को तस्तीक करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरा भारत साढ़े छ: लाख गांवों से भरा है और इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में 42 फीसद ग्रामीण महिलाएं हैं। गांव में महिलाओं की श्रम शक्ति में हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। कृषि क्षेत्र में अभी भी 60 प्रतिशत के साथ यह बढ़त लिए हुए है। इतना ही नहीं बचत दर सकल घरेलू उत्पाद का 33 प्रतिशत इन्हीं से सम्भव है और डेयरी उद्योग में तो महिलाएं ही छायी हैं जहां 94 फीसद का आंकड़ा देखा जा सकता है। इंटरनेट की बढ़त से चौतरफा सम्भावनाओं में बाढ़ आना स्वाभाविक तो है मगर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह सुलभ के साथ कहीं अधिक सस्ता भी हो।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचायती राज मंत्रालय, पंचायतों को पारदर्शी और सशक्त बनाने के लिए कई अभियान और कार्यक्रम चला रहा है। पंचायतों को इस बात के लिए भी निर्देशित किया गया है कि ग्राम पंचायत स्तर पर किसी भी मद में पैसे का लेन-देन फिलहाल यूपीआई से ही किया जाए जिस हेतु 15 अगस्त 2023 का लक्ष्य रखा गया। स्पश्ट है कि डिजिटल लेन-देन व ई-गवर्नेंस को यहां तवज्जो देने की बात है मगर इसका भी पूरा ताना-बाना इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भर है। इसके अलावा मंत्रालय की केन्द्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने राज्यों से यह भी कहा है कि राज्य विशेष की सभी पंचायतों में जीईएम पोर्टल के माध्यम से ही वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-फरोख्त को केन्द्रीय वित्त आयोग द्वारा अनिवार्य किया जा रहा है। यहां भी ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने की बात है बशर्ते चुनौती में इंटरनेट सेवा ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यों में इंटरनेट सेवा की पड़ताल यह बताती है कि लगभग पूरे देश में हालत कमोबेश कमजोर और एक जैसी है मसलन उत्तर प्रदेश मे 58189 पंचायतों में महज 5014 पंचायतें इंटरनेट से जुड़ पायी हैं। यह आंकड़ा इस बात का उदाहरण है कि पंचायतें इंटरनेट सेवा के मामले में बहुत बेहतर नहीं बल्कि चिंतनीय अवस्था में है। उत्तराखण्ड में यही आंकड़ 7791 के मुकाबले 1010 पर है। इसी क्रम में राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश समेत सभी राज्यों की हालत कुछ ऐसी ही है। पंजाब इस मामले में कहीं अधिक बेहतर अवस्था लिए हुए है। यहां कि 13241 पंचायतों में 9483 पंचायतें इंटरनेट से सरोकार रखती है जबकि हरियाणा में 6220 पंचायतों के मुकाबले इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले पंचायतों की संख्या 3570 है। देखा जाए तो गुजरात में 14359 पंचायतों में 11167 का जुड़ाव इंटरनेट से है जो अपने आप में एक बेहतर आंकड़ा तो हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दावे अपनी जगह है नीयत और नीति में भी कोई संदेह नहीं है मगर ई-ग्राम स्वराज में पंचायतों की तकनीकी स्थिति को देखते हुए यह आंकलन आसान है कि अभी एड़ी-चोटी का जोर लगाना बाकी है। लेकिन एक हकीकत यह है कि जनवरी में किए गए तमाम दावो को छ: महीने बीत चुके हैं, हो सकता है कि पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ने का क्रम बीते छ: महीने में बड़ा रूप लिया हो मगर यह कहना अतार्किक सा प्रतीत होता है कि अक्टूबर से जीईएम पोर्टल से ही पंचायते अनिवार्य रूप से खरीद मामले से जुड़ जाएंगी। इसका सबसे बड़ा कारण फिर वही तकनीक की चुनौती ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वोकल फॉर लोकल का नारा कोरोना काल में तेजी से बुलंद हुआ। मोटे अनाज को लेकर इन दिनों चर्चा खूब जोरों पर है। अच्छे बीज, अच्छी सीख और अच्छी खेती समेत मुनाफे से भरी बिकवाली की अगर कोई बड़ी चुनौती है तो वह तकनीक का समुचित न होना ही है। गांव श्रम का सस्ता रास्ता है लेकिन वित्तीय कठिनाईयों के चलते संसाधन की कमी से जूझते कौशलयुक्त ग्रामीण श्रम शहर का रास्ता पकड़ लेता है। जिसका सबसे बड़ा असर ग्राम स्वराज की उस अवधारणा पर पड़ता है जो राश्ट्रपति महात्मा गांधी का सपना था। ग्रामीण उद्यमी वित्तीय रूप से सशक्त होंगे व तकनीक से युक्त होंगे तो जाहिर है गांवों का देश भारत उन्नति का परिचायक हो जाएगा। फलस्वरूप सुशासन का सपना पाले सरकार को भी इसकी पूरी परिभाशा गढ़ने का अवसर मिलेगा। Good Governance</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्रशासनिक चिंतक (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 30 Jul 2023 10:07:20 +0530</pubDate>
