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                <title>उत्सव किसका और क्यों? भारत के राजनीतिक योद्धा</title>
                                    <description><![CDATA[बीते वर्ष की स्मृति लेख किन शब्दों में लिखें? खूब जश्न मनाएं और ढ़ोल नगाडेÞ बजाएं? नई आशाओं, सपनों और वायदों के साथ नव वर्ष 2019 का स्वागत करें? या बारह महीनों में निरंतर पतन की ओर बढ़Þते रहने पर शोक व्यक्त करें? वर्ष 2018 को इतिहास में एक मिले जुले वर्ष के रूप में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">बीते वर्ष की स्मृति लेख किन शब्दों में लिखें? खूब जश्न मनाएं और ढ़ोल नगाडेÞ बजाएं? नई आशाओं, सपनों और वायदों के साथ नव वर्ष 2019 का स्वागत करें? या बारह महीनों में निरंतर पतन की ओर बढ़Þते रहने पर शोक व्यक्त करें? वर्ष 2018 को इतिहास में एक मिले जुले वर्ष के रूप में याद किया जाएगा। राजनीतिक दृष्टि से हमारे नेताओं ने जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत चरितार्थ की और भारत के योद्धाओं की तरह कार्य किया। अपने वोट बैंक के अनुरूप कार्य न करने वाली प्रणाली को चलाया। क्या वर्ष 2018 को एक ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जाएगा जिसमें राजनीतिक दलों ने चुनावी जीत की खातिर अपने अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने के लिए कदम उठाए? मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़Þ विधान सभाओं में भाजपा की हार और उससे पहले 11 राज्यों में लोक सभा की चार और विधान सभा की 11 सीटों में से राजग द्वारा केवल तीन सीटों पर जीत दर्ज करना भाजपा के लिए एक बुरा सपना था और इससे विपक्ष को यह संदेश मिला कि स्थानीय स्तर पर एकजुटता के माध्यम से वे भाजपा को हरा सकते हैं। यही स्थिति कर्नाटक की रही जहां पर गौडा की जद (एस) तथा कांग्रेस ने भाजपा को मात दी। राजग ने अपने दो सहयोगी दल आंध्र प्रदेश में तेदेपा और बिहार में आरएसलएसपी को खोया। जबकि शिव सेना, जद (यू), लोजपा और अपना दल आदि सौदेबाजी में बड़ा हिस्सा मांग रहे हैं। ?</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: इस स्थिति के लिए भगवा संघ दोषी है। भाजपा को एक कट्टरवादी पार्टी के रूप में देखा जाता है जिस पर सांस्कृतिक असहिष्णुता अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और गाय की राजनीति का आरोप है तथा अच्छे दिन लाने के लिए इसे मिली सहानुभूति धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है क्योंकि सरकार अपने वायदे पूरे नहीं कर पायी है। अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में आक्रोश है। शहरी क्षेत्रों में उदासीनता है और युवा रोजगार के अवसर न मिलने के कारण गुस्से में हैं। साथ ही सांप्रदायिक धु्रवीकरण और इसके वोट बैंक में कमी के चलते लगता है इसे चुनावी लाभ नहीं मिल पाएगा। प्रश्न उठता है कि क्या मोदी पर जीत दर्ज की जा सकती है? निश्चित रूप से 2018 कांग्रेस के राहुल का रहा जो पप्पू से कांग्रेस अध्यक्ष बने और जिन्होंने हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भाजपा से तीन राज्यों से सत्ता छीनी। इसके अलावा विपक्षी दल की एकजुटता से लगने लगा है कि वे चुनावी लाभ के लिए अपनी प्रतिद्वंदिता भुला सकते हैं। चाहे उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा और अखिलेक्ष की सपा के बुआ भतीजे हों या कर्नाटक में राहुल की कांग्रेस और गौड़ा की जद (एस) हो और तेलंगाना में कांग्रेस तथा तेदेपा हों। किंतु क्या यह एकजुटता 2019 में भी बनी रहेगी?</p>
<p style="text-align:justify;">इस राजनीतिक आक्रोश और आम आदमी द्वारा रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष से जूझने के बीच नए वर्ष में गुस्साई जनता बदलाव की आशा कर रही है। आज जनता नए महाराजाओं से खिन्न है जो कुछ लोग अन्य लोगों से अधिक समान हैं के ओरवेलियन सिंड्रोम और हमेशा और अधिक की मांग की ओलियर डिसआॅर्डर से ग्रस्त हैं। सामाजिक मोर्चे पर भी स्थिति निराशाजनक है। स्वतंत्रता के सात दशकों बाद और शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन पर खरबों रूपए खर्च करने के बाद भी देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या भूखी, अशिक्षित