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                <title>Realizing - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>आपसी प्रेम एवं अपनेपन का एहसास कराता हैै ‘रक्षाबंधन’</title>
                                    <description><![CDATA[रक्षाबंधन पर्व भारत के मशहूर पर्वों में से एक है, जो श्रावण मास की पूर्णिमा (Realizing love Is ‘Rakshabandhan’) के दिन मनाया जाता है। भाई-बहन का यह त्यौहार सुरक्षा, स्नेह, सम्मान, आपसी प्रेम और अपनेपन का वचन लेकर आता है। रक्षाबंधन के दिन एक तरफ जहां बहन अपने भाई को प्यार, विश्वास और सम्मान से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/realizing-love-and-belonging-is-rakshabandhan/article-5552"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/realizing-love-is-rakshabandhan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन पर्व भारत के मशहूर पर्वों में से एक है, जो श्रावण मास की पूर्णिमा <strong>(Realizing love Is ‘Rakshabandhan’)</strong> के दिन मनाया जाता है। भाई-बहन का यह त्यौहार सुरक्षा, स्नेह, सम्मान, आपसी प्रेम और अपनेपन का वचन लेकर आता है। रक्षाबंधन के दिन एक तरफ जहां बहन अपने भाई को प्यार, विश्वास और सम्मान से राखी बांधती है, वहीं भाई अपनी बहन को पूरी उम्र उसकी रक्षा का वचन देता है। रक्षाबंधन पर बहन द्वारा भाई को बांधा जाने वाला सूत्र केवल धागा नहीं होता, यह प्रतीक होता उस आपसी प्रेम का, सम्मान का, स्नेह का, जो भाई-बहन के बीच होता है। रक्षाबंधन के नाम से ही महसूस होता है कि रक्षा का बंधन।</p>
<p style="text-align:justify;">पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्षाबंधन पर्व लक्ष्मी जी का बलिराज को राखी बांधने से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि दानवों के राजा बलि ने जब सौ यज्ञ पूरे करने के बाद चाहा कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो, इस पर देव इन्द्र का सिहांसन डोलने लगा। ऐसे में वे भगवान विष्णु के पास जाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हंै, जिसके फलस्वरूप भगवान विष्णु वामन अवतार ले, ब्राह्मण वेश धर कर, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने जाते है। भिक्षा में तीन पग भूमि मांगने पर राजा बलि अपने दिये वचन पर अडिग रहते हुए, श्री विष्णु को तीन पग भूमि दान में देने के तैयार हो जाते है। वामन रुप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">तीसरा पग रखने के लिए राजा बलि अपना सिर आगे करते हंै, जिससे वे परलोक पहुंच जाता है। सर्वस्व दान करने के कारण ही बलिदान शब्द बना। बलि के व्यवहार से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने को कहते है, जिसपर राजा बलि उनसे हरदम अपने सामने रहने का वर मांगते है। जिसके बाद वे वहीं राजा बलि के द्वार पर उनके द्वारपाल बनकर रहते हैं। इसके बाद लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को वापिस लाने के लिए राजा बलि के पास जाकर उन्हें अपना भाई बनाकर राखी बांधती है और इसके उपहार स्वरूप अपने पति भगवान विष्णु को मांगती है। उस दिन से प्रत्येक श्रावण पूर्णिमा को भारत में रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास का एक दूसरा उदाहरण कृष्ण और द्रौपदी को माना जाता है। कृष्ण भगवान ने राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएं हाथ की उंगली से खून बह रहा था, इसे देखकर द्रौपदी बेहद दु:खी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की उंगली में बांध दी, जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। कहा जाता है तभी से कृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। सालों के बाद जब पांडव द्रौपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था, तब कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन का एक और उदाहरण इतिहास के पन्नों में देखने को मिलता है, वो है रानी कर्णावती और सम्राट हुमांयू का। मध्यकालीन युग में राजपूत और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब चित्तौड़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी। तब हुमायूं बहन की रक्षा के लिए आये किंतु तब तक देर हो चुकी थी, और रानी कर्णावती जोहर कर चुकी होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
रक्षाबंधन को भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है और अलग-अलग रूप में मनाया जाता है जैसे उतरांचल में इसे श्रावणी नाम से मनाया जाता है। भारत के ब्राह्मण वर्ग में इस दिन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है, यज्ञोपवीत धारण करना शुभ माना जाता है। कई जगह रक्षा बंधन के दिन ब्राह्मण वर्ग अपने यजमानों को यज्ञोपवीत एवं राखी देकर दक्षिणा लेते हैं। भारत में स्थान बदलने के साथ ही पर्व को मनाने की परम्परा भी बदल जाती है। तमिलनाडू, केरल और उड़ीसा आदि दक्षिण भारत में रक्षाबंधन को अवनि अवितम के रुप में मनाया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन की परंपरा उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं, भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरूआत क्यों न की हो, लेकिन उसकी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है। आज रक्षाबंधन भारत के बड़े त्यौहारों में शामिल है। बहनें अपने भाईयों-भतीजों के लिए सुन्दर-सुन्दर राखियां खरीद कर लाती है, और पूर्णिमा के दिन शुभ समयनुसार उनकी कलाई पर बांध उन्हें अपनी जिम्मेवारियों का एहसास दिलाती है।<em> <strong>सौरभ जैन</strong></em></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Aug 2018 13:17:43 +0530</pubDate>