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                <title>GST Collection: बढ़ता जीएसटी संग्रह और सुशासन</title>
                                    <description><![CDATA[GST Collection: वित्त बगैर ऊर्जा नहीं और ऊर्जा बगैर कुछ नहीं यह स्लोगन दशकों पहले कहीं पढ़ने को मिला था जो आज के दौर में कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। सुशासन तभी संभव कहा जाएगा, जब जनहित की समस्याएं निर्मूल हों। समावेशी विकास की राह हो और एवंऔर खुशहाली का बड़ा वातावरण हो तथा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/rising-gst-collection-and-good-governance/article-50322"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/gst-collection.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">GST Collection: वित्त बगैर ऊर्जा नहीं और ऊर्जा बगैर कुछ नहीं यह स्लोगन दशकों पहले कहीं पढ़ने को मिला था जो आज के दौर में कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। सुशासन तभी संभव कहा जाएगा, जब जनहित की समस्याएं निर्मूल हों। समावेशी विकास की राह हो और एवंऔर खुशहाली का बड़ा वातावरण हो तथा यह तब हो सकता है जब सुशासन हो व सुशासन तभी होगा जब समुचित वित्त होगा। इसी धारा में एक व्यवस्था अप्रत्यक्ष कर जीएसटी है जो आर्थिक इंजन के तौर पर देश में 1 जुलाई, 2017 को परोसी गई, जिसकी छ: साल की यात्रा हो चुकी है। सुशासन की दृष्टि से जीएसटी को देखा जाए तो यह बल इकट्ठा करने का एक आर्थिक परिवर्तन था मगर सफलता कितनी मिली यह पड़ताल से जरूर पता चलेगा। GST Collection</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि 24 जुलाई 1991 को जब उदारीकरण एक बड़ा आर्थिक नीति और परिवर्तन का स्वरूप लेकर प्रकट हुआ था तब उम्मीदें भी बहुत थी और कहना गलत न होगा कि 3 दशक पुरानी इस व्यवस्था ने निराश नहीं किया बल्कि इसी दौर के बीच में सुशासन को 1992 में सांस लेने का अवसर मिला जिसकी धड़कन की आवाज कमोबेश आज सुनी और समझी जा सकती है। देश में कई सारे अप्रत्यक्ष करों को समाहित कर आज से ठीक 6 साल पहले 1 जुलाई 2017 को एक नया आर्थिक कानून वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुआ था। इस एकल कर व्यवस्था से राज्यों को होने वाले राजस्व कर की भरपाई हेतु पांच साल तक मुआवजा देने का प्रावधान भी इसमें शामिल था जो जून 2022 में पूरा भी हो गया। इस हेतु एक कोष बनाया गया जिसका संग्रह 15 फीसद तक के सेस से होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नियमसंगतता की दृष्टि से जीएसटी के उक्त संदर्भ सुशासन के समग्रता को परिभाषित करते हैं मगर वक्त के साथ व्याप्त कठिनाईयों ने इस पर सवाल भी खड़ा किये। गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने से पहले ही केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच आपस में इस बात पर सहमति का प्रयास किया गया था कि इसके माध्यम से प्राप्त राजस्व में केन्द्र और राज्यों के बीच राजस्व का बंटवारा किस तरह किया जाएगा। ध्यानतव्य हो कि पहले इस तरह के राजस्व का वितरण वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया जाता था। GST Collection</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी का एक महत्वपूर्ण संदर्भ यह रहा है कि इस प्रणाली के लागू होने से कई राज्य इस आशंका में शामिल रहे हैं कि इनकी आमदनी इससे कम हो सकती है और यह आशंका सही भी है। हालांकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए केन्द्र ने राज्यों को यह भरोसा दिलाया था कि साल 2022 तक उनके नुकसान की भरपाई की जाएगी। मगर पड़ताल यह बताती है कि बकाया निपटाने के मामले में केन्द्र सरकार समय के साथ पूरी तरह खरी नहीं उतरी और अब मुआवजे का मामला भी एक साल से खत्म है। इसमें कोई शक नहीं कि राज्य वित्तीय संकट से कमोबेश जूझ तो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पड़ताल यह बताती है कि वित्तीय सम्बंध के मामले में संघ और राज्य के बीच समय-समय पर कठिनाइयां आती रही हैं। सहकारी संघवाद के अनुकूल ढ़ांचे की जब भी बात होती है तो यह भरोसा बढ़ाने का प्रयास होता है कि समरसता का विकास हो। आरबीआई के पूर्व गर्वनर डी0 सुब्बाराव ने कहा था कि जिस प्रकार देश का आर्थिक केन्द्र राज्यों की ओर स्थानांतरित हो रहा है उसे देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में भारत का आर्थिक विकास सहकारी संघवाद पर टिका देखा जा सकता है। Good Governance</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि संघवाद अंग्रेजी शब्द फेडरेलिज्म का हिन्दी अनुवाद है और इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है जिसका अर्थ समझौता या अनुबंध