और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं से वंचित है। उसके पास कोई कौशल नहीं है। देश में जातिवाद और सांप्रदायिकता बढ़ती जा रही है। असहिष्णुता और अपराधीकरण भी बढ़ता जा रहा है। इसका दु:खद पहलू यह भी है कि आम आदमी का व्यवस्था के प्रति मोह भंग हो रहा है जो कभी भी आक्रोश का रूप ले सकता है। किसी भी मोहल्ला, जिला या राज्य में चले जाओ स्थिति वही निराशाजनक है। जिसके चलते अधिकाधिक लोग कानून अपने हाथ में ले रहे हैं तथा दंगा, लूट खसोट और बसों को जलाने की घटनाएं बढ़Þ रही हैं। देश की राजधानी दिल्ली में रोड़ रेज में हत्याओं की घटनाएं बढ़Þ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारी व्यवस्था इतनी बीमार हो गई है कि चलती रेलगाड़ियों में महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है और सह यात्री मूक दर्शक बने हुए हैं। जिनके चलते हमारा देश अंधेर नगरी बन गया है। गरीब मुस्लमानों के पुन: धर्मान्तरण के घर वापसी कार्यक्रम और हिन्दू लड़कियों को फुसलाकर विवाह करने वाले मुस्लिम लड़कों के विरुद्ध लव जिहाद से लेकर मी टू अभियान में देश में यौन उत्पीड़न छेड़छाड़ की घटनाओं और राजनेताओं बड़ी हस्तियों, अभिनेताओं, लेखकों विज्ञापन निमार्ताओं, संगीतारों आदि द्वारा यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़ और हमले के कई प्रकरण सामने आए हैं जो समाज पुरातनपंथी सोच के साथ जी रहा हो वहां पर महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता को अनैतिकता माना जाता है। देश में महिलाओं के प्रति सम्मान का अभाव दर्शाया गया है जिसके चलते वे ऐसे लोगों की शिकार बनती रहती हैं हालांकि महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। विडंबना देखिए। लोक सभा द्वारा तीन तलाक विधेयक को पारित किया गया और इसमें तीन तलाक की प्रथा को अपराध माना गया है। यह कानून स्थिति में बदलाव लाने वाला है और इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। इससे न केवल 21वीं सदी की मुस्लिम महिलाएं मुस्लिम पर्सनल कानून के शिकंजे से मुक्त होंगी अपितु उन्हें कानून के समक्ष समानता मिलेगी और लिंग के आधार पर उनके साथ हो रहा भेदभाव दूर होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि विपक्ष का कहना है कि इस कानून के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया रहा है। न केवल समाज में बदलाव की आवश्यकता है अपितु हमारी अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देने की आवश्यकता है। नोटबंदी के बाद लगता है नमो एंड कंपनी भटक गयी है। वे दिशाहीन बन गए हैं। वे महंगाई, कृषि संकट, बढ़ती बेरोजगारी जैसी मुख्य समस्याओं का निराकरण नहीं कर पाए हैं। क्या इस वर्षान्त तक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.2-7.5 प्रतिशत रहने से लोगों की समस्याएं दूर हो जाएगी या महंगाई पर अंकुश लगेगा? यही नहीं चार वर्ष के अंतराल में रिजर्व बैंक के दो गर्वनरों और सरकार के दो मुख्य आर्थिक सलाहकारों ने त्यागपत्र दिया है। किसानों में निराशा व्याप्त है और किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। हालांकि अब सरकार ने किसानों को राहत पैकेज देने के लिए एक बड़ी योजना तैयार की है। गैलप सर्वे में पाया गया है कि 2014 में 1 से 10 के पैमाने पर भारतीय 4.4 पर थे और अब वे 4 पर आ गए हैं। 14 प्रतिशत लोगों का मानना था कि उन्होने प्रगति की है। आज उनकी संख्या केवल 4 प्रतिशत रह गयी है। 2014 में दो वक्त की रोटी जुटाने में दिक्कतों का सामना करने वाले लोगों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में 28 प्रतिशत थी जो आज 41 प्रतिशत है और शहरी क्षेत्रों में 18 प्रतिशत थी जो आज 26 प्रतिशत है। आम आदमी का पेट जुमलों से भरा जा रहा है। राजनीतिक क्षितिज पर कोई आशा की किरण नहीं दिखायी दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोग विकल्प कल तलाश कर रहे हैं। भाजपा नीत राजग पतनोन्मुखी है किंतु क्या कांग्रेस या प्रस्तावित महागठबंधन विकल्प उपलब्ध करा पाएगा? यह सच है कि हमें वैसे ही नेता मिले हैं जिनके हम हकदार हैं। किंतु प्रश्न यह भी उठता है कि क्या ये नेता हमारे लायक हैं। हम अपनी आत्मा को ऐसे छोटे लोगों के पास गिरवी रखने जा रहे है। कुल