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                <title>जयपुर: अपराध के शिकार बच्चों को कानूनी सहायता अभियान की हुई शुरूआत</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस आज यहां अस्पृश्यता से मुक्ति और अत्याचारों की रोकथाम एवं पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध के शिकार बच्चों को कानूनी सहायता अभियान की शुरूआत की गई। राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और राजस्थान राज्य विधिक सेवा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/legal-aid-campaign-started-for-children-victims-of-crime/article-39705"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/law.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस आज यहां अस्पृश्यता से मुक्ति और अत्याचारों की रोकथाम एवं पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध के शिकार बच्चों को कानूनी सहायता अभियान की शुरूआत की गई। राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और राजस्थान राज्य विधिक सेवा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस पंकज भंडारी सहित मेडिएशन के प्रभारी जस्टिस प्रकाश गुप्ता ने अभियान की शुरूआज की। इस मौके आयोजित कार्यक्रम में राजस्थान विधिक सेवा प्राधिकरण सहित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारियों ने भाग लिया।</p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Nov 2022 15:39:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजनीति में भागीदारी बढ़ाएं महिलाएं: प्रतिभा सुमन</title>
                                    <description><![CDATA[-महिला आयोग की चेयरपर्सन ने किया महिलाओं के कानूनी अधिकार पुस्तक का विमोचन -जाट कॉलेज में सर्च-राज्य संसाधन केन्द्र हरियाणा द्वारा सेमीनार आयोजित रोहतक(सच कहूँ न्यूज)। महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हुए राजनीति में आना चाहिए ताकि वे महिला सशक्तिकरण के कानूनों की मांग को मजबूती से उठा सकें। यह बात हरियाणा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2 style="text-align:justify;">-महिला आयोग की चेयरपर्सन ने किया महिलाओं के कानूनी अधिकार पुस्तक का विमोचन</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;">-जाट कॉलेज में सर्च-राज्य संसाधन केन्द्र हरियाणा द्वारा सेमीनार आयोजित</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>रोहतक(सच कहूँ न्यूज)।</strong> महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हुए राजनीति में आना चाहिए ताकि वे महिला सशक्तिकरण के कानूनों की मांग को मजबूती से उठा सकें। यह बात हरियाणा राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन प्रतिभा सुमन ने बुधवार को जाट कॉलेज के सभागार में भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा महिलाओं के कानूनी अधिकार विषय पर आयोजित जागरूकता सेमिनार को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बहुत ही कम है जिसके कारण महिलाओं के मुद्दों पर विचार-विमर्श बहुत कम हो पाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, इसलिए महिलाओं को राजनीति में अपनी भागीदारी को बढ़ाना चाहिए ताकि वे अपने पक्ष को मजबूती से रख सकें। जिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी करमिन्दर कौर ने कहा कि दुनिया में किसी न किसी रूप में भेदभाव होता रहा है। महिलाओं के साथ भी हर वर्ग में भेदभाव हो रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज को मानसिकता बदलते हुए महिलाओं को सम्मान देना होगा, तभी सार्थक समाज का निर्माण हो सकता है। एसएचओ गरिमा श्योराण ने कहा कि पुराने समाज में महिलाएं घर तक सीमित रहती थीं। वर्तमान में महिलाओं ने घर की चार दीवारी को लांघ ली है, लेकिन उनके सामने जागरुकता के साथ अनेक समस्याएं भी आ गई हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अब एकल परिवार के कारण माता-पिता बच्चों पर नहीं दे पाते ध्यान</h2>
<p style="text-align:justify;">अब एकल परिवार होने के कारण माता-पिता बच्चों पर बहुत कम ध्यान दे पा रहे हैं। जिस कारण महिलाओं के साथ आपराधिक मामले बढ़ते जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने महिलाओं की समस्या को ओर ज्यादा बढ़ा दिया है। चेयरपर्सन ने छात्राओं का आह्वान किया कि वे अत्याचार को सहन न करें। जब भी कोई उन्हें परेशानी आए अपने अधिकारों का प्रयोग करें। महिलाएं ही अपने आत्मविश्वास से स्वयं की स्थिति को बदल सकती हैं। इस अवसर पर प्राचार्या डॉ. संगीता दलाल, डॉ. शबनम राठी, डॉॅ. सुशीला डबास, डॉ. मीनल मलिक, डॉ. जसमेर सिंह, डॉ. शीशपाल, विमलेश कुमारी, डॉ. आरएस दहिया मौजूद रहे।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/release-of-legal-rights-book/article-7670</link>