है। जीएसटी संघ और राज्य के बीच एक ऐसा अनुबंध है जिसे आर्थिक रूप से सहकारी संघवाद कहा जा सकता है मगर जब अनुबंध पूरे न पड़े तो विवाद का होना लाजिमी है और सुशासन को यहीं पर ठेस पहुंचना भी तय है। जुलाई 2017 में पहली बार जब जीएसटी आया तब उस माह का राजस्व संग्रह 95 हजार करोड़ के आसपास था। धीरे-धीरे गिरावट के साथ यह 80 हजार करोड़ पर भी पहुंचा था और यह उतार-चढ़ाव चलता रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोविड-19 महामारी के चलते अप्रैल 2020 में इसका संग्रह 32 हजार करोड़ तक आकर सिमट गया जबकि दूसरी लहर के बीच अप्रैल 2021 में यह आंकड़ा एक लाख 41 हजार करोड़ का था जो उस कालखण्ड में जीएसटी लागू होने से और संग्रह में सर्वाधिक था। अब तो हाल यह है कि जीएसटी हर महीने डेढ़ लाख करोड़ के आंकड़े को तो पार करती है और यह लगभग 2 लाख करोड़ के आसपास छलांग लगाने की ओर है। जाहिर है अप्रत्यक्ष कर के साथ कई तकनीकी समस्याएं हो सकती है पर जीएसटी संग्रह का लगातार बढ़ना और करदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि इसके सुशासनिक पक्ष को मजबूती की ओर ही इंगित करता है। Good Governance</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी के इन 6 साल से अधिक के कालखण्ड में जीएसटी काउंसिल की अब तक 50 बैठकें और हजार से अधिक संशोधन हो चुके हैं। कुछ पुराने संदर्भ को पीछे छोड़ा जाता है तो कुछ नये को आगे जोड़ने की परम्परा अभी भी जारी है। गौरतलब है कि संविधान स्वयं में एक सुशासन की कुंजी है जहां सभी के अधिकार और स्वायतता को पहचान मिलती है और यहीं से सभी का कद-काठी भी बड़ा होता है। संघ और राज्य के वित्तीय मामलों में संवैधानिक प्रावधान को भी संविधान में देखा जा सकता है। अनुच्छेद 275 संसद को इस बात का अधिकार प्रदान करता है कि वह ऐसे राज्यों को उपयुक्त अनुदान देने का अनुबंध कर सकती है जिन्हें संसद की दृष्टि में सहायता की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनुच्छेद 286, 287, 288 और 289 में केन्द्र तथा राज्य सरकारों को एक दूसरे द्वारा कुछ वस्तुओं पर कर लगाने से मना किया गया है। अनुच्छेद 292 व 293 क्रमश: संघ और राज्य सरकारों से ऋण लेने का प्रावधान भी करते हैं। गौरतलब है कि संघ और राज्य के बीच शक्तियों का बंटवारा है संविधान की 7वीं अनुसूची में संघ, राज्य और समवर्ती सूची के अंतर्गत इसे बाकायदा देखा जा सकता है। जीएसटी वन नेशन, वन टैक्स की थ्योरी पर आधारित है जो एकल अप्रत्यक्ष कर संग्रह व्यवस्था है। जिसमें संघ और राज्य आधी-आधी हिस्सेदारी रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">80वें संविधान संशोधन अधिनियम 2000 और 88वें संविधान संशोधन अधिनियम 2003 द्वारा केन्द्र-राज्य के बीच कर राजस्व बंटवारे की योजना पर व्यापक परिवर्तन दशकों पहले किया गया था जिसमें अनुच्छेद 268डी जोड़ा गया जो सेवा कर से सम्बंधित था। बाद में 101वें संविधान संशोधन द्वारा नये अनुच्छेद 246ए, 269ए और 279ए को शामिल किया गया तथा अनुच्छेद 268 को समाप्त कर दिया गया। गौरतलब है राज्य व्यापार के मामले में कर की वसूली अनुच्छेद 269ए के तहत केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है जबकि बाद में इसे राज्यों को बांट दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी केन्द्र और राज्य के बीच झगड़े की एक बड़ी वजह उसका एकाधिकार होना भी रहा है। क्षतिपूर्ति न होने के मामले में तो राज्य केन्द्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात कह चुके हैं। काफी हद तक इस जीएसटी को महंगाई का कारण भी राज्य मानते रहे हैं। सवाल यह भी है कि वन नेशन, वन टैक्स वाला जीएसटी जब मुआवजे के बावजूद राज्यों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं कर पाया तो अब क्या हाल होगा यह समझने का विषय है। दो टूक यह भी है कि सुशासन, शान्ति का पर्याय है तो जीएसटी वित्त का। यदि वित्त का संदर्भ उचित होगा तो शान्ति समुचित होगी साथ ही संघ और राज्य संतुलित भी रहेंगे तथा सुशासन का कद तुलनात्मक बढ़ा रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>                                                 डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक<br />