मिलाकर हमारे नेताओं को लोगों का गुस्सा कम करने का प्रयास करना होगां। समय आ गया है कि जब जनता विशेषकर मौन रहने वाली जनता देश की हर कीमत पर सत्ता प्राप्त करने की राजनीति से परे सोंचे और गुंडे बदमाशों को राजनीति से बाहर खदेडें। हमारे राष्ट्रीय जीवन में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी लाए जाने की आवश्यकता है। हम नव वर्ष 2019 में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए हमारे नेताओं को इन खामियों को दूर कर जिम्मेदारी लेनी होगी। अपने तौर-तरीके बदलने होंगे और शासन की वास्तविक समस्याओं का निराकरण करना होगा। लोग रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहते हैं। हमें ऐसे नेता चाहिए जो साहसी और दृढ़ विश्वासी हों तथा जो नए भारत का निर्माण कर सकें। कठिन समय में कठिन निर्णय लेने की आवश्यकता है किंतु मूल प्रश्न है: कौन विजेता बनेगा? क्या जो विजेता बनेगा वह कठोर कदम लेने में सक्षम होगा? क्या वह अपनी इच्छाशक्ति का उपयोग कर पाएगा? हां। हम आशा करते हैं कि 2019 में भारत में ऐसा देखने को मिलेगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>पूनम आई कौशिश</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Jan 2019 10:21:16 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>विदेशों में ही क्यों बढ़ रही है हिन्दी की ताकत</title>
                                    <description><![CDATA[भारत एक है, संविधान एक है। लोकसभा एक है। सेना एक है। मुद्रा एक है। राष्ट्रीय ध्वज एक है। लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए। बात चाहे राष्ट्र भाषा हो या राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत- इन सबको भी समूचे राष्ट्र में सम्मान एवं स्वीकार्यता मिलनी चाहिए। राष्ट्र […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-is-the-power-of-hindi-growing-in-foreign-countries/article-5409"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/unnamed-file.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत एक है, संविधान एक है। लोकसभा एक है। सेना एक है। मुद्रा एक है। राष्ट्रीय ध्वज एक है। लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए। बात चाहे राष्ट्र भाषा हो या राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत- इन सबको भी समूचे राष्ट्र में सम्मान एवं स्वीकार्यता मिलनी चाहिए। राष्ट्र भाषा हिन्दी को आजादी के 72वर्ष बीत जाने पर भी अपने ही देश में घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जो राष्ट्रीय शर्म का विषय है, जबकि विश्व में हिन्दी की ताकत बढ़ रही है, जिसका ताजा प्रमाण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) द्वारा हिन्दी में ट्वीटर सेवा शुरू करना। देश के सम्मान में उस समय और अधिक इजाफा हुआ जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने ट्विटर पर हिंदी में अपना अकाउंट बनाया और हिंदी भाषा में ही पहला ट्वीट किया। पहले ट्वीट में लिखा संदेश पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने फेसबुक पर भी हिंदी पेज बनाया है। साथ ही साथ साप्ताहिक हिन्दी समाचार भी सुने जा सकेंगे। भारत सरकार के प्रयत्नों से हिन्दी को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, यह सराहनीय बात है। लेकिन भारत में उसकी उपेक्षा कब तक होती रहेगी?</p>
<p style="text-align:justify;">मॉरिशस में होने वाले 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में गोस्वामी तुलसीदास, महानकवि अभिमन्यु अनंत व गोपालदास के नाम पर सभागार बनाए गए हैं। विदेशमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के इस कथन से एक नया विश्वास जगा है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को मान्यता दिलाने के सरकार के प्रयास सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं। आने वाले समय में विदेश मंत्रालय दुनिया भर में और खासकर गिरमिटिया देशों में हिंदी को बचाने के लिए और भी कदम उठाएगा। नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 से लेकर भोपाल में आयोजित 2015 के सम्मेलन तक बार-बार यह प्रश्न खड़ा होता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी कब अधिकारिक भाषा बनेगी। इसके लिये सबसे बड़ी बाधा 193 देशों के दो तिहाई सदस्य देशों की सहमति-समर्थन नहीं है बल्कि इन सभी देशों को इस पर होने वाले खर्च की है। इसी बाधा की वजह से जर्मनी और जापान की भाषा भी वह स्थान हासिल नहीं कर पाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे पहले 1977 में हिंदी में भाषण दिया था अटल बिहारी बाजपेयी ने। उस वक्त वे जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री थे और यूएन में भारत की अगुवाई कर रहे थे। संयुक्त राष्ट्र में किसी भी भारतीय के पहले हिंदी भाषण का पूरे देश में जोरदार स्वागत हुआ था। उनके भाषण की जगह-जगह चर्चा होती थी। इसके बाद उन्होंने सन 2002 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दोबारा इस अंतरराष्ट्रीय मंच से हिंदी में अपनी बात रखी थी। लेकिन प्रश्न यह है कि दोनों ही सक्षम नेताओं ने हिन्दी को अपने ही देश में क्यों उपेक्षित रहने दिया। क्या कारण है कि आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय प्रतीकों की उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है जिससे ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है। छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता। राष्ट्र-भाषा को लेकर छाए धूंध को मिटाने के लिये कुछ ऐसे ही ठोस कदम उठाने ही होंगे। विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान नहीं। महान् उस दिन बनेंगे जिस दिन राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र-गान एवं राष्ट्र-गीत को उचित स्थान एवं सम्मान देंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">कितने दुख की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमारे दूर-दराज के जिलों में राज्य सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं। हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है। लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है। किसी भी देश की भाषा और संस्कृति किसी भी देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। भाषा राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Aug 2018 21:17:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>जब सिगरेट पर चेतावनी लिख सकते हैं तो गंगा पर क्यों नहीं: NGT</title>
                                    <description><![CDATA[ राष्ट्रीय हरित प्राधिकरणनेगंगा के पानी की स्थिति पर को लेकर जताई चिंता नई दिल्ली (एजेंसी)। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने गंगा की हालत पर बेहद चिंता जताई है। साथ ही कहा है कि जब सिगरेट के पैकेट पर यह लिखकर चेतावनी दी जा सकती है कि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो फिर गंगा नदी के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/if-cigarette-pack-contain-warning-why-not-ganga-water-says-ngt/article-5038"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/ganga.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;"><strong> </strong>राष्ट्रीय हरित प्राधिकरणनेगंगा के पानी की स्थिति पर को लेकर जताई चिंता</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong>राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने गंगा की हालत पर बेहद चिंता जताई है। साथ ही कहा है कि जब सिगरेट के पैकेट पर यह लिखकर चेतावनी दी जा सकती है कि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो फिर गंगा नदी के ऊपर क्यों नहीं? इसके साथ ही, एनजीटी ने हरिद्वार से उन्नाव के बीच गंगा के पानी की स्थिति पर को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की है, जो नहाने और पीने के लायक नहीं है।इसके साथ ही, एनजीटी ने नेशनल मिशन फॉर गंगा क्लीन को यह आदेश दिया है कि वह हर 100 किलोमीटर की दूरी पर पर्याप्त सूचना के साथ एक बोर्ड लगाएं। उसमें गंगा नदी के पानी की क्वालिटी के बारे में पूरी सूचना हो ताकि यह पता चल सके कि वो पीने और नहाने के लायक है या नहीं।</p>
<h2>स्वास्थ्य के लिए खतरनाक</h2>