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                <pubDate>Wed, 13 Feb 2019 19:20:23 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कानूनी उत्पीड़त के विरोध में सवर्ण</title>
                                    <description><![CDATA[Protest Against legal Harassment बम को चिंगारी से बचाने की दूरदृष्टि हमारे ज्यादातर नेताओं में नहीं है। यदि दृष्टि होती तो सर्वोच्च न्यायालय के 20 मार्च 2018 को आए जिन दिशा-निर्देश को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने न्यायालय के आदेश को पलटा, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप आज देश में सवर्ण और पिछड़े समुदाय के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/protest-against-legal-harassment/article-5767"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/protest-against-legal-harassment.jpg" alt=""></a><br /><h1 class="tw-data-text tw-ta tw-text-medium" dir="ltr"><span lang="en" xml:lang="en">Protest Against legal Harassment</span></h1>
<p style="text-align:justify;">बम को चिंगारी से बचाने की दूरदृष्टि हमारे ज्यादातर नेताओं में नहीं है। यदि दृष्टि होती तो सर्वोच्च न्यायालय के 20 मार्च 2018 को आए जिन दिशा-निर्देश को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने न्यायालय के आदेश को पलटा, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप आज देश में सवर्ण और पिछड़े समुदाय के लोग सड़कों पर उतरकर भारत बंद के लिए मजबूर न हुए होते ? इस शांतिपूर्ण बंद की खासियत यह रही कि इसमें नेता और नेतृत्व नदारद थे। बावजूद बिहार में हिंसा और आगजनी की घटनाओं को छोड़ दें तो बंद सफल रहा। इस बंद का आह्वान 35 सवर्ण और ऐसे पिछड़े जातिगत संगठनों ने किया था, जिनकी कोई देशव्यापी पहचान नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय देश के नेताओं की गति सांप-छछूंदर सी हो गई है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सबके ओंठ सिले हुए है। कोई भी नेता अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न अधिनियम के समर्थन या विरोध में बोलने को तैयार नहीं है। यहां तक कि दलितों के बूते राजनीति करने वाली मायावती और पिछड़ी जातियों के बूते तीन दशक से सत्ता व राजनीति के सिरमौर रहे लालू, मुलायम और शरद यादव भी चुप हैं। इससे पता चलता है कि हमारे नेता राजनीति का सतही खेल खेलते हुए सिर्फ वोट की राजनीति करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एनडीए में शामिल दलित नेताओं के दबाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ गए और सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को बदल दिया, जिसमें दलितों द्वारा उत्पीड़न की रिपोर्ट करने पर नरमी बरतते हुए जांच के बाद एफआईआर दर्ज करने का प्रावधान किया था। दरअसल निसंदेह भारतीय समाज की यह एक कड़वी सच्चाई है कि अभी भी दलित और आदिवासियों पर आर्थिक रूप से संपन्न और दबंग जातियों द्वारा अत्याचार होते हैं। किंतु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अजा और अजजा उत्पीड़न निरोधक कानून का दुरुपयोग भी बेहिसाब होता है।</p>
<h1 class="tw-data-text tw-ta tw-text-medium" dir="ltr"><span lang="en" xml:lang="en">Protest Against legal Harassment</span></h1>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने इसी दुरुपयोग को रूकने के लिए प्रावधान किया था कि मुकदमा दायर होते ही किसी को गिरफ्तार न किया जाए और 7 दिन के भीतर एसडीओपी स्तर का अधिकारी मामले की जांच करे। तत्पश्चात सही पाए जाने पर मामला दर्ज हो। इसी प्रावधान के विरुद्ध 2 अप्रैल 2018 को दलित समुदाय के लोगों ने न केवल भारत बंद किया, बल्कि हिंसा और आगजनी की घटनाओं को भी अंजाम दिया था। राजग सरकार ने न्यायालय के आदेश को पलटते हुए यह भी दावा किया था कि सरकार ने संसद के मानसून सत्र में दलितों के हित में जो कानून पारित किया है, वह भविष्य में न्याय का सत्र कहलाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा इसलिए भी कहा गया क्योंकि इसी सत्र में पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दिया गया था। सवर्ण और पिछड़े समाज ने न्याय के सत्र की संज्ञा को दलितों का वोट के लिए तुष्टीकरण माना और इसे शाहबानों प्रकरण की तरह देखा और इसी परिप्रेक्ष्य में सफल भारत बंद किया। तेलंगाना के मुख्यमंत्री द्वारा सरकार भंग करने का प्रस्ताव राज्यपाल को दे दिए जाने से यह भी उम्मीद है कि इन्हीं राज्यों के साथ तेलंगाना के भी चुनाव हो सकते हैं। ऐसे में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के सामने चुनौती यह भी है कि वे कैसे दलित, सवर्ण और पिछड़ों को एक साथ खुश रखते हुए सामाजिक समरसता का वातावरण बनाए रखें ?</p>