(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="टूटा बांध फिर बांधा डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों ने, दर्जनों गांवों से खतरा टला" href="http://10.0.0.122:1245/dera-sacha-sauda-sewadar-rebuilt-the-broken-dam-averted-danger-from-dozens-of-villages/">टूटा बांध फिर बांधा डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों ने, दर्जनों गांवों से खतरा टला</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Jul 2023 10:48:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Good Governance : सुशासन के लिए चुनौती साइबर सुरक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[Good Governance : यह तर्कसंगत है कि देश में जैसे-जैसे डिजिटलीकरण का दायरा बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा (Cyber ​​Security) सम्बंधी चुनौतियां भी बढ़ती जाएंगी। डाटा चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी साइबर अपराध के बड़े आधार हो गए हैं। शायद यही कारण है कि रोजगार के नए अवसर में डाटा प्राइवेसी, डाटा सिक्योरिटी और नेटवर्क सिक्योरिटी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/cyber-security-a-challenge-for-good-governance/article-49770"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/good-governance.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Good Governance : यह तर्कसंगत है कि देश में जैसे-जैसे डिजिटलीकरण का दायरा बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा (Cyber ​​Security) सम्बंधी चुनौतियां भी बढ़ती जाएंगी। डाटा चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी साइबर अपराध के बड़े आधार हो गए हैं। शायद यही कारण है कि रोजगार के नए अवसर में डाटा प्राइवेसी, डाटा सिक्योरिटी और नेटवर्क सिक्योरिटी के विशेषज्ञ प्रोफेशनल की मांग तेजी से बढ़ी है। देखा जाए तो साइबर सुरक्षा का बाजार भी बड़ा आकार लेता जा रहा है। एक रिपोर्ट से यह पता चलता है कि इस बाजार का आकार 2021 में 220 करोड़ का था जो 2027 तक 350 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो साल 2021 में होने वाले साइबर हमलों में विश्व में भारत का दूसरा स्थान था और 2022 में तो इसे लेकर 14 लाख मामले दर्ज किए गए थे। विज्ञान और तकनीक जिस मुकाम को हासिल किए उसमें सब कुछ उजला ही नहीं है कुछ उसके स्याह पक्ष भी है साइबर अपराध इसी का एक नतीजा है। कम्प्यूटर, सर्वर, मोबाइल डिवाइस, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, नेटवर्क और डेटा को हमले से बचाने का एक बड़ा प्रयास साइबर सुरक्षा है। वैश्विक स्तर पर साइबर खतरा तेजी से गतिमान है और दिन दूनी-रात चैगुनी की तर्ज पर तेजी लिए हुए है। Good Governance</p>
<p style="text-align:justify;">साइबर अपराधियों ने किसी को भी सुरक्षित नहीं छोड़ा। सांसद, न्यायाधीश, विश्वविद्यालय के कुलपति, व्यापारी, पुलिस अधिकारी को भी अपने शिकंजे में फंसा चुका है। आंकड़े की पड़ताल से यह पता चलता है कि भारत में साल 2021 में साइबर अपराध के लगभग 53 हजार मामलों पर केस दर्ज हुआ, 18 हजार से अधिक मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए, जिसमें 491 मामलों में सजा भी हुई। उक्त से यह परिलक्षित होता है कि साइबर अपराध का दायरा अच्छा खासा पसर गया है और साथ ही साइबर सुरक्षा की चुनौती को बढ़ा दिया है।</p>
<h3>डिजिटलीकरण को दो कदम और आगे बढ़ाने की फिराक में सरकार</h3>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा दौर सुशासन उन्मुख दृष्टिकोण से युक्त है साथ ही ई-गवर्नेंस को भारी पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इंटरनेट कनेक्टिविटी को 5-जी व 6-जी की ओर ले जाने का पूरा प्रयास है। 2025 तक 90 करोड़ आबादी को इंटरनेट से जोड़ने का लक्ष्य है। पढ़ाई-लिखाई से लेकर चिकित्सा व अदालती व्यवस्थाओं में इंटरनेट का पूरा समावेश देखा जा सकता है। ई-बैंकिंग समेत दर्जनों प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक विधाओं से युक्त क्रियाकलापों को जमीन पर उतार दिया गया है। लेन-देन की प्रक्रिया को सरकार भी डिजिटलीकरण के मामले को दो कदम और आगे बढ़ाने की फिराक में रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने तो यहां तक भी कहा है कि एक दिन जेब में बिना कैश के ही रहे और लेन-देन को डिजिटल पर ले जाएं। सुशासन की परिपाटी में शासन को यह चिंता होना स्वाभाविक है कि चहुंमुखी विकास को डिजिटलीकरण के माध्यम से बड़ा और सघन बनाया जाए। मगर साइबर सुरक्षा को लेकर एक चिंता अपनी जगह रहती है जो हर लिहाज से सुशासन को मुंह चिढ़ाता है। साइबर खतरे का स्तर लगातार बढ़ने के साथ साइबर सुरक्षा समाधानों पर वैश्विक खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है। Good Governance</p>