<p style="text-align:justify;">एनजीटी ने कहा कि मासूम लोग श्रद्धापूर्वक नदी का जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है। एनजीटी ने कहा, मासूम लोग श्रद्धा और सम्मान से गंगा का जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं। उन्हें नहीं पता कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। अगर सिगरेट के पैकेटों पर यह चेतावनी लिखी हो सकती है कि यह ‘ स्वास्थ्य के लिए घातक है , तो लोगों को (नदी के जल के) प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी क्यों नहीं दी जाए ?</p>
<h2 style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को सौ किलोमीटर के अंतराल पर डिस्प्ले बोर्ड लगाने का निर्देश</h2>
<p style="text-align:justify;">एनजीटी प्रमुख ए के गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा , ” हमारा नजरिया है कि महान गंगा के प्रति अपार श्रद्धा को देखते हुए , मासूस लोग यह जाने बिना इसका जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं कि जल इस्तेमाल के योग्य नहीं है। गंगाजल का इस्तेमाल करने वाले लोगों के जीवन जीने के अधिकार को स्वीकार करना बहुत जरूरी है और उन्हें जल के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को सौ किलोमीटर के अंतराल पर डिस्प्ले बोर्ड लगाने का निर्देश दिया ताकि यह जानकारी दी जाए कि जल पीने या नहाने लायक है या नहीं।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Jul 2018 05:46:36 +0530</pubDate>
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                <title>समाज में उजालें क्यों हो रहे हैं कम?</title>
                                    <description><![CDATA[व्यक्ति परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से भी जुड़ा है Why Society Heading Towards darkness? स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है। क्योंकि व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं है, वह परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है। अपने लिए जीने का अर्थ है अपने सुख की तलाश और इसी सुख की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-society-heading-towards-darkness/article-4840"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/society-heading-darkness.jpg" alt=""></a><br /><h1>व्यक्ति परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से भी जुड़ा है Why Society Heading Towards darkness?</h1>
<p>स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है। क्योंकि व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं है, वह परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है। अपने लिए जीने का अर्थ है अपने सुख की तलाश और इसी सुख की तलाश ने अनेक समस्याएं पैदा की हैं। सामाजिक जीवन का एक आधारभूत सूत्र है सापेक्षता। निरपेक्ष व्यक्तियों का समूह भीड़ हो सकती है, समाज नहीं। जहां समाज होगा वहां सापेक्षता होगी। और जहां सापेक्षता होगी वहां सहानुभूति, संवेदनशीलता और आत्मीयता होगी। किसी भी संस्था, समाज, देश या राष्ट्र की शक्ति एवं सफलता का आधार है सापेक्ष सहयोग, आपसी प्रतिबद्धताएं। जिस समाज से जुड़े हुए व्यक्ति समूह के हितों के दीयों में अपनी जिंदगी का तेल अर्पित करने की क्षमता रखते हों वही समाज संचेतन, प्रगतिशील, संवेदनशील और संजिदा होता है। स्वस्थ एवं उन्नत समाज वह है जिसमें सामाजिक चेतना एवं संवेदनाओं की अनुभूति प्रखर हो और उसकी क्रियान्विति के प्रति जागरूकता बरती जाती हो। अनेक संगठनों ने सेवा, सहयोग एवं संवेदना की दृष्टि से एक स्वतंत्र पहचान बनाई है।</p>
<h1>स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है। Why Society Heading Towards darkness?</h1>