<p style="text-align:justify;">अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 में दर्ज मामलों में महज गिरफ्तारी के प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने नए निर्देश दिए थे। जिससे इस कानून का दहेज कानून की तरह दुरुपयोग न हो। अदालत ने सिर्फ यह फैसला दिया था कि इस कानून में सिर्फ प्राथमिकी के आधार पर गिरफ्तारी न हो, क्योंकि यह गलत है। आदर्श स्थिति तो यही होती यदि शीर्ष न्यायालय ने किसी मुद्दे पर कोई फैसला दिया है तो उसे लेकर सड़कों पर उतरकर अराजकता फैलाने से बचा जाए। दुनिया भर के नागरिक एवं मानवाधिकार संगठनों की भी यह दलील है कि किसी भी गैर-नृशंस अपराध में केवल एफआईआर के आधार पर यदि गिरफ्तारी का प्रावधान है तो उसका दुरुपयोग होगा ही। इसकी मिसाल हमारे यहां दहेज विरोधी कानून है, जिसके शिकार हर जाति, धर्म और वर्ग के लोग हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका दुरुपयोग न हो इस परिप्रेक्ष्य में गिरफ्तारी पर रोक व्यावहारिक थी। हालांकि एसडीओपी स्तर के अधिकारी द्वारा जांच के बाद यदि शिकायत सही पाई जाती है तो गिरफ्तारी की अनुमति करने का प्रावधान था। इसी तरह सरकारी कर्मचारी इस कानून का दुरुपयोग करता है तो उस कर्मचारी की गिरफ्तारी के लिए विभाग के प्रमुख अधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है। इस दृष्टि से यह फैसला जांच के जरिए सच्चाई सामने लाना भर था। वैसे भी शीर्ष न्यायालय सब के लिए है और बदलते समय के अनुसार उसकी व्याख्या भी वर्तमान परिदृश्य में उच्चतम न्यायालय ही करता है।</p>
<h1 class="tw-data-text tw-ta tw-text-medium" dir="ltr"><span lang="en" xml:lang="en">Protest Against legal Harassment</span></h1>
<p style="text-align:justify;">संविधान का प्रमुख रक्षक भी यही न्यायालय है। ऐसे में यदि उसकी मंशा पर संदेह का सिलसिला चल निकला तो धर्म और जाति से जुड़े फैसलों के विरोध का सिलसिला भी चल पड़ेगा। जबकि संविधान में दर्ज प्रावधानों के आधार पर ही सभी जाति और धर्म के लोगों को देश में सम्मानजनक ढंग से रहने के मौलिक अधिकार मिले हुए हैं। गोया अदालत के फैसलों का सम्मान जरूरी है। 55 साल कांग्रेस देश की सत्ता पर काबिज रही, लेकिन उसने संगठन के स्तर पर अनुसूचित जाति व जनजातियों के उत्थान व संमृद्धि के लिए कोई प्रकल्प नहीं चलाए। जबकि संघ के करीब डेढ़ लाख प्रकल्प आदिवासियों की शिक्षा और कल्याण के लिए चल रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे दलित एवं आदिवासी समुदाय सदियों से कई तरह की मनोवैज्ञानिक हिंसा शरीरिक प्रताड़ता झेलते आए हैं। इस नजारिए से उन्हें एससी-एसटी एक्ट एक हथियार का अनुभव कराता है। ऐसे में इसमें कोई संशोधन का प्रावधान सामने आता है तो उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि उनके हथियार की धार भौंथरी हो जाएगी। उनकी ताकत कमजोर पड़ जाएगी। इसमें शताब्दियों से चले आ रहे उनके शोषण पर प्रतिबंध का कानूनी भरोसा अंतर्निहित है। वैसे दलित और आदिवासियों में फैली निराशा के लिए किसी एक सरकार या दल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश पर 55 साल कांग्रेस और 10 साल भाजपा ने राज किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बीच-बीच में मोरारजी देसाई, चरणसिंह, चंद्रशेखर, वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल को भी प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन समस्याएं यथावत रहीं। इनमें से कोई भी दल और नेता राजनैतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर समस्याओं के समाधान की दिशा में आगे नहीं बढ़ा। नतीजतन दबंग लोगों के हाथों दलित और आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन बरकरार रहा। यदि सत्तर साल की आजादी के बाद भी यह कलंक और भेदभाव बना रहता है तो यह स्थिति संवैधानिक लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। प्रत्येक जाति व धर्म समुदाय की अपनी जातीय गरिमा होती है। इस लिहाज से दलितों की भी अपनी गरिमा है। गोया अन्य जातीय समूहों को उनकी गरिमा का सम्मान करना चाहिए। <em><strong>प्रमोद भार्गव</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/protest-against-legal-harassment/article-5767</link>