<p style="text-align:justify;">अनुमान तो यह भी है कि साइबर सुरक्षा खर्च 2023 में 188 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा जबकि 2026 तक यही 260 बिलियन डॉलर हो जाएगा। अमेरिका, इंग्लैण्ड, आॅस्ट्रेलिया देशों ने साइबर सुरक्षा के लिए अनेकों पहल किए हैं। खतरों की विवेचना से यह पता चलता है कि साइबर अपराध बिना किसी सीमा के चलायमान है। साइबर हमले, साइबर आतंकवाद जैसे शब्द सभ्य समाज और व्याप्त सुशासन के लिए कड़ी और बड़ी चुनौती दे रहे हैं। देश के कई इलाके जो साइबर अपराधियों के गढ़ बन गए हैं ऐसे ही इलाकों में हरियाणा का नूंह जिला जिसे साइबर लुटेरों ने मिलकर चर्चे में ला दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">पुलिस के अनुसार इस जिले में 434 गांव हैं। अधिकांश अरावली की तलहटी में स्थित है और फर्जी कॉल के लिए यह उपयुक्त अड्डे हैं। हालांकि साइबर अपराध दुनिया के किसी भी कोने में कहीं से भी पनप सकता है और समाज को नई मुसीबत में डाल सकता है। देश में इंटरनेट से करोड़ों की आबादी जुड़ गयी। बहुतायत में व्यक्तिगत ईमेल समेत अन्य प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्थाओं से जनता जुड़ गयी मगर एक पक्ष यह भी है कि साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता का स्तर अभी विकसित ही नहीं हो पाया। कई वर्ष पहले ही साइबर अपराध की बढ़ती स्थिति और इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था से गतिमान संदर्भ को देखते हुए यह अनुमान लगा लिया गया था कि देश में साइबर सुरक्षा से जुड़े रोजगार के आकार में बढ़ोत्तरी होगी। Cyber ​​Security</p>
<p style="text-align:justify;">इतना ही नहीं सरकार को साइबर सुरक्षा के मसले पर कठोर नियम और कानून से भी गुजरना पड़ेगा। सुशासन की परिपाटी को देखें तो अपराध मुक्त समाज इसकी परिभाषा का एक हिस्सा है जो अब दबे पांव आॅनलाइन लोगों पर हमला करता है और उन्हें वित्तीय समस्या समेत कई सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्या की ओर धकेलता है। आज इंटरनेट हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया है और जीवन के सभी पहलुओं को कमोबेश प्रभावित कर रहा है। साइबर जागरूकता और सावधानी इसका प्राथमिक बचाव है मगर जिस देश में अभी भी हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित हो वहां साइबर शिक्षा कितनी सबल होगी यह समझना कठिन काम नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">साइबर स्टॉकिंग, बौद्धिक सम्पदा की चोरी, वाइरस समेत कई ऐसे प्रारूप हैं जो अपराध के लिहाज से परेशानी का सबब है। गौरतलब है कि साल 2013 से पहले भारत में कोई साइबर नीति नहीं है मगर अब ऐसा नहीं है। राश्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2020 साइबर सुरक्षा और साइबर जागरूकता में सुधार लाने की इच्छा से युक्त है। इसी वर्ष भारतीय साइबर अपराध समन्वयक केन्द्र की स्थापना की गई जबकि 2017 में साइबर सुरक्षा केन्द्र और 2018 में साइबर सुरक्षित भारत पहल जैसी कवायद देखी जा सकती है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 डेटा एवं सूचना उद्योग को नियंत्रित करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा भी कई ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिसमें साइबर सुरक्षा को लेकर भारत पहल करता दिखाई देता है। विदित हो कि भारत ने अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे देशों के साथ अनेकों साइबर सुरक्षा सम्बंधी संधियों पर दस्तखत किए। दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य यह है कि साइबर अपराध वर्तमान में वृद्धि के साथ बना हुआ है और इसे रोकने के उपाय वक्त के साथ ढूंढे जा रहे हैं। यद्यपि सरकार साइबर सुरक्षा को लेकर कई सुशासनिक कदम उठाए हैं इसके लिए साइबर सेल भी बनाए गए हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति केस दर्ज करा सकता है और राहत पाने की उम्मीद अंदर पनपा सकता है मगर ज्यादातर मामलों में निराशा ही मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दो टूक कहें तो यह हवा में किया जाने वाला एक ऐसा अपराध है जो कमाई को उड़ा देता है। सूचना सुरक्षा भंडारण में भी सेंध लगने से अखण्डता और गोपनीयता को भी खतरा पैदा हो रहा है। साइबर अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति और प्रकार को देख कर यह सोचना सही रहेगा कि इससे सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल साइबर सेल और सरकार पर नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि जन मानस को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता और सावधानी का स्तर भी तुलनात्मक बढ़ा लेना चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक (ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Artificial Intelligence: अब बूढ़े नहीं होंगे लोग, एआई कर रही ऐसा प्रयोग !" href="http://10.0.0.122:1245/now-people-will-not-grow-old-ai-is-doing-such-an-experiment/">Artificial Intelligence: अब बूढ़े नहीं होंगे लोग, एआई कर रही ऐसा प्रयोग !</a></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/cyber-security-a-challenge-for-good-governance/article-49770</link>