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                <title>सपने देखना नहीं साकार करने के लिए जुटना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[हरि शंकर आचार्य सिने अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू’ शुक्रवार को रिलीज हुई। इसने पहले ही दिन सफलता के झंडे गाड़ दिए। इससे पहले यूट्यूब पर जारी हुए इसके टीजर को लगभग छह करोड़ बार देखा जा चुका है। यहां इस फिल्म का उल्लेख करना इस कारण जरूरी है क्योंकि यह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/need-to-mobilize-for-realizing-no-dreams/article-4591"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/dream.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">
हरि शंकर आचार्य</p>
<p style="text-align:justify;">सिने अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू’ शुक्रवार को रिलीज हुई। इसने पहले ही दिन सफलता के झंडे गाड़ दिए। इससे पहले यूट्यूब पर जारी हुए इसके टीजर को लगभग छह करोड़ बार देखा जा चुका है। यहां इस फिल्म का उल्लेख करना इस कारण जरूरी है क्योंकि यह फिल्म बॉलीवुड के सफलतम डायरेक्टर्स में से एक राजकुमार हिरानी की फिल्म है। वही राजकुमार हिरानी जिसने अब तक चार फिल्में बनाई हैं और चारों ही सुपर हिट रही हैं। अगर इन चार फिल्मों की कुल कमाई जोड़ें तो यह नौ सौ करोड़ के पार पहुंच चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">
हिरानी ने सबसे पहले वर्ष 2003 में बनाई ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’। इसने कमाए 34 करोड़। दूसरी फिल्म 2006 में आई ‘लगे रहो मुन्ना भाई’। इसने सौ करोड़ से अधिक कमाई की। वर्ष 2009 में हिरानी लाए ‘थ्री इडियट्स’। इसने 273 करोड़ कमाकर रिकॉर्ड बनाया तो वर्ष 2014 में आई ‘पीके’ ने पुराने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए लगभग 450 करोड़ रुपये कमा लिए। एक बात और ‘पीके’ की कहानी भी खुद हिरानी ने लिखी। इस पटकथा लेखन में उन्हें पांच वर्ष का समय लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
अब चलते हैं हिरानी के बैकग्राउंड पर। राजकुमार हिरानी का जन्म 22 नवंबर 1962 को नागपुर के सिंधी परिवार में हुआ। राजकुमार के परिजन उन्हें चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन हिरानी पढ़ाई में बहुत होशियार नहीं थे। उनके कभी अच्छे अंक नहीं आए। इस कारण यह सपना पूरा नहीं हो सका। हिरानी के पिता एक टाइपिंग इस्टीट्यूट चलाते थे। वे इस काम में पिता की मदद करते थे। हां, अभिनेता बनना उनका सपना था। इसी कारण उनके पिता ने फोटोशूट करवाकर उन्हें मुंबई के एक्टिंग स्कूल भेजा लेकिन वहां राजकुमार हिरानी का मन नहीं लगा और वे जल्दी ही इसे छोड़कर आ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">
इस दौरान उन्होंने खुद को एडवरटाइजिंग फिल्मों में निर्माता निर्देशक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। वे फेविकोल के एक विज्ञापन में भी दिखा दिए। उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ में के प्रोमो और ट्रेलर पर काम किया। ‘करीब’ के प्रोमो एडिट किए, लेकिन वर्ष 2000 में ‘मिशन कश्मीर’ की एडिटिंग करते हुए उन्होंने पहली बार सफलता का स्वाद चखा। बस फिर क्या था, राजकुमार हिरानी ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। चाहे ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ हो ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ और चाहे ‘थ्री इडियट्स’ और ‘पीके’ हर बार उन्होंने न सिर्फ सफलता प्राप्त की बल्कि इस सफलता को और अधिक बड़ी करते रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">
राजकुमार हिरानी ने हर फिल्म के लिए एक यूनीक स्टोरी का चयन किया। यही कारण है कि हिरानी को राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उनकी फिल्मों ने अनेक पुरस्कार जीते और लोगों के दिल जीतने में भी कामयाब रहे। हर सफलता के बाद हिरानी ने कई गुने जोश के साथ नया प्रोजेक्ट हाथ में लिया और उसमें भी सफलता को चूमकर दम लिया। संजय दत्त हमेशा से ही उनके नजदीक रहे। इस कारण उन्होंने अपनी पटकथा के मूल में दत्त के जीवन को रखा। उनके जीवन में अनेक छूए-अनछूए पहलुओं को बड़ी शिद्दत के साथ दर्शकों के बीच रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">
पर्दे पर यह फिल्म रिलीज हो चुकी है और सफलता की ओर बढ़ रही है। नि:संदेह यह फिल्म भी हिरानी के पुराने अनुभवों को दोहराएगी। ऐसा नहीं है कि राजकुमार हिरानी को यूं ही मिल गई। इसके लिए उन्होंने बहुत मेहनत की। स्वयं को स्थापित करने के लिए दिन-रात एक कर दिए। उनका कोई फिल्मी बैकग्राउण्ड नहीं था, लेकिन उनके मन में कुछ करने का जुनून था। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। इसके बूते उन्होंने इतिहास रच डाला। उन्होंने हर बार ‘मन’ की आवाज सुनी। दर्शकों की नब्ज को समझा और एक से बढ़कर एक यूनिक सब्जेक्ट के साथ पर्दे पर आए। तो इस ‘संडे’का ‘फंडा’ यह है कि सिर्फ सपने देखने से कुछ नहीं होता बल्कि इन सपनों को साकार करने अथक परिश्रम करना पड़ता है। इस राह में बाधाएं भी आती हैं, लेकिन उनसे घबराए बिना लगातार आगे बढ़ने वाला ही इतिहास रच सकता है।</p>
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                <pubDate>Sun, 01 Jul 2018 08:28:45 +0530</pubDate>
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