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                <pubDate>Fri, 07 Sep 2018 12:44:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भ्रष्टाचार के दोषियों के खिलाफ की जाए कानूनी कार्रवाई: खमनेई</title>
                                    <description><![CDATA[भ्रष्टाचार के दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा देना होना चाहिए। दुबई (एजेंसी)। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खमनेई ने देश में वित्तीय भ्रष्टाचार के दोषियों के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्रवाई करने का आह्वान किया है।ईरान के सरकारी टेलीविजन चैनल ने शनिवार को इस बात की जानकारी दी। खमनेई ने कहा कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/legal-action-should-be-taken-against-the-culprits-of-corruption-khamenei/article-5346"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/khamenei.jpg" alt=""></a><br /><h2>भ्रष्टाचार के दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा देना होना चाहिए।</h2>
<p><strong>दुबई (एजेंसी)।</strong> ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खमनेई ने देश में वित्तीय भ्रष्टाचार के दोषियों के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्रवाई करने का आह्वान किया है।ईरान के सरकारी टेलीविजन चैनल ने शनिवार को इस बात की जानकारी दी। खमनेई ने कहा कि अदालतों का उद्देश्य वित्तीय भ्रष्टाचार के दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा देना होना चाहिए। ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख अयातुल्ला सादिक अमोली लारीजानी ने खमनेई को एक पत्र लिखकर कहा कि देश में आर्थिक युद्ध जैसे हालात हैं।</p>
<p>बढ़ती हुयी कीमतों और कथित वित्तीय भ्रष्टाचार को लेकर जनता के बीच व्याप्त रोष के मद्देनजर ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।लारीजानी ने अपने पत्र में कहा कि ईरान की वर्तमान वित्तीय स्थिति आर्थिक युद्ध जैसे हालात के समान है। भ्रष्टाचार के मामलों से जल्द से जल्द निपटा जाए इसके लिए उन्होंने श्री खमनेई से विशेष अदालतों का गठन करने की भी मांग की।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Aug 2018 10:45:16 +0530</pubDate>
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                <title>अवैध प्रवासियों को बगैर कानूनी प्रक्रिया के वापस भेजा जाना चाहिए: ट्रम्प</title>
                                    <description><![CDATA[अपने देश में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकते वाशिंगटन (एजेंसी)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को कहा कि जो लोग गैरकानूनी तरीके से अमेरिका की सीमा में प्रवेश करते हैं उन्हें बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया पूरी किये बिना जहां से वे आए हैं वहां वापस भेजा जाना चाहिए। ट्रम्प ने अपने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/should-be-sent-back-without-legal-process/article-4490"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/tranp.jpg" alt=""></a><br /><h1>अपने देश में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकते</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी)।</strong></p>
<p>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को कहा कि जो लोग गैरकानूनी तरीके से अमेरिका की सीमा में प्रवेश करते हैं उन्हें बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया पूरी किये बिना जहां से वे आए हैं वहां वापस भेजा जाना चाहिए। ट्रम्प ने अपने सिलसिलेवार ट्वीट में कहा, ह्लहम इन सभी लोगों को अपने देश में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकते। जब कोई अमेरिका में आता है तो हमें तत्काल न्यायाधीशों या न्यायालय के मामलों में पड़े बिना उन्हें वापस भेज देना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘हमारे देश को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे सभी लोगों को हम स्वीकार नहीं कर सकते हैं। सीमाओं को मजबूत करना कोई अपराध नहीं।</p>
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                <pubDate>Mon, 25 Jun 2018 11:39:12 +0530</pubDate>
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