<p>डेरा सच्चा सौदा, स्वामिनारायण वाले हो या इस्कान वाले, कोई अणुव्रत का मिशन हो या सुखी परिवार अभियान-इनकी विभिन्न संस्थाएं सेवामूलक जनकल्याणकारी प्रवृतियों से जन-जन को अभिप्रेरित कर रही है। रोग या बुढ़ापे की स्थिति में हमारा क्या होगा, इस चिंता से ये संस्थाएं और उनसे जुडे़ लोग निश्चिंत करते हैं। वे पूरी जागरूकता से इस दायित्व को निभाते हैं। हमें भी सेवा का दर्शन अपनाते हुए अपने जीवन के साथ इसे जोड़ना है। इसे जोड़ने का अर्थ है कि हम खुद के लिए जीते हुए औरों के लिए भी जीने का प्रयत्न करें। व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समूहगत भावना से जहां, जब, जो भी हो उसमें हिस्सेदार बनें। इस भावना के विकास का अर्थ होगा कि हमारी संवेदनशीलता जीवंत होगी। सड़क पर पड़े आदमी की सिसकन, भूखे-प्यासे-बीमार की आहेंं, बेरोजगार की बेबसी, अन्याय और शोषण से प्रताड़ित आदमी की पीड़ा-ये सब स्थितियां हमारे मन में करुणा और संवेदना को जगांएगी। और यह जागी हुई करुणा और संवेदना हमें सेवा और सहयोग के लिए तत्पर करेंगी। इस तरह की भावना जब हर व्यक्ति में उत्पन्न होगी तो समाज उन्नत बनेगा, सुखी बनेगा और सुरक्षित बनेगा। न असुरक्षा की आशंका होगी, न अविश्वास, न हिंसा, न संग्रह, न शत्रुता का भाव। एक तरह से सारे निषेधत्मक भावों को विराम मिलेगा और एक नया पथ प्रशस्त होगा।</p>
<h2>पुनरावर्तन के अभाव में पढ़ा हुआ, सीखा हुआ ज्ञान भी विस्मृत हो सकता है Why Society Heading Towards darkness?</h2>
<p>हम अपनी महत्वाकांक्षाओं से इतने बंध गए कि इस स्वार्थ में हमारी संवेदना भी खो गई। आज दूषित राजनीति में सिर्फ अपने को सुरक्षित रखने के सिवाय राजनेताओं का कोई चरित्र नहीं है। यही वजह है कि राष्ट्रीय समस्याओं, फैलती बुराइयों, अंधविश्वासों और अर्थशून्य परंपराओं के सामूहिक विरोध की ताकत निस्तेज पड़ती जा रही है फिर सेवा और सहयोग के आयाम कैसे पनपे? जरूरत है दिशा बदलने की। परार्थ और परमार्थ चेतना जगाने की। दोनों हाथ एक साथ उठेंगे तो एकता, संगठन, सहयोग, समन्वय और सौहार्द की स्वीकृति होगी। कदम-से-कदम मिलाकर चलेंगे तो क्रांतिपथ का कारवां बनेगा। यही शक्ति है समाज में व्याप्त असंतुलन एवं अभाव को समाप्त करने की। व्यक्ति प्रमाद या जड़ता से चरित्र भ्रष्ट हो सकता है, पुनरावर्तन के अभाव में पढ़ा हुआ, सीखा हुआ ज्ञान भी विस्मृत हो सकता है, किंतु सेवा कभी नष्ट नहीं होती। सेवाजनित लाभ कभी कहीं नहीं जाता। राजस्थानी कहावत है-ह्यकरें सेवा मिलें मेवा। समाज स्तर पर सेवा के लाभ की मीमांसा करते हुए स्थानांग सूत्र के टीकाकार लिखते हैं-सेवा के व्यावहारिक लाभ हैं, शारीरिक या मानसिक दृष्टि से रुग्ण तथा वृद्ध व्यक्तियों के चित्त में समाधि पैदा करना, उन्हें भविष्य के प्रति आश्वस्त करना, ग्लानि का निवारण करना, वात्सल्य प्रकट करना, रोगी या वृद्ध को नि:सहायता अनाथता का अनुभव न होने देना।</p>
<h2>प्राचीनकाल में स्वार्थ कम तथा स्नेह व सौहार्द ज्यादा था, आज उसमें आई कमी  Why Society Heading Towards darkness?</h2>
<p>निशीथ भाष्यकार लिखते हैं-समाज के सदस्यों की सेवा करने वाला धर्म-वृक्ष की सुरक्षा करता है। सबकी प्रियता प्राप्त करता है और महान निर्जरा, चित्त शुद्धि का भागी बनता है। मेरी दृष्टि में यही सच्ची धार्मिकता है।<br />
समाज में उजालों की जरूरत आज ज्यादा महसूस की जा रही है, क्योंकि वास्तविक उजाला जीवन को खूबसूरती प्रदान करता है, वस्तुओं को आकार देता है, शिल्प देता है, रौनक एवं रंगत प्रदान करता है। उजाला इंसान के भीतर ज्ञान का संचार करता है और अंधकार को खत्म कर जीवन को सही मार्ग दिखाता है। नकारात्मक दृष्टिकोण दूर कर सकारात्मक दृष्टि और सोच प्रदान करता है। खुली आंखों से सही-सही देख न पाएं तो समझना चाहिए कि यह अंधेरा बाहर नहीं, हमारे भीतर ही कहीं घुसपैठ किये बैठा है और इसीलिये हम अंधेरों का ही रोना रोते हैं। जबकि जीवन में उजालों की कमी नहीं हैं। महावीर का त्याग, राम का राजवैभव छोड़ वनवासी बनना और गांधी का अहिंसक जीवन -ये उजालों के प्रतीक हैं जो भटकाव से बचाते रहे हैं।</p>
<h2>उजाला इंसान के भीतर ज्ञान का संचार करता है Why Society Heading Towards darkness?</h2>
<p>महान दार्शनिक आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने सेवा की प्रवृतियों को प्रोत्साहन दिया है। उन्होंने कहा है प्राचीनकाल में स्वार्थ कम तथा स्नेह व सौहार्द ज्यादा था। आज उसमें कमी आई है। इसका एक कारण है धन के प्रति आकर्षण और नकारात्मक चिंतन। जहां सकारात्मक चिंतन का विकास होता है वहां संबंधों में सौहार्द बढ़ता है। इसके लिए जरूरी है व्यक्ति अपने भीतर झांके। अंतर्दृष्टि को जागृत कर नया प्रकाश प्राप्त करें। अपेक्षा है कि समाज का हर अंग सेवा की विभिन्न प्रवृतियों के साथ जुड़कर उसी नये प्रकाश को प्राप्त कर सकते हैं, वह ईश्वरत्व का बीज है, स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार का मार्ग है।</p>