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                <pubDate>Sun, 09 Jul 2023 17:36:16 +0530</pubDate>
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                <title>Manipur Violence : सुशासन के दौर में सुलगता मणिपुर</title>
                                    <description><![CDATA[Manipur Violence : दो टूक कहें तो सुशासन (good governance) का अभिप्राय शांति और खुशहाली है जो लोक सशक्तिकरण की अवधारणा पर टिकी है। मगर इन दिनों पूर्वोत्तर का मणिपुर जिस तरह हिंसा में झुलसा हुआ है उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह समस्या पनपी ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/manipur-smolders-in-the-era-of-good-governance/article-49504"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/manipur-protest.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Manipur Violence : दो टूक कहें तो सुशासन (good governance) का अभिप्राय शांति और खुशहाली है जो लोक सशक्तिकरण की अवधारणा पर टिकी है। मगर इन दिनों पूर्वोत्तर का मणिपुर जिस तरह हिंसा में झुलसा हुआ है उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह समस्या पनपी ही क्यों। विदित हो कि मणिपुर में मैतेई और कूकी समुदाय के बीच मई के शुरुआती दिनों में भड़की हिंसा से सौ से अधिक मौतें हो चुकी हैं। अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में 3 मई को पर्वतीय जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च के आयोजन के बाद यह घटना घटित हुई। गौरतलब है कि मणिपुर की 53 फीसदी आबादी इसी समुदाय की है जो मुख्य रूप से इम्फाल घाटी में निवास करती है जबकि नगा और कूकी की आबादी भी 40 फीसदी है जिनका आवास पर्वतीय जिले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना का स्वरूप कुछ भी हो पर लम्बे समय तक नियंत्रण का पूरी तरह न हो पाना सुशासनिक पहलू की कमजोरी को तो दर्शाता ही है। इतना ही नहीं सुलगते मणिपुर ने इस बात को भी जता दिया है कि सरकार से भरोसा भी कम हुआ है। शायद यही कारण है कि जातीय हिंसा से निपटने में नाकाम रहे मुख्यमंत्री एन विरेन्द्र सिंह ने इस्तीफा देने का मन भी बना लिया था। हालांकि ऐसा कहा जा रहा है कि जनता के दबाव में उन्होंने अपना मन बदल लिया। महिलाएं नहीं चाहती थीं कि वे इस्तीफा दें और त्यागपत्र की प्रति भी फाड़ दी गयी। यह घटनाक्रम भी मणिपुर की संवेदना को मुखर करता है और इस बात को इंगित करता है कि किसी भी हिंसा को यदि देर तक जिंदा रखा जाएगा तो बड़े नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए जो सुशासन से भरी सरकारों के लिए कहीं भी से ठीक नहीं है।</p>
<h3>दो समुदायों की लड़ाई कैसे धार्मिक हिंसा में तब्दील हुई | Manipur Violence</h3>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर के मुख्यमंत्री की मानें तो आदिवासी समुदाय के लोग संरक्षित जंगलों और वन अभ्यारण्य में गैर कानून कब्जा करके अफीम की खेती कर रहे हैं। यह कब्जा हटाने के लिए सरकार मणिपुर वन कानून 2021 के अंतर्गत वन भूमि पर किसी तरह के अतिक्रमण को हटाने के लिए एक अभियान चला रही है। आदिवासियों का इस पर मत है कि यह उनकी पैतृक जमीन है न कि उन्होंने अतिक्रमण किया है। जिसके कारण विरोध पनपा और सरकार ने धारा 144 लगा कर प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी। नतीजन कूकी समुदाय के सबसे बड़े जातीय संगठन कूकी ईएनपी ने सरकार के खिलाफ बड़ी रैली निकालने का एलान कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे देखा जाए तो कूकी जनजाति के कई संगठन 2005 तक सैन्य विद्रोह में शामिल रहे हैं। मनमोहन सरकार के दौरान साल 2008 में सभी कूकी विद्रोही संगठनों से केन्द्र सरकार ने उनके खिलाफ सैन्य कार्यवाही रोकने के लिए सस्पेंश्न आॅफ आॅप्रेशन एग्रिमेंट किया था। 60 विधायको वाले मणिपुर में 40 विधायक मैतेई समुदाय से आते हैं जाहिर है इनका दबदबा है और इसमें से ज्यादातर हिन्दु हैं। यहां के पहाड़ी इलाकों में 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती हैं जिसमें नागा और कूकी प्रमुख हैं और इनका सरोकार मुख्यत: इसाई धर्म से है। उक्त से यह परिलक्षित होता है कि दो समुदायों की लड़ाई कैसे धार्मिक हिंसा में तब्दील हुई है। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371(ग) को समझें तो मणिपुर की पहाड़ी जनजातियों को संवैधानिक विशेषाधिकार मिले हैं और मेतई समुदाय इससे अलग है। भूमि सुधार अधिनियम के चलते मेतई समुदाय पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदकर प्रवास नहीं कर सकते हैं जबकि दूसरा समुदाय के घाटी में आकर बसने में कोई रोक-टोक नहीं है। नतीजन समुदायों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। ऐसे में मणिपुर की ताजी घटना भले ही तात्कालिक परिस्थितियों के चलते पनपी हो मगर यह इसका ऐतिहासिक पहलू और संरचना द्वन्द्व और संघर्ष से भरा दिखता है। इन सबके बावजूद यहां आठ फीसदी मुस्लिम और लगभग इतने ही सनमही समुदाय के लोग रहते हैं। Good Governance</p>
<h3>मणिपुर की कानून व्यवस्था जातीय हिंसा के चलते हाशिये पर</h3>
<p style="text-align:justify;">घटना का स्वरूप किसी भी कारण से विकसित हुआ हो मगर यह सुशासन के लिए बड़ी चुनौती है। खास तौर पर तब यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब दौर सुशासन और अमृतकाल का हो। सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है जिसमें कानून और व्यवस्था को प्राथमिकता देना और बुनियादी विकास को बनाए रखना शामिल है। मणिपुर की कानून और व्यवस्था इस जातीय हिंसा के चलते हाशिये पर है और केन्द्र और मणिपुर सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है। मामले पर केन्द्र अपने स्तर पर समाधान खोज रहा है जबकि राज्य की तरकीब समस्या से निपटने में नाकाफी रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य विरोधी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भी स्थिति को देखते हुए मणिपुर का दौरा किया और वहां की स्थितियों को समझने का प्रयास किया है। हालांकि इसे लेकर भी सियासत गर्म है। फिलहाल 50 हजार से अधिक लोग राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं जिनमें दोनों समुदाय के लोग शामिल हैं। पड़ताल बताती है कि गुस्से का स्तर बराबरी का है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सौ मंदिरों के अलावा दो हजार मैतेई घरों पर भी हमला हुआ है। कहा तो जा रहा है कि चर्च को भी नुकसान हुआ है। यानी कि हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते हिंसा ने भी धार्मिक रूप ले लिया। Manipur Violence</p>
<h3>इतने लम्बे वक्त तक हिंसा दोनों सरकारों के लिए सही नहीं | Good Governance</h3>
<p style="text-align:justify;">दो टूक यह भी है कि मणिपुर इस कदर तूफान से घिरा मगर केन्द्र हो या राज्य सरकार किसी ने इसे तत्काल प्रभाव से काबू में करने का प्रयास क्यों नहीं किया? वैसे देखा जाए तो भारत में जातीय और धार्मिक हिंसा की छुटपुट घटनाएं कहीं पर भी विकसित हो जाती हैं मगर मणिपुर एक खास ख्याल रखने वाला प्रदेश है। यह पूर्वोत्तर का राज्य है और दिल्ली से भी दूर है। यहां के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष से शेष भारत उतना वाकिफ नहीं है साथ ही राजनीतिक दृष्टि से भी यह बहुत रसूक की जगह नहीं है। ऐसे में हिंसा का बड़ा हो जाना और हालात को इतने लम्बे वक्त तक बनाए रखना केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए सही नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी के मणिपुर दौरे के दौरान राहत शिविरों में जाना और राज्यपाल से मिलना विपक्ष की दृष्टि से सही कदम है। चाहे सरकार केन्द्र की हो या राज्य की जिम्मेदारी को ठीक से निभायें और जिस सुशासन को लेकर गंभीर चिंता से जकड़े हुए हैं उसे देखते हुए मणिपुर को शान्ति और खुशहाली के मार्ग पर ले आएं। 2024 के चुनाव में एक वर्ष से कम समय का रह गया है ऐसे में मोदी सरकार अपनी राजनीतिक सुचिता को सकारात्मक बनाए रखने के लिए मणिपुर को लेकर कम चिंतित नहीं होगी मगर इस राज्य के बढ़े दर्द को सुशासन के मरहम से दूर किया जाना तत्काल की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर में जो हुआ वो बेहद कष्टकारी है और इस बात का द्योतक भी कि शासन-सुशासन व प्रशासन सभ्यता की ऊँचाई को कितना भी प्राप्त कर ले पर समावेशी और सतत विकास की अवधारणा के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलू के साथ कानून और व्यवस्था के बिना सुशासन को दुरूस्त नहीं कर सकती। बड़ी सरकार बड़े मतों से नहीं बल्कि शांति और खुशहाली से संभव है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह,वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक (ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Jul 2023 10:36:20 +0530</pubDate>