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                <pubDate>Sun, 15 Jul 2018 07:42:16 +0530</pubDate>
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                <title>क्यों न एडमीशन प्रक्रिया को रोक दिया जाए : हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[एमबीबीएस में कम वार्षिक आय पर दाखिले का मामला  हरियाणा सरकार व मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया से मांगा जवाब चंडीगढ़(सच कहूँ न्यूज)। प्रदेश में एमबीबीएस एडमिशन प्रक्रिया में पिछड़े वर्ग में तीन लाख से (Why, Admission, Process, Should, Stopped, HighCourt) कम वार्षिक आय वाले परिवार के बच्चों को एडमिशन में प्राथमिकता देने के निर्णय को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/why-the-admission-process-should-be-stopped-high-court/article-4563"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/haryana-1.jpg" alt=""></a><br /><h1>एमबीबीएस में कम वार्षिक आय पर दाखिले का मामला</h1>
<h3> हरियाणा सरकार व मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया से मांगा जवाब</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़(सच कहूँ न्यूज)।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">प्रदेश में एमबीबीएस एडमिशन प्रक्रिया में पिछड़े वर्ग में तीन लाख से <strong>(Why, Admission, Process, Should, Stopped, HighCourt)</strong></p>
<p style="text-align:justify;">कम वार्षिक आय वाले परिवार के बच्चों को एडमिशन में प्राथमिकता देने के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार सहित मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया और एडमिशन कमेटी को तीन जुलाई के नोटिस जारी कर जवाब तलब कर लिया है, साथ ही पूछा है कि क्यों न इस एडमीशन प्रक्रिया पर रोक लगा दी जाए।</p>
<h1 style="text-align:justify;">क्यों न एडमीशन प्रक्रिया…</h1>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अजय तिवारी एवं जस्टिस महाबीर सिंधु की वकेशन बेंच ने यह नोटिस रोहतक निवासी निशा द्वारा एडवोकेट पृथ्वी राज यादव के जरिये दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया है। दायर याचिका में याचिकाकर्ता ने हरियाणा सरकार द्वारा 18 अगस्त 2016 को जारी उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी है, जिसके तहत हरियाणा सरकार ने पिछड़े वर्ग को आय के आधार पर दो भागों में विभाजित किये जाने का निर्णय लिया है। इस नोटिफिकेशन के तहत एमबीबीएस कोर्स में एडमीशन में पिछड़े वर्ग के उन आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनके परिवार की वार्षिक आय ३ लाख रुपए से कम है। इस नोटिफिकेशन को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए बताया गया है कि यह नोटिफिकेशन सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी के मामले में तय किये गए दिशा-निर्देशों का उलंघन है।</p>
<h1 style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे ये निर्देश</h1>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में यह साफ कर दिया था कि आरक्षण के लाभ को सिर्फ आर्थिक आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। आरक्षण में आर्थिक और समाजिक दोनों तरह के पिछड़ेपन को कारक के रूप में शामिल किया जाना जरूरी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को स्वीकार किया था।</p>
<h1 style="text-align:justify;">यह है याचिकाकर्ता का आरोप</h1>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता का कहना है कि इस मामले में सरकार ने क्रीमी लेयर को तो बाहर रखा है, लेकिन 3 लाख से कम वार्षिक आय वाले परिवार के आवेदकों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है, जो पूरी तरह से गलत है। इस आधार पर पिछड़े वर्ग को दो वर्गों में विभाजित नहीं किया जा सकता है।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Jun 2018 22:28:24 +0530</pubDate>
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