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                <title>पांच &amp;#8216;अ’ ही हैं गुड गर्वनेंस का मंत्र</title>
                                    <description><![CDATA[सम्मान। सिविल सेवा परीक्षा-2017 उतीर्ण करने वाले प्रदेश के नव चयनित अधिकारियों को राज्यपाल ने पढ़ाया पाठ नवचयनित आईएएस से पब्लिक के ड्रीम्स का किंग बनने का आह्वान प्रदेश से चयनित सच कहूँ न्यूज/गुरुग्राम। हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने शनिवार को सिविल सेवा परीक्षा-2017 में हरियाणा के चयनित उम्मीदवारों से कहा कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/five-a-is-the-mantra-of-good-governance/article-4448"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/rajypal.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सम्मान। सिविल सेवा परीक्षा-2017 उतीर्ण करने वाले प्रदेश के नव चयनित अधिकारियों को राज्यपाल ने पढ़ाया पाठ</h1>
<ul>
<li><strong>नवचयनित आईएएस से पब्लिक के ड्रीम्स का किंग बनने का आह्वान प्रदेश से चयनित </strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ न्यूज/गुरुग्राम।</strong> हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने शनिवार को सिविल सेवा परीक्षा-2017 में हरियाणा के चयनित उम्मीदवारों से कहा कि ‘आपको पब्लिक के ड्रीम्स का किंग बनना है अर्थात् जब आप कुर्सी पर बैठेंगे, आपको अधिकार मिलेंगे और लोग आशाएं, उम्मीदें तथा अपनी समस्याएं व ड्रीम्स लेकर आपके पास आएंगे तो आपको उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही आपकी सही परीक्षा होगी। राज्पाल शनिवार को गुरुग्राम के किंगडम आॅफ ड्रीम्स में जिला प्रशासन द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा-2017 में हरियाणा से चयनित उम्मीदवारों के सम्मान समारोह में बोल रहे थे। राज्यपाल ने इस परीक्षा में हरियाणा से चयनित उम्मीदवारों को सम्मानित भी किया।</p>
<h1 style="text-align:center;"><strong>सभी 49 उम्मीदवारों को किया सम्मानित</strong></h1>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हरियाणा की आबादी देश की 2 प्रतिशत है और यहां से 49 उम्मीदवार सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हैं जोकि चयनित उम्मीदवारों का 5 प्रतिशत है। इनमें भी देश में पहले पांच उम्मीदवारों में 3 हरियाणा के हैं। उन्होंने कहा कि हरियाणा के युवाओं की यह उपलब्धि पूरे प्रदेश को स्वाभिमान प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल ने कहा कि हरियाणा हर दृष्टि से पूरे देश में अनुकरणीय बन रहा है, सरकार के सभी फलैगशिप कार्यक्रमों में हरियाणा बहुत आगे जा रहा है। उन्होंने बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, खेलों इंडिया, रूस में आयोजित बधिर कुश्ती प्रतियोगिता, एनसीसी, रैडक्रॉस आदि योजनाओं का उल्लेख भी किया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अवसर पर हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान के महानिदेशक जी प्रसन्ना कुमार, राज्य निर्वाचन आयुक्त दलीप सिंह, मुख्यमंत्री के विशेष अधिकारी ओ पी सिंह, राजस्व विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव केसनी आनंद अरोड़ा, परिवहन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव धनपत सिंह, भारत सरकार के सड़क परिवहन तथा राजमार्ग मंत्रालय के सचिव युद्धवीर सिंह मलिक, जीएमडीए के मुख्य कार्यकारी वी उमा शंकर, मण्डलायुक्त डा. डी सुरेश, सेवा निवृत आईएएस अधिकारी महेंद्र कुमार, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वी कामराज सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।</p>
<h1 style="text-align:center;">सिविल सर्वेंट्स में चार ‘सी’ होना जरूरी</h1>
<p style="text-align:justify;">सिविल सेवा परीक्षा 2017 में नव चयनित हरियाणा के उम्मीदवारों को संदेश देते हुए राज्यपाल ने पांच ‘अ’ पर जोर दिया और इसका अर्थ समझाते हुए कहा कि आस्था, आत्म संयम, आत्मीयता, आत्म विश्वास तथा अध्यात्मिकता के गुणों को अपने जीवन में अपनाकर वे लोगों को ‘गुड गवर्नेंस’ दे सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल ने उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल के शब्दों में सिविल सर्वेन्ट्स को भारत की सरकारी मशीनरी का स्टील फ्रेम वर्क बताया और कहा कि सिविल सर्वेंट्स में चार ‘सी’ का होना जरूरी है जिसमें कैलीबर, कपेसिटी, कंडक्ट और कै रेक्टर शामिल हैं।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 Jun 2018 08:44:10 +0530</pubDate>
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